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19 जुलाई 2021

पुकारता है वो गाँव का घर

आज अचानक से पता नहीं क्यों गाँव का घर याद आने लगा. अचानक से इसलिए क्योंकि न किसी से कोई बात चली और न किसी तरह की कोई घटना सामने आई, इसके बाद भी बहुत सी बातें उस घर से, पैतृक घर से जुड़ी हुई याद आने लगीं. यादें जिंदगी को तरोताजा रखने का काम करती हैं बशर्ते इन्सान उनमें खुशियाँ तलाशने का काम करे. यादों में खुशियों के साथ-साथ ग़मों का भी समावेश होता है और इन्सान जब यादों के सफ़र पर निकलता है तब यह उसकी मानसिकता पर निर्भर करता है कि वह खुशियों में या गम में रहना चाह रहा है. आज यादों का पिटारा लेकर गाँव की यात्रा पर जाना हुआ. ऐसा नहीं कि गाँव की ये कोई पहली यात्रा थी. इससे पहले भी कई बार गाँव जाना हुआ. गाँव में खूब रहना हुआ. गाँव में घूमना-फिरना भी हुआ. पिछले एक दशक से अधिक समय में जब-जब गाँव जाना हुआ, तब-तब वहां से जुडी यादें वहां पहुँचने के पहले दिल-दिमाग पर हावी होकर पुरानी बातों का स्मरण करवा देती.

अब गाँव जाने का अवसर कुछ धार्मिक, पारिवारिक कृत्य से जुड़ने के दौरान ही मिल पता है. पारिवारिक धार्मिक मान्यताओं से जुड़े कार्यों को पूरा करवाने के बाद गाँव में अपने पैतृक मकान के दर्शन करने चल पड़ते हैं. पिछले एक दशक से अधिक का समय हो चुका है जबकि पैतृक आवास को निर्जन छोड़ दिया गया है. अपने परिजनों के चले जाने के एहसास ने ईंट-गारे के उस मकान को भी आहत किया होगा, तभी धीरे-धीरे उसने अपने आपको कमजोर काना शुरू कर दिया. इसके बाद भी उसके आँगन, उसकी दीवारें, उसकी छत, उसका मैदान, उसके पेड़-पौधे बराबर उन दिनों की याद दिलाते रहे जबकि हम सब बालरूप में उस घर की जमीन पर धमा-चौकड़ी मचाया करते थे.

घर की जर्जर होती दीवारों को छूकर उसी एहसास को अपने अन्दर उतारने की कोशिश हरबार की जाती थी, आज भी की गई. हर बार लगता था कि वो बूढ़ा घर, जिसने हमारे दादा, परदादा को अपने आगोश में खेलते देखा है कुछ कहना चाहता है. उसके निःशब्द संबोधन को, स्वर को सुनने की, समझने की चेष्टा हर बार की गई. समझने के बाद भी, उसका कहा सुनने के बाद भी उस पैतृक आवास के प्रति अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन नहीं कर सके. अभी भी उसके प्रति एक जिम्मेवारी है मगर अधूरी ही बनी हुई है. कोशिश होगी कि जल्द ही उस जर्जर होती काया को कुछ एहसासों के साये में, यादों की सुखद स्मृतियों में फिरसे सजीव किया जाये ताकि कल को उस आवास के आँगन में खड़े होकर यादों के जंगल में विचरण करते समय बबूल के वे काँटे न चुभें जो आज उस आँगन में बेतरतीब से खड़े हो चुके हैं.

 

01 जुलाई 2020

वर्षों पुराना सपना शायद वापस गाँव ले जाए

क्या हम लोग गाँवों की तरफ लौटना पसंद करेंगे? क्या हम शहर की भौतिकतावादी ज़िन्दगी को आज तक जीने के बाद अब गाँव में जीवन बिताना स्वीकार करेंगे? ऐसे और भी सवाल उस समय भी उठे थे जबकि चीनी वायरस कोरोना के चलते लगाये गए लॉकडाउन में मजदूरों की, श्रमिकों की वापसी गाँव के लिए हुई थी. इस तरह के सवाल उस समय भी हमारे मन में उभरे थे जबकि पिताजी के देहांत के पश्चात् गाँव के पैतृक घर की स्थिति देखी थी. उस घर के आँगन में, छत पर, चौक पर, वहाँ की छोटी सी फुलवारी में हमने अपना बचपन बिताया है, गर्मियों की छुट्टियाँ बिताई हैं इस कारण तो उस घर, आँगन से लगाव होना स्वाभाविक ही है. इसके साथ-साथ उस मकान से अपने पुरखों की तमाम स्मृतियों को जुड़े हुए देखा है, उनकी कहानियों को सुना है, उस घर के अनेक किस्सों को सुना है इसके चलते भी उस जगह से लगाव होना सहज है.


बाबा जी के देहांत के पश्चात् गाँव के घर में जाना-रहना एकाधिक बार ही हुआ. उनके बाद कभी-कभार ही जाना होता रहा. धीरे-धीरे यह आना-जाना भी बंद सा हो गया. गाँव के मकान की तरफ विचार इसलिए भी नहीं आया क्योंकि अभी वह पिताजी की देखरेख में था. उस घर में बाद में रहने का मौका भले ही न मिला हो मगर हमेशा एक सपना मन के कोने में कहीं दुबका बैठा रहता. सोचते थे कि ज़िन्दगी के एक पड़ाव पर आने के बाद पुरखों की उस विरासत पर बहुत भव्य इमारत बनवाई जाएगी. एक निश्चित समय तक कुछ न कुछ करने के बाद सारी आपाधापी से दूर उसी की छाँव में रहा जायेगा. चूँकि घर का पैतृक मकान बहुत बड़ा है, इसलिए यह भी विचार आता था कि उस मकान के एक हिस्से में गाँव के बच्चों के लिए विद्यालय खुलवा दिया जायेगा.



कालांतर में स्थितियाँ बदलती रहीं मगर मन के कोने में सजा वह सपना ज्यों का त्यों बना हुआ है. अब जबकि परिवार की नई पीढ़ी (हमारी और हमारे बाद वाली) में से किसी का गाँव आना या कहें कि वापस लौटना असंभव है. सभी भाई अपने-अपने कार्यों, रोजगार के कारण घर से बहुत दूर हैं. ऐसे में संभव है कि आने वाले समय में पैतृक घर-जमीन को निकालने की सहज, समवेत स्वीकृति बन जाये. हमारा सपना भी पूरा होगा या नहीं यह अभी कहा नहीं जा सकता है क्योंकि परिस्थितियाँ जिस तेजी से इस वर्ष बदलीं हैं, आने वाले समय में उनका क्या स्वरूप होगा इसका आकलन नहीं किया जा सकता. ऐसा नहीं कि गाँव में रहना आज के समय में मुश्किल हो गया है. आज भी हमारे परिचित में अनेक लोग ऐसे हैं जिन्होंने बहुत सुख-सुविधाओं भरा जीवन बड़े-बड़े शहरों में व्यतीत करने के बाद वृद्धावस्था में गाँव में निवास करना ही पसंद किया.

आने वाले समय के बारे में अभी से कुछ कहना संभव नहीं. भविष्य की किसी योजना के फलीभूत होने के बारे में अभी से कोई भविष्यवाणी नहीं. इसके बाद भी पैतृक घर में गाँव के बच्चों के लिए स्कूल खोलने का सपना किसी न किसी हाल में पूरा करने का प्रयास किया जायेगा. उस जमीन पर जहाँ कभी हमारे पुरखों की उपस्थिति रही हो, जिस जगह का अपना इतिहास रहा हो उस जगह पर भव्य इमारत न बने मगर एक छोटी झोपड़ी बनाने का सपना पूरा करने का प्रयास होगा. भले ही उसमें स्थायी रूप से निवास करने का अवसर न मिले मगर क्षणिक रूप से वहाँ कुछ पल गुजार कर बीते दिनों का अनुभव लेने का प्रयास किया जायेगा.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

17 सितंबर 2019

बाबा जी के आशीर्वाद से निखरता आत्मबल


अपने गाँव बचपन से ही जाना होता रहता था. गर्मियों की छुट्टियाँ कई बार गाँव में ही बिताई गईं. इसके अलावा चाचा लोगों के साथ भी अक्सर गाँव जाना होता रहता था. हमारे गाँव जाने के क्रम में कोई न कोई साथ रहता था मगर उस बार अकेले जाना हो रहा था. बिना किसी कार्यक्रम के, बिना किसी पूर्व-निर्धारित योजना के. स्नातक की पढ़ाई के लिए हमारा ग्वालियर जाना निर्धारित हो गया था. जाने का दिन भी लगभग तय हो गया था. अचानक बैठे-बैठे दिमाग में आया कि ग्वालियर जाने के पहले अईया-बाबा से मिल आया जाये. उस समय अईया-बाबा गाँव में ही हुआ करते थे. उनका उरई आना दशहरे-दीपावली के आसपास होता था. इसके बाद होली के बाद खेती वगैरह के काम से गाँव चले जाया करते थे.

बहुत छोटे से लगातार अईया-बाबा के संपर्क में रहने के कारण लगाव भी था. बहरहाल, उस दिन दोपहर बाद घर पहुँच नीचे से जैसे ही आवाज़ लगाई, अईया ख़ुशी से चहक उठीं. बाबा भी आश्चर्य में पड़ गए कि हम अचानक कैसे आ गए, वो भी अकेले. आश्चर्य होने का कारण ये और था कि हम अकेले आये थे बिना किसी सूचना के. उस समय आज की तरह मोबाइल तो थे नहीं, फोन भी नहीं थे कि खबर कर दी जाती हमारे आने की. उस समय खबरों के आदान-प्रदान का स्त्रोत पत्र हुआ करते थे या फिर गाँव से आने-जाने वाले लोग. इसके साथ-साथ आश्चर्य का एक कारण हमारा नितांत अकेले आना भी था. परिवार में किसी समय लम्बे समय तक चलने वाली जमींदारी और गाँव क्षेत्र की अपनी अलग ही स्थितियों के चलते बाबा इस तरह की स्थितियों से बचाया करते थे. आज भी हम लोगों की ये स्थिति है कि गाँव आने-जाने के दौरान निश्चित समय, रास्ता कभी न बताया जाता है. 

दो-तीन गाँव में रुकना हुआ. उन दो-तीन दिनों में बाबा से बहुत सी बातें हुईं. वैसे तो बाबा का साथ हम भाइयों को बहुत छोटे से मिला, जिसके कारण उनके द्वारा बहुत सी जानकारियाँ, शिक्षाएँ हमें मिलती रहीं. जीवन जीने के ढंग, समस्याओं से निकलने के रास्ते, परेशानियों से बचने के तरीके, खुद पर नियंत्रण रखने की स्थिति, अनुशासन में रहने का मन्त्र, सामाजिक रूप से खुद को स्थापित करने की कार्यशैली आदि पर उनके द्वारा बड़े ही रोचक ढंग से लगातार हम लोगों को बताया जाता रहता.

गाँव में अपने अल्प-प्रवास के दौरान बाबा जी ने कई बातें समझाईं, घर से बाहर अकेले रहने के दौरान आने वाली समस्याओं, उनसे निपटने के तरीके आदि भी समझाए, बिना घबराए, संयम से काम लेटे हुए आगे बढ़ने के रास्ते भी बताए. बाबा जी स्वयं बहुत कम आयु में ही पढ़ने के लिए घर से बाहर निकल आये थे. अपनी पढ़ाई के दौरा उन्होंने स्वयं बहुत संघर्ष किया था. इसका जिक्र वे कई बार हम लोगों के सामने किया करते थे और उदाहरण के लिए समझाया भी करते थे. उनके पढ़ाई के दौरान के संघर्ष को महज ऐसे समझा जा सकता है कि तत्कालीन स्थितियों में एक जमींदार परिवार के बेटे को पढ़ने के लिए बिठूर से उन्नाव ट्रक चलाना पड़ता था. बाबा जी अक्सर उस समय का बना हुआ ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया करते थे. असल में बाबा जी के बड़े भाई नहीं चाहते थे कि बाबा जी आगे की पढ़ाई करें. उनका कहना था कि मैट्रिक तक की पढ़ाई ठीक है अब घर वापस आकर खेती और अन्य कामों में सहयोग करें. ऐसे में बाबा जी अपनी जिद से कानपुर में पढ़ाई कर रहे थे. बड़े बाबा जी घर से प्रतिमाह भेजी जाने वाली सामग्री में सबकुछ भेजते, बस रुपये नहीं भेजते थे. ऐसे में धन की कमी को बाबा जी अपने एक मित्र की ट्रांसपोर्ट कंपनी का ट्रक चलाकर पूरा किया करते मगर उन्होंने कभी घर में इसकी शिकायत न की.

उन्हीं बातों के दौरान बाबा जी की एक बात आज तक जैसे कंठस्थ है. उस बात ने या कहें कि जीवन की सबसे बड़ी सीख ने हमें व्यक्तिगत स्तर पर पारिवारिक तनाव, संघर्ष से बचाए रखा है. पिताजी के देहावसान और अपनी दुर्घटना के बाद की स्थितियों में भी यदि मनोबल कमजोर न हुआ तो बाबा जी की नसीहतों के चलते.

गाँव से वापस लौटने वाले दिन के ठीक पहले दोपहर में खाना खाने के बाद बाबा जी के पैर की उंगलियाँ चटका रहे थे. बाबा ने कहा कि स्नातक की पढ़ाई करने जा रहे हो, आगे भी खूब पढ़ना. शिक्षा ही एकमात्र ऐसी पूँजी है जिसके द्वारा संसार की किसी भी स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है. गाँव, खेती, जमीन, मकान आदि की चर्चा करते हुए उन्होंने समझाया कि हमेशा एक बात याद रखना कि गाँव की जमीन, मकान, खेत न हम लेकर आये थे, न तुम्हारे पिताजी. ये सब हमारे पुरखों के द्वारा कई पीढ़ियों से अगली पीढ़ी को स्वतः मिलता रहा है. ऐसे में इन्हें लेकर कभी लड़ाई नहीं करना. बाबा जी का कहना था कि गाँव की लड़ाई, मुक़दमेबाजी से दूर रखने के लिए तुम्हारे पिताजी-चाचा लोगों को बाहर निकाला है, तुम लोग इसके लिए लौटकर गाँव न आना. मुक़दमेबाजी, लड़ाई, पुलिस आदि झगड़ों से दूर ही रहना. दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो भी जाये कि कोई गाँव की जमीन, घर, खेत आदि पर कब्ज़ा कर ले तो अपने अधिकारों का पूरा उपयोग करो. अपनी संपत्ति को वापस लेने के लिए संघर्ष करो मगर इसके लिए खून-खराबा करने की, फौजदारी करने की आवश्यकता नहीं है. वापस गाँव लौटने की जरूरत नहीं है. शिक्षा तुमको इससे ज्यादा सम्मान, इससे ज्यादा संपत्ति प्रदान करवाएगी. पुरखों की इस संपत्ति की रक्षा करना तुम सबका दायित्व है मगर इसके लिए अपने भविष्य को, अपने परिवार को, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बिगाड़ देना समझदारी नहीं होगी.   

और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा बहुत गंभीरता से कही गईं. असल में हमारे बाबा जी स्वयं इस स्थिति के भुक्तभोगी रहे थे. अपनी सरकारी नौकरी को वे छोड़कर गाँव के घर, जमीन, खेत के लिए वापस गाँव आये थे. मुकदमेबाजी, आपसी तनाव, झगड़ों के बीच उन्होंने समय की, पढ़ाई की महत्ता को समझा-जाना था. उस समय तो बाबा जी की उन बातों सा न तो हम सन्दर्भ पकड़ पा रहे थे और न ही उनका आकलन कर पा रहे थे कि ऐसा क्यों बताया-समझाया जा रहा. बाबा जी उसके बाद बस एक वर्ष और हमारे बीच रहे, शायद वे समय की सीख देना चाह रहे थे. और यह संयोग ही कहा जायेगा कि कभी गाँव अकेले न जाने वाले हम उस दिन अचानक बिना किसी कार्यक्रम के बाबा-अईया के पास पहुँच गए.

लगभग तीन दशक का समय हो गया बाबा जी को हम लोगों से दूर गए हुए. कम नहीं होता इतना समय, इसके बाद भी लगता है जैसे उनका जाना कल की ही बात हो. उस दिन का समूचा घटनाक्रम आज भी ज्यों का त्यों दिल-दिमाग में छाया हुआ है. उनकी बहुत सी बातें आज भी हम गाँठ बाँधे हैं. उनकी शिक्षाओं ने, उनकी नसीहतों ने कभी हमें परेशान न होने दिया, कभी हमें समस्या में न पड़ने दिया, कभी आत्मविश्वास न डिगने दिया. आज बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन.


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आज, 17 सितम्बर बाबा जी की पुण्यतिथि पर 

27 जुलाई 2019

कहाँ गए सावन के वो झूले


सावन का मौसम अपने आपमें अनेक तरह की रागात्मक क्रियाएं छिपाए रहता है. रक्षाबंधन का पावन पर्व, पेड़ों पर डाले गए झूले, उनमें पेंग भरते हर उम्र के लोग, गीत गाते हुए महिलाओं का झूलों के सहारे आसमान को धरती पर उतार लाने की कोशिश. सामान्य बातचीत में जब भी सावन का जिक्र होता है तो उसके साथ सहज ही झूलों की चर्चा होने लगती है. झूलों की चर्चा होने पर उसके साथ महिलाओं का जुड़ा होना पाया जाता है. ऐसा शायद कोई दृष्टान्त सामने आया हो जबकि सावन के झूलों की बात चल रही हो और उसमें पुरुषों की चर्चा की जा रही हो. ऐसा माना जाता रहा है कि झूला झूलने का काम सिर्फ महिलाओं का है. अब ऐसा मानने वाले लोग भी कम दिखने लगे हैं. इसका कारण स्त्री-पुरुष समानता नहीं वरन झूलों का न के बराबर दिखाई देना है. पहले झूले बहुतायत में दिखाई देते थे. शायद ही कोई बड़ा, घना पेड़ बिना झूले के रहता हो. अब ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता. अब ऐसे पेड़ भी बहुत कम दिखते हैं और झूले भी न के बराबर दिखते हैं. हाँ, पार्कों में अवश्य ही ऐसे झूले दिखते हैं. उनमें बच्चों का पेंग भरते देखना सुखद लगता है. भले ही पेड़ की कमी यहाँ दिखती हो मगर झूले का असल स्वाद यहाँ अवश्य ही मिलता है.

बरगद का पेड़ (यही जगह कहलाती है बरगदिया तरे)

हमें अपना बचपन और उसके बाद की स्थिति भली-भांति याद है जबकि खूब झूला झूला जाता था. उस समय जहाँ हम लोग रहते थे वहाँ पर एक बड़ा बरगद का पेड़ हुआ करता था. जिसकी छाँव में हम बच्चे अपनी शरारतें करते और बड़े लोग अपनी चर्चाएँ. उस जगह को बरगदिया तरे कह कर पुकारा जाता था. सभी लोग उस जगह को इसी नाम से आज भी पहचानते हैं. उसी बरगद के पेड़ पर झूला डल जाया करता था फिर क्या दिन क्या रात, क्या सुबह क्या शाम, क्या बच्चे क्या बड़े, क्या महिलाएं क्या पुरुष सभी लोग झूला झूलते नजर आते थे. दो-दो, चार-चार के अलावा कई बार आठ-आठ लोग एकसाथ झूला झूलते नजर आते. किसी दिन खूब मजबूत लम्बा सा बांस लेकर बाँधा जाता और उसी के अनुपात में मोटी रस्सी. बस फिर क्या एक-एक करके झूला झूलने वालों की संख्या बढ़ती रहती, पेंग भी बढ़ती रहती. किसी-किसी दिन डंडे की जगह बड़ा सा तख्ता बाँध दिया जाता. फिर क्या, कुछ लोग एक तरफ मुंह करके बैठते, कुछ लोग दूसरी तरफ मुंह करके. कभी-कभी शरारत का आलम ये रहता कि झूले को बजे झुलाने के, पेंग बढाने के उसी को गोल-गोल घुमाया जाता रहता. जिस-जिस बच्चे को गोल-गोल घूमने से समस्या होती वह चक्कर खाता हुआ इधर से उधर डोलता नजर आता. 


अपने घर के पास के झूले के साथ-साथ ननिहाल में भी झूले का खूब आनंद उठाया है. एक बार का किस्सा तो बहुत अच्छे से याद है जबकि घर के बाहर लगे नीम के पेड़ पर झूला डाला गया. उस झूले में बजे डंडे के चारपाई का इस्तेमाल किया गया. इसका कारण ये कि हमने इच्छा जताई कि लेट कर झूला झूलना है. फिर क्या था, ननिहाल में सबके अत्यंत प्रिय होने के कारण मामा लोगों ने आनन-फानन डंडे की जगह चारपाई बाँध दी. अब लेटे-लेटे झूले का आनंद किया गया. कॉलेज टाइम में भी झूला झूलने का आनंद लिया. मेले में, प्रदर्शनी में आज भी झूला झूलने का आनंद लेते हैं. अब ये बात और है कि ये झूले पेड़ के बजाय जमीन पर खड़े होते हैं और बिजली के सहारे से गोल-गोल चक्कर लगवाते हैं. इन झूलों में रफ़्तार का मजा भले आये मगर न तो पेंग बढ़ाकर आसमान छूने जैसा रोमांच आता है, न ही महिलाओं के लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियाँ सुनाई देती हैं, न ही बच्चों की शरारतें देखने को मिलती हैं. अब तो रफ़्तार, तकनीक के चलते शोर, चीख-पुकार, चिल्ला-चोट ही सुनाई देती है. आज भी आने-जाने के दौरान, घूमने के दौरान कहीं भी पेड़ पर पड़ा झूला दिख जाता है तो बिना झूले मन मानता नहीं है. कभी-कभी इस मन को घर के जाल पर बेटी के लिए लगाए जाते झूले में झूल कर भी समझा लिया जाता है.

27 जनवरी 2018

कुछ कहता है गाँव का वो बूढ़ा घर

यादें जिंदगी को तरोताजा रखने का काम करती हैं बशर्ते इन्सान उनमें खुशियाँ तलाशने का काम करे. यादों में खुशियों के साथ-साथ ग़मों का भी समावेश होता है और इन्सान जब यादों के सफ़र पर निकलता है तब यह उसकी मानसिकता पर निर्भर करता है कि वह खुशियों में या गम में रहना चाह रहा है. आज यादों का पिटारा लेकर गाँव की यात्रा पर जाना हुआ. ऐसा नहीं कि गाँव की ये कोई पहली यात्रा थी. इससे पहले भी कई बार गाँव जाना हुआ. गाँव में खूब रहना हुआ. गाँव में घूमना-फिरना भी हुआ. पिछले एक दशक से अधिक समय में जब-जब गाँव जाना हुआ, तब-तब वहां से जुडी यादें वहां पहुँचने के पहले दिल-दिमाग पर हावी होकर पुरानी बातों का स्मरण करवा देती.


आज गाँव जाने का अवसर कुछ धार्मिक, पारिवारिक कृत्य से जुड़ा हुआ था. पारिवारिक धार्मिक मान्यताओं से जुड़े कार्यों को पूरा करवाने के बाद गाँव में अपने पैतृक मकान के दर्शन करने चल दिए, समस्त परिजनों संग. कुछ वर्षों पहले परिवार में शामिल हुए कुछ नए सदस्यों, जो परिवार की बहुओं के रूप में शामिल हुई थीं और कुछ मासूम से नन्हे सदस्य जो अपने जन्म के द्वारा परिवार से जुड़े, उन लोगों का अपने गाँव जाने का, गाँव के पैतृक मकान के दर्शन का पहला अनुभव था. पिछले एक दशक से अधिक का समय हो चूका है जबकि पैतृक आवास को निर्जन छोड़ दिया गया है. अपने परिजनों के चले जाने के एहसास ने ईंट-गारे के उस मकान को भी आहत किया होगा, तभी धीरे-धीरे उसने अपने आपको कमजोर काना शुरू कर दिया. इसके बाद भी उसके आँगन, उसकी दीवारें, उसकी छत, उसका मैदान, उसके पेड़-पौधे बराबर उन दिनों की याद दिलाते रहे जबकि हम सब बालरूप में उस घर की जमीन पर धमा-चौकड़ी मचाया करते थे.



घर की जर्जर होती दीवारों को छूकर उसी एहसास को अपने अन्दर उतारने की कोशिश हरबार की जाती थी, आज भी की गई. हर बार लगता था कि वो बूढ़ा घर, जिसने हमारे दादा, परदादा को अपने आगोश में खेलते देखा है कुछ कहना चाहता है. उसके निःशब्द संबोधन को, स्वर को सुनने की, समझने की चेष्टा हर बार की गई. समझने के बाद भी, उसका कहा सुनने के बाद भी उस पैतृक आवास के प्रति अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन नहीं कर सके. अभी भी उसके प्रति एक जिम्मेवारी है मगर अधूरी ही बनी हुई है. कोशिश होगी कि जल्द ही उस जर्जर होती काया को कुछ एहसासों के साये में, यादों की सुखद स्मृतियों में फिरसे सजीव किया जाये ताकि कल को उस आवास के आँगन में खड़े होकर यादों के जंगल में विचरण करते समय बबूल के वे काँटे न चुभें जो आज उस आँगन में बेतरतीब से खड़े हो चुके हैं.

28 मई 2016

रोते, सिसकते तन्हा गाँव

शाम का धुंधलका होते ही घर के पास बने कुंए से पानी खींचना और घर के सामने की जगह पर छिड़क कर जमीन की गर्मी, धूल को दबाने का काम शुरू हो जाता. कई-कई बाल्टी पानी खींचना, कई-कई बार का चक्कर लगाना, जमीन की दिन भर की गर्मी को शांत करने की सफल कोशिश के बाद मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक से मन झूम जाता. चारपाई बिछाने का काम भी होने लगता. कोई अपनी चटाई बिछाकर पहले से अपनी जगह को घेरने लगता. फैलते अंधियारे में कभी चाँद की चाँदनी तो कभी लालटेन की रौशनी फैलाती दिखती. इसी रौशनी के सहारे आसपास के बुजुर्ग, युवा, बच्चे, पुरुष, महिलाएँ अपने-अपने झुण्ड बनाकर विस्तार में फैली जगह में चहचाहट भर रहे होते. घर के सामने बने विशाल चबूतरे पर रामचरित मानस का नियमित पाठ होता, उसे नियमित सुनने वाले भी अपनी-अपनी जगह पर बैठे होते. बच्चों की शरारतों, युवाओं के ठहाकों, महिलाओं की रुनझुन करती हँसी के साथ-साथ मानस की चौपाइयों की स्वर-लहरी भक्तिमय रूप में घुलती रहती. शाम का धुंधलका घहराते-घहराते रात में बदलता जाता. गली भर में, चबूतरों पर, नीम के पेड़ों के नीचे पाए जाते झुण्ड भी परिवर्तित होते रहते. लोगों की जगह बदलती रहती, बैठने का स्थान बदलता रहता, आपसी वार्तालाप का विषय बदलता रहता. कभी एकदम से चिल्ला-चोट, कभी संशय भरी खुसफुसाहट, कभी ठहाके तो कभी नितांत ख़ामोशी सी.

रात में अँधेरे में सिमटती जाती अपनी-अपनी दुनिया में निमग्न ये छोटे-छोटे समूह चलायमान भी बने रहते. कुछ के घर से भोजन कर लेने की पुकार उठती. कुछ भोजन करके ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बनते, कुछ समूह का हिस्सा बने लोगों को अपने साथ ले जाकर भोजन का आनंद उठाते. कुछ ज्यादा ही मनमौजी टाइप के लोग अपनी थाली सहित सबके बीच ही प्रकट हो जाते. एक थाली, कई-कई हाथ, न जाति का पूछा जाना, न बड़े-छोटे का भान. छोटे-छोटे कौर परमानन्द की प्राप्ति कराते हुए थाली के भोजन को समाप्त करते जाते. थाली खाली होने के पहले ही भर जाती. कभी इस घर से सूखी सब्जी आ जाती तो कभी उस घर की रसीली सब्जी का स्वाद मिलता. कहीं से दाल आकर लोगों को ललचाती तो कहीं से तीखा अचार आकर चटखारे बढ़ा देता. अनौपचारिक रूप से सब एक-दूसरे से हिले-मिले कहानी, किस्सों, लोकगीतों के हिंडोले पर कब नींद के आगोश में खो जाते, पता ही नहीं चलता. ऐसा नहीं कि रातें ही ऐसे खुशगवार गुजरती वरन सुबह से लेकर शाम आने तक जिंदगी ऐसे ही खुशगवार तरीके से गुजरती. दिन भर धूप की, गर्मी की चिंता से मुक्त कभी खलिहान, कभी बगिया की सैर. कभी नीम के झोंके पकड़ने की होड़ में झूलों की पेंग कभी तालाब की गहराई नापने की होड़ तो कभी बम्बा की धार को पीछे छोड़ने की सनक. आम, अमिया पर निशाना साधने को फेंके जाते पत्थर; तरबूज-खरबूज को एक मुक्के से तोड़ने की प्रतियोगिता दिन-दिन भर बच्चों के बीच चलती रहती.


गर्मी हो या सर्दी, सभी मौसम में बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक की एकसमान गतिविधियाँ. सभी की सहयोगात्मक स्थिति. सभी के बीच प्रेम, स्नेह, सौहार्द्र का गुलशन लगातार महकता रहता. बच्चों से लेकर बड़ों तक अपनापन दिखाई देता. किसी के बीच किसी तरह भेदभाव समझ नहीं आता. घर की चौखटों पर कोई प्रतिबन्ध न दिखाई देता. गलियाँ चहकती-महकती रहती. समय ने बहुत कुछ बदल दिया. इंसानों को भी बदला. गाँवों की संस्कृति को भी बदला. खेतों, खलिहानों, बगीचों, गलियों की मिट्टी की सुगंध को बदला. नीम के पेड़ों पर पड़े झूलों को बदला, तालाबों, नदियों, बम्बों के पानी को बदला. गुलजार रहने वाले खेत, खलिहान, बगीचे, गलियाँ अब सुनसान से दिखाई देते हैं. चबूतरे वीरान हैं, नीम तन्हा खड़े हैं, झूले खामोश लटके हैं, गलियों में सुगन्धित मिट्टी की जगह सीमेंट की गर्मी उड़ रही है. एक थाली में भोजन की परम्परा की जगह घर के आँगन में दीवार खिंची है. अपनेपन की जगह स्वार्थ दिखाई देने लगा है. प्रेम-स्नेह की जगह वैमनष्यता ने ले ली है. अब न दिन चहकते दिखते हैं और न ही रातें गुलज़ार दिखती हैं. कुँओं की जगत पर खिलखिलाहट नहीं सुनाई देती. गली के मकानों से भोजन कर जाने की आवाजें भी नहीं उठती. सब अपने-अपने में मगन हैं. सब अपने-अपने घरौंदों में सिमटे हैं. कभी चहकता-महकता दिखता गाँव तन्हा है, खामोश है. अपने में सिसकता है, अपने में रोता है किन्तु अब उसके आँसू देखने वाला कोई नहीं, उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं, उसके हालचाल जानने वाला कोई नहीं. 

27 फ़रवरी 2009

हमारे प्राकृतिक ज्ञान को कौन बचायेगा?

एकदम से सरदी का जाना और फरवरी के अन्त में ही गरमी जैसा मौसम दिखना बताता है कि मौसम का मिजाज कुछ बदलने वाला है। अब क्या बदलेगा और कैसे बदलेगा, यह तो पता नहीं पर जो जानकार हैं वे बता सकते हैं कि क्या बदलेगा? मौसम के मिजाज को देखकर, हवाओं के रुख को देखकर, बारिश के होने न होने को देखकर गाँव के बुजुर्ग बता दिया करते थे कि आगे क्या होने वाला है। हो सकता है कि गाँवों में आज भी कुछ लोग इस तरह के आज भी हों जो मौसम को देखकर आगे की जानकारी दे सकते हैं। यह सब उन नये लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है जो गाँव से सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं रखते हैं पर वे सभी लोग अवश्य ही इससे परिचित होंगे। अब गाँव को भी शहरों में बदलने का कार्यक्रम चल रहा है। तकनीक का आना और उसका उपयोग किसी भी रूप में बुरी बात नहीं है किन्तु तकनीक के नाम पर अपनी संस्कृति को और ज्ञान को भुला देना अवश्य ही गलत बात है। गाँव में भी आज जिस तरह से सांस्कृतिक वातावरण का विकास हो रहा है (इसे विकास न कहें तो शायद बेहतर होगा) वह किसी भी रूप में स्वस्थ परम्परा की स्थापना नहीं कर रहा है। हमारा जो भी प्राकृतिक ज्ञान था आज उसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है। जो बुजुर्गवार आज भी इस धरोहर को संभाले बैठे हैं वे अपनी विद्या किसी न किसी को सिखाना चाहते हैं पर युवा वर्ग इस ओर आकर्षित ही नहीं हो रहा है। इस तरह के माहौल से हमारा ज्ञान सदा-सदा को विलुप्त हो रहा है। क्या यह सम्पदा सुरक्षित रह पायेगी? क्या कोई इस ओर भी सकारात्मक प्रयास करेगा? काश! कोई विदेशी इस पर किसी तरह से अपनी नजरें इनायत कर दे तो सम्भव है कि इस प्राकृतिक ज्ञान का भी भला हो जाये। हम भारतीयों के हाथ में तो बहुत कुछ वैसे भी नहीं रहता है...........हमारी तरक्की, हमारी प्रतिभा को तो विदेशी ही तय करते हैं???