30 अप्रैल 2019

समय के साथ झूलती ज़िन्दगी


अपनों तक अपनी बात कहने और ग़ैरों तक अपनी बात कहने के बीच के अंतर को समझना आवश्यक होता है. कई बार समय ऐसे हालात पैदा कर देता है कि व्यक्ति चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता है. दो व्यक्तियों के बीच के तालमेल को या फिर उनमें पैदा हुए अविश्वास को कोई और नहीं समय पैदा करता है. क्या वाकई ऐसा होता है? क्या वाकई ऐसा ही होता है? क्या सिर्फ समय ही ऐसा होता है जिसके चलते व्यक्ति कुछ कर नहीं पाता है या फिर करने में असमर्थ रहता है? सबसे पहले समझना होगा कि समय आखिर है क्या? क्या समय वही है जो किसी घड़ी के माध्यम से गुजर रहा है? क्या ये समय वही है जिसके चलते किसी व्यक्ति की उम्र बढ़ रही है? या फिर समय एक परिस्थिति है, एक स्थिति है, एक सोच है जिसके द्वारा कोई भी इन्सान कुछ करने के लिए तत्पर रहता है. असल सच यही है. समय तो किसी भी इन्सान के द्वारा अपनी स्थिति से सामंजस्य बनाए रखने का माध्यम है जबकि असल में स्थिति ही किसी इन्सान के कार्यों के सञ्चालन की जिम्मेवार होती है. 


हालातों का पैदा होना, चाहे वे सही हों या फिर गलत हों उनका होना किसी समय के अंतर्गत नहीं बल्कि उसी हालात के पार्श्व में पैदा की गई परिस्थिति से होता है. परिस्थितियाँ ही किसी व्यक्ति को सही गलत के लिए उकसाती हैं. स्थितियाँ ही किसी व्यक्ति के कुछ करने या न करने के लिए प्रेरित करती हैं. ऐसे में जबकि किसी स्थिति के चलते सबकुछ सामान्य सा हो जाये, सबकुछ खुशनुमा हो जाये, सबकुछ सुखद हो जाये तो समय उसी व्यक्ति के पक्ष में खड़ा दिखाई देने लगता है. और इसके उलट यदि सबकुछ नकारात्मक हो जाये तो वही समय उस व्यक्ति के विरोध में खड़ा दिखाई पड़ता है. सोचिये इसी बिंदु पर आकर कि व्यक्ति एक है, समय भी वही एक है तो फिर स्थितियों के नकारात्मक, सकारात्मक होने पर वही समय जिम्मेवार कैसे? स्पष्ट है कि अपने आपको संतुष्टि का भाव देने के लिए, खुद के द्वारा पैदा किये गए हालातों का दोष अपने सिर आने से बचने के लिए इन्सान समय को कटघरे में खड़ा कर देता है.

29 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी तू थक जाएगी इम्तिहान लेते-लेते - 1550वीं पोस्ट

ऐ ज़िन्दगी, कितनी बार इम्तिहान लेगी तू हमारा? हो सकता है कि कल को तू इम्तिहान लेती-लेती थक जाए मगर हम नहीं थकेंगे. तुम्हारा काम इन्तिहान लेना है, हमारा इम्तिहान देना. तुम थक जाओगी मगर हम नहीं. यहाँ तो एक उम्र बीत गई इसी में. ज़िन्दगी, तुमने अपने रंग-ढंग बदले मगर हम न बदले. तुम अपनी कोशिश करो, हम अपनी करते हैं. तुम जीत जाओ तो हमें ले जाना, हम जीतें तो बिना हमारी आज्ञा के न जाना. कहो, है मंजूर? ये कोई दर्शन नहीं, ये कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं वरन ज़िन्दगी के प्रति एक नजरिया होना चाहिए किसी भी आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति है. हमारा तो यही विचार है. हमारा मानना है कि ज़िन्दगी जिस परमसत्ता द्वारा दी गई है, जिस प्रकृति द्वारा दी गई है, जिस विज्ञान द्वारा दी गई है वह महज उम्र काटने के लिए नहीं दी गई है. यदि उसका उद्देश्य किसी भी जीव को, विशेष रूप से इन्सान को ज़िन्दगी देना है तो उसके पीछे अनेक अर्थ छिपे हुए हैं. यदि उसे महज जीवन देना होता, मात्र जीवित रखना होता तो वह ज़िन्दगी के साथ अनिश्चितता नहीं जोड़ता. सबकुछ निर्धारित होने के बाद भी इन्सान उससे अनभिज्ञ है, ऐसा महज इसलिए कि वह ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मकता अपनाता हुआ आगे बढ़ता रहे.


जैसा कि प्रकृति का सिद्धांत है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनीय है. एक पल में ही यहाँ सबकुछ उलट-पुलट हो जाता है. प्रकृति की गोद में एक दिन में ही जाने कितना परिवर्तन होता रहता है. पूरे चौबीस घंटों की समयावधि देखें तो पल-पल में ही परिवर्तन देखने को मिलते हैं. ऐसे में कैसे स्वीकार कर लिया जाये कि उसी प्रकृति की गोद में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन नहीं होगा? कैसे मान लिया जाये कि जो पल आज है वह अगले पल बदलेगा नहीं? यह सत्य है कि जैसे दुःख आया है वैसे जाएगा भी उसी के साथ सुख भी आएगा और वह भी दुःख के जाने की तरह कुछ पल बाद चला जायेगा. इन्सान से अपने आपको इसी बदलाव के द्वारा, इस परिवर्तन के द्वारा आने वाली किसी भी घटना के लिए तैयार रहने के लिए, खुद में संतोष का भाव जागृत करने के लिए मान लिया है कि ऐसा करना ज़िन्दगी का लक्षण है. ऐसा होता है से ज्यादा वह इस पर विश्वास करता है कि ज़िन्दगी ऐसा करती है. इस विचारधारा से वे व्यक्ति सहज रूप में बाहर निकल आते हैं जो विश्वास के साथ किसी भी परिवर्तन का सामना करते हैं. इसके ठीक उलट वे लोग परेशान हो जाते हैं जो ज़िन्दगी के ऐसे परिवर्तनों के वशीभूत होकर अपना संतुलन खो देते हैं, अपने विश्वास को डगमगा देते हैं. 

ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को अगले पल की जानकारी नहीं, सभी व्यक्तियों को चौबीस घंटे ही मिले हैं, हाँ बस संसाधनों का, माध्यमों का अंतर अवश्य हो सकता है. इस अंतर को कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास के द्वारा भले न मिटा सके मगर कम तो कर ही सकता है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति अपने कार्यों से अपने सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करता जाता है, अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान करता जाता है वैसे-वैसे उस व्यक्ति के अन्दर विश्वास का लेवल बढ़ता चला जाता है. किसी भी व्यक्ति को यही विश्वास विजयी बनाता है, यही विश्वास आगे बढ़ाता है. ऐसे में ज़िन्दगी में मिलने वाली चुनौतियों को, ज़िन्दगी से मिलने वाली चुनौतियों को वह सिर्फ और सिर्फ अपने विश्वास से ही जीत सकता है. ऐसे में कोई भी व्यक्ति अपने विश्वास को बनाये रखे और ज़िन्दगी की चुनौतियों से जीतते हुए उसे ही चुनौती देता रहे.


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इस ब्लॉग की 1550वीं पोस्ट 

28 अप्रैल 2019

ऐसे जागरूक मतदाताओं के सहारे जिंदा है हमारा लोकतंत्र


इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव को देश का महापर्व घोषित कर दिया गया है. शासन-प्रशासन अपने-अपने स्तर पर पूरा दम लगाकर अधिक से अधिक मतदान करवाने की कोशिश में लगा हुआ है. ऐसे में मतदान कितना होगा ये बाद की बात है मगर जैसा कि पहले भी कहा था कि मतदाता जागरूकता किसी के कहने से नहीं होती वरन यह स्व-स्फूर्त प्रक्रिया है जो अंतःकरण से उपजती है. जिसे भी जरा सा भी भान है अपनी जिम्मेवारी का, अपने कर्तव्य का, देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली के प्रति विश्वास का, देश की सरकार के कार्यों के प्रति सकारात्मकता का वह अपने आपको मतदान के लिए प्रेरित कर ही लेता है. मतदान के लिए खुद को तैयार कर ही लेता है. उसे न तो प्रशासन की गोष्ठियों की आवश्यकता होती है, न रैलियों की, न नारे लिखी तख्तियों की, न आदर्श बूथ की. ऐसे लोग अपने आप मतदान के लिए सतर्क रहते हैं, जागरूक रहते हैं.


ऐसा उदाहरण आज विश्व के पहले अनाज बैंक के बुन्देलखण्ड स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की उरई शाखा में देखने को मिला जबकि वहाँ की लाभार्थी खाताधारक महिलाएँ जनपद जालौन में 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने के प्रति उत्साहित दिखीं. अनाज बैंक उरई शाखा प्रतिमाह दो बार एक महिला को पांच किलो अनाज प्रदान करता है, इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी भूखा न सोये. सभी महिलाएं ऐसी हैं जो अकेली हैं, वृद्ध हैं, अत्यंत गरीब हैं, मजबूर हैं, निराश्रित हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जो शिक्षित नहीं हैं. सामान्य अक्षर-ज्ञान से भी वंचित हैं, अपने नाम को लिखना भी नहीं जानती हैं. बहुत सी महिलाएं अत्यंत वृद्ध हैं. इसके बाद भी ख़ुशी की बात यह है कि दो-चार महिलाओं को छोड़कर सभी महिलाएं अभी तक मतदान करती रही हैं. अबकी बार कुछ महिलाओं के वोट कट गए हैं; कैसे, क्यों इसकी जानकारी उनको भी नहीं है और अनाज बैंक शाखा को भी समय से नहीं हो सकी.  

अप्रैल माह के दूसरे वितरण के दौरान आज सभी महिलाओं से मतदान करने सम्बन्धी चर्चा हुई. सभी महिलाओं ने पूर्व में अपने मतदान करने की बात कही. कुछ महिलाओं ने अपने वोट के इस बार कट जाने की समस्या बताई. उनकी बातों से लग रहा था, जैसे कि उनका वोट कट जाना गलत हुआ. उन्हीं महिलाओं में से अत्यंत वृद्ध महिला ने यहाँ तक कहा कि वह कल मतदान दिवस पर अपना आधार कार्ड लेकर अपने बूथ जाएगी. वहां किसी अधिकारी से बात करके वोट डलवाने के लिए कहेगी क्योंकि वह पहले वोट डालती रही है. सोचिये, जिस देश के नागरिकों में इस तरह का ज़ज्बा होगा, वहां का लोकतंत्र खतरे में कैसे आ सकता है? ये ऐसी महिलाएं हैं जिनको सीधे-सीधे अपने किसी जनप्रतिनिधि से काम नहीं पड़ना है. इनको किसी सरकार में बालू, शराब के ठेके नहीं चाहिए हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं जिनके किसी परिजन को कोई सिफारिश भी नहीं करवानी है. ये सभी महिलाएं बस इतना समझ सकी हैं कि देश में सरकार के बनाने-गिराने में वोट का महत्त्व है. इसी कारण वे अपना वोट देना चाहती हैं. उनके ये जानने का प्रयास नहीं किया कि वे किसे अपना वोट देना चाहती हैं और न ही उन्होंने ये बताने-पूछने की चेष्टा की. 

सुखद ये लगा जानकर कि जहाँ आज के दौर में जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों से रुष्ट होकर पढ़ा-लिखा मतदाता वोट डालने से विरक्त होने लगा है वहीं ऐसी महिलाएं अपने मतदान को लेकर सजग हैं. मतदान को छुट्टी का दिन मानकर पढ़ा-लिखा मतदाता कहीं सपरिवार पिकनिक पर निकल जाता है वहीं ये महिलाएं सबह-सुबह मतदान करने के प्रति जागरूक दिखीं. शिक्षित मतदाताओं के लिए शासन-प्रशासन द्वारा आये दिन तमाम तरह की नौटंकी करते हुए उनको जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं ये महिलाएं स्व-प्रेरण से मतदान के लिए जागरूक हैं. ऐसी महिलाओं, ऐसे मतदाताओं के कारण ही इस देश का लोकतंत्र जिन्दा है, इस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली सक्रिय है. नमन है ऐसी महिलाओं को, ऐसे जागरूक मतदाताओं को.  

27 अप्रैल 2019

एकमात्र काम बस मतदाता जागरूकता कार्यक्रम


चुनाव अपने चरम पर है और सभी जगह प्रशासन भी मुस्तैदी से जुटा हुआ है. चुनाव सम्बन्धी जो तैयारियाँ चल रही हैं, उनको लेकर जितना ध्यान प्रशासन स्तर पर रखा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा जोर इस बार मतदाता जागरूकता को लेकर दिख रहा है. दिन भर किसी न किसी रूप में मतदाताओं को जागरूक करने का काम किया जा रहा है. इस काम में प्रशासनिक मशीनरी जितना अधिक शामिल है, उससे कहीं ज्यादा उसने निजी मशीनरी को लगा रखा है. जागरूकता के नाम पर निजी संस्थानों को, सामाजिक कार्य करने वालों को लगा रखा गया है. कहीं-कहीं इनके द्वारा स्वेच्छा से काम किया जा रहा है और कहीं-कहीं प्रशासन द्वारा जबरिया तरीके से इनसे मतदाता जागरूकता के कार्य करवाए जा रहे हैं.


निश्चित ही चुनाव हमारे देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण भाग है और इसमें हर एक व्यक्ति को अपनी भागीदारी निभानी चाहिए. देखा जाये तो बहुत से भागों में ऐसा होता भी है. वे सरकारी लोग जिन पर सरकार का, प्रशासन का नियंत्रण है, चुनाव ड्यूटी में लगाये जाते हैं. यहाँ ऐसे लोगों की अपनी मजबूरी होती है और वे इस कार्य से खुद को सहजता से अलग भी नहीं कर पाते हैं. इस बार कई जगहों से प्रशासन द्वारा असंवेदनशील रवैया अपनाये जाने की खबरें भी मिली हैं. महिलाओं की निर्वाचन सम्बन्धी ड्यूटी लगाने में भी संवेदना का भाव नहीं दिखाया गया है. कई जगह बुजुर्ग कर्मियों के साथ भी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाये जाने की बातें सामने आई हैं. इसके साथ-साथ चुनाव ड्यूटी से बचे लोगों को और चुनाव ड्यूटी में लगे लोगों को मतदाता जागरूकता के इतने काम सौंपे गए, लगा जैसे वर्तमान निर्वाचन में जागरूकता एक प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आया हो. विद्यालयों के वे बच्चे भी इसमें शामिल किये गए जिन्हें अभी मतदान करने में समय है. कोचिंग सेंटर्स, विद्यालयों आदि को लगभग रोज ही किसी न किसी कार्यक्रम करने को, रैली निकालने को, गोष्टी आयोजित करने को मजबूर किया जाता रहा है. इस समय की भीषण गर्मी में बच्चों को धूप में रैली निकालने के लिए मजबूर करना किसी भी रूप में मानवीय तो समझ नहीं आया.

आज के दौर में मतदान करने वाला बहुत हद तक जागरूक है, इसके बाद भी यदि उसमें किसी तरह की सुसुप्तावस्था आई है तो वह जनप्रतिनिधियों के रवैये के चलते. उनके बेरुखे व्यवहार ने मतदाताओं को मतदान से दूर किया है. इसी तरह प्रशासन के तानाशाही भरे रवैये ने भी आम आदमी को प्रशासन से दूर किया है, उसके प्रति खौफ सा पैदा किया है. आज जिस तरह से शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधि अपने कार्य करने का तरीका बनाये हैं, उससे आमजनमानस में सिर्फ और सिर्फ भ्रष्ट तस्वीर बनी है. इसी के चलते प्रशासन के मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आम जनता को सिर्फ धन कमाने के, सरकारी पैसे को खपाने का माध्यम मात्र नजर आता है. प्रशासन ज्यादा से ज्यादा मतदाता जागरूकता कार्यक्रम करवा कर, अधिक से अधिक मतदान करवा कर अपनी प्रोफाइल को बढ़िया कर लेने की कोशिश में रहते हैं. चुनाव संपन्न होने के बाद उनका रवैया भी जनप्रतिनिधियों जैसा हो जाता है. वे भी आम जनता की समस्याओं की तरफ से अपने आपको दूर ले जाते हैं. 


असल में आज जनप्रतिनिधियों ने, प्रशासन ने जनता के बीच से अपना विश्वास खो सा दिया है. आये दिन के कार्यों से इसकी झलक भी दिखाई देती है. यदि हालिया मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों की चर्चा की जाये तो आये दिन निकलने वाली रैलियों से शहर की सड़कों पर जाम की स्थिति बनती है. चिलचिलाती धूप में राहगीर फँसे होते हैं, बच्चे फँसे होते हैं, मरीज तड़प रहे होते हैं मगर उस जाम को घंटों तक खुलवाने के लिए किसी तरह की प्रशासनिक मदद, सहयोग नहीं मिलता है. ऐसे भी जागरूकता से क्या फायदा जो अपने शहर के लोगों को ही कष्ट में खड़ा कर दे. असल में जागरूकता कहीं बाहर से ठेल-ठेल कर नहीं लाई जा सकती है. यह विशुद्ध अंतःप्रेरण का सुफल है. आज से दशकों पहले के चुनावों का दौर भी भली-भांति याद है जबकि लोग सुबह से ही मतदान करने के लिए हँसते-हँसते चल दिया करते थे. तब न तो आज की तरह रैलियाँ थीं, न गोष्ठियाँ, न नारेबाजी, न तख्तियाँ, न सेल्फी पॉइंट. तब लोग मतदान करना अपना कर्तव्य समझते थे और इसके लिए सजग रहते थे. जब तक एक-एक मतदाता चुनाव को, मतदान को अपनी जिम्मेवारी नहीं समझेगा,, अपना कर्तव्य नहीं मानेगा तब तक ऐसे ही मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलते रहेंगे. प्रशासन अपना काम करता रहेगा, मतदाता अपना काम करते रहेंगे, जनप्रतिनिधि अपना काम करते रहेंगे. इन सबके बीच देश का लोकतंत्र आगे बढ़ता ही रहेगा, लोकतान्त्रिक प्रणाली आगे बढ़ती रहेगी.

26 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी की अनिश्चितता में ज़िन्दगी का आनंद है


हम सभी ज़िन्दगी की अनिश्चितता को लेकर बहुत सारी बातें करते हैं मगर इसकी असलियत के बारे में कभी गौर भी नहीं करते हैं. हो सकता है आप इसे न स्वीकारें मगर इससे इंकार नहीं कर सकते कि रोज ही घर से बाहर निकलते समय आप ज़िन्दगी की अनिश्चितता को लेकर विचार न करते हों. सबकुछ आपके हाथ में होने के बाद भी ज़िन्दगी आपके हाथ में नहीं होती. चाहे देश का सर्वोच्च पदधारी हो, सर्वोच्च शक्तिधारी हो या फिर निम्न से निम्नतर व्यक्ति, कोई ही दावे के साथ नहीं कह सकता कि वो अगले पल की ज़िन्दगी का आनंद लेगा ही. असल में ज़िन्दगी का आनंद उसी समय लिया जा सकता है जबकि आने वाले के बारे में कोई जानकारी न हो. मान लो, यदि किसी व्यक्ति को अपने आनंद के पलों में ज्ञात हो जाये कि अगले पल या फिर इस निश्चित समय पर उसके साथ दुर्घटना घटित होने वाली है, तब वो क्या उन आनंद भरे पलों का वास्तविक सुख ले पायेगा? नहीं न. यही ज़िन्दगी है, जो अनिश्चितता में प्रत्येक इन्सान को रखते हुए उसे उत्साहित करती है, ज़िन्दगी जीने का रास्ता दिखाती है. 


असल में देखा जाये तो ज़िन्दगी साँस लेने-छोड़ने का माध्यम मात्र है. आपने समाज के लिए क्या किया, समाज आपको किस रूप में जान रहा है, असल में ज़िन्दगी यही है. इस समाज में प्रत्येक जीव जिसको जीवन मिला है, वह किसी न किसी तरह अपने जीवन का निर्वाह करते हुए अंतिम अवस्था को प्राप्त हो जाता है. इसी चक्र में कतिपय विरले व्यक्ति ही ऐसे होते हैं जो अपने जीवन को अपने लिए नहीं वरन समाज के लिए व्यतीत करने का कार्य करते हैं. असल में जिंदगी का आनंद वही लोग लेते हैं. असल में ज़िन्दगी भी वही लोग जीते हैं. हम सबको ध्यान रखना चाहिए कि ज़िन्दगी की अनिश्चितता ही हम सबको जीवित रखे है, हम सबको सामान्य रखे है. यदि किसी भी व्यक्ति को अपने भविष्य के बारे में जानकारी हो जाये तो वह किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं रह सकता है. ऐसी स्थिति में जबकि हमें अपना भविष्य ज्ञात नहीं, अपने वर्तमान को अंतिम सत्य मानते हुए व्यतीत करना चाहिए. इससे सभी ज़िन्दगी का असल आनंद उठा सकते हैं साथ ही ज़िन्दगी की अनिश्चितता के भय से मुक्त भी रह सकते हैं.

25 अप्रैल 2019

राजनीति को स्वच्छ करना है तो जागना होगा


आजकल लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये और क्या न किया जाये? यह स्थिति किसी आम आदमी की अकेले नहीं है, यह समस्या हर वर्ग के साथ है। जो सम्पन्न हैं उनके साथ समस्या है कि अपनी सम्पन्नता को और कैसे बढ़ाया जाये। कैसे अपनी सम्पन्नता और वैभव के दम पर चारों ओर अपनी हनक को जमाया जाये। किस तरह अपनी इस हनक के सहारे से सत्ता को प्राप्त किया जाये। इसी तरह जो सम्पन्न नहीं हैं और सम्पन्नता को पाना चाहते हैं वे भी कोई न कोई जुगत भिड़ाने में लगे रहते हैं। रोजी-रोटी की जुगाड़ में लगे रहते हैं। सम्पन्नता और अभाव से अलग एक और वर्ग है जिसे पिछले कुछ समय से देश में सर्वाधिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है। इस वर्ग में राजनीतिक लोगों को रखा जा सकता है, ऐसे राजनीतिज्ञों को जो किसी न किसी रूप से सत्ता के आसपास मंडराते रहते हैं। यह वह वर्ग है जो किसी न किसी रूप से सत्ता का दुरुपयोग करके स्वार्थ पूर्ति में लगा रहता है। यही वह वर्ग है जो देशहित की बात बड़े-बड़े मंचों से करता है किन्तु मौका आने पर देश विरोधी कार्यों में संलिप्त हो जाता है। ऐसे वर्ग के लिए किसी उदाहरण की आवश्यकता नहीं है।


भ्रष्टाचार और घोटालों की दुनिया में किससे साफगोई की उम्मीद की जाये। एक अपने कॉलर को खड़ा करके दूसरे को दोष देना शुरू करता ही है कि अगले ही क्षण उसके कॉलर में भी कालिख दिखनी शुरू हो जाती है। कालिख को पोते एकदूसरे को गाली देने, दोष लगाने के बीच देश के आम आदमी का कितना धन बर्बाद हो रहा है इस बात की कोई फिक्र किसी को भी नहीं रही। राजनीतिक केंद्र के चारों तरफ घूमा-फिरी करने वाला ऐसा वर्ग खुद किसी न किसी तरह इसी केंद्र में शामिल होना चाहता है। उसके लिए राजनीति करना देशहित के लिए नहीं, नागरिकों के लिए, जनता के लिए नहीं, समाजहित के लिए नहीं वरन राजनीति के द्वारा मिलने वाले लाभों की प्राप्ति के लिए है। इसके लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है। यही कुछ कर गुजरने की स्थिति ही राजनीति में नकारात्मकता पैदा कर रही है। जिनका किसी भी रूप में सामाजिक कार्यों से लेना-देना नहीं है वे खुद को वरिष्ठ समाजसेवी बताते हुए राजनीति में घुसने का रास्ता तलाशते हैं। इसी रास्ते के द्वारा वे कालांतर में अपना उल्लू सीधा करने की जुगाड़ में लग जाते हैं। 

राजनीति में निरन्तर आ रही गिरावट का कारण राजनीति नहीं वरन उसमें शामिल होने वाले लोग हैं। इनके कुकृत्य ही राजनीति को कलंकित कर रहे हैं। राजनीति में से यदि धन को निकाल दिया जाये तो संभव है कि राजनीति में वह संख्या आधी से भी कम रह जाए जो आज राजनीति के नाम पर इधर-उधर से धन-उगाही करती घूमती है। इसके लिए सबसे पहले तो सांसद निधि, विधायक निधि को समाप्त किये जाने की आवश्यकता है। सोचना चाहिए कि ये जनप्रतिनिधि नीतियाँ बनाने के लिए हैं, नीति-निर्धारण के लिए हैं आखिर इनको कार्यों के संपादन के लिए क्यों लगाया जाता है? प्रशासन इसी कार्य के लिए पहले से दत्तचित्त होता है। विधायकों का, सांसदों का काम सदन में बैठकर नीतियां बनाना है साथ ही अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को सुनकर उसके लिए लाभार्थ योजनाओं का निर्धारण करना है। इसके बजाय आज के जनप्रतिनिधि हैण्डपम्प, नालियां, सड़कें, खडंजा आदि के निर्माण के लिए निधियों की संस्तुति करते घूम रहे हैं। ऐसी स्थितियों के बीच वे लोग फायदा उठा ले जाते हैं जो राजनीति के नाम पर बस धन-उगाही में लगे हुए हैं।

राजनीति का स्तर, कलेवर अब बहुत बदला है। तकनीक ने, सोशल मीडिया ने किसी भी घटना को, किसी भी घटनाक्रम को एक व्यक्ति या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने दिया है। अब वह वैश्विक स्तर तक अपनी पहुँच बना चुकी है। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि और उनके आसपास डोलने वाले लोग अपने पर संयम न रखकर इसी तरह राजनीति करते रहेंगे तो आने वाले समय में ऐसे लोगों का ही जमावड़ा राजनीति में दिखाई देगा जो बस स्वार्थ-पूर्ति में यहाँ आये हुए हैं। ऐसे लोगों से किसी भी प्रकार से देशहित की उम्मीद नहीं की जा सकती है। स्पष्ट है कि तब भी बात को समझे बिना राजनीति को ही दोष दिया जायेगा, जैसे कि आज दिया जा रहा है।

24 अप्रैल 2019

23 अप्रैल 2019

कैसे भूल जाएँ वो दिन, उस दिन से उपजे कष्ट को


कहते हैं कि दुःख-दर्द को बहुत दिनों तक याद नहीं रखना चाहिए. जीवन में घटित होने वाली कष्टकारी घटनाओं को भी भुला कर आगे बढ़ना चाहिए. जीवन का फलसफा यही होना चाहिए, इसी में ज़िन्दगी का सार भी है. सभी के जीवन में अच्छे-बुरे पलों का आना होता है, सुखद-दुखद घटनाओं का आना होता है. ऐसे में न चाहते हुए भी ऐसी घटनाओं को, ऐसी बातों को व्यक्ति भुला नहीं पाता है जिनके कारण उसे कष्ट हुआ हो, जिन घटनाओं से उसे दर्द मिला हो. इसके बाद भी ऐसी बातों को भूलने की कोशिश करते हुए इन्सान आगे बढ़ता ही रहता है. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जबकि कोई व्यक्ति अपने कष्टों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ता रहता हो. ऐसा भी लगभग न के बराबर देखने को मिलता है जबकि वह सुखद पलों में अपने कष्टों का आरोपण करके सुख की अनुभूति करता हो. कष्टों को, दुखों को भूलना-भुलाना भले ही व्यक्ति के हाथों में हो, उसके वश में हो इसके बाद भी अनेक स्थितियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें वह चाहकर भी भुला नहीं पाता है. ऐसा किसी और के साथ नहीं स्वयं हमारे साथ है.


ज़िन्दगी में कई तरह के दुःख देखने को मिले. कई तरह के कष्टों से सामना होता रहा. सामाजिक, पारिवारिक जीवन में ऐसी अनेक स्थितियाँ सामने आईं जिन्होंने सिवाय कष्ट के और कुछ नहीं दिया. ऐसी स्थितियों को, क्षणों को भुलाते हुए हर बार आगे बढ़ते रहे. पारिवारिक सदस्यों का हमेशा-हमेशा को छोड़कर चले जाना कष्टकारी एहसास देता है. मित्रों का, सहयोगियों का, परिजनों का, अपनों का कई बार साथ न मिलना भी कष्ट देता है. ज़िन्दगी की आपाधापी में हम भी लगे हुए हैं, पारिवारिक संरचना के अनुसार हम भी सक्रियता बनाये हुए हैं. ऐसे में समय-असमय मिलती परेशानियाँ, कष्ट, दुःख समय के साथ-साथ धुंधले पड़ते जाते हैं, दिल-दिमाग से विस्मृत होते जाते हैं. ऐसी ही तमाम सारी परेशानियों के बीच एक कष्ट ऐसा मिला जो चाहते हुए भी भुलाया नहीं जा सकता है. यह कष्ट खुद का एक ट्रेन दुर्घटना में घायल होना रहा. कह सकते हैं कि 22 अप्रैल 2005 को पुनर्जन्म ही हुआ हमारा. उस एक घटना ने तत्क्षण जो कष्ट दिए, आने वाले महीनों में जो कष्ट दिए उनसे निपटना होता रहा. इसके बाद भी रोज ही, हर पल ही वह दिन याद आता है, उस दिन के साथ मिला कष्ट याद आता है. लाख कोशिश करते हैं, लाख लोगों का कहना मानने की सोचते हैं मगर हर बार असफल रहते हैं.

आखिर कैसे भुला दें उस कष्ट को जो सुबह आँख खुलने के साथ हमारे साथ अपनी आँखें खोलता है? कैसे भुला दें कृत्रिम पैर पहनते समय कि कोई दुर्घटना हमारे साथ नहीं हुई? कैसे भुला दें बिस्तर छोड़ने से पहले क्षतिग्रस्त पंजे की मालिश करके उसके सहारे खड़े होने की स्थिति बनाते समय कि कहीं कोई दर्द नहीं है? कैसे भूल जाएँ कि कोई दर्द नहीं है जबकि पंजे में बिना पट्टी बांधे एक कदम चलना मुश्किल है? कैसे भूल जाएँ पिछले चौदह साल में एक सेकेण्ड को भी बंद न हुए दर्द के कारण कि शरीर कष्टमुक्त है? कैसे भूल जाएँ कमर में बंधी बेल्ट के दर्द से छिलती देह के बीच कि उस दिन की दुर्घटना ने तन-मन को छील कर रख दिया है? कैसे भुला दें कृत्रिम पैर के बोझ और हाथ में पकड़ी छड़ी के साथ कि कभी हम भी एथलेटिक्स में भाग लिया करते थे? कैसे भुला दें देर रात सोने से पहले कृत्रिम पैर को, पंजे की पट्टी को उतारने के बाद पैर-पंजे में आई सूजन को मालिश से सामान्य करते समय कि उस दुर्घटना से कष्ट नहीं उपजा है? 


हाँ, फिर भी सबकुछ याद रखते हुए भी, सबकुछ याद आते हुए भी सबकुछ भुलाना भी है, सबकुछ भुलाते भी हैं. एक बंधी-बंधाई सी मशीनी दिनचर्या की तरह पंजे की मालिश, कृत्रिम पैर का पहनना, पट्टी बांधना, दर्द को भुलाते हुए आगे बढ़ना होता ही है. ऐसा नियमित ही होता है. दर्द अपनी तीव्रता के साथ अपना काम करता है, हम अपनी जीवटता के सहारे अपना काम करते हैं. किसी दिन दर्द जीत जाता है, किसी दिन हम जीतने का एहसास कर लेते हैं. किसी दिन रिश्ते ज़ख्म को हम भुलाते हुए उसमे मीठा एहसास पैदा करने की कोशिश करते हैं, किसी दिन वही ज़ख्म दोस्त बनकर स्वतः खामोश एहसास जगाने लगता है. दर्द, जलन, सूजन, कष्ट के बीच कहना आसान है कि सबकुछ भुलाकर आगे बढ़ा जाए मगर जब कुछ ऐसा जो आपका न होकर भी आपके साथ जुड़ जाए, कुछ ऐसा जिसके बिना आपका एक कदम आगे बढ़ाना संभव न हो तब सबकुछ भुलाया जा सकता है, बस यही सबकुछ नहीं भुलाया जा सकता है. इसी सबकुछ को याद रखते हुए, इसी सबकुछ को भुलाते रहते हैं, खुद भुलावे में रहते हैं.

22 अप्रैल 2019

ये रिश्ता पल दो पल का नहीं है....


दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो अनाम सम्बन्ध के द्वारा सदैव आगे बढ़ता रहता है. ये हमारी खुशकिस्मती ही है कि हमें दोस्तों का, सच्चे दोस्तों का, भरोसेमंद दोस्तों का साथ खूब मिला है. ख़ुशी में भी दोस्त हमारे साथ रहे हैं और मुश्किल में तो और भी ज्यादा साथ आये हैं. उस समय भी ऐसी ही मुश्किल घड़ी थी पूरे परिवार के सामने. ट्रेन से दुर्घटना, एक पैर का स्टेशन पर ही कट जाना, दूसरे पैर का बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाना. घायल होने के बाद भी दिमाग में परिजनों के चेहरे उभरते. स्टेशन पर लगा कि एक और बुरी खबर घर पहुँचेगी फिर घर की स्थिति दिमाग में आते ही आत्मविश्वास के सहारे उस शाम की परेशानी से लड़ने का मन बनाया. घर में सिर्फ चाचा को खबर की और कानपुर अपने जीजा जी श्री रामकरन सिंह को. रास्ते में भागती कार के साथ अपने चिकित्सक मित्र रवि को फोन करके पूरी स्थिति से अवगत कराया. दुर्घटना के पहले दिन से लेकर आज तक हमारे पैर की छोटी से छोटी समस्या से लेकर बड़ी से बड़ी परेशानी का इलाज सिर्फ और सिर्फ रवि के द्वारा ही होता है.


उस समय तो ऐसी स्थिति थी नहीं कि कोई कुछ कहता-सुनता बाद में जिसने भी सुना उसने आश्चर्य जताया कि इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद भी हमने रवि पर विश्वास किया, उसको इलाज के लिए आगे किया. ये विश्वास किसी डॉक्टर से अधिक अपने दोस्त पर था. वो दोस्त जिसके साथ बचपन गुजरा, जिसके साथ झगड़े भी हुए, जिसके साथ खेले-कूदे भी, जिसके साथ पढ़ाई की, जिसके साथ हँसी-मजाक किया. विश्वास था कि वो दोस्त जो अब डॉक्टर है वो हमारे साथ गलत नहीं होने देगा. दोस्ती का, दोस्त का विश्वास ही है कि हम आज चल पा रहे हैं. दुर्घटना वाली शाम जो कानपुर पहुँचते-पहुँचते रात में बदल गई थी. रवि के कारण हॉस्पिटल में सारी व्यवस्थायें पहले से तत्परता से काम करने में लगी थी. ऑपरेशन थियेटर का दृश्य आज भी दिमाग में कौंधता है. रवि से अपने कटे पैर को ऑपरेशन करके लगाने की बात कहना, उसका कहना कि तुमको चलाने से ज्यादा हमारे लिए जरूरी है तुमको बचाना. उरई से कानपुर पहुँचने के दौरान किसी के पल को भी नहीं लगा कि साँस थमेगी. उसी विश्वास को बल मिला रवि से बात करके. संभव है कि उस समय उसके साथ के अन्य सहायकों को हमारी बातें बेहोशी की या फिर दुर्घटना से बदहवास स्थिति की उपज लग रही हों मगर ऐसा नहीं था. वे सारी बातें आज भी हमारे मन-मष्तिष्क में ज्यों कि त्यों हैं. स्पाइनल कॉर्ड के जरिये इंजेक्शन लगाकर आगे का इलाज होना था. उसके पहले की तमाम बातें हम रवि से कर लेना चाहते थे क्योंकि एक वही ऐसा दिख रहा था जिससे दिल की सभी बातें की जा सकती थीं.

उस रात शुरू हुआ इलाज कितनी-कितनी बार ऑपरेशन टेबल से गुजरा. न जाने कितने-कितने इंजेक्शन रवि की निगरानी में, मुस्तैद निगाहों के बीच से गुजर कर हमारे शरीर में लगे. ऑपरेशन थियेटर में बिना रवि के किसी का एक कदम भी हमारी तरफ न बढ़ता. बेहोशी का इंजेक्शन बहुत देर असरकारी न रहता और रवि बहुत ज्यादा डोज देना नहीं चाहता था. ऐसे में चीखते-चिल्लाते उसकी हथेलियों का स्पर्श जैसे दर्द को कम कर देता था. उसका आश्चर्य भरा एक सवाल बार-बार होता कि क्यों बे, क्या कोई नशा करते हो? हर बार मुस्कुराकर हमारा इंकार होता और उसका भी इंकार इस रूप में कि तुम झूठ बोल रहे हो. पता नहीं संसार को संचालित करने वाली परम सत्ता हमारी आंतरिक शक्ति का इम्तिहान ले रही थी या फिर भविष्य के दर्द सहने की आदत डलवा रही थी जो कुछ मिनटों की संज्ञाशून्यता के बाद फिर होशोहवास में ला देती थी. इलाज के दौरान न जाने कितनी बार बहुत छोटी सी लापरवाही पर हॉस्पिटल के स्टाफ को डांट उसके द्वारा पड़ी. रवि ने खुद न जाने कितने-कितने डॉक्टर्स से संपर्क किया, अपने कई सीनियर्स को बुलाकर उनसे सलाह ली मगर हमें एक दिन को भी अकेला न छोड़ा. क्या दिन, क्या रात, क्या सुबह, क्या शाम, क्या व्यक्तिगत आकर, क्या फोन से जैसे चाहे वैसे उसने अपने आपको हमारे आसपास बनाये रखा.

हॉस्पिटल में ऐसा लग रहा था कि जितनी जल्दी हमें ठीक होने की थी, उससे कहीं ज्यादा जल्दी रवि को हमारी रिकवरी की थी. आईसीयू के पहले दिन से ही उसकी कोशिश ऐसी दिखी, तभी रविवार को ऑपरेशन थियेटर बंद होने के बाद भी घंटों चलने वाली ड्रेसिंग टाली नहीं गई, आईसीयू को उसने अपनी जिद में ऑपरेशन थियेटर में बदलवा दिया. रविवार को खाने के बारे में पूछने पर हमने कहा कि चिकन खाना है. खा लोगे, के उसके सवाल पर हमारी हाँ सुनकर उसने तुरंत इंतजाम करवाया. दोपहर बाद किसी तरह की तकलीफ न होती देख वह उसी दोस्ताना अंदाज में मौज लेते हुए बोला, ठीक तो हो बे, काहे पड़े हो अब यहाँ आईसीयू में. आज रात ऑपरेशन बाद शिफ्ट करते हैं तुमको. वह हमारी रिकवरी के लिए प्रयासरत रहता और हम अपनी आंतरिक शक्ति को, आत्मविश्वास को और बढ़ाने की कोशिश में रहते. हर दिन कुछ न कुछ सुधारात्मक स्थिति को अपनाया जाता. न जाने कितनी बार ऑपरेशन थियेटर ले जाया जाता, न जाने कितनी बार सर्जरी की जाती, न जाने कितनी बार अन्य दूसरे तरीके अपनाये जाते. एक महीने हॉस्पिटल और फिर दो माह मामा जी के यहाँ रुकने के दौरान रवि की उपस्थिति बराबर रही. हर बार वह एक दोस्त की तरह उसी अंदाज में मिलता. हम दोनों के बीच वही नोंक-झोंक चलती रहती, हँसी-मजाक होता रहता. इन सबके बीच एक-एक पहलू पर गंभीरता से निगाह रहती उसकी. एक-एक स्थिति पर सतर्कता दिखाई देती. अंततः तीन महीने के कानपुर चिकित्सकीय प्रवास के बाद उरई आने के पहले रवि ने एक पैर पर सहारा देकर खड़ा करवा ही दिया. न कोई चक्कर, न कोई कमजोरी, न कोई परेशानी. 

उरई आने के बाद भी उसका संपर्क बराबर बना हुआ था. क्या, कैसे और बेहतर हो सकता है, इस बारे में भी उसकी चिंता दिखाई देती. एक साल बाद कृत्रिम पैर लगवाने में भी उसकी राय को वरीयता दी गई. कानपुर एलिम्को की मदद से कृत्रिम पैर के द्वारा चलना शुरू किया गया. दर्द, समस्या, परेशानी, दाहिने पंजे से हड्डियों के टुकड़ों का बाहर निकल आना, ऑपरेशन, ड्रेसिंग, इलाज आदि से मुक्ति अभी भी न मिल सकी थी. रवि को भी मुक्ति न मिली थी. आज स्थिति में बहुत सुधार है. अब पंजे की हड्डियाँ टूटकर बाहर नहीं आती. दुर्घटना के चौदह साल गुजर जाने के बाद भी दाहिने पंजे, उँगलियों में दर्द एक सेकेण्ड को भी बंद न हुआ है. दर्द की तीव्रता से ध्यान हटाकर अपने काम पर लगा दिया है इसके बाद भी पैर की समस्याओं का समाधान रवि ही बनता है. इसके बाद भी मिलने पर उसको हम दोस्तों की टीका-टिप्पणी हमसे ही सुननी पड़ती है कि अबे, आता भी कुछ या ऐसे ही डॉक्टरी दिखाते फिरते हो? काश! ये दोस्ती हर जन्म में मिले, सबको मिले.




21 अप्रैल 2019

प्रेम, इश्क इंसानी प्रवृत्ति है न कि दिल, दिमाग की


शारीरिक संरचना में दिल जितना छोटा है, व्यक्ति उसे लेकर उतना ज्यादा ही परेशान है. संबंधों को, रिश्तों को, आपसी ताने-बाने को वह दिल के सन्दर्भ में तौलना शुरू कर देता है. दिल के साथ-साथ देह में एक दिमाग भी होता है. वैज्ञानिक रूप में और चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दिमागी संरचना दिल से कहीं अधिक जटिल होती है. इसके साथ-साथ दिल की क्रियाविधि की तुलना में दिमाग कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहता है. दिल और दिमाग की क्रियाविधि के बारे में यदि संक्षेप में कहा जाये तो एक का सम्बन्ध भावनात्मकता से होता है, एक का सम्बन्ध पूरी तरह से गणितीय विधि पर आधारित होता है. दिल जहाँ किसी भी स्थिति के लिए अपनी भावनाओं पर अंकुश नहीं लगा पाता है वहीं दिमाग उसी घटना पर पूरी विवेचना करने के बाद ही आगे के लिए निर्णय लेता है.


यहाँ समझना होगा कि न तो दिल और न ही दिमाग खुद में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता है. वे किसी भी स्थिति में सिर्फ और सिर्फ व्यक्ति की भावनाओं के द्वारा संचालित होते हैं, उसी व्यक्ति के निर्णय के अनुसार अपना काम करते हैं. इसके बाद भी दिल को भावना का और दिमाग को संतुलन का पर्याय बताया जाने लगता है. अक्सर प्रेमपरक मामलों में दिल को सबसे कोमल मानकर उसी के निर्णयों पर व्यक्ति अपनी राय बनाता है. सोचने वाली बात है कि आज तक किसका दिल उसके शरीर से निकल कर दूसरे के शरीर में चला गया? किसका दिल प्रेम में किसी दूसरे के हाथों में सजा दिखाई दिया? प्रेम में नाकाम रहने पर किसके दिल में छेद हुए, किसके दिल के टुकड़े हुए? किसका दिल कई-कई टुकड़ों में ज़ख़्मी मिला? ऐसा आजतक तो किसी के साथ नहीं हुआ, न ही किसी के दिल के साथ हुआ. इसके बाद भी प्रेम में दिल चला जाता है, दिल टूट जाता है, दिल के टुकड़े हो जाते हैं. क्या ऐसा कभी दिमाग के साथ होता है? जबकि यह सारा कुछ किया-धरा दिमाग का ही होता है.

सोचने वाली बात है कि आजतक किसी धनवान को किसी बीमार, अत्यंत गरीब से प्रेम न हुआ. आजतक किसी का अत्यंत अमीर का दिल किसी सड़क पर टहलते किसी गरीब से न लगा. दिल किसी तरह का भेद नहीं रखता है यह सही हो सकता है मगर क्या किसी दिलवाले या दिलवाली ने अपनी गली में आये किसी भिखारी से प्रेम किया? उसके साथ विवाह करने की जिद की? यदि प्रेम, प्यार, इश्क जैसी स्थितियाँ सिर्फ दिल की उपज हैं तो ऐसा होना चाहिए मगर ऐसा नहीं हुआ. कहीं न कहीं यहाँ भी दिमाग ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया. दिल पर दिमाग हावी हुआ और उसी के हिसाब से दिल संचालित हुआ. इसमें भी दिल, दिमाग से ऊपर उस व्यक्ति के निर्णय ने, उसके विवेक ने अपनी भूमिका निभाई जो दिल-दिमाग के कारण प्रेम, इश्क जैसी स्थिति में उलझने वाला था. ऐसी स्थिति में कहाँ दिल और कहाँ दिमाग? ये सारी की सारी स्थितियाँ सिर्फ और सिर्फ व्यक्ति के अपने मन से संचालित हैं. उसके विवेक पर आधारित हैं. अपनी और सामने वाले की पद, प्रस्थिति के अनुसार उसका दिल, दिमाग काम करना शुरू करता है और उसी के हिसाब से वह प्रेम करता है, इश्क करता है. हाँ, अपवादों का स्थान सदैव इस समाज में रहा है, यहाँ भी है. 

आज के और बीती पीढ़ी के युवाओं से एक बात स्पष्ट रूप से कि प्रेम और इश्क जैसी अवधारणा दिल को खुश करने का माध्यम है न कि दिमाग को. दिमाग सारा गणित सही-गलत के रूप में, लाभ-हानि के रूप में लगाता है और उसी के हिसाब से काम करता है. कभी-कभी ऐसे निर्णयों में व्यक्ति के निर्णयों में दिल-दिमाग का संतुलन न बन पाने का खामियाजा सिर्फ व्यक्ति को निभाना पड़ता है. चाहे उस व्यक्ति के साथ अच्छा हो या बुरा, दोनों ही स्थितियों में दिल और दिमाग उसके शरीर में उसी जगह रहते हैं, जहाँ उसके जन्म लेते समय थे. ऐसे में न तो दिल कहीं जाता है, न कोई चुरा ले जाता है, न दिल के हजार टुकड़े होते हैं, न दिल टूटता है और इसी तरह न दिमाग ख़राब होता है, न दिमाग घूमता है, न दिमाग पगलाता है. जो करता है वह संदर्भित व्यक्ति करता है और सबकुछ अपने विवेक से करता है. हाँ, आलंकारिक दृष्टि में वह कभी इसे दिल का, कभी दिमाग का मसला बताने लगता है.

भगवा आतंकवाद, हिन्दू आतंकी की स्थापना का कुत्सित प्रयास फिर से


शाबास, जमानत पर रिहा एक साध्वी को भोपाल से टिकट क्या मिला, सब नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगे. आखिर ऐसा क्या हुआ कि उसके चुनाव लड़ने पर समस्या हो? अभी इस नैतिकता से निपटे न थे कि उनका करकरे पर बयान विवादों के घेरे में आ गया. निर्वाचन आयोग ने भी आनन-फानन उनको नोटिस भी जारी कर दिया. इसके उलट राहुल गाँधी के आचार संहिता में धन देने की घोषणा करने पर आयोग तब तक मौन रहा जब तक कि अदालत की तरफ से इस बारे में निर्देश न दिए गए.  जमानत पर नैतिकता की बात करने वाले भूल गए कि खुद उन्हीं की पार्टी के लोग जमानत पर हैं और चुनाव में भी हैं. इसके अलावा एक ऐसे महाशय भी राजनीति में सक्रिय हैं, टिकट वितरण में हैं जो सजायाफ्ता होने के कारण खुद चुनाव नहीं लड़ सकते. ऐसे समय में नैतिकता कहीं आराम करने चली जाती है.


बहरहाल, प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव में उतरने का क्या असर उस सीट पर होगा यह तो वहाँ के मतदाताओं द्वारा तय किया जाना है पर यह साफ़ है कि कई वर्षों पूर्व भगवा आतंकवाद की, हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा का आधार बनाने की साजिशें भी इसी रास्ते से सबको दिखाई देंगी. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके सामने वह पार्टी है जिसके एक महामना आतंकवादियों को साहब कहते हैं. एक महाशय जी कहते हैं. खुद उम्मीदवार बने महोदय उस साजिश से सम्बंधित किताब का विमोचन करते हैं. ये तो भला हो तत्कालीन पुलिस कर्मियों का, सुरक्षा बलों का जिन्होंने उस आतंकी को जिंदा पकड़ लिया. यदि ऐसा न हो पाता तो भगवा आतंकवाद की, हिन्दू आतंकी की अवधारणा समाज में स्थापित कर ही दी गई थी. आखिर इसके पीछे दिमाग किसका काम किया होगा? क्यों किया होगा? किसने उन आतंकियों से कहा होगा हाथ में कलावा बांध कर आने को? किसने उस पुस्तक की रचना-प्रक्रिया के बारे में दिमाग दौड़ाया होगा? देखा जाए तो इन सबका निशाना किसी भी रूप में हिन्दू, भाजपा, आरएसएस ही थे. इनकी आड़ में सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं पर निशाना साधने की कोशिश की गई थी. ये कोशिश भले उस समय पूरी तरह निशाने पर न बैठी हो मगर अब फिर से प्रयास है कि प्रज्ञा ठाकुर के बहाने सबको कटघरे में खड़ा किया जाये. 

जहाँ तक सवाल हिन्दुओं का है तो इस देश में सदैव से ही हिन्दुओं को सांप्रदायिक घोषित करने का काम किया जाता रहा है. धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के नाम पर बार-बार समाज में वैमनष्यता साबित करने की कोशिश की जाती रही है. भाजपा-विरोधी दलों को, हिन्दू-विरोधी मानसिकता वालों को हमेशा ही कष्ट होता है जब पूरे विश्व में कहीं से भी इस्लामिक आतंकवाद, मुस्लिम आतंकवादी जैसे शब्दों की ध्वनि-प्रतिध्वनि सुनाई देने लगती है. ऐसे में इनका एकमात्र उद्देश्य यही बन जाता है कि कैसे भी भारत देश में भगवा आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद का प्रचार किया जाए.  उसको बार-बार बिकाऊ मीडिया के द्वारा पूरे देश में फैलाया जाए. इस कुप्रचार करने के कुकृत्य में ये लोग भूल जाते हैं कि भगवा वो क्रांतिकारी रंग है जिसने इस देश की आज़ादी के महासंग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है. ये सब लोग भूल जाते हैं कि भगवा रंग हमारे राष्ट्रध्वज में है. लोग भूल जाते हैं कि इसी भगवा रंग के वस्त्र धारण करके स्वामी विवेकानंद ने न केवल देश का नाम बल्कि हिन्दू धर्म का नाम समूचे विश्व में रोशन किया था.

वैसे भी एक परिवार को खुश करने के लिए छेड़े गए शिगूफे के लिए, तुष्टिकरण की नीति को और प्रभावी बनाने के लिए, पडोसी देश के साहब आतंकियों को राहत देने के लिए दिए गए उठाये गए इस चिंतन से सनातन धर्म पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला. जनता भी इस बात को जानती-समझती है, उसकी मानसिकता पर भी अब नकारात्मक प्रभाव नहीं होने वाला. हाँ, विरोधी लोगों की क्षुद्र मानसिकता स्पष्ट हो चुकी है, तुष्टिकरण के लिए किसी भी निम्नता तक पहुँचने की बात स्पष्ट हो चुकी है. अंत में एक सलाह हिन्दू-विरोधियों, भाजपा-विरोधियों को कि भले ही तुष्टिकरण की नीति चालू रखो, भले ही हिन्दुओं को सांप्रदायिक घोषित करते रहो, भले ही भगवा आतंकवाद को प्रचारित करते रहो पर कम से कम सब करने से पहले देश-हित को भी देख लिया करो.

20 अप्रैल 2019

राजनीति के प्रति प्रेरित करें अपने बच्चों को


देश में आमतौर पर एक धारणा बनी हुई है राजनीति को गाली देने की. राजनीति को गाली देने के साथ ही साथ राजनेताओं को भी गाली दी जाने लगती है. इस क्रम में यह तो आसानी से स्वीकारा जा सकता है कि आज ज्यादातर नेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं, अधिकतर किसी न किसी प्रकार के घोटालों में, किसी न किसी आपराधिक प्रकरण में लिप्त हैं. वर्तमान के साथ-साथ जो भविष्य के नेता दिखाई दे भी रहे हैं वे भी किसी तरह की समाजसेवा या देशसेवा के नाम पर नहीं बल्कि बहुत बड़ी निधि की राशि देख कर, रुतबे को देखकर, अकूत धन देखकर आ रहे हैं. ऐसे में राजनीति की इस वर्तमान व्यवस्था को दोष देने के पूर्व यदि हम अपने क्रियाकलापों, अपनी जागरूकता पर निगाह डालें तो हम ही स्वयं में सबसे बड़े दोषी नजर आयेंगे. हमारे देश की संसद और तमाम विधान सभाओं में एक निश्चित समयान्तराल के बाद चुनाव होता है और दोनों ही जगहों के लिए एक निश्चित सीट पर सांसदों, विधायकों का चुनाव किया जाता है. एक पल को हम विचार करें कि यदि पांच वर्षों के अन्तराल में होने वाला चुनाव आया और प्रत्याशियों में सभी जगह पर केवल आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति ही दिखाई देने लगे तो क्या हमारे संविधान में, संसद में, न्यायालय में इस बात का प्रावधान है कि चुनाव को टाल दिया जाये? इसका जवाब शायद न में हो. अब बात वहीं घूम फिर कर आती है कि चुनाव का निर्धारित समय किसी लिहाज से टाला नहीं जा सकता है और सदन की निर्धारित सीटों को अपने निश्चित समय पर भरा ही जाना है. ऐसे में यदि अच्छे लोग उन्हें भरने को आगे नहीं आयेंगे तो जो भी सामने दिखेगा सदन उसी को अगले निर्धारित समय के लिए अपने में समाहित कर लेगा. ऐसी स्थिति में दोष हमारा ही है कि हमने स्वयं अपने को अच्छा माना भी है और स्वयं को राजनीति से पीछे खींचा भी है. 


हम सब अपने पारिवारिक क्रियाकलापों पर विचार करें और बतायें कि जिनका सीधे तौर पर राजनीतिक क्षेत्र से सम्बन्ध नहीं है क्या उन्होंने अपने बेटे-बेटी को राजनीति में कैरियर बनाने को प्रोत्साहित किया? अपने बच्चों को राजनीति के क्षेत्र में कभी आदर्श रहे लोगों के बारे में जानकारी दी? क्या कभी अपने बच्चों के मन में राजनीति के अच्छे लोगों के प्रति सकारात्मक बीज बोने का काम किया? नहीं न. असल में हमारे देश की बिडम्बना है कि एक क्लर्क, एक चपरासी, एक मजदूर अपनी संतान को आई०ए०एस० बनाने के सपने देखता है जबकि उसका दूर-दूर तक आई०ए०एस० से कोई सम्बन्ध नहीं होता है किन्तु अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवियों को, जिनका देश के विकास के प्रति कोई दायित्व है, उन्हें भी अपने बच्चों को राजनीति से दूर करते हुए देखा है. ऐसे में हम गाली किसे और क्यों दे रहे हैं?

हमारा प्रयास हो कि हम अपने बच्चों में राजनीति के प्रति कुछ जागरूकता पैदा करें, उन्हें समझायें कि इस क्षेत्र को भी कैरियर के रूप में अपनाया जा सकता है. आज की पीढ़ी को समझाने की आवश्यकता है कि सिर्फ मल्टीनेशनल कम्पनियों के लुभावने पैकेज को प्राप्त कर लेना ही देश-सेवा नहीं है, देश-सेवा का एक रास्ता राजनीति से भी होकर जाता है. यदि हम आने वाले समय में देशहित को ध्यान में रखकर युवाओं को सक्रिय राजनीति में उतार सके तो यकीन मानिये कि आपराधिक तत्वों को जेलों में जगह मिलेगी और देश के समस्त सदन सकारात्मक, सक्रियतापूर्ण, उत्साही, जागरूक, कर्मठ, चिन्तशील राजनेताओं से सुशोभित दिखेंगे.

19 अप्रैल 2019

नैतिकता भी रास्ता खोज रही है


राजनैतिक घोटालेबाजों का बेशर्मी से अपनी सफाई देते रहना; राजनैतिक हत्यारों का सीना तानकर समाज में घूमते रहना; रिश्तेदारों द्वारा रिश्तों की गरिमा को तार-तार करना, युवा पीढ़ी द्वारा आधुनिकता के वशीभूत नशे की गिरफ्त में चले जाना; एक पल में शानोशौकत, पद, प्रतिष्ठा पाने की चाहत में लोगों का अपराधों के दलदल में धँस जाना; महिलाओं, यहाँ तक कि छोटी-छोटी बच्चियों तक से बलात्कार की घटनाओं का लगातार सामने आना और भी बहुत सी घटनायें हैं, विकृतियाँ हैं जिन्हें देखने-सुनने के बाद लगता है जैसे समाज पूरी तरह से अपराध की दुनिया में समा गया है। किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था के द्वारा उसके अपराधी घोषित होने के बाद भी उसमें किसी तरह का भी अपराधबोध नहीं दिखाई देता है। उसके द्वारा एक अपराध करने के बाद, एक घोटाला करने के बाद पुनः दूसरे अपराध की ओर, दूसरे घोटाले की ओर मुड़ जाता है। इस तरह की पुनरावृत्ति दर्शाती है कि समाज से नैतिकता समाप्त होती जा रही है। 


अब सवाल यही उभरता है कि क्या वाकई ऐसा हो रहा है? क्या आज का समाज नैतिकता, संस्कार, सामाजिकता जैसी बातों पर विश्वास करता है? आज जिस तरह से चारों ओर पल भर में स्वविकास की होड़ लगी है, किसी भी तरह से उच्च से सर्वोच्च तक पहुँचने को हर प्रकार के हथकंडे प्रयोग में लाये जा रहे हैं, आपसी रिश्तों में भी स्वार्थपरकता पूरी तरह से हावी होती दिख रही है, आधुनिकता के नाम पर संस्कारों को, संस्कृति को एक प्रकार से तिलांजलि दी जा रही हो ऐसे में क्या नैतिकता की ओर कोई ध्यान भी देता होगा?

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो एक के बाद एक घोटाले सामने आते जा रहे हैं और सरकार से, घोटालेबाज मंत्री-नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दें; विपक्षी दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी नैतिकता को बनाये रखते हुए सहयोग प्रदान करें; प्रादेशिक स्तर पर देखें अथवा स्थानीय स्तर पर एक छोटे से छोटे कर्मचारी से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वो नैतिकता से अपने दायित्वों को पूर्ण करेगा। सभी को सभी से किसी न किसी प्रकार की नैतिकता की अपेक्षा रहती है पर स्वयं अपने स्तर पर नैतिकता भरे कदम नहीं उठाते हैं। ऐसे समय में जबकि समाज के प्रत्येक वर्ग से, प्रत्येक क्षेत्र से नैतिकता समाप्त सी होती दिख रही है तब हम सभी को ही मिलकर इस ओर कदम बढ़ाने की आवश्यता है। अपनी युवा पीढ़ी को समझाने की आवश्यकता है क्योंकि आने वाला समय इसी पीढ़ी का है और यदि हमारे समाज की भावी पीढ़ी ने नैतिकता के गूढ़ार्थ को समझ लिया तो जिस तरह का हताशा-निराशा का माहौल आज दिख रहा है सम्भव है कि वो न दिखे।

18 अप्रैल 2019

कुछ पल परिवार के बुजुर्गों के लिए भी


वैश्विक समुदाय के साथ कदमताल करने के प्रयास में लगभग सारा समाज पूरे जीजान से जुटा हुआ है. पश्चिमी सभ्यता के सुर-लय को पकड़ने की कोशिशों में हमने पहनावा, रहन-सहन, शालीनता, संस्कृति, भाषा, रिश्तों, मर्यादा आदि तक को दरकिनार करने से परहेज नहीं किया जा रहा है. पश्चिम से हमारे समाज ने कुछ सीखा हो या न सीखा हो मगर उसने संबंधों का खुलापन अवश्य सीखा है. सिर्फ सीखा ही नहीं है वरन उसे आत्मसात भी कर लिया है. यही कारण है कि आज विपरीतलिंगियों के छोटे-बड़े झुण्ड सडकों पर तैरते दिखाई देते हैं. दिन हो या फिर रात, सुबह का समय ही या शाम का, कॉलेज का पूरी गर्मजोशी से हमने हाथों में पट्टा बाँध, गलबहियाँ करते हुए, बाइक को फर्राटा बनाकर, कुछ तरल पदार्थ गले के नीचे उतार इस विशेष डे को और भी विशेष बना दिया. आपस में चहकते, मटकते, तेज़-तेज़ आवाज़ में अजीब-अजीब सी ध्वनियाँ निकालते, बेतरतीब वस्त्रों के साथ खुद को आधुनिक सा सजाते हुए विपरीतलिंगियों में दोस्ती, दोस्ती में प्यार और प्यार में भी प्यार से आगे का बहुत कुछ खोजते तमाम झुण्ड आयोजन की सफलता की कहानी लिखने में लगे होंगे. इसी सफल-असफल सी कहानी के साये में बहुत कुछ बिखरता सा दिखता है, बहुत कुछ छीजता सा दिखता है.


विदेशी आयोजनों की भव्यता के बीच हमारे परिवार की दिव्यता कहीं बिखरती सी दिखती है. युवाओं की जोशपूर्ण मस्ती के बीच परिवार के, समाज के बुजुर्गों की हस्ती सिमटती सी लगती है. निर्द्वन्द्व, स्वच्छंद भटकते झुण्ड के बीच बुजुर्गों का एकाकीपन पिसता सा लगता है. ये आयोजन भले ही एक दिन का हो पर आज की पीढ़ी अपना हर दिन, हर पल सिर्फ और सिर्फ मौज में जीना चाहती है. मस्ती में सराबोर होने के तरीके खोजती हुई अपने आपको सिर्फ और सिर्फ अपने में केन्द्रित कर लेना चाहती है. उसके लिए अपने अस्तित्व और अपनी दोस्ती के अलावा कुछ और मायने नहीं रखता है. ये और बात है कि आज के तीव्रगति से भागते समय में अधिकांश दोस्ती भरे रिश्ते कब बनते हैं और कब बिखर जाते हैं, ये खुद इन दोस्तों को ही पता नहीं चलता. ऐसे भटकन भरे दौर में कम से कम कुछ समय हमारे युवा अपने उन बुजुर्गों के लिए भी निकालें जो उनके साथ रहते हुए भी, उनके आसपास रहते हुए भी एकाकी जीवन गुजार रहे हैं. दोस्ती के मायने सिर्फ गुलछर्रे उड़ाना, पार्टियाँ करना, सडकों पर हुल्लड़ काटना, देह की परिभाषा तय करना ही नहीं है बल्कि एक एहसास को जन्म देना है, एक विश्वास को स्थापित करना है. 

एहसास और विश्वास की मर्यादा-पावनता को हम अपने परिवार के बुजुर्गों के बीच भी बाँटने का प्रयास करें. दोस्ती के नाम पर भले ही हमारी युवा पीढ़ी उनके साथ बाइक के स्टंट न कर सके, बीयर-वाइन के जाम न छलका सके, गलबहियाँ करते हुए मॉल-पब, डिस्कोथिक में मस्ती न कर सके पर ये सत्य है कि उन बुजुर्गों को ख़ुशी का बहुत बड़ा तोहफा दे सकती है. आधुनिकता के दौर में चाहे कुछ कितना भी बदल गया हो पर हमें विश्वास को नहीं बदलने देना है, एहसास को नहीं बदलने देना है, रिश्तों को नहीं बदलने देना है, मर्यादा को नहीं बदलने देना है, संस्कृति को नहीं बदलने देना है. दोस्ती के नाम पर मस्ती में चूर आज की पीढ़ी को इसका आभास कराये जाने की जरूरत है कि बुजुर्ग उनके लिए बोझ नहीं, उनकी रफ़्तार में अवरोध नहीं, उनकी मस्ती की बोरियत नहीं हैं. अपनी संस्कृति-सभ्यता से विरत हो रहे, परिवार को बंधन समझ रहे, ज़िम्मेवारियों से मुक्ति चाह रहे युवा वर्ग को समझाना ही होगा कि बुजुर्ग हमारा एहसास हैं, हमारा विश्वास हैं, हमारी संस्कृति हैं, हमारा परिवार हैं, हमारा अस्तित्व हैं. आइये कम से कम दोस्ती के नाम का एक दिन तो इनके नाम कर ही दें, बाकी दिन तो अपने हमउम्र दोस्तों के साथ मौज-मस्ती, सैर-सपाटा, गलबहियाँ करते हुए बिताना ही है.


17 अप्रैल 2019

बर्फ सा न पिघलने दें बचपन को


बच्चों को सुबह जगाने, स्कूल के लिए तैयार करने के नाम पर चीखना-चिल्लाना; उनको नाश्ता कराने-भोजन करवाने के नाम पर क्रोधित होना; उनको पढ़ाने के नाम पर, होमवर्क करवाने के नाम पर खीझना जैसे अभिभावकों के बीच सामान्य गतिविधि होती जा रही है. संभव है कि ऐसा सभी घरों में न होता हो मगर जिस तरह से अभिभावक अपनी मनोच्छाओं को अपने बच्चों पर लाद रहे हैं, उसे देखते हुए ये बातें लगभग सभी घरों में नित्य ही देखने को मिलती हैं. असल में अभिभावकों ने ज़िन्दगी की आपाधापी में चल रही अंधी दौड़ में अपने बच्चों को भी शामिल कर लिया है. उनके लिए उनके बच्चे भले ही उनकी संतान हों, वे अवश्य ही उससे प्यार-दुलार करते हों मगर इन सबके ऊपर अपने बच्चों को सर्वोत्कृष्ट देखने का भाव उनके प्रति तीखी प्रतिक्रिया करने को प्रेरित करता है. वर्तमान औद्योगीकरण, वैश्वीकरण के दौर में जिस तरह से धन को किसी भी रिश्ते, किसी भी सम्बन्ध पर वरीयता दी जाने लगी है, उसने संबंधों-रिश्तों में एक तरह का खोखलापन तो भरा ही है, बचपन को भी शुष्क कर दिया है. अभिभावकों में अपने बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने की, किसी न किसी खेल में, गीत-संगीत में, कला में भी अपना सर्वोच्च देने का दवाब बनाया जाने लगा है. खेलना-कूदना, शरारत करना जैसे फूहड़पन की बातें हो गई हैं.


किसी अभिभावक द्वारा अपने बच्चों के साथ इस तरह की कठोरता दिखाना, तेज आवाज़ में चिल्लाना, बात-बात पर टोकना आदि का उद्देश्य उनकी बेइज्जती करना नहीं होता है. असल में आज भी बहुसंख्यक अभिभावकों में आम धारणा बनी हुई है कि उनका अपने बच्चों के साथ इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देना एक तरह का अनुशासन बनाना है. वे समझते हैं कि इस तरह से बच्चों की सुबह जागने से लेकर रात सोने तक की सभी गतिविधियों पर टोका-टाकी करके, उसमें कठोरता दिखाकर वे बच्चों को अनुशासित बना रहे हैं. यदि देखा जाये तो उनकी ऐसी सोच बहुत हद तक गलत है. संभव है अपने माता-पिता की टोका-टाकी करने से, उनके डांटने से, उनके तेज चिल्लाने से बच्चा कुछ हद तक शांत रह जाए मगर इससे वह अनुशासित नहीं हो सकता है. कई बार ऐसे मामलों में अभिभावक अपना, अपने समय का उदाहरण दिया करते हैं. इस तरह के उदाहरण देते समय वे भूल जाते हैं कि तब न वे अकेले हुआ करते थे और न ही परिवार अकेले हुआ करते थे. संयुक्त परिवार की अवधारणा के चलते कई पारिवारिक सदस्य एकसाथ रहा करते थे. ऐसे में किसी बच्चे की डांट पड़ने पर, उसके साथ सख्ती दिखाने पर उसे अकेलापन महसूस नहीं हुआ करता था. ऐसे में पारिवारिक सदस्य ही उसकी गलती बताते हुए उसे सुधारने की कोशिश कर लिया करते थे. अब जबकि परिवार एकल हो गए हैं, बच्चे भी बहुतायत परिवारों में एक ही हैं तब उनके साथ सख्ती बरतना उनको अनुशासित करना नहीं वरन उनको चिड़चिड़ा बनाना है. 

आज बच्चों को बाहर खुले में खेलने की न तो जगह दिखती है और न ही उनको बाहर खेलने की अनुमति मिलती है. स्कूल के काम, पढ़ाई के बोझ में वे खुद को दबा हुआ पाते हैं, अभिभावकों द्वारा अधिक से अधिक अंक लाने का दवाब भी उनके ऊपर होता है, खेलने के लिए भी कंप्यूटर या मोबाइल गेम उनके सामने होते हैं ऐसे में स्वाभाविक है कि उनका नैसर्गिक विकास नहीं हो पाता है. ऐसे में प्रतिदिन की सुबह से शाम तक की टोका-टाकी में बच्चे अपने आपको कमतर समझने लगते हैं. किसी एक ही काम के लिए भी बार-बार टोकने से उनको उस काम के प्रति वितृष्णा सी होने लगती है. इससे न केवल बच्चे काम करने से दूर भागने लगते हैं बल्कि अपने ही अभिभावकों के प्रति नकारात्मकता का एहसास पालने लगते हैं. यह स्थिति बच्चों के विकास को अवरुद्ध करती है. आज की स्थितियों में माता-पिता को बच्चों के साथ न सही एक दोस्त की तरह पर दोस्ताना माहौल में काम करने की आवश्यकता है. यदि माता-पिता इस तरह का वातावरण अपने परिवार में, घर में बना पाते हैं तो बच्चों का स्वाभाविक विकास करने के प्रति एक कदम बढ़ा सकते हैं. ऐसा न हो पाने की दशा में बच्चों में चिड़चिड़ापन आना, गुस्सा आना, नकारात्मक भावना का विकसित होना शुरू हो जाता है.

15 अप्रैल 2019

तेरा कष्ट मेरे कष्ट से बड़ा कैसे


समस्याएं सबसे साथ होती हैं पर हमें सिर्फ अपनी समस्या ही सबसे बड़ी क्यों लगती है? कष्ट किसी न किसी रूप में सबके साथ जुड़ा है पर हमें सिर्फ अपना ही कष्ट क्यों सबसे बड़ा दिखाई देता है? क्यों हमें किसी और के कष्ट, समस्या बड़ा समझ नहीं आता? क्यों अपने ही कष्ट को, अपनी समस्या को हम किसी दूसरे के कष्ट पर, दूसरे की समस्या पर आरोपित करना चाहते हैं. ऐसा संभव है कि उस स्थिति में होता हो जबकि हम अपने कष्ट में, अपनी समस्या में घिरे नितांत अकेले बैठे हों. जब हम किसी दूसरे के कष्ट में भागीदार नहीं बनेंगे, किसी दूसरे की समस्या के साथ खुद को जोड़ने का काम नहीं करेंगे तब तक किसी और के कष्टों, दुखों, समस्याओं को न ही समझ सकेंगे, न ही उनको बड़ा समझ सकेंगे. कष्ट, समस्या, दुःख किसी भी रूप में किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि का कारक नहीं बनते. उनके होने पर किसी व्यक्ति को सुख की अनुभूति नहीं होती है. इसके बाद भी ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति अपने कष्टों, अपनी समस्याओं को लगभग पालने-पोसने का काम करते हैं. किसी न किसी तरह, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में समाज में अपने कष्ट, अपनी समस्या को प्रकट करने का अवकाश खोजते हैं.


व्यक्ति समाज का एक हिस्सा है, उसी के द्वारा समाज का निर्माण हुआ है. ऐसे में सभी व्यक्तियों का दायित्व बनता है कि वे एक-दूसरे के साथ तारतम्यता बनाये रखें, एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाये रहें. यदि व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम होता है तो वह एक-दूसरे के सुखों का आनंद भी उठा सकता है, एक-दूसरे के दुखों, कष्टों, समस्याओं को भी मिलकर सुलझा सकता है. मिलजुल कर रहने के कारण, सामूहिकता की भावना होने के कारण किसी भी व्यक्ति को अपना कष्ट किसी दूसरे के कष्ट के आगे बहुत बड़ा नहीं लगेगा. कष्ट की, समस्या की स्थिति में वह हमेशा दूसरे के कष्टों को, समस्याओं को दूर करने के लिए आगे ही आगे रहेगा. इससे व्यक्ति को समझ में आएगा कि समाज में एकमात्र वही नहीं है जिसके पास समस्याएं हैं, कष्ट हैं. उसके जैसे, उससे बुरी स्थिति में बहुत से लोग हैं जो कष्टों में, समस्याओं में रहने के बाद भी अपने जीवन को सहजता से संचालित कर रहे हैं. 

व्यक्ति को अपनी गंभीरता, अपने धैर्य, अपनी हिम्मत का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए. इनके द्वारा वह आत्मविश्वास में वृद्धि करता रहता है. इसी आत्मविश्वास के चलते वह सदैव कष्टों पर विजय पा सकता है, समस्याओं का समाधान खोज सकता है, दुखों से मुक्ति पा सकता है. बस उसे ध्यान रखना होगा कि उससे ज्यादा कष्ट वाले, समस्या वाले इस समाज में हैं. उसे ध्यान रखना होगा कि उसके पास आत्मविश्वास है जो उसे हारने नहीं देगा.

14 अप्रैल 2019

सच्चे दिल से नफरत नहीं हो सकती


लोग कहते हैं कि इस एक जीवन में प्रेम करने के लिए ही पर्याप्त समय नहीं, लोग कहाँ से आपस में दुश्मनी पाल लेते हैं. यहाँ समझना होगा कि प्रेम किससे, दुश्मनी किससे? प्यार किससे, नफरत किससे? जिन दो दिलों में प्यार होगा उनमें आपस में नफरत नहीं होगी, आपस में उनमें दुश्मनी नहीं होगी. ऐसा किसी का मानना हो या न हो पर हमारा मानना है कि जिनके बीच भी सच्चा स्नेह है, सच्चा प्रेम है उनके बीच कभी भी दुश्मनी जैसा शब्द नहीं आ सकता है. भले ही ऐसे उदाहरण देखने को मिलते रहे हों जहाँ कि दो प्यार करने वालों में आपस में नफरत हुई, उनमें आपस में प्रेम न रहा, उनमें किसी तरह से अलगाव हो गया तो यहाँ स्पष्ट है कि उनके बीच प्रेम नहीं रहा होगा. प्रेम की सम्पूर्णता के लिए पहले प्रेम और आकर्षण का अंतर समझना होगा. प्रेम और आकर्षण में जमीन आसमान जैसा अंतर है. प्रेम का सम्बन्ध किसी भी रूप में नफरत से नहीं है, दुश्मनी से नहीं है. यहाँ आवश्यक नहीं कि प्रेम दो विपरीतलिंगियों के बीच हो. प्रेम का तात्पर्य यहाँ दो व्यक्तियों के बीच दिलों से दिलों के जुड़ने का मसला है. वे चाहें दो मित्र हों, चाहे दो सम्बन्धी हों, दो सहयोगी हों या फिर दो कोई भी व्यक्ति. 


असल में प्रेम विशुद्ध दिली मामला है और दुश्मनी दिल से नहीं दिमाग से की जाती है. ऐसे में कई बार भले ही दो प्रेम करने वाले दिलों में आपस में किसी कारण से तनाव आ जाये, उनके बीच अबोलपन की स्थिति बन जाए मगर यदि उनके बीच सच्चा प्रेम है तो यह तनाव बहुत लम्बे समय तक नहीं ठहर सकता है. दोनों ही किसी न किसी रूप में अपने दूसरे साथी का हालचाल जानने के लिए बेचैन रहता है. हाँ यदि दोनों में से किसी एक में भी प्रेम का दिखावटी स्वरूप मौजूद है, दोनों में से किसी एक के प्रेम में प्रेम के स्थान पर आकर्षण है तो वहाँ भी इस तनाव के साथ-साथ एक तरह का अहं स्थान घेर लेता है. ऐसी स्थिति में प्रेम की जगह एक-दूसरे के लिए नफरत दिखाई देने लगती है. ऐसी स्थिति में ही वहाँ दो लोगों के बीच प्रेम की जगह नफरत दिखाई पड़ती है.

प्रेम को नफरत से बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि दो दिलों में एक-दूसरे के प्रति समर्पण रहे, एक-दूसरे के प्रति विश्वास रहे. ऐसा न होना ही दिलों के बीच दूरियां पैदा करता है और आपस में तनाव, नफरत, दुश्मनी जैसे भाव को जन्म देता है.

13 अप्रैल 2019

डाइनिंग टेबल की सत्ता और संस्कृति


इधर बहुत लम्बे समय से कुछ पढ़ा नहीं जा रहा था. कुछ अजीब तरह की व्यस्तताएँ अनावश्यक रूप से घेरे हुए थीं. कुछ ऐसा भी इन दिनों हुआ कि खुद आलस्य के साथ दोस्ती कर ली थी. इसके अलावा चुनावी माहौल आने के चलते होने वाली खुद बुलाई व्यस्तता के साथ-साथ सोशल मीडिया की गैर-जरूरी उठापटक में भी फँसे हुए थे. इन तमाम सारे कारणों या कहें बहानों के बीच तमाम सारे काम हो रहे थे बस कुछ पढ़ना नहीं हो पा रहा था. मोबाइल पर पढ़ने की आदत तो लगभग न के बराबर है. हमारे भतीजे द्वारा सादर दिया गया किंडल अस्त्र भी पढ़ाये रखने को कारगर होता नहीं लग रहा था. लैपटॉप भी बहुत ज्यादा आकर्षित नहीं कर पा रहा था कि उस पर ही कुछ पढ़ा जाए. ऐसे में खुद अपने से लड़ते हुए आखिरकार जिला पुस्तकालय जाकर दो-चार नई किताबों को तलाशा गया, नई इस रूप में, जिन्हें हमने पढ़ न रखा हो. इनमें से एक पुस्तक हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा दशद्वार से सोपान तक को पढ़ना शुरू किया. इसका कवर देखते ही उस एक प्रकाशक की मूर्खता पर हँसी आई जिसका कहना था कि किसी साहित्यकार की आत्मकथा में उसका चित्र कवर पेज पर नहीं होता है. ऐसा उसने इस सन्दर्भ में कहा था क्योंकि हमने खुद की आत्मकथा में कवर पेज पर अपना चित्र प्रकाशित करने की शर्त रखी थी. अंततः इसी कारण वो प्रकाशक एक बड़ी आत्मकथा प्रकाशित करने से चूक गया.

बहरहाल, बच्चन जी की आत्मकथा दशद्वार से सोपान तक पढ़ने के दौरान एक जगह उनकी एकबात पर विशेष रूप से ध्यान गया. उनके द्वारा महाभारत का सन्दर्भ देते हुए खाना खाने की मेज पर बैठने सम्बन्धी स्थिति के बारे में लिखा गया है. उनकी बात के अनुसार अमिताभ के आवास प्रतीक्षा में खाना खाने की गोल मेज है. जिसमें उन्होंने सहज ही अपनी-अपनी जगह चुन ली और रोज उसी पर बैठने लगे. इस बैठने सम्बन्धी दिशा का जिक्र उन्होंने महाभारत के सन्दर्भ में किया. उसका यहाँ कोई अर्थ नहीं, यहाँ सन्दर्भ इसका कि बहुतायत घरों में जहाँ खाना खाने की मेज का उपयोग किया जाता है वहाँ पारिवारिक सदस्यों के बैठने की जगह निर्धारित सी हो जाती है. ऐसा कुछ अमिताभ बच्चन की एक फिल्म बागवान में भी दिखाया गया है.

हो सकता है कि खाने की मेज का चलन आने पर ऐसा किसी सामाजिक स्थिति के कारण किया गया हो या फिर पारिवारिक स्थिति के पद, उम्र, अनुभव, रिश्ते, सम्बन्ध आदि के चलते ऐसा किया गया हो. इस बैठक व्यवस्था के पीछे का मूल बिंदु क्या है, यह अलग शोध का विषय हो सकता है, जिस पर यद्यपि अभी हमारी कोई रुचि नहीं. जहाँ-जहाँ हमने खाने की मेज पर बैठने की पारिवारिक व्यवस्था देखी वहाँ उम्र के साथ-साथ प्रस्थिति का भी ख्याल किया गया. इसे भी घर-परिवार में किसी एक व्यक्ति के प्रति सम्मान भाव भी कहा जा सकता है साथ ही इसे उसके प्रति सत्तासीन होने के भाव की आवृत्ति पैदा करना भी हो सकता है. जो व्यक्ति परिवार में सम्मान का पात्र है उसे सम्मान मिलता ही है फिर खाने की मेज पर उसकी बैठकी को लेकर इतनी सजगता क्यों? कभी लगता है कि खाने की मेज भी एक तरह से राजशाही जैसा वातावरण पैदा करती है. सबके हिसाब से सबकी जगह का निर्धारण किया जाना और निर्धारण पश्चात् उसका उसकी जगह पर ही बैठना. संभव है कि कभी जगह का परिवर्तन होने पर परिवारों में फ़िल्मी नौटंकी न होती हो मगर बहुतेरे घरों में इस बैठकी को लेकर एक तरह की सुरक्षात्मक सावधानी बरतते अवश्य देखा गया है. कुछ घरों में हमने स्वयं ऐसा होते देखा है, जहाँ पारिवारिक सदस्य की प्रस्थिति के अनुसार उसकी सीट का निर्धारण हो जाता है. आखिर ऐसा क्यों? क्या खाने की मेज पर बैठना भी व्यक्ति की प्रस्थिति का परिचायक है? क्या खाने की मेज पर बैठक व्यवस्था भी किसी शासन-सत्ता जैसी व्यवस्था का सूचक है? कहीं खाने की मेज पर बैठक व्यवस्था किसी विशेष व्यक्ति के अधिकारों को तो प्रदर्शित नहीं करती? 

चूँकि अभी तक हम लोगों द्वारा खाने की मेज का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है. कतिपय कारणों से अब जमीन पर बैठकर भोजन करना असंभव हो गया है अन्यथा पहले सभी सदस्य जमीन पर पालथी मार कर ही बैठते और भोजन का सामूहिक आनंद लिया करते थे. संभव हो कि डाइनिंग टेबल पर भोजन करने का अपना संस्कार हो, अपनी संस्कृति हो पर क्या वह संस्कृति घर, होटल, किसी आयोजन आदि में एकसमान ही रहती है? चलिए, इस पर कुछ खोजबीन के बाद कुछ और कहा-लिखा जायेगा. तब तक हम बच्चन जी की आत्मकथा से निपट लें.



12 अप्रैल 2019

ग़लतफ़हमी और अविश्वास में दरकते सम्बन्ध


कतिपय सार्वभौमिक सत्यों की तरह यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि ग़लतफ़हमी के चलते संबंधों के बिगड़ने में देर नहीं लगती है. इसके लिए किसी परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि यह अनादिकाल से सत्य होता चला आ रहा है. दो लोगों के आपसी संबंधों में बिखराव का एक कारण उनके बीच होने वाली ग़लतफ़हमी होती है. यह ग़लतफ़हमी कई तरह से संबंधों के बीच पनपने लगती है. आज के आपाधापी के दौर में, भागमभाग की स्थिति में सभी के पास सीमित समय रह गया है या कहें कि व्यक्तियों ने खुद को खुद में ही सीमित कर लिया है, इस कारण भी समय सीमित रह गया है. ऐसी स्थिति में लोगों के बीच आपसी वार्तालाप के अवसर बहुत कम आने लगे हैं. लोग जानबूझ कर भी आपस में मिलने से बचने लगे हैं. एक-एक व्यक्ति के भीतर अनेक-अनेक समाज पनप चुके हैं, वह उनको सँभालते-सँभालते ही अपने आपमें इतना परेशान हो जाता है कि किसी और जगह समय देने की स्थिति में नहीं रहता है.


ग़लतफ़हमी के साथ-साथ विश्वास-अविश्वास की स्थिति भी आपसी मनमुटाव का कारण बनता है. दो लोगों के मध्य अविश्वास का जन्म भी इसी ग़लतफ़हमी के कारण होता है. देखा जाये तो ग़लतफ़हमी और अविश्वास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इन दोनों का सह-सम्बन्ध भी है. एक के होने से दूसरे का उत्पन्न होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में चाहे पहले अविश्वास जन्म ले तो वहाँ ग़लतफ़हमी भी जन्म लेती है और यदि पहले ग़लतफ़हमी हो जाये तो वहाँ अविश्वास का जन्म हो जाता है. इधर देखने में आ रहा है कि वर्षों पुराने सम्बन्ध भी अचानक से जरा-जरा सी बात पर ग़लतफ़हमी का शिकार हो रहे हैं. अचानक से वर्षों पुराने संबंधों में अविश्वास पैदा हो जा रहा है. ये समझने का विषय है कि आखिर वर्षों पुराने संबंधों में एकदम से अविश्वास कहाँ, क्यों और कैसे उत्पन्न हुआ? यहाँ यह भी समझने वाली बात है कि यदि किसी स्थिति के चलते अविश्वास जैसी स्थिति आई भी, ग़लतफ़हमी का शिकार हुआ भी गया तो क्या आपसी सूझ-बूझ से, आपसी तालमेल से, आपसी बातचीत से उसे सुलझाने की कोशिश न की गई? ग़लतफ़हमी को दूर करने की कोशिश नहीं की गई?

इस तरह की स्थितियों से हमें स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर अनेक बार दो-चार होना पड़ता है जबकि अपने करीबी मित्रों, सहयोगियों, रिश्तेदारों के बीच उत्पन्न अविश्वास, ग़लतफ़हमी को दूर करने के प्रयास करने पड़ते हैं. ऐसा देखने में आया है कि बहुत बार अकारण जन्मे अविश्वास, ग़लतफ़हमी के पीछे कभी उनका अहं, कभी उनके बीच अबोल की स्थिति, कभी किसी पुरानी घटना को लेकर बना तनाव मुख्य कारण होता है. ऐसा ही कुछ हाल के दिनों में भी हुआ जबकि हमारे दो मित्रों के बीच उत्पन्न तनाव की स्थिति को, अविश्वास की स्थिति को दूर करने का प्रयास किया गया. यहाँ हवन करते हाथ जलने वाली बात हमारे साथ सत्य बैठ गई. दोनों मित्रों की चुप्पी के बीच हँसी-हँसी के वातावरण में हमने सुलझाव लाने की कोशिश की, इसी कोशिश में पता नहीं कहाँ से अविश्वास का, किसी पुरानी बात का, तनाव का, ग़लतफ़हमी का साया आ टपका. बस, एक झटके में बात बनने के बजाय बिगड़ने की दिशा में चली गई. दोनों तरफ से बात अपने-अपने स्तर पर सही समझ आ रही थी, मगर ऐसा सिर्फ भावनात्मक तौर पर ही सत्य समझ आ रहा था. भावनात्मक आधार पर निर्मित इमारत का व्यावहारिक स्वरूप निर्मित होता दिख नहीं रहा था. ऐसी स्थिति में पता नहीं उन दोनों के बीच बात सुलझी या और उलझ गई मगर हमारा प्रयास निरर्थक ही निकला. 

इस प्रयास में एक बात और स्पष्ट हुई कि शायद अभी भी हमें अपना विश्वास जमाने की आवश्यकता है क्योंकि बिना विश्वास के ऐसे मामले हल नहीं किये जा सकते हैं. दिल से, दिमाग से यही चाहा था कि दोनों दोस्तों के बीच का मसला सुलझ जाए, दोनों के बीच की तनाव की, अबोल की स्थिति समाप्त हो जाए और उन दोनों सहित हम भी सुखद स्थिति का अनुभव कर सकें. आखिर एक जिम्मेवारी सी समझ आ रही थी, उन दोनों मित्रों के बीच कॉमन मित्र बने होने के नाते. मित्रता का एक आधार जहाँ का तहाँ है, एक आधार शायद खिसक चुका है. बस उस आधार को बचाने के पहले अभी हमें खुद का ही विश्वास बचाना है. अपने विश्वास को पहले से भी अधिक ऊँचाई पर ले जाने का, पहले से अधिक मजबूत कर लेने का विश्वास तो हमें है बस कामना उन दोनों मित्रों के लिए है. जय हो....

11 अप्रैल 2019

चित्रों और शब्दों के संयोजन से उभरे शब्द-चित्र

कुछ समय पहले हमारे एक मित्र ने हमारी कविताओं, ग़ज़लों आदि को पढ़कर सुझाव दिया था कि मंच पर भी पढ़ा करो. इसके अलावा और भी बहुत कुछ हमारी रचनाओं की तारीफ के भी कहा गया. साफ़ सी बात है, मित्र है, बचपन का मित्र है तो स्वाभाविक है कि कोई लाग-लपेट तो होनी नहीं है. ऐसा भी नहीं कि कोई स्वार्थ रहा हो तभी उसने ऐसा कहा हो. वो हमारी आदत को जानता भी है कि हम किस कारण मंच से बचते रहे हैं. पहले रोजगार की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं को ही मंच बना रखा था, ऐसे में मंच पर जाना समय की बर्बादी समझ आती थी. ऐसा था भी क्योंकि उरई और आसपास के कवि-सम्मेलनों का देर रात तक चलना हुआ करता था, ऐसा आज भी होता है. यहाँ बहुत शुरू से पढ़ने का समय रात में ही निर्धारित कर रखा था, जिसके चलते रात का समय हम कहीं और खर्चने के मूड में नहीं रहते थे. वैसे ऐसा आज भी है. सिवाय घुमक्कड़ी के रात का समय कहीं और बिताना समय की, रात की बर्बादी समझ आती है. 


बहरहाल, अब न तो प्रतियोगी परीक्षाओं का चक्कर रहा और न ही रोजगार की तलाश में भटकने का सिलसिला और न ही किसी और तरह की भागदौड़. ऐसे में उस दोस्त ने कहना उसकी दृष्टि से सही भी था मगर पता नहीं क्यों इस तरह रुझान बना ही नहीं पाए. ऐसा नहीं कि मंच पर रचनाओं का पाठ नहीं किया या मंच से किसी तरह का भय लगता है मगर पता नहीं क्यों आज भी मन होने के बाद भी अन्दर से इच्छा नहीं होती कि मंच पर पढ़ने का सिलसिला आरम्भ किया जाये. ये भी मालूम है कि मंच अत्यंत सहजता से मिल भी जायेगा क्योंकि बहुत सारे मित्र मंचों पर स्थापित हो चुके हैं. उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन भी करते रहते हैं. इसके बाद भी अनिच्छा बनी ही रही, बनी ही हुई है.

जब उसने इस बार भी अपना प्रयास असफल होते देखा तो उसने एक और सुझाव दिया कि अपनी काव्य रचनाओं को छोटे-छोटे हिस्सों में अपनी फोटो के साथ शेयर करना शुरू करो. इसके लिए उसने आजकल सोशल मीडिया पर छोटे-बड़े कवियों, शायरों, साहित्यकारों के प्रसारित-प्रचारित होते काव्यांशों, गद्यांशों को चित्र सहित दिखाया भी. ऐसे चित्र हमारे पास भी सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से दिन भर किसी न किसी रूप में आते ही रहते हैं. किसी में प्रेम भरी शायरी, किसी में टूटे दिल का दर्द, किसी में दर्शन, किसी में भावनात्मक अपील जैसी, किसी में रिश्तों के निर्वहन की बातें, किसी में दोस्ती की चर्चा. लगा कि ये सुझाव अपनाया जा सकता है. आखिर कौन ऐसा होगा जिसे अपना ही प्रचार अच्छा न लगता हो. उसके द्वारा कई माह पहले दिया गया सुझाव ठंडे बस्ते में चला गया था. इधर दो-चार दिन से अपनी रचनाओं को, स्वयं के द्वारा खींचे गए चित्रों की, खुद बनाये रेखाचित्रों की रखरखाव, उनका संयोजन, व्यवस्थित करने का काम चल रहा था. इसी में कुछ चित्र बनाये हैं. हालाँकि इनको सोशल मीडिया पर भी शेयर किया गया है तथापि आप सबके लिए ब्लॉग पर पुनः इनको लगा रहे हैं. बताइयेगा कि हमारे दोस्त का सुझाया यह प्रस्ताव कैसा रहा?




10 अप्रैल 2019

अभावग्रस्त बचपन की खिलंदड़ मस्ती

अपने कॉलेज आने-जाने के क्रम में, नियमित शहर टहलने के क्रम में अक्सर ऐसे बच्चों से मिलना हो जाता है. बहुत से लोग ऐसे बच्चों को देखकर उनसे बचते हुए निकल जाते हैं. बहुत से लोग हैं जो इनको डाँटते-फटकारते हुए भी आगे बढ़ते हैं. समझ नहीं आया कि आखिर इन बच्चों को डाँटने-फटकारने का कारण क्या रहता है? देखने में आता है कि ये बच्चे किसी से कुछ मांगते नहीं हैं, न किसी से भीख माँगें, न किसी से खाने-पीने की गुहार लगायें. इस तरह के कई बच्चे हैं जो उरई की सड़कों पर, गलियों में आम लड़कों की तरह टहलते दिख जाते हैं. ये बच्चे तीन-तीन, चार-चार की संख्या में एकसाथ रहते हैं और सड़कों से, गलियों से, कूड़े के ढेर से कूड़ा बीनने का काम करते हैं. इनसे कई बार बातचीत करके इनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में जानकारी ली. इनके माता-पिता इनके द्वारा जमा किये गए पैसों को जुआ खेलने, शराब पीने में उड़ा दिया करते हैं. लगभग सभी परिवारों की एक जैसी स्थिति है. दो-चार बार इन बच्चों को पढ़ाई, शिक्षा आदि के बारे में समझाया, बताया मगर इनका मन उस तरफ जाता दिखाई न दिया. 


बहरहाल, बात ये नहीं कि ये पढ़ना चाहते हैं कि नहीं, यह भी नहीं कि प्रशासन इनकी तरफ ध्यान दे रहा है या नहीं बल्कि यह बताना है कि नितांत गरीबी के दौर में जी रहे ये बच्चे अपने इसी काम को करते समय पूर्णतः निर्दोष मस्ती के साथ मगन रहते हैं. इनकी आपसी मस्ती, आपसी नोंक-झोंक, आपस का हुल्लड़ देखकर लगता नहीं कि ये अपना पेट भरने की जद्दोजहद में इस काम को कर रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे अपने उसी काम को अपनी नियति समझने के बाद भी उसका आनंद ले रहे हैं, उसी में से आनंद निकाल रहे हैं. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जबकि कोई व्यक्ति अपने काम में पूरी तरह से आनंद की प्राप्ति करे. ऐसा न के बराबर देखने को मिलता है जबकि एक जैसा काम करने वालों के बीच हँसी-मजाक का निष्कलंक माहौल बना रहे. 

इन बच्चों को जब इस स्थिति में देखते हैं तो एकबारगी मन विचलित हो उठता है मगर ये देखकर सीखने की प्रेरणा मिलती है कि अपने काम को कैसे हँसते-खेलते किया जा सकता है.

09 अप्रैल 2019

संबंधों की आत्मीयता का ह्रास न होने दें


अनेक बार व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है कि संबंधों का विस्तार हो मगर भावनात्मकता के बिना हो. संबंधों में यदि भावनात्मकता का समावेश हो जाये और यदि किसी कारण से उनमें तारतम्यता न बनी रहे तो कष्ट बहुत होता है. ऐसा किसी और के नहीं वरन स्वयं के अनुभव से महसूस किया है. ऐसा बहुत लम्बे समय से हमारे साथ होता आ रहा है जबकि संबंधों का लाभ उठाया जाता रहा, हमारे संपर्कों का लाभ उठाते हुए अन्य लोगों द्वारा स्वार्थ सिद्ध किये गए मगर विगत एक दशक से ज्यादा समय से ऐसा बहुत नजदीक से देखने को मिला. कहा जाता है कि जो होता है उसके होने में कोई न कोई अच्छाई छिपी होती है. हमारा इस विचार से हमेशा विरोध रहा है. कई बार समझ नहीं आता था कि किसी परिवार के युवा की मृत्यु हो जाने में कौन सी अच्छाई छिपी हुई है? किसी मासूम बच्चे के साथ हुए अन्याय में किस तरह की अच्छाई छिपी होती है? ऐसा ही कुछ उस समय महसूस हुआ जबकि खुद को एक दुर्घटना का शिकार बना पाया. समझ नहीं आया कि इस दुर्घटना के चलते हमारे साथ क्या अच्छा होने वाला है?


बहरहाल, वो कठिन दौर जैसे आया था, कम से कम वैसे तो नहीं निकला मगर धीरे-धीरे गुजरने की कोशिश करने लगा. समस्याएं जैसी थीं वैसी भले ही समाप्त न हुईं मगर कम होने लगीं. इन्हीं के बीच अपने और गैरों की पहचान दिखने लगी. बहुत सारे अपने किसी गैर की तरह दिखने लगे और बहुत सारे गैर किसी अपने से ज्यादा नजर आये. समय गुजरता रहा, लोगों का आना-जाना लगा रहा. अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोगों का आना-जाना लगा रहा. इसमें कुछ सम्बन्ध आत्मीयता की हद तक बने, कुछ सम्बन्ध औपचारिक ही बने रहे. औपचारिक संबंधों से कभी किसी तरह की समस्या नहीं होती क्योंकि उनसे किसी तरह की अपेक्षा भी नहीं की जाती है. ऐसा माना जाता है कि औपचारिक सम्बन्ध सिर्फ और सिर्फ सम्बन्ध बनाये जाने के लिए बने हैं. उसी औपचारिकता में कोई एकाध ही संबंधों का दुरुपयोग कर जाता है. समस्या उनसे होती है जो आत्मीयता की हद तक जुड़े हुए होते हैं. जिनसे किसी तरह के अपनेपन की अपेक्षा की जाती है. ऐसे सम्बन्ध जब किसी गैर की तरह से व्यवहार करते दिखते हैं तो कष्ट होना स्वाभाविक है. 

ज़िन्दगी के इस दौर में कई बार लगता है कि संबंधों का बनाया जाना जहाँ एक तरफ शक्ति प्रदान करता है तो वहीं दूसरी तरह कमजोर भी बनाता है. संबंधों की आड़ में स्वार्थ-पूर्ति करने वालों की आज कमी नहीं और यदि ऐसा किसी आत्मीय सम्बन्ध वाले द्वारा किया जाये तो कष्ट तीव्र होता है. संबंधों के ऐसे निर्वहन में एक तरह की औपचारिकता दिखाई देने लगती है जिसके चलते संबंधों में कृत्रिमता विकसित होने लगती है. यही कृत्रिमता सभी तरह की आत्मीयता का ह्रास कर देती है. लगता है कि यदि संबंधों का दीर्घकालिक विकास चाहिए तो उनको आत्मीयता से बचाए रखना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि आत्मीयता का विकास संबंधों के बीच किसी न किसी तरह की अपेक्षा का निर्माण करती है और उसके पूरा न हो पाने की दशा में इसी आत्मीयता का ह्रास होता है. संबंधों का विकास कभी भी अपेक्षाओं की आधारभूमि पर नहीं हुआ है. इसके लिए संबंधों का निष्पक्ष, निष्कलंक रहना आवश्यक है.