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02 जून 2019

आभासी दुनिया के संबंधों की वास्तविकता


तकनीकी रूप से कई बार आभास होता है कि हम बहुतों से बहुत पीछे हैं, बहुत पिछड़े हैं. हमारे साथ के ही बहुत से लोग हमसे कई सालों पहले से कंप्यूटर का उपयोग करने लगे थे. हमने पहली बार कंप्यूटर का आंशिक उपयोग शायद 1999 में करना शुरू किया था. हालाँकि देखने और छूने को तो सन 1992 में ही मिल गया था. इसके बाद पूरी तरह से उपयोग करना सन 2006-07 में करना शुरू किया था, जबकि एक सेकेण्डहैण्ड कंप्यूटर किसी काम के लिए हमने लिया था. उसके बाद लगातार सीखते रहे, काम करते रहे. इसी सबमें इंटरनेट से, ब्लॉग से, सोशल मीडिया से जुड़ना हुआ. इन सबमें आने के बाद भी एक तरह से अशिक्षित रहे, अनाड़ी ही रहे. जैसे-जैसे लोगों से मिलना-जुलना होता रहा, विचारों का आदान-प्रदान होता रहा तो मालूम पड़ता रहा कि लोग इस क्षेत्र में भी हमसे कई-कई साल पहले आ चुके हैं. अपनी आदत के अनुसार संबंधों का विस्तार करते रहे. संबंधों का बनना लगातार होता रहा. नए-नए लोगों से मिलना होता रहा. ब्लॉग की दुनिया के साथ-साथ सोशल मीडिया की दुनिया में लोगों से मेलजोल बनता रहा. इन सबके बीच लगातार यह आभास बना रहा, एहसास होता रहा कि सोशल मीडिया की दुनिया पूरी तरह से आभासी ही है. लोग माने या न माने मगर ऐसा उन सभी के व्यवहार से भी लगता रहा कि सोशल मीडिया की दुनिया आभासी दुनिया है.


ऐसा इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया में या कहें कि इस आभासी दुनिया में सम्बन्ध दो तरह के लोगों से बनते समझ आये. एक तो वे लोग थे जिनसे विशुद्ध सोशल मीडिया के चलते ही सम्बन्ध बने. ऐसे लोगों से पहले किसी भी तरह से कहीं भी मिलना नहीं हुआ था. दूसरे वे लोग आभासी दुनिया में जुड़े जो उससे कहीं पहले से हमारे संपर्क में थे, हमसे जिनके सम्बन्ध थे. ऐसे लोग इन्हीं संबंधों को ए धरातल पर एक नया स्वरूप देने के लिए आभासी दुनिया में एक-दूसरे से जुड़े, सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के साथ मित्र रूप में जुड़े. ये सम्बन्ध आभासी दुनिया के मुकाबले जमीनी सम्बन्ध कहे जा सकते हैं, जो बहुत पहले से एक-दूसरे पर विश्वास करके, स्नेह करके ही बने हुए थे. ये ज़मीनी सम्बंध जब आभासी दुनिया में मिले तो उनमें तमाम विरोधों के बाद भी खटास नहीं आई. उनको आभासी दुनिया के पहले से सम्बन्धों का लिहाज़ था, आत्मीयता का एहसास था. ऐसे सम्बन्धों ने किसी कारण से आभासी दुनिया के सम्बन्धों को बंद किया तो भी वास्तविक दुनिया के अपने सम्बन्धों में वही परिपक्वता बनाए रखी, जो कभी थी.

इसके उलट आभासी दुनिया के सम्बन्धों ने जब वास्तविक दुनिया में आकार लेना चाहा तो उनमें तब तक ही आत्मीयता दिखाई दी, जब तक वैचारिक रूप से दोनों तरफ़ से एक जैसी समान बातें होती रहीं. दोनों तरफ़ से एक-दूसरे की तारीफ़ के क़सीदे काढ़े जाते रहे. इससे ज़रा सा भटकते ही रिश्ते ख़त्म. आभासी दुनिए के ऐसे सम्बन्धों में वे तमाम लोग शामिल रहे जिन्होंने अपने को बिलकुल पारिवारिक स्तर पर हमसे जोड़ कर प्रस्तुत किया. ऐसे लोग भी सामने आये जिन्होंने अपनी परेशानियों को आत्मीय रूप में हमसे शेयर किया, उनका समाधान पाया. बहुत से ऐसे लोग सोशल मीडिया के द्वारा हमसे जुड़े जिन्होंने हमसे बहुत कुछ सीखने का दावा किया. जिन्होंने लेखन में, फोटोग्राफी में, व्यवहार निर्वहन में, भाषण देने की कला में हमसे बहुत कुछ सीखने की बात स्वीकारी, मित्र के साथ-साथ हमें अपने गुरुरूप में स्वीकारने का भाव प्रकट किया. इन संबंधों में वैचारिकी महज यहीं तक सीमित नहीं रही. संबंधों का एहसास महज यहीं तक नहीं रहा. आभासी दुनिया के संबंधों को, सोशल मीडिया के आभासीपन को झुठलाने की कोशिश में ऐसे संबंधों का विस्तार इस आभासी दुनिया से बाहर आकर जमीनी रूप में अपना स्वरूप विकसित करने लगा.

बहुत से लोगों का घर आना भी हुआ. रुकना, रहना हुआ, साथ घूमना-फिरना हुआ. हमारा भी बहुत से लोगों के घर जाना हुआ. यदि किसी कारणवश एक-दूसरे के घर आना-जाना नहीं हो सका तो कहीं न कहीं, किसी न किसी कार्यक्रम में मुलाकातों के द्वारा आभासी संबंधों को वास्तविकता का जामा पहनाने की कोशिश की गई. ऐसे प्रयासों के बाद भी, लगातार मिलने-जुलने, बातचीत के बाद भी ये सम्बन्ध तनिक सी वैचारिकी मेल न खाते ही समाप्त हो गए. जमीनी संबंधों के मुकाबले बहुत ही कमजोर आधारभूमि पर बने इन संबंधों ने एक झटके में न केवल अपनी फ़्रेंड लिस्ट से बाहर किया बल्कि कई बार ब्लॉक भी किया. महज इतने से अभी संबंधों का समापन होना शायद आभासी दुनिया को मंजूर नहीं था सो उनको वास्तविकता का जो आँचल ओढ़ाया गया था, उसे भी समाप्त किया गया. न सिर्फ़ ख़त्म बल्कि ऐसे समाप्त किया जैसे कभी मिले नहीं, कभी जाना ही नहीं. आख़िर आभासी से वास्तविकता में जाना और उसे बनाए रखना अत्यंत कठिन होता है. 

ऐसी स्थिति कष्टकारी होती है, खासतौर से उस स्थिति में जबकि संबंधों का निर्वहन दिल से करने की बात कही जा रही हो. पिछली कई बार की तरह पुनः निवेदन कि हम भी साधारण से इंसान हैं. हमारे लेखन, किसी कार्य से हमारे प्रति कोई विशेष धारणा न बनाएँ. किसी तरह का आदर्श, मानक हममें न तलाशें. एक पल में हमें आदरणीय बना-बताकर, सम्मानजनक दर्जा देने के बाद अगले ही पल धरती पर पटक देते हैं. कृपया सम्बन्धों को उसी स्थिति तक बनाए रखें, जितने आप हमसे निभा सकें. आभासी दुनिया के बहुत से पुरोधाओं के अतीत को देखते हुए लगता है कि बहुतों से तकनीकी रूप से तो पिछड़े हैं ही, अब कई बार लगता है कि सोशल मीडिया के या फिर आभासी दुनिया के संबंधों का निर्वहन करने में भी हम पिछड़े ही हैं. पता नहीं कब ऐसे संबंधों का निर्वहन करने की योग्यता हममें विकसित हो पायेगी, हो भी पायेगी या नहीं?



30 मार्च 2016

अंतिम सत्य अभी शेष है

फ़ैजाबाद के रामभवन में लगभग दस वर्ष तक प्रवास पर रहने के बाद भी किसी के सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले ‘भगवन’ आज भी लोगों के लिए उतने ही गुमनाम से हैं जितने कि अपने प्रवास के दौरान थे. अपने प्रवास के दौरान किसी ने, यहाँ तक कि उनके मकान मालिक ने भी उन्हें नहीं देखा था. यदा-कदा किसी से मुलाकात होने की स्थिति में वह रहस्यमय व्यक्तित्व परदे के पीछे रहकर मुलाक़ात करता था. अपनी इस रहस्यमयी पहचान के चलते वे लोगों में ‘भगवन’ के नाम से प्रसिद्द हो गए और यही भगवन कालांतर में लोगों में ‘गुमनामी बाबा’ के रूप में स्वीकारे जाने लगे. भगवन, गुमनामी बाबा के रूप में चर्चित रहस्यमयी व्यक्तित्व के वर्ष 1985 में देहांत के पश्चात् स्थानीय लोगों को बजाय उनके दर्शनों के उनके सामानों के दर्शन हुए. गुमनामी बाबा के देहांत की खबर आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और अत्यंत सशंकित रूप से उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. आश्चर्य इसका कि उनकी पार्थिव देह को तिरंगे में लपेटा गया था, ऐसा किसलिए किया गया होगा? इसके अलावा उनका अंतिम संस्कार उच्च प्रशासनिक एवं सैन्य अधिकारियों की देखरेख में हुआ. इसके साथ ही सैन्य-संरक्षित क्षेत्र में गुमनामी बाबा को अंतिम विदा देना भी कहीं न कहीं स्थानीय लोगों के विश्वास को पुष्ट करता है कि वे कोई असाधारण व्यक्तित्व ही थे. इस आश्चर्य, विश्वास को तब और बल मिला जबकि गुमनामी बाबा के तमाम सारे सामानों को देखकर लगभग सभी ने एक स्वर में उन सामानों को नेताजी से सम्बंधित माना.

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देश की आज़ादी के लिए देश से बाहर जाकर अपनी जीवटता और नेतृत्व-क्षमता के चलते सैन्य गठन करके नेताजी अंग्रेजी शासन के लिए समस्या बने हुए थे. उनके संघर्ष का, उनकी सेना के युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होता इसको देखने के पूर्व ही नेताजी अचानक रहस्यमयी व्यक्तित्व बन गए. 18 अगस्त 1945 को तथाकथित विमान दुर्घटना का होना, उस कथित दुर्घटना में नेताजी की कथित मृत्यु ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की दिशा को प्रभावित किया ही आज़ादी की लड़ाई को भी प्रभावित किया. अनेकानेक वीर योद्धाओं का संघर्ष काम आया, अनेकानेक शहीदों की शहादत रँग लाई और देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी चंगुल से मुक्त हो गया. ये अपने आपमें विचित्र विडम्बना ही कही जाएगी कि देश तो मुक्ति पा गया, अपनी स्वतंत्र पहचान पा गया किन्तु देश का एक सपूत उसके बाद भी गुमनामी में बना रहा. विमान दुर्घटना का होना या न होना, नेताजी की उसमें मृत्यु होना या न होना, नेताजी का गुप्त रूप से रूस चले जाना या रूस भेज दिया जाना, अंग्रेजों और नेहरू के बीच की संधि होना या न होना, रूस में उनकी हत्या कर दिया जाना या कैद कर लिया जाना आदि-आदि न जाने क्या-क्या बातें लगातार तैरती रहीं. इनमें सत्य क्या है, कौन सी बात है ये तो स्वयं नेताजी ही भली-भांति जानते-समझते होंगे किन्तु फ़ैजाबाद के गुमनामी बाबा के सामानों ने तार्किक रूप से उनको ही नेताजी मानने को विवश सा किया है. गुमनामी बाबा के देहांत के पश्चात् नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भतीजी ललिता बोस उन सामानों को देखकर अपने आँसू रोक नहीं सकी थी. ये महज संयोग ही नहीं कि बाद में ललिता बोस ने उन सामानों को सुरक्षित रखवाने के लिए सरकार से लम्बी लड़ाई लड़ी. सामानों को देखकर स्थानीय लोगों के साथ-साथ ललिता बोस ने भी माना कि उन सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा ही उनके चाचा थे. आखिरकार ललिता बोस तथा स्थानीय नागरिकों के प्रयासों से सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के सामानों की एक सूची बनाई गई. 23 मार्च 1986 से 23 अप्रैल 1987 के दौरान बनाई गई सूची के अनुसार आज भी फैजाबाद के सरकारी कोषागार में लगभग 2761 सामान रखे हुए हैं.
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गुमनामी बाबा का प्रवासकेंद्र रहे रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा 13 जनवरी 2013 को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने कोषागार में रखे गुमनामी बाबा के सामानों को वैज्ञानिक विधि से सुरक्षित करने, संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक करने एवं रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में समिति गठित कर गुमनामी बाबा के सामानों से पर्दा हटाने का निर्देश उत्तर प्रदेश सरकार को दिया. न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को विश्वास होने लगा कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं नेताजी ही थे. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.
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सामानों के आधार पर बाबा को नेताजी माना जा सकता है किन्तु आधिकारिक पक्ष अभी आना बाकी है. हाल फिलहाल तो गुमनामी बाबा का सामान सूचीबद्ध करके पुनः तालाबंदी में है. जल्द ही यदि न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया गया तो ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही होगी. नेताजी के प्रशंसकों के विश्वास की अंतिम विजय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के रहस्य से पर्दा उठने पर ही होगी.
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05 जुलाई 2015

मजबूरी में शिक्षा से वंचित न रह सके कोई


अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में, अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाने का सपना प्रत्येक माता-पिता का होता है और इसके लिए माता-पिता किसी भी हद तक मेहनत करने को तैयार रहते हैं. भारतीय समाज में अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन ने, दिन प्रतिदिन खुलते नए-नए आलीशान कॉन्वेंट स्कूल्स की चकाचौंध ने, अंग्रेजी भाषा के प्रति बढ़ती जनमानस की ललक ने, ज्ञान की प्राप्ति का एकमात्र केंद्र अंग्रेजी माध्यम के स्कूल्स को मान लेने ने, ज्यादातर हिन्दीभाषी विद्यालयों की गिरती दशा और वहाँ के शिक्षकों की उदासीनता ने भी अभिभावकों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की तरफ आकर्षित किया है. इस आकर्षण से कोई भी वर्ग अछूता नहीं रह गया है. अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित, नौकरीपेशा हो या फिर व्यापारी, मालिक हो या फिर मजदूर, शहरी हो या फिर ग्रामीण या फिर किसी भी वर्ग का व्यक्ति सबके मन में अंग्रेजी शिक्षा के प्रति, अंग्रेजी भाषा के प्रति, कॉन्वेंट स्कूल्स के प्रति एक अजब तरह का लगाव देखने को मिलता है.
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इसमें कोई बुराई भी नहीं दिखाई देनी चाहिए, आखिर प्रत्येक व्यक्ति को इतनी स्वतंत्रता तो है ही कि वो कहाँ और किस स्तर से शिक्षा प्राप्त करे; कहाँ, किस संस्थान से, किस माध्यम से अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाए. इसके बाद भी कई बार लगता है जैसे कहीं न कहीं समाज का एक वर्ग ऐसा है जो ऐसे विद्यालयों में, इस तरह के आलीशान, चकाचौंध भरे संस्थानों में अध्ययन के लिए अपने बच्चों को भेजे जाने का सपना लिए ही रह जाते हैं. देखा जाये तो ऐसे बड़े-बड़े, चमकते संस्थानों में शिक्षा के नाम पर जबरदस्त व्यापार चलने में लगा हुआ है, जहाँ मोटी, भारी-भरकम फीस वसूलने के अलावा डोनेशन के नाम पर भी अनाप-शनाप धन वसूली की जाती है. कोई व्यक्ति इसका जुगाड़ कहीं न कहीं से कर भी ले तो फिर प्रवेश के नाम पर दूसरी तरह के खेल शुरू हो जाते हैं. अभिभावकों का साक्षात्कार, उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनकी पढ़ाई का स्तर, बच्चों को पढ़ा पाने की उनकी क्षमता, पारिवारिक रहन-सहन का माहौल, आसपास का वातावरण आदि-आदि ऐसा कुछ होता है जिसके द्वारा लगता नहीं है कि ये संस्थान अध्ययन केंद्र के नाम पर संचालित किये जा रहे हैं.
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आज भी हमारे समाज में ऐसे परिवार बहुतायत में हैं जिनका आर्थिक स्तर अत्यंत निम्न स्तर का है; जिनकी पढ़ाई-लिखाई का स्तर लगभग अशिक्षा के आसपास ठहरता है; जिनका रहन-सहन आम साधारण परिवार के रहन-सहन से भी निम्न स्तर का है. ऐसे में उनके बच्चों का ऐसे विद्यालयों में अध्ययन हेतु प्रवेश ले पाना लगभग नामुमकिन ही रहता है. यदि किसी तरह ऐसे परिवार के अभिभावक कहीं न कहीं से, मेहनत से, मजदूरी से, किसानी आदि से धन का प्रबंध करके अपने बच्चों का प्रवेश ऐसे विद्यालयों में करवा देते हैं तो भी उनके सामने उनको घर में पढ़ाये जाने की समस्या उत्पन्न हो जाती है. इन हालातों में बच्चे या तो असफलता की स्थिति में विद्यालय से निकाल दिए जाते हैं या फिर पारिवारिक मजबूरी के चलते स्वतः ही बाहर निकल जाते हैं. ऐसे में समझने वाली बात ये है कि इस स्थिति में बुद्धिमान, काबिल बच्चों का वास्तविक दोषी कौन है? वो विद्यालय जो संस्थानों में पर्याप्त ध्यान देने के बजाय घर में माता-पिता के सहारे से बच्चों की शिक्षा पूरी करवाना चाहते हैं? या फिर वे माता-पिता जो अशिक्षित हैं और घर में अपने बच्चों की पढ़ाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते हैं? या फिर वे बच्चे जो बुद्धिमान हैं, होशियार हैं मगर गरीब घर में पैदा हो गए?
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होना ये चाहिए कि सरकारी स्तर पर ऐसे विद्यालयों में प्रबंध किये जाएँ कि होनहार विद्यार्थी महज इस कारण शिक्षा से वंचित न रह जाएँ, न किये जाएँ कि उनके माता-पिता दोनों ही निरक्षर हैं अथवा कम पढ़े-लिखे हैं. ऐसे होनहार विद्यार्थियों को चिन्हित करके विद्यालय प्रबंधन की तरफ से उनके अध्ययन के, उनकी समस्याओं के समाधान हेतु विशेष कदम उठाये जाने चाहिए. इसके लिए यदि शासन-प्रशासन को स्थानीय स्तर पर कोई सहायता देनी पड़े तो उसके लिए भी सरकार को उपाय करने चाहिए. आज के दौर में जबकि शिक्षा, अध्ययन सबके लिए अनिवार्य ही है तब कोई जिज्ञासु, कोई होनहार शिक्षा से वंचित रह जाए तो ये जागरूक बताये जाने वाले समाज के मुँह पर तमाचा ही होगा, विकास के नाम पर अंधाधुंध धन व्यय करती सरकार के मुँह पर तमाचा होगा, शिक्षा को व्यापार बना देने वाले शिक्षा-माफियाओं के मुँह पर तमाचा होगा.

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19 जून 2015

आपातकाल की आशंका वाले बयान पर बवाल नहीं चिंतन हो


लाल कृष्ण आडवाणी के आपातकाल की आशंका लगाये जाने सम्बन्धी बयान के बाद सुस्त से पड़े विपक्षी दलों में जान सी आ गई है. सबने उनके एक बयान के बहाने से मोदी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. त्वरित प्रतिक्रिया देने की आदत के चलते और राजनैतिक मजबूरियों के चलते राजनैतिक दलों के विभिन्न नेताओं ने तो बयान देने आरम्भ कर दिए हैं. दिए जाने वाले बयानों का मंतव्य सिर्फ और सिर्फ मोदी सरकार को निशाना बनाया जाना है और ऐसा बिना आगा-पीछा सोचे किया जा रहा है. सोचने-समझने वाली बात है कि जिन आडवाणी जी ने इंदिरा गाँधी द्वारा लगाये गए आपातकाल में उन्नीस माह जेल में बिताये थे, आखिर उन्होंने किन हालातों को देख-परख लिया कि आपातकाल लगाये जाने जैसी आशंका व्यक्त की. इस बात को समझे बिना बस बयानों की बाढ़ सी आ गई है. अभी तक सहज रूप में चल रही केंद्र सरकार निरंकुश सी दिखने लगी है. अभी तक नागरिक सुविधाओं को देने वाली केंद्र सरकार आपातकाल लाने वाली लगने लगी है. सुरक्षित समझने वाला आम आदमी एकाएक खुद को असुरक्षित मानने लगा है. बयानबाजियों के खेल में ये चिंता नहीं की जा रही कि वाकई सत्य क्या है.
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मोदी सरकार ने विगत एक वर्ष में नागरिक कानूनों का, नागरिक अधिकारों का, मानवाधिकारों का, न्यायालयीन व्यवस्था आदि का किसी भी तरह से कोई हनन नहीं किया है. ऐसा भी नहीं है कि पूर्व सरकारों द्वारा जनहित में चलाई जा रही किसी भी योजना को मोदी सरकार द्वारा अवरुद्ध किया गया हो या फिर बंद किया गया हो. इसके उलट मोदी सरकार द्वारा आम जानता के हितार्थ, मजदूर, शोषित, कमजोर के लाभार्थ नई-नई अनेक योजनाओं को लागू किया गया है. लगातार आशंका जताए जाने के बाद भी किसी भी तरह की सब्सिडी को पूर्णतः समाप्त नहीं किया गया है. अल्पसंख्यक समाज में लगातार भय दिखाया गया था किन्तु आज भी अल्पसंख्यक उतने ही सुरक्षित हैं जितने की पूर्ववर्ती सरकारों में थे. यदि महंगाई, पेट्रो-कीमतों आदि को आपातकाल लगाये जाने की आहट मान लिया जाये तो फिर आपातकाल पूर्व के सरकारों में लगाये जाने की आशंका वर्तमान से अधिक प्रबल थी. इसके बाद भी न तो पूर्व में आपातकाल लगा और न ही अभी लगाया गया है.
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यदि आडवाणी जी के बयान को गंभीरता से समझा जाये तो उन्हों ने वर्तमान राजनैतिक परिपक्वता पर सवाल उठाते हुए अपनी आशंका व्यक्त की है. इस आशंका के साथ-साथ उन्हों ने अन्ना आन्दोलन पर भी सवालिया निशान लगाये हैं. यहाँ समझा जाना चाहिए कि वर्तमान हालातों में राजनीति को लोगों ने बाजारू स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है. ऐसा लगता है जैसे राजनीति देश, समाज की सबसे निकृष्टतम व्यवस्थाओं में एक है. जबकि वास्तविकता ये है कि देश, समाज, व्यक्ति, संस्थाएं एक पल को बिना राजनीति के, बिना राजनैतिक व्यवस्थाओं के चल नहीं सकती हैं. यहाँ आडवाणी जी की आशंका को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए. उन सभी लोगों को, जो राजनैतिक शुचिता की बात करते हैं सजगता से ध्यान देना चाहिए. स्वार्थपरकता में बनते गठबंधन, महाविलय जैसी स्वार्थमयी स्थितियाँ, तुष्टिकरण के नाम पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाना, वोट-बैंक के लिए आतंकवाद का भी समर्थन कर देना आदि वे स्थितियां हैं जिनके चलते गृह युद्ध हो जाये तो आश्चर्य नहीं. और ऐसे हालातों में यदि आपातकाल लगता है तो क्या गलत होगा. लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर, राजनीति के स्थान पर व्यवस्था परिवर्तन करने आये लोगों की नजर में संविधान का, संसद का, लोकतंत्र का कोई मोल नहीं; मुफ्त के सब्जबाग दिखाकर अफरातफरी पैदा करना एकमात्र उद्देश्य हो तो आपातकाल की आशंका से कोई भी इनकार नहीं कर सकता, आडवाणी जी तो जाने-माने राजनीतिज्ञ हैं, बौद्धिक राजनीतिज्ञ हैं, चिंतनशील राजनीतिज्ञ हैं. उनके इस बयान पर बवाल नहीं बल्कि चिंतन करने की आवश्यकता है.

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17 अप्रैल 2015

फिर एक बार महाविलय का प्रयोग


महाविलय हुआ, एक परिवार का पुनर्निर्माण हुआ पर समझ से परे ये रहा कि ये छह दलों का मिलन हुआ अथवा छह हताश-निराश राजनीतिज्ञों का मिलन हुआ है? देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ कितना बड़ा और भद्दा मजाक है कि इन छह लोगों का, दलों का मिलन किसी भी रूप में राजनैतिक विकास हेतु नहीं, राष्ट्रीय विकास हेतु नहीं वरन मोदी को रोकने के उद्देश्य से हुआ है. ऐसा किसी राजनैतिक विश्लेषक ने अथवा किसी पूर्वाग्रही व्यक्ति ने नहीं वरन स्वयं इन्हीं लोगों ने स्पष्ट किया है. ऐसे में जबकि इनका उद्देश्य स्पष्ट है और बिहार विधानसभा चुनाव भी सामने दिख रहे हैं, जनता परिवार की कालावधि पर किसी भी तरह का संशय नहीं रह जाता है. और वैसे भी इस तरह के राजनैतिक प्रयोग कमोबेश इन्हीं लोगों द्वारा समय-समय पर किये जाते रहे हैं और उन सभी प्रयोगों के पीछे का मूल तत्त्व सत्ता-प्राप्ति ही रहा है.
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जहाँ तक याद पड़ता है कुछ इस तरह का आंशिक सफल प्रयोग इंदिरा गाँधी के विरोध स्वरूप सामने आया था और देशव्यापी आन्दोलन ने गैर-कांग्रेसी गठबंधन को पहली बार केंद्र में ‘सत्ता सुख’ उठाने का अवसर प्रदान किया था. ‘सत्ता सुख’ महज इस कारण से क्योंकि उस सफलतम आन्दोलन के बाद भी ये कुनबा अपने आपको संयमित नहीं रख सका, अपनी एकजुटता को बनाये नहीं रख सका और समय से पूर्व ही धड़ाम हो गया. इसके बाद भी समय-समय पर इन हताश-निराश लोगों की राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाएं उमड़ती-घुमड़ती रहीं और बारम्बार गठबंधन के, मोर्चे बनाये जाने के असफल प्रयोग दोहराए जाते रहे. वर्ष १९८९ में बना राष्ट्रीय मोर्चा हो अथवा १९९६ में बना संयुक्त मोर्चा या फिर वर्ष २००८ और वर्ष २००९ में तीसरा मोर्चा बनाये जाने की कवायद, सभी में एक अनिवार्य पक्ष सामने आता दिखा है और वो था राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा. और यही कारण रहा कि सभी प्रयास बुरी तरह से असफल सिद्ध हुए और मतदाता, देश की जनता ने खुद को ठगा सा महसूस किया. वर्ष १९८९ में बने राष्ट्रीय मोर्चा का समापन वर्ष १९९१ में ही हो गया और सफलता के रूप में दो प्रधानमंत्री देश को दे गया. इसी तरह वर्ष १९९६ में बने संयुक्त मोर्चा में सात दलों की सहभागिता रही और अंततः वर्ष १९९८ में पूर्णतः भागते समय इस मोर्चे ने भी देश को दो प्रधानमंत्री दे दिए. इसके बाद के दोनों प्रयासों में न कोई स्वरूप बन पाया और न ही किसी को प्रधानमंत्री बनाया जा सका. वर्तमान महाविलय का भविष्य अतीत में बने मोर्चों की छाया में देखा जा सकता है. दो-दो वर्ष के प्राथमिक मोर्चे और देश को दोनों बार दो-दो प्रधानमंत्रियों की सौगात. अब जबकि इस महाविलय में सभी छह सदस्य सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री पद की तरफ ही देखने में लगे हैं तो इसके भविष्य का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है.
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इस विलय का भविष्य क्या होगा, कालावधि कितने माह, वर्ष की होगी ये कहना अभी जल्दबाजी ही होगी क्योंकि चुनाव पूर्व तक इन सभी को शांति धारण किये रहने की मजबूरी होगी. इस बात से ये परिवार भली-भांति परिचित है कि प्रधानमंत्री पद के लिए तो इनमें से किसी की दाल नहीं गलनी है, ऐसे में ये राज्यों के चुनावों में अपना प्रभाव जमाकर वहाँ सत्ता सुख पाने के प्रयास में रहेंगे. इसके साथ-साथ यदि ये परिवार राज्यसभा के गैर-भाजपाई, गैर-कांग्रेसी दलों को एकजुट करने में सफल हो गए तो संभव है कि वहाँ से स्वार्थपरक राजनीति का नया खेल खेल सकते हैं. ये स्पष्ट है कि इनका विलय स्वार्थसिद्धि हेतु सामने आया है ऐसे में देशहित की कीमत पर ये परिवार कुछ भी कर सकता है, बशर्ते उसके एवज में इनको कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में सत्ता-सुख हासिल हो रहा हो. आइये देखते हैं कि इस परिवार की एकता कितने दिन तक निर्विवाद रूप से बनी रहती है.

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21 अगस्त 2014

बच्चों के साथ घुलमिल कर तो देखें



कई बार अबोल की स्थिति होती है; सब कुछ सहज होते हुए भी असहज सा लगता है; कहने की स्थिति के बाद भी कुछ न कहने का मन करता है; भीड़ में होने के बाद भी अकेलापन महसूस होता है; बहुत-बहुत व्यस्त होने के बाद भी खालीपन का एहसास बना रहता है. कुछ लोगों की नजर में ये मानसिक अवसाद की स्थिति होती है तो कुछ लोग इसे नैराश्य का भाव कहते हैं. कई लोगों के अनुसार ये विभ्रम की स्थिति है तो कुछ लोगों के मुताबिक किसी बीमारी के लक्षण. कुछ भी हो मगर ऐसा होना सही नहीं है और विडंबना देखिये कि हमारी आज के युवा, किशोरवय और बचपन की मानसिकता कुछ ऐसी ही दिखती है. सभी अलग-अलग तरह की अपेक्षाओं के बोझ से दबे अपनी उम्र से अधिक बड़े बनने-दिखने का प्रयास कर रहे हैं.
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इस स्थिति को गौर किया जाना चाहिए, आज माता-पिता और बच्चों के बीच मित्रवत व्यवहार देखने को मिल रहा है. अभिभावकों में अपने बच्चों की समस्याओं-परेशानियों को जानने-समझने की मानसिकता भी दिख रही है. इसके बाद भी बच्चों में हताशा का भाव है, परिवार से भागने का भाव है, अपने माता-पिता के प्रति उदासीनता का भाव है, उनके प्रति बेरुखी का भाव है. शायद यही कारण है कि बहुत बड़ी संख्या में ये बच्चे अपराध, आत्महत्या, नशे आदि की गिरफ्त में आते जा रहे हैं. हमें जागना होगा, माता-पिता को समझना होगा कि मंहगी-मंहगी बाइक देकर, मोटा-मोटा जेबखर्च देकर, कुछ देर बैठ कर उनसे मित्रवत बात करके बच्चों की मनोदशा को समझा नहीं जा सकता है.  बच्चों के साथ भरपूर समय गुजारने की जरूरत है, उनको ये एहसास करवाने की जरूरत है कि वे उनसे दूर नहीं हैं. हम सभी को समझना होगा कि बच्चे भविष्य की धरोहर हैं और उन्हीं के कांधों पर समाज निर्माण की जिम्मेवारी है. 
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आइये हम अपनी व्यस्तता में से कुछ समय निकालें और अपने युवाओं के, किशोरों के, बच्चों के दिल में बैठने का, उनके साथ घुलने-मिलने का कार्य करें. आप भी बच्चे बनकर देखिये, आपके बच्चे तो प्रसन्न होंगे ही आपको भी अच्छा लगेगा. करके देखिये ऐसा....