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24 दिसंबर 2022

गीत-ग़ज़ल के शौक़ीन नहीं दिखते अब

क्या आजकल लोगों ने गाने-ग़ज़ल सुनना बंद कर दिए? हो सकता है कि आप सबको ये सवाल कुछ अजीब सा लगे. लगा भी होगा बहुतों को कि ये क्या सवाल है मगर यदि अपनी भागमभाग ज़िन्दगी में एक पल को रुक कर बस इसी सवाल का जवाब खोजें तो आप अपने आपमें ही, अपने लिए जवाब न दे पाएँगे. ऐसा आज के समय में बहुत हद तक सही है. आपको, हमें या कहें कि हम एक व्यक्ति को आज के दौर में एक ऐसी नस्ल देखने को मिलती है जिसके काम में हेडफोन लगा है, इयरफोन घुसे हैं मगर सत्य ये है कि वे गाने नहीं सुन रहे होते हैं. इस नस्ल में से कुछेक लोग यदि गाने सुनते भी हैं तो वे बस कुछ पल के लिए. उनके लिए भी गाने सुनना कोई शौक नहीं, कोई पैशन नहीं.


ये सवाल कोई आज अचानक से दिमाग में नहीं आ गया. ये सवाल बहुत दिनों से दिल-दिमाग के किसी कोने में बैठा हुआ था, बस हम ही मौका नहीं निकाल पा रहे थे कि इसे बाहर ला सकें. पिछले एक लम्बे समय से हम अनुभव कर रहे हैं कि हम मित्रों की मुलाकात के दौरान, अपने आसपास जमा भीड़ की बातचीत के दौरान, समाज के विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय रखने वालों की बातचीत के दौरान, किशोरों-युवाओं के साथ अपनी बातचीत के दौरान बहुत सारे विषयों पर बात होती है, बहुत सारे मुद्दों पर बहस होती है मगर गानों-ग़ज़लों पर चर्चा नहीं होती है. इसी तरह के बहुत सारे लोगों से उनके शौक पर बात होती है, उनकी पसंद-नापसंद पर बात होती है, उनके कार्यों पर बात होती है मगर इन्हीं में से कोई ऐसा सामने नहीं आता है जो गाने सुनने का शौक रखता हो, जो नए-पुराने गानों-ग़ज़लों को सुनने का शौक रखता हो. आश्चर्य की बात तो ये लगी कि ऐसा हाल उन लोगों का भी है जो खुद को गीत-संगीत के क्षेत्र से जोड़े हुए हैं, लगातार गायन-वादन से जुड़े हैं.




ऐसे में यदि हम अपनी बात करें तो आज भी सुबह उठने के बाद पहला काम रेडियो को शुरू करना होता है. उसके न होने की स्थिति में म्यूजिक सिस्टम चालू हो जाता है. इनका काम गानों-ग़ज़लों को सुनाते रहना है. ये क्रम तब तक निर्बाध चलता है जबकि हमारा सोना नहीं होता है. आपको आश्चर्य लगेगा, ये काम हमारी नित्यक्रिया संपन्न करने के दौरान भी चलता रहता है. बस उस समय म्यूजिक सिस्टम की आवाज़ जरा तेज हो जाती है. इस लेख को लिखे जाने के समय भी ग़ज़ल साथ में चल रही है. ये आदत कोई आज की नहीं है. आज हम इसे आदत नहीं बल्कि नशा कहते हैं. अपने घर में बचपन से ही रेडियो की उपस्थिति को महसूस किया है. गाने, समाचार, कमेंट्री, बच्चों के कार्यक्रम, लोकगीत आदि को रेडियो में बचपन से ही सुनते चले आ रहे हैं.


रेडियो के उस सुहाने दौर में रिकॉर्ड प्लेयर से भी परिचय हुआ, टेप रिकॉर्डर से भी मुलाकात हुई. इन दोनों का अपना अलग ही अंदाज देखा. अस्सी के दशक में उरई में इक्का-दुक्का दुकानें हुआ करती थीं जहाँ कैसेट में गाने की डबिंग हुआ करती थी. ये हम बच्चों के लिए बड़ी कौतूहल की चीज हुआ करती थी. समय के साथ बदलाव आते गए, समझ बढ़ती गई तो कैसेट का, प्लेयर का महत्त्व समझ में आया, उनका अंतर समझ में आया. गाने सुनते-सुनते कब ये शौक ग़ज़ल सुनने में बदल गया पता ही न चला. पुराने गीतों के तमाम सारे गायक-गायिकाओं के बीच कब गुलाम अली ने अपनी ग़ज़ल गायकी से स्थान बना लिया पता ही न चला. नब्बे के दौर में हम मित्रों के बीच यह भी स्वस्थ प्रतियोगिता की एक पहचान हुआ करती थी कि किसके पास किस गायक की नई कैसेट आ गई है, किसने गुलाम अली की कौन सी नई ग़ज़ल पहले सुन ली है.


उन दिनों आपसी बातचीत का एक विषय गीत-ग़ज़ल भी हुआ करते थे. आज ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है. अभी पिछले दिनों गुलाम अली की एक बेहतरीन ग़ज़ल की चर्चा अपने मित्रों से की, परिचितों से की मगर किसी ने ये भी जानने की कोशिश ना की कि वो ग़ज़ल कौन सी है. अपने कॉलेज में भी सामान्य बातचीत के दौरान भी यदि कभी गीत-ग़ज़ल की चर्चा हो जाती है तो सामने से कोई प्रतिक्रिया नहीं आती है. जबकि ऐसा पहले नहीं था. पहले एक मित्र के यहाँ यदि कैसेट आ जाती थी तो बारी-बारी से उसी रिकॉर्डिंग सभी मित्रों तक पहुँच जाती थी. हमें आज भी याद है उस समय गुलाम अली का कोई कार्यक्रम शायद दिल्ली में हुआ था. हमारे एक मित्र को इसीलिए दिल्ली भेजा गया था कि वो लाइव रिकॉर्डिंग करेगा. उसने भी वहाँ पहुँच कर विशेष रूप से स्पीकर के पास बैठने का इंतजाम किया और गुलाम अली का लाइव कार्यक्रम रिकॉर्ड किया. वो कैसेट आज भी हमारे पास सुरक्षित है.


अब हो सकता है कि लोग गीत-ग़ज़ल सुनते हों मगर खुद में सीमित रहकर. जैसे बहुत सी बातों को लोगों ने गोपनीय बना दिया है, शायद गीत-ग़ज़ल सुनने के शौक को भी गोपनीय बना दिया हो.

  






 

30 दिसंबर 2020

मैं तुझे भूलने की कोशिश में, आज कितने क़रीब पाता हूँ

हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली वो किसी विरले कवि को प्राप्त होती है. वे हिन्दी के कवि और ग़ज़लकार थे. उनके लेखन का स्वर सड़क से संसद तक गूँजता रहा है. यूँ तो उन्होंने अनेक विधाओं में लेखनी चलाई किन्तु ग़ज़लों की अपार लोकप्रियता ने उनकी अन्य विधाओं को पीछे धकेल दिया. दुष्यंत कुमार का जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के ग्राम राजपुर नवादा में 1 सितम्बर 1933 को हुआ था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कुछ दिन आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर भी रहे. अपने जीवन में वे बहुत, सहज और मनमौजी व्यक्ति थे. उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था. उन्होंने प्रारम्भ में दुष्यंत कुमार परदेशी नाम से रचनाएँ करनी शुरू की. 





जिस समय उन्होंने साहित्य की दुनिया में पदार्पण किया उस समय प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था. इसी तरह हिन्दी में अज्ञेय और मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था. ऐसे समय में दुष्यंत कुमार ने सहज हिन्दी में ग़ज़ल लिखकर उसे कठिनता से निकाला और प्रसिद्धि प्राप्त की. दुष्यंत कुमार ने देश के आम आदमी का दर्द ही नहीं लिखा बल्कि उसकी भाषा को भी अपनाया. उनका एकमात्र ग़ज़ल संग्रह साये में धूप आज भी साहित्य-प्रेमियों के बीच बहुत सराहा जाता है. उनकी अन्य कृतियों में सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे, जलते हुए वन का वसन्त (काव्य-संग्रह) और छोटे-छोटे सवाल, आँगन में एक वृक्ष, दुहरी ज़िंदगी (उपन्यास) प्रमुख हैं. उनका निधन 30 दिसम्बर सन 1975 में सिर्फ़ 42 वर्ष की अवस्था में हो गया. 


दुष्यंत कुमार को सभी लोग गजलकार के रूप में जानते हैं मगर दिलचस्प बात है कि ग़ज़ल उनका पहला प्यार नहीं थीं. इनसे पहले वे उपन्यास, नाटक, एकांकी और कविता सरीखी हर विधा में अपना हाथ आजमा चुके थे. इन सब में उन्होंने हाथ ही नहीं आजमाया, हर जगह अपनी साफ छाप भी छोड़ी. नयी कहानी, इस परंपरा के प्रमुख सूत्रधार मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर माने जाते हैं परन्तु बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि इस आन्दोलन का नामकरण दुष्यंत कुमार द्वारा ही किया गया था. उन्होंने अपने एक लेख में लिखा भी था कि क्यों और किस तरह ये कहानियाँ पुरानी कहानियों से अलग हैं. उन्होंने इसे भी प्रमाणित किया था कि आखिरकार इनका नाम नयी कहानी क्यों उचित है.


आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हीं की एक ग़ज़ल सादर समर्पित-- 


मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ,

वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ.


एक जंगल है तेरी आँखों में

मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ.


तू किसी रेल सी गुज़रती है

मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ.


हर तरफ़ एतराज़ होता है

मैं अगर रौशनी में आता हूँ.


एक बाज़ू उखड़ गया जब से

और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ.


मैं तुझे भूलने की कोशिश में

आज कितने क़रीब पाता हूँ.


कौन ये फ़ासला निभाएगा

मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ.

 

.
वंदेमातरम्

09 जून 2020

न जाने कैसा रिश्ता रखा

कई बार विचार बनाने पड़ते हैं और कई बार स्वतः बनते जाते हैं. ज़िन्दगी के हर पल में कुछ न कुछ ऐसा घटित होता रहता है जिसे संजोया जाये तो पद्य या गद्य में कुछ न कुछ रचनात्मक अवश्य निकल आता है. कुछ ऐसा ही इधर घटित हुआ कि अचानक बैठे-बैठे ये रचना बन गई. नहीं जानकारी कि हिन्दी का, उर्दू का, गीत का, ग़ज़ल का क्या मीटर है, क्या बहर है. बस जैसा दिल कहता गया, गुनगुनाता गया लिख दिया. पढ़िए आप भी और रसास्वादन करिए.



न जाने कैसा रिश्ता रखा,

न करीब आए न फासला रखा।


मिलने आते सबसे छिप कर,
और हमसे भी परदा रखा।

चाहतें मोरपंख सपनों की,
नींद ने न कोई वास्ता रखा।

वो चाँद था या चेहरा उनका,
दुनिया को दीवाना बना रखा।

साथ भी और तन्हाई भी,
जान कर भी अनजाना रखा।


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 मई 2020

इक पगली मेरा नाम जो ले... तो ये हाल हो जाए

सर्दी की कड़कड़ाती सुबह थी. चाय की तलब के आगे सर्दी, गर्मी, बरसात कहीं नहीं लगती थी. एक आदत बुरी यही पड़ी है, चाय पीने की. सुबह और शाम को एक बार पीनी ही पीनी है, चाहे क़यामत आ जाये. उस दिन सुबह शाल लपेट चाय पीने के लिए निकल पड़े. हॉस्टल के गेट से सड़क तक पहुँचने के लिए दो-ढाई सौ मीटर का रास्ता तय करना पड़ता था. सोचिये, कितनी कठिन तपस्या करनी पड़ती थी. सर्दी की कंपकंपाती सुबह, चाय की घनघोर तलब और इतना लम्बा रास्ता. चले जा रहे थे मुँह में चाय का स्वाद बनाते हुए. उसी समय सड़क पर कुछ डायोड, ट्रांजिस्टर जैसे अंग पड़े हुए थे. विज्ञान प्रगति, अविष्कार जैसी पत्रिकाओं के कारण छोटे-मोटे वैज्ञानिक बनने का प्रयास भी कर लेते थे. हालाँकि हर प्रयास में असफलता ही मिली किन्तु किसी न किसी दी सफलता मिलेगी, प्रयोग करते ही रहे. आगे के किसी प्रयोग में ये सब पार्ट्स काम आ सकते हैं, उठा लिए.


कुछ कदम और आगे बढ़े तो इसी तरह के दो-चार पार्ट्स और बिखरे दिखे. पहले सोचा कि पता नहीं किसने फेंके हैं, बेकार ही होंगे मगर फिर उनको भी उठा लिया. यहाँ अपने बाबा जी की एक बात याद आ गई कि सकल चीज संग्रह करे, काऊ दिन आबे काम. इसी सोच के साथ अभी उन दो-चार तत्त्वों को समेट कर जेब के हवाले कर भी न पाए थे कि आँखों के आगे कुछ और चीजें दिखाई दीं. अबकी दिखाई देने वाली चीजें कुछ परिचित सी समझ आईं. थोड़ा दिमाग दौड़ाया तो वे सब हिस्से अपने भाईसाहब के टेप रिकॉर्डर के समझ आये. जैसे ही उन सारे हिस्सों को देखा और कुछ बाहरी सा हिस्सा देखा तो साफ़ समझ आ गए कि ये टेप रिकॉर्डर ही है.

अब चाय का स्वाद गायब. दिमाग दौड़ने लगा टेप रिकॉर्डर की ऐसी दुर्गति के मूल में. इसके साथ ही आँखें तलाशने में लगी थीं बेचारे टेप रिकॉर्डर के अंग-प्रत्यंगों को. कुछ हिस्से सड़क किनारे लगे तारों के दूसरी तरफ बबूल के जंगल में नजर आये. तार कूद दूसरी तरफ जाकर लगभग पूरा का पूरा टेप रिकॉर्डर जरा-जरा से हिस्सों में बरामद कर लिया गया. ओढ़े हुए शाल में उसके बेजान हिस्सों को समेट कर बजाय चाय पीने के वापस हॉस्टल लौट सीधे भाईसाहब के कमरे में पहुँचे. तब तक इतनी सुबह हो चुकी थी कि वे सब लोग भी जाग चुके थे. नित्यक्रिया से निपटने के बाद चाय पीने की तैयारी में शेष पलटन भी लगी हुई थी. हमने बिना कुछ कहे पलंग पर शाल खोलकर सारे कल-पुर्जे बिखेर कर रख दिए. एक भाईसाहब को छोड़ सबकी आँखें खुली की खुली रह गईं.


कुछ घंटों पहले रात में जो कुछ हुआ, वो अब सबकी समझ आ गया था. असल में हम कुछ मित्र-मंडली हॉस्टल में एक कमरे में बैठे गपशप करने में लगे थे, सीनियर भाईसाहब को छोड़कर. वे ख़ामोशी से आँखों को आने हाथ से बंद किये लेते हुए थे. उनके ऐसे खामोश से लेते रहने का कारण हम दो दोस्तों को पता था. कॉलेज में जिस लड़की को वे पसंद करते थे, उससे कुछ अनबन हो गई थी. हम दोनों दोस्त कुछ देर पहले उन्हें इसी बात पर चिढ़ाते भी रहे थे, छेड़ते रहे थे. उनके चुप लेटने पर हम लोग अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे. ऐसे में उनको सक्रिय करने के लिए, इस मनोदशा से बाहर लाने के लिए उनके पसंद की ग़ज़ल टेप रिकॉर्डर पर चला दी. गुलाम अली की आवाज़ में एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाए भी, घबराए भी ग़ज़ल को हम लोग उसी लड़की से जोड़कर खूब सुनते थे.

अभी ग़ज़ल पूरी हो भी न पाई थी कि भाईसाहब ने उसी अवस्था में लेते-लेते आदेश दिया, टेप बंद करो. हम दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुरा कर टेप चलने दिया. कुछ देर में ग़ज़ल पूरी हुई तो हमने उसे रिवाइंड करके फिर शुरू कर दिया. टेप बंद करने का आदेश फिर हुआ. हम लोगों की वही प्रतिक्रिया रही. अबकी ग़ज़ल उसके आगे बढ़ न सकी थी कि भाईसाहब उठे और टेप बंद करके हम दोनों को गुस्से से घूरा और लेट गए. उनके गुस्से से हम सभी परिचित थे सो गुस्से का आदर भी करते थे, बचते भी थे. कुछ मिनट तक हम लोग भी चुप रहे फिर अपने-अपने काम में मगन हो गए.

ठण्ड खूब थी ही, सो रजाई में लिपटे आराम से लेते थे. तभी भाईसाहब का उठना हुआ और शाल लपेट कर एक झटके में बाहर निकल गए. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि हम लोगों को कुछ समझ नहीं आया. उस रात ये अंदाजा हम में से किसी को नहीं था कि भाईसाहब झटके में टेप रिकॉर्डर को उठाकर बाहर निकल गए थे. बताने की आवश्यकता नहीं कि रात को उन्होंने हॉस्टल वाली सड़क पर गुम्मे के सहारे उस टेप रिकॉर्डर की, उस कैसेट की हत्या करके उसके अंग-प्रत्यंग सबूत मिटाने की दृष्टि से इधर-उधर बिखेर दिए. वही अंग सुबह हमारे हाथ लगे और एक मासूम की हत्या का राज़ खुला.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 दिसंबर 2018

याद न रखने की ज़िद

वो भूल जाने की ज़िद रखता है,
याद न रखने की ज़िद रखता है.

याद न आ जाऊँ मैं उसे कहीं,
ये याद रखने की ज़िद रखता है.

नहीं करता गिला शिकवा कभी
ख़ामोश रहने की ज़िद रखता है.

मिलता है वो सबसे हँस-हँस कर,
हमसे दूर रहने की ज़िद रखता है.

उसका दीदार भी हुआ है मुश्किल,
नक़ाब में छिपने की ज़िद रखता है.
++
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
19-12-2018

24 अक्टूबर 2018

नींद ख़ामोशियों पर छाने लगी


नींद ख़ामोशियों पर छाने लगी,
इक कहानी फिर ठहर जाने लगी.

दर्द को रोका धीरे-धीरे मगर,
सैलाब दिल में लहर लाने लगी.

कब बदल जाए मौसम क्या पता,
तेज़ बारिश में धूप मुस्काने लगी.

हौसलों से हारती हैं मुश्किलें,
लौ दिए की अंधियारा मिटाने लगी.

आ रही वीरानियों में भी रौनक़ें,
बस्ती ख़ुद को फिर से बसाने लगी.

ज़ुल्म मिल करने लगे हैं रात-दिन,
अब तो क़ुदरत भी क़हर ढाने लगी.

ज़ख़्म कुरेदने का हुनर सीखकर ज़ुबां,
मुहब्बतें मिटा नफ़रतें फैलाने लगी.

+
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
21-10-2018

22 अक्टूबर 2018

बिछड़ के मुझसे खुश रहते हो


बिछड़ के मुझसे खुश रहते हो
तुम क्यों झूठी बातें करते हो.

चाँद सितारे जगमग जगमग
लगता है जैसे तुम हँसते हो

भौंरा कलियों बीच छिपा यूँ,
जैसे तुम ख़ुद में छिपते हो.

कैसे मेरे साथ चलोगे
तुम तो दुनिया से डरते हो.

ज़र्रा ज़र्रा चहके तुमसे
और तुम ही गुमसुम रहते हो.

जाने क्या कैसा रिश्ता है
अपने अपने से लगते हो.

+
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
21-10-2018

02 सितंबर 2018

हमसफर हैं कि नहीं इतना इशारा कर दे

साथ ले ले मुझे या खुद से जुदा तू कर दे।
हमसफर हैं कि नहीं इतना इशारा कर दे।

ज़िन्दगी तेरी है तेरी ही रहे तेरी कसम।
मुझको बस इसमें थोड़ी सी जगह तू दे दे।

वादा करते हो और भूल भी जाते हो सनम।
कोई एक वादा तू अपना तो पूरा कर ले। 

रंग बिखरे हैं कई रंग के इस गुलशन में।
अपने दामन को तू इनसे सतरंगी कर ले।

रात काली है, गुमसुम हैं सितारे, चंदा।
भर दो पूनम की छटा इनमें चाँदनी बनके।

शबनमी कलियों को जो एक नजर ही देखा।
कत्ल करने को कई भँवरे ले खंजर निकले।


++
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र  

+++++

बुन्देलखण्ड के प्रसिद्द गायक मिर्ज़ा साबिर बेग, जिन्हें लोग मुहम्मद रफ़ी के नाम से पुकारते हैं, जल्द ही उनके संगीत और स्वर में उक्त ग़ज़ल आपके सामने आएगी. वे इसकी धुन तैयार करने में लगे हैं. बहुत जल्द ही ये ग़ज़ल उनके स्वर-सुर-संगीत में आपको सुनाई देगी. तब तक आप इसे पढ़कर आनंद ले सकते हैं.

ये हमारे लिए सम्मान की बात है कि उनका कहना है कि ये ग़ज़ल पूरी तरह बहर में हैं. उन्हें इसकी धुन तैयार करने में कोई समस्या नहीं हुई. ये भी संयोग है कि जिस तरह की लय हमने इस ग़ज़ल की बनाई थी, लगभग वैसी ही लय-धुन साबिर भाई ने तैयार की.

उनकी व्यस्तता के बीच समय निकाल कर एक एल्बम भी निकाला जायेगा. हाल-फ़िलहाल आप इसका आनंद पढ़कर ही उठायें. 

23 जुलाई 2018

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी के करीब लाती है ज़िन्दगी


ज़िन्दगी को ज़िन्दगी के करीब लाती है ज़िन्दगी।
कभी हँसाती, कभी जार-जार रुलाती है ज़िन्दगी।।

रेत की दीवार से ढह जाते हैं सुनहरे सपने।
एक पल में हजारों रंग दिखाती है ज़िन्दगी।।

कोई नहीं जानता अंजाम अपने सफर का।
सभी को अपनी मंजिल तक पहुँचाती है ज़िन्दगी।।

नहीं कोई भरोसा है गुजरते हुए वक्त का।
सभी को कटी पतंग सा डोलाती है ज़िन्दगी।।

सहर होने से पहले काली रात के साये हैं।
मिटाने को फासला चाँदनी बन आती है ज़िन्दगी।।

लड़ते हुए अपने आपसे जीना भुला बैठे।
जीने के नये अंदाज सिखाती है ज़िन्दगी।।

बिछुड़ गये थे जो बीच राह में हमकदम।
अनजाने किसी मोड़ पर फिर मिलाती है ज़िन्दगी।।

दूर होकर भी कोई दिल के करीब है हमारे।
तन्हाई में मीठा सा एहसास कराती है ज़िन्दगी।।

14 जुलाई 2018

प्यार से उनको मनाने हो रही है बारिश


बादलों का संग निभाने हो रही है बारिश,
जाने किस-किस को भिगोने हो रही है बारिश।

मन-मयूर नाचता है दिल कि कोयल कूकती,
प्रेम की सरगम सजाने हो रही है बारिश।

देख तेरे ही शहर में एक तन्हा हम ही हैं,
और सबका दिल बहलाने हो रही है बारिश।

लग के गले ख़ामोश दुनिया से बेख़बर बैठे रहे,
प्रेम का अंकुर खिलाने हो रही है बारिश।

रूठ कर बैठे हैं जो इक ज़रा सी बात पर,
प्यार से उनको मनाने हो रही है बारिश।

देख कर दर्द उसका आँख कोई नम न हो,
उसके अश्कों को छिपाने हो रही है बारिश।

++
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
13-07-2018

11 जुलाई 2018

ख़ामोश लबों के पीछे अफ़साना छिपाए हैं


मुद्दतों से जिन्हें सीने में दबाए हैं,
बदली ने बरस वो दर्द जगाए हैं।

देखने की, न दिखने की अदा उनकी,
और ख़ुद को चिलमन में छिपाए हैं।

ख़ामोश मुहब्बत जब भी उनके लबों पे सजी,
पूछने पर उसे वो ग़ज़ल बताए हैं।

बेधड़क लिख मेरा नाम मिटाते भी नहीं,
उँगली क़लम पानी को काग़ज़ बनाए हैं।

दिल मेरा तबसे दिल जैसा नहीं रहा,
जबसे उनके दिल से दिल लगाए हैं।

आँखों की शोख़ी, गालों की सुर्खी बताती है,
ख़ामोश लबों के पीछे अफ़साना छिपाए हैं।

30 जून 2018

बंद आँखों ने मगर अफ़साना सारा कह दिया

जिंदगी का कारवाँ बनता रहा न पूरा हुआ,
साथ आये लोग बस एक तू न साथ था.

प्यार भी तूने दिया तुझसे ही नफरत मिली,
जो दिया तूने मुझे मेरे लिए अनमोल था.

आस तेरे आने की हम राह में बैठे रहे,
तू न आया था कभी और आज भी आना न था.

मौसमों ने रोज बदलीं रंगतें मेरे लिए,
और मैं अपनी ही बारिश में सदा भीगा रहा.

लब मेरे खामोश तूने अपने लब से कर दिए,
बंद आँखों ने मगर अफ़साना सारा कह दिया.

ले गया मुझको उड़ाकर फिर वो न जाने कहाँ,
तेरा रूप ले के आया झोंका इक यादों भरा.



++
यह पोस्ट इस ब्लॉग की 1250वीं पोस्ट है.

09 फ़रवरी 2018

अश्कों को दिल में छिपाने का हुनर लाया हूँ


दिल के ज़ख़्मों को हरा रखने का फ़न लाया हूँ
कह सके जो न वो कहने को ग़ज़ल लाया हूँ.

चाँदनी रोती रही बढ़ते रहे अँधियारे,
चाँद चमकाने को चंद्रकिरण लाया हूँ.

वो चुराते हैं नज़र मेरी नज़र से देखो,
मिलके जो झुक न सके ऐसी नज़र लाया हूँ.

ख़्वाब में मिलते हैं और चले हैं जाते,
जाने की ज़िद न करें वो दीवनापन लाया हूँ.

आँख में उनकी छवि इसलिए लाए न नमी,
अश्कों को दिल में छिपाने का हुनर लाया हूँ.

++
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
28-01-2018



++
इस ब्लॉग की 1150वीं पोस्ट 

03 सितंबर 2017

हिन्दी ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार को याद करते हुए

हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली वो किसी विरले कवि को प्राप्त होती है. वे हिन्दी के कवि और ग़ज़लकार थे. उनके लेखन का स्वर सड़क से संसद तक गूँजता रहा है. यूँ तो उन्होंने अनेक विधाओं में लेखनी चलाई किन्तु ग़ज़लों की अपार लोकप्रियता ने उनकी अन्य विधाओं को पीछे धकेल दिया. दुष्यंत कुमार का जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के ग्राम राजपुर नवादा में 1 सितम्बर 1933 को हुआ था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कुछ दिन आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर भी रहे. अपने जीवन में वे बहुत, सहज और मनमौजी व्यक्ति थे. उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था. उन्होंने प्रारम्भ में दुष्यंत कुमार परदेशी नाम से रचनाएँ करनी शुरू की.



जिस समय उन्होंने साहित्य की दुनिया में पदार्पण किया उस समय प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था. इसी तरह हिन्दी में अज्ञेय और मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था. ऐसे समय में दुष्यंत कुमार ने सहज हिन्दी में ग़ज़ल लिखकर उसे कठिनता से निकाला और प्रसिद्धि प्राप्त की. दुष्यंत कुमार ने देश के आम आदमी का दर्द ही नहीं लिखा बल्कि उसकी भाषा को भी अपनाया. उनका एकमात्र ग़ज़ल संग्रह साये में धूप आज भी साहित्य-प्रेमियों के बीच बहुत सराहा जाता है. उनकी अन्य कृतियों में सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे, जलते हुए वन का वसन्त (काव्य-संग्रह) और छोटे-छोटे सवाल, आँगन में एक वृक्ष, दुहरी ज़िंदगी (उपन्यास) प्रमुख हैं. उनका निधन 30 दिसम्बर सन 1975 में सिर्फ़ 42 वर्ष की अवस्था में हो गया.

16 मार्च 2013

सात सौवीं पोस्ट के रूप में ग़ज़ल - जाते जाते भी दिल में ये आस छोड़ जाओगे

ये हमारी सात सौवीं पोस्ट है, इस ब्लॉग की. मई २००८ में बनाये गए इस ब्लॉग पर लगातार विभिन्न विषयों पर कुछ न कुछ लिखा जाता रहा. आप सभी लोगों का स्नेह, आशीष सदैव मिलता रहा.
अपनी इस सात सौवीं पोस्ट के रूप में अपनी लिखी एक ग़ज़ल आपके सामने>>>>
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जाते जाते भी दिल में ये आस छोड़ जाओगे,
हम पुकारेंगे तुम्हें और तुम कर लौट आओगे.

देख ही लेता एक बार तो तुम्हें जी भर कर,
सोचा न था तुम इतनी जल्द छोड़ कर जाओगे.

आसान नहीं होता अपना बनाकर छोड़ देना,
तुम इतनी सी बात को कब समझ पाओगे.

बेचैन करेगी तन्हाई में जब हमारी चाहत तुम्हें,
उस घड़ी अपने बेचैन दिल को कैसे समझाओगे.

मेरे दिल की चुभन से थोड़ी तड़प तुम्हें भी होगी,
अपने आंसुओं का सबब लोगों को क्या बताओगे.

चाह होने पर खुदा की ढूँड़ लेते हैं पत्थरों में,
मैं गया वक्त नहीं हूँ कि मुझे ढूँड़ नहीं पाओगे.

कभी एहसास जगे गर दिल में हमसे मिलने का,
आँखें बंद करोगे तो अपने आसपास ही पाओगे.

दुआ फिर भी तुझे देंगे हमें छोड़ कर जाने वाले,
हम जैसा कोई और इस जहाँ में ढूँड़ नहीं पाओगे.

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आशा है कि आपको पसंद आएगी. आप सभी का स्नेह सदैव की भांति आगे भी अपेक्षित है.

15 अगस्त 2012

देखते होंगे खुद को आइने में और शरमाते भी होंगे


देखते होंगे खुद को आइने में और शरमाते भी होंगे,

सजाते होंगे मन में हमारे सपने और लजाते भी होंगे।

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एक एक लम्हा मिलन का वो सजोये हैं दिल में अपने,

गुदगुदाते भी होंगे जो उन्हें और कभी रुलाते भी होंगे।

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ख्वाब में मिलने की कोशिश और नींद आंखों में नहीं,

याद करके हमें रात सारी करवटों में बिताते भी होंगे।

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बिना कहे ही बहुत कुछ कह जाती है गालों की सुर्खी,

पूछने पर सबब चेहरे को हथेलियों से छिपाते भी होंगे।

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निहारते हैं घंटों मेरी तस्वीर को किताब में छिपा कर,

और तन्हाई में कभी-कभी अपने होंठों से लगाते भी होंगे।

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मिलते हैं लोगों से वो लबों पर एक चुप सी लगा कर,

बेपर्दा न हो जाये प्यार कहीं सोच कर घबराते भी होंगे।

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खुद नहीं करते हैं कभी भूले से मेरी बातों का चर्चा,

पर जिक्र होने पर मेरा खुशी से चहक जाते भी होंगे।

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उनके हर एक कदम से उठती है नफासत की खुशबू,

कांधों से फिसलता आंचल पल-पल संभालते भी होंगे।

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