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06 अप्रैल 2026

बदलते मौसम के खतरे

प्रकृति मिजाज कब बदल जाये, कहा नहीं जा सकता है. उसके इस बदलते रुख को इस समय बहुत ही नजदीक से महसूस किया जा रहा है. दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत अचानक से बदले मौसम की चपेट में है और बारिश, ओलावृष्टि, तूफानों का सामना कर रहा है. यह आश्चर्य का विषय है कि जिस समय में इस क्षेत्र में गरम हवाओं का परिचालन होता था, तीव्र गर्मी का एहसास किया जाता था उस समय यहाँ बारिश, ओलावृष्टि हो रही है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ में व्यापक बदलाव आने के कारण ऐसा हुआ है. इसके लिए उन्होंने पॉलर जेट स्ट्रीम में गड़बड़ी और पोलर वॉर्टेक्स के बदलते रूप को जिम्मेदार बताया है. पोलर वॉर्टेक्स आर्कटिक के चारों ओर घूमता ठंडा वायुमंडल है. इसके चलते ही ओलावृष्टि में तीव्रता देखने को मिल रही है. मौसम विज्ञानियों के अनुसार गत माह मार्च में पाँच-छह पश्चिमी विक्षोभ आने चाहिए थे लेकिन इनकी संख्या आठ हो गई. वर्तमान माह अप्रैल में अनुमान है कि इनकी संख्या कम से कम तीन हो सकती है.

 


इस बदलते मौसम का कारण कुछ भी क्यों न रहा हो मगर यह जलवायु संकट का एक अत्यंत चिंताजनक और प्रत्यक्ष उदाहरण है. पारम्परिक ऋतु चक्र में परिवर्तन होने से जीवनदायिनी बारिश विनाशकारी भी बन जाती है. इस बेमौसम बारिश का प्रभाव नकारात्मक रूप से सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक ढाँचे पर हुआ है. इस असमय वर्षा ने सबसे घातक प्रहार हमारे कृषि ढाँचे पर किया है. तकनीकी विकास के बाद भी भारतीय कृषि आज भी पूरी तरह से प्रकृति के तालमेल पर निर्भर करती है. ऐसे में प्रकृति का जरा सा भी नकारात्मक बदलाव किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती है. असमय होने वाली इस बारिश, ओलावृष्टि, तूफ़ान ने रबी की फसल को अपनी चपेट में ले लिया है. गेहूँ, सरसों, चने जैसी फसलें मौसम की मार के कारण मिट्टी में मिल चुकी हैं.

 

ऐसी स्थिति का प्रभाव अकेले किसानों पर नहीं पड़ता है बल्कि समग्र रूप में पूरी आर्थिकी इससे प्रभावित होती है, आम जनजीवन को भी इसका प्रभाव सहना पड़ता है. असमय मौसम के बदले इस मिजाज के कारण फसल तो चौपट होती ही है और यदि किसी तरह के प्रयासों से कुछ बचाव कर भी लिया जाये तो न केवल अनाज की मात्रा कम होती है बल्कि दानों की गुणवत्ता में भी कमी आती है. इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि किसान को  अपनी फसल का उचित दाम बाजार में नहीं मिल पाता है. ऐसी स्थिति में आपूर्ति की कमी हो जाती है, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था, एक गृहिणी की रसोई भी प्रभावित होती है. बाजार में आपूर्ति की कमी के चलते खाद्य मुद्रास्फीति अर्थात महँगाई का भी तेजी से बढ़ना शुरू हो जाता है. वर्तमान दौर में जबकि न केवल वैश्विक समुदाय बल्कि भारतीय समाज भी युद्ध की विभीषिका के कारण से आर्थिकी में हो रहे परिवर्तनों को महसूस कर रहा है, तब बेमौसम की मार से इस आर्थिक तंत्र के बिगड़ने से आम जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है.

 


इस असमय मौसम परिवर्तन ने केवल कृषि को बल्कि स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है. प्रकृति में तापमान के अचानक गिरने से, नमी के बढ़ने से सूक्ष्मजीवों
, वायरस, मच्छरों आदि के पनपने का खतरा बढ़ गया है. ऐसा होने के परिणामस्वरूप सर्दी-खाँसी, बुखार, श्वसन सम्बन्धी समस्याओं के साथ-साथ डेंगू, मलेरिया आदि बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है. मौसमी बदलाव के लिए शारीरिक रूप से तैयार न होने के कारण लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है. इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है. इनके अलावा इस बदलते मौसम से हमारा पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता भी प्रभावित होती है. प्रत्येक जीव और वनस्पति का अपना एक जैविक कैलेंडर होता है, जिसमें इस असमय बदलाव के कारण भी बदलाव देखने को मिलता है. असमय बारिश से उनका प्रजनन चक्र प्रभावित होता है, बहुत से पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं, अनेक दुर्लभ प्रजातियों का  अस्तित्व इस असमय बदलाव के कारण खतरे में पड़ जाता है.

 

मौसम विशेषज्ञ इस बदलाव का कारण भले ही कुछ भी बताएँ मगर यदि ऐसी स्थितियों के मूल में जाया जाये तो ग्लोबल वार्मिंग, मानव-जनित प्रदूषण ही इसके सबसे प्रमुख कारण नजर आते हैं. विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने जंगलों, नदियों, पहाड़ों, वायुमंडल को नष्ट कर दिया है. इससे पारिस्थितिक तंत्र की नकारात्मकता ने प्रकृति में उथल-पुथल मचा रखी है. कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा ने धरती का तापमान खराब कर दिया है. समुद्रों, नदियों के पहले से कहीं अधिक गर्म होने के कारण बादलों का निर्माण, उनकी दिशा अनियंत्रित हो गई है. पश्चिमी विक्षोभ और समुद्री चक्रवातों के बदलते पैटर्न ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है.

 

इस संकट का समाधान मुआवजा, तात्कालिक राहत में नहीं है. इसके लिए दीर्घकालिक नीतियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना होगा. प्रकृति से खिलवाड़ करने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा. सिंचाई के लिए जल संचयन प्रणालियों को मजबूत करना होगा ताकि बारिश के पानी का सदुपयोग हो सके. तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे शहरों के नियोजन में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है ताकि वे जलवायु अनुकूलन क्षमता को धारण कर सकें. यह समझना होगा कि बेमौसम बारिश कोई मौसमी परिघटना नहीं है बल्कि यह प्रकृति की चेतावनी है, जो हमें अपनी जीवनशैली बदलने को सचेत कर रही है. यदि हम अब भी नहीं जागे, पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया तो ऐसी मौसमी अनिश्चितताएँ हमारी खाद्य सुरक्षा, सामाजिक ढाँचे को हिलाकर रख देंगी.


22 अगस्त 2021

बारिश के आते ही बचपन का आ जाना

यूँ तो सभी मौसमों का अपना मजा है. हर मौसम में लोग अपनी तरह से उसका आनंद लिया करते हैं. किसी को गर्मी इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि इस मौसम में वे देश-विदेश के बर्फीले स्थानों के भ्रमण का बहाना निकाल लेते हैं. कुछ लोगों को सर्दी इसलिए पसंद आती है क्योंकि उस मौसम का गुलाबीपन मनभावन होता है. कुछ लोगों को बरसात का मौसम उसकी रिमझिम के कारण, भीगते हुए मस्ती करने के कारण पसंद आता है. मौसमों की बदलती रंगत के चलते, अपनी विशेष प्रकृति के चलते ये नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ यही मौसम सुहाना है या फलां मौसम ख़राब है. सबका अपना आनंद है, सबका अपना महत्त्व है. सामान्य रूप से सर्दी, गर्मी, बरसात के तीन मौसमों में से हमें भी बरसात का मौसम विशेष रूप से पसंद है. पसंद तो सर्दी भी है, गर्मी भी है मगर बरसात का आना खुद को बचपन में लौटा ले जाने जैसा अनुभव कराता है. बरसात का आना हमारे लिए आज भी भीगने का सन्देश लाने जैसा होता है. बचपन में तो भीगना, कागज की नाव बनाकर तैराना, एक साथ कई नावों को धागे से बाँधकर तेरा देना, भरे पानी में कूद कर खुद को भिगाते हुए बगल वाले को भिगो देना, मेंढकों की टर्र-टर्र को पकड़ना, बारिश बंद हो जाने के बाद भीगे पौधों को हिलाकर उनकी पत्तियों पर बैठी बूंदों के नीचे आकर भीगना आदि सहज भाव से होता रहता था.



समय गुजरता रहा. हम बचपन से युवावस्था की तरफ बढ़ते रहे. उम्र बढ़ती रही. समय के साथ कार्यशैली बदलती रही. कार्य बदलते रहे. जीवनशैली बदलती रही. प्रस्थिति बदलती रही. जिम्मेवारियाँ बढ़ती रहीं. इन सबके बदलते रहने के बीच बरसात हर साल अपनी रंगत में आती रही. ये और बात है कि पर्यावरणीय समस्याओं के चलते अब बरसात अपने उस रूप में नहीं आती जैसी कि हमारे बचपने में आती थी. क्या कुछ न बदला. समय बदला, बरसात की रंगत बदली, बारिश की समयसीमा भी बदली मगर यदि न बदला तो बरसात में मौज-मस्ती करने का हमारा अंदाज. उम्र अपनी जगह, जिम्मेवारी अपनी जगह, प्रस्थिति अपनी जगह, कार्य अपनी जगह और बरसात की मस्ती अपनी जगह. कई बार तेज बारिश में सड़क पर खुद को भिगाते घूमते समय लोगों को दुकानों में, किसी आड़ में, कहीं किसी स्थान पर दुबके खड़े लोगों को देखकर विचार आता है कि क्या इनके अन्दर बारिश में भीगने की इच्छा नहीं होती? बारिश में भीगने के डर से दुबके खड़े लोगों में युवाओं को देखकर तो उनके ऊपर तरस आता है. यदि वे इस अवस्था में खुलकर जीने का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं तो उस समय क्या उठाएंगे जबकि उनके ऊपर परिवार की, अपने कार्य की, पद की जिम्मेवारी होगी.

कॉलेज में फुर्सत के पलों में बारिश का आनंद 

कई बार महसूस किया है हमने कि लोग अनावश्यक रूप से गंभीर बनने की कोशिश में जीवन जीना भूल चुके हैं. बढ़ती उम्र के लोग ये सोचकर बारिश में नहीं भीगते कि लोग क्या कहेंगे. वे बच्चों के साथ कागज की नाव इसलिए तैराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि लोग उन्हें पागल न समझ लें. युवाओं में भी भीगने को लेकर, पानी में कूदने, नाव तैराने को लेकर संकोच का भाव है. आजकल के बच्चे, युवा अचानक ही अपनी उम्र से कई गुना अधिक बड़े-बुजुर्ग बन चुके हैं. जिम्मेवारियों से पहले ही उनके कंधों पर अनावश्यक जिम्मेवारियाँ डाल दी गई हैं. ऐसा नहीं हैं कि हमारे कंधों पर जिम्मेवारी नहीं, ऐसा भी नहीं है कि हमारे आसपास के वातावरण में, समाज में हमारी प्रस्थिति-स्थिति दोयम दर्जे की है मगर अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने के लिए किसी की क्या परवाह करना. हाँ, हमारी उन्मुक्तता से, हमारी स्वच्छंदता से, हमारी मौज-मस्ती से किसी अन्य के जीवन पर, उसकी जीवनशैली पर, उसके आनंद पर, उसके रहन-सहन पर किसी तरह का नकारात्मक असर न पड़े, इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए. हम तो आज भी बारिश का इंतजार उसी बेसब्री से करते हैं जैसे कि बचपन में किया करते थे. आज भी बारिश होते ही शहर की सड़कों पर विचरना शुरू हो जाता है. भरे पानी में, बहते पानी में नाव का तैराना शुरू हो जाता है. 

तैर गईं कई नावें 

एक बार, एक पल को अपने आसपास सबकुछ भुलाकर खुद को बस बच्चा समझकर देखिये. अपने आसपास के लोगों की तरफ से आँखें हटाकर बस खुद को देखना शुरू कीजिये. महसूस कीजिये उस एक क्षण को जब सिर्फ और सिर्फ आप हैं और रूमानी अंदाज में हो रही बारिश. उस एक पल में सारी जिम्मेवारियों को कहीं किनारे लगा कर बस बारिश को अपने ऊपर हावी होने दीजिये. फिर देखिये, कैसे आपके दिल-दिमाग में जबरन घुसी बैठी समस्याएँ, परेशानियाँ कहीं दूर भागती नजर आती हैं. झमाझम होती बारिश के साथ एकाकार होने की कोशिश करिए फिर देखिये कैसे आपका बचपना आपके साथ खेलने-कूदने सामने आ जाता है. सबको नजरअंदाज करते हुए एक बार बहते पानी में कागज की नाव तैराकर देखिये आपको लगेगा कि आपके बचपन के साथी आपके साथ खिलखिला रहे हैं. जिंदगी की आपाधापी में से कुछ पल विशुद्ध अपने लिए निकालने के लिए आपको सबकुछ भूल-भुलाकर बच्चा बनना पड़ेगा, बचपन को आज में वापस लाना पड़ेगा.


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बारिश होने पर आज फिर याद आ गई कुछ साल पहले की ये पोस्ट 

26 जून 2021

बचपना अपने जीवन में उतार कर तो देखिये

देखा जाये तो हर एक मौसम का अपना मजा है. जिसको मौसम का मजा लेने की आदत है वो किसी न किसी बहाने उस मौसम का अपनी तरह से उसका आनंद लिया करता है. किसी को गर्मी पसंद है क्योंकि इस मौसम में वह देश-विदेश के बर्फीले स्थानों के घूमने का मौका निकाल लेते हैं. कुछ लोगों के लिए सर्दी पसंद का कारण है क्योंकि उस मौसम का गुलाबीपन मनभावन होता है. कुछ लोगों को बरसात का मौसम उसकी रिमझिम के कारण, भीगते हुए मस्ती करने के कारण पसंद आता है. हर मौसम का अपना आनंद है, हर मौसम का अपना महत्त्व है. हमें भी सभी मौसम अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण पसंद हैं मगर बरसात का आना सबसे सुखद लगता है. इसका कारण खुद को बचपन में लौटा ले जाने जैसा अनुभव कराना है. बरसात का आना हमारे लिए आज भी भीगने का सन्देश लाने जैसा होता है. बचपन में तो भीगना, कागज की नाव बनाकर तैराना, एक साथ कई नावों को धागे से बाँधकर तेरा देना, भरे पानी में कूद कर खुद को भिगाते हुए बगल वाले को भिगो देना, मेंढकों की टर्र-टर्र को पकड़ना, बारिश बंद हो जाने के बाद भीगे पौधों को हिलाकर उनकी पत्तियों पर बैठी बूंदों के नीचे आकर भीगना आदि सहज भाव से होता रहता था. यह सहजता हम आज भी बनाये हुए हैं.




ये और बात है कि बचपन से युवावस्था की तरफ बढ़ते रहने के साथ कार्यशैली बदलती रही. कार्य बदलते रहे. जीवनशैली बदलती रही. जिम्मेवारियाँ बढ़ती रहीं. इन सबके बदलते रहने के बीच बरसात हर साल अपनी रंगत में आती रही. ये और बात है कि पर्यावरणीय समस्याओं के चलते अब बरसात अपने उस रूप में नहीं आती जैसी कि हमारे बचपने में आती थी. क्या कुछ न बदला. समय बदला, बरसात की रंगत बदली, बारिश की समयसीमा भी बदली मगर यदि न बदला तो बरसात में मौज-मस्ती करने का हमारा अंदाज. उम्र अपनी जगह, जिम्मेवारी अपनी जगह, प्रस्थिति अपनी जगह, कार्य अपनी जगह और बरसात की मस्ती अपनी जगह. कई बार तेज बारिश में सड़क पर खुद को भिगाते घूमते समय लोगों को दुकानों में, किसी आड़ में, कहीं किसी स्थान पर दुबके खड़े लोगों को देखकर विचार आता है कि क्या इनके अन्दर बारिश में भीगने की इच्छा नहीं होती? बारिश में भीगने के डर से दुबके खड़े लोगों में युवाओं को देखकर तो उनके ऊपर तरस आता है. यदि वे इस अवस्था में खुलकर जीने का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं तो उस समय क्या उठाएंगे जबकि उनके ऊपर परिवार की, अपने कार्य की, पद की जिम्मेवारी होगी.


कई बार लगता है हमने कि लोग अनावश्यक रूप से गंभीर बनने की कोशिश में जीवन जीना भूल चुके हैं. बढ़ती उम्र के लोग ये सोचकर बारिश में नहीं भीगते कि लोग क्या कहेंगे. वे बच्चों के साथ कागज की नाव इसलिए तैराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि लोग उन्हें पागल न समझ लें. युवाओं में भी भीगने को लेकर, पानी में कूदने, नाव तैराने को लेकर संकोच का भाव है. आजकल के बच्चे, युवा अचानक ही अपनी उम्र से कई गुना अधिक बड़े-बुजुर्ग बन चुके हैं. जिम्मेवारियों से पहले ही उनके कंधों पर अनावश्यक जिम्मेवारियाँ डाल दी गई हैं. ऐसा नहीं हैं कि हमारे कंधों पर जिम्मेवारी नहीं, ऐसा भी नहीं है कि हमारे आसपास के वातावरण में, समाज में हमारी प्रस्थिति-स्थिति दोयम दर्जे की है मगर अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने के लिए किसी की क्या परवाह करना. हाँ, हमारी उन्मुक्तता से, हमारी स्वच्छंदता से, हमारी मौज-मस्ती से किसी अन्य के जीवन पर, उसकी जीवनशैली पर, उसके आनंद पर, उसके रहन-सहन पर किसी तरह का नकारात्मक असर न पड़े, इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए. हम तो आज भी बारिश का इंतजार उसी बेसब्री से करते हैं जैसे कि बचपन में किया करते थे. आज भी बारिश होते ही शहर की सड़कों पर विचरना शुरू हो जाता है. भरे पानी में, बहते पानी में नाव का तैराना शुरू हो जाता है. 


अभी कुछ दिन पहले दो-तीन दिन कभी-कभी बहुत तेज बारिश हुई. इसे शायद संयोग ही कहेंगे कि उस समय हम घर से बाहर ही थे. तेज बारिश के उस मौके पर हमने बजाय दुबक के बैठने के बारिश में घूमने का मौका निकाला. न केवल हम बारिश में भीगने निकले बल्कि बारिश के तेज समझ आते ही हम घर आये और उस समय घर में उपस्थित अपनी दोनों बेटियों को स्कूटर में बैठाया और निकल पड़े तेज बारिश का आनंद लेने. बहुत से परिचित लोगों के लिए यह हँसी-मजाक का विषय बन जाता है मगर एक बार बच्चा बनकर देखिये, एक बार अपनी बढ़ती उम्र में बचपन को जीकर देखिये, आपको भी हमारी तरह मजा आएगा, सुकून मिलेगा.




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01 अक्टूबर 2019

हम भी भीगना चाहते हैं


आज दोपहर फिर खूब बारिश हुई, खूब जोरों की बारिश हुई. सभी की तरह हमारा भी मन किया भीगने का, झमाझम बरसती बारिश में दिल तक भिगो डालने का. ठीक उसी तरह भीगने का जैसे कि और लोग भी भीगा करते हैं. कभी सड़क पर झूमते हुए, कभी खाली गीली सड़क पर अपनी बाइक लहराते हुए, कभी तेज बरसती बूंदों के साथ अटखेलियाँ करते. बारिश के साथ इस तरह से भीगना हमारे हिस्से क्यों नहीं आता है? क्यों हमें बाइक को बारिश की रफ़्तार के साथ होड़ लगाने की अनुमति नहीं मिलती है? क्यों हमारा भीगना घर की छत से बाहर नहीं निकल पाता है? हमने भी देखा है शहर के बाहर से गुजरते हुए हरे-भरे हाईवे को. हमने भी महसूस किया है उस हाईवे पर बरसती बारिश की बूंदों को. ठीक है, हमने उस बारिश का भी आनंद लिया है मगर कब तक एक बंधन में बंधी हुई आज़ादी का आनंद हम लेटे रहेंगे? कब तक हम आज़ादी का आभासी एहसास करते रहेंगे? आखिर हम भी एक व्यक्तित्व हैं. हमें भी अपने आपको साबित करना आता है. ऐसे में आखिर कब तक हम महज एक बोझ की तरह सबके सामने लाये जाते रहेंगे? 


कोई और न समझे, दुनिया के वे चार लोग न समझें जो कुछ न कुछ कहने लगते हैं, समाज के लोग न समझें मगर आप तो समझिये. आप तो हमारे अपने हैं, आप महज वे चार लोग नहीं जिनका नाम लिया जाता है, आप सवालिया निशान उठाने वाले समाज नहीं. आप हमारा समाज हैं. हम आपसे हैं और आप भी हमसे ही हैं फिर हम पर सवालिया निशान क्यों? आपकी शिक्षायें ही हमारा आधार हैं फिर आप हम पर शंका कर रहे हैं या फिर अपनी शिक्षाओं पर? आपको बताएं, हम भी आनंद लेना चाहते हैं बारिश का. हम भी सुखद अनुभूति लेना चाहते हैं बारिश की आज़ादी का. हम भी दौड़ाना चाहते हैं तेज रफ़्तार से अपनी बाइक को. हम भी भीगना चाहते हैं हाईवे की आज़ाद बरसती बूंदों के साथ.

हमें भली-भांति जानकारी है अपनी आज़ादी की. हमें अच्छे से जानकारी है अपनी स्वतंत्रता की. हम समझते हैं अपनी उड़ान को. हमें मालूम है कि हमारी आज़ादी बारिश की बूंदों से अधिक नहीं होगी, इसके बाद भी हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि हम बारिश की बूंदों की आज़ादी को बाधित नहीं करेंगे. हम आपको विश्वास दिलाते है कि हम अपनी बाइक के सहारे बाकी किसी की बाइक की रफ़्तार को कम न होने देंगे. हम ये भी विश्वास दिलाते हैं कि हमारा भीगना किसी और को शर्मसार नहीं करेगा. हम बस भीगना चाहते हैं बारिश में. हम बस आनंद लेना चाहते हैं मौसम का. हम बस महसूस करना चाहते हैं अपनी आज़ादी का. हम बस स्वीकार करना चाहते हैं अपने व्यक्तित्व का. कम से कम समाज के और लोग तो नहीं पर आप तो इसे महसूस करो. हम आपसे ही हैं इसे आभासित तो होने दो. एक बार बरसती बूंदों को हमारे लिए बरसना समझ कर हमें घर की छत से आज़ाद होने दो. हम विश्वास दिलाते हैं कि हम भीगना चाहते हैं घनघोर मगर आपको आंसुओं में भीगने न देंगे. बस हम भीगना चाहते हैं, सिर्फ और सिर्फ भीगना चाहते हैं.



26 जुलाई 2018

बारिश और बचपन का लौटना

यूँ तो सभी मौसमों का अपना मजा है. हर मौसम में लोग अपनी तरह से उसका आनंद लिया करते हैं. किसी को गर्मी इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि इस मौसम में वे देश-विदेश के बर्फीले स्थानों के भ्रमण का बहाना निकाल लेते हैं. कुछ लोगों को सर्दी इसलिए पसंद आती है क्योंकि उस मौसम का गुलाबीपन मनभावन होता है. कुछ लोगों को बरसात का मौसम उसकी रिमझिम के कारण, भीगते हुए मस्ती करने के कारण पसंद आता है. मौसमों की बदलती रंगत के चलते, अपनी विशेष प्रकृति के चलते ये नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ यही मौसम सुहाना है या फलां मौसम ख़राब है. सबका अपना आनंद है, सबका अपना महत्त्व है. सामान्य रूप से सर्दी, गर्मी, बरसात के तीन मौसमों में से हमें भी बरसात का मौसम विशेष रूप से पसंद है. पसंद तो सर्दी भी है, गर्मी भी है मगर बरसात का आना खुद को बचपन में लौटा ले जाने जैसा अनुभव कराता है. बरसात का आना हमारे लिए आज भी भीगने का सन्देश लाने जैसा होता है. बचपन में तो भीगना, कागज की नाव बनाकर तैराना, एक साथ कई नावों को धागे से बाँधकर तेरा देना, भरे पानी में कूद कर खुद को भिगाते हुए बगल वाले को भिगो देना, मेंढकों की टर्र-टर्र को पकड़ना, बारिश बंद हो जाने के बाद भीगे पौधों को हिलाकर उनकी पत्तियों पर बैठी बूंदों के नीचे आकर भीगना आदि सहज भाव से होता रहता था.


समय गुजरता रहा. हम बचपन से युवावस्था की तरफ बढ़ते रहे. उम्र बढ़ती रही. समय के साथ कार्यशैली बदलती रही. कार्य बदलते रहे. जीवनशैली बदलती रही. प्रस्थिति बदलती रही. जिम्मेवारियाँ बढ़ती रहीं. इन सबके बदलते रहने के बीच बरसात हर साल अपनी रंगत में आती रही. ये और बात है कि पर्यावरणीय समस्याओं के चलते अब बरसात अपने उस रूप में नहीं आती जैसी कि हमारे बचपने में आती थी. क्या कुछ न बदला. समय बदला, बरसात की रंगत बदली, बारिश की समयसीमा भी बदली मगर यदि न बदला तो बरसात में मौज-मस्ती करने का हमारा अंदाज. उम्र अपनी जगह, जिम्मेवारी अपनी जगह, प्रस्थिति अपनी जगह, कार्य अपनी जगह और बरसात की मस्ती अपनी जगह. कई बार तेज बारिश में सड़क पर खुद को भिगाते घूमते समय लोगों को दुकानों में, किसी आड़ में, कहीं किसी स्थान पर दुबके खड़े लोगों को देखकर विचार आता है कि क्या इनके अन्दर बारिश में भीगने की इच्छा नहीं होती? बारिश में भीगने के डर से दुबके खड़े लोगों में युवाओं को देखकर तो उनके ऊपर तरस आता है. यदि वे इस अवस्था में खुलकर जीने का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं तो उस समय क्या उठाएंगे जबकि उनके ऊपर परिवार की, अपने कार्य की, पद की जिम्मेवारी होगी.

कॉलेज में फुर्सत के पलों में बारिश का आनंद 

कई बार महसूस किया है हमने कि लोग अनावश्यक रूप से गंभीर बनने की कोशिश में जीवन जीना भूल चुके हैं. बढ़ती उम्र के लोग ये सोचकर बारिश में नहीं भीगते कि लोग क्या कहेंगे. वे बच्चों के साथ कागज की नाव इसलिए तैराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि लोग उन्हें पागल न समझ लें. युवाओं में भी भीगने को लेकर, पानी में कूदने, नाव तैराने को लेकर संकोच का भाव है. आजकल के बच्चे, युवा अचानक ही अपनी उम्र से कई गुना अधिक बड़े-बुजुर्ग बन चुके हैं. जिम्मेवारियों से पहले ही उनके कंधों पर अनावश्यक जिम्मेवारियाँ डाल दी गई हैं. ऐसा नहीं हैं कि हमारे कंधों पर जिम्मेवारी नहीं, ऐसा भी नहीं है कि हमारे आसपास के वातावरण में, समाज में हमारी प्रस्थिति-स्थिति दोयम दर्जे की है मगर अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने के लिए किसी की क्या परवाह करना. हाँ, हमारी उन्मुक्तता से, हमारी स्वच्छंदता से, हमारी मौज-मस्ती से किसी अन्य के जीवन पर, उसकी जीवनशैली पर, उसके आनंद पर, उसके रहन-सहन पर किसी तरह का नकारात्मक असर न पड़े, इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए. हम तो आज भी बारिश का इंतजार उसी बेसब्री से करते हैं जैसे कि बचपन में किया करते थे. आज भी बारिश होते ही शहर की सड़कों पर विचरना शुरू हो जाता है. भरे पानी में, बहते पानी में नाव का तैराना शुरू हो जाता है. 

तैर गईं कई नावें 

एक बार, एक पल को अपने आसपास सबकुछ भुलाकर खुद को बस बच्चा समझकर देखिये. अपने आसपास के लोगों की तरफ से आँखें हटाकर बस खुद को देखना शुरू कीजिये. महसूस कीजिये उस एक क्षण को जब सिर्फ और सिर्फ आप हैं और रूमानी अंदाज में हो रही बारिश. उस एक पल में सारी जिम्मेवारियों को कहीं किनारे लगा कर बस बारिश को अपने ऊपर हावी होने दीजिये. फिर देखिये, कैसे आपके दिल-दिमाग में जबरन घुसी बैठी समस्याएँ, परेशानियाँ कहीं दूर भागती नजर आती हैं. झमाझम होती बारिश के साथ एकाकार होने की कोशिश करिए फिर देखिये कैसे आपका बचपना आपके साथ खेलने-कूदने सामने आ जाता है. सबको नजरअंदाज करते हुए एक बार बहते पानी में कागज की नाव तैराकर देखिये आपको लगेगा कि आपके बचपन के साथी आपके साथ खिलखिला रहे हैं. जिंदगी की आपाधापी में से कुछ पल विशुद्ध अपने लिए निकालने के लिए आपको सबकुछ भूल-भुलाकर बच्चा बनना पड़ेगा, बचपन को आज में वापस लाना पड़ेगा.


25 जुलाई 2018

बचपन को एकबार फिर जीकर देखो


विगत कई दिनों से लगातार बादल उमड़ रहे थे. काले-काले बादल इस तरह आसमान में विचरण करने लगते मानो अब बरसे कि तब बरसे. कई घंटों की घूमा-फिरी करने के बाद आसमान को अपनी कालिख से मुक्त करते हुए नीला कर जाते और बारिश का मुँह ताकते लोगों को निराश कर जाते. कभी-कभी छुटपुट कुछ बूँदें टपक जाती और वे ऐसा एहसास कराती जैसे बादलों के टहलने-घूमने से उनका पसीना निकल कर धरती पर आ गिरा हो. बादलों का आना और बारिश का न होना लगातार जारी रहा. आसमान के साए में विचरते बादल अपनी छठा बिखेरते हुए चले जाते और यहाँ धरती पर काली खोपड़ी वाला अपने-अपने वैज्ञानिक-अवैज्ञानिक तर्क-कुतर्क करता बारिश के होने, न होने का विश्लेषण प्रस्तुत करता रहता. हमें इन तर्क-वितर्क से कोई लेना-देना नहीं क्योंकि बचपन से एक बात पढ़ते आ रहे हैं कि बारिश होने के लिए पेड़ों का, छायादार वृक्षों का, सघन जंगलों का होना अत्यावश्यक है. अब ये सब चीजें बची नहीं सो बारिश भी इसी अनुपात में हो रही है. बहरहाल, आसमान में जैसे ही काले बादल अपने भ्रमण पर निकलते, हम भी अपना स्कूटर उठाकर सडकों पर, मैदानों में टहलने लगते. इंतजार रहता कि कब ये बरसें और कब हम भीगें. हम धरती पर टहलते, बादल आसमां में टहलते और अंततः थकहार कर दोनों अपने-अपने घर को लौट जाते.



बारिश का होना और हमारा भीगना जैसे पिछले कई जन्मों का नाता हो. आज से नहीं, बचपन से बारिश में भीगने का जबरदस्त आननद उठाया है. जब स्कूल में होते तो बारिश के दिनों में इंतजार करते कि कब छुट्टी के समय पानी गिरे और कब हम भीगते हुए घर पहुँचें. जिस दिन बारिश होने लगती, उसी दिन स्कूल से घर का रास्ता न जाने कितना लम्बा हो जाता. शहर की न जाने कितनी गलियों में टहलते-भीगते हम घर पहुँचते. आज भी ऐसा ही होता है. आज भी कॉलेज से आना होता है मगर अंतर इतना है कि बचपन में छात्र की स्थिति में होते थे आज शिक्षक की स्थिति में हैं. प्रस्थिति बदलने के बाद भी बारिश के प्रति संवेदनाओं में परिवर्तन न हुआ, उसके प्रति दीवानगी में कमी न आई, उसके साथ भीगने का आनंद कम न हुआ. यही कारण है कि आज भी बारिश होने पर बजाय घर में चाय-पकौड़ों का आनंद लेने के हम सड़कों पर टहलते हुए भीगना पसंद करते हैं. हमारे कई मित्र ऐसी स्थिति में देखकर हमें हमारी उम्र, हमारे पद, हमारी प्रस्थिति, समाज में हमारी स्थिति का भान करवाते हैं. बारिश में छोटे से शहर की सड़कों पर भीगते हुए टहलने को बहुत से लोग बचपना बताते नहीं थकते. कुछ ऐसे कृत्य को बिगड़े युवाओं वाले विशेषण से नवाजते हैं. कोई क्या कहता है, किस उपाधि से हमें विभूषित करता है इससे हमें फर्क नहीं पड़ता है. हमें आनंद आता है बारिश में भीगने में तो हम भीगते हैं.



वैसे ये अपने आपमें एक शोध का विषय होना चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ, पद बढ़ने के साथ, जिम्मेवारी बढ़ने के साथ इन्सान अपना बचपना क्यों खोता जाता है? क्यों उसे ऐसा लगता है कि यदि वह समाज में खुलकर हँस लेगा तो लोग उसे जाहिल बता देंगे? क्यों उसके अन्दर ऐसी भावना आ जाती है कि अब वह शादीशुदा है, बच्चों का पिता है तो उसे बचपन जैसी हरकतें नहीं करनी चाहिए? उसे क्यों महसूस होता है कि वह किसी पद पर है और दो-चार पल अपनी ख़ुशी के जी लेगा तो लोग उसके बारे में बुरा सोचने लगेंगे? हमारा अपना अनुभव है कि इन्सान की इसी सोच ने कि लोग क्या कहेंगे, उसे जरूरत से ज्यादा गंभीर बना दिया है. यही अतिशय गंभीरता उसे परेशान करती है, थकाती है, हताशा की तरफ ले जाती है. ज़िन्दगी खुलकर, हँसकर जीने का नाम है. परेशानियों, कष्टों में ज़िन्दगी जी नहीं जाती वरन सिर्फ गुजारी जाती है. कोई इन्सान किस पद पर है, किस प्रस्थिति में है, कितने बच्चों का पिता है इसका उसके स्वभाव पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. किसी भी व्यक्ति की अनावश्यक गंभीरता, जिम्मेवारी उठाये रखने की अनावश्यक भावना ने उसके अन्दर का बचपन समाप्त करके रख दिया है. यदि हम एहसास करें तो किसी भी व्यक्ति को सबसे ज्यादा आनंद बच्चों के साथ ही मिलता है. बच्चों के साथ वह उनकी ही तरह तोतली भाषा में बात करने लगता है, उनके लिए घोड़ा बनकर घूमने लगता है और कभी कोई जानवर बनकर उसी की तरह आवाज़ निकालने लगता है. ये और बात है कि ये सारी हरकतें वह परदे के भीतर करता है.

सोचने वाली बात है कि बारिश में भीगना या फिर बच्चों की तरह निश्छल जीने का अंदाज प्रदर्शित करना क्या कोई अपराध है? फिर बारिश में उन्मुक्त होकर आनंद लेना, चंद पल को बच्चों के बीच जाकर बचपन को याद कर लेने में शर्म क्यों? हम तो आज भी अपनी प्रस्थिति, पद, नाम, काम को घर पर सुरक्षित रखकर मौका देखकर बच्चों के साथ बचपन गुजार लेते हैं. आज हमारे शहर में बारिश हुई. लम्बे इंतजार के बाद जमकर हुई. कॉलेज में इसी कारण देर तक रुके रहे कि शायद वहीं शुरू हो जाये तो लौटते में भीगा जाए मगर मन की ये मुराद पूरी न हो सकी. घर आते ही बादलों ने बरसना शुरू किया तो हमने भी उनका पीछा किया. बिटिया रानी संग निकल पड़े अपना स्कूटर लेकर. खूब जीभर कर भीगे. शहर भर का चक्कर लगाते हुए बारिश का भरपूर आनंद उठाया. आप भी कोशिश करिए, जबरन ओढ़ी हुई गंभीरता से बचने की, अनावश्यक ओढ़े गए बुद्धिजीवी वाले आवरण से बाहर निकलने की. एक बार बचपन में जाकर देखिये आनंद तो आएगा, आपकी समस्याओं का हल भी यहीं से मिलेगा.

28 सितंबर 2017

छाता लगाकर बस में यात्रा

रोडवेज बस से कालपी अपने चाचा-चाची के पास जाना हो रहा था. बरसात का मौसम था. तब पानी भी आज के जैसे छिटपुट नहीं बल्कि खूब जमकर बरसता था. इधर बस ने उरई छोड़ा ही है कि बादलों ने अपनी छटा बिखेरी. खूब झमाझम पानी. बस की खिड़कियाँ बंद कर दी गईं.

तेज बारिश के चलते कुछ बूँदें अन्दर घुस आने में सफल हो जा रही थीं. उनके चलते अपनी तरह का ही आनंद आ रहा था. तभी ये आनंद ऊपर से आता मालूम हुआ. ऊपर देखा तो बस की छत से एक-दो बूँद पानी टपक रहा है.

कुछ देर तक तो टपकती बूंदों में बड़ा अच्छा लगा मगर कुछ देर में उनके गिरने की गति बढ़ गई. हम और हमारा छोटा भाई, उस समय चार-पांच साल वाली अवस्था में होंगे, उन टपकती बूंदों से भीगने लगे तो हमको वहाँ से उठाकर दूसरी सीट पर बिठा दिया गया. कुछ देर में वहां से भी पानी गिरने लगा.

बाहर पानी लगातार तेज होता जा रहा था. बस की जंग लगी छत में पानी का भरना बराबर हो रहा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि जगह-जगह से पानी बुरी तरह से अन्दर टपकने लगा. कुछ लोग जो इस मौसम की मार को समझते थे वे अपने साथ छाता लेकर चल रहे थे. आनन-फानन उन दो-चार लोगों ने अपने-अपने छाते खोल कर बस के बच्चों को भीगने से बचाया.

आज भी खूब तेज बारिश होने पर या फिर बारिश के समय होने वाली यात्रा में वो छाता लगाकर की गई बस-यात्रा जरूर याद आ जाती है.