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27 जून 2026

भाजपा का कमजोर पक्ष

भाजपा के संदर्भ में हम एक बात बहुत शुरुआती दौर से कहते आए हैं कि इनके पास ऐसी टीम का घनघोर अभाव है जो भाजपा के ख़िलाफ़ फैलाई जाने वाली अफ़वाहों, इसके विरुद्ध सेट किए जाने वाले नैरेटिव आदि को समाप्त कर सकें. उनके बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकें. ऐसा एक-बार नहीं कई बार हुआ और हर बार भाजपा को बैकफुट पर आते देखा गया. ऐसा ही एक षड्यंत्र विरोधियों द्वारा फिर रचा गया, फिर एक अफवाह फैलाई गई श्रीराम मंदिर में चढ़ावा-दान की चोरी को लेकर. दान की चोरी को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई और चढ़ावा चोरी के सम्बन्ध में आरोपितों को जेल. बावजूद इसके विरोधियों द्वारा अपना षड्यंत्र चालू है.

 

ये ध्यान रखना होगा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ने इसके विरोधियों की प्रतिष्ठा पर चोट की है; मुस्लिम आक्रांताओं के उस अहं को धूल चटाई है जिसके दम पर वे हिन्दू आस्थाओं पर कब्जा किए रहे. इन लोगों को फूटी आँख नहीं सुहा रहा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर वैश्विक स्तर पर न केवल आस्था का बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का केन्द्र बन गया. चढ़ावा की चोरी निश्चित रूप से मानवीय स्वभाव-जनित सोच के रूप में सामने आई है साथ ही इसमें विरोधी साजिश की भी आशंका है. जाँच चले, पूरी गम्भीरता से चले और बड़े से बड़ा दोषी भी न छूटे. इसके साथ ही विरोधियों की अफवाहों से, षड्यंत्र से बचने की आवश्यकता है.

 

मंदिर को गिराकर बने ढाँचे को मिटाकर मंदिर तो पुनः बना लिया गया है किंतु आस्था-प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने पर उसे बनाया जाना मुश्किल है.


05 मई 2026

जनादेश, व्यक्तिगत अहंकार और संविधान

भारतीय संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनादेश को मान्यता देती है तो जनप्रतिनिधियों से भी आदर्श स्थापन की अपेक्षा करती है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल विधानसभा चुनाव हार चुका है और भाजपा बड़े दल के रूप में सामने आई है. चुनाव परिणामों की इस स्थिति में सामान्य कदम सत्ताधारी दल के मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा देना होता है किन्तु पश्चिम बंगाल में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ संविधान से भी मजाक करने जैसा है. सामान्य रूप में इसे भले ही एक राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा हो किन्तु ऐसा नहीं है. भारतीय संविधान ऐसी स्थितियों में भी सशक्त प्रावधानों के साथ जनादेश के विरुद्ध सत्ता हथियाने के कुत्सित इरादों को रोकता है.

 

सबसे पहले यहाँ संविधान के अनुच्छेद 172(1) की उस शक्ति को समझना होगा, जिसके अनुसार राज्य की विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष के लिए होता है. इस पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् सम्बंधित विधानसभा का विघटन हो जाता है. यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है. ऐसे में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही इस्तीफ़ा न देने की जिद पर अड़ी हों मगर उनको ये समझना होगा कि वर्तमान विधानसभा के संवैधानिक रूप से अस्तित्वहीन हो जाने पर उनका अस्तित्व क्या होगा? विधानसभा के अस्तित्व में न रहने की स्थिति में उसके आधार पर नियुक्त मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद का कानूनी एवं संवैधानिक आधार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. सदन के अस्तित्व में न रहने पर किसी व्यक्ति का अपने पद का बने रहना संवैधानिक रूप से असंभव है.

 


इस संवैधानिक अनुच्छेद के होने के साथ-साथ विवाद की ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका प्रमुख हो जाती है. अनुच्छेद 164(1) के अन्तर्गत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री भी राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर कार्य करता है. सामान्य स्थितियों में मुख्यमंत्री का अपने पद पर बने रहना सदन में उसके प्रति बहुमत से निर्धारित होता है किन्तु चुनाव जैसी स्थितियों में इसका निर्धारण जनादेश के माध्यम से होता है. पश्चिम बंगाल में स्पष्ट है कि वर्तमान सत्ताधारी दल पराजित हो चुका है, ऐसे में वहाँ राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ सक्रिय हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने भी एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ तथा इसके बाद के अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए लेकिन जब नई विधानसभा के चुनाव संपन्न हो चुके हों तो नया जनादेश पिछले किसी भी बहुमत पर भारी पड़ता है. सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 11 मार्च 1994 को यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. यद्यपि इस मामले का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोकना और सदन के पटल पर बहुमत परीक्षण को अनिवार्य बनाना था तथापि इसी निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनादेश ही सरकार की वैधता का अंतिम स्रोत है. जैसे ही नई विधानसभा के चुनाव होते हैं, पुरानी विधानसभा और उसके विश्वास का आधार समाप्त हो जाता है. स्पष्ट है कि ममता बनर्जी वर्तमान में अपने मुख्यमंत्रित्व के अस्तित्व में नहीं हैं. वैसे भी संवैधानिक रूप से चुनाव परिणामों के पश्चात निवर्तमान मुख्यमंत्री का इस्तीफा अनिवार्य कदम नहीं बल्कि यह एक लोकतांत्रिक शिष्टाचार और परम्परा है. इसके उल्लंघन होने पर राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री को पदमुक्त करने का, बर्खास्त करने का आदेश भी जारी कर सकते हैं. ऐसा कदम पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ममता बनर्जी के सन्दर्भ में भी उठा सकते हैं क्योंकि ममता बनर्जी के पास अब न तो जनादेश है और न ही सदन का अस्तित्व.

 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के अन्तर्गत चुनाव आयोग नई विधानसभा के गठन के लिए विधिवत गठित अधिसूचना जारी करता है. अधिसूचना के जारी होते ही नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाती है. अब चूँकि पश्चिम बंगाल में इसी 07 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और अगले दिन राज्य में वैध सरकार न होने की स्थिति में राज्यपाल ऐसा कदम उठाने के लिए स्वतन्त्र हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने नई विधानसभा के गठन हेतु आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. यह अधिसूचना राज्यपाल को सौंपी जा चुकी है जिसके पश्चात नई सरकार के गठन तथा शपथ ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ममता बनर्जी भले ही पद न छोड़ रही हों किन्तु अब राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वे चुनाव आयोग की अधिसूचना प्राप्त हो जाने के बाद भाजपा के विधायक दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. राज्यपाल अनुच्छेद 163 और 164 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए विजयी दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण लेते ही पूर्व मुख्यमंत्री का दावा कानूनी रूप से शून्य हो जाएगा. प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी राज्यपाल द्वारा नई सरकार के गठन का आदेश देते ही राज्य की सम्पूर्ण नौकरशाही नए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हो जाती है. निवर्तमान मुख्यमंत्री का कोई भी आदेश अवैध माना जाएगा. स्पष्ट है कि राज्यपाल का आदेश स्वतः ही ममता बनर्जी की जिद को अस्तित्वहीन कर देगी.

 

भारतीय लोकतंत्र में जनादेश सर्वोच्च है. यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो भी वे केवल एक कब्जेधारी की स्थिति में होंगी न कि संवैधानिक शासक की. संविधान ने राज्यपाल को अनेक विवेकाधीन अधिकार दिए हैं जिनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी व्यक्तिगत अड़ियल रुख को दूर किया जा सके. विधानसभा का पाँच वर्ष पूरा होना ममता बनर्जी के अड़ियलपन के ताबूत में अंतिम संवैधानिक कील होगा. इसके बाद भाजपा का सरकार बनाना न केवल राजनीतिक वास्तविकता होगी बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कदम भी.


16 नवंबर 2025

अराजकता पैदा करने का मंसूबा?

‘देश के युवा, देश के छात्र, देश के जेन-जी संविधान को बचाएँगे. लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी को रोकेंगे. मैं उनके साथ हमेशा खड़ा हूँ. जय हिन्द.’ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर ये विचार पोस्ट करने वाला व्यक्ति कोई आम नागरिक नहीं बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी हैं. 18 सितम्बर 2025 को पोस्ट इस विचार का उत्प्रेरक नेपाल की अराजकता के लिए जिम्मेदार जेन-जी पीढ़ी को माना जा रहा है. इस पोस्ट के माध्यम से उन्होंने न केवल देश के युवाओं को उकसाने का काम किया बल्कि वोट चोरी जैसे मुद्दे के द्वारा संवैधानिक संस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम किया है.

 

ईवीएम का मुद्दा हो या अब वोट चोरी का, इनके द्वारा राहुल गांधी किसी तरह की सुधारवादी व्यवस्था का सहयोग नहीं करते बल्कि निर्वाचन आयोग पर सवालिया निशान लगाते हैं. भाजपा की जीत पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने, उसे हैक कर लेने का आरोप लगा देना तथा विपक्षी दलों की जीत को लोकतंत्र की जीत बताने लगना आम बात हो गई है. ईवीएम से छेड़छाड़ किये जाने के आरोप भाजपा पर लगातार लगाते रहने के बाद भी विपक्षी दलों द्वारा उसे सही सिद्ध न कर पाने से मतदाताओं ने इसके पीछे की मंशा को भली-भांति समझ लिया. ये सहज रूप में समझ में आता है कि विपक्षी दलों द्वारा अपनी हार का ठीकरा ईवीएम और निर्वाचन आयोग के ऊपर फोड़कर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करना रहा है. कुछ इसी तरह का काम अब राहुल गांधी करते नजर आ रहे हैं वोट चोरी के नाम पर.

 



बिहार में पहले चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस के द्वारा हरियाणा में वोट चोरी होने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि पिछले साल हरियाणा के विधानसभा चुनाव में 25 लाख फर्जी वोटों का इस्तेमाल किया गया जो कुल वोटों का लगभग 12.5 प्रतिशत है. निर्वाचन आयोग और भाजपा पर मिलीभगत का आरोप लगाने वाले राहुल का मानना है कि इसके चलते कांग्रेस हार गई. वोट चोरी के सन्दर्भ में उनके द्वारा एक महिला, जो ब्राजील की मॉडल निकली, की अनेकानेक फोटो के माध्यम से अपने आरोपों को सही साबित करने का भी प्रयास किया गया. यहाँ एक बात समझ से परे है कि यदि राहुल गांधी को लगता है कि भाजपा और निर्वाचन आयोग की मिलीभगत से वाकई वोट चोरी जैसा कदम उठाया जाता है तो इसके समाधान के लिए वे अदालत की मदद क्यों नहीं ले रहे? उनको कम से कम इसका भान तो होना ही चाहिए कि इसी देश में 12 जून 1975 को एक ऐतिहासिक फैसले में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने उनकी दादी इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी पाया था. जिसके चलते न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित करते हुए उन्हें छह साल तक अन्य दूसरा कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया था. इस निर्णय के पश्चात् लागू आपातकाल 1977 में समाप्त होने पर चुनाव सम्पन्न हुए. इन चुनावों में मतदाताओं ने तानाशाही, चुनावी धाँधली के विरोध में न केवल कांग्रेस को बल्कि रायबरेली से इंदिरा गांधी को भी हराया. आज संभवतः अराजकता फ़ैलाने की मंशा रखने के कारण राहुल गांधी मतदाताओं की, न्यायालय की असल ताकत को स्वीकारना नहीं चाह रहे हैं.

 

दरअसल राहुल गांधी को वोट चोरी, निर्वाचन आयोग की मिलीभगत को लेकर न्यायालय जाने से ज्यादा आसान लगता है आरोप लगाना. इसमें न किसी तरह के सबूतों को न्यायालय में प्रस्तुत करना है और न ही किसी तरह के तथ्यों की पुष्टि करना है. विगत वर्षों में अनेक मामलों में न्यायालय की तरफ से उनको समझाए जाने के, सजा सुनाये जाने के दृष्टान्त भी सबके सामने हैं मगर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने इनसे कोई सीख नहीं लेने का मन बना रखा है. इसके अलावा लगता है जैसे राहुल गांधी भारत में उसके पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि की तरह का अराजक माहौल देखने का मंसूबा रखते हैं. यही कारण है कि वे कभी यहाँ की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, संवैधानिक संस्थाओं पर, संविधान पर आरोप लगाते हैं तो कभी इंडियन स्टेट के नाम पर, सेना के नाम पर, आतंकियों के नाम पर, वोट चोरी के आरोपों द्वारा, जेन-जी पीढ़ी की क्रांति के रूप में अनर्गल बयानबाजी करते नजर आते हैं.

 

बिहार चुनावों के परिणामों ने साबित किया है कि यहाँ के मतदाताओं ने न केवल विशेष गहन पुनरीक्षण को अपनी स्वीकार्यता प्रदान की है बल्कि राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोपों की भी हवा निकाल दी है. ईवीएम सम्बन्धी गड़बड़ियों में मुँह की खाने के बाद, अनेक चुनावों में लगातार हारने के बाद अब बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण और वोट चोरी आरोपों के नकारे जाने के बाद राहुल गांधी को स्वयं का विश्लेषण करने की आवश्यकता है. उनको अपने उन मार्गदर्शकों का आकलन करने की आवश्यकता है जो निरर्थक मुद्दों के द्वारा उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने को हवा देते रहने के साथ-साथ देश को अराजकता की तरफ ले जाना चाहते हैं. उनको ऐसे बयानवीरों से दूर रहने की आवश्यकता है जो उनके कपोल-कल्पित बयानों को नाइट्रोजन बम, हाइड्रोजन बम साबित करने की कोशिश में राहुल गांधी को ही मजाकिया पात्र बना दे रहे हैं.

 

ये बात न केवल राहुल गांधी को ही बल्कि कांग्रेस पार्टी को भी समझनी होगी कि वे वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और उनके तमाम अनर्गल बयान न केवल उनकी छवि को धूमिल करते हैं बल्कि देश की राजनीति को भी विवादास्पद बनाने के साथ-साथ देश की संवैधानिक संस्थाओं को संशय के घेरे में खड़ा करते हैं. ऐसी राजनीति भले ही उनके सन्दर्भ में उचित हो मगर देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, संवैधानिक संस्थाओं के लिए कतई उचित नहीं है.


10 अक्टूबर 2025

कार्यकर्त्ता भी खुद को सबल बनाएँ

ध्यान रखना, ये नेरेटिव भाजपा के खिलाफ नहीं बल्कि मोदी-योगी के विरोध में तैयार किया जा रहा है.
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योगी जी की उरई में हुई जनसभा के बाद दो-चार फोटो को केन्द्र में रखते हुए अनेक पोस्ट लिखी जा रही हैं. कुछेक को छोड़कर बाकी पोस्ट में पूर्व पदाधिकारियों की उपेक्षा की बात कही जा रही है.

यहाँ एक बात सबसे पहले भाजपा के ही पूर्व एवं वर्तमान पदाधिकारियों को, साथ ही भाजपा के आनुसंगिक संगठनों के पूर्व एवं वर्तमान पदाधिकारियों को याद रखनी चाहिए चाहिए कि इस जनसभा की स्वीकृति आने वाले दिन से ही इसे जिला प्रशासन का कार्यक्रम बताया जा रहा था. ऐसे में यह भी याद रखना होगा कि प्रशासन और सरकार एक तरह से एक सिक्के के दो पहलू होते हैं. ऐसे में मंच पर सरकार को ही वरीयता मिलनी थी.

एक बात और, जिले में भाजपा के अनेक पूर्व जिलाध्यक्ष है, क्या सबको ही मंच पर स्थान मिला था? यहाँ एक बात उन सभी को ध्यान रखनी चाहिए जो अपने आपको भाजपा का कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्त्ता बताते हैं, निष्ठावान बताते हैं कि किसी भी जिले के किसी भी संगठन में पद गिनी-चुनी संख्या में होते हैं मगर कार्यकर्त्ता लाखों में होते हैं. ऐसे में सभी को पदाधिकारी भी नहीं बनाया जा सकता और हजारों पूर्व पदाधिकारियों को मंच पर स्थान उपलब्ध नहीं कराया जा सकता.

जहाँ तक बात आयातित लोगों की है तो यहाँ भी दोष हम कार्यकर्ताओं का है. किसी भी दल से भाजपा में आने वाले बाहुबली, धनबली का स्वागत ऐसे करते हैं जैसे वह जन्म से ही भाजपा का कार्यकर्त्ता रहा हो. ठीक है कि शीर्ष नेतृत्व ने सत्ता-सुख के लिए, सीटों के लालच में, धन के कारण दूसरे दल से आये व्यक्ति को न केवल भाजपा में शामिल किया बल्कि उसे पद भी दिया, मगर इस स्थिति का भाजपा के सक्रिय, निष्ठावान कार्यकर्ताओं में से कितनों ने विरोध किया? विरोध तो दूर की बात, उस आयातित व्यक्ति का कालपी में यमुना पुल पर जिंदाबाद-जिंदाबाद करते हुए न केवल स्वागत किया बल्कि चौबीस घंटे उसी के इर्द-गिर्द टहलना शुरू कर दिया.

कुछ मिलने की आस में जिस तरह से कार्यकर्ताओं ने भी पलटी मारी है, उसे संगठन के कतिपय स्वार्थी लोगों ने समझा है, परखा है. यही कारण है कि बहुत से सच्चे कार्यकर्त्ता या तो संगठन से दूर हो गए हैं या फिर खुद को निष्क्रिय कर बैठे हैं. जनसभा में उपेक्षा या सादगी वाली बात से ज्यादा इसी तत्त्व ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया है.

ध्यान रखिये कि कोई भी दल हो वह उसके कार्यकर्ताओं से है और इसके लिए कार्यकर्ताओं को भी सशक्त होना पड़ेगा, स्वार्थ-लिप्सा से दूर होना पड़ेगा, शीर्ष पदाधिकारियों के, विधायक-सांसद-मंत्री की चरण-वंदना करने से, परिक्रमा करने से, चाटुकारिता करने से बचना होगा. यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो फिर शीर्ष क्रम के, आयातित लोगों के हाथों की कठपुतली बने रहिये, ऐसे ही उपेक्षित होने का रोना रोते रहिये.

04 अप्रैल 2025

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पारित

संसद ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 को पारित कर दिया है. लोकसभा के बाद यह विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो गया. राज्यसभा में विधेयक पर लगभग बारह घंटे तक चली चर्चा के बाद देर रात दो बजे के बाद मत-विभाजन करवाया गया. इसमें विधेयक के पक्ष में 128 सदस्यों ने मतदान किया जबकि 95 सदस्यों ने विधेयक के विरोध में मतदान किया. लोकसभा पहले ही विधेयक को मंजूरी दे चुकी है. यहाँ इस विधेयक के पक्ष में 288 और विरोध में 232 मत पड़े.

 



अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने ये संशोधन बिल पेश किया था. विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इस कानून से करोड़ों गरीब मुसलमानों को फायदा होगा और किसी भी तरह से यह किसी भी मुसलमान को नुकसान नहीं पहुँचाएगा. उन्होंने कहा कि यह कानून वक्फ संपत्तियों में हस्तक्षेप नहीं करता है. वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है, जिसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के प्रावधान हैं. इस विधेयक का उद्देश्य संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाकर, वक्फ बोर्ड और स्थानीय अधिकारियों के बीच समन्वय को सुव्यवस्थित करके और हितधारकों के अधिकारों की रक्षा करके शासन में सुधार करना भी है. इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड को अधिक समावेशी बनाना है.

 

इसी के साथ संसद ने मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 को भी मंजूरी दे दी है. यह विधेयक मुसलमान वक्फ अधिनियम 1923 को निरस्त करता है, जिसे राज्यसभा ने मंजूरी दे दी है. लोकसभा में पहले ही इस विधेयक को पारित किया जा चुका है.


20 फ़रवरी 2025

दिल्ली मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण में आम आदमी पार्टी की अनुपस्थिति

आज, 20 फरवरी 2025 को दिल्ली विधानसभा के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह रामलीला मैदान में आयोजित किया गया. पिछले 26 सालों से विपक्षी गलियारे में टहलने वाली भाजपा को उसकी मेहनत और विचारधारा के कारण दिल्ली के मतदाताओं ने इस बार बहुमत के साथ सरकार बनाने का अवसर दिया. भाजपा की तरफ से पहली बार विधायक बनी रेखा गुप्ता ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की. इससे पहले वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा कुछ सीटों के अंतर से सरकार बनाने से चूक गई थी. इसी मौके का फायदा उठाकर कांग्रेस ने अन्ना आन्दोलन के दौरान रहे उसके धुर विरोधी आम आदमी पार्टी, अरविन्द केजरीवाल टीम को समर्थन देकर सरकार बनाने का अवसर दे दिया था. इस अवसर का फायदा उठाते हुए आम आदमी पार्टी ने अगले दो चुनावों में प्रचंड बहुमत से सरकार तो बनाई मगर दिल्ली के मतदाताओं के दिल में प्रचंड रूप में अपना स्थान नहीं बना सके.

 



तमाम सारी मुफ्त की योजनाओं, विरोधी दलों पर आरोपों की बौछारों, स्वयं को एकमात्र ईमानदार सिद्ध करने की मानसिकता के बाद भी इस वर्ष के चुनावों में मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को नकारते हुए भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया. आम आदमी पार्टी या कहें कि केजरीवाल के पिछले कार्यकाल जिस तरह से गुजरे उसके अनुसार वे केन्द्र सरकार के प्रताड़ित व्यक्ति जैसे खुद को साबित करने की कोशिश में लगे रहे. अनाप-शनाप बयानबाजी, अनर्गल आरोपों के चलते उनकी और पार्टी की छवि लगातार गिरती रही. ये गिरावट आज मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भी देखने को मिली. आम आदमी पार्टी, अरविन्द केजरीवाल की तरफ से कोई भी इस समारोह में उपथित न हुआ. देखा जाये तो यह राजनैतिक गरिमा की निम्नतम गिरावट है. इससे पूर्व किसी भी शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी दलों के नेताओं का, पूर्व मुख्यमंत्रियों का उपस्थित रहना हुआ करता था.

 

आज की हरकत एक तरह से आम आदमी पार्टी का, अरविन्द केजरीवाल एंड फ्रेंड्स कंपनी का भविष्य भी तय करती सी दिख रही है. लोकतान्त्रिक मूल्यों में, विषयों में जितना महत्त्वपूर्ण कोई नेता होता है, उतना ही महत्त्वपूर्ण एक-एक मतदाता भी होता है. आज की हरकत से कम से कम वे लोग जो वाकई में राजनीति में शुचिता, ईमानदारी, गरिमा आदि देखना पसंद करते हैं, आम आदमी पार्टी से दूर होने की राह चल दिए होंगे. बाकी तो पिछला इतिहास ही आम आदमी पार्टी की कहानी लिखेगा.


08 फ़रवरी 2025

नकारात्मक कार्य-शैली का नतीजा आप की हार

सत्ताईस बरसों तक विपक्षी गलियारे में टहलते रहने के बाद भाजपा को दिल्ली विधानसभा का सत्ता सुख प्राप्त हो गया. 70 सीटों वाली दिल्ली में भाजपा ने 48 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया जबकि पिछले बारह सालों से सरकार चला रही आम आदमी पार्टी 22 सीटों में ही सिमट गई. आम आदमी पार्टी का इतनी कम सीटों में सिमट जाना संख्यात्मक रूप से इस कारण आश्चर्यजनक लग रहा है कि अपने पहले चुनाव में ही आम आदमी पार्टी द्वारा चमत्कारिक रूप से 28 सीटें जीत कर अपनी पहचान को साबित किया था. अन्ना आन्दोलन की लहर, लोकपाल बिल बनाये जाने का मुद्दा, भ्रष्टाचार विरोधी छवि के साथ पहले चुनाव के चमत्कारिक प्रदर्शन को अद्भुत प्रदर्शन में बदलते हुए 2015 एवं 2020 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने क्रमशः 67 एवं 62 सीटों पर विजय हासिल की थी. केन्द्रीय राजनीति में बेहतर प्रदर्शन करने वाली भाजपा को इन दोनों विधानसभा चुनावों में क्रमशः 03 एवं 08 सीटों से संतोष करना पड़ा था, वहीं कांग्रेस इन दोनों चुनावों में अपना खाता ही नहीं खोल सकी. आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर विजय हासिल की थी किन्तु विधानसभा में उसका प्रदर्शन एकदम लचर रहा.

 

आम आदमी पार्टी के पहले चुनाव की सफलता को अन्ना आन्दोलन लहर की सहानुभूति का परिणाम मानने वालों को भले ही चुनाव परिणामों की संख्यात्मकता ने गलत साबित किया हो मगर आम आदमी पार्टी खुद को सही साबित करने में विफल ही रही. यही कारण रहा कि दो बार प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता प्रदान किये जाने के बाद भी अंततः इस बार दिल्ली के मतदाताओं ने उससे किनारा करना ही उचित समझा. वर्तमान 2025 विधानसभा चुनाव परिणामों को आम आदमी पार्टी के समर्थक भले ही सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकम्बेंसी) कह कर खुद को सांत्वना देने का प्रयास करें मगर सत्यता यही है कि पिछले बारह बरसों के अपने कार्यकाल में आम आदमी पार्टी द्वारा अपनी उसी विचारधारा, अपने उन्हीं सिद्धांतों से लगातार दूरी बनाई जाती रही, जिनके सहारे वह सत्ता में आई थी. अपने कार्यों, अपने विचारों, अपनी कार्य-शैली आदि के चलते आम आदमी पार्टी ने और स्वयं अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह से नकारात्मक माहौल बना रखा था, उससे दिल्ली के मतदाताओं में निराशा उत्पन्न हो चुकी थी. यही कारण रहा कि दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्य-शैली पर भरोसा करते हुए इस बार विधानसभा भाजपा को सौंप दी. दिल्ली के मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अरविन्द केजरीवाल को भी हराया, मनीष सिसौदिया के साथ-साथ सत्येंद्र जैन और सौरभ भारद्वाज को भी बाहर का रास्ता दिखाया. एक दशक से अधिक समय की कार्य प्रणाली, व्यवहार को देखने के बाद मतदाताओं को न मुफ्त की रेवड़ियाँ पसंद आईं और न ही कट्टर ईमानदार वाली कथित छवि ने प्रभावित किया.

 



आम आदमी पार्टी की हार के पीछे भले ही भाजपा की अपनी तैयारी, रणनीति, मोदी का चेहरा समेत अनेक कारक समाहित माने जा सकते हैं, किन्तु आम आदमी पार्टी और उनके शीर्ष नेताओं के कारनामे भी उसकी हार के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जो दल भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से जन्मा हो, जिस राजनैतिक दल के खिलाफ पूरा आन्दोलन छेड़े रहा हो सत्ता में आने के लिए उसी से हाथ मिला लिए. कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ सैकड़ों पृष्ठों के जो सबूत सार्वजनिक मंच से दिखाए जाते थे, वे अचानक ही गायब हो गए. भ्रष्टाचार विरोध के द्वारा सत्ता में आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने लगे. खुद को कट्टर ईमानदार कहने वाले अरविन्द केजरीवाल भी इससे बच न सके. उनके सहित मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाना पड़ा.

 

नई तरह की साफ-सुथरी, ईमानदार और वैकल्पिक राजनीति का वादा करने वाले केजरीवाल ने तो सिद्धांतों की, ईमानदारी की उस समय धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं जबकि उनको जेल जाना पड़ा. बात-बात पर नैतिकता की दुहाई देने वाले अरविन्द केजरीवाल द्वारा जेल जाने के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया गया. इसके बजाय उनके द्वारा जेल से ही सरकार चलाने की ऐसी जिद दिखाई गई जो भारतीय राजनीति में अचम्भित करने वाली घटना थी. भ्रष्टाचार विरोध, नैतिकता की बात करने वाले केजरीवाल ने सत्ता सुख के लिए अनेक राज्यों में उन्हीं दलों, नेताओं के साथ हाथ मिलाया जिनके दामन में भ्रष्टाचार, दंगों, घोटालों आदि के दाग लगे हैं. व्यवस्था परिवर्तन करने, राजनीति का ढंग बदलने की बात करने वाले केजरीवाल और उनके साथी लगातार न केवल भ्रष्टाचार में लिप्त होते चले गए बल्कि काम-काज के मामलों में भी असफल सिद्ध हुए. सरकारी विद्यालयों, चिकित्सालयों, मोहल्ला क्लीनिक, सड़कें, यमुना साफ़-सफाई, बिजली, पानी आदि के मामलों में आम आदमी पार्टी लगातार असफल ही रही. विडम्बना यह रही कि तमाम सारी नाकामियों के बाद भी केजरीवाल द्वारा इनका जिम्मेदार स्वयं को, अपने नेताओं को, अपनी पार्टी को न मानकर दूसरों पर दोषारोपण किया जाता रहा. अलग तरह की राजनीति के नाम पर बिना किसी सबूत के, बिना किसी आधार के बाकी सभी पार्टियों और उनके नेताओं को चोर-बेईमान बताया जाने लगा. इसकी हद तो उस समय हुई जबकि वर्तमान चुनाव से ठीक पहले उन्होंने सीधे-सीधे हरियाणा की भाजपा सरकार पर यमुना के पानी में जहर मिलाने, नागरिकों के नरसंहार की साजिश रचने का अत्यंत गम्भीर आरोप लगा दिया. यह कदम केजरीवाल की गैर-जिम्मेदार राजनीति की सारी सीमाओं का लाँघना था.

 

फिलहाल तो आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के कारनामों की लम्बी सूची है, उनके कांड भी लम्बे-चौड़े हैं, अमानतुल्लाह खान, ताहिर हुसैन पर दंगों के आरोप तय हो चुके हैं, इस वास्तविकता को न केवल आम आदमी पार्टी के नेताओं ने समझा बल्कि दिल्ली के मतदाताओं ने भी समझा. यही कारण रहा कि दिल्ली में चुनावी मौसम के ठीक बीच में आम आदमी पार्टी के सात विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. यहाँ पार्टी छोड़ने की परम्परा भी पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही शुरू हो गई थी. शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, मयंक गांधी, कुमार विश्वास, कैलाश गहलोत आदि ऐसे नाम हैं जो केजरीवाल की कार्यप्रणाली, उनकी मनमानी से असहमति के चलते पार्टी से बाहर हो गए. इन सब बातों का भी असर चुनाव परिणाम पर पड़ा. मतदाताओं में यह धारणा बन चुकी थी कि अब पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.

 

दिल्ली चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठना बेवजह भी नहीं. क्षेत्रफल की दृष्टि से भले ही दिल्ली छोटा राज्य हो मगर देश की राजधानी होने के कारण वह राजनीति के केन्द्र में रहता है. देश की राजनीति की तरह ही यहाँ की राजनीति भी विचारधारा और पार्टी के मजबूत शीर्षक्रम पर आधारित है. स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति आम आदमी पार्टी के पास नहीं है. आम आदमी पार्टी भले ही स्वयं को कट्टर ईमानदारी, अलग तरह की राजनीति करने वाली, व्यवस्था परिवर्तन करने वाली विचारधारा का पोषण करने वाली बताती रही हो मगर सत्यता यही है कि उसकी कोई विचारधारा नहीं है. उसका जन्म किसी विचारधारा के कारण नहीं बल्कि सत्ता में आने के उद्देश्य से ही हुआ है. आम आदमी पार्टी का गठन करते समय केजरीवाल के स्वयं ही कहा था कि मजबूरी में हम लोगों को राजनीति में उतरना पड़ा. हमें राजनीति नहीं आती है. हम इस देश के आम आदमी हैं जो भ्रष्टाचार और महँगाई से दुखी हैं, उन्हें वैकल्पिक राजनीति देने के लिए आए हैं. ऐसे में पार्टी के लिए बिना किसी ठोस विचारधारा के उसके विधायकों का वैचारिक दृष्टिकोण से एकजुट बने रहना भी एक चुनौती होगी. दिल्ली की सत्ता में रहते हुए केजरीवाल को अपने विधायकों को सँभाले रखना मुश्किल हो रहा था, अब विपक्ष में रहते हुए उनको साधे रखना आसान नहीं होगा. विचारधारा शून्यता के साथ-साथ शराब घोटाले और शीशमहल जैसे मुद्दों ने पार्टी की कट्टर ईमानदारी छवि पर भी दाग लगाया है. केजरीवाल, सिसौदिया का हारना अन्य प्रदेशों की इकाइयों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा. ऐसे में यदि आम आदमी पार्टी को, केजरीवाल को राजनीति का लम्बा रास्ता तय करना है तो उनको दूसरों पर दोषारोपण करने के स्थान पर अपने गिरेबान में झाँकना होगा. अपने कारनामों पर, अपनी कार्य-शैली पर चिंतन करना होगा. कट्टर ईमानदार, अजेय बने रहने के अहंकारी दम्भ से बाहर निकलना होगा.  


05 फ़रवरी 2025

दिल्ली विधानसभा चुनाव का खेल

दिल्ली विधानसभा चुनाव का मतदान समाप्त होते ही कई एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल जारी किये. कुछ प्रमुख एजेंसियों में से सात ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और दो ने आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार का अनुमान दिखाया है. कांग्रेस को किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया है. देखा जाये तो कांग्रेस पिछले चुनाव से ही दिल्ली में हाशिए पर है. वर्तमान चुनावों का अंतिम परिणाम क्या होगा ये मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा किन्तु दिल्ली विधानसभा चुनाव की स्थिति का आकलन करने के लिए कांग्रेस का भी आकलन करना होगा, बिना इसके विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आएगी. इसके लिए विगत तीन विधानसभा चुनावों का आकलन करना होगा.

 

दिल्ली विधानसभा 2015 और 2019 के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस पूरे परिदृश्य से गायब हुई उसे देख कहा जाने लगा कि कांग्रेस का विकल्प आप है. 2013 में आप ने अन्ना आन्दोलन लहर के साथ पहली बार चुनाव में उतरते ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 32 सीटों के साथ पहले स्थान पर, आप 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आप को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आप का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.

 



पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. लोकसभा चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे कि आप या अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि 2013 चुनाव में 28 सीटें जीतने वाली आप ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात थी कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठाए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

 

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी अनदेखा किया गया. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आप को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस को 2013 के चुनाव के मुकाबले 2015 में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत मिले. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत सी सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही. इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा ने 2013 के मुकाबले 2015 में महज 17 सीटों पर कम मत प्राप्त किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

 

दरअसल ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का था. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ स्विंग कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का स्विंग कर जाना साधारण घटना नहीं थी. भाजपा या कि मोदी विरोधियों ने एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन से मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आप को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे. अरविन्द केजरीवाल के वे सारे सबूत कहीं गायब हो गए जो शीला दीक्षित के खिलाफ मंचों से दिखाए जाते रहे थे. इस खेल में किसी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की गई. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध किया गया.

 

इसके बाद भी विधानसभा 2019 में आप अपना पिछला कारनामा दोहराने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त हुए. भाजपा को 201के मुकाबले 57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुएउनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

 

आप की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियाँ भी प्रभावी रही होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आप को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आप विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

 


28 जनवरी 2025

हिन्दुओं की आस्था पर फिर आघात

एक तरफ बहुसंख्यक देशवासी प्रयागराज में चल रहे महाकुम्भ की पावनता का एहसास कर रहे हैं वहीं कुछ राजनैतिक पक्ष इसको मलिन बनाने में लगे हैं. महाकुम्भ की पावनता को राजनैतिक रंग देने से राजनैतिक दल, व्यक्तित्व चूक नहीं रहे हैं. इसके आरम्भ होने के पहले से ही भाजपा-विरोधी, हिंदुत्व-विरोधी मानसिकता वालों द्वारा अनर्गल प्रलाप किया जा रहा है. इसी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान ने विवाद पैदा कर दिया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी नेताओं के बीच गंगा स्नान की होड़ लगी हुई है, हालांकि इससे कोई गरीबी दूर होने वाली नहीं है. कांग्रेस पार्टी धर्म के नाम पर शोषण को कभी बर्दाश्त नहीं करने वाली. कांग्रेस अध्यक्ष को संभवतः जानकारी नहीं रही होगी कि कांग्रेस के पुराने नेता, जिसमें कि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी भी शामिल हैं, कुम्भ में स्नान कर चुके हैं. देखा जाये तो यह बयान राजनैतिक विरोध के साथ-साथ धार्मिक आस्था के विरोध का भी है.  

 



विगत कुछ वर्षों से अनेक राजनैतिक दलों, व्यक्तियों का मुख्य उद्देश्य राजनैतिक विरोध के नाम पर हिंदुत्व पर, हिन्दुओं की आस्था पर चोट करना है. अवसर मिलते ही उनके द्वारा ऐसा कर लिया जाता है. कांग्रेस अध्यक्ष को यदि भाजपा नेताओं के स्नान करने से आपत्ति थी तो उनको किसी अन्य विषय के सन्दर्भ सहित भाजपा की, उनके नेताओं की आलोचना करनी चाहिए थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. दरअसल गैर-भाजपाई दलों की दृष्टि में महाकुम्भ हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का केन्द्र होने से ज्यादा भाजपा की राजनीति को सशक्त करने वाला मंच बनता जा रहा है. महाकुम्भ में जिस तरह से हिन्दू आस्था का सैलाब उमड़ रहा है उससे इन दलों को अपने राजनैतिक अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगता समझ आ रहा है. यही कारण है कि अनेक दलों द्वारा लगातार किसी न किसी रूप में महाकुम्भ की आलोचना का अवसर खोजा जा रहा है. यह अवसर खड़गे को भाजपा नेताओं के गंगा स्नान करने के रूप में हाथ लगा.

 

धर्म, गंगा स्नान, महाकुम्भ आदि किसी व्यक्ति की आस्था से जुड़े विषय हैं. पिछले कुछ समय से व्यक्ति की धार्मिक आस्था को, विशेष रूप से हिन्दुओं की धार्मिक आस्था को रोजगार, आजीविका, अमीरी-गरीबी आदि से जोड़ कर देखा जाने लगा है. इसका जीता-जागता उदाहरण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर रहा है. उसे लेकर अनर्गल प्रलाप बराबर बना रहता था. मंदिर के स्थान पर कोई अस्पताल बनवाने की बात करता था, कोई विद्यालय बनाये जाने की वकालत करता था. मंदिर निर्माण को रोजगार से, आजीविका से जोड़कर भी लगातार सवाल उठाये गए. यहाँ सवाल उठाये जाने वालों की नीयत में किसी व्यक्ति का भला करना नहीं, किसी वर्ग-विशेष को लाभ पहुँचाना नहीं वरन हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ करना रहा है. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हिन्दुओं की आस्था पर, उनके धार्मिक स्थलों पर, उनके धार्मिक कृत्यों पर प्रश्न खड़े करते लोगों द्वारा कभी भी किसी अन्य धर्म, मजहब के लिए ऐसे प्रश्न नहीं किये गए. कभी इस पर बयान नहीं दिए गए कि किसी दरगाह, मजार पर चादर चढ़ाने से किसी गरीब के नंगे बदन को वस्त्र नहीं मिल जाता. कभी सवाल नहीं उठाया गया कि मोमबत्तियाँ जलाकर प्रार्थना करने से किसी गरीब के घर रौशनी हो जाती. ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ हिन्दुओं के धार्मिक क्रिया-कलाप ही संचालित होते हों, अन्य धर्मों के क्रिया-कलाप भी यहाँ पूरे उत्साह के साथ संचालित होते हैं, अन्य धर्मों के स्थल यहाँ अपनी पूरी आभा के साथ स्थापित हैं. ऐसी स्थिति होने के बाद भी हिन्दुओं की आस्था पर सवाल उठाना ऐसे लोगों की कुत्सित मानसिकता का परिचायक है.

 



ये बात राजनैतिक लोगों को समझ में नहीं आती है कि धर्म किसी भी व्यक्ति के आंतरिक विश्वास का विषय है. इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल स्वयं को सुरक्षित समझता है बल्कि सकारात्मक रूप से प्रभावित भी होता है. वर्तमान में राजनैतिक दलों द्वारा संवैधानिक अनुच्छेदों का कथित रूप से फायदा उठाकर धर्म के द्वारा राजनीति को चमकाया जा रहा है. सार्वजानिक स्थलों पर धार्मिक कृत्यों को समर्थन देना, शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में मजहबी शिक्षा प्रदान करना, अल्पसंख्यकों के नाम पर दबाव समूह के रूप में राजनीति करना इन्हीं अनुच्छेदों की आड़ लेकर किया जाने लगता है. समय-समय पर अलग राज्य की माँग, धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक कार्यों के लिए करने जैसे कदम उठाये जाते रहते हैं.

 

जहाँ तक सवाल हिन्दुओं का है तो इस देश में सदैव से ही हिन्दुओं को साम्प्रदायिक घोषित करने का काम किया जाता रहा है. धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के नाम पर बार-बार समाज में हिन्दुओं को बदनाम करने की कोशिश की जाती रही है. हिन्दुओं को बदनाम करने की आड़ में भारत देश में भगवा आतंकवादहिन्दू आतंकवाद का प्रचार किया जाता रहा है. कुछ इसी तरह की हरकत खड़गे के बयान को कहा जायेगा. ये सोचने-समझने वाली बात है कि धार्मिक कृत्य मनोभावों को, संस्कारों को, पारिवारिक मूल्यों को सहेजने का, पल्लवित-पुष्पित करने का कार्य करते हैं. आस्था में, धार्मिक विश्वास में, कृत्य में कभी भी आर्थिक दृष्टिकोण को हावी नहीं होने दिया गया है. पता नहीं राजनैतिक रूप से खुद को सशक्त समझने वाले लोग धार्मिक, सामाजिक रूप से इतने कंगाल क्यों हो जाते हैं कि वे व्यक्तियों की आस्था, भावना से खेलने का काम करने लगते हैं?  


09 अक्टूबर 2024

चुनाव परिणाम भाजपा के लिए संजीवनी

अबकी बार चार सौ पार जैसा जबरदस्त नारा उछलने के बाद भी लोकसभा चुनावों में आशातीत सफलता न मिल पाने के बाद गैर-भाजपाई दलों द्वारा नए तरह के दुष्प्रचार राजनैतिक गलियारों में उछालने शुरू कर दिए थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली, भाजपा की डबल इंजन सरकार की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठाते हुए विपक्षी दलों के उभरते गठबंधन और मुहब्बत की दुकान ने आने वाला समय अपना बताया. इस तरह की वैचारिकी को, विपक्षी दलों द्वारा फैलाये जा रहे दुष्प्रचार को उस समय और बल मिला जबकि चुनाव सर्वेक्षणों ने हरियाणा में गठबंधन को जबरदस्त सफल होते दिखाया. इसके उलट चुनाव परिणामों ने अलग कहानी लिख दी. 

 

हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने लगभग 40 प्रतिशत मतों के साथ 48 सीटों को भाजपा के पक्ष में देकर विपक्षी दलों द्वारा चलाये जा रहे अनेकानेक दावों, बयानों को गलत साबित कर दिया. पिछले विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने लगभग 37 प्रतिशत मतदान भाजपा के पक्ष में करते हुए 40 सीटों पर विजय दिलवाई थी. अबकी सीटों की संख्या और मतदान प्रतिशत दोनों में वृद्धि करते हुए हरियाणा के मतदाताओं ने भाजपा के विरुद्ध चलाये जा रहे तमाम दुष्प्रचार खारिज कर दिए. भाजपा की इस विजय से निश्चित ही विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस को जबरदस्त निराशा हुई होगी क्योंकि जिस तरह से हरियाणा में भाजपा विरोधी माहौल बनाया गया था, चुनाव सर्वेक्षणों में उसे एक पायदान नीचे दिखाया गया था उसके बाद कांग्रेस खुद को सत्तासीन समझ चुकी थी. यहाँ की जनता ने किसान विरोधी, पहलवान विरोधी, सेना विरोधी, सरकार विरोधी तमाम स्थितियों को आइना दिखा दिया. भाजपा की जीत ने अग्निवीर योजना पर मतदाताओं की मुहर लगाई, साथ ही यह भी साबित कर दिया कि महिला पहलवानों और किसानों का मुद्दा विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था.

 



भाजपा ने हरियाणा में आरम्भ से ही अपना ध्यान राज्य के ओबीसी मतदाताओं पर लगाया जो हरियाणा की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हैं. यहाँ की राजनीति में मुख्य रूप से जाट समुदाय का प्रभुत्व बना हुआ है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 25 प्रतिशत हैं. कांग्रेस सहित अन्य दलों का ध्यान जहाँ जाट मतदाताओं पर रहा वहीं भाजपा ने गैर-जाट मतदाताओं को आकर्षित कर अपनी जीत सुनिश्चित की. इसके अलावा भाजपा ने गाँवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दलित परिवारों तक पहुँच बनाई, जिसमें लखपति ड्रोन दीदी अभियान ने मुख्य भूमिका निभाई.

 

हरियाणा का चुनाव वहाँ की राजनैतिक स्थितियों के कारण चर्चा में रहा तो जम्मू-कश्मीर का चुनाव इसलिए राष्ट्रव्यापी विमर्श का हिस्सा बना क्योंकि धारा 370 हटाये जाने, केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद वहाँ यह पहला चुनाव था. इस चुनाव को लोकतान्त्रिक प्रणाली की परीक्षा भी माना जा रहा था. राज्य का इतिहास रहा है कि जहाँ पर आतंकवादियों और अलगाववादियों के भय के साए में चुनाव सपन्न हुआ करते थे, वहाँ भाजपानीत केन्द्र सरकार द्वारा लोकतंत्र की बहाली का रास्ता बनाते हुए 2019, 2020 एवं 2021 में क्रमशः ब्लॉक विकास परिषद् (बीडीसी), जिला विकास परिषद्  (डीडीसी) एवं पंचों-सरपंचों के चुनाव सहजता, शांतिपूर्वक करवा दिए. केन्द्रशासित राज्य बनाये जाने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर संभाग में 47 सीटों का आवंटन किया गया. जम्मू-कश्मीर के चुनावों में देखा जाये तो यहाँ राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता और जनजातीय अस्मिता को महत्त्व दिया गया. राज्य में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन का पूरा जोर धारा 370 की वापसी, राज्य का दर्ज़ा बहाल करने, भू-स्वामित्व को सीमित करना आदि पर रहा. इसके माध्यम से गठबंधन राज्य के नागरिकों को लुभाने में सफल भी रहा. परिणामस्वरूप नेशनल कांफ्रेंस को 45 सीटों पर विजय प्राप्त हुई जबकि कांग्रेस को मात्र 06 सीटों से संतोष करना पड़ा.

 

भाजपा की दृष्टि से यह चुनाव कुछ लाभकारी कहा जा सकता है. पिछले चुनाव की 25 सीटों के मुकाबले इस बार उसे 29 सीटों पर विजय प्राप्त हुई. राज्य में कश्मीर मुस्लिम बहुल है जहाँ भाजपा की पैठ न के बराबर है. जम्मू में जहाँ हिन्दू जनसंख्या अपना प्रभाव रखती है वहाँ भाजपा के प्रदर्शन को संतोषजनक कहा जा सकता है. मतदाताओं के बीच भाजपा ने लोकतंत्र की स्थापना, क्षेत्रीय विकास, आतंकवाद-अलगाववाद को समाप्त करने आदि मुद्दों को पहुँचाने की कोशिश की लेकिन राज्य में उसके लिए बहुत अधिक राजनैतिक संभावनाओं के न होने के बाद भी 2014 की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन निश्चित ही भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं के लिए संजीवनी का काम करेगा. राज्य के चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि यहाँ नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनेगी किन्तु अबकी शासन, सरकार का स्वरूप पहले वाले जम्मू-कश्मीर जैसा नहीं होगा. केन्द्रशासित राज्य होने के कारण वर्तमान में उपराज्यपाल की शक्तियाँ अपना कार्य करेंगी, इस कारण अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए मुख्यमंत्री को उपराज्यपाल की अनुमति, सहमति की आवश्यकता होगी.

 

बहरहाल हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को उस क्षेत्र विशेष के सन्दर्भ में, वहाँ की राजनैतिक, नागरिक स्थितियों के सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है. केन्द्र की भाजपानीत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा-मुक्त, शांतिपूर्वक चुनाव करवाकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना का आधार निर्मित किया है वहीं हरियाणा में भाजपा द्वारा लगातार तीसरी जीत ने बहुत सारे दुष्प्रचारों को खारिज किया है. इस जीत से निश्चित ही चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा, उसके सहयोगी दलों और कार्यकर्ताओं में उत्साह, ऊर्जा का संचार होगा.

09 जून 2024

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी.


आज नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है. हम सभी हर्षित, उत्साहित हैं. यहाँ अति-उत्साह, हर्ष में अपनी-अपनी पोस्ट में उनके तीसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ लेने की बात लिख रहे हैं, वे थोड़ा सा संशोधन करते हुए उसे 'लगातार तीसरी बार' लिखें.

 

तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वालों में जवाहर लाल नेहरू के बाद अटल बिहारी वाजपेयी भी रहे हैं. ये बात और है कि अटल जी लगातार तीन बार शपथ लेने वालों में नहीं थे, जैसे कि नेहरू जी रहे और अब मोदी जी हैं.

 



अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार निम्न समयावधि में रहे.

पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए

दूसरी बार 1998 में 13 महीने की अवधि के लिए

तीसरी बार 1999 में पूर्ण कार्यकाल पाँच वर्ष के लिए...

20 मई 2024

विचार-विहीन भाजपा-विरोधी

विरोधियों की कोई विचारधारा नहीं होती है, उनको बस विरोध करना होता है. यही इनका धर्म होता है. 2014 का लोकसभा चुनाव और 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव इन दोनों सदनों के लिए भाजपा के लिए नितांत नया मोर्चा था. केन्द्र में दस साल तक कांग्रेस रही थी उसी तरह उत्तर प्रदेश में भाजपा लम्बे समय से सत्ता से बाहर थी.


2019 के लोकसभा चुनाव में और 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के पास पाँच वर्ष का अनुभव था. अपने मित्रों के साथ, विशेष रूप से भाजपा-विरोधी मित्रों के साथ हुई अनेकानेक चर्चाओं में जिस तरह के परिणाम आने का संकेत किया था, लगभग वैसे ही परिणाम आये थे.

बावजूद इसके हम लगातार कहते हैं कि चुनाव परिणाम उस स्थिति पर निर्भर नहीं करते जैसी कि मतदान के दिन दिख रही होती है. राजनीति में दिखने और होने में बहुत बड़ा अंतर होता है और कहने को एक महीन सी रेखा भी होती है. इस अंतर को अथवा महीन रेखा को समझने के लिए संकुचित दिमाग नहीं बल्कि विश्लेषक बुद्धि की आवश्यकता होती है.

वर्तमान लोकसभा चुनाव में भाजपा-विरोधी लोग जिस तरह से लिख रहे हैं वो उनकी हताशा को दर्शाता है. जब खुद में विश्वास होता है तो बात द्विअर्थी नहीं कही जाती है. यदि आपकी गणित अच्छी है, विश्लेषण की क्षमता उत्तम है, आकलन बेहतर कर लेते हैं तो खुलकर लिखिए-कहिये.

इस चुनाव का अंतिम परिणाम क्या होने वाला है ये तो अंतिम परिणाम आने पर ही निर्धारित होगा किन्तु भाजपा-विरोधियों को असलियत का एहसास अभी से हो गया है.

04 मई 2024

गैर-भाजपाई दलों का प्रयास

जैसे-जैसे चुनाव के चरण बढ़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे चुनावी रंग-ढंग भी कुछ अलग तरह के नजर आ रहे हैं. गैर-भाजपाई दल लगातार स्वयं को इस तरह से प्रोजेक्ट करने में लगे हैं मानो समूचे चुनावी क्षेत्र में एकमात्र वही बचे हुए हैं. भाजपा के नाम पर इस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है जैसे कि इस बार उसे नाममात्र की सीटें मिलने वाली हैं.

 

ऐसी स्थिति में देखकर कई बार भाजपा-विरोधियों पर, उनकी सोच पर जबरदस्त हंसी आती है. यदि चुनावी समर को ही देखें तो ये कोई पहला चुनाव नहीं है जहाँ कि भाजपा को अथवा नरेन्द्र मोदी को खुद को साबित करना हो. इससे पहले लोकसभा के दो चुनावों-2014 और 2019 में लोगों ने भाजपा को और नरेन्द्र मोदी को परख लिया है. इसी तरह से उत्तर प्रदेश विधानसभा के दो चुनावों-2017 और 2022 में भी जनता ने भाजपा को निराश नहीं किया है. इन चार चुनावों में भाजपा और मोदी की छवि स्पष्ट रूप से निखर कर सामने आई है. इसके साथ-साथ प्रदेश विधानसभा के दो चुनावों में इन छवियों में  योगी जी की छवि ने अपना सकारात्मक सहयोग भी प्रदान किया है. ऐसे में अब विरोधियों द्वारा किया जाने वाला फोटोशॉप प्रचार महज खानापूरी नजर आ रही है.

14 मार्च 2024

आर्थिक सम्पन्नता से होगी वैतरणी पार

लोकसभा चुनावों की सुगंध चारों तरफ फैलने लगी है. इस बार का लोकसभा चुनाव जहाँ एक तरफ विपक्षी गठबंधन के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है वहीं भाजपा के लिए खुद को निखारने जैसा है. विगत दस वर्षों के कार्यों को देखने के बाद शायद ही किसी राजनैतिक विश्लेषक को केन्द्र में भाजपानीत सरकार के प्रति संशय हो. इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए प्रतिद्वंद्विता स्वयं से ही है, निखारना भी स्वयं को है, साबित भी स्वयं को करना है. विगत दस वर्षों के कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी द्वारा किये गए कार्यों, उनके द्वारा लिए गए अनेक साहसिक निर्णयों के द्वारा यह निर्धारित हो चुका है कि वे देशहित में किसी भी तरह का साहसिक निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते हैं.

 

उनके इन्हीं कार्यों, निर्णयों के आधार पर सहज स्वीकार्यता बनी हुई है कि इस लोकसभा चुनाव में जनादेश प्राप्त करने के बाद वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे. देश में अभी तक हुए सत्रह लोकसभा चुनावों में जवाहर लाल नेहरू के अतिरिक्त किसी को भी लगातार तीन बार जनादेश नहीं मिला है. नेहरू जी के नेतृत्व में 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस विजयी हुई थी. भाजपा द्वारा ‘अबकी बार, चार सौ पार’ का नारा ऐसे ही नहीं दिया जा रहा है. ऐसा अनुमान है कि नरेन्द्र मोदी अपने तमाम कार्यों, निर्णयों के आधार पर कांग्रेस के एक और कीर्तिमान पर अपनी नजर बनाये हुए हैं. अभी तक के लोकसभा चुनावों में वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उसी वर्ष संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने कीर्तिमान रचते हुए ऐतिहासिक 415 सीटों के साथ केन्द्र में सरकार बनायी थी. नरेन्द्र मोदी और भाजपा का पूरा प्रयास रहेगा कि अपने कार्यों के चलते वे इस ऐतिहासिक संख्या को छू सकें.

 



जिस तरह की राजनैतिक हलचल मची हुई है, जिस तरह से विपक्ष के क्रियाकलाप हैं, जिस तरह से उनके द्वारा बयानबाजी की जा रही है, जिस तरह से मतदाताओं का रुख है उसे देखकर इस लोकसभा में भाजपा को जनादेश मिलना मुश्किल नहीं लग रहा है. इसके पीछे नरेन्द्र मोदी के वे तमाम कार्य और निर्णय हैं जो उन्होंने पूरे साहस के साथ पूरे किये हैं. इन कार्यों में चाहे नोटबंदी हो, 370 की समाप्ति हो, तीन तलाक का मामला हो, राममंदिर निर्माण हो, नारी शक्ति वंदन अधिनियम हो, नागरिकता संशोधन अधिनियम हो या फिर समान नागरिक संहिता जैसा मुद्दा हो. असल में इन कार्यों को भाजपा के थिंक टैंक द्वारा, उनके सहयोगियों द्वारा तो खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया मगर उन अनेकानेक कार्यों पर विषद चर्चा कभी नहीं की गई जो जनहित से जुड़े रहे, जो आर्थिक नीतियों से जुड़े रहे. उक्त तमाम विषयों को विरोधियों द्वारा बार-बार आलोचनात्मक रूप में उठाते हुए सरकार की आलोचना की गई कि उसके द्वारा गरीबी, स्वास्थ्य, मंहगाई, रोजगार आदि के लिए किसी भी तरह का कार्य नहीं किया गया. इन बिदुओं पर भाजपा के रणनीतिकारों द्वारा भी जनमानस के बीच जाने का प्रयास नहीं किया गया. आम जनता को यह समझाने का प्रयास ही नहीं किया गया कि मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा महज जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, वाराणसी आदि पर ही कार्य नहीं किया गया बल्कि आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, बालिका समृद्धि योजना, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया आदि के द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने का कार्य किया है.

 

2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अद्यतन भारतीय राजनीति को दो-दो दशकों के तुलनात्मक रूप में देखा जाने लगा है. इसमें पहला मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाला 2004-2014 का संप्रग कार्यकाल और दूसरा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाला 2014-2024 का राजग कार्यकाल है. यहाँ इन दो-दो दशकों के एक-एक पक्ष को विश्लेषित कर पाना संभव नहीं है मगर कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को अवश्य ही दर्शाया जा सकता है. जब भी किसी सरकार के कार्यों का आकलन किया जाता है तो मंहगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना आदि पर विशेष नजर रखी जाती है. तुलनात्मक रूप में देखें तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, रसोई गैस कनेक्शन, आवास, शौचालय, शिक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार, आधारभूत संरचना, मातृत्व सेवाओं आदि में जबरदस्त उपलब्धि प्राप्त की है. उज्ज्वला योजना, सस्ते आवास योजना, शौचालय निर्माण के द्वारा मोदी सरकार ने जन-जन में, गरीब तबके में अपनी पैठ बनाई है. 2004 में रसोई गैस कनेक्शन की संख्या 14.5 करोड़ थी जो 2023 में 31.4 करोड़ हो गई. स्वच्छता के प्रति गम्भीर मोदी सरकार ने शौचालय के निर्माण में सकारात्मकता दिखाई. अपने दोनों कार्यकाल में 11.5 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके मोदी सरकार ने महिलाओं, बहू-बेटियों को खुले में शौच जाने की शर्मिंदगी, मुसीबत से छुटकारा दिलवाया. आश्चर्य की बात है कि संप्रग सरकार के दो दशकों में महज 1.8 करोड़ शौचालयों का ही निर्माण करवाया जा सका था. महिलाओं के प्रति संवेदनशील मोदी सरकार ने मातृत्व लाभार्थियों के प्रति विशेष जागरूकता दिखाई है. उनके कार्यकाल में ऐसे लाभार्थियों की संख्या 9.9 लाख के मुकाबले 559 लाख तक पहुँची.

 

भाजपा, मोदी विरोधियों द्वारा आये दिन मँहगाई, आर्थिक स्तर आदि को लेकर हमलावर रुख अपनाया जाता है. बयानबाजियों के लिए किसी भी स्तर तक जाकर जनमानस को बरगलाया जा सकता है किन्तु यदि तथ्यों की, आँकड़ों की बात की जाये तो कुछ अलग ही परिदृश्य नजर आता है. संप्रग सरकार के अंतिम दिनों में विदेशी मुद्रा कोष की स्थिति अत्यंत ही दयनीय बनी हुई थी. मँहगाई की औसत दर भी अपने चरम पर थी. मोदी सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में विशेष प्रयास किये गए. दूसरे देशों से लगातार संपर्क, खाड़ी देशों से दोस्ताना सम्बन्ध आदि के चलते समय के साथ आर्थिक स्थिति में सुधार आया. विदेशी मुद्रा इस जनवरी में 617 अरब डॉलर था और मंहगाई की औसत दर वर्ष 2023 में 5.1 प्रतिशत रही. इस तरह के आर्थिक माहौल के चलते ही अनेक विदेशी कम्पनियों ने भारत का रुख किया. निवेश की जबरदस्त स्थिति के चलते ही देश ने पहली बार भारतीय वस्तुओं के निर्यात को 400 अरब डॉलर के पार किया. इस तरह की आर्थिक स्थिति के कारण ही आज भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. 2023 में देश की जीडीपी 3.7 लाख करोड़ हो गई है और इसके 2024 में 4.1 लाख करोड़ रहने का अनुमान है.

 

वर्तमान में नरेन्द्र मोदी के कार्यों-निर्णयों ने उनके कद को अत्यंत विराट स्वरूप दे दिया है. मुद्दा चाहे राष्ट्रीय महत्त्व का हो या फिर क्षेत्रीय महत्त्व का प्रत्येक स्तर पर मोदी सरकार की सहभागिता दिखाई देती है. जहाँ उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास आदि की समस्या को दूर करते हुए 24.8 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का कार्य किया गया वहीं विदेशी मुद्रा भंडार, टैक्स संरचना, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, बिजनेस रैंकिंग आदि में बहुआयामी परिवर्तन  करके देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलवाई है. आज जिस तरह से देश का आर्थिक, सामाजिक ढाँचा सुधारात्मक मोड में है, लोगों की क्रय-क्षमता बढ़ी है, ग्रामीण अंचलों तक बिजली ने अपनी पहुँच बनाई है, मूलभूत सुविधाओं ने महिलाओं की जीवन-शैली को सहज बनाया है उससे जनमानस में नरेन्द्र मोदी के प्रति, सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है. निश्चित ही यही विश्वास भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को इस लोकसभा चुनावी वैतरणी सफलतापूर्वक, सहजतापूर्वक पार करवा देगा. 





 

15 जून 2023

समान नागरिक संहिता का अतार्किक विरोध

समान नागरिक संहिता का मसला उस समय चर्चा में आया जबकि इसी 14 जून को 22वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों के विचार माँगे हैं. एक सामान्य नागरिक भी इस पर अपने विचार विधि आयोग को तीस दिन के भीतर भेज सकता है. आयोग ने यह भी कहा है कि यदि आवश्यकता महसूस हुई तो वह चर्चा के लिए व्यक्ति अथवा संगठन को बुला भी सकता है. जैसे ही समान नागरिक संहिता की चर्चा शुरू हुई वैसे ही इसका विरोध भी शुरू कर दिया गया. समान नागरिक संहिता का मुद्दा कोई राजनैतिक नहीं वरन संविधान में ही इसके तत्त्व समाहित हैं. संविधान की प्रस्तावना और नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सरकार सभी के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करे. 


आज़ादी के बाद नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड एच लारी, बिहार के मुस्लिम सदस्य हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने भीमराव अम्बेडकर का विरोध किया था. तब डॉ० अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, संपत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. जबरदस्त विरोध के बीच हुए मतदान में डॉ० अम्बेडकर का प्रस्ताव विजयी हुआ. मुस्लिम सदस्य बुरी तरह पराजित हुए और संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत की राय से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इसके बाद भी बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए टाल दिया गया. समय गुजरने के साथ-साथ मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते सन 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताती-मानती है.




इसके विरोध में खड़े लोगों का यह तर्क तो अत्यंत हास्यास्पद है कि समान नागरिक संहिता की बात हिन्दुओं द्वारा महज इस कारण की जाती है क्योंकि वे मुसलमानों की चार शादी और तलाक देने की सुविधा को आबादी बढ़ाने वाला मानते हैं. यहाँ सवाल उठता है कि क्या ये प्रासंगिक है कि एक महिला को मात्र तीन बार तलाक बोलकर हमेशा के लिए बेघर कर दिया जाये, जैसा कि शाहबानो प्रकरण में हुआ? 1985 में शाहबानो की उम्र 62 वर्ष थी और उसके पति ने तीन बार तलाक कहकर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था. पाँच बच्चों की माँ शाहबानो को तब सिर्फ मैहर की रकम वापस की गई थी. इसी वर्ष उच्चतम न्यायालय ने कहा भी था कि संसद को समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ना चाहिए. वर्ष 2015 में भी पुनः उच्चतम न्यायालय ने इसकी आवश्यकता पर बल दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पूर्व वर्ष 2003 में भी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 118 को असंवैधानिक करार देते हुए संसद को समान नागरिक संहिता के निर्माण के सम्बन्ध में अपनी टिप्पणी प्रेषित की थी.


गैर-भाजपा राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाती रहती है. सत्तारूढ़ केंद्र सरकार द्वारा राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के वायदे को पूरा करने के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वह हिंदुत्व, हिन्दू वोट के लिए समान नागरिक संहिता को देश में लागू करना चाहती है. ये समझने का विषय है कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थी, तब हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय क्यों इसका विरोध किया गया? सभी नागरिकों के एक अधिकार हो जाने का विरोध क्यों? शरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता है? किसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारना, हाथ काटना, पत्थर मारना, फांसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैं? कुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है. जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के संभव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. कुरान विधवा विवाह और पुनर्विवाह को मान्य करती है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐसा प्रतिबंधित करता है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में ये लोग किस शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध करने में लगे हैं? क्यों इस विषय पर मुस्लिमों के एकमत होने का इंतजार किया जाता है? क्यों उनको अंतरात्मा की आवाज़ सुनने के लिए कहा जाता है? सवाल उठता है कि क्या सन 1955-56 में हिन्दू कोड बिल लागू करते समय हिन्दुओं की भावनाओं का ख्याल रखा गया था? क्या उत्तराधिकार, बाल विवाह आदि पर नियम बनाते समय हिन्दुओं की अंतरात्मा की आवाज़ को सुनने का प्रयास किया गया था?


आखिर चन्द गैरजिम्मेवार लोगों के विरोध के चलते कब तक अपरिहार्य विधान को लागू होने से रोका जाता रहेगा? समान नागरिक संहिता किसी एक समुदाय विशेष के विवाह अथवा तलाक की बात नहीं करती वरन एक महिला को भी नागरिक के रूप में अधिकार प्रदान किये जाने की बात करती है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता इसकी है कि सभी लोग हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि धार्मिक मानसिकता से ऊपर उठकर विशुद्ध भारतीय नागरिक की मानसिकता से विचार करें. देश में एक ऐसी संहिता का निर्माण करने में योगदान दें जो सभी समुदायों पर समान रूप से लागू हो, सभी को भारतीयता की पहचान कराती हो.






 

10 अक्टूबर 2022

संघ प्रमुख और इमाम की मुलाकात का स्वागत हो

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा पिछले दो महीनों में दो मुलाकातें मुस्लिम समाज के प्रमुख व्यक्ति से कर लेने के सियासी मकसद खोजे जाने शुरू कर दिए गए हैं. मुस्लिम समुदाय से मुलाकात के सियासी मकसद भाजपा या फिर संघ के सन्दर्भों में ही होता है, अन्य किसी दल या संगठन के सन्दर्भ में नहीं. मोहन भागवत की मुलाकात ने तब सियासी हलचल मचा दी जबकि उन्होंने अखिल भारतीय इमाम संगठन के प्रमुख डॉ. उमैर अहमद इलियासी से दूसरी मुलाकात की. मोहन भागवत ने दिल्ली की एक मस्जिद में मरहूम मौलाना जमील इलियासी की मजार पर पहुँच कर फूल चढ़ाए. इसके बाद वहीं मस्जिद के बंद कमरे में उनकी और मस्जिद के इमाम डॉ. उमर अहमद इलियासी की लगभग एक घंटे तक चली गुफ्तगू ने सियासी पारे में हलचल पैदा कर दी. इसमें गर्मी उस समय बढ़ गई जबकि भागवत से मुलाकात के बाद इलियासी ने मंत्रमुग्ध हो उनकी तारीफ करते-करते उन्हें राष्ट्रपिता कह दिया.


देखा जाये तो यह कोई पहला अवसर नहीं है जबकि मोहन भागवत ने किसी मुस्लिम धर्मगुरु अथवा मुस्लिम नेता से मुलाकात की हो. इससे पहले वे पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई कुरैशी, पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति जमीरुद्दीन शाह और कारोबारी सईद शेरवानी से भी मुलाकात कर चुके हैं. इन मुलाकातों के सन्दर्भ में यदि संघ की गतिविधियों को मुस्लिम समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो संघ ने मुस्लिम समुदाय में अपनी सकारात्मक पहुँच बनाने के लिए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच बनाया हुआ है. इसके अलावा संघ ने मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोगों से संवाद के लिए एक समिति भी बना रखी है. जिसमें इंद्रेश कुमार, कृष्ण गोपाल, मनमोहन वैद्य और रामलाल जैसे वरिष्ठ व्यक्तित्व शामिल हैं.




समाज में, राजनैतिक हलकों में इन मुलाकातों को लेकर एक आमराय यही बनी हुई है कि संघ की तरफ से मुस्लिमों के दिलों में पैठ बनाने के लिए ऐसी मुलाकातें की जा रही हैं. यदि संघ की इन सहयोगी संस्थाओं का या फिर मुलाकातों का निहितार्थ मुस्लिम समाज में उसकी पैठ बनाने को लेकर ही माना जाये तो प्रथम दृष्टया इसमें बुराई क्या है? देश की आज़ादी के बाद के बरसों में राजनैतिक दलों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अनेकानेक कदम उठाये. मुस्लिम समाज को महज वोट-बैंक मानकर ही तमाम राजनैतिक दल अपनी-अपनी राजनैतिक गोटियाँ सजाते रहे. भाजपा या फिर संघ को गैर-भाजपाई, गैर-संघी मानसिकता के दलों, संगठनों ने मुसलमानों की निगाह में दुश्मन, आक्रामक, हत्यारा जैसा बना दिया है. रामजन्मभूमि मामले में विवादित ढाँचा गिराए जाने के बाद से संघ-विरोधी दलों को जैसे एक सूत्र हाथ लग गया था. उनके द्वारा विवादित ढाँचे की घटना को आधार बनाकर अनेकानेक चुनावों में खुलेआम संघ को, भाजपा को मुस्लिम समाज का दुश्मन और खुद को उनका हितैषी बताया जाता.


इस तरह की घटनाओं, मंचों से संघ को मुस्लिम विरोधी बताये जाने के बयान आदि से निश्चित ही सामाजिक वातावरण नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है. ऐसे में समाज विरोधी तमाम ताकतों को यह डर है कि यदि मुस्लिम समाज में संघ अपनी सकारात्मक पहुँच बनाने में सफल हो गया तो न केवल उन तमाम दलों, संगठनों की असलियत सामने आ जाएगी बल्कि उनकी राजनैतिक जमीन भी खिसक जाएगी.   


मोहन भागवत की मुलाकात का मकसद यदि संघ की छवि को मुस्लिम समाज की निगाह में बदलना है, तो यह समाज की बेहतरी के लिए एक सकारात्मक कदम है. ऐसा इसलिए क्योंकि संघ को इसके लिए भी बदनाम किया जाता है कि वह इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है. समझने वाली बात ये है कि भारत किसी एक राज्य का, एक संस्कृति का, एक भाषा का नाम नहीं है वरन यह अनेक राज्यों, अनेकानेक संस्कृतियों, भाषाओं का समुच्चय है. इसे किसी एक धर्म, मजहब के रूप में बदलना सहज नहीं. इन स्थितियों में, छवियों में परिवर्तन तभी लाया जा सकता है जबकि खुद मुस्लिम समाज संघ की बात सुनने को, उसके विचार जानने को आगे आये. इसके प्रति मुस्लिम समाज को अपनी सोच में, अपनी कट्टरता में बदलाव करने की आवश्यकता है. इसके लिए भी कोई बाहर से आकर काम नहीं कर सकता बल्कि खुद मुस्लिम समाज के भीतर से किसी व्यक्ति को सामने आना होगा.


मुसलमानों का संघ-विरोधी रवैया सिर्फ संघ के लिए ही नुकसानदायक नहीं है बल्कि वह पूरे समाज के लिए घातक है. वे केवल संघ को ही अपना विरोधी या दुश्मन न मानकर समस्त हिन्दुओं के प्रति ऐसी धारणा बनाये हैं. आये दिन छोटी से छोटी बात पर होती हिन्दू-मुस्लिम झड़पें, किसी-किसी राज्य में जानलेवा हिंसा के पीछे यही मानसिकता काम करती है. इनके उदाहरण समय-समय पर सामने आते ही रहते हैं. ऐसे में यदि मोहन भागवत की पहल पर मुस्लिम समाज से किसी ने एक सकारात्मक कदम बढ़ाया है तो उसमें किसी तरह की राजनैतिक मंशा न देखते हुए उस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए. गैर-संघ मानसिकता वाले दलों और संगठनों ने इस तरह की मुलाकातों को सियासी रंग देते हुए इसे महज चुनावों के सन्दर्भ में सीमित कर दिया है. ऐसे लोगों का कहना है कि यदि संघ के, मोहन भागवत के प्रयासों से हिन्दू और मुस्लिम समाज के बीच बनी दूरी कम होती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को आने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव में मिल सकता है. स्पष्ट है कि गैर-संघ, गैर-भाजपा दल, संगठन नहीं चाहेंगे कि संघ के, मोहन भागवत के ऐसे कोई भी प्रयास फलीभूत हों, जिनसे हिन्दू और मुस्लिम समाज की दूरी मिटे.


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अवधारणा सबका साथ, सबका साथ वाली रही है. इसी तरह उनके द्वारा इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए गए भाषण में पाँच प्रण की बात कही गई. इन पाँच प्रणों में उनका सबसे पहला सपना विकसित भारत का है, जिसके लिए उन्होंने एकता और एकजुटता की बात कही है. यह तभी संभव है जब मुस्लिम आबादी का संशय संघ और भाजपा को लेकर दूर हो. अगर ऐसा होता है तो निश्चित ही केन्द्र सरकार को अपनी कूटनीति, आर्थिक नीति, राजनीति को चलाना सहज होगा. ऐसे में न केवल समाज की बेहतरी के लिए बल्कि स्वयं मुस्लिम समुदाय के प्रति बनते जा रहे नकारात्मक माहौल को दूर करने के लिए भी संघ प्रमुख मोहन भागवत और इमाम डॉ. उमैर अहमद इलियासी की मुलाकात का स्वागत होना चाहिए. मुस्लिम समाज को ऐसी और भी मुलाकातों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाये जाने की आवश्यकता है.