आधुनिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आधुनिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

30 जून 2026

व्यक्तिगत स्वतंत्रता या नैतिक पतन

वर्तमान में भारतीय समाज एक तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि इस पर विचार करने की आवश्यकता है. आधुनिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रगतिशीलता आदि का नाम लेकर वर्तमान समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ नैतिक मूल्यों का पतन ही दिखता है. हास्य के नाम पर, मनोरंजन के रूप में अमर्यादित आचरण को दर्शाया जा रहा है. किसी कॉमेडी शो में एक युवक द्वारा अपनी महिला मित्र को बिरयानी खिलाने के बदले कीमत वसूलने की बात करना, किसी अन्य मंच से एक डॉक्टर युवती द्वारा शवों के साथ संवेदनहीन मजाक करने की स्वीकारोक्ति, किसी और कार्यक्रम में हास्य के नाम पर अपने माता-पिता के अंतरंग पलों में शामिल होने की बात कहना विवेकशून्यता को दर्शाता है. यह स्थिति इसलिए और भी भयावह लगती है क्योंकि इस प्रकार की फूहड़ता, अश्लीलता सार्वजनिक रूप से परोसी जा रही है और समाज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग खुलकर तालियाँ बजाते हुए खुद को कूल, प्रगतिशील साबित कर रहा है.

 

देखा जाये तो इस तरह की नैतिक गिरावट केवल मनोरंजन के मंचों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है. हाल ही में किशोरों और युवाओं के उजागर हुए चैट इसकी अलग ही कहानी कहते हैं. इनमें सहपाठी लड़कियों और महिलाओं के बारे में जिस स्तर की अश्लील, अमर्यादित बातें की गई हैं, उन्हें कोई भी सभ्य व्यक्ति अकेले में पढ़ते हुए भी शर्म से पानी-पानी हो जाए. यहाँ चिंताजनक यह है कि इस विकृत संवाद में केवल लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियाँ भी समान रूप से शामिल हैं. यह इस बात का संकेत है कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं से आत्मनियंत्रण, मर्यादा, शालीनता को पूरी तरह से छीन लिया है. इसी का दुष्परिणाम है कि इंटरनेट पर आए दिन निजी पलों के, अन्तरंग सम्बन्धों के वीडियो लीक तो होते ही हैं, उनको देखने की चाह रखने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी होती है. यह समाज में बढ़ती वासना, अश्लीलता का परिचायक है.

 

समाज में फैलती जा रही इस विभीषिका ने केवल युवा-वर्ग को ही अपनी गिरफ्त्त में नहीं लिया है बल्कि इसने  पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. पारिवारिक रिश्ते इसी विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ रहे हैं. रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करने वाली घटनाएँ अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं. एक युवक का अपनी ही सास से विवाह करना, किसी युवक द्वारा अपनी भाभी को पाने की हवस में अपने ही मासूम भतीजे की बेरहमी से हत्या कर देना, विवाहेतर सम्बन्धों की खुलेआम स्वीकार्यता और अपने जीवन-साथी की हत्या करवा देना दिखाता है कि वासना ने इंसान को पथभ्रष्ट कर दिया है. रिश्तों की इस संवेदनहीनता का वीभत्स रूप तब दिखता है जब एक माँ अपने शारीरिक सम्बन्धों में बाधक बनते अपने ही बच्चे के हाथ-पैर तोड़े जाने और उसकी जान लिए जाने को मूकदर्शक बनकर देखती रहती है.

 

सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि आखिर समाज इस स्थिति पर पहुँचा कैसे? यह मानसिक पतन, सामाजिक विकृति एकाएक हो नहीं ही आई होगी. आधुनिकता के झूठे मुखौटे, सूडो-फेमिनिज्म, अत्यधिक व्यक्तिवाद, पारम्परिक परिवार व्यवस्था का अंधविरोध, विवाह संस्था के ऊपर दैहिक सम्बन्धों को वरीयता, खुलेपन की आड़ में यौन-सम्बन्धों को अपनाने आदि ने इस पतन की नींव रखी है. व्यक्ति की असीमित, अनियंत्रित स्वतंत्रता ने सामाजिक ढाँचे को ही खोखला कर दिया है. रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, लिव-इन, फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स आदि ने मूलतः व्याभिचार, अनैतिकता, अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दे दी है. इससे धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था बिखरने लगी और नई पीढ़ी संस्कार, नैतिकता, मर्यादा आदि से मुक्त होने लगी. इस भटकाव का असर यह हुआ है कि आज के युवाओं को यह अहसास ही नहीं कि वे कुछ गलत कर रहे हैं. एक साथ कई जगह सम्बन्ध बनाना, बार-बार साथी बदलना, किसी भी एक व्यक्ति या संस्था के प्रति वफादार न रहना, मर्यादा, शालीनता की सीमाओं को पार करना अब उनकी नजर में कोई गलती नहीं है. इसके उलट उन्होंने संस्कार, मर्यादा, शालीनता आदि को ही मज़ाक बना दिया है; इनका पालन करने वाले को पिछड़ा, दकियानूसी बताया है. समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इस नकारात्मकता का विरोध करने के बजाय चुप्पी साधे रखी है परिणामतः सार्वजनिक मंचों से फूहड़ता, अश्लीलता का सहज स्वरूप हमारे घर-परिवारों तक आ चुका है.

 

हम सभी को यह समझना होगा कि उच्छ्रंखल, अनुशासनहीन, अमर्यादित आचरण का परिणाम सुखद नहीं होने वाला है. हमारे देश की सामाजिक संरचना पश्चिमी देशों जैसी नहीं है बल्कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बिना आत्म-अनुशासन के, बिना पारिवारिक सहयोग के, बिना सुदृढ़ नैतिक मूल्यों के समाज को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रख पाना पूरी तरह संभव नहीं है. पश्चिमी सभ्यताओं की नक़ल के नाम पर हमारे समाज में फूहड़ता ही फैलती जा रही है, उन देशों जैसा अनुशासन, उनके जैसी जीवन-शैली, उनके जैसा सिविक सेंस हमारे समाज में कदाचित देखने को नहीं मिलता है. सोचने वाली बात है कि जब समाज से शर्म, मर्यादा, शालीनता, संस्कार, सम्मान आदि पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे तो समाज में अपराध, मानसिक अवसाद, अविश्वास, अश्लीलता, फूहड़ता का ही साम्राज्य दिखाई देगा. यदि हम आज भी बिना सँभले आधुनिकता के नाम पर ऐसे ही आत्मघाती मार्ग पर चलते रहे तो आने वाले समय में हमें सामाजिक और मानवीय विनाश का सामना करना पड़ेगा, यह समय जागने का, अपनी जड़ों की ओर लौटने का, मर्यादाओं को पुनः स्थापित करने का है.


11 दिसंबर 2018

बढ़ता अकेलापन, बढ़ती आत्महत्या


एक कार्यक्रम में एक विशेषज्ञ युवाओं और किशोरों से सम्बंधित समस्या पर प्रकाश डाल रहे थे. बातचीत के दौरान उन्होंने आत्महत्या के दो बिंदु बताये. उनके द्वारा बताई चंद बातों का सार ये निकलता है कि एक स्थिति  में आत्महत्या करने वाला व्यक्ति इसकी पूरी तैयारी कर चुका होता है, बस वह समय का इंतजार कर रहा होता है. दूसरी स्थिति में आत्महत्या करने वाला ऐसा कदम उठाने का निर्णय एकाएक उठाता है. उसके इस कदम के बारे में उसके आसपास के लोग, उसे साथ के लोग सोच भी नहीं पाते, समझ भी नहीं पाते हैं. यदि उक्त दोनों स्थितियों को सत्य मानते हुए विचार करें कि भले ही आत्महत्या करने वाला व्यक्ति ऐसा कदम सोचविचार कर उठाये अथवा अकस्मात् उठाये दोनों ही स्थितियों में एक इन्सान की मृत्यु हो जाती है. एक व्यक्ति हमेशा के लिए परिवार से चला जाता है. एक व्यक्ति का चले जाना दुःख देता है, मगर तमाम सारे अनुत्तरित से सवाल पैदा कर जाता है.


संभावनाओं के इस दौर में भी समाज में अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है, युवाओं का मरना ज़ारी है. इसमें सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इसके पीछे का कारण समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाना भी है. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए उन्होंने अपने जीवन को मशीन बना लिया गया है. यह यांत्रिक जीवन न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखाई देने लगा है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.

धनोपार्जन की अंधी दौड़ में अभिभावक भी संलिप्त हैं, युवा अनावश्यक सी भागमभाग में जुटे हैं. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दे दिया. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.

इस अकेलेपन को दूर करने के लिए उसने अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि आधुनिकता के बाज़ार में उसे इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन दिख रही हैं. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.

02 जुलाई 2018

समय से पहले बच्चों का वयस्क होना


आज खबर पढ़ने को मिली कि कानपुर में चार नाबालिगों ने चार साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक दुराचार किया. इन चारों नाबालिगों में से एक की उम्र बारह वर्ष बताई गई है जबकि अन्य तीन की उम्र छह वर्ष से दस वर्ष के बीच है. बच्ची के पिता द्वारा की गई रिपोर्ट के बाद उन चारों बच्चों को गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने बताया कि एक पोर्न फिल्म देखने के बाद उन्होंने उसी का कृत्य उस बच्ची पर आजमाया. बच्चे सुधार गृह में भेज दिए गए हैं, ऐसी खबर है.


वैसे देखा जाये तो ये कोई पहली घटना नहीं है, इतने छोटी उम्र के बच्चों का सेक्स जैसे मामले में शामिल होना. इससे पहले भी सहमति वाली और रेप वाली कई घटनाएँ सामने आईं हैं. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर आये दिन इस तरह की फोटो, वीडियो सामने आते रहे हैं जिनमें छोटी कक्षाओं के बच्चे अपने गुप्तांग एक-दूसरे को दिखाते पकड़े गए हैं. ऐसी भी खबरें आपस में इधर से उधर होती रही हैं जिनमें लड़के-लड़कियाँ आपस में मम्मी-पापा का खेल खेलते पाए गए. इस खेल में उनके द्वारा सेक्स क्रियाएं भी संचालित करते हुए देखी गईं हैं. देखा जाये तो ये अकस्मात् नहीं होता है. इसके पीछे पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तंत्र काम करता है. संभव है कि संस्कृति के ठेकेदार इसे नकारने का काम करें मगर यदि गौर से देखा जाये तो सेक्स सम्बन्धी हरकतें बच्चों द्वारा बहुत छोटी वय से करते देखी जाती हैं. हमारे समाज में सेक्स का सन्दर्भ आज भी दो वयस्कों द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से लगाया जाता है. आज, इक्कीसवीं सदी के देश दशक से अधिक समय निकल जाने के बाद भी यौन शिक्षा का अर्थ दो विषमलिंगियों द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से लगाया जाता है. इसी तरह की संकुचित मानसिकता के चलते ही सेक्स को लेकर बहुत गलत, भ्रामक धारणाएँ समाज में फैली हुई हैं. बच्चों की कम उम्र की गतिविधियों को यदि गौर किया जाये तो विषमलिंगी बच्चे आपस में एक-दूसरे के गुप्तांगों को लेकर अचंभित होते हैं. लड़के-लड़कियों के गुप्तांगों में बचपन से ही जबरदस्त अंतर दिखाई देता है और बच्चों के लिए यह कौतूहल की स्थिति होती है. उस कम उम्र में उनके लिए यह अंतर सेक्स का पर्याय नहीं होता वरन आश्चर्य का विषय होता है. उनके द्वारा इस अंतर का कारण पूछे जाने पर अभिभावकों द्वारा सही उत्तर न दिया जाना भी आगे चलकर हानिकारक होता है.

बच्चों की बढ़ती उम्र और घर में उनका अकेलापन उन्हें विषमलिंगियों के शरीर के प्रति आकर्षित करता है. उस अंतर का भेद जानने को प्रेरित करता है, जिसे वे बचपन में नहीं जान सके थे. ऐसी स्थिति में उनको मदद पोर्न फिल्मों, उनके अभिभावकों द्वारा या परिवार के बड़े युगलों द्वारा असावधानीपूर्ण बनाये जा रहे शारीरिक संबंधों द्वारा मिलती है. देह के अंतर को वे ऐसे में देख-समझ लेते हैं और किसी दिन इसे खुद आजमाने के प्रयास में रहते हैं. इसके अलावा हम लोग अपने परिवारों में तीन-चार साल के बच्चों को उनके क्लास में पढ़ने वाले लड़के/लड़कियों के नाम पर चिढ़ाते हैं. उनके बॉयफ्रेंड का, गर्ल फ्रेंड का नाम पूछते हैं. और तो और उनकी शादी तक की बात भी करके उन्हें चिढ़ाते हैं. माता-पिता अपने छोटे बच्चों के सामने रोमांटिक मूड में बने रहते हैं. अक्सर बेपरवाह होकर बेपर्दा भी हो जाते हैं. बच्चे मासूमियत में भले होते हैं मगर ऐसे कृत्य के बारे में जानना चाहते हैं. ऐसा उनके लिए इसलिए भी गलत नहीं होता क्योंकि उनके मम्मी-पापा ऐसा कर रहे होते हैं. ऐसे में बच्चों द्वारा इस तरह का कृत्य मनोरंजन के स्थान पर अपनी जिज्ञासा का शमन करने जैसा होता है.

इसके अलावा एक बात और, आज जिस पोर्न साइट्स का, इंटरनेट के दुरुपयोग का हम सब रोना रो रहे हैं, यदि याद हो तो मोदी सरकार ने आने के कुछ समय बाद पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का निर्णय लिया था. उस समय समाज के कथित आधुनिकतावादी इस निर्णय के विरोध में उतर आये थे. उनका कुतर्क था कि अब सरकार निर्णय करेगी कि लोग क्या देखें क्या नहीं. सोचिये, आप क्या देख रहे और आपके बच्चे क्या देख रहे. आज हर हाथ में मोबाइल है, हर हाथ में इंटरनेट है तो हर हाथ में पोर्न है. बच्चों के माता-पिता जिस गोपन को पलंग के एक छोर पर संचालित करते हैं, बच्चे उसी गोपन का ज्ञान अपने हाथों में सहेजे मोबाइल के माध्यम से करने में लगे हैं. बस वे इसके प्रयोग के इंतजार में रहते हैं. जैसे ही वे इसे पाते हैं किसी न किसी रूप में उसका निदान कर लेते हैं. ऐसी एक-दो नहीं अनेक घटनाएँ हैं जहाँ नाबालिगों ने नाबालिग लड़की से सम्बन्ध बनाये हैं, रेप किया है. ये और बात है कि कानपुर की ये घटना पकड़ में आ गई और समाज के लिए आश्चर्यजनक बन गई है. हाथ में पकड़े मोबाइल से लेकर बेडरूम में सजे टीवी तक किसी न किसी रूप में आज के बच्चे सिर्फ और सिर्फ सेक्स देख रहे हैं, अश्लीलता देख रहे हैं. ऐसे में उन्हें समझाना कठिन है कि यह उनकी उम्र के लिए नहीं है. आइये, बस आधुनिकता का यह तमाशा देखिये क्योंकि हम सब भौतिकतावादी दौड़ में सबकुछ भुलाकर लगे हुए हैं.

19 फ़रवरी 2018

आधुनिकता में दरकते रिश्ते


सम्बन्ध क्या हैं? रिश्ते क्या हैं? रिश्तों और संबंधों में आपसी सामंजस्य, साहचर्य किस तरह का है? क्या रिश्ते और सम्बन्ध एक ही हैं? क्या रिश्ते और सम्बन्ध आपस में एकसमान भाव रखते हैं? ये ऐसे सवाल हैं जो आये दिन दिमाग में उलझन तो पैदा ही करते हैं, दिल में भी उथल-पुथल मचाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कई बार हम संबंधों को लेकर सजग होते हैं और कई बार रिश्तों का महत्त्व नहीं समझते हैं. इसके अलावा बहुत बार ऐसा भी होता है कि किसी व्यक्ति के लिए संबंधों के साथ-साथ रिश्तों की भी महत्ता होती है. इसके साथ-साथ समाज में ऐसे लोगों से भी सामना होता है जिनका सम्बन्ध सिर्फ उन्हीं लोगों से अधिक होता है जो उनके साथ किसी न किसी तरह का रिश्तेनुमा व्यवहार रखते हैं. वर्तमान स्थितियों को देखते हुए आज बहुतेरे लोग रिश्तों के साथ संबंधों को अहमियत देते दिखाई देते हैं जबकि बहुत से लोग संबंधों को तवज्जो देते हैं.


यहाँ समझने का विषय मात्र इतना है कि किसी के लिए भी संबंधों और रिश्तों में अंतर कैसा है? इन दोनों शब्दों की परिभाषा उसके लिए किस स्तर की है? असल में आज की भौतिकतावादी दुनिया में हम संबंधों और रिश्तों की महत्ता को भूल चुके हैं. आज हम में से बहुतों के लिए रिश्तों का कोई महत्त्व नहीं. ऐसे लोग संबंधों को महत्त्व देने लगे हैं. और आश्चर्य की बात ये कि ऐसा उन लोगों के बीच भी होने लगा है जिनका रिश्ता पावनता के साथ आपस में जोड़ा गया है. माता-पिता, भाई-बहिन आदि रक्त-सम्बन्धियों के अलावा एक रिश्ता आपस में सामाजिक रूप से इस तरह निर्मित किया गया है जो पावनता में, विश्वास में किसी भी रिश्ते से पीछे नहीं बैठता है. पति-पत्नी के रूप में बनाया गया यह रिश्ता भी आज कसौटी पर खड़ा कर दिया गया है. आये दिन इस रिश्ते को भी परीक्षा देनी पड़ती है. कभी इन दोनों को आपस में और कभी इन दोनों को सामाजिक रूप में तो कभी इनको पारिवारिक रूप में. समय के साथ माता-पिता, भाई-बहिन आदि से दूरी बनती जाती है, भले ही ये दूरी दिल से न बने मगर ऐसा अपने रोजगार, कारोबार या अन्य कार्यों के चलते भौगौलिक रूप से अवश्य ही हो जाता है. इन रिश्तों से दूरी बनने के बाद भी पति-पति साथ रहते हैं. इधर देखने में आ रहा है कि पति-पत्नी आपस में अहंकारी भाव दिखाने लगे हैं.

सम्पूर्ण समाज में, खास तौर से भारतीय समाज में एकमात्र यही रिश्ता ऐसा है जो लाख लड़ाई के बाद भी रात को एकसाथ होता है. इधर जबसे समाज को आधुनिकता की, पाश्चात्य समाज की हवा लगी है तबसे इस रिश्ते में भी उसी का असर दिखने लगा है. एक तरह के झूठे अहंकार में दोनों लिप्त होकर न केवल रिश्ते की हत्या कर रहे हैं वरन संबंधों की आत्मीयता को भी समाप्त कर रहे हैं. अनजाने से, अनचाहे से अहंकार के बीच ये पावन रिश्ता लगभग पिसता जा रहा है. आधुनिकता की दौड़ में शामिल होकर पति-पत्नी के रूप में दो इन्सान न मिलकर अब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे का सामना करते हैं. जहाँ कानून की भाषा बोली जाती है, अदालत का सहारा लिया जाता है, एक-दूसरे को सबक सिखाने की चुनौती दी जाती है. ऐसे में कई बार लगता है कि समाज में बहुत पहले से अनेकानेक रक्त-सम्बन्धियों में आपसी विवाद देखने को मिलता था. आपसी रक्त-सम्बन्धियों में आपसी तनाव देखने को मिलता था. जिसके चलते उनके किसी तरह के सम्बन्ध भविष्य में देखने को नहीं मिलते थे. अब जबकि ऐसा पति-पत्नी के बीच दिखाई देने लगा है और बहुतायत में दिख रहा है तब आशंका सामाजिक अवधारणा पर खड़ी होती है. समाज में पारिवारिकता, सामाजिकता के लिए खड़ी की गई विवाह संस्था इस तरह से एक न एक दिन अवश्य ही खंडित होकर नष्ट हो जाएगी. सामाजिकता की संस्कारवान पीढ़ी के निर्माण की संकल्पना के लिए पति-पत्नी को सामंजस्य बनाये रखने की, आपस में आत्मीयता बनाये रखने की आवश्यकता है.


05 सितंबर 2017

वर्तमान दौर में शिक्षकों की जिम्मेवारी बढ़ी है

समाज ने लगातार विकास के नए-नए आयामों को प्राप्त किया है. कई-कई नए-नए मानक स्थापित भी किये हैं. इन्हीं में एक मानक शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थापित किया गया है. इक्कीसवीं सदी तक आते-आते शिक्षा क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, कई अत्यावश्यक कदमों को उठाया गया. शिक्षा व्यवस्था ने कई तरह के परिवर्तनों को देखते-समझते हुए अपना स्वरूप भी बदला. आज शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. उसके द्वारा कितना भी विकास कर लिया गया हो, इसके बाद भी समाज से शिक्षकों की महत्ता कम नहीं मानी जा सकती है. तकनीकी विकास ने संस्थागत अनेकानेक बिन्दुओं को दरकिनार कर दिया हो किन्तु इससे शिक्षकों की जिम्मेवारियाँ और उनका दायित्वों पर नकारात्मक असर नहीं हुआ है. वे समय के साथ कम नहीं हुई हैं वरन बढ़ी ही हैं. एक समय जबकि तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेवारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेवारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है.

आज ऐसा माना जाने लगा है कि किसी भी शिक्षक का काम किसी संस्थान में, किसी कमरे में बैठे अनेक विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र है. शिक्षक के लिए उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है और होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में एक विद्यार्थी का साथ अबसे अधिक एक शिक्षक के साथ ही रहता है. ऐसे में किसी भी स्तर के शिक्षक की जिम्मेवारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. यह विचार करना शायद आज किसी के लिए संभव नहीं हो पा रहा है कि अध्यापन कार्य किसी तरह के व्यवसाय से सम्बंधित करके कभी नहीं देखा गया है. इसके पीछे की मूल भावना सिर्फ इतनी थी कि एक शिक्षक किसी तरह का उत्पाद निर्मित नहीं करता है वरन वह एक नागरिक तैयार करता है, एक व्यक्तित्व का विकास करता है. ऐसे में उसके कार्यों, उसकी भावना, उसकी मानसिकता का प्रभाव उसके विद्यार्थियों पर पड़ता है. किसी भी शिक्षक को अपना आदर्श मानकर एक विद्यार्थी उससे बहुत कुछ सीखता है. उसकी कही बातों को गाँठ बांधकर जिंदगी भर उन पर अमल करने की कोशिश करता है.

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वीडियो कांफ्रेंसिंग के साथ-साथ ऑनलाइन शिक्षा की अवधारणा ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि शिक्षक का कार्य विशुद्ध रूप से अपने पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना, विद्यार्थियों की परीक्षा लेना, उनकी उत्तर-पुस्तिका जाँचकर अंक देना रह गया है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को शिक्षक माना-समझा जाने लगा है. ये किसी भी शिक्षक के सहायक उपकरण तो सिद्ध हो सकते हैं न कि किसी शिक्षक के स्थान पर स्वीकार्य हो सकते हैं. आज विकास की अंधी दौड़ में अभिभावकों के पास समय की अत्यंत कमी देखने को मिलती है. ऐसे में उनके द्वारा प्रयास यही किया जाता है कि शिक्षा का कोई ऐसा माध्यम मिल जाये जो नितांत उन्हीं के बच्चे पर ध्यान दे सके. मोबाइल क्रांति के बाद इंटरनेट क्रांति ने जैसे अभिभावकों के मन की मुराद पूरी कर दी हो. एक क्लिक पर समस्त जानकारियों को अपने सामने देखकर अभिभावक भी संतुष्टि का एहसास कर रहे हैं. इस बिंदु पर आकर वे यह समझना नहीं चाहते कि ऑनलाइन माध्यम से जानकारी तो मिल सकती है किन्तु किसी योग्य व्यक्ति का सान्निध्य नहीं मिल सकता है, जो बच्चों को सही-गलत समझा सके. भारतीय संस्कृति, सांस्कृतिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति के लिए शिक्षा लेने का अर्थ सिर्फ पाठ्यक्रमों का पूरा कर लेना मात्र कभी नहीं रहा है. यही कारण है कि शिक्षा व्यवस्था के किसी भी चरण में नैतिक शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, हमारे पूर्वजों के बारे में शिक्षा आदि को भी साथ-साथ दिया जाता रहा है. ऐसा माना जाता रहा है कि एक शिक्षक अपने पाठ्यक्रम के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों में समाज के प्रति सेवा-भावना, राष्ट्र के प्रति जिम्मेवारी का भाव, प्राणीमात्र के लिए परोपकार की भावना, संगठन-शक्ति का विकास, सामूहिकता की स्वीकार्यता आदि गुणों का विकास भी करता है. ऐसे में समझना कतई मुश्किल नहीं है कि मशीनी संस्कृति, मशीनी शिक्षा के द्वारा विषय-सामग्री की उपलब्धता तो हो सकती है किन्तु उससे सम्बंधित विषय पर ज्ञान मिलेगा, ऐसा कहा नहीं जा सकता है.

मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज या फिर कांफ्रेंसिंग के जरिये किसी विषय को सहजता से समझाया भले ही जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों का विकास नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. वर्तमान में विवादास्पद मोबाइल गेम ‘ब्लू व्हेल’ को भी इसी रूप में देखा जा सकता है. ऐसे बच्चों को बताने वाला ही कोई नहीं कि क्या सही है क्या गलत है. ये समझने वाली बात है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? आज लोगों की जीवन-शैली तकनीकी रूप से, भौतिक रूप से पहले से कहीं अधिक संपन्न हुई है. लोगों को अपने मनमाफिक कार्यक्षमता के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता भी प्राप्त हुई है. ऐसे में समाज में शिक्षकों के प्रति गंभीरता का भाव समाप्त भले ही न हुआ हो किन्तु कम अवश्य हुआ है. तकनीक को सर्वस्व मानने वालों के लिए एक शिक्षक का महत्त्व संस्थान स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति जितना रह गया है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है. किसी भी शिक्षक की स्थान-पूर्ति नहीं कर सकता है.


मशीन ज्ञान दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ऑनलाइन शिक्षा किसी भी विषय पर सामग्री की उपलब्धता सहज करवा सकती है किन्तु उसके व्यावहारिक पक्षों से परिचित नहीं करा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. किसी समय में तकनीक के, सामग्री के, पुस्तकों आदि के अभाव ने शिक्षकों की महत्ता को स्थापित किया होगा किन्तु आज तकनीकी विकास के दौर में भी शिक्षकों का होना अनिवार्य है. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.

28 फ़रवरी 2017

आधुनिकता और परम्परा का समन्वय - अंडमान-निकोबार यात्रा वृतांत

अंडमान निकोबार की यात्रा करने की इच्छा बहुत लम्बे समय से मन में थी. इसके मूल में एकमात्र कामना पोर्ट ब्लेयर स्थित सेलुलर जेल के दर्शन करना रहा था. जिस स्थान में देश की आज़ादी के दीवानों ने ज़ुल्म सहकर भी उफ़ तक नहीं की, उस स्थान के दर्शन करने की उत्कंठा सदैव से मन में रही थी. जब-जब, जितनी बार कालापानी नामक सजा के बारे में पढ़ा, सेलुलर जेल के बारे में पढ़ा, वहाँ कैद किये गए वीर क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ा, उनको दी जाने वाली घनघोर अमानवीय यातनाओं के बारे में जाना तब-तब, उतनी-उतनी बार सेलुलर जेल के दर्शन करने की उत्कंठा और तीव्र होती रही. लम्बे समय की आकांक्षा इस बार पूरी हुई और फरवरी में अंडमान निकोबार की यात्रा करने का अवसर आ ही गया. पोर्ट ब्लेयर के वीर सावरकर अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन पर कदम रखते ही प्राकृतिक सौन्दर्य की अनुभूति हुई वहीं वीर सावरकर नाम आँखों के सामने आते ही मन जोश से, गर्व से भर गया. पहले ही दिन सेलुलर जेल के दर्शन करने के साथ ही अपनी अंडमान निकोबार यात्रा का आरम्भ किया. वहाँ के इतिहास की जानकारी अध्ययन के दौरान हुई उस जानकारी को, वहाँ बंदी वीर क्रांतिकारियों की अप्रत्यक्ष उपस्थिति को जेल की सात विंग्स में से शेष बची तीन विंग्स में महसूस किया. जेल की छोटी-छोटी कोठरियों, फाँसीघर, अमानवीय यातनाओं के औजारों को देखकर सिरहन सी दौड़ गई. (बहरहाल, इसके बारे में विस्तार से)


अंडमान निकोबार के आसपास के अन्य दर्शनीय स्थानों की सैर करते समय, एक टापू से दूसरे टापू तक जाने में छोटे जहाज अथवा फैरी की यात्रा के दौरान अपने साथ के अन्य सैलानियों को भी देखा. बहुतायत में नवयुगलों का आना वहाँ हो रहा था. हैवलॉक हो, चिड़िया टापू, रॉस आइलैंड या फिर बीच हो, बाज़ार हो, कोई स्मारक हो सभी जगहों पर नवयुगल बड़ी संख्या में दिखाई दिए. हाथों में हाथ लिए, अपनी दुनिया में खोये, आपसी चुहल, छेड़छाड़, मस्ती के अंदाज में टहलते, प्राकृतिक सुषमा का आनंद लेते अपनी इस नई पारी का लुफ्त ले रहे थे. आपसी प्यार या कहें कि प्यार जैसी स्थिति का प्रदर्शन खुलकर हो रहा था. छोटे शिप या फैरी पर चलते संगीत पर थिरकते कदम, बीच पर समुद्र की लहरों के संग बहते हुए, अल्हड़ता के साथ समुद्री जल में क्रीड़ा करते नवयुगल अपने आसपास के वातावरण से खुद को पूरी तरह अनजान बनाये हुए थे. अंडमान निकोबार से बहुत-बहुत दूर, जिसे वहाँ के स्थानीय निवासी मेनलैंड पुकारते हैं, अपने-अपने शहरों के परिचित वातावरण से दूर नितांत अपरिचित माहौल में नवजीवन की रंगीनियों का आनंद उठाते दिखाई दिए. 


जब यात्रा का आनंद लिया जा रहा हो, बीच के किनारे टहला जा रहा हो, समुद्र की लहरों में एकसाथ बहते जाना हो, हास-परिहास के बीच मस्ती की जा रही हो, अनजान वातावरण में अल्हड़ता के साथ हाथों में हाथ डाले चले जाना हो तब देह वस्त्रों का बोझ उठाने में सक्षम नहीं दिखती. नवयुगल पारंपरिक परिधानों से अलग स्वतंत्रता का बोध लिए छोटे-छोटे कपड़ों में जगह-जगह विचरण करते दिखे. लड़के-लड़कियाँ दोनों ही वस्त्रों की लम्बाई-चौड़ाई में कंजूसी बरतते दिखे. बहुत से लोग सवाल उठा सकते हैं कि आखिर कोई बात वस्त्रों पर आकर, छोटे वस्त्रों पर आकर ही क्यों टिक जाती है? यहाँ लेखक का मकसद किसी भी रूप में वस्त्रों पर सवालिया निशान उठाना है ही नहीं. महज छोटे-छोटे कपड़ों से या फिर किसी जोड़ी की उम्र देखकर उसके नवदंपत्ति होने, नवविवाहित होने का संकेत कतई नहीं मिला. जो मुख्य बात ऐसी समस्त जोड़ियों में दिखाई दी वो ये कि लड़कियों की देह पर भले ही अल्पवस्त्रों का बोझ रहा हो मगर उनकी कलाईयाँ पर्याप्त रंग-बिरंगी चूड़ियों से खनक रही थीं. हाथ, पैर मेंहदी से लकदक दिखाई दे रहे थे. माथे पर सुहाग सिन्दूर दमक रहा था. 


ऐसे वातावरण में जहाँ कि ऐसे युगलों को पर्याप्त स्वतंत्रता मिल रही थी, परिधान सम्बन्धी बंधन का एहसास कराने वाला कोई परिजन नहीं दिख रहा था, आपसी चुहल-हास-परिहास सारे तटबंधों को तोड़कर बह रहा था, समुद्री लहरों में शालीनता कहीं दूर बही जा रही थी तब चूड़ियों का बोझ लादे घूमना थोड़ा अटपटा सा लगा. बेफिक्री के साथ मौज-मस्ती, आनंद उठाते लड़के-लड़कियाँ यदि देह से वस्त्रों का बोझ उतार सकते थे तो वही लड़कियाँ नाजुक कलाईयों में ढेरों चूड़ियों का बोझ किस मानसिकता से लादे हुए थी? कहीं वस्त्रों की आधुनिकता के साथ सुहाग सम्बन्धी पारम्परिकता तो नहीं? बहरहाल वे नवयुगल पूरी मस्ती में अपनी यात्रा का आनंद ले रहे थे. वे अपने आसपास के लोगों से, अपने आसपास के वातावरण से बहुत दूर सिर्फ एक-दूसरे में खोये हुए थे. प्राकृतिक सौन्दर्य के साए में उल्लासित होता उनका शारीरिक सौन्दर्य आजीवन बना रहे, जिस तरह के प्रेम का प्रदर्शन वे कर रहे थे उस प्रेम में समय के साथ गहराई आती रहे ऐसी कामना के साथ ये देखना अच्छा लगा कि इसी देश में आधुनिकता और परम्परा एकसाथ अपना विकास करते रहते हैं. 

++
सभी चित्र लेखक द्वारा लिए गए हैं.

04 अप्रैल 2016

अकेलापन हावी है, मौत जारी है

अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. अब विद्रूपता ये की ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.



धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने मशीन बनते ही सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.


इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तनहा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. अकेलेपन का उपाय मोबाइल में, लैपटॉप में, छलकते जाम में, सिगरेट के छल्लों में, नशे के बादलों में, दैहिक आकर्षण में, बिस्तर की सिलवटों में खोजा जा रहा है. सेल्युलाइड के परदे की चकाचौंध को ही अपने जीवन की वास्तविकता मान लिया जा रहा है. आभासी दुनिया के नकलीपन को ही अपने जीवन का असलीपन बना लिया जा रहा है. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि पिता अपनी ही बेटी से कुकृत्य करने में लगा है. भाई-बहिन के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन रहे हैं. इंसानी देह महज भोग की वस्तु बनती जा रही है. यौनेच्छा पूर्ति के लिए हवसी बच्चियों, वृद्धाओं, शवों तक को नहीं बख्श रहे हैं. दैहिक संबंधों को मानसिक संबंधों पर वरीयता दी जाने लगी है. ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को अपने चारों तरफ आभासी दुनिया का एहसास होता है, नितांत भ्रम का एहसास होता है, सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.
.

21 मार्च 2016

मारो और बचाओ

तरक्की पसंद इंसान के चेतना के द्वार विगत कुछ वर्षों से कुछ अधिक ही खुल रहे हैं. तकनीक का प्रयोग करते हुए जहाँ वो मानवीय रिश्तों के प्रति कुछ हद तक असंवेदनशील हुआ है तो जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों के प्रति कुछ ज्यादा ही संवेदित हुआ है. यहाँ ये समझना थोड़ा मुश्किल ही प्रतीत होता है कि उसकी संवेदनशीलता वास्तविक है अथवा इसमें भी प्रचार-नाम-यश की भूख छिपी हुई है. कुछ वर्षों पहले बाघ बचाने की मुहिम चली थी और एक-दो वर्षों के तमाम हथकंडे अपनाये जाने के बाद बताया गया कि बाघों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गई है. आश्चर्य इसका था कि विज्ञापनों, टीवी चैनलों आदि के माध्यम से होते प्रचार से प्रभावित होकर ऐसे-ऐसे लोग, ऐसे-ऐसे क्षेत्रों में बाघ बचाओ मुहिम के लिए निकल पड़े थे, जहाँ बाघों का कभी भी कोई नामोनिशान नहीं था. अब कुछ संवेदित लोग गौरैया बचाने को निकल पड़े हैं. शहरों के बीच से वृक्षों को समाप्त करके कंक्रीट के जंगल खड़े देने वाले लोग, घरों से खुलापन, लॉन का अस्तित्व मिटा देने वाले लोग चिंतातुर हैं कि अब गौरैया उनके घरों में, उनके आँगन में दिखाई नहीं देती. ऐसे लोगों से सवाल महज इतना कि पहले वे लोग ही बताएं कि उनमें से कितने लोगों ने अपने-अपने बहुमंजिला मकानों में आँगन रख छोड़े हैं? गौरैया की चिंता में व्याकुल लोग जरा इस बात पर प्रकाश डालें कि उनमें से कितने फिक्रमंद अपने-अपने घरों की छतों पर नियमित रूप से जाते हैं? गौरैया के घोंसले के लिए चिंता करने वाले अपने दिल पर हाथ रखकर बताएं कि कितने लोग हैं जिन्होंने अपने-अपने घरों के भीतर गौरैया को घोंसला बनाने दिया है?

.
गौरैया बचाने के पहले ये समझना आवश्यक है कि गौरैया समाप्त क्यों होने लगी हैं? क्यों उनका घर-आँगन में फुदकना, चहचहाना बंद सा हो गया है? इसको समझने के लिए न तो जीव-जंतु विशेषज्ञ होना आवश्यक है और न ही किसी शास्त्र का विद्वान वरन साधारण सी सामाजिकता का होना आवश्यक है. नितांत साधारण सी बात है कि गौरैया सदैव से स्वच्छ वातावरण में रहना पसंद करती रही है. उसने अपने घोंसले के निर्माण के लिए घरों को, खिड़कियों को, बरामदे के किनारों को, मकान की खाली, अनुपयोगी जगह को प्राथमिकता में रखा है. अब अपने आसपास नजर दौड़ाने पर पता चलता है कि स्वच्छता तो हमने रहने ही नहीं दी है. गाड़ियों के धुँए ने प्रदूषण को बढ़ाया है तो शहर के किनारे बनते-उगते आये छोटे-छोटे कल-कारखानों ने उगलते धुँए ने भी वातावरण को, हवा को जहरीला किया है. ऐसी जहरीली हवा में जहाँ इंसान सांस लेने में कष्ट का अनुभव कर रहा है तो वहां कोमल स्वभाव वाली गौरैया की तकलीफ को सोचा जा सकता है. इसके साथ-साथ कानफोडू शोर के चलते भी गौरैया को मानवीय समाज के साथ अपना समाज विकसित करने में समस्या उत्पन्न हो रही है. शांत माहौल में चहचहाने वाली, फुदकने वाली गौरैया के अस्तित्व के लिए ये शोरगुल नकारात्मक भूमिका निभा रहा है.
.
वातावरण की अस्वच्छता, प्रदूषण, शोरगुल आदि के साथ तकनीक के विकास-क्रम में इंसान ने अपना विकास तो किया मगर जीव-जंतुओं के लिए संकट ही पैदा किया है. इस विनाश-क्रम में इंसान ने एक कदम की और वृद्धि की है, जबकि मोबाइल रेडियेशन के चलते भी गौरैया के अस्तित्व पर संकट के बादल गहराने लगे हैं. गौरैया बचाने की मुहिम छेड़ने वालों को भी भली-भांति ये सारे तत्त्व ज्ञात हैं, इसके बाद भी बिना किसी ठोस, सकारात्मक प्रयासों के गौरैया बचाने की मुहिम चलाई जा रही है, गौरैया के लिए मानव-निर्मित घोंसले बनाये जा रहे हैं, छतों पर, मुंडेरों पर गौरैया के लिए दाना-पानी का बंदोवस्त करने के सन्देश छोड़े जा रहे हैं. किसी पक्षी के अस्तित्व की रक्षा के लिए ये बेहतर प्रयास कहे जा सकते हैं मगर तब जबकि इनके पीछे महज प्रचार पाने की लालसा न हो, महज फोटो खिंचवाने की लालसा न हो. यदि वाकई में गौरैया को बचाने के प्रयास करने हैं तो हमें वातावरण को स्वच्छ रखने की कोशिश करनी चाहिए. पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने के कदम उठाये जाने चाहिए. मोबाइल रेडियेशन को कम से कम करने का प्रयास करना चाहिए. ऐसे में फिर सवाल, कि क्या वाकई में इंसान ऐसा कर पायेगा? क्या वाकई ऐसा कर पाने की मानसिकता को पैदा कर पायेगा? यदि इंसान अपने वातावरण को, पर्यावरण को, हवा-पानी को, जंगल-जमीन आदि को बचाने के लिए आगे न आया तो गौरैया को चील, गिद्ध, बाज, नीलकंठ, कठफोड़वा, टिटहरी, कौआ आदि की तरह विलुप्त सा करेगा ही साथ ही अपने अस्तित्व को भी विलुप्त करेगा. वैसे भी ‘बेटी बचाओ’ के द्वारा वह अपने अस्तित्व को बचाने की मुहिम में लगा ही हुआ है.
.

28 नवंबर 2015

हैप्पी टू ब्लीड या हैप्पी टू बेशर्मी


एक मोहतरमा ने पूरी बिलबिलाहट के साथ इनबॉक्स में प्रवेश किया और भट्ट से दे मारा कि यदि हम महिलाएँ हैप्पी टू ब्लीड को लेकर आगे आ रही हैं तो आपको क्या समस्या है, अथवा आप पुरुष वर्ग को क्या आपत्ति है? उनकी बात अपनी जगह पूरी तरह सही थी, आखिर हमें अथवा पुरुष वर्ग को महिलाओं के किसी कदम से आपत्ति क्यों होनी चाहिए? आखिर आप अथवा आपका पुरुष वर्ग क्या जनता-समझता है मासिक धर्म के बारे में? उनको जो समझाया, उसी का विस्तृत रूप मात्र इतना ही है कि हैप्पी टू ब्लीड में उत्साह से भाग लेने वाली, अपनी सलवार पर लाल दाग को अच्छा बताने वाली महिलाओं से कोई आपत्ति नहीं है. हाँ, आपत्ति है तो किसी भी कदम के प्रस्तुतीकरण से. यदि इस समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आपको इसकी आज़ादी देती है कि आप मासिक-धर्म के दौरान बिना नैपकिन के रहें, अपने कपड़ों पर लगते दागों का प्रदर्शन करें तो यही समाज इसकी भी आज़ादी देता है कि हम अपने मन से किसी भी कदम का समर्थन अथवा विरोध कर सकें. समाज की कुछ अतिशय जागरूक महिलाओं के द्वारा हैप्पी टू ब्लीड जैसा कदम महज इसलिए उठाया गया क्योंकि किसी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के समय उनके मासिक धर्म सम्बन्धी जाँच की बात कही गई. ऐसे कदम की पहरुआ महिलाएँ बताएँ कि क्या कोई ऐसी मशीन वाकई बन गई है जो बाहरी शारीरिक स्पर्श से किसी महिला के बारे में बता सके कि वो मासिक धर्म से गुजर रही है अथवा नहीं? मेरी अपनी जानकारी में संभवतः ऐसा कुछ नहीं है. ऐसे में हैप्पी टू ब्लीड जैसे कदम का उठाया जाना उस मंदिर के प्रबंधकों द्वारा लिया गया निर्णय नहीं वरन अपने आपको मीडिया की निगाह में लाना है.

इसके अलावा जहाँ तक बात मासिक धर्म को जानने न जानने की है तो ये सच है कि ऐसी बातों को जानने-समझने की एक उम्र होती है. एक उम्र थी हमारी, जबकि आज की तरह न तो हाथों में स्मार्ट फोन थे और न ही इंटरनेट की सुविधा. तब जानकारियों के प्रसारण में अनेक तरह की बाध्यताएं थीं. ऐसी ही बाध्यता के बीच ज्ञान नहीं था कि लाल रंग से भीगे रुई के टुकड़े में, कपड़े के टुकड़े में किसी चोट का खून नहीं वरन नारी देह की नैसर्गिकता छिपी हुई है. इसके बाद जब चोट के रक्त और मासिक धर्म के रक्त का अंतर समझ आया तो उसके साथ ही ये भी समझ आया कि ये किसी महिला को सम्पूर्ण करता है, उसको मातृत्व का सुख प्रदान करने का संकेत देता है. किसी महिला को मासिक धर्म होने का अर्थ उसके लिए शर्म नहीं वरन गर्व का, उसकी सम्पूर्णता का विषय होता है. इसी संदर्भ में आपको बताते चलें कि हमारी एक मित्र को अपनी शारीरिक उलझनों के चलते दैनिक कार्यों में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. नित-प्रति बढ़ती उसकी समस्याओं को देखकर उसके परिवार वालों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उसको गर्भाशय निकलवाने की सलाह दे डाली, जिसका उद्देश्य उसको प्रतिमाह पाँच दिनों की कठिनाई से छुटकारा दिलाना था. उस साहसी युवती ने अपने परिवार के ऐसे निर्णय का विरोध ये कह कर किया कि वो अधूरी महिला होकर जीना नहीं चाहती. सोचिये, जहाँ एक युवती को नित्य प्रति अपने ही शरीर की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ रहा हो, उसके बाद भी वो मासिक धर्म को अपने स्त्री होने की सम्पूर्णता मानती है वहीं आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल कुछ महिलाएँ हैप्पी टू ब्लीड के बहाने सम्पूर्ण स्त्रियों के मातृत्व को शर्मसार करने में लगी हैं.

ये अवश्य हो सकता है कि किसी मंदिर प्रबंधन के द्वारा अतिशयता में आपत्तिजनक निर्णय लिया गया हो पर ऐसी महिलाएँ अपने घर-परिवार पर दृष्टि डालें. ऐसे कदम का समर्थन कर रही महिलाओं से एक ही सवाल कि ऐसा हैप्पी टाइप कोई कदम उन्होंने तब उठाया था जबकि उनकी दादी ने, माँ ने, सास ने, परिवार की किसी बुजर्ग आदि ने उनको रसोई में, मंदिर में जाने से रोका था? क्या ऐसी महिलाओं को मासिक धर्म के समय उनकी माओं ने, उनके परिवार की बुजुर्ग महिलाओं ने, उनको सासों ने नहीं रोका था? अब जबकि परिवार के नाम पर पति-पत्नी रह गए हैं तो क्या वे उन पाँच दिनों में भी पूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव नहीं करती हैं? बाज़ार द्वारा ऐसे दिनों में भी स्वतंत्रता का एहसास करने के लिए अत्याधुनिक, अनेकानेक साइज़ में नैपकिन उपलब्ध नहीं करवाए जा रहे हैं? क्या हैप्पी टू ब्लीड के नाम से समाज में एक अजब तरह की गंद फैलाती इन महिलाओं ने अपने परिवार की महिलाओं के विरोध में ऐसा कोई मोर्चा खोला था? नए-नए नैपकिन बनाती कंपनियों के विरुद्ध भी कोई मोर्चा खोलकर वे अपने हैप्पी टू ब्लीड अभियान को सफल बनाने का उपक्रम करेंगी? निश्चित रूप से इन महिलाओं ने न ऐसा किया था और न ही ऐसा कुछ करने जा रही हैं.

सत्यता ये है कि वर्तमान में उपस्थिति का संकट सबके सामने है, स्त्री-सशक्तिकरण की पहरुआ बनती स्त्रियों के सामने भी ऐसी समस्या है. ऐसे में उनको कोई न कोई एक ऐसा विषय चाहिए जो घर बैठे प्रसिद्धि पाने का माध्यम बन सके. सोचने का विषय मात्र ये है कि क्या वाकई हैप्पी टू ब्लीड जैसे अनावश्यक कदम उठाये जाने से वे समस्याएं दूर हो जाएँगी जिन्हें महिलाओं के मासिक धर्म से जोड़कर देखा जाता है? क्या अपने इस अभियान को सफलता दिलाने के लिए ये महिलाएँ अपने घर की सभी स्त्रियों को हैप्पी टू ब्लीड के नाम पर नैपकिन सुरक्षा प्रणाली से दूर रखने का कार्य करेंगी? इस अभियान के नाम पर क्या ये महिलाएँ वाकई उन पाँचों दिनों में बिना किसी साधन के अपने नित्य-कार्यों को संपन्न करने का साहस जुटाएंगी? समस्या इतने पर ही आकर नहीं ठहरती दिख रही है. असल समस्या तो शायद उस दिन शुरू हो जबकि हैप्पी टू ब्लीड जैसे अनावश्यक कदमों का समर्थन करने वाली महिलाएँ स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों को परदे के भीतर से निकाल कर घर के आँगन में उतार दें; सड़क पर नुमाईश बनाकर रख दें; बाज़ार में उसकी प्रदर्शनी बना दें.

13 अक्टूबर 2015

संवेदनहीन भी बना रहा है सोशल मीडिया

‘वो तड़प कर अपनी जान से गया, खेल का सामान हमारे लिए बन गया’ ये स्थिति आजकल सोशल मीडिया पर चरितार्थ होती दिख रही है. हर हाथ में मोबाइल, हर हाथ में इंटरनेट, हर हाथ में तकनीक ने जहाँ जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया वहीं मानवीय संवेदनाओं का गला घोंटा है. तकनीक का वर्तमान दौर ‘बन्दर के हाथ उस्तरा’ लगने जैसा हो गया है, जहाँ हर कोई अपने आपको तकनीक का पुरोधा समझ कर उसका उपयोग किसी भी रूप में कर रहा है. इस अनियंत्रित उपयोग ने मानव जीवन के गोपन को तो उजागर किया ही है सामाजिक सरोकारों को नष्ट किया है, मानवीय मूल्यों का ह्रास किया है, संवेदनाओं को समाप्त किया है. हम सब सोशल मीडिया के किसी न किसी रूप से सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं और अपने कार्यक्षेत्र के बहुतायत कार्यों में इसकी सहायता भी लेते हैं. इसकी उपयोगिता से आज इंकार भी नहीं किया जा सकता है किन्तु इसके साथ ही एक अप्रत्यक्ष सा संकट हम सबके बीच तैर रहा है. देखा जाये तो सोशल मीडिया से न सिर्फ हम बल्कि हमारे नौनिहाल, हमारे समाज का भविष्य भी बहुत गहराई तक जुड़ा हुआ है. ऐसे में अनियंत्रित प्रचार-प्रसार का खतरा न केवल इनके वर्तमान के लिए वरन भविष्य के लिए और विभीषक होकर सामने आता है.
.
यदि संजीदगी से विचार किया जाये तो हम लगभग रोज ही सोशल मीडिया के किसी न किसी माध्यम से हिंसा, बलात्कार, हत्या, दुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स तस्वीरों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शव, फंदे पर लटकता किसी का शव, दुर्घटना में क्षत-विक्षत देह, शारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की नग्न देह सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर भेज दिए जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर का, किसी देह का, किसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता है, किसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता है किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी. तकनीक से जुड़े रहने के क्रम में, सबसे पहले सूचना देने के लोभ में, बहुतायत लोगों तक सूचना-सम्प्रेषण के चलते वर्तमान में ऐसे-ऐसे चित्रों का, वीडियो का प्रसारण किया जा रहा है जो किसी भी रूप में नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे आज के दौर में जबकि रिश्तों का, संबंधों का, संस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना होता है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. किसी समय में पत्रकारिता में ऐसे चित्रों का प्रकाशन, प्रसारण निषिद्ध माना जाता था; ऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करने जैसा समझा जाता था; शारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की पहचान को किसी भी रूप में उजागर करना सामाजिक रूप से प्रतिबंधित माना गया था; क्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस समझा जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे अपराध उजागर करने के लिए अनिवार्य माना जाने लगा है; जागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है.

.
 तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. कई बार सरकारों की तरफ से सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया किन्तु उसमें वो सफल नहीं हुई. आश्चर्य तो इसका हुआ कि पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का विरोध अति-जागरूक जनता ने करके सरकार को अपने कदम वापस लेने को विवश कर दिया. ऐसे में स्वयं नागरिकों को, सोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या-क्या पोस्ट किया जाये, क्या-क्या प्रतिबंधित रखा जाये. जिस तरह से क्षत-विक्षत शवों की, दर्दनाक हादसों की, देह की नग्नता की, हत्याओं-आत्महत्याओं की तस्वीरें, वीडियो सोशल मीडिया के विविध माध्यमों के द्वारा एक पल में हजारों-हजार लोगों तक प्रेषित कर दिए जाते हैं वो चिंतनीय है. अपराधों के प्रति जागरूकता लाने के नाम पर इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरें, वीडियो अपने आरंभिक दौर में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैं, संवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देती हैं. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों के लिए अभ्यस्त हो जाना संवेदनाओं को समाप्त करता है. घटना के प्रति, दुर्घटना के प्रति, मरने वाले के प्रति, शोषित के प्रति, मृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्या, बलात्कार, आत्महत्या, हिंसा, दुर्घटना आदि की खबरें, दृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैं, सूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं. लगातार एक के बाद एक तक प्रसारित-प्रचारित करते ऐसे वीभत्स दृश्य कब हमें संवेदनाहीन बना देते हैं, कब हमें इंसान से जानवर बना देते हैं, कब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. काश ये सोचते हुए कि ‘किसी की बेबसी से खेलने को, क्यों हमारे अन्दर इक जानवर बन गया’ शायद हम अपनी संवेदनाओं को कुछ हद तक बचा पाने की तरफ भी एक कदम बढ़ा सकें. अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता का, वीभत्सता का, विकृतता का अर्थ समझा सकें. ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ. 
.

09 अक्टूबर 2015

अकेले हैं चले आओ...

‘जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है’ किसी गीत की ये पंक्तियाँ दिल के उदास होने पर किसी अपने के अस्तित्व के होने की गवाही दे रही हैं. दिल के उदास होने और उस उदासी में किसी अपने के पास होने की अभिलाषा करना इंसान को इंसान से जोड़े रखने की संकल्पना को पुष्ट करती है. भारतीय समाज में मानवीय आधार पर निर्मित अनेकानेक मान्यताओं, परम्पराओं का अपना वैज्ञानिक आधार रहा है. उसके अनुपालन के पीछे संस्कारों का निर्माण, संस्कृति का संवर्धन, सहयोग की भावना का विस्तारण करना रहा है. वसुधैव कुटुम्बकम महज एक विचार नहीं, चंद शब्द नहीं वरन अपने आपमें एक समृद्ध अवधारणा है, जिसके द्वारा इंसान को न केवल इंसान से बल्कि इंसान को प्रकृति के अंग-अंग से समन्विति बनाये रखने को बल मिलता है. आधुनिकता के वशीभूत हमने न केवल वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को छिन्न-भिन्न किया वरन अपने आपको नितांत अकेलेपन का शिकार बना लिया. तकनीकी, ज्ञान, कार्य की असीमित व्यस्तता के बीच भी इंसान किस कदर अकेला पड़ गया है इसे महानगरों के साथ-साथ छोटे-छोटे नगरों, कस्बों में भी सहजता से देखा जा सकता है. किसी समय छोटे-छोटे नगरों, कस्बों, गाँवों आदि को प्रेम-स्नेह-सौहार्द्र के, आपसी सहयोग के, समर्पण के रूप में प्रस्तुत किया जाता था किन्तु आज इन सबको भी आधुनिकता की बयार में बदलते देखा जा सकता है.
.
अकेलेपन की इस स्थिति के दुष्प्रभाव का हाल ये है कि आज एक घर में कई-कई घर देखने को मिल रहे हैं. अपने-अपने कमरे की चहारदीवारी में अपना-अपना एक अलग संसार बनाकर लोग उसी में ख़ुशी तलाश रहे हैं. अपने आपसे घिरे नितांत अकेले अपने में ही अपने को खोज रहे हैं. मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर की दुनिया से रचे-बसे संसार की पल-पल की जानकारी रखने के बाद भी इंसान अपने आसपास की, अपने परिवार की जानकारी से अनभिज्ञ रहता है. यही वे हालात हैं जो व्यक्ति को अकेलेपन के साये में अवसाद में धकेलते हैं. अवसाद की इस नकारात्मक स्थिति में न केवल वयस्क जा रहे हैं वरन बच्चों को, किशोरों को भी इसका शिकार होते देखा जा रहा है. संयुक्त परिवार की संकल्पना का ध्वंस करके एकल परिवार अस्तित्व में लाये गए किन्तु उनमें भी आज एक-दूसरे के लिए समय का अभाव दिख रहा है. अकेलेपन की इस त्रासदी के चलते बच्चे, किशोर, युवा, वयस्क आदि, वो चाहे पुरुष हो या स्त्री, किसी अनजाने की खोज में लगे रहते हैं. इस अनजाने की खोज में उनका दिल तो परेशान रहता ही है, साथ ही स्वयं भी परेशानी में नकारात्मकता को जन्म दे बैठते हैं. ये अकेलापन उनको एहसास कराता है कि कोई उनको पसंद नहीं करता है, कोई उनको समझने का प्रयास नहीं करता है, उनके लिए किसी के पास समय नहीं. देखा जाये तो स्थितियाँ इसके उलट उन्हीं पर लागू होती हैं. अकेलेपन से ग्रस्त-त्रस्त व्यक्ति स्वयं भी किसी को पसंद नहीं करते हैं, वे स्वयं ही किसी को समझने की कोशिश नहीं करते हैं, उनके पास ही किसी से मिलने-जुलने का समय नहीं होता है. अकेलेपन की स्थिति ऐसे लोगों को चिड़चिड़ा बना देती है, बात-बात में आक्रोशित होना, अकारण किसी से झगड़ा कर बैठना ऐसे लोगों का स्वभाव बन जाता है.

.
आधुनिकता का आलम ये है कि इंसान के संगठित रूप में रहने को अब कबीलाई संस्कृति समझा जाने लगा है; खिलखिलाकर, ठहाका मारकर हँसने को अब ज़ाहिलाना हरकत करार दिया जाता है; अंतरंगता दिखाने को चापलूसी समझा जाने लगता है; गले मिलने, आत्मीयता जताने को अवैध संबंधों से जोड़कर देखा जाने लगता है, ऐसे में दिल का उदास होना, अकेला होना लाजिमी है. उत्सव, त्यौहार, आयोजन अब हर्ष-उल्लास का विषय नहीं वरन विवाद का विषय बनने लगे हैं, ऐसे में इंसान को भरे-पूरे होने का एहसास कैसे हो? दोस्तों की महफ़िल कहीं दूर हो गई है, सांझ ढलने से देर रात चलने वाली हँसी-मस्ती की आवारगी अब देखने को नहीं मिलती है. बच्चों के लिए खेल के मैदानों को बड़ी-बड़ी इमारतों ने निगल लिया है, अब वे मैदान में मस्ती करने के स्थान पर मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम के सामने अकेले-अकेले अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको अकेलापन सालता भी है और विडम्बना देखिये कि यही अकेलापन उन्हें पसंद भी आता है, या कहें कि अकेलेपन से लगातार जूझते रहने के कारण ये अकेलापन उन्हें पसंद आने लगता है. अकेलेपन का ये रोग ऐसे लोगों के मन-मष्तिष्क में इस कदर हावी हो जाता है कि किसी का साथ, मित्रों की संगत, महफ़िलों की रौनक, हंसी-ठहाके ऐसे लोगों को अकेलेपन की तरफ और ज्यादा धकेलते से मालूम पड़ते हैं. ऐसे में अकेलेपन की त्रासदी झेल रहे लोग कह उठते हैं ‘तब ही ये दिल उदास होता है, जब भी कोई आसपास होता है.’ इससे पहले कि हमारे परिवार के बीच में अकेलेपन का भयावह साया किसी सदस्य को अपनी गिरफ्त में ले, किसी बच्चे को अवसाद की तरफ ले जाये, किसी युवा को अपराध की तरफ धकेले, हम सबको एकजुटता की, सहयोग की, अपनत्व की महफ़िल सजाकर अपने लोगों को अपने लोगों के बीच उपस्थित करना होगा. 
.

25 अगस्त 2015

लिव-इन-रिलेशन और सामाजिकता


वर्तमान परिदृश्य में समाज का बहुसंख्यक वर्ग वैवाहिक संबंधों के प्रति नकारात्मकता दिखाने में लगा हुआ है. किसी न किसी कारण से पति-पत्नी के आपसी संबंधों में बिखराव की स्थिति आ रही है. इसके पीछे के कारण अपने आपमें शोध का विषय हो सकते हैं किन्तु वैवाहिक संबंधों से वितृष्णा सी दर्शाती वर्तमान युवा और स्वच्छंद पीढ़ी एक नए रिश्ते को नाम देकर समाज में नई संकल्पना को प्रस्तुत कर चुकी है. इस नई संकल्पना को लिव-इन-रिलेशन के नाम से जाना-पहचाना जा रहा है. महिला मुक्ति के समर्थक ऐसे विषय का समर्थन करते आसानी से दिख जाते हैं जहाँ शारीरक संबंधों में स्वतंत्रता मिलती हो जबकि संस्कृति की रक्षा का झंडा उठाये घूमते लोग ऐसे विषयों के विरोध में दिखते हैं. देखा जाये तो दोनों पक्षों के लोग एक तरह की कट्टरता का पालन ही करते हैं. इन लोगों को विषय की गंभीरता, समाज पर उसका प्रभाव, उसकी दीर्घकालिकता का कोई अर्थ नहीं होता, उन्हें तो सिर्फ और सिर्फ अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते देखा जाता है. लिव-इन-रिलेशन भी इसी तरह का विषय है जो एक तरफ स्त्री-स्वतंत्रता का आयाम तय करता है वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति को ही नकारात्मकता प्रदान करता है.
.
भूमंडलीकरण के इस दौर में जबकि युवा वर्ग कैरियर की जद्दोजहद में लगा हुआ है, उसके लिए वर्तमान में विवाह से ज्यादा महत्त्वपूर्ण सफलता हासिल करना होता है; अधिकाधिक धनार्जन करना होता है; ऐशो-आराम के समस्त संसाधनों को प्राप्त कर लेना होता है. इस आपाधापी के चलते युवाओं में विवाह संस्था के प्रति विश्वास समाप्त सा होता जा रहा है. किसी तरह की सामाजिकता उन्हें इस संस्था में नहीं दिखती है वरन उनके लिए यह एक प्रकार के प्रतिबन्ध सा होता है. बिना किसी प्रतिबन्ध, बिना किसी जिम्मेवारी, स्वतंत्र भाव से जीने की संकल्पना, अकल्पनीय स्वतंत्रता के बीच शारीरिक संबंधों की स्वीकार्यता ने ही लिव-इन-रिलेशन को जन्म दिया. इस तरह के सम्बन्ध नितांत दैहिक आकर्षण और उसकी माँग और आपूर्ति जैसे क़दमों की देन हैं और ऐसे सम्बन्ध यदि दीर्घकालिक, पूर्णकालिक नहीं हैं तो इनका सर्वाधिक नुकसान महिलाओं को ही उठाना पड़ता है.
.
इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि प्राकृतिक रूप से स्त्री-पुरुष की शारीरिक स्थिति नितांत भिन्न रही है. सामाजिक प्रस्थिति को सफलता के बिंदु पर ले जाने के बाद भी महिलाओं का अपनी विभिन्न शारीरिक क्रियाओं, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं रहा है. यही कारण है कि जहाँ एक तरफ महिलाओं सम्बन्धी गर्भ-निरोधक साधनों की, गर्भ रोकने के उपायों की बाज़ार में भरमार हुई है वहीं दूसरी तरह गर्भपातों की, बिन-व्याही माताओं की, कूड़े के ढेर पर मिलते नवजातों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि हुई है. ये समूची स्थितियाँ सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को प्रभावित करती हैं. यदि लिव-इन-रिलेशन जैसे सम्बन्ध आपसी सामंजस्य से विवाह संस्था से बचने के लिए हैं; शारीरिक संबंधों की निर्बाध स्वीकार्यता के लिए है; अल्पकालिक दैहिक सुख के लिए है तो सहजता से कहा जा सकता है कि ऐसे सम्बन्ध असामाजिकता को ही बढ़ायेंगे. लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों में किसी भी समय पर लड़के द्वारा लड़की को छोड़ देने, किसी और लड़की के साथ लिव-इन में चले जाने, इस रिलेशन में रहने वाली लड़की के गर्भवती होने, कई-कई शारीरिक संबंधों से होने वाले यौन-रोगों आदि दुष्परिणाम भी सामने आने की आशंका बनी रहती है. देखा जाये तो कैरियर के लिए अल्पकालिक अथवा पूर्णकालिक वैवाहिक रिश्तों का नकार किसी भी व्यक्ति का निजी निर्णय हो सकता है मगर ऐसे निर्णयों की आड़ में लिव-इन-रिलेशन का बनाया जाना संभवतः सामाजिक नहीं है. सामाजिक संरचना में विवाह यौन-संबंधों की स्वीकार्यता मात्र नहीं है अपितु सृष्टि के विकास की अवस्था में सहगामी कदम भी है. इसके द्वारा जहाँ पारिवारिक संरचना का विकास होता है वहीं सामाजिकता भी अपना विकास करती है. ऐसे में लिव-इन-रिलेशन की सामाजिक-कानूनी मान्यता-स्वीकार्यता के पूर्व खुले मंच से इस पर बहस हो, खुले दिल-दिमाग से इसके समस्त पहलुओं पर चर्चा हो, सकारात्मक दृष्टि से इसके नैतिक-अनैतिक रूप का आकलन हो. ऐसा करना न सिर्फ वर्तमान के लिए वरन भविष्य के लिए भी उचित कदम होगा.

.