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26 फ़रवरी 2026

अनावश्यक ज्ञान बाँटते अज्ञानी-जन

 ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनसे अपना घर न सँभलता है; घर की किसी योजना में उनकी कोई राय नहीं ली जाती है; जिनका काम न केवल घर में बल्कि आस-पड़ोस में भी सिर्फ बकैती करना हो, वे लोग भी विदेश-नीति पर, वैश्विक सम्बन्धों पर, दक्षिण-एशिया के विविध बिन्दुओं पर अपनी राय दे रहे हैं. कई लोग विदेश नीति को असफल बताने में लगे हैं. हास्यास्पद ये भी है कि जो व्यक्ति विगत दो दशक से अधिक समय से संवैधानिक पद पर है, उसके निर्णयों पर, उसके कार्यों पर वे लोग सलाह दे रहे हैं, जिनके हिस्से में किसी तरह का सम्मान आज तक नहीं आया है.

 



यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि जिस UGC का विनियम 2026 का सहारा लेकर अपने लोग ही अब पीठ में छुरा भोंकने की स्थिति में आ गए हैं, आस्तीन का साँप बने बैठे हैं, वे सहज भाव में UGC के विनियम 2012 को पढ़ लें. ध्यान देने की आवश्यकता है कि अमित शाह के द्वारा अर्बन नक्सलवाद का सफाया करने वाले कदम उठाये जाने के बाद से ही क्यों इस तरह के मुद्दे उभर कर सामने आने लगे? इसका एक सीधा सा उत्तर है कि नक्सलवाद से, वामपंथ से जुड़े लोगों को भली-भांति मालूम है कि मोदी की टीम में ऐसे बकबकी करने वालों की संख्या ज्यादा ही है. वे एक बार में ही बहकने वाली मुद्रा में आ जाते हैं, उनको बहकाया जाना आसान है.

 

बहरहाल, बहेलिया (वामपंथ, अर्बन नक्सलवाद) ने जाल बिछाया और बकवास करने वाले कबूतर उसमें फँस गए. अब उन फँसे कबूतरों को सरकार के, मोदी के और तो और और योगी के भी हर कदम, हर निर्णय गलत लग रहे हैं. अब क्या ही कहा जाये, जो इन लोगों के बापों के समय में नहीं हुआ, वो सब हो गया, इनको देखने को मिल गया तो बकबकी निकल रही जुबान से, नहीं तो छिलवा दिए गए थे किसी समय में.


06 जून 2025

दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल

1315 मीटर लम्बे और एफिल टावर से भी ऊँचे पुल का उद्घाटन 06 जून 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया. जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बना यह पुल दुनिया का सबसे ऊँचा पुल है. यह उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. चिनाब रेल सेतु इस्पात और कंक्रीट का मेहराबदार पुल है जो जम्मू-कश्मीर के जम्मू मंडल के रियासी जिले में बक्कल और कौरी के बीच स्थित है. नदी तल से इस पुल की ऊँचाई 359 मीटर (1178 फीट) है.

 

चिनाब सेतु भूकंपीय क्षेत्र पाँच में स्थित है. यह दो पहाड़ों के बीच बना है, जहाँ तेज हवाओं की वजह से विंड टनल फिनोमेना देखा जाता है. इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए पुल को इस तरह से बनाया गया का, इस तरह से इसका डिजाइन तैयार किया गया है कि यह 260 किलोमीटर प्रति घंटा की हवा की गति का भी सामना आसानी से कर सकता है. जिसे इस तरह से बनाया गया है कि यह भूकंप और तेज हवाओं को भी झेल सकता है. 

 





20 मई 2025

सकारात्मक माहौल में नकारात्मक राजनीति

किसी भी देश के राजनैतिक विकास के लिए उसके सत्ता पक्ष और विपक्ष का समन्वित स्वरूप महत्त्वपूर्ण होता है. यह तब और भी विशेष हो जाती है जबकि देश में कोई संकट की स्थिति हो. आवश्यक नहीं कि संकट सीमा-पार से ही उत्पन्न हो, देश की आंतरिक स्थिति, प्राकृतिक स्थिति के कारण भी संकट का सामना करना पड़ता है. ऐसी किसी भी स्थिति में, आपातकाल में यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष में समन्वय रहता है, उनमें सामंजस्य की भावना हो तो समाधान सहजता से हो जाता है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में चारों तरफ शांतिपूर्ण माहौल के बाद भी अशांति लगती है. प्रशासनिक सजगता के बाद भी अराजक तत्त्वों की हलचल दिखती है.

 

विगत दिनों देश का सामना एक असामान्य घटना से हुआ. घटना की प्रतिक्रिया में सरकार ने भी कदम उठाया. आतंकी घटना और उसके बाद ऑपरेशन सिन्दूर की समयावधि में ऐसा लगा जैसे सत्ता पक्ष और विपक्ष में तालमेल बना है. एकाधिक बयानबाजियों को छोड़ दें तो प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से भी आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाही की खुली छूट, सरकार को पूर्ण समर्थन जैसे सहयोगात्मक बयानों का आना हुआ. ऑपरेशन सिन्दूर सफलतापूर्वक अपनी पूर्णता को प्राप्त होता उसके पहले ही युद्ध-विराम को अपनाना पड़ा. यह निर्णय देशवासियों को किसी भी कीमत पर पसंद नहीं आया. पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की कार्यवाही का नागरिकों ने जितने खुले दिल से समर्थन किया, युद्द-विराम पर उतने खुले रूप में सरकार का विरोध किया.

 

यहीं देश के सत्ता-पक्ष और विपक्ष का चेहरा देखने का अवसर भी मिला. केन्द्र सरकार को किन कारणों, किन कूटनीतिक स्थितियों के चलते युद्ध-विराम पर सहमत होना पड़ा, ये अलग विषय है किन्तु इसके बाद भी सरकार के अडिग नजरिये में, कठोर निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आया. प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पाकिस्तान सहित सकल विश्व को स्पष्ट रूप से सन्देश दिया गया कि पाकिस्तान की परमाणु ब्लैकमेलिंग को सहन नहीं किया जायेगा. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी कठोर लहजे में कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर तो ट्रेलर था, पिक्चर अभी बाकी है. वैचारिक रूप से अपनी मनोवैज्ञानिक बढ़त के साथ सत्ता पक्ष कूटनीतिक, रणनीतिक रूप से तत्पर था किन्तु विपक्ष अपने पुराने रंग-ढंग में आने लगा.

 



पहलगाम आतंकी हमले के पहले भी कई बार देश ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के दंश को सहा है. हर बार देशवासियों की माँग होती कि पाकिस्तान पर हमला कर वहाँ के आतंकी ठिकाने ध्वस्त कर दिए जायें. पाकिस्तान के साथ कई बार युद्ध होने, संघर्ष की स्थिति होने पर देश में उपद्रव होने की आशंका रहती. आतंकी स्लीपर सेल द्वारा गृह-युद्ध जैसे हालात पैदा किए जाने का भय रहता. ऑपरेशन सिन्दूर के बाद सरकार ने पूरी सजगता दिखाई. युद्ध-विराम पर सहमति के बाद भी कार्यवाही को विराम नहीं दिया. उसके द्वारा कूटनीति को धार देते हुए न केवल देश में बल्कि बाहर भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया. वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान के नापाक इरादे बताने के लिए, ऑपरेशन सिन्दूर की आवश्यकता के बारे में तथा आतंकवाद के विरुद्ध भारत के ठोस और कठोर नजरिये के बारे में सरकार द्वारा अभूतपूर्व कूटनीति तैयार की गई. केन्द्र सरकार ने आक्रामक कूटनीतिक पहल करते हुए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल बनाये जो आगामी कुछ सप्ताहों में अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र, यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों का भ्रमण करेंगे. इसका उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ सामंजस्य स्थापित करना, पाकिस्तान की आतंकवाद में भूमिका को वैश्विक मंच पर उजागर करना है.

 

एक तरफ सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की जानकारी देने वैश्विक यात्रा की तैयारी में है, तब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा विदेशमंत्री एस. जयशंकर पर ऑपरेशन सिन्दूर की जानकारी पाकिस्तान को पहले से देने का आरोप तथा वायुसेना के नष्ट हुए विमानों की संख्या माँगना समझ से परे है. राहुल गांधी के इस बयान को पाकिस्तान में भारत विरोधी वातावरण बनाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है. यदि राहुल गांधी का केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति नजरिये का, बयानों का इतिहास देखें तो यह पहली घटना नहीं है जबकि उनके नकारात्मक विचार सार्वजनिक हुए हैं. उनके द्वारा ऐसा किया जाना आम बात है, बिना यह विचारे कि देश-हित में इन बयानों का क्या प्रभाव पड़ेगा. देखा जाये तो राहुल गांधी का यह बयान देश-विरोधी ताकतों के लिए उत्प्रेरक का कार्य करेगा. संवेदनशील समय में ऐसा बयान देने का कारण तो वही बता सकेंगे किन्तु निश्चित ही ऐसे बयान देश की छवि को नुकसान पहुँचाते हैं. प्रतिनिधिमंडल के लिए कांग्रेस प्रस्तावित चार नामों से इतर शशि थरूर का नाम केन्द्र सरकार द्वारा न केवल प्रतिनिधिमंडल में शामिल करना बल्कि एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व देना कांग्रेस को कतई पसंद नहीं आया. ऑपरेशन सिन्दूर पर केन्द्र सरकार की प्रशंसा करने के लिए कांग्रेस उनसे नाराज चल रही है. ऐसा समझा जा रहा है कि राहुल गांधी का हालिया आरोप इसी की परिणति है.

 

कुछ भी हो मगर ऐसे समय में जबकि पूरा देश आतंकियों के सफाए के लिए एकजुट है; केन्द्र सरकार द्वारा न केवल आंतरिक रूप से बल्कि सीमा पार भी राजनैतिक-कूटनीतिक रूप से सशक्त और सकारात्मक कदम उठा रखे हैं; पड़ोस की भू-राजनीतिक स्थितियों में उथल-पुथल होने के बाद भी देश में स्थिरता वाले माहौल में ऐसे बयान नकारात्मकता पैदा करते हैं. वैश्विक रूप से अपनी सैन्य शक्ति की सशक्तता, निर्णयों की गम्भीरता, कूटनीति की सक्षमता की विकास-यात्रा में यही नकारात्मकता अवरोधक का कार्य करती है. निश्चित रूप से ऐसे बयान न तो परिपक्वता की पहचान कराते हैं और न ही गम्भीरता की.


10 मई 2025

क्रोध-रोष, जोश-प्रतिशोध

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. दिन बीतते जा रहे थे, सरकार की चुप्पी बयानों के सन्दर्भ में ही टूट रही थी, मीडिया की तरफ से लगातार कुछ न कुछ बड़ा होने जैसा संकेत दिया जाता मगर प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. पहलगाम हत्याकांड के बाद आतंकवादियों, पाकिस्तान के विरुद्ध उपजा क्रोध अब सरकार की ख़ामोशी, कदमों को देखते हुए रोष में बदलने लगा था. जनसामान्य की एकराय सिर्फ और सिर्फ युद्ध जैसा कठोर कदम उठाने की थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक भी पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

केन्द्र सरकार ने पहलगाम घटना के बाद से ही अपनी सक्रियता शुरू कर दी थी. गृह मंत्रालय के आदेश पर एनआईए ने हमले की जाँच आरम्भ की. सिन्धु जल समझौता अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित कर दिया गया. पाकिस्तान से युद्ध होने, तनाव की स्थितियों के बाद भी इस समझौते को कभी निलम्बित नहीं किया गया था. यह पहली बार है जबकि भारत ने इसको निलम्बित किया. पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को ‘युद्ध की कार्यवाई बताया. पाकिस्तानी नागरिकों के सभी प्रकार के वीजा रद्द करते हुए उन्हें तत्काल वापसी के आदेश दिए गए. इसी के साथ इस्लामाबाद में भारतीय मिशन और नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या को कम कर दिया गया. पाकिस्तानी उच्चायोग के रक्षा, नौसेना और वायुसेना सलाहकारों को एक सप्ताह में भारत छोड़ने का आदेश भी दिया गया. सेना के सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिए गए. केन्द्र सरकार के ऐसे क़दमों, निर्णयों से स्पष्ट संकेत मिला कि इस बार वह शांत बैठने के मूड में नहीं है.

 



केन्द्र सरकार स्वयं तो कूटनीतिक, राजनैतिक निर्णय लेते हुए काम कर रही थी साथ ही सैन्य गतिविधियों को भी सक्रियता प्रदान कर रही थी. सरकार की तरफ से लगातार बैठकों के द्वारा सेना को उनकी सैन्य गतिविधियों के लिए खुली छूट देने जैसा आक्रामक एवं विश्वासपरक कदम उठाकर दर्शाया गया कि सरकार सुस्त अथवा खामोश नहीं है. भारतीय वायुसेना द्वारा सेंट्रल सेक्टर में एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया गया, जिसमें पहाड़ी और जमीनी लक्ष्यों पर हवाई हमलों का अभ्यास किया गया. इसे 'आक्रमण' नाम दिया गया जिससे इसका उद्देश्‍य स्पष्ट हो जाता है. वायु सेना के अलावा नौसेना ने अरब सागर में अपनी गतिविधियों को बढ़ा दिया था. युद्धपोतों को हाई अलर्ट पर रख कर कई एंटी-शिप और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया गया.  

 

इसके बाद भी जनाक्रोश कम नहीं हो रहा था. जनमानस पाकिस्तान के विरुद्ध खुले रूप में सैन्य गतिविधि को देखना चाहता था. दरअसल जनता का मनोविज्ञान तत्काल कार्यवाही करने का, तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति, राजनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट किसी भी सरकार के लिए युद्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं स्वीकारा जाता है. युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष वाली स्थिति में ले जाना होता है. हम सभी वर्तमान में वैश्विक स्तर पर कई युद्ध देख रहे हैं, जो लम्बे समय के बाद भी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं. भारत सरकार की मंशा भी कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है. सम्भव है कि ऐसा कुछ विचार करके केन्द्र सरकार किसी सटीक कदम को उठाने की तैयारियों में सक्रिय हो.

 

ऐसा कुछ उस समय समझ में भी आया जबकि केन्द्र की तरफ से युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को आगाह किया गया. एक निश्चित तिथि पर देश में मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट के द्वारा युद्ध से निपटने के लिए जन-जागरूकता को बढ़ाने वाले दिशा-निर्देश जारी किये गए. इधर जनमानस में ब्लैक आउट को लेकर, मॉक ड्रिल को लेकर सक्रियता, सजगता देखने को मिल रही थी उधर सरकार कुछ बड़ा करने के मूड में थी. केन्द्र सरकार द्वारा अप्रत्याशित कदम उठाते हुए मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट वाले दिन से पहले ही पाकिस्तान और पीओके में मिसाइल स्ट्राइक करके पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की कमर तोड़ दी.

 

भारत की तीनों सेनाओं ने अपनी संयुक्त शक्ति के साथ आधी रात के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के द्वारा पाकिस्तान और पीओके स्थित आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य हमले किये. ख़ुफ़िया जानकारियों के आधार पर चिन्हित 21 आतंकी ठिकानों में से अभी 09 ठिकानों को सेना ने अपना निशाना बनाया है. इनमें पाँच केन्द्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में और चार पाकिस्तान में स्थित थे. इन हमलों में विशेष बात यह रही कि पाकिस्तान के किसी भी सैन्य ठिकाने को और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया गया. सेना का निशाना पूरी तरह आतंकी केन्द्रित रहा, इसमें लश्कर-ए-तैयबा, टीआरएफ सहित कई आतंकी ठिकाने शामिल रहे. बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद), मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय), टेहड़ा कलां (जैश-ए-मोहम्मद), सियालकोट (हिजबुल मुजाहिदीन), बरनाला (लश्कर-ए-तैयबा), कोटली (जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन का प्रशिक्षण शिविर), मुजफ्फराबाद (लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी शिविर और जैश-ए-मोहम्मद का संचालन केन्द्र) इन हमलों में पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए.

 

केन्द्र सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. यह स्पष्ट सन्देश है कि आतंकी संगठनों का, उनके ठिकानों का सफाया किये बिना भारतीय सेना रुकने वाली नहीं है. अचम्भित करने वाली भारत की सैन्य कार्रवाई में दर्जनों आतंकियों और उनके करीबियों के मारे जाने की पुष्टि खुद पाकिस्तान ने की है. केन्द्र सरकार द्वारा उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक तथा पुलवामा अटैक के बाद की एयर स्ट्राइक के बाद वर्तमान मिसाइल स्ट्राइक के द्वारा पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दिया गया है कि भारत अब पाकिस्तानी आतंकवाद का घिनौना खेल बर्दाश्त नहीं करने वाला. निश्चित ही ऐसा दृढ़ विश्वास और आक्रामक रणनीति जनाक्रोश को समाप्त करेगी साथ ही आतंकियों का भी सर्वनाश करेगी.  


07 मई 2025

ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने की शुरुआत

आज सुबह आँख खुली. जब मोबाइल पर आये हुए संदेशों को देखा तो सबसे पहले ये चित्र नजर आया. अभिन्न मित्र द्वारा भोर में भेजे गए इस चित्र से समझ आया कि किस तरह की सक्रियता रही होगी उच्च स्तर पर. 


(पहले चित्र देखिये...)



मन प्रसन्न हो गया था ये चित्र देख कर. आखिर पहलगाम आतंकी हत्याकांड में मिली चुनौती को जवाब देने का आरम्भ हो चुका था. इस चित्र के बाद जब सोशल मीडिया पर दस्तक दी गई तो चारों तरफ यही बम-बम मची हुई थी. सभी जगह से ऑपरेशन सिन्दूर पर ही गर्व किया जा रहा था. 


इसी उत्साह, उमंग, जोश ने शांत नहीं बैठने दिया. सोशल मीडिया पर कुछ सन्देश लिखित रूप में और कुछ चित्र के रूप में प्रसारित किये जाते रहे. उनकी एक झलक, आज की पोस्ट के रूप में....


Operation SINDOOR का एक अर्थ ये भी है...

ऑपरेशन SIN दूर

😊

#छीछालेदर_रस से खात्मा हो जाएगा इस SIN का.

+

अरे मोदी जी, थोड़ा सा पानी छोड़ दीजिए. बेचारे आग बुझाने से पहले पिछवाड़ा धो लें.

😜

ग़ज़ब #छीछालेदर_रस लपेटे दिख रहे टीवी पर

+

एक साथ दो-दो ऑपरेशन की जबर लहर चली,

पाकिस्तान में ऑपरेशन सिन्दूर, देश में ऑपरेशन फटी.

😜

#दुनाली कहरदार

+

भारत में सायरन बजेगा बोल के

पाकिस्तान का बैंड बजाया पेल के.

😜😆

#दुनाली ऑपरेशन सिन्दूर भरी

+

चिल्ला-चिल्ला के यही गा रहे.....

भाग डी के बोस... डी के बोस....

#छीछालेदर_रस

😜😆😜😆

(स्याले बोन चिड़ी के)

+

अंधियारे में उजियारा लाने वाली

सेना हिन्द की है,

दुश्मन को ठिकाने लगाने वाली

सेना हिन्द की है,

आघात सहकर खामोश बैठना

नहीं है अपनी फितरत,

ख़ामोशी को विस्फोट बनाने वाली

सेना हिन्द की है.

+

कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

07.05.2025

+

ये कटपीस क्या चलायेंगे परमाणु बम,

भारतीय सेना ने सुलगा दिया इनका बम.

😜😜

बोल बम #दुनाली भारतीय सैन्य शक्ति की

+

यार, जे तो रोमंटी भई, मॉक ड्रिल की कहके तुमने तो रगड़ दओ.

अब बिलबिलाने फिर रये दोऊ तरफ़ के खजैले सुअर


कुछ चित्रों पर भी ध्यान दीजियेगा. 






(पंक्तियाँ कवयित्री अनीता सिंह की)

 




08 फ़रवरी 2025

नकारात्मक कार्य-शैली का नतीजा आप की हार

सत्ताईस बरसों तक विपक्षी गलियारे में टहलते रहने के बाद भाजपा को दिल्ली विधानसभा का सत्ता सुख प्राप्त हो गया. 70 सीटों वाली दिल्ली में भाजपा ने 48 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया जबकि पिछले बारह सालों से सरकार चला रही आम आदमी पार्टी 22 सीटों में ही सिमट गई. आम आदमी पार्टी का इतनी कम सीटों में सिमट जाना संख्यात्मक रूप से इस कारण आश्चर्यजनक लग रहा है कि अपने पहले चुनाव में ही आम आदमी पार्टी द्वारा चमत्कारिक रूप से 28 सीटें जीत कर अपनी पहचान को साबित किया था. अन्ना आन्दोलन की लहर, लोकपाल बिल बनाये जाने का मुद्दा, भ्रष्टाचार विरोधी छवि के साथ पहले चुनाव के चमत्कारिक प्रदर्शन को अद्भुत प्रदर्शन में बदलते हुए 2015 एवं 2020 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने क्रमशः 67 एवं 62 सीटों पर विजय हासिल की थी. केन्द्रीय राजनीति में बेहतर प्रदर्शन करने वाली भाजपा को इन दोनों विधानसभा चुनावों में क्रमशः 03 एवं 08 सीटों से संतोष करना पड़ा था, वहीं कांग्रेस इन दोनों चुनावों में अपना खाता ही नहीं खोल सकी. आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर विजय हासिल की थी किन्तु विधानसभा में उसका प्रदर्शन एकदम लचर रहा.

 

आम आदमी पार्टी के पहले चुनाव की सफलता को अन्ना आन्दोलन लहर की सहानुभूति का परिणाम मानने वालों को भले ही चुनाव परिणामों की संख्यात्मकता ने गलत साबित किया हो मगर आम आदमी पार्टी खुद को सही साबित करने में विफल ही रही. यही कारण रहा कि दो बार प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता प्रदान किये जाने के बाद भी अंततः इस बार दिल्ली के मतदाताओं ने उससे किनारा करना ही उचित समझा. वर्तमान 2025 विधानसभा चुनाव परिणामों को आम आदमी पार्टी के समर्थक भले ही सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकम्बेंसी) कह कर खुद को सांत्वना देने का प्रयास करें मगर सत्यता यही है कि पिछले बारह बरसों के अपने कार्यकाल में आम आदमी पार्टी द्वारा अपनी उसी विचारधारा, अपने उन्हीं सिद्धांतों से लगातार दूरी बनाई जाती रही, जिनके सहारे वह सत्ता में आई थी. अपने कार्यों, अपने विचारों, अपनी कार्य-शैली आदि के चलते आम आदमी पार्टी ने और स्वयं अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह से नकारात्मक माहौल बना रखा था, उससे दिल्ली के मतदाताओं में निराशा उत्पन्न हो चुकी थी. यही कारण रहा कि दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्य-शैली पर भरोसा करते हुए इस बार विधानसभा भाजपा को सौंप दी. दिल्ली के मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अरविन्द केजरीवाल को भी हराया, मनीष सिसौदिया के साथ-साथ सत्येंद्र जैन और सौरभ भारद्वाज को भी बाहर का रास्ता दिखाया. एक दशक से अधिक समय की कार्य प्रणाली, व्यवहार को देखने के बाद मतदाताओं को न मुफ्त की रेवड़ियाँ पसंद आईं और न ही कट्टर ईमानदार वाली कथित छवि ने प्रभावित किया.

 



आम आदमी पार्टी की हार के पीछे भले ही भाजपा की अपनी तैयारी, रणनीति, मोदी का चेहरा समेत अनेक कारक समाहित माने जा सकते हैं, किन्तु आम आदमी पार्टी और उनके शीर्ष नेताओं के कारनामे भी उसकी हार के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जो दल भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से जन्मा हो, जिस राजनैतिक दल के खिलाफ पूरा आन्दोलन छेड़े रहा हो सत्ता में आने के लिए उसी से हाथ मिला लिए. कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ सैकड़ों पृष्ठों के जो सबूत सार्वजनिक मंच से दिखाए जाते थे, वे अचानक ही गायब हो गए. भ्रष्टाचार विरोध के द्वारा सत्ता में आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने लगे. खुद को कट्टर ईमानदार कहने वाले अरविन्द केजरीवाल भी इससे बच न सके. उनके सहित मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाना पड़ा.

 

नई तरह की साफ-सुथरी, ईमानदार और वैकल्पिक राजनीति का वादा करने वाले केजरीवाल ने तो सिद्धांतों की, ईमानदारी की उस समय धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं जबकि उनको जेल जाना पड़ा. बात-बात पर नैतिकता की दुहाई देने वाले अरविन्द केजरीवाल द्वारा जेल जाने के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया गया. इसके बजाय उनके द्वारा जेल से ही सरकार चलाने की ऐसी जिद दिखाई गई जो भारतीय राजनीति में अचम्भित करने वाली घटना थी. भ्रष्टाचार विरोध, नैतिकता की बात करने वाले केजरीवाल ने सत्ता सुख के लिए अनेक राज्यों में उन्हीं दलों, नेताओं के साथ हाथ मिलाया जिनके दामन में भ्रष्टाचार, दंगों, घोटालों आदि के दाग लगे हैं. व्यवस्था परिवर्तन करने, राजनीति का ढंग बदलने की बात करने वाले केजरीवाल और उनके साथी लगातार न केवल भ्रष्टाचार में लिप्त होते चले गए बल्कि काम-काज के मामलों में भी असफल सिद्ध हुए. सरकारी विद्यालयों, चिकित्सालयों, मोहल्ला क्लीनिक, सड़कें, यमुना साफ़-सफाई, बिजली, पानी आदि के मामलों में आम आदमी पार्टी लगातार असफल ही रही. विडम्बना यह रही कि तमाम सारी नाकामियों के बाद भी केजरीवाल द्वारा इनका जिम्मेदार स्वयं को, अपने नेताओं को, अपनी पार्टी को न मानकर दूसरों पर दोषारोपण किया जाता रहा. अलग तरह की राजनीति के नाम पर बिना किसी सबूत के, बिना किसी आधार के बाकी सभी पार्टियों और उनके नेताओं को चोर-बेईमान बताया जाने लगा. इसकी हद तो उस समय हुई जबकि वर्तमान चुनाव से ठीक पहले उन्होंने सीधे-सीधे हरियाणा की भाजपा सरकार पर यमुना के पानी में जहर मिलाने, नागरिकों के नरसंहार की साजिश रचने का अत्यंत गम्भीर आरोप लगा दिया. यह कदम केजरीवाल की गैर-जिम्मेदार राजनीति की सारी सीमाओं का लाँघना था.

 

फिलहाल तो आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के कारनामों की लम्बी सूची है, उनके कांड भी लम्बे-चौड़े हैं, अमानतुल्लाह खान, ताहिर हुसैन पर दंगों के आरोप तय हो चुके हैं, इस वास्तविकता को न केवल आम आदमी पार्टी के नेताओं ने समझा बल्कि दिल्ली के मतदाताओं ने भी समझा. यही कारण रहा कि दिल्ली में चुनावी मौसम के ठीक बीच में आम आदमी पार्टी के सात विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. यहाँ पार्टी छोड़ने की परम्परा भी पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही शुरू हो गई थी. शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, मयंक गांधी, कुमार विश्वास, कैलाश गहलोत आदि ऐसे नाम हैं जो केजरीवाल की कार्यप्रणाली, उनकी मनमानी से असहमति के चलते पार्टी से बाहर हो गए. इन सब बातों का भी असर चुनाव परिणाम पर पड़ा. मतदाताओं में यह धारणा बन चुकी थी कि अब पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.

 

दिल्ली चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठना बेवजह भी नहीं. क्षेत्रफल की दृष्टि से भले ही दिल्ली छोटा राज्य हो मगर देश की राजधानी होने के कारण वह राजनीति के केन्द्र में रहता है. देश की राजनीति की तरह ही यहाँ की राजनीति भी विचारधारा और पार्टी के मजबूत शीर्षक्रम पर आधारित है. स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति आम आदमी पार्टी के पास नहीं है. आम आदमी पार्टी भले ही स्वयं को कट्टर ईमानदारी, अलग तरह की राजनीति करने वाली, व्यवस्था परिवर्तन करने वाली विचारधारा का पोषण करने वाली बताती रही हो मगर सत्यता यही है कि उसकी कोई विचारधारा नहीं है. उसका जन्म किसी विचारधारा के कारण नहीं बल्कि सत्ता में आने के उद्देश्य से ही हुआ है. आम आदमी पार्टी का गठन करते समय केजरीवाल के स्वयं ही कहा था कि मजबूरी में हम लोगों को राजनीति में उतरना पड़ा. हमें राजनीति नहीं आती है. हम इस देश के आम आदमी हैं जो भ्रष्टाचार और महँगाई से दुखी हैं, उन्हें वैकल्पिक राजनीति देने के लिए आए हैं. ऐसे में पार्टी के लिए बिना किसी ठोस विचारधारा के उसके विधायकों का वैचारिक दृष्टिकोण से एकजुट बने रहना भी एक चुनौती होगी. दिल्ली की सत्ता में रहते हुए केजरीवाल को अपने विधायकों को सँभाले रखना मुश्किल हो रहा था, अब विपक्ष में रहते हुए उनको साधे रखना आसान नहीं होगा. विचारधारा शून्यता के साथ-साथ शराब घोटाले और शीशमहल जैसे मुद्दों ने पार्टी की कट्टर ईमानदारी छवि पर भी दाग लगाया है. केजरीवाल, सिसौदिया का हारना अन्य प्रदेशों की इकाइयों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा. ऐसे में यदि आम आदमी पार्टी को, केजरीवाल को राजनीति का लम्बा रास्ता तय करना है तो उनको दूसरों पर दोषारोपण करने के स्थान पर अपने गिरेबान में झाँकना होगा. अपने कारनामों पर, अपनी कार्य-शैली पर चिंतन करना होगा. कट्टर ईमानदार, अजेय बने रहने के अहंकारी दम्भ से बाहर निकलना होगा.  


19 अगस्त 2024

युद्ध-काल में मोदी की यूक्रेन यात्रा

रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते हुए दो वर्ष से अधिक का समय हो चुका है मगर अभी भी इस युद्ध की अंतिम परिणति दिखाई नहीं दे रही है. दोनों देशों में जिसे जब अवसर मिलता है, वह जबरदस्त हमला करके दूसरे देश को क्षति पहुँचा देता है. युद्ध के चलते रहने की ऐसी स्थिति के बीच भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा यूक्रेन का दौरा करना वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है. इसी माह की 23 तारीख को नरेन्द्र मोदी अपनी पोलैंड यात्रा के तुरंत बाद यूक्रेन दौरा करेंगे. भारत और यूक्रेन के बीच तीस वर्ष पूर्व, 1992 में राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने के बाद पहली बार है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा यूक्रेन की यात्रा की जा रही है. अपनी इसी महत्ता के साथ-साथ रूस-यूक्रेन युद्ध तेज होने के बीच भारतीय प्रधानमंत्री का यूक्रेन दौरा महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है.

 

ऐसा नहीं है कि रूस-यूक्रेन युद्ध-काल में मोदी और जेलेंस्की की यह पहली मुलाकात है. इससे पहले भी इन दोनों नेताओं की तीन बार मुलाकात हो चुकी है. यूक्रेन दौरे पर नरेन्द्र मोदी और जेलेंस्की की होने वाली मुलाकात उनकी चौथी मुलाकात होगी. पहली बार इन दोनों नेताओं की मुलाकात 2021 में ग्लासगो में हुई थी. इसके बाद मई 2023 को जी7 शिखर सम्मलेन के दौरान दोनों नेताओं का हिरोशिमा में मिलना हुआ था. तीसरी मुलाकात जून 2024 को इटली में हुए जी7 शिखर सम्मलेन में हुई थी, यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा की थी. इस चौथी को इस कारण से और भी महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है क्योंकि इन दोनों नेताओं के मध्य यह पहली आधिकारिक मुलाकात होगी. इससे पहले दोनों नेताओं की मुलाकात किसी दूसरे देश में किसी अन्य मंच पर ही होती रही है. प्रधानमंत्री मोदी इस बार जेलेंस्की के आमंत्रण पर यूक्रेन जा रहे हैं. 

 



प्रधानमंत्री मोदी द्वारा रूस-यूक्रेन युद्ध के समय में अभी हाल ही में रूस की यात्रा की गई थी. युद्ध-काल में रूस की अपनी पहली यात्रा में रूसी राष्ट्रपति पुतिन और नरेन्द्र मोदी का गले मिलना पश्चिमी मीडिया के गले नहीं उतरा था. मीडिया के द्वारा इसकी आलोचना करने के साथ-साथ स्वयं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की द्वारा भी इस पर आपत्ति की गई थी. इस पर उन्होंने कहा था कि आज रूस के मिसाइल हमले में 37 लोग मारे गए, इसमें तीन बच्चे भी शामिल थे. रूस ने यूक्रेन में बच्चों के सबसे बड़े अस्पताल पर हमला किया. एक ऐसे दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता का दुनिया के सबसे ख़ूनी अपराधी से मॉस्को में गले लगाना शांति स्थापित करने की कोशिशों के लिए बड़ी निराशा की बात है. ऐसे में जहाँ मोदी की रूस यात्रा के दौरान जेलेंस्की को आपत्ति हुई थी, माना जा रहा है कि मोदी की यूक्रेन यात्रा से रूस को आपत्ति, असहजता हो सकती है.

 

यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि भारत के रूस और यूक्रेन से अपने-अपने स्तर से अलग-अलग सम्बन्ध हैं. जहाँ तक रूस-यूक्रेन के इस युद्ध का सवाल है तो भारत द्वारा कूटनीतिज्ञ भूमिका अपनाते हुए लगातार यही प्रयास किया गया है कि यह युद्ध समाप्त हो. उसके द्वारा किसी एक देश का न तो समर्थन किया गया है और न ही विरोध. भारत के रूस और यूक्रेन दोनों से मजबूत और स्वतंत्र सम्बन्ध होने का ही परिणाम है कि भारत ने यूक्रेन पर रूसी हमले की न तो निंदा की और न ही संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का समर्थन किया. इसी तरह से भारत द्वारा युद्ध-काल में यूक्रेन को लगातार मानवीय सहायता उपलब्ध करवाई जाती रही है. यूक्रेन और रूस के साथ भारत के राजनयिक सम्बन्ध होने के साथ-साथ व्यापारिक सम्बन्ध भी बने हुए हैं, जो इस युद्ध के दौरान भी लगातार स्थापित रहे. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021-22 में 386 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया. इसके साथ ही दोनों देशों के मध्य कृषि उत्पाद, धातुकर्म उत्पाद, प्लास्टिक, पॉलिमर, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, रसायन, खाद्य उत्पाद आदि का आयात-निर्यात पूर्व की भांति होता रहा.

 

मोदी और जेलेंस्की की यह मुलाकात कृषि, बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा आदि सहित अनेक बिन्दुओं पर केन्द्रित रहेगी. इसके अलावा इस मुलाकात से रूस-यूक्रेन युद्ध के सन्दर्भ में कोई सकारात्मक बिन्दु सामने आने की अपेक्षा की जा रही है क्योंकि भारत हमेशा से युद्ध के बजाय आपसी बातचीत के द्वारा रूस और यूक्रेन के मध्य विवाद के समाधान तक पहुँचने की बात करता रहा है.स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यह युद्ध का समय नहीं है. युद्ध के मैदान में समाधान नहीं ढूंढे जा सकते. युद्ध और वैश्विक अराजकता के इस दौर में पिछले महीने भारतीय प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के बाद अब यूक्रेन की यात्रा से सकारात्मक सन्दर्भ तलाशने की आवश्यकता है.  

 


08 जुलाई 2024

नरेन्द्र मोदी की रूस यात्रा के निहितार्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को अपनी दो दिवसीय यात्रा पर रूस पहुँचे. यहाँ वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ भारत-रूस द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे. तीसरे कार्यकाल की उनकी यह पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा है. ऐसे समय में जबकि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल है; रूस-यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से बेनतीजा चल रहा है; रूस और चीन के बीच सम्बन्ध दोस्ताना दिख रहे हैं, यह यात्रा महत्त्वपूर्ण हो जाती है. यह यात्रा उनकी पिछली परम्परा से हटकर है, इसलिए भी उनकी इस यात्रा को अलग नजरिये से देखा जा रहा है. नरेन्द्र मोदी ने पूर्व के दोनों कार्यकालों में पहली द्विपक्षीय यात्रा में पडोसी देशों को महत्त्व दिया था. पहले और दूसरे कार्यकाल में उनकी यात्रा क्रमशः भूटान और मालदीव की हुई थी. ऐसे में इस बार उनका पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए रूस जाना कूटनीतिक, व्यापारिक, सामरिक केन्द्र में है.

 

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते भी मोदी की रूस यात्रा महत्त्वपूर्ण है. मोदी ने वर्ष 2022 में उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में पुतिन संग द्विपक्षीय वार्ता के दौरान यूक्रेन से युद्ध समाप्त करने को कहा था. पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के साथ मोदी ने कई बार टेलीफोन पर बातचीत करते हुए युद्ध समाप्ति हेतु कूटनीतिक दबाव बनाना जारी रखा है. चूँकि इस बार भारत शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के कजाकिस्तान शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुआ. रक्षा मामलों के विशेषज्ञों की राय है कि भारत इस उम्मीद के साथ एससीओ में शामिल हुआ था कि उसका प्रभाव मध्य एशिया में बढ़ेगा किन्तु इसमें चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण ऐसा नहीं हो सका. इसके अलावा पाकिस्तान भी अब एससीओ का सदस्य है. ऐसे में चीन के बढ़ते प्रभाव और हस्तक्षेप के कारण भारत को अपनी स्थिति महत्त्वपूर्ण न लगी होगी. विशेष बात ये है कि रूस और चीन इस संगठन के सदस्य हैं. ऐसे में इस रूस यात्रा में सम्भव है कि मोदी द्वारा चीन के बढ़ते प्रभावों का मुद्दा भी उठाया जाये.

 



रूस भारत का सबसे पुराना और भरोसेमंद मित्र, सहयोगी है. रूस के द्वारा अनेक मुश्किल पलों में भारत का साथ दिया गया. आज भी भारत के साथ उसके गहरे व्यापारिक सम्बन्ध हैं. दोनों देशों में लम्बे समय से रणनीतिक साझेदारी के अन्तर्गत रक्षा, अंतरिक्ष और आर्थिक समझौतों पर सहमति है. भारत द्वारा भी रूस के साथ अपनी मित्रता और भरोसे को बनाये रखा गया है. रूस पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद भारत-रूस का आयात-निर्यात सम्बन्ध बना हुआ है. भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में फार्मास्यूटिकल्स, कार्बनिक रसायन, विद्युत मशीनरी और यांत्रिक उपकरण, लोहा और इस्पात शामिल हैं जबकि रूस से आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक, खनिज संसाधन, कीमती पत्थर और धातु, वनस्पति तेल आदि शामिल हैं. व्यापारिक संबंधों की महत्ता को वाणिज्य विभाग के आँकड़ों से समझा जा सकता है. उसके अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार 65.70 बिलियन डॉलर में भारत का निर्यात 4.26 बिलियन डॉलर और आयात 61.44 बिलियन डॉलर रहा जो अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है.

 

व्यापारिक महत्त्व के रूप में अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) भी प्रमुख है. भारत और रूस दोनों के लिए यह सम्पर्क मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह गलियारा माल ढुलाई के लिए जहाज, रेल और सड़क मार्गों का 7200 किमी लंबा मल्टी-मोड नेटवर्क है. भारत, ईरान और रूस ने इससे सम्बंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे ताकि ईरान और सेंट पीटर्सबर्ग के माध्यम से हिन्द महासागर और फारस की खाड़ी को कैस्पियन सागर से जोड़ने वाला सबसे छोटा परिवहन मार्ग प्रदान करने के लिए एक गलियारा बनाया जा सके. हाल ही में रूस ने पहली बार इसके द्वारा भारत को कोयला ले जाने वाली दो ट्रेनें भेजी हैं. यद्यपि यह मार्ग अभी पूर्ण रूप से शुरू नहीं हुआ है तथापि जब यह मार्ग पूरी तरह चालू हो जाएगा तो भारत और रूस के बीच व्यापारिक गतिविधियाँ तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

 

पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने का उद्देश्य रूस को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अकेला करना था मगर भारत ने रूस का साथ देते हुए कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा रूस के साथ किये जा रहे सौतेले व्यवहार के पक्ष में भारत नहीं है. ऐसे में भारत ने रूस के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के साथ-साथ सामरिक सम्बन्धों को भी बनाये रखा. सामरिक महत्त्व में भारत द्वारा रूस से एस-400 मिसाइलों की खरीदारी महत्त्वपूर्ण विषय है. टी-90 टैंक, एसयू 30, एके 203 राइफलें भी भारत में ही संयुक्त उत्पादन में निर्मित हो रही हैं. इस तरह के रक्षा सम्बन्धों के साथ-साथ सहयोगात्मक विदेश नीति के कारण भारत-रूस सम्बन्धों का वैश्विक दृष्टि से व्यापक प्रभाव है.

 

विगत कुछ समय से वैश्विक स्तर पर युद्ध की स्थितियाँ चारों तरफ बनती दिखाई देने लगी हैं. बहुसंख्यक देशों के बीच तनाव भी नजर आ रहा है. ऐसे में वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका, चीन, पश्चिमी देशों की अनावश्यक अराजकता, आक्रामकता, विस्तारवाद जैसी स्थितियों से बचाने के लिए शक्ति संतुलन की आवश्यकता है. नरेन्द्र मोदी सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाते हुए भारतीय सम्बन्धों को पश्चिमी देशों, यूरोपीय देशों सहित अमेरिका के साथ संतुलन बनाये रखने हेतु लगातार प्रयासरत हैं. निश्चित ही रूस की इस यात्रा से भारत के साथ-साथ सकल विश्व को भी सकारात्मक सन्देश प्राप्त होगा.


02 जुलाई 2024

अब तो परिपक्वता दिखाएँ राहुल गांधी

दस साल के बाद वर्तमान लोकसभा को नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी का मिलना हुआ. नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने के एक नियम के कारण विगत दस वर्षों से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं था. इस नियम के चलते किसी भी विपक्षी दल के पास लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या का कम से कम दस प्रतिशत सदस्य होने चाहिए. 2014 और 2019 की लोकसभा में किसी भी विपक्षी दल के पास आवश्यक दस प्रतिशत सदस्य नहीं थे अर्थात लोकसभा के कुल 543 सांसदों में से किसी के पास 55 सांसद नहीं थे. 2014 में सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस के पास सिर्फ 44 सांसद थे. इसी तरह 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र 52 सांसदों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल था. अब 2024 लोकसभा में कांग्रेस 99 सीटों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल है. इसीलिए राहुल गांधी संसद में नेता प्रतिपक्ष के रूप में हैं.   

 



राहुल गांधी अपने राजनैतिक जीवन में पहली बार कोई संवैधानिक पद सँभालेंगे. संसद में विपक्षी नेता अधिनियम 1977 के अन्तर्गत नेता प्रतिपक्ष केन्द्रीय मंत्री के समान होता है. नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल को कई शक्तियाँ और अधिकार भी मिलेंगे. वे भारत सरकार की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष होने के अलावा प्रधानमंत्री के साथ मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों का चयन करने वाले पैनल का हिस्सा होंगे. इसके अलावा वे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में लोकपाल, ईडी-सीबीआई निदेशक, केंद्रीय सतर्कता आयोग, केन्द्रीय सूचना आयुक्त, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग प्रमुख को चुनने वाली समितियों के सदस्य होंगे. गांधी परिवार की दृष्टि से देखें तो वे इस परिवार के तीसरे सदस्य हैं, जिनको नेता प्रतिपक्ष का संवैधानिक पद प्राप्त हुआ है. इससे पहले उनके पिता और माँ क्रमशः राजीव गांधी और सोनिया गांधी इस पद पर रह चुके हैं.

 

पिछले कुछ वर्षों में राजनैतिक हलकों में राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में लगातार प्रोजेक्ट किया जा रहा है. कांग्रेस सहित उनके अन्य सहयोगियों द्वारा इस तरह से प्रचार भी किया जाता रहा है. भारत जोड़ो यात्रा को उनके परिपक्व होने के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है. ऐसी स्थिति में जबकि किसी नेता को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया जाता हो तब भी और अब जबकि वही नेता सदन में संवैधानिक पद का प्रतिनिधित्व कर रहा हो, तब उससे परिपक्वता की अपेक्षा की जाती है. यह अपेक्षा तब विवादों के, हंगामे के घेरे में फँस गई जबकि 18वीं लोकसभा के पहले सत्र में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने पहले भाषण में ही राहुल गांधी हिन्दुओं को चौबीस घंटे हिंसा, नफरत, असत्य फ़ैलाने वाला कह गए. ये और बात है कि खुद राहुल गांधी और उनके बचाव में उतरे नेताओं द्वारा बार-बार कहा जा रहा है कि हिन्दुओं से उनका अर्थ सम्पूर्ण हिन्दू समाज से नहीं वरन भाजपा से था.

 

नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनके लगभग नब्बे मिनट तक चले भाषण से ऐसा लगा कि वे अभी भी चुनावी मोड में हैं. एकबारगी भी नहीं लगा कि सदन के अन्दर किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति भाषण दे रहा है. विगत वर्षों में जिस तरह से उनका लहजा रहा है, उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं आया. लम्बे राजनैतिक सफ़र के बाद भी उनके हाव-भाव, भाषा-शैली, बर्ताव, आचरण आदि में परिपक्वता की कमी दिखी, भले ही स्थिति सदन में हो, सदन के बाहर हो, मंच पर हो या फिर पदयात्रा में हो. संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गले लगने के बाद आँख मारना, निलंबित किए विपक्षी सांसदों के विरोध प्रदर्शन के समय राज्यसभा के सभापति की मिमिक्री करने का वीडियो खुद राहुल गांधी बनाते दिखे. इसी तरह भाजपा के केन्द्र में आने के बाद राहुल गांधी ने जब भी अपने भाषणों में, प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जिक्र किया तो उनके लिए अशालीन, अमर्यादित शब्दावली का ही प्रयोग किया. प्रधानमंत्री के लिए पनौती, जेबकतरा, हत्यारा, भाग जायेगा, नरेंद्र मोदी कांपने लगा, वो झूठ बोलना शुरू कर देता है आदि शब्दावली का प्रयोग करना राहुल गांधी के लिए आम बात है.

 

एक मिनट को मान लिया जाये कि अभी तक की शब्दावली, राहुल की गतिविधि महज एक सांसद के तौर पर थी. तब किसी संवैधानिक पद पर न होने के कारण संभवतः वे उसकी गरिमा, महत्ता को न समझ पाते हों. हालाँकि ऐसा समझना भी अपने आपमें एक भूल होगी क्योंकि उनके परिवार ने मात्र सांसद ही नहीं दिए हैं बल्कि प्रधानमंत्री दिए हैं. अब जबकि वे खुद एक संवैधानिक पद पर हैं, संवैधानिक पद की गरिमा को, उसके आचरण को उन्होंने अपने परिवार में ही देखा है तब कम से कम ये अपेक्षा बनती ही है कि वे मर्यादित आचरण का परिचय देंगे. कहीं ऐसा न हो कि उनसे मर्यादित आचरण की अपेक्षा रखने वाले देशवासी उनके पिता की तरह कहें कि हमें देखना है, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे. देश की संसद को भी एक मजबूत नेता प्रतिपक्ष की आवश्यक्ता है. आखिर वो उनकी आवाज और प्रतिनिधि है जो सत्ता और सरकार से मतभेद रखते हैं; जो सत्तारूढ़ दल की नीतियों, कार्यशैली में विश्वास नहीं करते. लोकतंत्र में विरोध भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि समर्थन. आशा है राहुल गांधी उस परिपक्वता को प्रदर्शित करेंगे जिससे असहमति और विरोध का स्वर भी सदन में सम्मान और उचित स्थान पा सके.

09 जून 2024

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी.


आज नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है. हम सभी हर्षित, उत्साहित हैं. यहाँ अति-उत्साह, हर्ष में अपनी-अपनी पोस्ट में उनके तीसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ लेने की बात लिख रहे हैं, वे थोड़ा सा संशोधन करते हुए उसे 'लगातार तीसरी बार' लिखें.

 

तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वालों में जवाहर लाल नेहरू के बाद अटल बिहारी वाजपेयी भी रहे हैं. ये बात और है कि अटल जी लगातार तीन बार शपथ लेने वालों में नहीं थे, जैसे कि नेहरू जी रहे और अब मोदी जी हैं.

 



अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार निम्न समयावधि में रहे.

पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए

दूसरी बार 1998 में 13 महीने की अवधि के लिए

तीसरी बार 1999 में पूर्ण कार्यकाल पाँच वर्ष के लिए...

14 मार्च 2024

आर्थिक सम्पन्नता से होगी वैतरणी पार

लोकसभा चुनावों की सुगंध चारों तरफ फैलने लगी है. इस बार का लोकसभा चुनाव जहाँ एक तरफ विपक्षी गठबंधन के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है वहीं भाजपा के लिए खुद को निखारने जैसा है. विगत दस वर्षों के कार्यों को देखने के बाद शायद ही किसी राजनैतिक विश्लेषक को केन्द्र में भाजपानीत सरकार के प्रति संशय हो. इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए प्रतिद्वंद्विता स्वयं से ही है, निखारना भी स्वयं को है, साबित भी स्वयं को करना है. विगत दस वर्षों के कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी द्वारा किये गए कार्यों, उनके द्वारा लिए गए अनेक साहसिक निर्णयों के द्वारा यह निर्धारित हो चुका है कि वे देशहित में किसी भी तरह का साहसिक निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते हैं.

 

उनके इन्हीं कार्यों, निर्णयों के आधार पर सहज स्वीकार्यता बनी हुई है कि इस लोकसभा चुनाव में जनादेश प्राप्त करने के बाद वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे. देश में अभी तक हुए सत्रह लोकसभा चुनावों में जवाहर लाल नेहरू के अतिरिक्त किसी को भी लगातार तीन बार जनादेश नहीं मिला है. नेहरू जी के नेतृत्व में 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस विजयी हुई थी. भाजपा द्वारा ‘अबकी बार, चार सौ पार’ का नारा ऐसे ही नहीं दिया जा रहा है. ऐसा अनुमान है कि नरेन्द्र मोदी अपने तमाम कार्यों, निर्णयों के आधार पर कांग्रेस के एक और कीर्तिमान पर अपनी नजर बनाये हुए हैं. अभी तक के लोकसभा चुनावों में वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उसी वर्ष संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने कीर्तिमान रचते हुए ऐतिहासिक 415 सीटों के साथ केन्द्र में सरकार बनायी थी. नरेन्द्र मोदी और भाजपा का पूरा प्रयास रहेगा कि अपने कार्यों के चलते वे इस ऐतिहासिक संख्या को छू सकें.

 



जिस तरह की राजनैतिक हलचल मची हुई है, जिस तरह से विपक्ष के क्रियाकलाप हैं, जिस तरह से उनके द्वारा बयानबाजी की जा रही है, जिस तरह से मतदाताओं का रुख है उसे देखकर इस लोकसभा में भाजपा को जनादेश मिलना मुश्किल नहीं लग रहा है. इसके पीछे नरेन्द्र मोदी के वे तमाम कार्य और निर्णय हैं जो उन्होंने पूरे साहस के साथ पूरे किये हैं. इन कार्यों में चाहे नोटबंदी हो, 370 की समाप्ति हो, तीन तलाक का मामला हो, राममंदिर निर्माण हो, नारी शक्ति वंदन अधिनियम हो, नागरिकता संशोधन अधिनियम हो या फिर समान नागरिक संहिता जैसा मुद्दा हो. असल में इन कार्यों को भाजपा के थिंक टैंक द्वारा, उनके सहयोगियों द्वारा तो खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया मगर उन अनेकानेक कार्यों पर विषद चर्चा कभी नहीं की गई जो जनहित से जुड़े रहे, जो आर्थिक नीतियों से जुड़े रहे. उक्त तमाम विषयों को विरोधियों द्वारा बार-बार आलोचनात्मक रूप में उठाते हुए सरकार की आलोचना की गई कि उसके द्वारा गरीबी, स्वास्थ्य, मंहगाई, रोजगार आदि के लिए किसी भी तरह का कार्य नहीं किया गया. इन बिदुओं पर भाजपा के रणनीतिकारों द्वारा भी जनमानस के बीच जाने का प्रयास नहीं किया गया. आम जनता को यह समझाने का प्रयास ही नहीं किया गया कि मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा महज जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, वाराणसी आदि पर ही कार्य नहीं किया गया बल्कि आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, बालिका समृद्धि योजना, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया आदि के द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने का कार्य किया है.

 

2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अद्यतन भारतीय राजनीति को दो-दो दशकों के तुलनात्मक रूप में देखा जाने लगा है. इसमें पहला मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाला 2004-2014 का संप्रग कार्यकाल और दूसरा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाला 2014-2024 का राजग कार्यकाल है. यहाँ इन दो-दो दशकों के एक-एक पक्ष को विश्लेषित कर पाना संभव नहीं है मगर कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को अवश्य ही दर्शाया जा सकता है. जब भी किसी सरकार के कार्यों का आकलन किया जाता है तो मंहगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना आदि पर विशेष नजर रखी जाती है. तुलनात्मक रूप में देखें तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, रसोई गैस कनेक्शन, आवास, शौचालय, शिक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार, आधारभूत संरचना, मातृत्व सेवाओं आदि में जबरदस्त उपलब्धि प्राप्त की है. उज्ज्वला योजना, सस्ते आवास योजना, शौचालय निर्माण के द्वारा मोदी सरकार ने जन-जन में, गरीब तबके में अपनी पैठ बनाई है. 2004 में रसोई गैस कनेक्शन की संख्या 14.5 करोड़ थी जो 2023 में 31.4 करोड़ हो गई. स्वच्छता के प्रति गम्भीर मोदी सरकार ने शौचालय के निर्माण में सकारात्मकता दिखाई. अपने दोनों कार्यकाल में 11.5 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके मोदी सरकार ने महिलाओं, बहू-बेटियों को खुले में शौच जाने की शर्मिंदगी, मुसीबत से छुटकारा दिलवाया. आश्चर्य की बात है कि संप्रग सरकार के दो दशकों में महज 1.8 करोड़ शौचालयों का ही निर्माण करवाया जा सका था. महिलाओं के प्रति संवेदनशील मोदी सरकार ने मातृत्व लाभार्थियों के प्रति विशेष जागरूकता दिखाई है. उनके कार्यकाल में ऐसे लाभार्थियों की संख्या 9.9 लाख के मुकाबले 559 लाख तक पहुँची.

 

भाजपा, मोदी विरोधियों द्वारा आये दिन मँहगाई, आर्थिक स्तर आदि को लेकर हमलावर रुख अपनाया जाता है. बयानबाजियों के लिए किसी भी स्तर तक जाकर जनमानस को बरगलाया जा सकता है किन्तु यदि तथ्यों की, आँकड़ों की बात की जाये तो कुछ अलग ही परिदृश्य नजर आता है. संप्रग सरकार के अंतिम दिनों में विदेशी मुद्रा कोष की स्थिति अत्यंत ही दयनीय बनी हुई थी. मँहगाई की औसत दर भी अपने चरम पर थी. मोदी सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में विशेष प्रयास किये गए. दूसरे देशों से लगातार संपर्क, खाड़ी देशों से दोस्ताना सम्बन्ध आदि के चलते समय के साथ आर्थिक स्थिति में सुधार आया. विदेशी मुद्रा इस जनवरी में 617 अरब डॉलर था और मंहगाई की औसत दर वर्ष 2023 में 5.1 प्रतिशत रही. इस तरह के आर्थिक माहौल के चलते ही अनेक विदेशी कम्पनियों ने भारत का रुख किया. निवेश की जबरदस्त स्थिति के चलते ही देश ने पहली बार भारतीय वस्तुओं के निर्यात को 400 अरब डॉलर के पार किया. इस तरह की आर्थिक स्थिति के कारण ही आज भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. 2023 में देश की जीडीपी 3.7 लाख करोड़ हो गई है और इसके 2024 में 4.1 लाख करोड़ रहने का अनुमान है.

 

वर्तमान में नरेन्द्र मोदी के कार्यों-निर्णयों ने उनके कद को अत्यंत विराट स्वरूप दे दिया है. मुद्दा चाहे राष्ट्रीय महत्त्व का हो या फिर क्षेत्रीय महत्त्व का प्रत्येक स्तर पर मोदी सरकार की सहभागिता दिखाई देती है. जहाँ उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास आदि की समस्या को दूर करते हुए 24.8 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का कार्य किया गया वहीं विदेशी मुद्रा भंडार, टैक्स संरचना, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, बिजनेस रैंकिंग आदि में बहुआयामी परिवर्तन  करके देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलवाई है. आज जिस तरह से देश का आर्थिक, सामाजिक ढाँचा सुधारात्मक मोड में है, लोगों की क्रय-क्षमता बढ़ी है, ग्रामीण अंचलों तक बिजली ने अपनी पहुँच बनाई है, मूलभूत सुविधाओं ने महिलाओं की जीवन-शैली को सहज बनाया है उससे जनमानस में नरेन्द्र मोदी के प्रति, सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है. निश्चित ही यही विश्वास भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को इस लोकसभा चुनावी वैतरणी सफलतापूर्वक, सहजतापूर्वक पार करवा देगा. 





 

06 जनवरी 2023

वैश्विक नेतृत्व की राह पर भारत

देश में इस वर्ष सितम्बर में जी-20 सम्मेलन का आयोजन होना है. इस आयोजन का कारण हमारे देश को विश्व के शक्तिशाली समूह जी-20 की अध्यक्षता मिलना है. भारत ने बीस देशों के शक्तिशाली समूह जी-20 का अध्यक्षीय पद ग्रहण किया है. बाली शिखर सम्मेलन में पूर्व अध्यक्ष देश इंडोनेशिया द्वारा भारत को 1 दिसम्बर 2022 को वर्ष 2023 के लिए अध्यक्षता सौंपी गई. अब पूरे एक साल तक भारत जी-20 से जुड़ी दो सौ बैठकों की मेजबानी करेगा. ये आयोजन देश के पचास से अधिक शहरों में किए जाएँगे. नब्बे के दशक में अनेक विकसित और विकासशील देश आर्थिक एवं वित्तीय समस्याओं का समाधान करने के लिए 25 सितम्बर 1999 को औपचारिक रूप से वाशिंगटन डीसी में जी-20 समूह की स्थापना की गयी. यह दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, मैक्सिको, अर्जेंटीना, रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, यूके, ब्राजील, इटली, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, भारत, इंडोनेशिया, जापान, तुर्की, कोरिया, फ्रांस, सऊदी अरब एवं यूरोपीय संघ शामिल हैं. जी-20 को विश्व के आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श एवं आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है.




सितम्बर में होने वाले कार्यक्रम की थीम वसुधैव कुटुम्बकम’ के द्वारा यह संकेत स्पष्ट रूप से दिया गया है कि धरती ही परिवार है. कार्यक्रम का एजेंडा भले ही अभी सदस्य देशों द्वारा तय किया जाना है किन्तु भारत ने इस बात का साफ संकेत दिया है कि ऊर्जा संकट और आतंकवाद को रोकना उसके लिए बड़ा एजेंडा होगा. दुनिया के देशों के सामने भारत इनसे निपटने का रोडमैप भी पेश करेगा जी-20 अपने आपमें एक अनूठी वैश्विक संस्था है, जहाँ विकसित और विकासशील देशों का समान महत्व है. यहाँ विकासशील देश सबसे शक्तिशाली देशों के साथ अपने राजनैतिक, आर्थिक और बौद्धिक नेतृत्व को प्रदर्शित कर सकते हैं. इसी कारण से भारत का दुनिया के सबसे प्रभावशाली बहुपक्षीय समूह का नेतृत्व करना प्रत्येक नागरिक के लिए गौरव का विषय है. अपनी अध्यक्षता के साथ देश अपनी पहली वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका में नई नीतियों के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त करेगा. भारत कमजोर देशों की सहायता करने, विकासशील देशों की आवाज़ को मुखरित करने और उनके मुद्दों को वैश्विक स्तर पर उठाने के लिए जी-20 की प्रमुख भूमिका पर दृढ़ता से ध्यान केंद्रित करने के लिए तत्पर है.


भारत को जी-20 की अध्यक्षता मिलना दर्शाता है कि देश वैश्विक ताकतों के बीच वैश्विक नेतृत्व के रूप में उभरा है. इसके अलावा अन्य कई मंचों पर भी देश ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्शायी है. आर्थिक क्षेत्र में वह ब्रिटेन को पीछे छोड़ कर पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना तो संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में वह अस्थायी सदस्य बना है. इसके अलावा सुरक्षा परिषद में सुधार की माँग का रूस और अमेरिका द्वारा समर्थन करने को भी देश की वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जा सकता है. जी-20 में विश्व के वे तमाम विकसित देश शामिल हैं जिनकी वैश्विक जीडीपी में लगभग 85 प्रतिशत की भागीदारी है. ऐसे में प्रत्येक भारतीय को इसके महत्त्व को पहचानते हुए देश के बढ़ते कद को लेकर गौरवान्वित होना चाहिए. हमारे देश के सकारात्मक कार्य हम सभी के सामने हैं और इसी का सुखद परिणाम जी-20 की अध्यक्षता के रूप में मिला है.  


देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उल्लेख भी किया है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों में उम्मीद जगाने के लिए हम बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने और वैश्विक सुरक्षा बढ़ाने पर सर्वाधिक शक्तिशाली देशों के बीच एक ईमानदार बातचीत को प्रोत्साहन प्रदान करेंगे. भारत का जी-20 एजेंडा समावेशी, महत्त्वाकांक्षी, कार्रवाई-उन्मुख और निर्णायक होगा. आइए, हम भारत की जी-20 अध्यक्षता को संरक्षण, सद्भाव और उम्मीद की अध्यक्षता बनाने के लिए एकजुट हों. आइए, हम मानव-केंद्रित वैश्वीकरण के एक नए प्रतिमान को स्वरूप देने के लिए साथ मिलकर काम करें.






 

08 नवंबर 2021

माँ अन्नपूर्णा की चोरी गई प्रतिमा वापस आई

कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो. ये पंक्ति कार्य करने को प्रेरित करती है. यह बात केवल व्यक्तियों पर लागू नहीं होती बल्कि शासन, प्रशासन, संस्थाओं आदि पर भी लागू होती है. किसी भी काम को करने के प्रति यदि सकारात्मकता है, पारदर्शिता है, ईमानदारी है तो ऐसा संभव नहीं कि वह कार्य सफल न हो. कुछ ऐसा ही इस बार भारत सरकार के प्रयासों से देखने को मिला.


वाराणसी से लगभग 100-150 वर्ष पहले माँ अन्नपूर्णा की पवित्र प्रतिमा को असामाजिक तत्वों द्वारा चोरी करके कनाडा पहुँचा दिया गया था. कालांतर में इस प्रतिमा की पहचान भारतीय मूल के किसी लेखक द्वारा की गई. यह प्रतिमा भारत की आस्था से जुड़ी है. इस संबंध में जैसे ही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जानकारी मिली उन्होंने कनाडा सरकार से संवाद स्थापित किया. उनके प्रयासों से भारत और कनाडा सरकार के बीच परस्पर संवाद बना रहा. इसका सुफल यह रहा कि माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा को ससम्मान भारत मँगवाया गया.




माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा में माँ के एक हाथ में खीर की कटोरी और दूसरे हाथ में चम्मच है. यह प्रतीक है समाज को भूखे पेट न रहने देने का, सभी के लिए भोजन उपलब्धता है. 15 नवम्बर को इस प्रतिमा की प्राण स्थापना काशी में की जाएगी. इससे पूर्व यह प्रतिमा दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद को सौंपी गई है. जिसके बाद पुनर्स्थापना यात्रा के माध्यम से माँ अन्नपूर्णा 18 जिलों में भक्तों को दर्शन देते हुए 14 नवम्बर को काशी पहुँचेगी. इसके बाद अगले दिन (15 नवम्बर) देवोत्थान एकादशी के पावन अवसर पर श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के नवीन परिसर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधि-विधान से प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा करेंगे.