व्यापार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
व्यापार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

19 जून 2026

क्या बेरोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी न मिलना है?

क्या बेरोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी न मिलना है?

किसी और के बजाय यदि अपनी ही बात करें.... तो कृपया बताया जाये कि हम कब बेरोजगार रहे, कब हमें रोजगार वाला माना जायेगा?

+++

==>> 1995 में एम.ए. करते ही डी.वी.कॉलेज में अंशकालिक प्रवक्ता के रूप में अर्थशास्त्र विषय में अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया था.

==>> इसके पश्चात् 2002 तक डी.वी.कॉलेज में ही हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य अंशकालिक प्रवक्ता के रूप में किया.

==>> दिसम्बर 2005 से लेकर मार्च 2019 तक गांधी महाविद्यालय में हिन्दी विषय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहे.

==>> मार्च 2019 से अभी तक गांधी महाविद्यालय में ही हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में स्थायी नियुक्ति मिलने के पश्चात् कार्यरत हैं.

==>> 1995 से लेकर अभी तक की समयावधि में बीच में कुछ समय ऐसा भी आया जबकि किसी तरह की नौकरी नहीं की बल्कि लेखन से, कुछ फुटकर कार्यों से, स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए किये कार्यों से आमदनी होती रही.


18 फ़रवरी 2026

धार्मिक विरासत का विकास मॉडल - अयोध्या

जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.

 



आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए. अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400 करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.

 

किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है. इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है. इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन, परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.

 

इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं.

 

प्रवासी भारतीयों, देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान प्राप्त की है. अध्ययन के अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर दिया है.

 

 


09 अप्रैल 2025

टैरिफ वॉर की चपेट में वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये गए टैरिफ वॉर से वैश्विक व्यापारिक जगत में हाहाकार मचा हुआ है. दुनिया भर के शेयर बाजार धड़ाम नजर आ रहे हैं. यदि सिर्फ अमेरिकी शेयर बाजार की चर्चा करें तो टैरिफ लगाने के बाद से यहाँ लगभग छह ट्रिलियन डॉलर अर्थात लगभग 516 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं. यदि भारतीय बाजार के सन्दर्भ में देखा जाये तो यह रकम भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के आकार से दोगुनी है. सोचा-समझा जा सकता है कि टैरिफ लगाये जाने की घोषणा से बाजार का जो हाल हुआ है, उससे आगे क्या हाल होने वाला है. बाजार की ऐसी स्थिति के स्पष्ट रूप से दिखाई देने के बाद भी ट्रम्प अपने फैसले को जबरिया सही सिद्ध करने पर उतारू हैं. दुनिया भर के 60 देशों पर टैरिफ लगाने के बाद अमेरिका सहित एशिया, यूरोप के बाजारों में भयंकर गिरावट दिख रही है, बावजूद इसके ट्रम्प इसकी तरफ से आँखें मूँद कर इसे एक दवा बता रहे हैं. जहाँ एक तरफ वैश्विक स्तर पर तमाम विशेषज्ञ ट्रम्प के इस टैरिफ वॉर की आलोचना कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्‍ट्रपति एक सवाल के जवाब में दो टूक भाषा में टैरिफ विरोध को दरकिनार करते हुए कहते हैं कि मैं किसी चीज में गिरावट नहीं चाहता लेकिन चीजें ठीक करने के लिए दवाई देनी पड़ती है.

 



आखिर ये समझने का विषय है कि किस कारण से ट्रम्प टैरिफ लागू किये जाने की जिद पकड़े हैं? ये भी जानने-समझने का विषय हो सकता है कि आखिर किस कारण से ट्रम्प को टैरिफ एक तरफ दवाई नजर आ रही है तो दूसरी तरफ खूबसूरत चीज दिखाई दे रही है. ट्रम्प ने सोशल मीडिया के एक मंच पर लिखा भी है कि चीन, यूरोपीय संघ और कई अन्य देशों के साथ हमारा विशाल वित्तीय घाटा है. इस समस्या का समाधान सिर्फ टैरिफ़ से ही संभव है. इससे अमेरिका में अरबों डॉलर आ रहे हैं. क्या वाकई टैरिफ की नई दरों से अमेरिका में अरबों डॉलर आ रहे हैं या फिर यह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनी बात को पुख्ता किये जाने के लिए कहा गया है? यदि बाजार के सन्दर्भ में अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर नजर डालें तो साफ़ समझ आ रहा है कि अमेरिकी सरकार पर कर्ज का बहुत बड़ा बोझ है. आँकड़े बताते हैं कि अमेरिकी सरकार वर्तमान में 36.1 ट्रिलियन डॉलर क़र्ज़ की सर्वोच्च सीमा पर है. इसके अलावा अमेरिका के लिए आर्थिक स्तर पर जो बुरी खबर है वो यह कि वर्तमान में अमेरिकी सरकार प्रतिवर्ष लगभग 900 बिलियन डॉलर से एक ट्रिलियन डॉलर के आसपास ब्याज का भुगतान करती है. टैरिफ के कारण अमेरिकी बॉण्ड यील्ड में आई गिरावट हाल-फिलहाल ट्रम्प सरकार के लिए राहत जैसी समझ आ रही. टैरिफ के कारण अमेरिका के दस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4 प्रतिशत की गिरावट आई है. इसी तरह से बीस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4.25 प्रतिशत और तीस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4.3 प्रतिशत की गिरावट आई है. यह गिरावट इसलिए राहत का विषय हो सकती है क्योंकि इससे ब्याज देनदारी में कमी आएगी. ऐसी विषम स्थिति में ट्रम्प सरकार को राहत दिलाने का यह काम भले टैरिफ के माध्यम से होता दिखे मगर वह क्षणिक है और दीर्घकाल में समूचे विश्व में इसका नकारात्म्मक असर दिखने की आशंका है.

 

ट्रम्प के टैरिफ वॉर का असर वैश्विक स्तर पर तो पड़ेगा ही उसका अमेरिका पर भी काफी बुरा असर पड़ेगा. तात्‍कालिक प्रभाव से शेयर बाजार में छह लाख करोड़ डॉलर तो डूब ही चुके हैं जो अमेरिका की अर्थव्‍यवस्‍था का लगभग 20 प्रतिशत है. इसके साथ-साथ एशिया, यूरोपीय बाजारों में यह आँकड़ा सोच से कहीं अधिक बुरी कहानी बयान करता है. ऐसी स्थिति के चलते अमेरिका में मंदी की आशंका जताई जा रही है. विश्व की अनेक कम्पनियाँ जो अमेरिका को अपने उत्पाद, सेवाएँ भेजती हैं, उनके कारोबार और बाजार मूल्‍यांकन में तगड़ी गिरावट देखी जा रही है. इससे नौकरियों पर भी संकट आ गया है. यदि यश स्थिति वैश्विक रूप में मंदी के रूप में सामने आती है तो छोटी अर्थव्‍यवस्‍थाओं के लिए इससे उबरना मुश्किल हो जाएगा.

 

ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका ने भले ही दो अप्रैल को अपना नया लिबरेशन दिवस घोषित करते हुए अमेरिका के अनेक व्यापारिक साझेदारों पर जवाबी शुल्क लगा दिया हो मगर इससे अमेरिका की स्थिति में सुधार होने की सम्भावना हाल-फिलहाल तो नजर नहीं आती है. बजाय किसी तरह के सुधार के एक सम्भावना यह बनती दिख रही है कि कहीं वैश्विक व्यापारिक क्षेत्र में अमेरिका शेष विश्व से अलग न हो जाये. ट्रम्प ने भले ही अमेरिका को अपने ही आर्थिक झंझावातों से बाहर निकालने के लिए, अमेरिका को कर्ज के मकड़जाल से मुक्त करवाने के लिए टैरिफ लगाये जाने का निर्णय लिया मगर इससे एशिया, यूरोप की अर्थव्यवस्था में अलग तरह के बदलाव देखने को मिल सकते हैं. विश्व की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अमेरिका से इतर एक नई व्यापारिक व्यवस्था को स्वीकार कर सकती हैं. निश्चित ही ऐसा होना वैश्वीकरण की व्यवस्था को पूरी तरह से उलट देने जैसा होगा. टैरिफ की घोषणा के आने मात्र से होने वाली उठापटक के बाद इसके दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सुखद कल्पना तो कदापि नहीं की जा सकती है. देखना यह है कि आने वाले समय में ट्रम्प द्वारा शुरू किया गया टैरिफ वॉर क्या अंतिम परिणाम सामने लाता है?


06 नवंबर 2024

भारतीय सन्दर्भ में डोनाल्ड ट्रंप की जीत

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने जीत हासिल की. उन्होंने अपनी प्रतिद्वन्द्वी कमला हैरिस को पराजित किया. राष्ट्रपति पद की जीत के लिए आवश्यक 270 इलेक्टोरल वोट के आँकड़े को पार करते हुए इस जीत को हासिल किया. इस जीत से उन्होंने अमेरिका में 132 वर्ष पूर्व हुए राष्ट्रपति चुनाव परिणाम की बराबरी कर ली है. दरअसल ट्रंप 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे जो 2020 में हुए अगले राष्ट्रपति चुनाव में हार गए थे. इस हार के बाद वे अब 2024 में पुनः विजयी हुए हैं. अमेरिका में ऐसा 132 साल बाद हुआ है जब कोई व्यक्ति दूसरी बार राष्ट्रपति बना हो मगर उसने चुनाव लगातार न जीता हो. डोनाल्ड ट्रंप के पहले ग्रोवर क्लीवलैंड 1884 में और फिर 1892 में राष्ट्रपति बने थे.

 

डोनाल्ड ट्रंप की जीत को लेकर भारत में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे थे. उनकी जीत से भारतीय शेयर बाजार पर भी प्रभाव पड़ता दिखा है. इसका एक कारण है कि अमेरिकी चुनाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. भारत का व्यापार अमेरिका के साथ वैश्विक स्तर पर अपना महत्त्व रखता है. भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों की दृष्टि से देखा जाये तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021-2022 में 119.42 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हुआ था, जबकि इसके पूर्व 2020-21 में यह 80.51 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था. इस व्यापारिक संबंधों का प्रभाव निश्चित रूप से सकारात्मक ही होगा. ट्रंप के आने का सबसे ज्यादा फायदा उन उद्योगों को होने वाला है जो निर्यात से जुड़े हैं. इसमें चाहे मैन्युफैक्चरिंग कम्पनियाँ हों या इन कम्पनियों के उत्पादों को बाहर भेजने वाली कोई तीसरी कम्पनी. आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार ऑटोमोबाइल, मशीनरी, टेक्सटाइल और कैमिकल आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है. ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है कि ट्रंप की नीतियाँ अमेरिकी कम्पनियों को भारत में निवेश के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं. इस कारण से भी भारत-अमेरिका के बीच पारस्परिक सह-संबंधों में जबरदस्त सुधार देखने को मिल सकते हैं.

 



भारतीय निर्यात को महत्वपूर्ण लाभ मिलने की उम्मीद के साथ-साथ ट्रंप द्वारा पूर्व में चीनी उत्पादों पर हाई टैरिफ लगाए जाने का सकारात्मक असर भारतीय व्यापारिक नीति में दिखाई पड़ सकता है. ट्रंप ने चीन से आने वाले सोलर पैनल, वॉशिंग मशीन, स्टील और एल्युमीनियम समेत अनेक उत्पादों पर टैरिफ्स लगाए थे. इससे अमेरिका में उनका निर्यात बहुत मुश्किल हो गया था. वहाँ की कम्पनियाँ इन उत्पादों की माँग की आपूर्ति के लिए दूसरे विकल्पों की ओर देखने लगी थीं. इन विकल्पों में एक नाम भारत का भी शामिल था. ऐसा माना जा रहा है कि वर्तमान जीत के बाद भी ट्रंप का रवैया या नजरिया चीन के प्रति कोई खास बदलने वाला नहीं है. यदि ऐसा रहा तो निश्चित ही माल की आपूर्ति के लिए वहाँ की कम्पनियों को दूसरे देशों को विकल्प के रूप में स्वीकारना होगा. ऐसी स्थिति में भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और अमेरिका के साथ इसके संबंध देश को चीन का विकल्प बनने के लिए प्रबल दावेदार बनाते हैं. इससे अमेरिकी बाजार में ऑटो पार्ट, सौर उपकरण और रासायनिक उत्पाद आदि भारतीय निर्माताओं को स्थान मिल सकता है.

 

निर्यातक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलता मिलने की एक उम्मीद के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा क्षेत्र में ट्रंप की नीतियों का लाभ भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में तेजी ला सकता है. अमेरिकी इन क्षेत्रों को मजबूत बनाने के लिए भारतीय रक्षा कम्पनियों के साथ बेहतर सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं. भारत-अमेरिका के बीच रक्षा और सैन्य सहयोग पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुआ है. क्वाड समूह के द्वारा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव को कम करने सम्बन्धी कदम उठाया था. ट्रंप के पिछले कार्यकाल में हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर क्षेत्र में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्वाड समूह के द्वारा सुरक्षा साझेदारी को मजबूत किया गया था.  ऐसी स्थिति में वर्तमान में ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को बेहतर तथा मजबूत बनाये जाने की प्रबल सम्भावना है.

 

इन व्यापारिक, रक्षा सम्बन्धी मामलों के साथ-साथ ऐसा माना जा रहा है कि ट्रंप की जीत से रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति आने की सम्भावना है. अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप लगातार यह कहते नजर आये हैं उनके जीतने का सुखद परिणाम रूस-यूक्रेन युद्ध रुकने के रूप में सामने आएगा. यद्यपि अमेरिका और भारत की नीति एवं वैचारिक रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अलग-अलग रही है किन्तु जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी कई मंचों पर कहते नजर आये हैं कि ये युद्ध का समय नहीं है, ऐसे में संभव है कि ट्रंप की पहल से यह युद्ध रुक जाये. युद्ध का रुकना भारतीय सन्दर्भों में भी लाभकारी है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ-साथ ट्रंप बांग्लादेश मामले में भी वहाँ हिन्दुओं पर हो रही हिंसा का विरोध करते रहे हैं. ऐसे में जबकि माना जा रहा है कि बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम सरकार में अमेरिका का हस्तक्षेप बना हुआ है. ऐसे में ट्रंप के आने से एक उम्मीद यह भी है कि बांग्लादेश के हालात और वहाँ हिन्दुओं की हालत में सुधार होगा. यदि ऐसा होता है तो यह भी निश्चित रूप से भारत के लिए लाभकारी होगा.

08 जुलाई 2024

नरेन्द्र मोदी की रूस यात्रा के निहितार्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को अपनी दो दिवसीय यात्रा पर रूस पहुँचे. यहाँ वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ भारत-रूस द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे. तीसरे कार्यकाल की उनकी यह पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा है. ऐसे समय में जबकि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल है; रूस-यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से बेनतीजा चल रहा है; रूस और चीन के बीच सम्बन्ध दोस्ताना दिख रहे हैं, यह यात्रा महत्त्वपूर्ण हो जाती है. यह यात्रा उनकी पिछली परम्परा से हटकर है, इसलिए भी उनकी इस यात्रा को अलग नजरिये से देखा जा रहा है. नरेन्द्र मोदी ने पूर्व के दोनों कार्यकालों में पहली द्विपक्षीय यात्रा में पडोसी देशों को महत्त्व दिया था. पहले और दूसरे कार्यकाल में उनकी यात्रा क्रमशः भूटान और मालदीव की हुई थी. ऐसे में इस बार उनका पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए रूस जाना कूटनीतिक, व्यापारिक, सामरिक केन्द्र में है.

 

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते भी मोदी की रूस यात्रा महत्त्वपूर्ण है. मोदी ने वर्ष 2022 में उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में पुतिन संग द्विपक्षीय वार्ता के दौरान यूक्रेन से युद्ध समाप्त करने को कहा था. पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के साथ मोदी ने कई बार टेलीफोन पर बातचीत करते हुए युद्ध समाप्ति हेतु कूटनीतिक दबाव बनाना जारी रखा है. चूँकि इस बार भारत शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के कजाकिस्तान शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुआ. रक्षा मामलों के विशेषज्ञों की राय है कि भारत इस उम्मीद के साथ एससीओ में शामिल हुआ था कि उसका प्रभाव मध्य एशिया में बढ़ेगा किन्तु इसमें चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण ऐसा नहीं हो सका. इसके अलावा पाकिस्तान भी अब एससीओ का सदस्य है. ऐसे में चीन के बढ़ते प्रभाव और हस्तक्षेप के कारण भारत को अपनी स्थिति महत्त्वपूर्ण न लगी होगी. विशेष बात ये है कि रूस और चीन इस संगठन के सदस्य हैं. ऐसे में इस रूस यात्रा में सम्भव है कि मोदी द्वारा चीन के बढ़ते प्रभावों का मुद्दा भी उठाया जाये.

 



रूस भारत का सबसे पुराना और भरोसेमंद मित्र, सहयोगी है. रूस के द्वारा अनेक मुश्किल पलों में भारत का साथ दिया गया. आज भी भारत के साथ उसके गहरे व्यापारिक सम्बन्ध हैं. दोनों देशों में लम्बे समय से रणनीतिक साझेदारी के अन्तर्गत रक्षा, अंतरिक्ष और आर्थिक समझौतों पर सहमति है. भारत द्वारा भी रूस के साथ अपनी मित्रता और भरोसे को बनाये रखा गया है. रूस पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद भारत-रूस का आयात-निर्यात सम्बन्ध बना हुआ है. भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में फार्मास्यूटिकल्स, कार्बनिक रसायन, विद्युत मशीनरी और यांत्रिक उपकरण, लोहा और इस्पात शामिल हैं जबकि रूस से आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक, खनिज संसाधन, कीमती पत्थर और धातु, वनस्पति तेल आदि शामिल हैं. व्यापारिक संबंधों की महत्ता को वाणिज्य विभाग के आँकड़ों से समझा जा सकता है. उसके अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार 65.70 बिलियन डॉलर में भारत का निर्यात 4.26 बिलियन डॉलर और आयात 61.44 बिलियन डॉलर रहा जो अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है.

 

व्यापारिक महत्त्व के रूप में अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) भी प्रमुख है. भारत और रूस दोनों के लिए यह सम्पर्क मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह गलियारा माल ढुलाई के लिए जहाज, रेल और सड़क मार्गों का 7200 किमी लंबा मल्टी-मोड नेटवर्क है. भारत, ईरान और रूस ने इससे सम्बंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे ताकि ईरान और सेंट पीटर्सबर्ग के माध्यम से हिन्द महासागर और फारस की खाड़ी को कैस्पियन सागर से जोड़ने वाला सबसे छोटा परिवहन मार्ग प्रदान करने के लिए एक गलियारा बनाया जा सके. हाल ही में रूस ने पहली बार इसके द्वारा भारत को कोयला ले जाने वाली दो ट्रेनें भेजी हैं. यद्यपि यह मार्ग अभी पूर्ण रूप से शुरू नहीं हुआ है तथापि जब यह मार्ग पूरी तरह चालू हो जाएगा तो भारत और रूस के बीच व्यापारिक गतिविधियाँ तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

 

पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने का उद्देश्य रूस को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अकेला करना था मगर भारत ने रूस का साथ देते हुए कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा रूस के साथ किये जा रहे सौतेले व्यवहार के पक्ष में भारत नहीं है. ऐसे में भारत ने रूस के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के साथ-साथ सामरिक सम्बन्धों को भी बनाये रखा. सामरिक महत्त्व में भारत द्वारा रूस से एस-400 मिसाइलों की खरीदारी महत्त्वपूर्ण विषय है. टी-90 टैंक, एसयू 30, एके 203 राइफलें भी भारत में ही संयुक्त उत्पादन में निर्मित हो रही हैं. इस तरह के रक्षा सम्बन्धों के साथ-साथ सहयोगात्मक विदेश नीति के कारण भारत-रूस सम्बन्धों का वैश्विक दृष्टि से व्यापक प्रभाव है.

 

विगत कुछ समय से वैश्विक स्तर पर युद्ध की स्थितियाँ चारों तरफ बनती दिखाई देने लगी हैं. बहुसंख्यक देशों के बीच तनाव भी नजर आ रहा है. ऐसे में वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका, चीन, पश्चिमी देशों की अनावश्यक अराजकता, आक्रामकता, विस्तारवाद जैसी स्थितियों से बचाने के लिए शक्ति संतुलन की आवश्यकता है. नरेन्द्र मोदी सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाते हुए भारतीय सम्बन्धों को पश्चिमी देशों, यूरोपीय देशों सहित अमेरिका के साथ संतुलन बनाये रखने हेतु लगातार प्रयासरत हैं. निश्चित ही रूस की इस यात्रा से भारत के साथ-साथ सकल विश्व को भी सकारात्मक सन्देश प्राप्त होगा.


18 जून 2023

जीआई टैग से मिलती वैश्विक पहचान

उत्तर प्रदेश सरकार एवं नाबार्ड के संयुक्त प्रयास से बुन्देलखण्ड के कालपी के हस्तनिर्मित कागज़ को भारत सरकार ने बौद्धिक सम्पदा स्वीकारते हुए उसे जीआई टैग दिया है. इससे यहाँ के कागज को पूरे विश्व में अलग पहचान मिलेगी. पदमश्री से सम्मानित जीआई टैग विशेषज्ञ डॉ. रजनीकान्त दुबे ने बताया कि कालपी के हस्तनिर्मित कागज का जीआई में 733 नम्बर से पंजीकृत किया गया है. कोरोनाकाल में जीआई पंजीकरण हेतु कालपी की हस्तनिर्मित कागज समिति ने अपना आवेदन चेन्नई भेजा था. एक लम्बी और कानूनी प्रक्रिया के बाद कालपी के हाथ कागज उद्यमियों को यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ. यहाँ के हस्तनिर्मित कागज को जीआई टैग मिलने के पहले भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र के महोबा के देसावरी पान को, बाँदा के गौरा पत्थर को भी जीआई टैग मिल चुका है. इसके साथ-साथ यहाँ के अदरख, कठिया गेंहू, अरहर की दाल को भी जीआई टैग दिलवाने की प्रक्रिया चल रही है.

 

अभी हाल ही में चार नए सामानों, जिनमें बागपत होम फर्निशिंग, अमरोहा ढोलक, कालपी हस्तनिर्मित कागज और बाराबंकी हैंडलूम शामिल हैं, को जीआई टैग मिलने के बाद उत्तर प्रदेश के जीआई प्रमाणित उत्पादों की संख्या 52 हो गई है. जीआई विशेषज्ञ पद्मश्री रजनीकांत जिनकी संस्था ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन प्रमाणन प्राप्त करने के लिए तकनीकी सुविधा प्रदान करती है, के अनुसार वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) में शामिल इन उत्पादों को जीआई टैग प्रदान किया गया. उनके अनुसार 52 उत्पादों के 40 शिल्पों के साथ हस्तशिल्प मामले में प्रदेश पहले स्थान पर है. अकेले वाराणसी क्षेत्र में 23 में से 18 जीआई टैग वाले उत्पाद हस्तशिल्प श्रेणी के हैं. वर्तमान में देश में जीआई टैग उत्पादों की कुल संख्या 432 हो गई है. इसमें कश्मीर का केसर और पश्मीना शॉल, हिमाचल का काला जीरा, तिरुपति के लड्डू, बंगाल का रसगुल्लाछत्तीसगढ़ का जीराफूल, बीकानेरी भुजिया, ओडिशा की कंधमाल हल्दी, कर्नाटक की कुर्ग अरेबिका कॉफी, केरल की रोबस्टा कॉफी, दार्जीलिंग की चाय, रतलामी सेव, नागपुर के संतरे, बनारस की बनारसी साड़ी, राजस्थान का फुलकारी (हस्तशिल्प ), मध्य प्रदेश के झाबुआ का कड़कनाथ मुर्गा, राजस्थान का दाल बाटी चूरमा, कोलकाता की मिष्टि दोई सहित कई उत्पाद शामिल हैं. सबसे अधिक जीआई रखने वाले शीर्ष पाँच राज्य कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और केरल हैं.

 



किसी भी क्षेत्र की पहचान उसके उत्पाद से भी होती है. जब उस उत्पाद की ख्याति जब देश-दुनिया में फैलती है तो उसे प्रमाणित करने वाली प्रक्रिया को जीआई टैग कहा जाता है. इसे जियोग्राफिकल इंडीकेटर अथवा भौगोलिक संकेतक के नाम से जाना जाता है. देश की संसद ने उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर दिसंबर 1999 में वस्तुओं का भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम पारित किया. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के एक सदस्य के रूप में बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार-संबंधित पहलुओं पर समझौते का अनुपालन करने के लिए भारत ने यह अधिनियम पारित किया था. वर्ष 2003 में इसके लागू होने के बाद वर्ष 2004 में देश में सबसे पहले दार्जिलिंग की चाय को जीआई टैग मिला था. कृषि से सम्बंधित, हैंडीक्राफ्ट्स से सम्बंधित, खाद्य सामग्री से सम्बंधित उत्पादों को जीआई टैग दिया जाता है. जीआई टैग के द्वारा उत्पादों को कानूनी संरक्षण मिलता है. इसके बाद बाजार में उसी नाम से दूसरा उत्पाद नहीं लाया जा सकता है. इसके साथ ही जीआई टैग किसी उत्पाद की गुणवत्ता का पैमाना भी होता है. कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के अनुसार जीआई टैग को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में एक ट्रेडमार्क के रूप में देखा जाता  है. यह ऐसे कृषि, प्राकृतिक अथवा हस्तनिर्मित उत्पादों की गुणवत्ता और विशिष्टता का आश्वासन देता है जो एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से उत्पन्न होता है. इसके चलते देश के साथ-साथ विदेशों में भी उस उत्पाद को सहजता से बाजार उपलब्ध हो जाता है.

 

किसी उत्पाद के लिए जीआई टैग प्राप्त करने के लिए चेन्नई स्थित पेटेंट, डिजाइन और व्यापार चिह्नों के नियंत्रक के ऑफिस में आवेदन करना होता है. इसके लिए उत्पाद को बनाने वाली संस्था आवेदन कर सकती है. कुछ क्षेत्रों में जीआई टैग के लिए सरकारी स्तर पर भी आवेदन किया जा सकता है. आवेदन करने वाले को उत्पाद की मौलिकता, ऐतिहासिकता, उसके महत्त्वपूर्ण होने सम्बन्धी जानकारी को सबूतों सहित देना होता है. सम्बंधित उत्पाद के मानकों पर खरा उतरने के बाद ही उसे जीआई टैग दिया जाता है. इसे भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री द्वारा उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत जारी किया जाता है. एक भौगोलिक संकेतक का पंजीकरण दस वर्ष की अवधि के लिये वैध होता है. इसके पश्चात् इसका नवीनीकरण करवाना होता है.

 

देश के बहुत सारे उत्पाद अपनी वैश्विक पहचान के लिए जाने जाते हैं. बहु-सांस्कृतिक लोकाचार, प्रामाणिकता एवं जातीय विविधता देश की अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण उत्प्रेरक का कार्य कर सकती है. जीआई टैग इसी तरह के उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सकता है. इसके साथ-साथ इससे स्थानीय समुदायों को भी लाभ मिलेगा. वे लोग अपने उत्पादों की न केवल सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो सकते हैं वरन उसकी मौलिकता को भी बचाए रख सकते हैं. इससे सम्बंधित क्षेत्र के उत्पाद, यहाँ की प्रतिभा को उद्यमिता, व्यक्तियों के कौशल के मुद्रीकरण तथा व्यवसायों को तीव्रता से बढ़ाने के नए अवसर मिल सकेंगे. घरेलू स्तर पर किये गए शिल्पकार्य का मुद्रीकरण देश में निम्न महिला श्रमबल भागीदारी दर में सुधार करेगा. इससे एमएसएमई क्षेत्र का भी कायाकल्प होगा जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 31 प्रतिशत और निर्यात में 45 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है.

 

जीआई टैग के द्वारा ऑनलाइन बाजार की उपलब्धता भी सहज हो जाती है. देश के ई-कॉमर्स क्षेत्र में आधुनिक वितरण प्रणाली उपलब्ध होने के कारण जीआई उद्योग को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है. ऑनलाइन बाजार के एक प्लेटफ़ॉर्म द्वारा चलाये गए लोकल-टू-ग्लोबल कार्यक्रम ने भारतीय उत्पादकों और उनके उत्पादों, जैविक उत्पादों को 200 से अधिक देशों में पहुँचाया है. बताया जाता है कि वर्ष 2019 से वर्ष 2021 के बीच अमेज़न ने दो बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य के मेड इन इंडिया उत्पादों का निर्यात किया है. प्रारंभिक चरण में जीआई उत्पादों को सरकारों के समर्थन की आवश्यकता है. विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि जीआई के तहत उत्पादों के पेटेंट और कॉपीराइट संरक्षण के परिणामस्वरूप उच्च आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, साथ ही गुणवत्तापूर्ण उत्पादन को बढ़ावा मिलता है.   






 

26 दिसंबर 2022

रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण से बढ़ेगी आर्थिक शक्ति

पिछले दिनों भारतीय आर्थिक क्षेत्र में दो उल्लेखनीय घटनाओं का उद्भव हुआ. एक तो केंद्र सरकार द्वारा व्‍यापार नीति के तहत निर्यात संवर्धन योजनाओं के लिए अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार निकायों को भारतीय रुपए में लेन-देन की अनुमति देना रहा है. दूसरी घटना भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा डिजिटल रुपये की पेशकश के लिए पहली पायलट परियोजना दिसम्बर माह में मुंबई, नई दिल्ली, बेंगलुरु और भुवनेश्वर में शुरू करना रही. इन दो घटनाओं से भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक सुधार आने की सम्भावना देखी जा रही है. अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार में रुपये का लेन-देन होने से जहाँ भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलेगी वहीं डिजिटल रुपये के आने से लेन-देन सहज हो सकेगा. एक अनुमान के अनुसार विदेशी व्यापार भुगतान में औसतन छह प्रतिशत तक शुल्क लगता है. डिजिटल मुद्रा आने से, भारतीय रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण होने से इस शुल्क में कमी आएगी. 


अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार निकायों को भारतीय रुपए में लेन-देन की अनुमति देने का उद्देश्य घरेलू मुद्रा में व्यापार को सुगम बनाना और बढ़ावा देना है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि भारतीय रुपये के अंतरराष्‍ट्रीयकरण करने की रुचि में वृद्धि को देखते हुए रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के निपटाने को मंजूरी देने का फैसला लिया गया है. इससे आयात और निर्यात के बारे में इनवॉयस तैयार करने, भुगतान और निपटान भारतीय रुपए में किया जा सकेगा. वर्तमान में आयात के मामले में भारतीय कंपनी को विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है. मुख्य रूप से यह डॉलर में होता है किन्तु कभी-कभी यह पाउंड, यूरो या येन में भी हो सकता है. निर्यात के मामले में भी भारतीय कंपनी को विदेशी मुद्रा में भुगतान किया जाता है. बाद में कंपनी उस विदेशी मुद्रा को रुपये में बदल देती है क्योंकि उसे अपनी आवश्यकताओं के लिए रुपये की आवश्यकता होती है.




भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मान्यता दिलवाने के साथ-साथ डॉलर की अघोषित सत्ता को, उस पर बनी निर्भरता को भी समाप्त करना इसका उद्देश्य हो सकता है. यदि बीते माह को दृष्टिगत रखते हुए बाजार की स्थिति देखें तो कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, डॉलर की कमजोरी और निरंतर विदेशी फंड प्रवाह के बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट देखने को मिल रही थी. इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर जिस तरह से पाबन्दी लगाई है, उसके बाद वैश्विक व्यापार जगत में अनेक देशों ने उसकी मंशा को भाँप लिया है. बहुतायत देशों को लगने लगा है कि इस तरह के कदम के बाद बहुत ज्यादा समय तक वैश्विक स्तर पर व्यापार के लिए डॉलर पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है. भारत तो बहुत पहले से डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती स्थिति की समस्या से जूझ रहा है. इसी कारण से भारतीय रिजर्व बैंक भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रुपये में विदेशी कारोबार को बढ़ावा देना चाहता है. बैंक ने जुलाई को एक सर्कुलर जारी करके कहा था कि उसने आईएनआर में चालान, भुगतान और निर्यात/आयात के निपटान के लिए एक अतिरिक्त व्यवस्था करने का फैसला किया है. रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय ने बैंकों और कारोबारियों के संगठनों के प्रतिनिधियों से रुपये में आयात-निर्यात लेनदेन को बढ़ावा देने को कहा था. डिजिटल मुद्रा के आने के बाद रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना सुगम हो सकता है.


भारतीय रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण होने से निकट भविष्य में डॉलर की तरह पूरी तरह से रुपये में कारोबार करना संभव हो जाएगा. इसके लिए किसी भी देश के साथ व्यापार लेनदेन का निपटान करने के लिए भारत में बैंक व्यापार के लिए भागीदार देश के कॉरेस्पॉन्डेंट बैंक/बैंकों के वोस्ट्रो खाते खोलेंगे. भारतीय आयातक इन खातों में अपने आयात के लिए भारतीय रुपये में भुगतान कर सकते हैं. आयात से होने वाली इन आय का उपयोग भारतीय निर्यातकों को भारतीय रुपये में भुगतान करने के लिए किया जा सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक से रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार किये जाने की अनुमति मिलने के बाद नई दिल्ली में विशेष ‘वोस्ट्रो खाते’ खोले गए, जिससे विदेश में रुपये में कारोबार संभव हो सकेगा. रूस के दो सबसे बड़े बैंक स्बरबैंक और वीटीबी बैंक ऐसे पहले बैंक हैं जिन्हें रुपये में कारोबार करने की मंजूरी मिली है. वर्तमान में रूस के नौ बैंकों ने रुपये में कारोबार करने के लिए विशेष वोस्ट्रो खाते खोल दिए हैं. वोस्ट्रो खाता एक ऐसा खाता है जो एक कॉरेस्पॉन्डेंट बैंक दूसरे बैंक की ओर से रखता है.


यदि वैश्विक बाजार का आकलन करें तो ज्ञात होता है कि डॉलर का वैश्विक विदेशी मुद्रा कारोबार में लगभग 88% हिस्सा है. यूरो, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग का स्थान डॉलर के बाद ही आता है. भारतीय रुपए की हिस्सेदारी लगभग दो प्रतिशत के आसपास है. चूँकि डॉलर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मान्यता मिली हुई है, ऐसे में विशेषाधिकारों की सीमा-रेखा में होने वाले भुगतान संतुलन संकट से वह अमेरिका को एक तरह की मौद्रिक सुरक्षा देता है. रुपये के अंतरराष्ट्रीय कारोबार का हिस्सा बनने से विदेशी लेन-देन में रुपए का उपयोग भारतीय व्यापार के लिये मुद्रा जोखिम को कम करेगा. डॉलर पर निर्भरता कम होने से मुद्रा की अस्थिरता जैसे संकट का सामना भी कम करना पड़ेगा. ऐसा होने से व्यापारिक सुरक्षा बनी रहेगी. एक तरफ जहाँ व्यापार की लागतों पर नियंत्रण रहेगा, वहीं व्यापार का बेहतर विकास भी संभव हो सकेगा.


इसके साथ ही सरकार की एक निश्चित सीमा तक विदेशी मुद्रा भंडार रखने की अनिवार्यता में भी बहुत हद तक कमी आएगी. वर्तमान में मुख्य रूप से डॉलर में अंतरराष्ट्रीय कारोबार होने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में डॉलर को जमा करके रखना होता है. यदि भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए बहुसंख्यक देशों द्वारा मान्यता मिल जाती है तो डॉलर पर बनी निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा भंडार जमा रखने की स्थिति से मुक्ति मिलेगी. विदेशी मुद्रा पर निर्भरता को कम होने से भारतीय व्यापार बाहरी जोखिमों से बच सकेगा. मुद्रा जोखिम के कम होने से पूंजी प्रवाह के उत्क्रमण को काफी हद तक कम किया जा सकेगा. इससे भारतीय व्यापार की सौदेबाज़ी की शक्ति भारतीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने, उसके वैश्विक कद और सम्मान को बढ़ाने में सहायक होगी.





 

04 जून 2020

समाजोपयोगी हो सकती है यह व्यवस्था

अनलॉक के दौरान बाजार में भीड़ अब अपने पुराने रूप में आती दिख रही है. उरई में शाम पाँच बजे तक बाजार खोलने की अनुमति है. जैसा कि ऊपर से आदेश हैं, उसके अनुसार रात नौ बजे तक नागरिकों के आवागमन पर प्रतिबन्ध नहीं है. एक आवश्यक काम से शाम को सात बजे के बाद निकलना हुआ. उस समय बाजार पूरी तरह से बंद हो चुका था. इक्का-दुक्का दवाओं की दुकानें खुली हुईं थीं. दुकानें बंद करने के नियम का पालन था अथवा प्रशासन का भय कि छोटी-छोटी सी दुकानें भी बंद थीं. ठिलिया वाले भी नहीं दिखाई दे रहे थे. चाय-पान की गुमटियाँ भी बंद मिलीं. सुनसान रास्तों पर चंद वाहनों की लाइट थी, सड़क के खम्बों पर जगमगाती रौशनी थी और शांत सा माहौल. लगा नहीं कि उरई के उसी बाजार में हम चले जा रहे हैं, जहाँ रात को नौ-दस बजे तक बस शोर-शराबा बना रहता था. दुकानों का बंद होना होते-होते भी देर रात कर ली जाया करती थी. गाड़ियों का शोर, हॉर्न का अनावश्यक बजना, तेज रफ़्तार से लोगों को डरातीं बाइक्स तब उरई की सड़कों की पहचान बनी थीं.


अब जो स्थिति दिखाई दे रही है वह किसी छोटे से कसबे से देर रात निकलने का एहसास करवा रही थी. एहसास ऐसा भी हो रहा था जैसा कि भोर में टहलने के लिए निकलते समय हुआ करता था. हलकी-हलकी ठंडी हवा, खम्बों, घरों, दुकानों से झांकती रौशनी और इक्का-दुक्का वाहनों के इंजन की आवाज़. न लोगों की भागदौड़, न अंधाधुंध रफ़्तार, न धक्का-मुक्की, न शोर, न धुआँ, न प्रदूषण बस एक चरम शांति, एक मधुर सा एहसास. लगा कि ऐसा नियम हमेशा के लिए बना दिया जाना चाहिए. किसी भी शहर को सुबह आठ-नौ बजे से शाम छह-सात बजे तक के लिए ही खोलना चाहिए. इससे न केवल कई तरह का प्रदूषण दूर होगा बल्कि समाज में फैली बहुत सी अराजकता अपने आप समाप्त हो जाएगी.



जब जल्दी बाजार बंद होगा तो ज़ाहिर सी बात है कि दुकानदारों को जल्द ही अपने घर पहुँचने का समय मिला करेगा. इससे देर रात पहुँचने के कारण अस्त-व्यस्त होने वाली उनकी दिनचर्या भी नियंत्रित हो सकेगी. बहुत से व्यापारिक परिवारों के बच्चों में इसकी समस्या देखने को मिलती है कि वे अपने पिता, भाई अथवा अन्य पुरुष परिजनों से समय से नहीं मिल पाते हैं. कई बार व्यापारिक अवसरों पर बच्चों को भी अपने परिजनों की सहायता के लिए दुकान पर जाना पड़ जाता है. इस तरह की स्थितियों पर बहुत हद तक लगाम लग सकती है.

इसके साथ-साथ जल्दी दुकान बंद होने के कारण लूट-पाट, छीना-झपटी जैसी घटनाओं पर भी अंकुश लगने की सम्भावना है. लगभग सभी दुकानदार, व्यापारी रात को अपनी-अपनी दुकान बंद करने के बाद बहुत सारा धन, दिन भर की आय अपने साथ लेकर ही घर जाते हैं. कई-कई दुकानदार देर तक दुकान खोले रहते हैं. ऐसे में अँधेरे में अकेले जाने वाले दुकानदारों पर, देर तक खुली दुकानों पर अराजक तत्त्वों का हमला भी हो जाया करता है. उनके साथ लूटपाट हो जाती है. जल्दी बाजार बंद होने से इस पर भी नियंत्रण लग सकता है.

इसी तरह यदि बाजार जल्द बंद होगा तो देर रात तक जलने वाली लाइट को भी रोका जा सकता है. इससे विद्युत ऊर्जा की खपत पर नियंत्रण होने से ऊर्जा की बचत की जा सकती है. लाइट चले जाने की स्थिति में जेनरेटर चलने की स्थिति में होने वाले प्रदूषण को भी रोका जा सकता है.

इनके अलावा बहुत से बिंदु ऐसे हैं जो समाजोपयोगी सिद्ध हो सकते हैं. इस तरह के निर्णय को लागू करने के लिए सरकार से ज्यादा सहयोग नागरिकों का, व्यापारियों का चाहिए है. इसके लिए बहुत से ऐसे व्यावसायिक कार्यों का हवाला दिया जा सकता है जो रात को ही संचालित होते हैं. यदि वाकई ऐसा होता है तो ऐसे व्यापारिक कृत्यों को कुछ निश्चित शर्तों के साथ रात में निश्चित अवधि तक के लिए खोलने की अनुमति दी जा सकती है. देखा जाये तो अभी भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. बाजार को शाम पाँच बजे बंद करने का नियम है मगर शराब की दुकानों को रात नौ बजे तक खोलने की अनुमति मिली है. वर्तमान की भयावहता और उसके सन्दर्भ में लगाई गई बंदी के बाद प्रकृति में आये सकारात्मक बदलाव को देखते हुए भविष्य की मजबूत इमारत के लिए ऐसे निर्णयों का पालन किया जाना अनिवार्य होना चाहिए. नागरिकों और व्यापारियों को भी इसके लिए अपनी सहमति देनी चाहिए.  

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 जून 2020

चीनी उत्पाद विरोध के बाद की संभावनाएँ

चीनी उत्पादों के खिलाफ भारत में एक आन्दोलन सा खड़ा होता दिखने लगा है. अगर यह आंदोलन चीन के विरुद्ध सफल हो जाता है तो भारत को इसके अनेक दीर्घकालिक लाभ होंगे.


इसमें पहला लाभ तो चीन को भारत से होने वाले राजस्व में जबरदस्त कमी आएगी. यह कमी लगभग 5 लाख करोड़ रुपये तक के होने का अनुमान है. ऐसा माना जाता है कि इस राजस्व का उपयोग चीन कहीं न कहीं भारत के खिलाफ सीमाओं पर करता है. यदि वाकई इस राजस्व में कमी आती है तो यह धन देश में ही उपयोग में लाया जा सकता है.

इसके अलावा अनेक हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर तथा दूसरे अन्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को भारतीय बाजार में अपना अस्तित्व खोजना पड़ेगा. ऐसा उनको अपनी हिस्सेदारी में भारतीय भाग के खोने के डर के कारण करना पड़ेगा. ऐसी स्थिति में वे कम्पनियाँ अपनी उत्पादन कंपनियों, कार्यालयों आदि को भारत में लगाने पर विचार करने पर विचार कर सकती हैं.

यह भी संभव है कि भारतीय स्टार्टअप और उद्योगों के लिए चीनी उत्पादों और सेवाओं के रूप में एक विकल्प भी मिल सके. यदि ऐसा होता है तो भारत में विकसित चीनी विकल्पों के लिए भी एक नया रास्ता मिलने की सम्भावना है.

ऐसी स्थिति में कच्चे माल के स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए योजनाबद्ध रूप से श्रमिक, मजदूर भी उपलब्ध होने की सम्भावनाएं होंगी. इसके साथ-साथ अपने सामान के बेचने हेतु उनको बाजार का विकसित स्वरूप मिल सकेगा. इसमें रोजगार की अपार संभावनाएं भी विकसित हो सकेंगी.


यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि कोरोना संकट और चीन विरोधी भावनाएं भारत के लिए एक बड़ा वरदान बन सकती हैं. ऐसा तभी संभव है जबकि हम एक साथ ऐसा माहौल बनायें और सद्भाव के साथ काम करें. सरकार के प्रति फैलाये जा रहे विरोधी विचारों के बीच भले ऐसा संभव न दिखता हो मगर हम सभी को नफरत को नजरअंदाज करते हुए मेक इन इंडिया को एक वास्तविकता बनाना होगा. 

हालाँकि यह एक संभावना है और यदि इस पर देशव्यापी दृष्टि के साथ कार्य किया जाये तो इसे वास्तविकता में बदलना मुश्किल नहीं होगा. ऐसे में प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत के विचार को सार्थक करना कठिन न होगा. 

(मयूरेश गोयल)

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

13 मई 2020

संकट में मध्यम वर्ग भी है

वैश्विक महामारी कोरोना के चलते लागू किया गया लॉकडाउन अब मध्यम वर्ग के लिए भी भारी पड़ने लगा है. यह संकट लॉकडाउन खुलने के बाद और अधिक गहराएगा. इस पर चर्चा से पहले इसकी पीठिका पर विचार कर लिया जाये. लगभग दो माह पूर्व लॉकडाउन के लागू होने के तुरंत बाद से ही दिहाड़ी मजदूरों के लिए आय के सारे स्त्रोत बंद हो गए थे. उनकी रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हुआ. ये वे लोग हैं जिनके पास रोज कुआँ खोद कर रोज पानी पीने वाली स्थिति होती है. ऐसी स्थिति से जूझने वाले केवल दिहाड़ी मजदूर अथवा कामगार ही नहीं हैं बल्कि इसमें पटरी, रेहड़ी वाले अत्यंत निम्न श्रेणी के दुकानदार भी शामिल माने जा सकते हैं. इनकी व्यापारिक गतिविधि भी लॉकडाउन के कारण ठप्प हो गई.


लॉकडाउन में सम्पूर्ण बाजार बंद करवाए जाने से सभी प्रकार के व्यापारिक प्रतिष्ठानों के आय के स्त्रोत प्रभावित हुए. सभी तरह के उद्योग बंद करवा दिए गए. सभी तरह की व्यापारिक क्रियाओं को प्रतिबंधित करवा दिया गया. सभी तरह का व्यावसायिक परिवहन रोक दिया गया. अत्यावश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी तरह की व्यापारिक गतिविधियों के ठप्प हो जाने से सारा जनजीवन रुक सा गया था. लॉकडाउन के आरंभिक दौर दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों, रेहड़ी, पटरी वाले दुकानदारों की आजीविका की समस्या को मुख्य रूप से हल करने की कोशिश की गई. प्रथम दृष्टया यह सही भी था क्योंकि इन लोगों के सामने राशन-भोजन-पानी का संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक था. इस गंभीर स्थिति को समझते हुए न केवल शासन-प्रशासन ने बल्कि समाजसेवियों ने इनकी सहायता करना आरम्भ कर दिया. सहायता के लिए उठे हाथों ने न केवल अपने शहर के ऐसे मजबूर लोगों का साथ दिया वरन दूसरे जनपदों, राज्यों से आये मजदूरों को भी सहायता उपलब्ध करवाई.




अब जबकि लॉकडाउन तीन दौर पार करने की स्थिति में आ गया है, शासन-प्रशासन को और सामाजिक संगठनों को दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों के साथ-साथ ऐसे परिवारों, ऐसे वर्ग की तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है जो दिहाड़ी मजदूर, कामगार अथवा दिहाड़ी कमाई जैसा भले ही न हो मगर उसकी स्थिति लगभग इसी के जैसी है. रेहड़ी, पटरी वाले दुकानदारों के अलावा समाज में ऐसे हजारों दुकानदार हैं जिनकी पारिवारिक आजीविका उनके व्यापार पर ही केन्द्रित है. इन्हीं दुकानदारों के सहायकों के रूप में हजारों की संख्या में ऐसे कर्मचारी भी हैं जो इसी व्यापारिक संरचना में अपना भरण-पोषण कर रहे थे. लॉकडाउन के आरंभिक दौर में ऐसा महसूस हो रहा था कि कुछ दिन की इस असामान्य स्थिति से निकलने का उपाय खोज लिया जायेगा अथवा स्थिति स्वतः ही सामने आकर कोई न कोई रास्ता बनाएगी. दुर्भाग्य से ऐसा कुछ न हो सका. समय के साथ कोरोना संक्रमण का आतंक बढ़ता ही रहा और उसी के साथ लॉकडाउन की अवधि को दो बार और बढ़ाना पड़ा. इससे इस वर्ग के सामने भी आर्थिक संकट, भरण-पोषण का संकट आकर खड़ा हो रहा है.

इस सन्दर्भ में विचारणीय होना चाहिए कि छोटे और मंझोले दर्जे के दुकानदार, उनके कर्मचारी और ऐसे मध्यम वर्गीय परिवार जिनकी आय सीमित है, जिनकी बचतें अल्प हैं, जिनके पास अपनी आजीविका को चलाने के लिए, अपने व्यापार को संचालित करने के लिए बैंक सहित अन्य वित्तीय संस्थाओं के ऋण हैं, वे भी दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों की तरह अब संकट में हैं. विगत लगभग दो माह की अवधि में व्यापारिक गतिविधि का ठप्प रहना, वित्तीय संस्थाओं के ऋणों के ब्याज का चुकाया जाना, अल्प बचतों का पारिवारिक खर्चों में समाप्त हो जाना आदि ऐसे परिवारों के लिए भी संकट का कारण बन रहा है. सामाजिक रूप से अथवा शासन स्तर पर अभी सहायता उन लोगों तक पहुँच रही है जो फुटपाथ पर जीवन गुजार रहे हैं, झुग्गी-झोपड़ी में गुजर-बसर कर रहे हैं या फिर बेसहारा हैं. देखा जाये तो अब उन बहुत से परिवारों को भी सहायता की आवश्यकता है, जो अपने रोजगार के, व्यापार के, कार्य के बंद होने के कारण आर्थिक अभाव की स्थिति में आ गए हैं. छोटे-मंझोले दर्जे के दुकानदारों का, उनके कर्मचारियों का, ऐसे वेतनभोगियों का जो किसी दूसरे संस्थान की आय पर निर्भर हैं, समय अब वाकई कठिनता से गुजर रहा है.

ऐसे परिवार, व्यक्ति अपने छोटे से व्यापारिक प्रतिष्ठान के चलते सामाजिक स्थिति प्राप्त किये हुए हैं जिसके चलते सहज रूप में समाज इनकी आर्थिक तंगहाली को समझ नहीं पा रहा है. ये वर्ग ऐसा भी है जो अपनी आर्थिक समस्या को समाज के सामने प्रस्तुत भी नहीं कर पा रहा है. सामाजिकता, प्रतिष्ठा आदि के चलते वह उस कतार में भी नहीं लग पा रहा है जहाँ गरीबों के लिए भोजन वितरण किया जा रहा है. ऐसे में न केवल समाज को बल्कि शासन-प्रशासन को ऐसे परिवारों की मदद के लिए आगे आना चाहिए. इसके अलावा इस वर्ग को लॉकडाउन खुलने के बाद भी अनेक तरह की नकारात्मक गतिविधियों का सामना करना पड़ेगा. ऐसे छोटे और मंझोले दुकानदारों, जिनका कपड़ों का, गारमेंट्स का, इलेक्ट्रॉनिक्स का, खाद्य सामग्री का व्यापार है, उनको लॉकडाउन के बाद बाजार खुलने पर एक अनिश्चित नुकसान का सामना करना पड़ेगा. लम्बे समय से दुकानों के न खुलने की स्थिति के कारण सीलन, चूहों आदि के चलते सामानों के ख़राब होने की आशंका अधिक है. इस अप्रत्याशित नुकसान की भरपाई इन्हीं दुकानदारों के हिस्से आएगी. ऐसे में भले ही देश का शीर्ष नेतृत्व सभी कर्मियों को इस बंदी के समय का वेतन देने की बात कह रहा हो मगर छोटे और मंझोले दुकानदारों को ऐसा कर पाना संभव ही न होगा.

इसके साथ-साथ जैसी कि लगातार बात की जा रही है लम्बे समय तक कोरोना के साथ जीवन यापन करने की तो संभव है कि लॉकडाउन हटने के बाद भी लम्बे समय तक व्यापारिक गतिविधियाँ सुचारू रूप से संचालित न हो सकें. इससे भी छोटे और मंझोले दुकानदारों की आय प्रभावित रहेगी. भले ही लॉकडाउन को शर्तों के साथ खोल दिया जाये मगर छोटे, मंझोले दुकानदारों और सीमित आय वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के भरण-पोषण के प्रति शासन-प्रशासन को, समाजसेवियों को ध्यान देने की आवश्यकता है.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

24 अक्टूबर 2019

ऑनलाइन मार्केटिंग के हाथों बाजार ठप्प न हो जाये

समय जब साथ नहीं होता है तो कुछ भी सही से नहीं चलता है. न सामान्य से काम सहज लगते हैं और न ही असामान्य काम करने की हिम्मत होती है. इस काम न करने की मानसिकता का असर ये रहा कि विगत कई दिनों से कोई पोस्ट लिखने का भी मन नहीं किया. इस बारे में एक तो कुछ अच्छा न लगना रहा साथ ही लैपटॉप का ख़राब होना भी रहा. लैपटॉप लेने के बारे में विगत कुछ माह से विचार चल रहा है मगर उस पर अंतिम मुहर न लग सकी है. इधर अपने अभिन्न मित्रों से लगातार मुलाकात होती रही, चर्चा होती रही जो इसी व्यापार से जुड़े हुए हैं. लैपटॉप या अन्य कोई सामान लेने पर उनकी राय को वरीयता दी जाती है. इधर देखने में आया कि बाजार जैसे खामोश है. बहुतेरे लोग इसका कारण मंदी को बता सकते हैं, केंद्र सरकार की नीतियों को बता सकते हैं मगर असलियत इससे कुछ अलग ही है. पिछले कुछ सालों से जिस तरह से ऑनलाइन मार्केटिंग की तरफ लोगों का बढ़ना हुआ है, ऑनलाइन मार्केटिंग से जुड़ी बहुत सी कंपनियों के लुभावने और सस्ते ऑफर लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने में लगे हैं. जिस तरह की और जितनी योजनायें इनके द्वारा चलाई जा रही हैं, उतनी किसी भी दुकानदार के द्वारा, किसी भी व्यापारी के द्वारा नहीं चलाई जा सकती हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि आम नागरिक जो एक-एक पैसे को बचाने में विश्वास करता है, वह ऑनलाइन मार्केटिंग की तरफ ही दौड़ेगा. ऐसे में इन व्यापारियों का, दुकानदारों का घाटे में चले जाना, दिन भर बिना किसी व्यापार के बैठे रहना स्वाभाविक है. 

ऐसे में सरकार को चाहिए कि कुछ कदम इन व्यापारियों के, दुकानदारों के हितार्थ भी उठाये. ध्यान रखना चाहिए कि भारत का बाजार अभी ऐसा नहीं है कि यहाँ सभी काम ऑनलाइन मार्केटिंग के द्वारा चलते रहें. आज भले ही बाजार में गलाकाट प्रतियोगिता सहजता से चलती दिख रही हो, उसमें किसी को कुछ गलत न दिख रहा हो मगर ऐसा मानवीय मूल्यों के पक्ष में नहीं है. दुकानदार, व्यापारी किसी भी प्रतियोगिता में भले हो मगर वह पहले एक आम नागरिक है. उसे भी व्यापार करने का, अपनी आजीविका चलाने का पूरा अधिकार है. यहाँ सरकारों को ध्यान देना चाहिए कि यदि किसी भी तरह से इनका शोषण हो रहा है तो उसे रोका जाये. अब इसे सरकार तय करे कि कैसे इस देश में एकसाथ ऑनलाइन मार्केटिंग और बाजार के दुकानदार-व्यापारी अपने-अपने हितों का संरक्षण कर सकें.