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10 मार्च 2026

अमेरिका का बड़बोलापन

पिछले दिनों अमेरिका की वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के एक बयान के बाद भारतीय समाज में हलचल सी मच गई. इसमें न केवल राजनीति बल्कि बौद्धिक वर्ग, मीडिया, सोशल मीडिया, आमजनमानस चर्चा में शामिल हुआ. इस चर्चा में केन्द्र सरकार को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जाने लगा. ईरान के साथ चल रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी वित्त मंत्री ने बयान जारी करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को तीस दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी है. इस बयान के आते ही देश में केन्द्र सरकार को कमजोर बताया जाने लगा. विपक्षी दलों द्वारा पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सरेंडर नरेंदर का नारा उछाला जा रहा था, इस बयान से इस नारे को और हवा मिली.

 

यहाँ एक बात समझने वाली है कि राजनीतिज्ञों का कार्य हमेशा से किसी भी तरह के बयानों को, कार्यों को, आँकड़ों को, जानकारियों को अपने मनमुताबिक तोड़-मरोड़ करके उसे जनता के बीच अपने लाभ के सन्दर्भ में उछालना रहा है. इस स्थिति से परिचित होने के बाद भी बौद्धिक वर्ग से जुड़े हुए लोगों द्वारा, मीडिया से जुड़े संस्थानों, व्यक्तियों ने, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने बिना जाने-समझे, बिना जाँचे-परखे अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान पर सरकार को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान को परमसत्य मानने से पहले उसके मूल में छिपे सन्दर्भ को भी समझ लिया होता तो शायद सच्चाई समझ आती. उनके इस बयान के पीछे कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर टैरिफ का लगाया जाना मुख्य बिन्दु रहा. दरअसल ट्रम्प ने भारत पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जो समूचे देशों पर लगाये गए टैरिफ से कहीं ज्यादा था. इसके लगाये जाने की जो वजह अमेरिका द्वारा बताई गई थी, उसने अमेरिकी वित्त मंत्री के हालिया बयान को मजबूती प्रदान की. गत वर्ष अगस्त माह में अमेरिका द्वारा भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाए जाने का कारण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से तेल लेना बताया गया. अमेरिका का मानना है कि ऐसा करके भारत रूस की आर्थिक मदद कर रहा है.

 

ऐसे में एकबारगी अमेरिका के बयानों पर ध्यान देने के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों, उनके कार्यों का आकलन ही कर लिया जाता तो भी भारत को रूस से तेल लेने के लिए तीस दिनों की अनुमति दिए जाने के सन्दर्भ में स्थिति स्पष्ट हो जाती. ऑपरेशन सिन्दूर के समय में भी ट्रम्प के बयानों में बार-बार जोर दिया जाता रहा कि उनकी कोशिशों से ही युद्ध रुका. इस तरह की बयानबाजी के बाद देश की केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया. किसी आधिकारिक साईट पर जाकर सच देखने का प्रयास नहीं किया गया. ट्रम्प के ऐसे बयानों के बाद भी हमारे देश के अनेक सैन्य अधिकारियों, विशेषज्ञों के लगातार बयान आते रहे कि परमाणु हथियारों से सम्बंधित सुरक्षा को देखते हुए भारत द्वारा युद्ध-विराम जैसा कदम उठाया गया, न कि अमेरिका के दबाव में.

 

इन बयानों की सत्यता उस समय और पुख्ता होती है जबकि स्टेट ऑफ द यूनियन के सम्बोधन में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को रोककर तीन करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई थी. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3.5 करोड़ लोग मारे जाते. ट्रम्प ने अकेले ऑपरेशन सिन्दूर को रुकवाने की बात नहीं की बल्कि उनके द्वारा आठ युद्ध रुकवाने का भी दावा किया गया. देश के तमाम बयानवीर अभी ट्रम्प द्वारा तेल लेने की अनुमति सम्बन्धी कथित बयान पर अटके हुए हैं, उधर ट्रम्प ने अपने बड़बोलेपन में एक और विवादित बयान मीडिया के सामने सरका दिया. उन्होंने कहा कि उनके सैन्य अधिकारियों को ईरान के जहाजों को डुबोने में मजा आ रहा है. सोचा जा सकता है कि ट्रम्प किस हद तक अमानवीय होकर अपने बयानों को, अपने क़दमों को उठा रहे हैं.

 

ट्रम्प के ऐसे बयान उनको शांति का नोबेल पुरस्कार न मिल पाने की हताशा है. युद्ध उनके द्वारा महज अपनी हताशा को छिपाने और खुद को सर्वशक्तिशाली दिखाने के लिए किये जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन का भले ही साथ देना रहा हो मगर कूटनीतिज्ञ रूप से जेलेंस्की के साथ अमेरिका में किया गया बर्ताव उनकी अगम्भीरता को दर्शाता है. अब जबकि रूस से तेल लेने को अमेरिका द्वारा कथित अनुमति की चर्चा चरम पर है, उसी समय अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट बयान देते हैं कि पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को देखते हुए वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने हेतु अमेरिका ने भारत से रूस से तेल खरीदने का आग्रह किया था. सीएनएन को दिए गए साक्षात्कार में ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ मिलकर भारतीय अधिकारियों से बातचीत कर समुद्र में पहले से उपस्थित रूसी कार्गो को भारतीय रिफाइनरियों में उतार लेने का आग्रह किया.

 

सोचने वाली बात है कि जो अमेरिका दो-चार दिन पहले भारत को अनुमति देने जैसी शब्दावली का प्रयोग कर रहा था, वही अब आग्रह जैसी भाषा बोल रहा है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने दूसरे कार्यकाल में बड़बोलेपन का ही उदाहरण पेश किया है, वो चाहे वैश्विक युद्ध रुकवाने की बात हो, नोबेल शांति पुरस्कार हो, टैरिफ हो या कि अब तेल खरीदने वाली बात हो. ऐसा लगता है कि ट्रम्प भली-भांति समझ चुके हैं कि भारत का विपक्ष इस स्थिति में है कि वह किसी भी छोटी से छोटी बात, झूठी बात के लिए केन्द्र सरकार का विरोध व्यापक स्तर पर करना शुरू कर देता है. इस मानसिकता को समझते हुए भारत को तेल खरीदे जाने की अनुमति देने जैसा बयान दिया. ये और बात है कि मुँह की खाने के बाद अमेरिका को अपने बयान से उलटना पड़ा. काश! ये बात भारतीय विपक्षी दल समझ पाता. 


09 अगस्त 2025

ऑपरेशन सिन्दूर पर संसद में चर्चा

ऑपरेशन सिन्दूर पर संसद में क्या चर्चा हुई, क्या बहस हुई इसे न देखा और न ही सुना क्योंकि पिछले सप्ताह की हरकतें देखकर समझ आ गया था कि चर्चा तो बस एक बहाना है, असल में लाइव टीवी के माध्यम से विपक्ष को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं को, अपने समर्थकों को ये दिखाना है कि उनका प्रतिनिधि कितने चिल्ला-चिल्ला के संसद में बहस कर लेता है. ऑपरेशन सिन्दूर, जो लगभग साफ़-साफ़ तस्वीर दिखा रहा है, उसके लिए बहस-चर्चा करने वाले विपक्ष ने कभी भी कुछ विषयों पर खुली बहस-चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटाई.

 

==>> नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से सम्बंधित कई-कई आयोगों के बनाये जाने के बाद भी आज के विपक्ष ने संसद में इसकी चर्चा करवाने की हिम्मत न जुटाई.

 

==>> देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में मृत्यु होना आज तक संदेहास्पद है मगर इस पर संसद में चर्चा करवाने के लिए आज के विपक्ष ने कभी जोर न लगाया.

 

==>> देश की एक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही आवास पर, उनके ही सुरक्षा गार्डों द्वारा कर दी गई. सुरक्षा की दृष्टि से आजतक की सबसे बड़ी चूक पर कांग्रेस ने, आज के विपक्ष ने कभी संसद में बहस करवाने के बारे में विचार नहीं किया.

 

==>> देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होना भी सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चूक कही जाएगी मगर इस पर कांग्रेस या आज के विपक्ष ने कभी संसद में चर्चा करवाए जाने पर संसद की कार्यवाही को बाधित नहीं किया.

 

क्या कभी इन घटनाओं पर विचार किया जायेगा? क्या इनके लिए संसद में बहस की कोई गुंजाइश नहीं? क्या आज के विपक्ष की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो इन घटनाओं की सत्यता को देश की जनता के सामने संसद के माध्यम से लाये? आज का विपक्ष भी कभी सरकार में था. इन घटनाओं से मुँह मोड़ लेने से और सिर्फ शोर मचाने की मानसिकता से संसद की कार्यवाही को बाधित कर देने से वे लोग अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते.


26 जुलाई 2025

ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद

संसद की कार्यवाही और ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद.

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संसद में लगातार बहस मची हुई है ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा किये जाने की. इस ऑपरेशन के बारे में सबकुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है, उसके लिए बहस-चर्चा करने वाले विपक्ष ने कभी भी कुछ विषयों पर खुली बहस-चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटाई. ऐसे विषयों की सूची लम्बी हो सकती है किन्तु संक्षेप में इसे निम्न बिन्दुओं के सापेक्ष समझा जा सकता है. काश! सदन के अन्दर बैठे जनप्रतिनिधियों ने कभी इन विषयों पर भी चर्चा करने पर विचार किया होता.

 

==>> नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से सम्बंधित कई-कई आयोगों के बनाये जाने के बाद भी आज के विपक्ष ने संसद में इसकी चर्चा करवाने की हिम्मत न जुटाई.

 

==>> देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में मृत्यु होना आज तक संदेहास्पद है मगर इस पर संसद में चर्चा करवाने के लिए आज के विपक्ष ने कभी जोर न लगाया.

 

==>> देश की एक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही आवास पर, उनके ही सुरक्षा गार्डों द्वारा कर दी गई. सुरक्षा की दृष्टि से आजतक की सबसे बड़ी चूक पर कांग्रेस ने, आज के विपक्ष ने कभी संसद में बहस करवाने के बारे में विचार नहीं किया.

 

==>> देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होना भी सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चूक कही जाएगी मगर इस पर कांग्रेस या आज के विपक्ष ने कभी संसद में चर्चा करवाए जाने पर संसद की कार्यवाही को बाधित नहीं किया.

 

क्या कभी इन घटनाओं पर विचार किया जायेगा? क्या इनके लिए संसद में बहस की कोई गुंजाइश नहीं? क्या आज के विपक्ष की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो इन घटनाओं की सत्यता को देश की जनता के सामने संसद के माध्यम से लायेआज का विपक्ष भी कभी सरकार में था. इन घटनाओं से मुँह मोड़ लेने से और सिर्फ शोर मचाने की मानसिकता से संसद की कार्यवाही को बाधित कर देने से वे लोग अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते.

20 मई 2025

सकारात्मक माहौल में नकारात्मक राजनीति

किसी भी देश के राजनैतिक विकास के लिए उसके सत्ता पक्ष और विपक्ष का समन्वित स्वरूप महत्त्वपूर्ण होता है. यह तब और भी विशेष हो जाती है जबकि देश में कोई संकट की स्थिति हो. आवश्यक नहीं कि संकट सीमा-पार से ही उत्पन्न हो, देश की आंतरिक स्थिति, प्राकृतिक स्थिति के कारण भी संकट का सामना करना पड़ता है. ऐसी किसी भी स्थिति में, आपातकाल में यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष में समन्वय रहता है, उनमें सामंजस्य की भावना हो तो समाधान सहजता से हो जाता है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में चारों तरफ शांतिपूर्ण माहौल के बाद भी अशांति लगती है. प्रशासनिक सजगता के बाद भी अराजक तत्त्वों की हलचल दिखती है.

 

विगत दिनों देश का सामना एक असामान्य घटना से हुआ. घटना की प्रतिक्रिया में सरकार ने भी कदम उठाया. आतंकी घटना और उसके बाद ऑपरेशन सिन्दूर की समयावधि में ऐसा लगा जैसे सत्ता पक्ष और विपक्ष में तालमेल बना है. एकाधिक बयानबाजियों को छोड़ दें तो प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से भी आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाही की खुली छूट, सरकार को पूर्ण समर्थन जैसे सहयोगात्मक बयानों का आना हुआ. ऑपरेशन सिन्दूर सफलतापूर्वक अपनी पूर्णता को प्राप्त होता उसके पहले ही युद्ध-विराम को अपनाना पड़ा. यह निर्णय देशवासियों को किसी भी कीमत पर पसंद नहीं आया. पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की कार्यवाही का नागरिकों ने जितने खुले दिल से समर्थन किया, युद्द-विराम पर उतने खुले रूप में सरकार का विरोध किया.

 

यहीं देश के सत्ता-पक्ष और विपक्ष का चेहरा देखने का अवसर भी मिला. केन्द्र सरकार को किन कारणों, किन कूटनीतिक स्थितियों के चलते युद्ध-विराम पर सहमत होना पड़ा, ये अलग विषय है किन्तु इसके बाद भी सरकार के अडिग नजरिये में, कठोर निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आया. प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पाकिस्तान सहित सकल विश्व को स्पष्ट रूप से सन्देश दिया गया कि पाकिस्तान की परमाणु ब्लैकमेलिंग को सहन नहीं किया जायेगा. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी कठोर लहजे में कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर तो ट्रेलर था, पिक्चर अभी बाकी है. वैचारिक रूप से अपनी मनोवैज्ञानिक बढ़त के साथ सत्ता पक्ष कूटनीतिक, रणनीतिक रूप से तत्पर था किन्तु विपक्ष अपने पुराने रंग-ढंग में आने लगा.

 



पहलगाम आतंकी हमले के पहले भी कई बार देश ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के दंश को सहा है. हर बार देशवासियों की माँग होती कि पाकिस्तान पर हमला कर वहाँ के आतंकी ठिकाने ध्वस्त कर दिए जायें. पाकिस्तान के साथ कई बार युद्ध होने, संघर्ष की स्थिति होने पर देश में उपद्रव होने की आशंका रहती. आतंकी स्लीपर सेल द्वारा गृह-युद्ध जैसे हालात पैदा किए जाने का भय रहता. ऑपरेशन सिन्दूर के बाद सरकार ने पूरी सजगता दिखाई. युद्ध-विराम पर सहमति के बाद भी कार्यवाही को विराम नहीं दिया. उसके द्वारा कूटनीति को धार देते हुए न केवल देश में बल्कि बाहर भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया. वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान के नापाक इरादे बताने के लिए, ऑपरेशन सिन्दूर की आवश्यकता के बारे में तथा आतंकवाद के विरुद्ध भारत के ठोस और कठोर नजरिये के बारे में सरकार द्वारा अभूतपूर्व कूटनीति तैयार की गई. केन्द्र सरकार ने आक्रामक कूटनीतिक पहल करते हुए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल बनाये जो आगामी कुछ सप्ताहों में अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र, यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों का भ्रमण करेंगे. इसका उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ सामंजस्य स्थापित करना, पाकिस्तान की आतंकवाद में भूमिका को वैश्विक मंच पर उजागर करना है.

 

एक तरफ सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की जानकारी देने वैश्विक यात्रा की तैयारी में है, तब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा विदेशमंत्री एस. जयशंकर पर ऑपरेशन सिन्दूर की जानकारी पाकिस्तान को पहले से देने का आरोप तथा वायुसेना के नष्ट हुए विमानों की संख्या माँगना समझ से परे है. राहुल गांधी के इस बयान को पाकिस्तान में भारत विरोधी वातावरण बनाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है. यदि राहुल गांधी का केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति नजरिये का, बयानों का इतिहास देखें तो यह पहली घटना नहीं है जबकि उनके नकारात्मक विचार सार्वजनिक हुए हैं. उनके द्वारा ऐसा किया जाना आम बात है, बिना यह विचारे कि देश-हित में इन बयानों का क्या प्रभाव पड़ेगा. देखा जाये तो राहुल गांधी का यह बयान देश-विरोधी ताकतों के लिए उत्प्रेरक का कार्य करेगा. संवेदनशील समय में ऐसा बयान देने का कारण तो वही बता सकेंगे किन्तु निश्चित ही ऐसे बयान देश की छवि को नुकसान पहुँचाते हैं. प्रतिनिधिमंडल के लिए कांग्रेस प्रस्तावित चार नामों से इतर शशि थरूर का नाम केन्द्र सरकार द्वारा न केवल प्रतिनिधिमंडल में शामिल करना बल्कि एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व देना कांग्रेस को कतई पसंद नहीं आया. ऑपरेशन सिन्दूर पर केन्द्र सरकार की प्रशंसा करने के लिए कांग्रेस उनसे नाराज चल रही है. ऐसा समझा जा रहा है कि राहुल गांधी का हालिया आरोप इसी की परिणति है.

 

कुछ भी हो मगर ऐसे समय में जबकि पूरा देश आतंकियों के सफाए के लिए एकजुट है; केन्द्र सरकार द्वारा न केवल आंतरिक रूप से बल्कि सीमा पार भी राजनैतिक-कूटनीतिक रूप से सशक्त और सकारात्मक कदम उठा रखे हैं; पड़ोस की भू-राजनीतिक स्थितियों में उथल-पुथल होने के बाद भी देश में स्थिरता वाले माहौल में ऐसे बयान नकारात्मकता पैदा करते हैं. वैश्विक रूप से अपनी सैन्य शक्ति की सशक्तता, निर्णयों की गम्भीरता, कूटनीति की सक्षमता की विकास-यात्रा में यही नकारात्मकता अवरोधक का कार्य करती है. निश्चित रूप से ऐसे बयान न तो परिपक्वता की पहचान कराते हैं और न ही गम्भीरता की.


10 मई 2025

क्रोध-रोष, जोश-प्रतिशोध

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. दिन बीतते जा रहे थे, सरकार की चुप्पी बयानों के सन्दर्भ में ही टूट रही थी, मीडिया की तरफ से लगातार कुछ न कुछ बड़ा होने जैसा संकेत दिया जाता मगर प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. पहलगाम हत्याकांड के बाद आतंकवादियों, पाकिस्तान के विरुद्ध उपजा क्रोध अब सरकार की ख़ामोशी, कदमों को देखते हुए रोष में बदलने लगा था. जनसामान्य की एकराय सिर्फ और सिर्फ युद्ध जैसा कठोर कदम उठाने की थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक भी पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

केन्द्र सरकार ने पहलगाम घटना के बाद से ही अपनी सक्रियता शुरू कर दी थी. गृह मंत्रालय के आदेश पर एनआईए ने हमले की जाँच आरम्भ की. सिन्धु जल समझौता अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित कर दिया गया. पाकिस्तान से युद्ध होने, तनाव की स्थितियों के बाद भी इस समझौते को कभी निलम्बित नहीं किया गया था. यह पहली बार है जबकि भारत ने इसको निलम्बित किया. पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को ‘युद्ध की कार्यवाई बताया. पाकिस्तानी नागरिकों के सभी प्रकार के वीजा रद्द करते हुए उन्हें तत्काल वापसी के आदेश दिए गए. इसी के साथ इस्लामाबाद में भारतीय मिशन और नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या को कम कर दिया गया. पाकिस्तानी उच्चायोग के रक्षा, नौसेना और वायुसेना सलाहकारों को एक सप्ताह में भारत छोड़ने का आदेश भी दिया गया. सेना के सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिए गए. केन्द्र सरकार के ऐसे क़दमों, निर्णयों से स्पष्ट संकेत मिला कि इस बार वह शांत बैठने के मूड में नहीं है.

 



केन्द्र सरकार स्वयं तो कूटनीतिक, राजनैतिक निर्णय लेते हुए काम कर रही थी साथ ही सैन्य गतिविधियों को भी सक्रियता प्रदान कर रही थी. सरकार की तरफ से लगातार बैठकों के द्वारा सेना को उनकी सैन्य गतिविधियों के लिए खुली छूट देने जैसा आक्रामक एवं विश्वासपरक कदम उठाकर दर्शाया गया कि सरकार सुस्त अथवा खामोश नहीं है. भारतीय वायुसेना द्वारा सेंट्रल सेक्टर में एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया गया, जिसमें पहाड़ी और जमीनी लक्ष्यों पर हवाई हमलों का अभ्यास किया गया. इसे 'आक्रमण' नाम दिया गया जिससे इसका उद्देश्‍य स्पष्ट हो जाता है. वायु सेना के अलावा नौसेना ने अरब सागर में अपनी गतिविधियों को बढ़ा दिया था. युद्धपोतों को हाई अलर्ट पर रख कर कई एंटी-शिप और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया गया.  

 

इसके बाद भी जनाक्रोश कम नहीं हो रहा था. जनमानस पाकिस्तान के विरुद्ध खुले रूप में सैन्य गतिविधि को देखना चाहता था. दरअसल जनता का मनोविज्ञान तत्काल कार्यवाही करने का, तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति, राजनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट किसी भी सरकार के लिए युद्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं स्वीकारा जाता है. युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष वाली स्थिति में ले जाना होता है. हम सभी वर्तमान में वैश्विक स्तर पर कई युद्ध देख रहे हैं, जो लम्बे समय के बाद भी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं. भारत सरकार की मंशा भी कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है. सम्भव है कि ऐसा कुछ विचार करके केन्द्र सरकार किसी सटीक कदम को उठाने की तैयारियों में सक्रिय हो.

 

ऐसा कुछ उस समय समझ में भी आया जबकि केन्द्र की तरफ से युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को आगाह किया गया. एक निश्चित तिथि पर देश में मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट के द्वारा युद्ध से निपटने के लिए जन-जागरूकता को बढ़ाने वाले दिशा-निर्देश जारी किये गए. इधर जनमानस में ब्लैक आउट को लेकर, मॉक ड्रिल को लेकर सक्रियता, सजगता देखने को मिल रही थी उधर सरकार कुछ बड़ा करने के मूड में थी. केन्द्र सरकार द्वारा अप्रत्याशित कदम उठाते हुए मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट वाले दिन से पहले ही पाकिस्तान और पीओके में मिसाइल स्ट्राइक करके पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की कमर तोड़ दी.

 

भारत की तीनों सेनाओं ने अपनी संयुक्त शक्ति के साथ आधी रात के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के द्वारा पाकिस्तान और पीओके स्थित आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य हमले किये. ख़ुफ़िया जानकारियों के आधार पर चिन्हित 21 आतंकी ठिकानों में से अभी 09 ठिकानों को सेना ने अपना निशाना बनाया है. इनमें पाँच केन्द्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में और चार पाकिस्तान में स्थित थे. इन हमलों में विशेष बात यह रही कि पाकिस्तान के किसी भी सैन्य ठिकाने को और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया गया. सेना का निशाना पूरी तरह आतंकी केन्द्रित रहा, इसमें लश्कर-ए-तैयबा, टीआरएफ सहित कई आतंकी ठिकाने शामिल रहे. बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद), मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय), टेहड़ा कलां (जैश-ए-मोहम्मद), सियालकोट (हिजबुल मुजाहिदीन), बरनाला (लश्कर-ए-तैयबा), कोटली (जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन का प्रशिक्षण शिविर), मुजफ्फराबाद (लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी शिविर और जैश-ए-मोहम्मद का संचालन केन्द्र) इन हमलों में पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए.

 

केन्द्र सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. यह स्पष्ट सन्देश है कि आतंकी संगठनों का, उनके ठिकानों का सफाया किये बिना भारतीय सेना रुकने वाली नहीं है. अचम्भित करने वाली भारत की सैन्य कार्रवाई में दर्जनों आतंकियों और उनके करीबियों के मारे जाने की पुष्टि खुद पाकिस्तान ने की है. केन्द्र सरकार द्वारा उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक तथा पुलवामा अटैक के बाद की एयर स्ट्राइक के बाद वर्तमान मिसाइल स्ट्राइक के द्वारा पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दिया गया है कि भारत अब पाकिस्तानी आतंकवाद का घिनौना खेल बर्दाश्त नहीं करने वाला. निश्चित ही ऐसा दृढ़ विश्वास और आक्रामक रणनीति जनाक्रोश को समाप्त करेगी साथ ही आतंकियों का भी सर्वनाश करेगी.  


07 मई 2025

ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने की शुरुआत

आज सुबह आँख खुली. जब मोबाइल पर आये हुए संदेशों को देखा तो सबसे पहले ये चित्र नजर आया. अभिन्न मित्र द्वारा भोर में भेजे गए इस चित्र से समझ आया कि किस तरह की सक्रियता रही होगी उच्च स्तर पर. 


(पहले चित्र देखिये...)



मन प्रसन्न हो गया था ये चित्र देख कर. आखिर पहलगाम आतंकी हत्याकांड में मिली चुनौती को जवाब देने का आरम्भ हो चुका था. इस चित्र के बाद जब सोशल मीडिया पर दस्तक दी गई तो चारों तरफ यही बम-बम मची हुई थी. सभी जगह से ऑपरेशन सिन्दूर पर ही गर्व किया जा रहा था. 


इसी उत्साह, उमंग, जोश ने शांत नहीं बैठने दिया. सोशल मीडिया पर कुछ सन्देश लिखित रूप में और कुछ चित्र के रूप में प्रसारित किये जाते रहे. उनकी एक झलक, आज की पोस्ट के रूप में....


Operation SINDOOR का एक अर्थ ये भी है...

ऑपरेशन SIN दूर

😊

#छीछालेदर_रस से खात्मा हो जाएगा इस SIN का.

+

अरे मोदी जी, थोड़ा सा पानी छोड़ दीजिए. बेचारे आग बुझाने से पहले पिछवाड़ा धो लें.

😜

ग़ज़ब #छीछालेदर_रस लपेटे दिख रहे टीवी पर

+

एक साथ दो-दो ऑपरेशन की जबर लहर चली,

पाकिस्तान में ऑपरेशन सिन्दूर, देश में ऑपरेशन फटी.

😜

#दुनाली कहरदार

+

भारत में सायरन बजेगा बोल के

पाकिस्तान का बैंड बजाया पेल के.

😜😆

#दुनाली ऑपरेशन सिन्दूर भरी

+

चिल्ला-चिल्ला के यही गा रहे.....

भाग डी के बोस... डी के बोस....

#छीछालेदर_रस

😜😆😜😆

(स्याले बोन चिड़ी के)

+

अंधियारे में उजियारा लाने वाली

सेना हिन्द की है,

दुश्मन को ठिकाने लगाने वाली

सेना हिन्द की है,

आघात सहकर खामोश बैठना

नहीं है अपनी फितरत,

ख़ामोशी को विस्फोट बनाने वाली

सेना हिन्द की है.

+

कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

07.05.2025

+

ये कटपीस क्या चलायेंगे परमाणु बम,

भारतीय सेना ने सुलगा दिया इनका बम.

😜😜

बोल बम #दुनाली भारतीय सैन्य शक्ति की

+

यार, जे तो रोमंटी भई, मॉक ड्रिल की कहके तुमने तो रगड़ दओ.

अब बिलबिलाने फिर रये दोऊ तरफ़ के खजैले सुअर


कुछ चित्रों पर भी ध्यान दीजियेगा. 






(पंक्तियाँ कवयित्री अनीता सिंह की)