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25 जनवरी 2020

संविधान, स्वतंत्रता, गणतंत्र को समझ न सके हैं अभी हम

राष्ट्रीय दिवसों से सम्बंधित आयोजन किसी भी व्यक्ति के अन्दर देशभक्ति की भावना का संचार करने में सक्षम होते हैं. गणतंत्र दिवस हो अथवा स्वाधीनता दिवस, सभी में बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक उत्साह दिखाई देता है. हर तरफ देशभक्ति की बयार बहती नजर आती है. एक तरह का जूनून सबके ऊपर नशे की तरह चढ़ा होता है. समाज का कोना-कोना देशभक्ति से ओतप्रोत समझ आने लगता है. क्या समाज, क्या घर, क्या कार्यालय, क्या आभासी दुनिया, क्या सोशल मीडिया सभी जगह देशभक्ति के विचारों का गुणगान होता रहता है. एक सामान्य नागरिक भी खुद को तिरंगे में सराबोर कर देता है. गणतंत्र की बातें, संविधान की रक्षा, उसके अनुपालन की बातें लोगों के मुँह से गली, मोहल्ले, चौराहे पर सुनाई देने लगती हैं. इसके बाद भी कहीं न कहीं अंतस इसका आनंद पूर्णतः ले नहीं पाता है. कहीं न कहीं वह ऐसे आयोजनों को महज एक दिन की औपचारिकता मानकर खारिज करना चाहता है. 


संभव है कि बहुत से देशभक्ति में सजे-धजे लोगों को ये बात हजम न हो मगर आज का अंतिम सत्य यही है. एक पल को तिरंगे को सलामी देने के ठीक पहले, उसके फहराने-लहराने पर मर-मिटने की सौगंध खाने के ठीक पहले विचार करिए कि आज देश की सड़कों पर, देश की राजधानी की सड़कों पर, राजधानी के शाहीन बाग़ में अथवा अन्य राज्यों के मुख्य-मुख्य स्थलों पर जो हो रहा है, चल रहा है उसे गणतांत्रिक व्यवस्था के सशक्तिकरण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? यह व्यवस्था की नहीं वरन नीति-नियंताओं की, व्यवस्था बनाने वालों की, सत्ता-निर्धारकों की असफलता ही कही जाएगी कि आज़ादी के एक लम्बे अरसे के गुजार देने के बाद, गणतंत्र को स्वीकार कर देने के सात दशकों के बाद भी एक सामान्य नागरिक सही और गलत को परिभाषित कर पाने में अक्षम है. वह इसके लिए अभी भी अपने कथित अगुआ प्रतिनिधि का मुँह ताकता है. ऐसा क्यों? क्या कभी ये सवाल किसी ने खुद से किया है? क्या कभी कोई भी सवाल किसी ने नीति-निर्धारकों से, सत्ताधीशों से पूछने की हिम्मत जुटाई है?

ऐसा न हो पाने का ही दुष्परिणाम आज देश भुगत रहा है. चंद फिरकापरस्त ताकतें उस कानून की मुखालफत करने पर आमादा हैं, देश में आग लगवाने को आतुर हैं जो किसी भी दृष्टि से असंवैधानिक नहीं है. ये गणतांत्रिक असफलता ही है कि एक आम नागरिक अपना बुद्धि, विवेक, कौशल लगाने के बजाय किसी और के हाथ की कठपुतली बना हुआ है. सोचने की आवश्यकता है कि एक ऐसे कानून का विरोध, जिसका इस देश के नागरिकों की नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है, देश के उन सम्बंधित नागरिकों की किस मानसिकता का परिचय देता है. ये हास्यास्पद ही नहीं वरन विचारणीय स्थिति है कि एक तरफ हम खुद को विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश कहते हैं, खुद को विश्व गुरु की राह का अगुआ कहते हैं तब ऐसे बिंदु पर समाज को बंधक बनाने की कोशिश की जा रही है जो किसी भी तरह से असंवैधानिक नहीं है.

यही स्थिति है कि हम पर, हमारे देश पर, हमारी प्रक्रिया पर, लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, गणतांत्रिक स्थिति पर सवाल उठाये जाने लगते हैं. सवाल कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या महज एक दिन के लिए ही संवैधानिक महत्त्व है? क्या महज एक दिन ही गणतंत्र की स्वीकार्यता होती है? क्या बस इसी एक दिन के लिए गणतंत्र को, संविधान को आदर दिया जाता है? क्यों इस एक दिन की लोकतान्त्रिक शैली अपनाये जाने के बाद हम नागरिकों के व्यवहार में तानाशाही दिखाई देने लगती है? क्यों इसी एक दिन संविधान को सर्वोच्च मानने के बाद उसमें खामियां दिखाई देने लगती हैं? क्यों एक दिन के गणतंत्र के बाद फिर इसी गणतांत्रिक व्यवस्था को दोयम दर्जे का बताया जाने लगता है? जिन संवैधानिक मूल्यों की लगातार चर्चा होती है, जिन संवैधानिक अधिकारों की बात की जाती है, जिन संवैधानिक दायित्वों पर प्रकाश डाला जाता है वे क्यों यह दिन समाप्त होते ही पुरातन बातें हो जाती हैं?

आज जबकि विरोध का कारण एक व्यक्ति, एक दल, एक विचारधारा हो तब ये आवश्यक हो जाता है कि असलियत है क्या. अब ऐसे समय में जबकि कतिपय वोटबैंक के कारण, कतिपय तुष्टिकरण के कारण समाज को बरगलाया जाने लगा है, उसे हिंसात्मक, विध्वंसक गतिविधियों में लगाया जाने लगा है तब आवश्यक है कि देश की भावी पीढ़ी को लोकतंत्र का, गणतंत्र का, स्वाधीनता का उचित अर्थ और सन्दर्भ ज्ञात हो. गणतंत्र को अथवा संविधान को समझना इसलिए और भी आवश्यक हो गया है क्योंकि देश के एक-एक व्यक्ति अब राजनैतिक पूर्वाग्रहों से घिर गया है. उसकी अपनी सोच, मानसिकता पर किसी न किसी वाद का, किसी न किसी विचारधारा का कब्ज़ा सा समझ आने लगा है. ऐसा महसूस होता है जैसे सोचने-समझने की क्षमता को कहीं तिलांजलि देकर वह किसी न किसी विचारधारा की कठपुतली बना हुआ है. क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है के बारे में कोई विचार किये बिना वह स्वार्थपूर्ति में संलिप्त है. अपने मनोनुकूल विचारधारा को पोषित करने में लिप्त है.


यह स्थिति वर्तमान समाज के लिए खतरनाक बनी हुई है. ऐसे में व्यक्ति स्वेच्छा से सोच-विचार करने के बजाय अपनी पुष्ट विचारधारा के अनुसार संचालित होता है. उसी के अनुसार खुद को आगे बढ़ाता हुआ कार्य करता है. इस बिंदु पर आकर वह खुद को और अपनी विचारधारा को ही एकमात्र सत्य स्वीकारता हुआ शेष सभी को ख़ारिज करता जाता है. यह स्थिति जहाँ एक तरफ तानाशाही को जन्म देती है वहीं मानसिक विकृति भी पैदा करती है, जो समाज के लिए किसी भी कीमत पर सुखद नहीं है. ऐसा आज लगातार हो रहा है. खुद को, खुद की विचारधारा को स्थापित करने के लिए व्यक्ति किसी भी हद तक जाने को बेताब सा है. इसी बेताबी, तीव्रता ने व्यक्ति व्यक्ति के मध्य आपस में तनाव को जन्म दिया है. आपसी कटुता, वैमनष्यता को बढ़ावा दिया है. अपराध, हिंसा, दुराचार, अराजकता के मूल में यही वैमनष्यता है, यही विभेद है.

इस तरह की सोच दूसरों पर कब्ज़ा करने की भावना का विकास करती है. इस बारे में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से अध्ययन करते हुए बहुतायत लोगों को उनके विचारों, उनकी मानसिकता के अनुसार ही वातावरण का निर्माण करने की कोशिश की जा रही है. सामाजिकता को किनारे रखते हुए तथ्यों को, आँकड़ों को भी विचारधारा के अनुसार प्रदर्शित करने का कार्य किया जा रहा है. इसके लिए कभी धर्म को, मजहब को साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, कभी जाति को इसका आधार बनाया जाता है तो कभी क्षेत्र की भावना को उछालते हुए वैमनष्यता को बढ़ाया जाता है. ऐसा करने वाली ताकतें और उन ताकतों के हाथों में खेलते लोग भूल जाते हैं कि ऐसा कोई भी कदम उठाने की अनुमति न तो हमारा संविधान देता है और न ही ऐसा करना गणतांत्रिक दृष्टि से उचित है. इसके बाद भी समूचे समाज में ऐसा होते दिख रहा है. संसद द्वारा किये जा रहे संविधान संशोधनों को भले ही किसी वर्ग, क्षेत्र, राज्य आदि के हितार्थ किया जाता रहा हो मगर समाज में संविधान संशोधनों की अपनी ही परिभाषाएं निकाली जाती हैं. संविधान के अपने ही स्वरूप दिखाए जाते हैं. गणतंत्र को अपने हिसाब से परिभाषित किया जा रहा है.

समझने वाली बात है कि गणतंत्र या फिर आज़ादी महज एक दिन का समारोह नहीं, एक दिन का आयोजन मात्र नहीं. गणतंत्र हमारे देश के, हम नागरिकों के जीने का आधार है. यह महज एक दिन का वो कृत्य नहीं जो तिरंगे के फहराने के साथ शुरू किया जाता है और उसके शाम को ससम्मान उतारने के बाद समाप्त हो जाता है. किसी दिन विशेष के साथ-साथ प्रत्येक दिन सम्पूर्ण देश के लिए गणतंत्र दिवस होना चाहिए, स्वतंत्रता दिवस होना चाहिए. ऐसा न होने का ही परिणाम है कि यहाँ दूसरों के लोकतान्त्रिक मूल्यों का हनन किया जा रहा है. दूसरों की आज़ादी में जबरन दखलंदाजी की जा रही है. गणतंत्र दिवस या फिर स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने के पहले, अपने को तिरंगे या फिर भारत माता की जय के द्वारा देशभक्त बताने से पहले संविधान का, गणतंत्र का अर्थ समझना होगा. इनके मूल्यों को समझना होगा. इनके महत्त्व को समझना होगा. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता है तो ऐसे किसी भी दिन विशेष का आयोजन खुद के प्रचार-प्रसार का तरीका भर है और कुछ नहीं.

30 जनवरी 2019

एक दिन का आयोजन नहीं है गणतंत्र


गणतंत्र दिवस आते ही हर तरफ देशभक्ति का जूनून दिखाई देने लगा. समाज का एक-एक कोन देशभक्ति से ओतप्रोत समझ आने लगा. सोशल मीडिया पर लोगों की प्रोफाइल और विचार देशभक्ति का गुणगान करने लगे. नागरिक भी अपने घर, कार्यालय, वाहन आदि के साथ-साथ खुद को तिरंगे रँगे से सराबोर करने लगे. गणतंत्र की बातें, संविधान की रक्षा, उसके अनुपालन की बातें लोगों के मुँह से गली, मोहल्ले, चौराहे पर सुनाई दे रही थीं. उस एक दिन के गणतांत्रिक स्वरूप के बाद फिर सब वैसे का वैसा दिखाई देने लगा. सवाल उठे कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या महज एक दिन के लिए ही संवैधानिक महत्त्व है? क्या महज एक दिन ही गणतंत्र की स्वीकार्यता होती है? क्या बस इसी एक दिन के लिए गणतंत्र को, संविधान को आदर दिया जाता है? क्यों इस एक दिन की लोकतान्त्रिक शैली अपनाये जाने के बाद हम नागरिकों के व्यवहार में तानाशाही दिखाई देने लगती है? क्यों इसी एक दिन संविधान को सर्वोच्च मानने के बाद उसमें खामियां दिखाई देने लगती हैं? क्यों एक दिन के गणतंत्र के बाद फिर इसी गणतांत्रिक व्यवस्था को दोयम दर्जे का बताया जाने लगता है? जिन संवैधानिक मूल्यों की लगातार चर्चा होती है, जिन संवैधानिक अधिकारों की बात की जाती है, जिन संवैधानिक दायित्वों पर प्रकाश डाला जाता है वे क्यों यह दिन समाप्त होते ही पुरातन बातें हो जाती हैं?

आज गणतंत्र को अथवा संविधान को समझना इसलिए और भी आवश्यक हो गया है क्योंकि देश के एक-एक व्यक्ति अब राजनैतिक पूर्वाग्रहों से घिर गया है. उसकी अपनी सोच, मानसिकता पर किसी न किसी वाद का, किसी न किसी विचारधारा का कब्ज़ा सा समझ आने लगा है. ऐसा महसूस होता है जैसे सोचने-समझने की क्षमता को कहीं तिलांजलि देकर वह किसी न किसी विचारधारा की कठपुतली बना हुआ है. क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है के बारे में कोई विचार किये बिना वह स्वार्थपूर्ति में संलिप्त है. अपने मनोनुकूल विचारधारा को पोषित करने में लिप्त है.

यह स्थिति वर्तमान समाज के लिए खतरनाक बनी हुई है. ऐसे में व्यक्ति स्वेच्छा से सोच-विचार करने के बजाय अपनी पुष्ट विचारधारा के अनुसार संचालित होता है. उसी के अनुसार खुद को आगे बढ़ाता हुआ कार्य करता है. इस बिंदु पर आकर वह खुद को और अपनी विचारधारा को ही एकमात्र सत्य स्वीकारता हुआ शेष सभी को ख़ारिज करता जाता है. यह स्थिति जहाँ एक तरफ तानाशाही को जन्म देती है वहीं मानसिक विकृति भी पैदा करती है, जो समाज के लिए किसी भी कीमत पर सुखद नहीं है. ऐसा आज लगातार हो रहा है. खुद को, खुद की विचारधारा को स्थापित करने के लिए व्यक्ति किसी भी हद तक जाने को बेताब सा है. इसी बेताबी, तीव्रता ने व्यक्ति व्यक्ति के मध्य आपस में तनाव को जन्म दिया है. आपसी कटुता, वैमनष्यता को बढ़ावा दिया है. अपराध, हिंसा, दुराचार, अराजकता के मूल में यही वैमनष्यता है, यही विभेद है.

सिर्फ और सिर्फ अपनी स्थापना वाली मानसिकता कैसे गणतंत्र का, संविधान का सम्मान करेगी यह समझ से परे है. इस तरह की सोच दूसरों पर कब्ज़ा करने की भावना का विकास करती है. किसी समय संपत्ति पर कब्ज़ा ज़माने की नीयत अब अधिकारों पर, दिमाग पर, सोच पर कब्जा करने में परिवर्तित होती जा रही है. इस बारे में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से अध्ययन करते हुए बहुतायत लोगों को उनके विचारों, उनकी मानसिकता के अनुसार ही वातावरण का निर्माण करने की कोशिश की जा रही है. सामाजिकता को किनारे रखते हुए तथ्यों को, आँकड़ों को भी विचारधारा के अनुसार प्रदर्शित करने का कार्य किया जा रहा है. इसके लिए कभी धर्म को, मजहब को साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, कभी जाति को इसका आधार बनाया जाता है तो कभी क्षेत्र की भावना को उछालते हुए वैमनष्यता को बढ़ाया जाता है.

ऐसा करने वाली ताकतें और उन ताकतों के हाथों में खेलते लोग भूल जाते हैं कि ऐसा कोई भी कदम उठाने की अनुमति न तो हमारा संविधान देता है और न ही ऐसा करना गणतांत्रिक दृष्टि से उचित है. इसके बाद भी समूचे समाज में ऐसा होते दिख रहा है. संसद द्वारा किये जा रहे संविधान संशोधनों को भले ही किसी वर्ग, क्षेत्र, राज्य आदि के हितार्थ किया जाता रहा हो मगर समाज में संविधान संशोधनों की अपनी ही परिभाषाएं निकाली जाती हैं. संविधान के अपने ही स्वरूप दिखाए जाते हैं. गणतंत्र को अपने हिसाब से परिभाषित किया जा रहा है.

समझने वाली बात है कि गणतंत्र या फिर आज़ादी महज एक दिन का समारोह नहीं, एक दिन का आयोजन मात्र नहीं. गणतंत्र हमारे देश के, हम नागरिकों के जीने का आधार है. यह महज एक दिन का वो कृत्य नहीं जो तिरंगे के फहराने के साथ शुरू किया जाता है और उसके शाम को ससम्मान उतारने के बाद समाप्त हो जाता है. किसी दिन विशेष के साथ-साथ प्रत्येक दिन सम्पूर्ण देश के लिए गणतंत्र दिवस होना चाहिए, स्वतंत्रता दिवस होना चाहिए. ऐसा न होने का ही परिणाम है कि यहाँ दूसरों के लोकतान्त्रिक मूल्यों का हनन किया जा रहा है. दूसरों की आज़ादी में जबरन दखलंदाजी की जा रही है. गणतंत्र दिवस या फिर स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने के पहले, अपने को तिरंगे या फिर भारत माता की जय के द्वारा देशभक्त बताने से पहले संविधान का, गणतंत्र का अर्थ समझना होगा. इनके मूल्यों को समझना होगा. इनके महत्त्व को समझना होगा. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता है तो ऐसे किसी भी दिन विशेष का आयोजन खुद के प्रचार-प्रसार का तरीका भर है और कुछ नहीं. 

यदि संवैधानिक मूल्यों का अनुपालन, गणतांत्रिक व्यवस्था का उपयोग, स्वतंत्र जीवन की कार्यशैली को महज एक दिन का मानकर शेष सभी दिनों में उसे तिरोहित कर देंगे तो ऐसा करके हम सभी लोग अपने समाज का, अपने देश का ही अहित करेंगे. हम सबको समझना होगा कि गणतंत्र दिवस का उल्लास, उसके सहारे उमड़ती देशभक्ति का ज्वार महज एक दिन के लिए नहीं बल्कि जीवन-पर्यंत के लिए है.



उक्त आलेख दिनांक 30-01-2019 दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

27 जनवरी 2017

संवैधानिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने दें

आज हम सभी के लिए गौरव का दिन है. आज ही के दिन सन 1950 में हमारे संविधान को सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. इसके लागू होते ही हमारा देश लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ एक गणराज्य के रूप में भी जाना जाने लगा. ये अपने आपमें अद्भुत है कि हमारे देश में केन्द्रीय सत्ता की प्रभुता के साथ-साथ राज्यों की प्रभुता को भी बराबर से स्वीकारा गया है. संविधान निर्माताओं ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार दिए. नागरिकों को व्यापक अधिकार प्रदान किये. कर्तव्यों का निर्वहन, मौलिक अधिकारों की रक्षा आदि का सूत्रपात इसी संविधान के द्वारा होना आरम्भ हुआ. संविधान निर्माताओं ने अपने पास असीमित अधिकार होने के बाद भी केंद्र और राज्य के साथ-साथ सामान्य नागरिक को भी पर्याप्त अधिकार, पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान किये जाने की वकालत की थी. वे चाहते तो अधिकारों को सामाजिक रूप से लोकतान्त्रिक न बनाकर उसे भी वंशानुगत अथवा परिवार तक सीमित कर सकते थे. यकीनन उनका उद्देश्य देश के विकास में सभी की भूमिका, सभी नागरिकों की स्वतंत्र भागेदारी करना रहा होगा. इसी कारण से नागरिकों को स्वतंत्रता के साथ जीवन-यापन करने के पर्याप्त अधिकार संविधान निर्माताओं ने संविधान के माध्यम से उपलब्ध कराये हैं.

इधर देखने में आने लगा है कि वर्तमान समय में स्वतन्त्रता, संविधान के नाम पर बहुतेरे नागरिकों द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग होने लगा है. इसके पीछे बहुत से लोग समाज को दोष देना शुरू कर देते हैं. देखा जाये तो समाज समस्याओं से हमेशा से ग्रस्त रहा है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम खुद व्यवस्थाओं के सुचारू रूप से चलने में अपना कितना योगदान दे रहे हैं. गणतन्त्र दिवस के इस अवसर पर बजाय इस बात के कि किसने क्या किया, किसने क्या नहीं किया हम इस बात पर विचार करें कि हमने क्या किया? हम आज जितने अधिक साक्षर हुए हैं, जितने अधिक शक्तिशाली बने हैं उतने ही अधिक वर्ग हमारे आसपास दिख रहे हैं. आज सहज रूप में देखने में आता है कि कोई गाँधी वर्ग में खुद को खड़ा किये हैं, कोई नेहरू वर्ग में, कोई अम्बेडकर वर्ग में. इन वर्गों के द्वारा बजाय सामाजिक चेतना लाने के एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास किये जा रहे हैं. यही कारण है कि आज किसी के लिए हेडगेवार देश तोडने वाले हैं तो किसी को सरदार पटेल की देश भक्ति पर संदेह दिखता है. कोई सरदार भगत सिंह को अपने पाले में शामिल करने की फिराक में दिखता है तो कोई अशफाक को अपने ग्रुप का बताता है. ये स्थिति क्षणिक रूप में किसी को प्रचार भले ही दिला दे किन्तु देश के लिए घातक है. देशवासियों के अलग-अलग गुटों में बंटने का फायदा विरोधियों द्वारा, देश के दुश्मनों द्वारा उठाये जाने की आशंका नजर आती है.


ऐसी स्थिति में हम सभी को विचार करना होगा कि क्या ऐसी स्थिति में वाकई हम संविधान का सम्मान करने की दशा में दिखते हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें गणतन्त्र दिवस मनाने की अनुमति देतीं हैं? क्या इस तरह से हम अपनी आजादी दिलाने वाले शहीदों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित कर पाने के अधिकारी हैं? सवाल बहुत से हैं. उनको खोजने के लिए समूचे देश को एक होना पड़ेगा. सभी को वर्ग, जाति, धर्म के तमाम खांचों से बाहर निकल कर देशहित में काम करना होगा. इत्तेफाक से हमारा प्रदेश इस समय चुनावी दौर से गुजर रहा है. किसी भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सफल होने के पीछे उसके नागरिकों का, उसके मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान होता है. आइये हम सब मिलजुलकर सकारात्मक रूप से मतदान करने निकलें. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए, गणतंत्र को सशक्त बनाने के लिए, संविधान के प्रति आस्था को और गहरा करने के लिए स्वच्छ मतदान प्रक्रिया को अपनाएं. एकजुट होकर गणतन्त्र दिवस मनायें. देश को सशक्त बनायें. देशवासियों को सफल बनायें. 

07 मार्च 2016

लोकतान्त्रिक मूल्यों को खतरा



किसी भी देश के विकास हेतु वहाँ सशक्त लोकतान्त्रिक मूल्यों का, सक्रिय राजनैतिक माहौल का, जागरूक राजनीतिज्ञों का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है. इन तत्त्वों के बिना देश के, समाज के विकास की संकल्पना बेबुनियाद लगती है. देश की आज़ादी के बाद संविधान निर्माताओं ने, लोकतान्त्रिक मूल्यों को स्थापित करने वालों ने, देश के आम इंसान को भी राजनैतिक रूप से भागीदारी करने के उद्देश्य से ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया था जहाँ इंसान इंसान में भेद नहीं किया गया था. अधिकारों, दायित्वों, कर्तव्यों के लिए संवैधानिक रूप से यथोचित ध्यान तत्कालीन लोगों द्वारा दिया गया था. आज़ादी के तुरंत बाद संविधान निर्माण का कार्य, संवैधानिक व्यवस्था बनाये जाने का काम, देश में लोकतान्त्रिक मूल्यों, लोकतान्त्रिक ढाँचे को स्थापित करने का काम कुछ विशेष लोगों के कन्धों पर ही था और उन लोगों ने बिना किसी स्वार्थ के जनतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाया. ऐसे में सोचा जा सकता है कि तत्कालीन लोगों के मन-मष्तिष्क में देशहित की, जनहित की भावना किस गहराई से स्थापित होगी कि बिना किसी स्वार्थलिप्सा के उन्होंने अधिकारों का वितरण देश के नागरिकों के बीच कर दिया. राष्ट्रीय स्तर पर हो अथवा प्रादेशिक स्तर पर, उनके द्वारा सदन की व्यवस्था इस तरह से की गई, जिसमें साधारण से साधारण इंसान को भी राजनैतिक सहभागिता करने का अवसर प्राप्त हो सके. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक माना जाता है कि किसी भी देश के सभी नागरिक राजनैतिक रूप से अपनी सक्रियता प्रदर्शित करें. 

इसी सकारात्मक मानसिकता के चलते ही संवैधानिक मूल्यों के निर्माताओं ने बिना किसी भेदभाव के तृणमूल स्तर तक के व्यक्ति तक को राजनैतिक अधिकार दे रखे थे. किसी भी व्यक्ति को धर्म, जाति, आर्थिक, शैक्षिक, क्षेत्र, लिंग आदि के आधार पर निर्वाचन प्रक्रिया से अलग नहीं रखा गया था. सर्वाधिक शिक्षित को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार दिया गया तो निरक्षर को भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के सशक्त बनाने में सहायक बनाया गया; सर्वाधिक अमीर व्यक्ति को भी जहाँ राजनैतिक रूप से भागीदारी करने का अवसर दिया गया वहीं नितांत गरीब को भी इस प्रक्रिया से अलग नहीं किया गया. संवैधानिक मूल्यों, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के रचनाकारों, निर्माताओं की इस निस्वार्थ सोच का सुखद परिणाम रहा कि एक-एक व्यक्ति को देश में लोकतान्त्रिक ढाँचे का अंग माना-समझा गया. ये सोचकर अपने आप ही उन विभूतियों की मानसिकता पर गर्व होता है कि निस्वार्थ भाव से वे समस्त अधिकारों, दायित्वों, कर्तव्यों का वितरण आम आदमी के बीच करते गए. वे चाहते तो देश के प्रमुख संवैधानिक पदों के लिए पारिवारिक व्यवस्था का निर्माण कर सकते थे. वे चाहते तो विरासतन व्यवस्था के द्वारा संवैधानिक पदों को आजीवन अपने नियंत्रण में कर सकते थे. वे चाह लेते तो लोकतान्त्रिक प्रकिया को अपने ढंग से संचालित करने का कोई सूत्र निर्माण कर लेते. सर्वाधिकार सुरक्षित होने के बाद भी, स्वतंत्र तरीके से संविधान निर्माण के बाद भी तत्कालीन लोगों ने अपने अथवा अपने परिवार के लिए किसी विशेष लाभ की सुविधा नहीं ली, ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण नहीं किया. 

समय परिवर्तित होता रहा. संवैधानिक मूल्यों में भले ही परिवर्तन न हुआ हो किन्तु लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलने लगे. निर्वाचन से लेकर सरकार गठन तक की प्रक्रिया में परिवारवाद, स्वार्थ, निजी हित दिखाई देने लगे. संविधान की मूल आत्मा के साथ खिलवाड़ करते हुए धनबल, बाहुबल से आम नागरिक को समूची प्रक्रिया से दूर किया जाने लगा. बेतहाशा बढ़ते धन ने, निरंकुश तरीके से सामने आते बहुबल ने साम, दाम, दंड, भेद जैसी स्थितियों में दाम और दंड जैसी व्यवस्था को सहज स्वीकार्य बना दिया. स्वस्थ प्रतियोगिता के स्थान पर हिंसक राजनीति ने अपना विकराल रूप प्रदर्शित किया. सत्ता स्वार्थ में न केवल संविधान को, संवैधानिक मूल्यों को, लोकतान्त्रिक ढाँचे को ही विखंडित करने का कार्य नहीं किया गया बल्कि राष्ट्र की बर्बादी करने वालों को आदर्श बनाया जाने लगा. किसी समय में हाशिये पर खड़े व्यक्ति को लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की मुख्य धारा में शामिल किये जाने की सोच के साथ लागू आरक्षण व्यवस्था को अपना अधिकार समझा जाने लगा. इस कथित अधिकार की प्राप्ति हेतु राष्ट्रीय संपत्ति, सार्वजनिक संपत्ति, निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाने लगा. सामाजिक दृष्टि से, नागरिक हितार्थ दृष्टि से, देशहित में विचारणीय स्थिति है. सत्तालोलुप होने के चलते अब राजनैतिक गठबंधन ही नहीं हो रहे वरन राजनैतिक हत्याएँ तक की जाने लगी हैं तो समझा जा सकता है कि देश का भावी लोकतंत्र किस तरह कमजोर हो रहा है. जब देश में आतंकियों को आदर्श माना जाने लगा हो, उनके समर्थन में संगठित रूप से खड़ा होने लगा जाये, देशहितों को ताक पर रखते हुए विदेशी ताकतों के साथ आवाज़ मिलानी शुरू कर दी जाये तो समझा जा सकता है कि लोकतंत्र खतरे में है.
 

26 मई 2014

आमंत्रण की औपचारिकता कार्यवाही की औपचारिकता न बने




जिस दिन से नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में हुई थी, उसी दिन से उन्हें आलोचनाओं का निशाना बनाया जा रहा है. अनावश्यक विरोध के केंद्र में रहे उनके अनेक कार्यों की तरह ही उनके शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित अतिथियों पर भी विवाद आरम्भ हो गया. इसमें भी मुख्य रूप से विवाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को आमंत्रण भेजे जाने पर उठा. प्रथम दृष्टया इस खबर को सुनकर बुरा सा महसूस होता है. आखिर उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाने की क्या आवश्यकता थी जिसने कदम-कदम पर देश के साथ छल किया है; हमारे जवानों को मौत के घात उतारा है; उनके सिरों को काट कर ले जाने के बाद उनका अपमान किया है; हमारे देश के बंदियों के साथ वहशियाना हरकतें की हैं. इस आमंत्रण पर याद आता है अटल बिहारी वाजपेयी जी का पाकिस्तान में बस ले जाना और पाकिस्तान द्वारा पीठ पीछे कारगिल घुसपैठ को अंजाम देना.
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यहाँ बुरा लगना इस कारण से भी महसूस किया जा रहा है क्योंकि माना जा रहा था कि भाजपा सत्ता में आते ही आतंकवाद पर, पाकिस्तानी जेलों में बंद भारतीयों पर, कश्मीर पर पाकिस्तान से दो टूक बात करेगी. ऐसा नहीं हुआ और उसने अपने पहले औपचारिक समारोह में ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर डाला. इस फैसले की कूटनीतिज्ञ दृष्टि से देखने की आवश्यकता है. यहाँ पहली बात ये जानने की है कि शपथ ग्रहण समारोह में सिर्फ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को ही आमंत्रित नहीं किया गया है. इसमें सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया है, जिसमें भारत, पाकिस्तान के साथ-साथ नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी शामिल हैं. राजनैतिक दृष्टि से दक्षिण एशियाई क्षेत्र का अपना ही महत्त्व है और इसमें भी एकमात्र भारत है जो नेतृत्व करने की क्षमता रखता है, नेतृत्व करने की स्थिति में है भी. सामरिक दृष्टि से भी इस क्षेत्र के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है. हिन्द महासागर क्षेत्र में वैश्विक महाशक्तियां लगातार कब्ज़ा करने की कोशिश में लगी रहती हैं. ऐसे में इस क्षेत्र में भारत के द्वारा शक्ति संतुलन की स्थिति बनाये रखने का प्रयास लगातार बना रहता है.
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इस आमंत्रण के द्वारा भाजपा ने अपने पड़ोसी देशों के साथ अपनी तरफ से कटुता समाप्त करने की पहल को दर्शाया है तो नई सरकार के रूप में पाकिस्तान के साथ नई स्थिति बनाने की पहल की है. इस पहल का असर तुरंत होते भी देखा गया है. पाकिस्तान और श्रीलंका ने अपनी जेलों में बंद भारतीय मछुआरों को बिना शर्त रिहा कर दिया है. शपथ ग्रहण के बहाने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को एकसाथ आमंत्रण से उनकी एकजुटता का परिचय वैश्विक समाज ने देखा है साथ ही इन देशों को भी सीधा सा सन्देश देने सम्बन्धी कार्य किया गया है जिससे भविष्य में ये भी भारत विरोधी कृत्यों को रोकने, न करने की मानसिकता बना सकें क्योंकि इधर हाल के वर्षों में तत्कालीन केंद्र सरकार की सुस्ती, चुप्पी, निष्क्रियता से इन देशों के द्वारा भी भारत विरोधी बयानबाजी लगातार की जाती रही है.
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इस निर्णय को अभी अंतिम नहीं स्वीकारना चाहिए क्योंकि अब सरकार अपने कार्यों को आरम्भ करेगी. यदि हर बार की तरह पाकिस्तान की ओर से पीठ में छुरा भोंकने का काम किया जाता है, सीमापार से आतंकी घटनाओं को जारी रखा जाता है, भारतीय सुरक्षा, आज़ादी, अस्मिता से खिलवाड़ किया जाता है, भारतीय बंदियों की रिहाई हेतु सार्थक कदम नहीं उठाये जाते हैं, हिन्द महासागर क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाला जाता है तब पूरा देश वर्तमान निर्वाचित सरकार से किसी ठोस कदम की अपेक्षा रखेगी. यदि तब भी कूटनीति, विदेशनीति जैसे जुमलों का प्रयोग किया गया, तब भी शांतिवार्ता का राग अलापा गया तो ये वर्तमान सरकार की घनघोर नाकामी और जनता के प्रति किया गया विश्वासघात होगा. अभी नरेन्द्र मोदी को, नवगठित सरकार को कार्य करने देने का अवसर दिया जाये, जो कूटनीतिज्ञ पहल की गई है उसके परिणाम का इंतज़ार किया जाए. सरकार की ओर से भी इस बात के प्रयास किये जाएँ कि ये कूटनीति सार्थक सफलता प्राप्त करे न कि क्रिकेट, संगीत, महफ़िलों, वार्ताओं, यात्राओं में ही सिमटकर रह जाए.
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11 मई 2014

मोदी-विरोध का राग, विरोधियों की खिसियाहट




अभी तक नरेन्द्र मोदी के वे धुर विरोधी जो मोदी लहर नामक किसी भी अवधारणा को नकारने में लगे थे, वे भी आज गुपचुप रूप से इसे स्वीकारने लगे हैं. लहर का कथित तौर पर बनाया जाना और जनसामान्य का स्वतः ही लहर बनकर उभरना दो अलग-अलग बातें हैं. लहर के बनने-बिगड़ने के सन्दर्भ में यहाँ अन्ना आन्दोलन तक जाना होगा, जहाँ जनता ने स्वतः स्फूर्त रूप से समूचे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी थी. संभव हो कि उस आन्दोलन के पीछे भीड़ जुटाने के लिए एक प्रकार का प्रबंधन कार्य कर रहा हो किन्तु इसके बाद भी अधिसंख्यक जनता स्वतः ही आंदोलित हुई थी. आज कुछ ऐसी स्थिति मोदी लहर के नाम पर दिखती है. अनेक आरोपों, जांचों के बीच नरेन्द्र मोदी ने खुद कि सफल मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित किया है. गुजरात का विकास, जितना भी..जैसा भी, उनकी सोच का परिणाम है. इसको योजना आयोग द्वारा भी कई बार प्रमाणित किया जाता रहा है साथ ही बेहतर राज्य के लिए भी, श्रेष्ठ मुख्यमंत्री के लिए भी उनको सम्मानित किया जा चुका है, ऐसे में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लोकतंत्र की हत्या किस तरह होगी, समझ नहीं आता. मोदी के सत्ता में आने के बाद राष्ट्रहित किस तरह तिरोहित कर दिए जायेंगे समझ से परे है. स्थितियाँ कैसे और बदतर हो जाएँगी, ये समझ पाना मुश्किल हो रहा है.
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लोकतान्त्रिक व्यवस्था में निर्वाचन पश्चात् ही व्यक्ति विधायक, सांसद आदि बनता है. नरेन्द्र मोदी खुद भी तीन बार चुनाव जीतकर अपने को साबित कर चुके हैं. जिस गुजरात विकास को उनके विरोधी झूठ बताते प्रचारित करते हैं, उसी राज्य की जनता ने उन्हें बार-बार चुनने का काम किया है. वर्तमान दौर में ये कहना नितांत दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि मोदी समर्थक बलात मतदान अपने पक्ष में करवा लेते हैं. यदि ऐसा होता तो गुजरात में विरोधी दल किस तरह और कहाँ से जीत कर आते हैं. उनके विरोधियों द्वारा मोदी के नाम पर बार-बार गुजरात दंगों की कालिख लगाकर देश को गुमराह करने का काम बखूबी किया जा रहा है किन्तु अनेक जाँच आयोगों, समितियों द्वारा भी मोदी को दोषी साबित नहीं किया जा सका है. ये क्या दर्शाता है, कि या तो मोदी वाकई निर्दोष हैं अथवा वे इतने शक्तिशाली बन चुके हैं कि देश की किसी भी जाँच एजेंसी को डरा-धमका कर अपने पक्ष में जाँच मोड़ दे रहे हैं. इसी के आलोक में उनको विरोधी, जो सिर्फ गुजरात दंगों का राग आलापते रहते हैं, बताएं कि २००२ के बाद से गुजरात कब और कितनी बार दंगों का शिकार हुआ?
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किसी व्यक्ति के बार-बार निर्दोष सिद्ध होने के बाद भी उसे कटघरे में खड़ा करना, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से बारम्बार निर्वाचित होने वाले व्यक्ति के सत्तासीन होने से देश को खतरा बताना, एक दशक से ज्यादा समय से बेहतर राज्य सरकार सञ्चालन करने वाले मुख्यमंत्री को मानवता के लिए खतरा बताया जाना कहीं न कहीं विरोधियों की खिसियाहट ही है. केंद्र सरकार के विगत दस वर्षों के कार्यों, कारनामों के पश्चात् आम जनता परिवर्तन चाहती है और उसे परिवर्तनकारी माध्यम नरेन्द्र मोदी के रूप में मिल गया है.

11 मार्च 2014

बाबा के लिए जनभावनाओं को नजरंदाज़ न किया जाये




विगत कुछ समय से बाबा रामदेव योग की शिक्षा देने से ज्यादा राजनीति की पाठशाला लगाने में ज्यादा व्यस्त दिखने लगे हैं. इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है क्योंकि राजनीति करना किसी वर्ग विशेष, व्यक्ति विशेष, दल विशेष की थाती नहीं है. योग के चलते बाबा रामदेव ने अपनी प्रतिष्ठा, अपना सम्मान, अपनी सक्रियता सम्पूर्ण देश में कायम कर ली. अपने लाखों-लाख अनुनायियों, योग-प्रेमियों, योग-लाभान्वितों के चलते उनके भीतर भी नेतृत्व करने की आकांक्षा प्रबलता से हिल्लोरें मारने लगी. इसी कड़ी में उनके द्वारा अनेक आन्दोलन भी आरम्भ किये गए जिनमें स्वदेशी का प्रचार-प्रसार, काले-धन की वापसी के प्रस्ताव, भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम प्रमुखता से गिनी जा सकती है. इन्हीं आन्दोलनों के बीच बाबा रामदेव ने राजनैतिक सक्रियता दिखानी आरम्भ कर दी. उनके राजनैतिक कदम को बहुत से लोगों ने नकारने की बात कही तो बहुत से लोगों ने इसकी सराहना की. बात चली तो दूर तलक जायेगी की तर्ज़ पर बाबा रामदेव ने लोकसभा चुनावों में भाजपा-मोदी के पक्ष में खुलकर अपना समर्थन व्यक्त किया.
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आन्दोलनों की सफलता, मुद्दों की गंभीरता और जनहितकारी होना, समर्थकों की संख्या का दिनों-दिन बढ़ना केंद्र सरकार के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा था, सो एक रात बाबा और उनके आन्दोलनकारियों पर कहर टूटा किन्तु बाबा का विश्वास न टूटने पाया. उनकी राजनैतिक सक्रियता और भी तेजी से बढ़ने लगी. इसी सक्रियता में बाबा अचानक भाजपा में खलल-बैचेनी-परेशानी पैदा करने वाले तत्त्व के रूप में सामने आने लगे. भाजपा को समर्थन, मोदी को समर्थन के नाम पर वे लोकसभा में अपने लिए कुछ सीटों की मांग करने लगे. ये ठीक उसी तरह की स्थिति कही जा सकती है जैसे कोई एक राजनैतिक दल, क्षेत्रीय दल अपनी शक्ति, अपने समर्थकों, अपने वोट-बैंक को भुनाने के लिए बाहरी समर्थन, गठबंधन सरीखी बात कर रहा हो. बाबा रामदेव और भाजपा की आपसी सहमति पर सात लोकसभा सीटों पर बाबा के पसंदीदा व्यक्ति या कहें कि उनके समर्थक चुनाव मैदान में उतरेंगे. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि क्या बाबा नए राजनैतिक दल के रूप में अपना पदार्पण कर रहे हैं? क्या बाबा खुद को एक दबाव समूह के रूप में सिद्ध करना चाहते हैं? माना कि बाबा-समर्थित सातों व्यक्ति लोकसभा चुनाव जीत जाते हैं तो बाबा खुद को किस रूप में स्थापित करेंगे? बाबा जिन व्यक्तियों को चुनावी मैदान में उतारेंगे क्या उनको स्थानीय जन-समर्थन प्राप्त है?
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ये दो-चार प्रश्न नहीं हैं बल्कि वो स्थितियाँ हैं जो कहीं न कहीं भाजपा-मोदी के लिए संकट ही उत्पन्न करती दिखती हैं. यहाँ बाबा और उनके थिंक टैंक (यदि कोई है) को समझना चाहिए कि बाबा रामदेव की जो विचारधारा है वो समूचे राजनैतिक दलों में से सिर्फ भाजपा से ही मेल खाती है. और फिर बाबा के विरोध में, उनके योग-शिविरों के विरोध में, उनके आन्दोलनों के विरोध में भाजपा कभी नहीं रही. ऐसे में बाबा को चाहिए था कि सम्पूर्ण देश में भाजपा का, मोदी का, भाजपा के प्रत्याशियों का प्रचार करना चाहिए था. चुनाव होने तक योग-शिविरों के बजाय विशुद्ध राजनैतिक कार्यक्रमों का सञ्चालन करके भाजपा के लिए समर्थन जुटाना चाहिए था. महज सात सीटों के द्वारा बाबा अपनी किस हनक को दिखाना चाहते हैं, ये तो वे, उनका थिंक टैंक या फिर भाजपा आलाकमान ही बता सकेगी. भले ही बाबा कि मंशा भाजपा को, उसके प्रत्याशियों को नुकसान पहुँचाने की नहीं हो किन्तु स्थानीय जनभावनाओं को नजरंदाज़ करके बाबा-समर्थित प्रत्याशियों को उतारना भाजपा के लिए भितरघात का कारण बन सकता है.