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13 अगस्त 2023

सम्मान बचा रहे वीर-वीरांगनाओं का

राष्ट्रीय पर्व हमेशा से जन-जन में राष्ट्रभक्ति का उफान लाते रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, नागरिकों का जोश, उत्साह, उमंग देखने लायक होता है. देशभक्ति के रंग में सराबोर होकर उनके द्वारा अपने आसपास के वातावरण को भी देशभक्तिमय बनाने का प्रयास होता है. इसमें भी तिरंगा सबसे ऊँचे स्थान पर विराजमान होता है. इसके प्रति सम्मान प्रदर्शित करने में आम आदमी किसी भी तरह की कंजूसी नहीं करता है, किसी भी तरह का संकोच नहीं करता है. खुद को, अपने घर को, कार्यालय को, वाहन को या कोई भी सामान को वह तिरंगे में रँगे देखना चाहता है. रंगीन झालरों से, कपड़ों से, रंगों से वह अपने आसपास का वातावरण तिरंगा जैसा बना देता है. 




इस तरह के प्रदर्शन में प्रशासन भी पीछे नहीं रहता है. उसके स्तर पर जहाँ भी, जैसे भी होता है माहौल को देशभक्ति से भरपूर करने के प्रयास किये जाते हैं. शहर भर को तीन रंगों में सजाने का अभियान सा चल पड़ता है. चौराहों को, सरकारी भवनों को, कार्यालयों को, सड़कों पर लगे बिजली के खम्बों को, जगह-जगह लगी लाइट को उसके द्वारा तीन रंग में चमकाने के कदम उठाये जाने लगते हैं. देशभक्ति के इस जोश में अक्सर कुछ बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. तिरंगे के प्रति सम्मान, देशभक्ति का जूनून इस कदर हावी होता है कि छोटी-मोटी गलती को न देखा जाता है और न ही उस पर ध्यान दिया जाता है. 




उरई शहर के एक चौराहे को, जहाँ कि रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा लगी हुई है, प्रशासन द्वारा तीन रंगों में सजाने का काम किया गया. सम्बंधित कार्यालय के कर्मी दत्तचित्त होकर चौराहे को सजाने में लगे रहे. तीन रंग के कपड़ों से चौराहे को सजाया गया, इसके अलावा बिजली वाली झालर को भी तीन रंग में संयोजित करके रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा को चमकाने-सजाने का काम किया गया. एक तरफ काम पूरा करने का दबाव और दूसरी तरफ देशभक्ति का जोश, कर्मचारियों ने इसका ध्यान ही नहीं दिया कि बिजली की जिन तीन रंगों की झालरों से रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा को सजाने का काम किया जा रहा, उन झालरों को उनके हाथ का सहारा देकर ही चारों तरफ फैलाया गया है.




निश्चित ही किसी भी कर्मचारी द्वारा ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया होगा मगर उनको कम से कम इसका ध्यान रखना चाहिए था कि देशभक्ति के जोश में जिन वीर-वीरांगनाओं के नाम की जय-जयकार की जा रही है, उनके प्रति तो सम्मान बनाये रखा जाये. बिजली की उन झालरों को फ़ैलाने के लिए रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के हाथ का सहारा लेने के स्थान पर उसके आसपास कोई खम्बा अथवा कोई सहारा लगा दिया जाता. 


(चित्र लेखक द्वारा स्वयं निकाले गए हैं. @13-08-2023)



 

20 मार्च 2022

वे क्षण, वो स्नेह, वो अपनापन हमारी धरोहर है

मित्रों के घर आना-जाना तो सभी का लगा ही रहता है. सामान्य तौर पर जाना भी होता है और किसी विशेष अवसर पर भी जाना पड़ता है. एक ऐसा ही विशेष अवसर आया हमारी मित्र के गृह प्रवेश का. मित्रता बहुत पुरानी, अनौपचारिक और पारिवारिक है, सो जाना अनिवार्य जैसा ही था. जाना हुआ भी उसके घर. उसके परिजनों में बहुत सारे लोग ऐसे थे जिनसे मुलाकात नहीं थी मगर सभी के नामों से (कारनामों से भी) जबरदस्त परिचय था. वैसे सोशल मीडिया के कारण उन सभी पारिवारिक सदस्यों के चेहरों से भी परिचय था, बस आमने-सामने की मुलाकात नहीं थी.


फिलहाल, नियत समय पर मित्र के घर जाना हुआ. दिल-दिमाग में एक विचार बहुत बार आया कि वहाँ सबसे मिलना होगा, जिन लोगों से पहली बार मिलना होगा उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? खुद हमारा अपना व्यवहार, उनसे मिलने का अंदाज उनके प्रति कैसा होगा? उन लोगों की तरफ से मुलाकात कितनी औपचारिक, कितनी अनौपचारिक रहेगी? खैर, इस तरह के सवाल सामने आते और हम अपने स्वभाव के चलते उनको हवा में उड़ा देते क्योंकि विगत वर्षों की दोस्ती का जो अंदाज बना हुआ है उसके कारण यह तो खुद पर भरोसा था कि मुलाकात, परिचय महज औपचारिक तो नहीं ही रहेगा.


जो समय हमने स्वयं में विचार कर रखा था, उससे कुछ देरी से ही घर पहुँचना हुआ. इस देरी का बहुत बड़ा कारण गाड़ी के मिलने में होने वाली समस्या रही. होली का त्यौहार होने के कारण गाड़ियाँ सहज रूप में उपलब्ध नहीं थीं. भले ही कुछ देरी से मित्र के घर पहुँचना रहा हो मगर द्वार पर पहुँचते ही लगा नहीं कि ऐसे लोगों के सामने आकर खड़े हो गए हैं, जिनसे पहली बार मुलाकात हो रही है, पहली बार बातचीत हो रही है. स्वागत की करो तैयारी, आ रहे हैं भगवाधारी की हमारी तर्ज़ पर ही हमारा स्वागत किया गया.


उसे वैसे स्वागत क्या ही कहेंगे, वो स्वागत से बहुत-बहुत ज्यादा ही कुछ था. अपनत्व, स्नेह, प्रेम, अनौपचारिकता, सम्मान, पारिवारिकता से भरपूर दरवाजे का वो अद्भुत नजारा सामने आया जैसा कि सोचा भी न था. ऐसा महसूस हुआ जैसे सभी लोग बस हमारा ही इंतजार कर रहे थे. खिलंदड अंदाज में कोई अपनी बात कह रहा था, कोई कैमरे वाले को बुलाने में लगा था, कोई फूलों की बारिश करने में, कोई गलबहियाँ करने में. और जब ऐसी स्थिति बने कि कार से उतरते ही अपेक्षा से कहीं बहुत अधिक और मनपसंद स्थिति मिल जाये तो फिर न पैर जमीन पर टिके होते हैं और न दिमाग अपने ठिकाने पर होता है. ऐसा स्वागत तो विश्वस्तर पर भी किसी VVVVIP का भी नहीं हुआ होगा या कहें कि उसने कल्पना भी नहीं की होगी.


ऐसा तब होना और भी आश्चर्यचकित करता है, मंत्रमुग्ध करता है जबकि मित्र के परिजनों से केवल खुद का नाम ही परिचित हो, सोशल मीडिया एक माध्यम रहा हो. निस्संदेह अद्भुत, अप्रतिम, स्नेह-अपनत्व-अनौपचारिकता से भरे क्षण थे वे. उन चंद पलों में न केवल हम ही वरन गृह प्रवेश के अवसर पर आये बहुत सारे लोग भी आश्चर्यचकित थे. उसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों से व्यक्तिगत मुलाक़ात करवाना, बातचीत का हास्य-बोध भरा माहौल, नितांत अनौपचारिक वातावरण में एकदम पारिवारिक सा अनुभव हो रहा था. यह व्यक्तिगत प्रसन्नता ही होती जबकि आपका पारिवारिक दायरा और अधिक विस्तार ले लेता है. इसे हम सहज रूप में महसूस कर सकते हैं.


वे चंद पल ज़िन्दगी भर के लिए अपना ऋणी बनाने के लिए पर्याप्त हैं. अब वे क्षण, वो स्नेह, वो अपनापन हमारी धरोहर है.





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04 सितंबर 2021

घर की मुर्गी को मुर्गी ही समझा गया


 

कल शिक्षक दिवस है. इस अवसर पर सरकारी, गैर-सरकारी आयोजन होते हैं, शिक्षकों को सम्मानित करने के. इस वर्ष स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. ऐसे में जानकारी हुई थी कि उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में 75 शिक्षकों का (महाविद्यालय स्तर पर) सम्मान किया जाना है. 


इस बारे में रात को आधिकारिक सूचना भी प्राप्त हो गई. अपने महाविद्यालय से सम्मानित होते कई शिक्षकों के बीच हमारा भी नाम चमक रहा है. अच्छा लगा अपने लोगों के बीच सम्मानित होने में. यद्यपि सम्मान समारोह कल होना है मगर ख़ुशी अभी से है. ख़ुशी इसलिए भी हो रही है कि भले ही ये शासन-प्रशासन का कार्यक्रम हो मगर 'घर की मुर्गी दाल बराबर' वाली बात को थोड़ा किनारे कर दिया गया है. सरकारी नीति के तहत ही सही, सभी जनपदों में ही सही 'घर की मुर्गी को मुर्गी ही' समझा गया है.


सभी को बधाई, शुभकामना. सभी शिक्षकों को, गुरुजनों को शिक्षक दिवस की शुभकामनायें.

08 मार्च 2021

सामाजिक क्षेत्र में भी पाए जाते हैं पिस्सू

अपने जीवन का बहुत लम्बा समय सामाजिक क्षेत्र में व्यतीत करने के कारण बहुत से व्यावहारिक अनुभवों को करीब से देखने का अवसर मिला है. इन अनुभवों में कुछ अनुभव बहुत सुखद रहे तो कुछ अनुभव तो अत्यंत दुखद रहे. सामाजिक क्षेत्र में बहुत से ऐसे लोगों से परिचय हुआ जो निस्वार्थ भाव से काम करने में विश्वास करते हैं. इसके उलट बहुत से ऐसे लोगों से भी सामना हुआ जिनके लिए सामाजिकता का अर्थ महज मंच, माइक और सम्मान प्राप्त कर लेना रहा है. सामाजिक क्षेत्र में समय के गुजरते रहने के साथ-साथ ऐसे अनुभवों का खजाना हमारे पास बढ़ता ही रहा है. यही कारण है कि बहुत बार सामाजिक क्षेत्र में खुद को सामने लाने की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन होता जा रहा है. जोड़-तोड़ करके मंच हासिल करना, सम्मान प्राप्त करना और ऐसा न हो पाने की दशा में कलह मचा देना, आयोजकों के चरित्र तक पर उँगली उठा देना ऐसे लोगों का सामान्य स्वभाव रहा है.


अपनी सामान्य शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यापक असफलता (आखिर जहाँ चाहते थे, वहाँ चयनित न हो सके) के बाद जब सामाजिक क्षेत्र में कदम रखा तो दिमाग में यही ख्याल था कि इस क्षेत्र में लोग सेवा की भावना से आते होंगे. इस क्षेत्र में जो लोग भी सक्रिय हैं वे निस्वार्थ भाव से अपना समय देते होंगे. आरंभिक अनुभव ही इतने कड़वे निकले कि उन्हीं दिनों में सामाजिक सेवा से दूर होने का मन बना लिया था. कार्यक्रम आरम्भ होने के पहले ही हमें तथाकथित सामाजिक लोगों द्वारा निर्देशित किया जाता कि उनको फलां के पहले बोलने को बुलाया जाये. उनको सम्मान दिया जाये तो फलां के पहले. ऐसे लोगों की कोशिश यह भी रहती कि दूसरे को सम्मान मिलने ही न पाए.




बहरहाल समय ने बहुत कुछ सिखाया और बहुत जल्दी अच्छे-बुरे की पहचान करके खुद को ऐसे जंजालों से दूर कर लेते हैं. सामाजिक क्षेत्र में बीस वर्ष से अधिक समय गुजर गया है, इसके बाद भी स्थिति अभी भी वहीं की वहीं दिखाई दे रही है. ऐसे लोग आज भी मंच के लिए, मंच की कुर्सियों पर बैठने के लिए, सम्मान, पुरस्कार जबरिया माँग कर हड़पने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्थानीय स्तर पर नाम होने के बाद भी ऐसे लोग अपने उपद्रवी स्वभाव, जबरन कब्ज़ा करने की मानसिकता के चलते एकाधिक बार बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये मंचासीन होते देखे गए हैं. बहुत बार सम्मान, पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ करते, डराते-धमकाते भी देखे गए हैं. यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं बल्कि स्वयं अनुभव की हुई, स्वयं देखी गई स्थिति है. यह समझ से परे है कि आखिर मंच की तृष्णा क्यों? आखिर हर मंच से सम्मान पाने की लालसा क्यों? आखिर बिना काम किये खुद को प्रतिस्थापित करने की कुंठित मनोभावना क्यों? आखिर सम्मान न मिलने पर, मंचासीन न किये जाने पर आयोजक के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित सोच क्यों?


जहाँ तक हमारा अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र भी किसी वृक्ष की तरह है, जहाँ पुराने पत्तों को डाली से स्थान छोड़ना होगा और नए पत्तों के खिलने को जगह देनी होगी. हमारा अपना अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र किसी परिपक्वता की माँग करता है जहाँ आपको अपनी जगह स्वयं बनानी पड़ती है. अतीत के अपने कुछ कामों, अपने नाम, मीडिया में अपने परिचय, परिवार के रसूख के बल पर आखिर कब तक नए लोगों से प्रतिस्पर्द्धा की जाती रहेगी? मंच पर जगह, लोगों के दिलों में सम्मान स्वतः पैदा होता है. किसी हनक के चलते, अपने उपद्रवी स्वभाव के चलते, कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने की मानसिकता रखने के चलते सिर्फ बदनामी ही पायी जा सकती है. 


संभव है कि ऐसे लोगों के स्वभाव के चलते आयोजक ऐसे लोगों को मंच प्रदान कर दे, माइक दे दे, सम्मान भी प्रदान कर दे मगर ऐसे लोग समाज में, नागरिकों में, प्रशासन में, मीडिया में स्थायी रूप से जगह नहीं बना पाते हैं. क्षणिक प्रतिष्ठा की चाह में, क्षणिक प्रचार की चाह में ऐसे लोग सिर्फ बदनामी ही पाते हैं. बिना किसी श्रम के, बिना किसी उल्लेखनीय कार्य के मंच, माइक, मंचासीन होने, सम्मान पाने की लालसा ऐसे लोगों के कमजोर व्यक्तित्व का ही परिचायक होता है. देखा जाये तो ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तित्व नहीं बल्कि पिस्सू होते हैं जो सामाजिक क्षेत्र में उभरते हुए वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वों का लहू पी रहे होते हैं.



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वंदेमातरम्

26 सितंबर 2020

एक-दूसरे की अपेक्षाओं का सम्मान करें

अपेक्षाओं का अंत लगातार होती उपेक्षाओं के कारण हो जाता है. ये बहुत आवश्यक है आज के दौर में कि हम सभी एक-दूसरे की अपेक्षाओं को पूरा करते रहे, एक-दूसरे की अपेक्षाओं का सम्मान करते रहें. जैसी स्थितियाँ लगातार निर्मित हो रही हैं उनमें अब एक-दूसरे का सम्मान, एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता अधिक पड़ने वाली है. इसलिए बजाय एक-दूसरे के साथ उपेक्षा का भाव दिखाए सबको एकसमान रूप में सम्मान देते हुए उनकी अपेक्षाओं को समझें और पूरा करने का प्रयास करें. 

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29 अगस्त 2020

दद्दा की हॉकी और उनका जादू

आज पूरा देश राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा है. आज का दिन हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद जी के जन्मदिन पर उनके सम्मान में मनाया जाता है. उनका जन्म 29 अगस्त सन्‌ 1905 ई. को इलाहाबाद में हुआ था. उनको हॉकी का खेल विरासत में नहीं मिला था बल्कि अपनी सतत साधनाअभ्यासलगनसंघर्ष और संकल्प के सहारे उन्होंने यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी. आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे महज 16 वर्ष की अवस्था में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भरती हो गए. उनको हॉकी के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है, जिनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और एक दिन दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए. हॉकी में उत्कृष्ट खेल के कारण सेना में उनकी पदोन्नति होती गई. सिपाही से भर्ती होने वाले ध्यानचंद लांस नायक, नायक, सूबेदार, लेफ्टिनेंट, सूबेदार बनते हुए अंत में मेजर बने. यहाँ एक रोचक बात ये है कि उनका मूल नाम ध्यानसिंह था किन्तु उनके रात में चाँद की रौशनी में हॉकी का अभ्यास करने के कारण उनके मित्र उनको चाँद उपनाम से पुकारने लगे. यहीं से उनका नाम ध्यानचंद पड़ गया. इसके साथ-साथ लोग प्यार से उनको दद्दा कहकर भी बुलाते थे.


उनका हॉकी स्टिक और गेंद पर इस कदर नियंत्रण था कि अकसर प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं. हॉलैंड में तो चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी भी गई थी. हॉकी खेलने की उनकी कलाकारी से मोहित होकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश भी की थी किन्तु ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही अपना गौरव समझा. मेजर ध्यानचंद ने अंतर्राष्ट्रीय मैचों सहित अन्य मैचों को मिलाकर 1000 से अधिक गोल किए. 

उनकी बेहतरीन हॉकी कला के कारण भारतीय टीम ने तीन ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीते. सन 1928 में एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय टीम ने भाग लिया. यहाँ भारतीय टीम सभी मुकाबले जीत हॉकी की चैंपियन बनी. सन 1932 में लास एंजिल्स में हुई ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में ध्यानचंद ने 262 में से 101 गोल किए. निर्णायक मैच में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हरा कर स्वर्ण जीता. इसके बाद सन 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में मेजर ध्यानचंद भारतीय टीम के कप्तान बने. फाइनल में भारतीय टीम ने जर्मन टीम को 8-1 से हरा कर स्वर्ण जीता. द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद उन्होंने अप्रैल 1949 ई. को हॉकी से संन्यास ले लिया था. इसके बाद उन्होंने नवयुवकों को गुरु-मंत्र सिखाने शुरू कर दिए और लम्बे समय तक राष्ट्रीय खेलकूद संस्थान (पटियाला) में भारतीय टीमों को प्रशिक्षित करते रहे.




हॉकी के जादूगर और सबके लोकप्रिय दद्दा को सन 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. सन 1980 में मरणोपरांत उनके सम्मान में भारत सरकार ने डाक टिकट का प्रकाशन करवाया. 3 दिसंबर 1979 को दिल्ली में उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार झाँसी में किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया जहाँ वो हॉकी खेला करते थे. 

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20 मई 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया.

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्र, सम्मान-पत्र, सम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाम, माता-पिता का नाम, जन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है), पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँ, किसी को यदि कोई विशेष उपाधि, सम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.

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29 जनवरी 2020

शहीदों का सम्मान बचाये रहना भी है श्रद्धांजलि


गणतंत्र दिवस हो या फिर स्वतंत्रता दिवस, इन राष्ट्रीय पर्वों पर दिल-दिमाग पर एक अजब तरह की खुमारी चढ़ी रहती है. ऐसे माहौल में, जबकि देह का रोम-रोम देशभक्ति के एहसास में डूबा रहता है किसी भी देशभक्त के प्रति अनादर जैसी स्थिति देख मन विचलित हो जाता है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी उस समय हुआ जबकि अपनी नियमित संध्या घुमक्कड़ी में बाजार में टहलना हो रहा था. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शहर को तिरंगे से सजाया जा रहा था. कहीं कपड़ों के द्वारा सजावट हो रही थी तो कहीं गुब्बारों के द्वारा तो कहीं बिजली की झालरें तीन रंग बिखेरने में लगी थीं. आज़ादी के मतवालों को याद करते हुए, मन ही मन में देशभक्ति के तराने गुनगुनाते हुए जैसे ही रानी लक्ष्मीबाई चौराहे के नजदीक पहुँचना हुआ तो दिमाग एकदम से झनझना उठा.


रानी लक्ष्मीबाई की मूर्ति जी घेरे के भीतर लगी हुई थी, उसे तिरंगे कपड़ों से सजाया गया था. चारों तरफ से झालरनुमा सजावट करने के प्रयास में तिरंगे कपड़ों को रानी लक्ष्मीबाई के बांये हाथ पर आकर तमाम कपड़े बाँध दिए गए थे. अपनी कतिपय शारीरिक दिक्कतों के चलते वहाँ तक पहुँच कर उन गाँठों को खोल पाना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था. उरई नगर पालिका परिषद् की ओर से ये सजावट करवाई जा रही थी. रात के लगभग नौ बजने को आये थे. कुछ जिम्मेवार लोगों को फोन करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए कहा कि आवश्यक नहीं कि इन क्रांतिकारियों की तरह कोई क्रांति ही करो मगर कम से कम इनका सम्मान तो करते रहो. गुस्सा इसलिए भी था क्योंकि कुछ दिनों पहले ऐसे ही एक सजावट के क्रम में रानी झाँसी के घोड़े की पूँछ को किसी खूंटे की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था, अबकी ऐसा बर्ताव रानी झाँसी के हाथ के साथ किया गया.


फिलहाल, कुछ फोन, सोशल मीडिया पर फोटो के लगाने और थोड़ी सी भागदौड़ के बाद उस विचित्र सी स्थिति को सुधार दिया गया. आज़ादी के लिए अपनी जान की परवाह न करने वाले इन शहीदों का सम्मान बचा रहे,यही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.



02 अक्टूबर 2019

दरकना एक और पारिवारिक आधार-स्तम्भ का


परिवार में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने आपमें एक आधार स्तम्भ होते हैं. उनके न कहने के बाद भी वे किसी न किसी रूप में परिवार को एकसूत्र में जोड़े रखने का काम करते हैं. परिवार की मान-मर्यादा को, उसकी प्रतिष्ठा को, उसके वर्चस्व को ऐसे ही लोगों के द्वारा स्वतः ही स्थापना मिलती रहती है. ऐसी स्थिति में जबकि परिवार का नाम क्षेत्र में हो, क्षेत्र के आसपास भी हो, उसके पुरखों का अपना रसूख, अपनी इज्जत, उनका नाम स्थापित हो तब ऐसे लोगों द्वारा स्वतः ही उस मान-सम्मान में, प्रतिष्ठा में वृद्धि की जाती रहती है. परिवार की पहचान का ये सदस्य आधार बनते हैं. दसियों लोगों के होने के बाद भी ऐसे सदस्य परिवार की पहचान बनते हैं. हमारा परिवार भी अपने क्षेत्र में दशकों से अपनी एक छाप बनाये हुए है. इसमें परिवार की एकजुटता भी बहुत मायने रखती है. कई-कई पीढ़ियों के बाद भी यदि परिवार का सम्मान, प्रतिष्ठा बनी हुई है तो उसके पीछे हम सब सदस्यों का एकजुट होना है. 

समय के साथ प्रकृति का नियम परिवार पर भी लागू होता रहा. बुजुर्ग परिजन अपने संस्कार, अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करते रहे और स्वयं अनंत यात्रा को जाते रहे. बुजुर्गों का चले जाना परिवार में एक खालीपन लाता रहा मगर उस खालीपन को किसी न किसी सदस्य द्वारा स्वतः ही भरा जाता रहा. इसके लिए परिवार की तरफ से कभी कोई प्रयास भी नहीं किये गए. कभी किसी तरह का समर्थन न व्यक्त किया गया, न कभी विरोध जैसी स्थिति दिखाई दी. विरासतन एक परिपाटी परिवार में चलती चली आई और उसका पालन भी होता रहा. बहुत अच्छे से याद है कि गाँव के सैकड़ों किमी दूर भी अपने बाबा के बजाय अपने बड़े बाबा (हमारे बाबा के बड़े भाई) के नाम से अपना परिचय हम देते रहे हैं. ग्वालियर में पढ़ने के दौरान अनेक अवसर ऐसे आये जबकि वहाँ और वहाँ के आसपास के क्षेत्रों में हमारा परिचय बड़े बाबा के नाम पर स्थापित हुआ.

बाबा लोगों के गुजर जाने के बाद ऐसी स्थिति हमारे सामने आई कि हमें अपना परिचय देना पड़ा तो ताऊजी और पिताजी का नाम ही सहारा बना. गाँव में किसी भी तरह की छुटपुट विवाद की स्थिति में ताऊजी और पिताजी के नाम ने उन विवादों को स्वतः ही हल कर दिया. कालांतर में परिवार ताऊजी और पिताजी से विहीन हुआ. उस समय भी लगा कि अब गाँव में परिवार की स्थिति को, उसकी मान-मर्यादा को किसके नाम पर स्थापना मिलेगी? जैसा कि अभी तक होता आया था, अबकी भी ऐसा हुआ. स्वतः ही हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े भाई हेमंत भाईसाहब अपने आप नेतृत्व करते दिखे. न परिवार में किसी तरह का विवाद हुआ, न कोई मीटिंग हुई, न किसी तरह की पंचायत. कालचक्र चलता हुआ जैसे अपने आप ही हेमन्त भाईसाहब (मुन्ना भाईसाहब) के सामने खड़ा हो गया. गाँव और उसके आसपास की स्थितियों में हेमन्त भाईसाहब पारिवारिक मर्यादा के साथ सबके बीच मौजूद रहने लगे. घर, जमीन, खेती सहित अनेक स्थितियां जैसे भाईसाहब के नाम से ही अपने आप सहज रूप में स्वीकार होने लगीं. निश्चिंतता रहती कि भाईसाहब हैं इसलिए किसी तरह का विवाद न तो गाँव में होगा और न ही आसपास क्षेत्र में. ऐसा होता भी, उनके नाम से ही बहुत सी समस्याएं अपने आप समाधान की तरफ मुड़ जातीं.

कालचक्र का घूमना जारी था. पीढ़ियों से चलता हुआ वह अपने साथ अबकी रुका तो हमारे मुन्ना भाईसाहब को अपने साथ ले जाने के लिए. प्रकृति के नियम का पालन सबको करना ही होता है, हमारे भाईसाहब भी उससे बंधे हुए थे. बिना किसी से कुछ कहे, बिना अपनी जिम्मेवारी को किसी को हस्तांतरित किये ख़ामोशी से काल के साथ अनंत यात्रा को निकल गए. परिवार के बुजुर्गों के साथ अपने को शामिल कर गए. एक सूनापन परिवार में समझ आ रहा है. परिवार की आन-बान-शान की जिम्मेवारी अब किसके सिर पर आएगी? अब कालचक्र स्वतः किसका चयन करेगा परिवार के नाम को आगे बढ़ाने के लिए. परिवार की सदियों पुरानी मान-मर्यादा का सञ्चालन, उसका निर्वहन अब किसके द्वारा किया जायेगा, किसके नाम के द्वारा किया जायेगा यह भविष्य के गर्भ में है. फ़िलहाल एक सूनेपन के साथ समूचा परिवार आँखों में नमी लेकर ख़ामोशी से बैठा है.

सादर नमन, श्रद्धांजलि मुन्ना (हेमन्त) भाईसाहब को.

18 अप्रैल 2019

कुछ पल परिवार के बुजुर्गों के लिए भी


वैश्विक समुदाय के साथ कदमताल करने के प्रयास में लगभग सारा समाज पूरे जीजान से जुटा हुआ है. पश्चिमी सभ्यता के सुर-लय को पकड़ने की कोशिशों में हमने पहनावा, रहन-सहन, शालीनता, संस्कृति, भाषा, रिश्तों, मर्यादा आदि तक को दरकिनार करने से परहेज नहीं किया जा रहा है. पश्चिम से हमारे समाज ने कुछ सीखा हो या न सीखा हो मगर उसने संबंधों का खुलापन अवश्य सीखा है. सिर्फ सीखा ही नहीं है वरन उसे आत्मसात भी कर लिया है. यही कारण है कि आज विपरीतलिंगियों के छोटे-बड़े झुण्ड सडकों पर तैरते दिखाई देते हैं. दिन हो या फिर रात, सुबह का समय ही या शाम का, कॉलेज का पूरी गर्मजोशी से हमने हाथों में पट्टा बाँध, गलबहियाँ करते हुए, बाइक को फर्राटा बनाकर, कुछ तरल पदार्थ गले के नीचे उतार इस विशेष डे को और भी विशेष बना दिया. आपस में चहकते, मटकते, तेज़-तेज़ आवाज़ में अजीब-अजीब सी ध्वनियाँ निकालते, बेतरतीब वस्त्रों के साथ खुद को आधुनिक सा सजाते हुए विपरीतलिंगियों में दोस्ती, दोस्ती में प्यार और प्यार में भी प्यार से आगे का बहुत कुछ खोजते तमाम झुण्ड आयोजन की सफलता की कहानी लिखने में लगे होंगे. इसी सफल-असफल सी कहानी के साये में बहुत कुछ बिखरता सा दिखता है, बहुत कुछ छीजता सा दिखता है.


विदेशी आयोजनों की भव्यता के बीच हमारे परिवार की दिव्यता कहीं बिखरती सी दिखती है. युवाओं की जोशपूर्ण मस्ती के बीच परिवार के, समाज के बुजुर्गों की हस्ती सिमटती सी लगती है. निर्द्वन्द्व, स्वच्छंद भटकते झुण्ड के बीच बुजुर्गों का एकाकीपन पिसता सा लगता है. ये आयोजन भले ही एक दिन का हो पर आज की पीढ़ी अपना हर दिन, हर पल सिर्फ और सिर्फ मौज में जीना चाहती है. मस्ती में सराबोर होने के तरीके खोजती हुई अपने आपको सिर्फ और सिर्फ अपने में केन्द्रित कर लेना चाहती है. उसके लिए अपने अस्तित्व और अपनी दोस्ती के अलावा कुछ और मायने नहीं रखता है. ये और बात है कि आज के तीव्रगति से भागते समय में अधिकांश दोस्ती भरे रिश्ते कब बनते हैं और कब बिखर जाते हैं, ये खुद इन दोस्तों को ही पता नहीं चलता. ऐसे भटकन भरे दौर में कम से कम कुछ समय हमारे युवा अपने उन बुजुर्गों के लिए भी निकालें जो उनके साथ रहते हुए भी, उनके आसपास रहते हुए भी एकाकी जीवन गुजार रहे हैं. दोस्ती के मायने सिर्फ गुलछर्रे उड़ाना, पार्टियाँ करना, सडकों पर हुल्लड़ काटना, देह की परिभाषा तय करना ही नहीं है बल्कि एक एहसास को जन्म देना है, एक विश्वास को स्थापित करना है. 

एहसास और विश्वास की मर्यादा-पावनता को हम अपने परिवार के बुजुर्गों के बीच भी बाँटने का प्रयास करें. दोस्ती के नाम पर भले ही हमारी युवा पीढ़ी उनके साथ बाइक के स्टंट न कर सके, बीयर-वाइन के जाम न छलका सके, गलबहियाँ करते हुए मॉल-पब, डिस्कोथिक में मस्ती न कर सके पर ये सत्य है कि उन बुजुर्गों को ख़ुशी का बहुत बड़ा तोहफा दे सकती है. आधुनिकता के दौर में चाहे कुछ कितना भी बदल गया हो पर हमें विश्वास को नहीं बदलने देना है, एहसास को नहीं बदलने देना है, रिश्तों को नहीं बदलने देना है, मर्यादा को नहीं बदलने देना है, संस्कृति को नहीं बदलने देना है. दोस्ती के नाम पर मस्ती में चूर आज की पीढ़ी को इसका आभास कराये जाने की जरूरत है कि बुजुर्ग उनके लिए बोझ नहीं, उनकी रफ़्तार में अवरोध नहीं, उनकी मस्ती की बोरियत नहीं हैं. अपनी संस्कृति-सभ्यता से विरत हो रहे, परिवार को बंधन समझ रहे, ज़िम्मेवारियों से मुक्ति चाह रहे युवा वर्ग को समझाना ही होगा कि बुजुर्ग हमारा एहसास हैं, हमारा विश्वास हैं, हमारी संस्कृति हैं, हमारा परिवार हैं, हमारा अस्तित्व हैं. आइये कम से कम दोस्ती के नाम का एक दिन तो इनके नाम कर ही दें, बाकी दिन तो अपने हमउम्र दोस्तों के साथ मौज-मस्ती, सैर-सपाटा, गलबहियाँ करते हुए बिताना ही है.


28 फ़रवरी 2019

रमन प्रभाव से मनाया जाता राष्ट्रीय विज्ञान दिवस


आज, 28 फरवरी का दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दैनिक जीवन में वैज्ञानिक अनुप्रयोग के महत्व के संदेशों को लोगों के बीच फैलाना, मानव कल्याण के लिए विज्ञान के क्षेत्र की सभी गतिविधियों, प्रयासों और उपलब्धियों को प्रदर्शित करना है. इसके साथ-साथ विज्ञान के विकास के लिए चर्चा करके नई प्रौद्योगिकी को लागू करना भी इसका उद्देश्य है. इस दिवस को देश के प्रसिद्द भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर चंद्रशेखर वेंकटरमन रमन के सम्मान में सन 1986 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है. उन्होंने सन 1928 में कोलकाता में इसी दिन एक उत्कृष्ट खोज की थी, जिसे रमन प्रभाव के नाम से जाना जाता है. इस कार्य के लिए उनको 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.  


रमन प्रभाव में एकल तरंगदैर्ध्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें जब किसी पारदर्शक माध्यम ठोस, द्रव या गैस से गुजरती है, उस दौरान प्रकाश की तरंगदैर्ध्य में बदलाव दिखता है. इसका अर्थ यह है कि जब प्रकाश की एक तरंग एक द्रव्य से निकलती है तो इस प्रकाश तरंग का कुछ भाग एक ऐसी दिशा में प्रकीर्ण हो जाता है जो कि आने वाली प्रकाश तरंग की दिशा से भिन्न है. छितराई किरणों का अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कमजोर तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं. इन्हीं किरणों को रमन-किरण भी कहते हैं.

विज्ञान के क्षेत्र में आज रमन किरणों अथवा रमन प्रभाव का ही प्रयोग किया जाता है. जहां भी सैंपल को बिना क्षति पहुंचाए, द्रुतगति से पदार्थ विशेष के कुछ कण पहचान कर निष्कर्ष निकाले जा सकते हों, वहां रमन प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी तकनीक प्रदान करता है. रमन प्रभाव का वर्तमान में मुख्य रूप से निम्न प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाता है.
औषधियों, पेट्रोकेमिकलों और प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण प्रक्रमों के अध्ययन, मॉनीटरन और गुणवत्ता निर्धारण में.
अपराध विज्ञान में पैकेट्स या बक्सों को बिना खोले उनके अन्दर विद्यमान विशिष्ट पदार्थों (जैसे मादक पदार्थों) के संसूचन (डिटेक्शन) में.
पेंट उद्योग में जैसे-जैसे पेंट सूखता है तो उसमें क्या रसायनिक अभिक्रियाएं होती हैं, इसका अध्ययन करने में.
हानिकारक अथवा रेडियोएक्टिव पदार्थों का सुरक्षित दूरी से अध्ययन करने में.
प्रकाश रसायनज्ञ और प्रकाश-जीववैज्ञानिक 1011 तक औसत आयु के क्षणजीवी रसायनों तक के स्पेक्ट्रम प्राप्त करने में. 
भूगर्भशास्त्र और खनिज-वैज्ञानिक रत्नों और खनिजों की पहचान तथा विभिन्न दशाओं में खनिज-व्यवहार आदि का अध्ययन करने के लिए. 
कार्बन नैनोट्यूबों एवं हीरों की गुणवत्ता और गुणों के अध्ययन के लिए.
जीवन-अध्ययनों जैसे डीएनए/आरएनए विश्लेषण में, रोग निदान, एकल सेल विश्लेषण आदि में.

13 दिसंबर 2018

सम्मान-पुरस्कार की स्वार्थ लोलुपता


सम्मान-पुरस्कार की लालसा आखिर किस स्थिति तक लोगों को गिरा सकती है, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है. समाज में बहुतेरे लोग ऐसे हैं जिनका नाम उनको मिलने वाले किसी भी सम्मान-पुरस्कार से कहीं बड़ा होता है या कहें कि बड़ा हो चुका है, इसके बाद भी वे लोग लगातार किसी न किसी सम्मान-पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ में संलिप्त हो जाते हैं. ऐसे लोग जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त सम्मान मिल चुका हो, ऐसा व्यक्ति जो राष्ट्रीय स्तर के संगठन का अध्यक्ष रह चुका हो, ऐसा व्यक्ति जो संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत कार्यक्रम में आमंत्रित-सम्मानित कर चुका हो, वह किसी जिले स्तर के कार्यक्रम में खुद को सम्मानित करवाने के लिए लगातार लालायित दिखाई दे तो यह उन नवोदितों के लिए शर्म का विषय है जो ऐसे व्यक्तियों को अपना आदर्श मानने लगे हों. असल में ऐसे लोगों को मालूम ही नहीं कि उनका इस तरह का कदम उनकी प्रस्थिति को बढ़ा नहीं रहा, उनके सम्मान में बढ़ोत्तरी नहीं कर रहा बल्कि उसमें गिरावट ही ला रहा है. इसके साथ-साथ उन नवोदितों के मन में भी उनके प्रति अनादर का भाव जगा रहा है जो उनको आदर्श मानते हुए जमीनी स्तर पर कार्य करने को तत्पर रहते हैं.


ये समझने वाली बात है कि प्रत्येक व्यक्ति का किसी भी जगह, स्थान के अनुसार एक विशेष कालखंड होता है, यदि वह उसके बाद भी उसी जगह, उसी स्थान पर बना हुआ है तो उसके सम्मान में कमी आने लगती है. इसका सीधा सा कारण है कि उसके बाद की पीढ़ी उसका अनुसरण करते हुए, उसको आदर्श मानते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर रही होती है. इसके साथ-साथ उस प्रसिद्द व्यक्ति की छवि कहीं न कहीं इसमें बाधक बनती है. इसके अलावा सम्बंधित जगह के लोगों में उस व्यक्ति के कार्यों, उसकी छवि को लेकर एक तरह की पूर्णता दिखाई देने लगती है. इससे भी उसकी छवि को धक्का सा लगता है. यहाँ ऐसे लोगों को अपनी राह छोड़कर आने वाले के लिए राह का निर्माण करना चाहिए. यदि सम्बंधित व्यक्ति ऐसा कर पाता है तभी वह सफल हो पाता है. अन्यथा की स्थिति में राष्ट्रीय स्तर के सम्मानों के साथ जिला-तहसील स्तर के सम्मान अवश्य ही गौरवान्वित महसूस कर रहे होते हैं मगर सम्मानित करने वाली संस्था और उस व्यक्ति को आदर्श मानने वाले लोग उसका मजाक बना रहे होते हैं.

07 दिसंबर 2018

सैनिकों के सम्मान में एक कदम


प्रतिवर्ष 7 दिसंबर को देश सशस्त्र सेना झंडा दिवस (Armed Forces Flag Day) मनाता है. इसके मनाये जाने की शुरुआत 7 दिसंबर 1949 से हुई थी. तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिमंडल की रक्षा समिति ने युद्ध दिग्गजों और उनके परिजनों के कल्याण के लिए सात दिसंबर को सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाने का फैसला लिया था. उसी के बाद से प्रतिवर्ष इस दिवस को सम्पूर्ण देश सम्मान सहित मनाता है. इस दिन देश के नागरिकों से सैन्यकर्मियों के लिए धन संग्रह किया जाता है. इस धन का उपयोग सैनिकों के परिवारों की भलाई के लिए किया जाता है. धन एकत्र करने के लिए इस दिन सशस्त्र सेना के प्रतीक चिन्ह झंडे को नागरिकों को प्रदान किया जाता है. इस झंडे में तीनों सेनाओं को प्रदर्शित करते हुए तीन रंग (लाल, गहरा नीला और हल्का नीला) होते हैं. यह एक स्टिकर के रूप में होता है. जिसे नागरिक एक राशि प्रदान करते हुए लेते हैं और शहीदों के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए इसे लगाते हैं.


सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर धन संग्रह के तीन मुख्य उद्देश्य हैं. पहला युद्ध के समय हुई जनहानि में सहयोग, दूसरा सेना में कार्यरत कर्मियों, उनके परिवार के कल्याण और सहयोग तथा तीसरा सेवानिवृत्त कर्मियों और उनके परिवार का कल्याण. इस दिन थल सेना, वायु सेना और नौसेना तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित करती है. कार्यक्रम से संग्रह किये गए धन को आर्म्ड फोर्सेज फ्लैग डे फंड में डाल दिया जाता है. सशस्त्र झंडा दिवस पर जांबाज सैनिकों व उनके परिजनों के प्रति नागरिक एकजुटता प्रदर्शित करने का दिन है, अत: प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वे इस दिन सैनिकों के सम्मान तथा उनके कल्याण में अपना योगदान दें.


23 मई 2018

सम्बन्ध और सम्मान दे गया ओरछा फिल्म समारोह

वीर बाँकुरों के बुन्देलखण्ड की पावन धरा ओरछा में पाँच दिवसीय भारतीय फिल्म समारोह 2018 ने सभी को अपनी-अपनी तरह से सम्मोहित किया है. पाँच दिनों के इस सांस्कृतिक समागम में कला थी, कलाकार थे, निर्देशन था, निर्देशक थे, रंगमंच था, फीचर फ़िल्में थीं, डाक्यूमेंट्री थी, शॉर्ट फ़िल्में थीं, तकनीक थी, संस्कृति थी, प्राचीनता थी, नवीनता थी, परम्पराएँ थीं, आधुनिकता थी. कुल मिलाकर कहा जाये कि सभी के लिए कुछ न कुछ था. फिल्म समारोह में आये कलाकरों ने अपनी-अपनी क्षमताओं, प्रतिभाओं के अनुसार प्रदर्शन किया और वहाँ उपस्थित रहे सभी लोगों ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उसका लाभ उठाया. मुंबई फिल्म जगत के नामचीन कलाकारों ने आकर बुन्देलखण्ड के कलाकारों की कला को तराशने का कार्य किया. हमारा व्यक्तिगत रूप से कभी रंगमंच से, नाटकों से, निर्देशन से सम्बन्ध रहा था मगर कतिपय कारणों से अब दर्शक की भूमिका के साथ-साथ फोटोग्राफर की और आलोचक की भूमिका का निर्वहन करते हैं. इन भूमिकाओं के बीच खुद को संबंधों के विस्तार के लिए भी सक्रिय रखते हैं. ऐसे कलात्मक आयोजनों में जहाँ एक तरफ कलाकारों से मुलाकात होती है, उनकी कला से परिचय मिलता है वहीं उन कलाकारों में छिपे इन्सान से भी परिचय हो जाता है.


भारतीय फिल्म समारोह ओरछा 2018 का आरम्भ पूर्ण सांस्कृतिकता के साथ हुआ. उसके बाद समारोह रोहिणी हट्टंगड़ी, रजत कपूर, केतन आनंद, नफ़ीसा अली, यशपाल शर्मा जैसी फ़िल्मी हस्तियों के आगमन से गुलज़ार हुआ. निर्देशक केतन आनंद जी से मुलाकात अचानक ही हुई जबकि मंचस्थ सुष्मिता मुखर्जी जी से मिलने हम और अनुज पहुँचे. उन्हीं के साथ खड़े केतन आनंद से बुन्देलखण्ड में हो रहे इस आयोजन के बारे में पूछ बैठे. उन्होंने अत्यंत सहज रूप में कई बातों का जिक्र किया. ख़ुशी जताई उन्होंने राजा बुन्देला जी के इस प्रयास पर. ये भी कहा कि यहाँ के कलाकारों में बहुत संभावनाएं हैं, ऐसे समारोह उनको तराशने, मंच देने का काम करेंगे.  

केतन आनंद 

इसके अलावा रमीज पठान जी से मिलना ख़ुशी का अवसर लेकर आया. कार्यक्रम की व्यस्तताओं के चलते समारोह स्थल पर उनसे मिलना ना हो सका था. कार्यक्रम के चौथे दिन की समाप्ति से कुछ पहले हमारा और अनुज (सपरिवार) का वहां से निकलना हुआ. रमीज जी हमारे साथ-साथ वहाँ से निकले निकले. इससे पहले श्रेया (अनुज की बेटी) द्वारा उनसे मुलाकात करके उनका ऑटोग्राफ लेने के साथ-साथ उनके साथ फोटो खिंचवाना भी हो चुका था. इस प्रक्रिया में कैमरे के कारण एक क्षणिक चेहरे वाली मुलाकात उनसे हो ही चुकी थी. रुद्राणी कलाग्राम से निकलने के बाद इत्तिफ़ाक़ रहा कि उनके होटल के ठीक पहले जहाँ हम लोग भोजन के लिए रुके वहां वे भी अपने साथियों सहित मिल गए. देखते ही अभिवादन हुआ और उन्होंने आगे बढ़कर अपने गले लगा लिया. लगभग एक घंटे तक उनके साथ अनौपचारिक बातचीत होती रही. अपनी लाइफ़ के बहुत से अनुभव शेयर किए. कुछ विशुद्ध गोपनीय बातें भी शेयर की. जिस गर्मजोशी और ज़िंदादिली से वे मिले उससे लगा नहीं कि वे सत्तर से अधिक बसंत देख चुके हैं. अनुज के गीत सुनने का उन्होंने वादा किया और सम्पर्क-सूत्र के आदान-प्रदान सहित मुंबई आने का न्यौता भी.

रमीज पठान 

रमीज़ जी से संभवतः इस कारण भी दिल के तार मिले होंगे क्योंकि उनकी तरह इधर भी लेखन का शौक पर्याप्त है. उनके अलावा बाकी कलाकारों से मिलना ही हुआ. एक बात विशेष है स्वभाव में कि कभी भी इक्का-दुक्का कलाकारों को छोड़कर कभी भी फ़िल्मी कलाकारों के प्रति पागलपन जैसा आकर्षण नहीं हुआ. न इस उम्र में न ही कॉलेज वाली अवस्था में. इस कारण भी उनके ऑटोग्राफ लेने, उनके साथ फोटो खिंचवाने की इच्छा भी वहां नहीं हुई. हाँ, एक नफीसा अली जी से मिलने की इच्छा थी, वो वहाँ पूरी हुई. उनसे मिलने का मन भी उनके अदाकारा होने के कारण नहीं वरन उनके सामाजिक कार्यों से जुड़े रहने के कारण हुआ था. इस मिलने-मिलाने के क्रम में भविष्य के कलाकारों से भी मिलना हुआ. कई परिचित लोगों से, कई मित्रों से मिलना हुआ. मिलने-जुलने के क्रम में सर्वाधिक ख़ुशी मिली कुछ उत्साही, युवा कलाकार साथियों से मिलकर.

मधुर 

मधुर, जो बाँसुरी बजाने में जितने योग्य हैं, उतने ही पेंटिंग बनाने में. ओरछा में मिलने से पहले उनसे कोई परिचय नहीं था, कभी मुलाकात भी नहीं थी. यहीं उनसे पहली बार मिलना हुआ. रुद्राणी कलाग्राम में टहलते हुए वो सामने से आता दिखा. मिलते ही उसने नमस्कार किया और पैर छू लिए. ऐसी स्थिति से हम अकबका से जाते हैं. लगता है कि सामने वाला हमें पहचान रहा है मगर हम ही पहचान नहीं पा रहे. यह स्थिति शर्म पैदा करती है. बिना शब्दों के सिर्फ आँखों के सहारे उसके हालचाल जानने चाहे तो उसने बताया कि नाटक 'तीसरा कम्बल' में वह बाँसुरी बजाने के साथ-साथ संगीत संयोजन कर रहा है. कुछ देर बाद टहलते हुए ही उससे फिर मुलाकात हुई तो वह बहुत ही भावुक था. अपनी कई पेंटिंग दिखाई मोबाइल पर और फिर हमारे साथ फोटो खिंचवाने के निवेदन के साथ बोला सर, हमारे सिर पर आप हाथ रख दीजिये. आपका आशीर्वाद मुझे बहुत सफलता देगा. कुछ ऐसी ही स्थिति बनी नाटक देखते समय. हमारे एक छात्र अनूप सेंगर ने जालौन के युवा कलाकारों से परिचय करवाया. उनकी फिल्म वहाँ दिखाई गई थी. मिलने के क्रम में उन युवा साथियों ने भी वही शब्द बोले- सर, आप हमारे सर पर हाथ रखकर मार्गदर्शन कीजिये हम लोगों का. जालौन टीम के दो सदस्य हमारे साथ उरई तक आये, बस उनके साथ फोटो नहीं हो सकी. पर अपने आपमें ऐसा महसूस हुआ जैसे हम भी कोई बहुत बड़े कलाकार हैं.


सम्बन्ध बनते रहे चलने-चलने तक. राजा बुन्देला, महेन्द्र भीष्म, नईम, गीतिका, संजय तिवारी, आरिफ, राघवेन्द्र चिंगारी, धर्मेन्द्र, अमजद आदि सहित कई कलाकार तो पहले से परिचित थे ही, कुछ नए सम्बन्ध भी बन गए. जालौन की टीम, वहीं के मुस्तकीम और रोहित, विवेक, रवीन्द्र, उमाशंकर, हरपाल, सरिता आदि से मुलाकात सार्थक रही. फिल्म समारोह 2018 के समापन दिवस पर इन संबंधों के साथ-साथ सम्मान भी मिला. नईम, जो हमारा छोटे भाई जैसा ही है, उसके बार-बार जोर देने के बाद भी अपनी तमाम शूट की गई क्लिप्स में से किसी की भी एडिटिंग करके समारोह में नहीं भेज सके. अंत-अंत तक हमने प्रयास किया और नईम ने बराबर जिद सी की मगर कोई फिल्म धरातल पर न उतर सकी. ओरछा के भारतीय फिल्म समारोह 2018 को हमारे लिए यादगार बनना ही था सो पुराने निर्देशन कार्यों को याद करते हुए अन्य भावी, वर्तमान कलाकारों के साथ हमारा भी सम्मान किया गया. सुखद अनुभूति के बीच प्रसिद्द अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी जी के हाथों सम्मान-पत्र प्राप्त हुआ. इसके लिए उनको और समूची आयोजक टीम का आभार.

सम्मान ग्रहण करते हुए 

भारतीय फिल्म समारोह ओरछा 2018 बुन्देलखण्ड के कलाकारों की आँखों में नए सपने भर गया है. तभी समापन समारोह अवसर पर एक नवयुवक ने राजा बुन्देला से राय प्रवीण पर फीचर फिल्म बनाये जाने का अनुरोध किया. ऐसे न जाने कितने स्वप्न यहाँ के कलाकारों, निर्देशकों, कहानीकारों, गीतकारों की आँखों में पलने लगे होंगे. सभी के सपने सच हों, ऐसी कामना ही की जा सकती है और अपेक्षा की जा सकती है कि वर्ष 2018 में ओरछा में आरम्भ यह प्रयास निरन्तर ऊँचाइयाँ पाता रहेगा, नई-नई प्रतिभाओं को तराशता रहेगा.

04 मई 2018

उपेक्षा का शिकार हैं बुन्देलखण्ड केसरी


बुन्देलखण्ड सदैव ही अपनी आन-बान-शान के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के प्रतापी राजा अपने कार्य, साहस के कारण आज भी अमर-अजर हैं। ऐसे वीर प्रतापी राजाओं में एक महाराजा छत्रसाल का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने अपनी वीरता, पराक्रम और रणनीतिक कौशल से बुन्देलखण्ड को वैभवशाली राज्य के रूप में स्थापित किया था। बुन्देलखण्ड केसरी के रूप में प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल के राज्य का सीमांकन निम्न रूप में वर्णित है-
इत यमुना, उन नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस,
छत्रसाल सौं लरन की, रही न काहू हौंस।

राजकीय संग्रहालय, धुबेला में स्थित महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा 

छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत् 1707 (4 मई 1649 ई०) को विंध्याचल पर्वत श्रेणियों के मध्य बने जंगलों में हुआ था। उनके पिता राजा चम्पतराय को विश्वासघातियों के कारण अपना राज्य गँवा जंगलों में जाना पड़ा। इन्हीं जंगलों, प्राकृतिक वातावरण, रणभूमि में छत्रसाल का पालन-पोषण हुआ, जिससे उनमें किसी भी स्थिति से निपटने की नैसर्गिक क्षमता का विकास स्फूर्त रूप से हुआ। बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता के लिए मुगलों से संघर्ष करने वाले उनके पिता तथा उनकी माता रानी लालकुँअरि ने विश्वासघातियों के कारण आत्माहुति दे दी। ऐसे विपरीत हालातों में भी छत्रसाल ने हार न मानते हुए कालान्तर में सूझबूझ का परिचय देते हुए राष्ट्रीयता के दैदीप्यमान नक्षत्र छत्रपति शिवाजी से सन् 1668 ई० में भेंट की। छत्रपति शिवाजी उनकी वीरता, आत्मविश्वास के साथ-साथ राष्ट्रचेतना, स्वतन्त्रता के प्रति उनकी क्रियाशीलता, दूरगामी नीतियों से प्रभावित हुए। छत्रसाल को स्वतन्त्र राज्य स्थापना हेतु प्रेरित करते हुए छत्रपति शिवाजी ने समर्थगुरु रामदास के आशीष वचन सहित भवानी तलवार भेंट की-
करो देस के राज छतारे। हम तुम तें कबहूँ नहीं न्यारे।।
दौर देस मुगलन को मारो। दपटि दिली के दल संहारो।।
तुम हो महावीर मरदाने। करिहो भूमि भोग हम जाने।।
जो इतही तुमको हम राखे। तो सब सुयश हमारे भाषे।।

वीर छत्रसाल स्वराज्य का मंत्र लेकर वापस आकर और अपने साथियों की मदद से 22 वर्ष की उम्र में मात्र 5 घुड़सवारों तथा 25 पैदलों की छोटी सी सेना तैयार की। इतनी छोटी उम्र में सेना का गठन, सैनिकों का चयन वीर छत्रसाल की कार्यक्षमता, बौद्धिक प्रतिभा को दर्शाता है। सेना बनाने के बाद सबसे पहला आक्रमण उन्होंने अपने माता-पिता के विश्वासघाती सेहरा के धंधेरों पर किया। पहले आक्रमण में प्राप्त विजय से जहाँ छत्रसाल और उनके साथियों का मनोबल ऊँचा हुआ वहीं क्षेत्रवासियों में भी उनके प्रति विश्वास बढ़ा। अपनी विजय यात्रा को बढ़ाते हुए छत्रसाल बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता और उसके विस्तार हेतु लगातार प्रयासरत रहे। उन्होंने पूर्व में चित्रकूट और पन्ना का क्षेत्र, पश्चिम में ग्वालियर, उत्तर में कालपी से लेकर दक्षिण में सागर, गढ़कोटा और दमोह तक अपने राज्य का विस्तार किया। उनके रणविजय की पताका मालवा, बघेलखण्ड, राजस्थान, पंजाब तक पहराने लगी थी, जिसके चलते यमुना, चम्बल, नर्मदा, टोंस आदि नदियों में बुन्देल राज्य स्थापित हो गया था।
जैतपुर में हुए अंतिम युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित होने की स्थिति में आने लगे। ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बाजीरव पेशवा को अपने पुराने सम्बन्धों का परिचय देते हुए एक काव्यात्मक पत्र लिखा, जिसकी चन्द पंक्तियाँ पूरे पत्र का सार प्रस्तुत कर देती हैं-
जो गति गज और ग्राह की, सो गति भई है आज।
बाजी जात बुन्देल की, राखौ बाजी लाज।।

इस पत्र के मिलते ही बाजीराव पेशवा की सेना ने मुहम्मद बंगश पर आक्रमण कर पराजित कर दिया। इस युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित हो सकते थे किन्तु मराठों के साथ अपने प्रगाढ़ रिश्तों के चलते अपना और बुन्देलखण्ड राज्य का सम्मान बचाए रखा। इसके बाद उन्होंने अपने राज्य का बंटवारा अपने दोनों पुत्रों और बाजीराव में कर दिया। बाजीराव से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मस्तानी, जिसे वे अपनी पुत्री मानते थे, के साथ उनका विवाह करवा दिया। बुन्देलखण्ड राज्य का विस्तार चहुँ ओर करने वाले प्रतापी महाराजा छत्रसाल ने पौष शुक्ल तृतीया संवत् 1788 (19 दिसम्बर 1731 ई०) को अपने बसाये नगर छतरपुर में नौगाँव के निकट अंतिम साँस लेकर जगमगाते नक्षत्रों में शामिल हो गये। बाजीराव पेशवा ने उनके सम्मान में समाधि-स्थल का निर्माण छतरपुर जिले में धुबेला ग्राम में धुबेला ताल के पास करवाया।

महाराजा छत्रसाल समाधि स्थल 

आजीवन बुन्देलखण्ड की स्वतन्त्रता, उसके स्वाभिमान के लिए संघर्ष करने वाले महाराजा छत्रसाल की अंतिम निशानी वर्तमान में उपेक्षा का शिकार है। धुबेला में उनके नाम से राजकीय  संग्रहालय का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। इसी राजकीय संग्रहालय के पार्श्व में महाराजा छत्रसाल की पहली रानी कमलापति की स्मृति में बना समाधि स्थल है। यहाँ से लगभग एक सौ मीटर की दूरी पर महाराजा छत्रसाल की समाधि स्थित है। महाराजा छत्रसाल के नाम से संचालित राजकीय संग्रहालय में उनसे सम्बन्धित विक्रमी सम्वत 1759 (सन् 1702 ई०) का ताम्रपत्र है, जिसमें उनकी उपलब्धियों, दान देने की सनद, ताम्रपत्र लिखने की तिथि एवं स्थान आदि का उल्लेख मिलता है। महाराजा छत्रसाल को चित्रांकित करती एक पेंटिंग तथा संग्रहालय के प्रांगण में आदमकद प्रतिमा भी देखने को मिलती है।


बुन्देलखण्ड के नाम को अपने नाम से पहचान देने वाले महाराजा छत्रसाल की शासन अथवा प्रशासन स्तर से उपेक्षा की जा रही है। उनके समाधि स्थल के आसपास का स्थान कच्चा, मिट्टीदार होने के कारण बहुत बड़ी संख्या में जगली पेड़-पौधों, खरपतवारों, कंटीली झाडि़यों आदि ने उस इमारत को घेर रखा है। उसके अंदर की दीवारें जर्जर, जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हैं। वहाँ आने वालों द्वारा एवं स्थानीय लोगों द्वारा पान खाकर थूकने का, दीवारों पर खरोंचने का काम किया जा रहा है। आसपास के क्षेत्रवासियों द्वारा, युवाओं द्वारा इन गौरवशाली प्रतीकों को मौजमस्ती का अड्डा बना लिया गया है। इनके आसपास बड़ी संख्या में सिगरेट, गुटखा, तम्बाकू, शराब आदि सेवन करने के अवशेष देखने को मिलते हैं। देखा जाये तो सरकारी स्तर पर इन ऐतिहासिक स्थलों की देखरेख करने की, अराजक तत्वों से इनको बचाये रखने की, इनके जीर्णोद्धार आदि की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है। इसी कारण से इन ऐतिहासिक स्मारकों पर, धुबेला ताल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यह अपने आपमें शर्म का विषय है कि जहाँ एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्य बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान के लिए न्यौछावर कर दिया वहीं स्वयं बुन्देलखण्डवासी ही उसके प्रतीकों की, उसकी धरोहर की उपेक्षा करने में लगे हुए हैं।

11 मार्च 2018

निस्वार्थ सामाजिक कार्य करने वालों का सम्मान हो


ज़िन्दगी जितनी नश्वर है, उतनी ही समर्थ सन्देश देने वाली भी. कई बार लगता कि वे लोग भी ज़िन्दगी को बिता रहे हैं जो कुछ विशेष नहीं कर रहे हैं, वे लोग भी ज़िन्दगी को जी रहे हैं जो कुछ न कुछ करते हुए अपनी ज़िन्दगी खपा दे रहे हैं. समझ से बाहर है कि आखिर ज़िन्दगी का असली मजा कौन ले रहा है? वे लोग जो बिना कुछ करे अपनी ज़िन्दगी बिता रहे हैं या वे लोग जो दिन भर किसी न किसी सामाजिक कार्य में खुद को लगाते हुए ज़िन्दगी को बिता रहे हैं? सामाजिक काम करने वालों को, देशहित में सक्रिय रहने वालों को बहुत से लोग बहुत प्रोत्साहित करते देखे जाते हैं. लोगों के कामों के द्वारा उनके सदैव-सदैव जीवित बने रहने की बात की जाती है. सच भी है या कहें कि सच भी हो सकता है कि अपने कामों से कोई भी व्यक्ति बहुत लम्बे समय तक जिंदा बना रहता है. इस सच के साथ यह भी सवाल उठता है कि आखिर खुद के मरने के बाद खुद को जिंदा बनाये रखने का लोभ-लालच इस जीवन में क्यों? क्या वाकई आज वे सभी लोग किसी न किसी रूप में जिंदा हैं जिन्होंने समाज के लिए, देश के लिए अपने जीवन को न्योछावर कर दिया? क्या जिन लोगों ने अपने जीवन को दाँव पर लगा दिया वे सभी आज सम्मान पा रहे हैं?


ये सवाल ऐसे हैं जो मन को व्यथित करते हैं. सामाजिक जीवन के साथ-साथ यदि पारिवारिक जीवन किसी व्यक्ति के साथ जुड़ गया होता है तो समाज के साथ-साथ उसकी जिम्मेवारी परिवार के सञ्चालन की भी होती है. यदि कहा जाए कि समाज से ज्यादा उसकी जिम्मेवारी अपने परिवार के प्रति होनी चाहिए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. इसके बाद भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने परिवार को हाशिये पर टिका कर समाज के लिए काम करने में लगे हैं. ऐसे लोगों में बहुत से लोग हमारे मित्र भी हैं और कई बार उनके कार्यों, उनके प्रयासों को देखकर लगता है कि वे जितना समाज के लिए कर रहे हैं, क्या समाज वाकई में उतना वापस करेगा? भले ही उन्हें न करे पर उनके परिवार के प्रति समाज की कुछ न कुछ जिम्मेवारी होनी चाहिए. एक व्यक्ति अपना सम्पूर्ण इसी समाज को दे रहा है तब क्या उस समाज की जिम्मेवारी नहीं बनती कि उसके परिजनों का ख्याल रखे? ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आये दिन हम किसी न किसी प्रसिद्द व्यक्तित्व के बारे में पढ़ते हैं, जिसका परिवार या परिजन दरिद्र अवस्था में जीवन-यापन कर रहे हैं. बहुत से नामी-गिरामी लोगों के परिजन मजबूरी में, मजदूरी में अपना जीवन गुजार रहे हैं. इसके अलावा ऐसे व्यक्ति भी समाज में असम्मान पा रहे हैं जिन्होंने अपने परिजनों का ध्यान रखे बिना समाज के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया. आखिर ऐसे जीवन से इन लोगों का क्या मिला?

सोचने वाली बात है कि वे लोग, जो इस संसार से विदा हो चुके हैं वे अपने किये गए कार्यों का लेखा-जोखा किसी से भी माँगने नहीं आ रहे हैं. वे देखने नहीं आ रहे हैं कि आप उनके प्रति कैसा व्यवहार कर रहे हैं. वे यह भी नहीं जानना चाहते कि उनके जाने के बाद समाज ने उनके परिजनों के प्रति कैसा बर्ताव किया. समाज ने देश के लिए अपनी जान लुटा देने वालों को भी लाल, हरे, भगवा रंग के खाँचों में बाँटकर उन पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया है. समाज के लिए काम करने वालों को भी सरकारी एजेंट बता कर उनके कामों को विस्मृत कर दिया गया है. ऐसे में अपने जीवन की, अपने परिवार की क़ुरबानी देकर मरणोपरांत नाम करवाए जाने का क्या निष्कर्ष निकलता है? ये समाज की, समाज के उन लोगों की जो लाभ ले रहे हैं जिम्मेवारी बनती है कि ऐसे लोगों के प्रति अवश्य ही अपनी जिम्मेवारी समझें जो निस्वार्थ भाव से काम करते हुए अपने जीवन का होम कर गए. ऐसे लोगों के प्रति समाज में जागरूकता लाने की आवश्यकता है जो बिना किसी लाभ की लालसा के सिर्फ काम करते रहे और अपने परिवार को भी भुला बैठे. यदि समाज से जुड़े हुए लोग ऐसा नहीं कर सके तो यकीन मानिये भविष्य में निस्वार्थ भाव से कार्य करने वालों की, सामाजिक सेवा देने वालों की जबरदस्त कमी दिखाई देगी. यदि ऐसा हुआ तो समाज में अराजकता बढ़ती दिखाई देगी. वर्तमान में बढ़ती अराजकता का एक कारण यह भी है कि समाज ने वास्तविक निस्वार्थ भावना से काम करने वालों का तिरस्कार करना शुरू कर दिया है, उनको विस्मृत करना शुरू कर दिया है, उनका अपमान करना आरम्भ कर दिया है.



09 मार्च 2018

दिव्या का सम्मान वास्तविक कार्य का सम्मान है

जीतने की कोई उम्र नहीं होती, सम्मान पाने की कोई उम्र नहीं होती. हाँ यदि इसके लिए कुछ होता है तो वो है काम करने का जज्बा. सम्मान, पुरस्कार, इज्जत, नाम आदि पाने के लिए काम पहली शर्त है और इस शर्त में भी कई तरह की अन्य शर्तें भी लागू होती हैं. उनमें आत्मानुशासन, आत्मबल, स्वाभिमान, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा आदि भी आवश्यक है. कुछ इसी के सहारे चरित्र का ही नहीं वरन व्यक्तित्व का भी निर्माण होता है. चरित्र-निर्माण का कार्य अथवा व्यक्तित्व-निर्माण का कार्य कोई एक दिन का नहीं, एक पल का नहीं, एक कार्य का नहीं, एक व्यक्ति का नहीं वरन कई-कई पलों की, कई-कई कामों की, कई-कई निगाहों की परीक्षण प्रक्रिया से गुजरने के बाद सामने आने वाली स्थिति है. इस प्रक्रिया से गुजरे बिना कोई भी अपने आपका विकास नहीं कर पाता है. अक्सर देखने में आता है कि सामाजिक क्षेत्र में कार्य कर रहे लोग आशानुरूप परिणाम न मिलने के कारण निराश होने लगते हैं. ऐसे लोगों में अपने कार्य के प्रति तुरंत ही परिणाम पाने की लालसा छिपी होती है. ये सही है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा कहीं न कहीं अपने नाम के प्रति गंभीरता दिखाई देती है. और ऐसा होना भी चाहिए. यदि कोई व्यक्ति अपने नाम के प्रति, अपनी इज्जत के प्रति, अपने सम्मान के प्रति सचेत नहीं है तो संभव है कि वह सामाजिक हित में काम उतनी मेहनत या ईमानदारी से न करे. यहाँ एक बात इसके ऊपर भी लागू होती है कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को अपने कार्य के प्रति ईमानदारी बरतने की आवश्यकता है. यदि वह अपने काम क प्रति, अपनी जिम्मेवारी के प्रति ईमानदार नहीं है तो संभव है कि वह अपनी जिम्मेवारी से दगाबाजी कर रहा हो. ऐसा करना कहीं न कहीं समाज के विरूद्ध कार्य करना ही कहा जायेगा. ऐसे में फिर काहे का सम्मान, काहे का नाम.



आज से नहीं बल्कि लगभग डेढ़-दो दशकों से अपने कार्य के प्रति समर्पण भाव लिए, समाजहित में खुद को चौबीस घंटे समर्पित किये, काम के प्रति एक जुनूनी हद तक जाकर वास्तविक काम करने वाले बहुत कम लोग देखने को मिलते हैं. बहुतेरे तो प्रचार की चकाचौंध में सिमट जाते हैं और अपने काम से ज्यादा अपने नाम के प्रचार में लग जाते हैं. इन सबसे बहुत अलग दिव्या ने न केवल खुद को सामाजिक कार्यों में लगा रखा है बल्कि जमीनी स्तर पर खड़ा कर रखा है. देश में तमाम तरह की प्राकृतिक आपदाओं में दिव्या उन सबके बीच खड़ी मिली, जिन्हें उसकी जरूरत थी. बाढ़ हो, भूकंप हो, आगजनी हो या फिर किसी और तरह की दुर्घटना दिव्या सब जगह बिना कुछ सोचे-बिचारे, बिना किसी आदेश की प्रतीक्षा के खड़ी मिली. न केवल वह वहां उपस्थित रही वरन खुद को काम के प्रति समर्पित करती रही. उसका काम हर बार बिना किसी अपेक्षा के आगे बढ़ता रहा. बिना किसी अपेक्षा के वह लगातार आगे चलती रही. उसके कार्य की निस्वार्थ भावना को जानने-समझने का दिन आखिर आ ही गया. उन सभी लोगों को, जो अपने काम के मूल्यांकन न होने की भावना से निराश होने लगते हैं, एक बात जान लेनी चाहिए कि ये समाज सबका मूल्यांकन करता है. आज नहीं तो कल, सभी को उसके कार्यों का प्रतिफल मिलता ही मिलता है. दिव्या को भी उसके कार्य का सुफल मिला.



गुजरात में यूनिसेफ के साथ सलाहकार के रूप में काम करने वाली दिव्या विगत कई वर्षों से जमीनी काम चुपचाप करने में लगी हुई है. विगत दो-तीन वर्षों से उसके द्वारा Volunteer Indians नाम से एक सार्थक प्रयास भी आरम्भ किया गया है. (फेसबुक पेज के लिए यहाँ क्लिक करें) कई वर्षों के समर्पित कार्य का प्रतिफल आज ये मिला कि उसे गांधीनगर (गुजरात) में UDGAM Women's Achiever's Award से सम्मानित किया गया. दिव्या को बधाई. साथ में उन सभी को भी बधाई जो बिना किसी प्रचार पाने की भावना के सत्यनिष्ठा से, पूरी ईमानदारी से अपना काम करने में लगे हैं. आज नहीं तो कल वे भी दिव्या की तरह प्रकाशित होंगे. सभी को शुभकामनायें.