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10 नवंबर 2025

दिल्ली कार धमाका

डॉक्टर सहित तमाम गिरफ्तारियों में हजारों किलो विस्फोटक के पकड़े जाने से हताश आतंकियों या कहें कि हम सबके बीच रह रहे इस्लामिक सफेदपोशों ने दिल्ली वाला कार धमाका करके मासूमों की हत्याएँ कर दीं. ऐसा करने के पीछे इनका उद्देश्य हमारी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताना और इन इस्लामिक सफेदपोशों के उन राजनैतिक आकाओं को अपने पक्ष में जगाना है जो कल इनको बचाने के लिए इनके पक्ष में खुल कर उतर आयेंगे.

 

जब तक अदालत कुछ फैसला करे तब तक इन गिरफ्तार लोगों का ख्याल रखा ही जायेगा जेल में.... पूरी सुरक्षा, खान-पान, सुविधा आदि के साथ.


10 मई 2025

क्रोध-रोष, जोश-प्रतिशोध

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. दिन बीतते जा रहे थे, सरकार की चुप्पी बयानों के सन्दर्भ में ही टूट रही थी, मीडिया की तरफ से लगातार कुछ न कुछ बड़ा होने जैसा संकेत दिया जाता मगर प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. पहलगाम हत्याकांड के बाद आतंकवादियों, पाकिस्तान के विरुद्ध उपजा क्रोध अब सरकार की ख़ामोशी, कदमों को देखते हुए रोष में बदलने लगा था. जनसामान्य की एकराय सिर्फ और सिर्फ युद्ध जैसा कठोर कदम उठाने की थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक भी पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

केन्द्र सरकार ने पहलगाम घटना के बाद से ही अपनी सक्रियता शुरू कर दी थी. गृह मंत्रालय के आदेश पर एनआईए ने हमले की जाँच आरम्भ की. सिन्धु जल समझौता अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित कर दिया गया. पाकिस्तान से युद्ध होने, तनाव की स्थितियों के बाद भी इस समझौते को कभी निलम्बित नहीं किया गया था. यह पहली बार है जबकि भारत ने इसको निलम्बित किया. पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को ‘युद्ध की कार्यवाई बताया. पाकिस्तानी नागरिकों के सभी प्रकार के वीजा रद्द करते हुए उन्हें तत्काल वापसी के आदेश दिए गए. इसी के साथ इस्लामाबाद में भारतीय मिशन और नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या को कम कर दिया गया. पाकिस्तानी उच्चायोग के रक्षा, नौसेना और वायुसेना सलाहकारों को एक सप्ताह में भारत छोड़ने का आदेश भी दिया गया. सेना के सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिए गए. केन्द्र सरकार के ऐसे क़दमों, निर्णयों से स्पष्ट संकेत मिला कि इस बार वह शांत बैठने के मूड में नहीं है.

 



केन्द्र सरकार स्वयं तो कूटनीतिक, राजनैतिक निर्णय लेते हुए काम कर रही थी साथ ही सैन्य गतिविधियों को भी सक्रियता प्रदान कर रही थी. सरकार की तरफ से लगातार बैठकों के द्वारा सेना को उनकी सैन्य गतिविधियों के लिए खुली छूट देने जैसा आक्रामक एवं विश्वासपरक कदम उठाकर दर्शाया गया कि सरकार सुस्त अथवा खामोश नहीं है. भारतीय वायुसेना द्वारा सेंट्रल सेक्टर में एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया गया, जिसमें पहाड़ी और जमीनी लक्ष्यों पर हवाई हमलों का अभ्यास किया गया. इसे 'आक्रमण' नाम दिया गया जिससे इसका उद्देश्‍य स्पष्ट हो जाता है. वायु सेना के अलावा नौसेना ने अरब सागर में अपनी गतिविधियों को बढ़ा दिया था. युद्धपोतों को हाई अलर्ट पर रख कर कई एंटी-शिप और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया गया.  

 

इसके बाद भी जनाक्रोश कम नहीं हो रहा था. जनमानस पाकिस्तान के विरुद्ध खुले रूप में सैन्य गतिविधि को देखना चाहता था. दरअसल जनता का मनोविज्ञान तत्काल कार्यवाही करने का, तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति, राजनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट किसी भी सरकार के लिए युद्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं स्वीकारा जाता है. युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष वाली स्थिति में ले जाना होता है. हम सभी वर्तमान में वैश्विक स्तर पर कई युद्ध देख रहे हैं, जो लम्बे समय के बाद भी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं. भारत सरकार की मंशा भी कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है. सम्भव है कि ऐसा कुछ विचार करके केन्द्र सरकार किसी सटीक कदम को उठाने की तैयारियों में सक्रिय हो.

 

ऐसा कुछ उस समय समझ में भी आया जबकि केन्द्र की तरफ से युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को आगाह किया गया. एक निश्चित तिथि पर देश में मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट के द्वारा युद्ध से निपटने के लिए जन-जागरूकता को बढ़ाने वाले दिशा-निर्देश जारी किये गए. इधर जनमानस में ब्लैक आउट को लेकर, मॉक ड्रिल को लेकर सक्रियता, सजगता देखने को मिल रही थी उधर सरकार कुछ बड़ा करने के मूड में थी. केन्द्र सरकार द्वारा अप्रत्याशित कदम उठाते हुए मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट वाले दिन से पहले ही पाकिस्तान और पीओके में मिसाइल स्ट्राइक करके पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की कमर तोड़ दी.

 

भारत की तीनों सेनाओं ने अपनी संयुक्त शक्ति के साथ आधी रात के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के द्वारा पाकिस्तान और पीओके स्थित आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य हमले किये. ख़ुफ़िया जानकारियों के आधार पर चिन्हित 21 आतंकी ठिकानों में से अभी 09 ठिकानों को सेना ने अपना निशाना बनाया है. इनमें पाँच केन्द्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में और चार पाकिस्तान में स्थित थे. इन हमलों में विशेष बात यह रही कि पाकिस्तान के किसी भी सैन्य ठिकाने को और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया गया. सेना का निशाना पूरी तरह आतंकी केन्द्रित रहा, इसमें लश्कर-ए-तैयबा, टीआरएफ सहित कई आतंकी ठिकाने शामिल रहे. बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद), मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय), टेहड़ा कलां (जैश-ए-मोहम्मद), सियालकोट (हिजबुल मुजाहिदीन), बरनाला (लश्कर-ए-तैयबा), कोटली (जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन का प्रशिक्षण शिविर), मुजफ्फराबाद (लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी शिविर और जैश-ए-मोहम्मद का संचालन केन्द्र) इन हमलों में पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए.

 

केन्द्र सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. यह स्पष्ट सन्देश है कि आतंकी संगठनों का, उनके ठिकानों का सफाया किये बिना भारतीय सेना रुकने वाली नहीं है. अचम्भित करने वाली भारत की सैन्य कार्रवाई में दर्जनों आतंकियों और उनके करीबियों के मारे जाने की पुष्टि खुद पाकिस्तान ने की है. केन्द्र सरकार द्वारा उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक तथा पुलवामा अटैक के बाद की एयर स्ट्राइक के बाद वर्तमान मिसाइल स्ट्राइक के द्वारा पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दिया गया है कि भारत अब पाकिस्तानी आतंकवाद का घिनौना खेल बर्दाश्त नहीं करने वाला. निश्चित ही ऐसा दृढ़ विश्वास और आक्रामक रणनीति जनाक्रोश को समाप्त करेगी साथ ही आतंकियों का भी सर्वनाश करेगी.  


19 अप्रैल 2025

शांतिदूत लिखने का सन्दर्भ भी समझो

'शांतिदूत' शब्द का प्रयोग करना बंद करो.

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यदि खुलकर मुस्लिम समुदाय के हमलावरों, आतातायी लोगों, उत्पात मचाते युवकों के खिलाफ हत्यारे, बवाली, हिंसक शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते तो कुछ न लिखो.... चुपचाप रहो.... मगर 'शांतिदूत' लिखकर उनको भविष्य के लिए वाकई शांतिदूत माने जाने का रास्ता न बनाओ.


वर्तमान इंटरनेट युग में इस शब्द के द्वारा सम्पूर्ण विश्व में एक सन्देश जायेगा वहीं भविष्य में इसी एक शब्द के द्वारा इन वर्तमान मुस्लिम आक्रान्ताओं को, हमलावरों को वास्तविक रूप में शांतिदूत माना-स्वीकारा जाने लगेगा.


क्या पता तब आज की तरह से फिल्मों के द्वारा सच दिखाने वाले लोग जिंदा भी मिलें या नहीं?


26 मार्च 2024

रूस पर बड़ा आतंकी हमला

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत वाली जीत के बाद रूस के और अधिक शक्तिशाली रूप में उभर कर आने का विश्वास व्यक्त किया था. इस दावे के साथ ही उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध में नाटो सेनाओं के शामिल होने के अपने विश्वासपरक दावे के सापेक्ष दुनिया को विश्वयुद्ध से एक कदम दूर बताया था. पुतिन की विश्वयुद्ध की सम्भावित चेतावनी नाटो सेनाओं, पश्चिमी देशों के लिए थी. इन सबके पीछे रूस की सशक्त सेना, पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था, सजग सुरक्षा एजेंसियों का होना माना जा रहा था मगर चंद आतंकियों ने रूस के, पुतिन के इस विश्वास को हिला डाला. चार आतंकियों ने मॉस्को के नज़दीक स्थित क्रोकस कॉन्सर्ट हॉल में घुसकर सोवियत काल के रॉक बैंड ग्रुप पिकनिक के एक म्यूजिक कॉन्सर्ट के दौरान गोलियों की बौछार कर दी थी. एके 47 से की गई अंधाधुंध गोलीबारी में सैकड़ों लोगों की जान गई और घायल हुए.

 



जहाँ इस हमले की जिम्मेवारी एक तरफ इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान प्रान्त (ISIS-K) ने ली वहीं दूसरी तरफ पुतिन इस आतंकी हमले को यूक्रेन की साजिश बता रहे हैं. पुतिन के इस संदेह का कारण आतंकियों का यूक्रेनी सीमा से यूक्रेन में प्रवेश करने की कोशिश करना रहा है. एक तरफ रूसी राष्ट्रपति इस्लामिक आतंकी संगठन को, यूक्रेन को इसके लिए जिम्मेवार ठहरा रहे हैं, दूसरी तरफ जैसै-जैसे इस आतंकी हमले की जाँच आगे बड़ रही है वैसे-वैसे चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. इस आतंकी हमले में संलिप्त चारों आतंकियों सहित कुल ग्यारह लोगों को पकड़ने का दावा रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने किया है. इन सभी गिरफ्तार व्यक्तियों का सम्बन्ध अफगानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक स्टेट की खोरासान शाखा से बताया गया है. इससे इस हमले में तुर्किये का सम्बन्ध होना सामने आया है. रूस की संघीय सुरक्षा एजेंसी (FSB) ने दावा किया है कि पहले भी मॉस्को में इसी तरह के दो आतंकी हमले की कोशिशों को नाकाम किया गया है. इस हमले में तुर्किये कनेक्शन सामने के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन को अपना दोस्त बताने वाले तुर्किये राष्ट्रपति एर्दोगन क्या अब धोखा दे रहे हैं?

 

रूस में हुए इस आतंकी हमले में अलग-अलग दृष्टिकोण से अलग-अलग पेंच और सम्बन्ध दिखाई देते हैं. हमले की जिम्मेवारी सबसे पहले इस्लामिक आतंकी संगठन ने ली थी. रूसी सुरक्षा एजेंसियों की जाँच से तुर्किये कनेक्शन दिखाई दिया. रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने इस हमले को यूक्रेन की साजिश बताया. इस संदेह के चलते ही यूक्रेन को पुतिन के गुस्से का खामियाजा उठाना पड़ा. रूस ने यूक्रेन के बाईस से ज्यादा शहरों में हमले किए. यूक्रेन के इस हमले में शामिल होने के दावे का असर अमेरिका पर पड़ता दिख रहा है. पुतिन के नजदीकी विश्वस्त अफसरों को संदेह है कि अमेरिका को इस तरह का आतंकी हमला होने की जानकारी थी लेकिन उसने रूस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी. रूसी अधिकारियों द्वारा इस तरह का संदेह उठाये जाने का एक कारण अमेरिका द्वारा सात मार्च का वह अलर्ट है जिसमें अमेरिकी दूतावास ने अपने नागरिकों से कहा था कि वे मॉस्को में होने वाली बड़ी सभाओं और कार्यक्रमों से दूर रहें. इस अलर्ट के बीस दिनों के भीतर ही आतंकी हमला होने का सीधा मतलब यही लगाया जा रहा है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के पास आतंकी हमले को लेकर जानकारी थी.  

 

आतंकी हमले के तार कहाँ-कहाँ, किस-किस से जुड़े हैं ये तो आने वाले समय में होने वाली जाँच से पता चलता रहेगा मगर अब अंदेशा रूस के हमलावर होने का है. ऐसा होता नजर आने भी लगा है. सुरक्षा एजेंसियों ने देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है. सभी जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया है. यूक्रेन पर हमले बढ़ गए हैं, देखा जाये तो ये बढ़े हुए हमले कहीं का कहीं अमेरिका और नाटो सेनाओं के विरुद्ध क्रोध का संकेत हैं. दरअसल वर्ष 2002 में चेचन अलगाववादियों द्वारा नॉर्ड-ओस्ट थियेटर में बंधक बनाये जाने के बाद से यह सबसे बड़ा आतंकी हमला है. उस हमले में एक सौ सत्तर के आसपास लोग मारे गए थे. रूस अभी तक उस आतंकी हमले को भुला नहीं पाया है. इसके अलावा इसमें कोई संदेह नहीं कि पुतिन अपने नेतृत्व में रूस से इस्लामिक, कट्टरपंथी आतंकवाद का एक तरह से सफाया कर दिया है. ऐसे में पुतिन की प्रचंड और ऐतिहासिक बहुमत वाली जीत ने उनके विरोधियों में नाराजगी और निराशा पैदा कर दी.

 

यह आतंकी हमला इसी निराशा और हताशा का परिणाम हो या न हो किन्तु यह हमला पुतिन के विश्वास और स्वाभिमान पर अवश्य है. इस आतंकी हमले के बाद रूस आक्रामक मुद्रा में है और अमेरिका द्वारा यूक्रेन को बेगुनाह बताते हुए क्लीन चिट दी जा रही है. विश्व की इन दो महाशक्तियों द्वारा उठाये जा रहे कदमों, बयानों का अंतिम निष्कर्ष क्या निकलेगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है किन्तु इस आतंकी घटना ने एक तरह का वैश्विक भय अवश्य पैदा कर दिया है. इस आतंकी हमले ने विश्व की दो महाशक्तियों के बीच खतरनाक संघर्ष के शुरू होने का बीज बो दिया है. 






 

13 दिसंबर 2020

संसद हमले में शहीदों को नमन

संसद पर वर्ष 2001 में हुए आतंकी हमले को विफल करने के दौरान हुए संघर्ष में शहीद हुए सुरक्षा-कर्मियों को नमन. 



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वंदेमातरम्

23 दिसंबर 2019

सुरक्षा तो सुरक्षा है, देश की हो या घर की


पिछले साल इसी दिसंबर की बात है, हम लोग बिहार के सबसे छोटे जिले शिवहर में थे. न कोई घूमने का विचार, न यहाँ छुट्टियाँ मनाने का कोई कार्यक्रम. हमारे एक मित्र राकेश द्वारा अपने देशव्यापी साईकिल अभियान का समापन अपने गृह-जनपद में किया गया था. समय भी लगभग इसी तिथि के आसपास का था. राकेश की चार साल की अनथक मेहनत और उनके साथियों के उत्साह का परिणाम था कि शिवहर जैसे बहुत छोटे जनपद में कई लोगों का जमावड़ा हुआ. उनके स्थानीय मित्रों ने सहयोग किया, बाहरी मित्रों का भी आना हुआ. उनके बामपंथी विचारधारा के होने के बाद भी बहुत से गैर-बामपंथी मित्रों ने, जिसमें स्थानीय और बाहरी मित्र शामिल थे, राकेश जी का साथ दिया.


कार्यक्रम के लिए निर्धारित तीन दिनों से ज्यादा समय उनके सहयोगियों द्वारा दिया गया. कार्यक्रम की समाप्ति जिस तरीके से होनी चाहिए थी या कि जैसी सोची थी भले ही वैसी न हुई हो मगर एक संतुष्टि थी कि बिहार के एक छोटे जनपद में एक बड़े कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ. कार्यक्रम जिसका नाम कि राकेश की मर्जी से ‘जेंडर संवाद’ निर्धारित किया गया, अगले संवाद की प्रतीक्षा करने लगा. इस प्रतीक्षा के बीच अल्प-समय विश्राम का निकाला गया. बिहार की अपनी निर्धारित कानूनी मर्यादाओं का पालन करने के बाद आगामी पड़ाव शिवहर के निकटवर्ती नेपाल देश की तरफ बनाया गया. ये शायद आश्चर्य का विषय हो सकता है मगर जबकि साथ में एक समूह हो तब किसी भी आश्चर्य की स्थिति नहीं रहती है. कानूनी स्थितियों का पालन करने की मानसिकता के साथ ही शिवहर से लगे नेपाल की तरह वाहन चल दिए.

कतिपय रोमांचक मार्गों, नदी, बाँध की स्थिति से निकलते-बचते अंततः युवा विचारों का समूह नेपाल के द्वार पर खड़ा हुआ था. बिहार, शिवहर से बहुत दूर के मित्रों के लिए यह अवश्य ही अचम्भा जैसा था कि दो देशों के द्वार पर कोई सुरक्षा नहीं, कोई सुरक्षा बल नहीं. हमारे वे मित्र जो कि खुद को बामपंथी बताते हुए कभी भी दक्षिण पंथ की, सनातन संस्कृति की, तत्कालीन मोदी-भाजपा सरकार की शाब्दिक बखिया उधेड़ने में सबसे आगे रहते हैं वे इस व्यवस्था को सर्वोत्कृष्ट बताने से नहीं चूक रहे थे. सीमाओं के निर्बंध होने को वे बामपंथ की जीत और उसका सफल उद्देश्य बताने में लगे थे. उनकी उत्साहित बातों के बीच बस एक सवाल उछाला कि यदि देशों की सीमाओं पर इस तरह की स्वतंत्रता आपको पसंद है तो अपने घर पर दरवाजे, दीवार, तालाबंदी आदि किसलिए? क्या एक देश में, एक गाँव में, तमाम परिचितों के बीच इस तरह की बाध्यता ग्रामवासियों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं? क्या यह उन ग्रामवासियों के अधिकारों में कटौती नहीं जो जब चाहें आपके घर आकर अपने इस्तेमाल के लिए कुछ भी ले जाना चाहते हैं? 

ऐसे और भी सवाल उस यात्रा में हमने उछाले मगर सारे के सारे निरुत्तर रहे. देर रात तक अपने स्थानीय मित्र की ससुराल में चलने वाली दामाद-स्वागत वाली पार्टी चलती रही, बहुत से स्थानीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होती रही, विमर्श होता रहा मगर हमारे तमाम सवालों का जवाब नहीं मिला. आज जबकि देश भर में कथित शांतिदूत किसी और बात की खीझ नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर निकाल रहे हैं, वे प्रश्न आज भी निरुत्तर हैं. एक घर की सीमा में किसी का भी प्रवेश स्वतंत्रता नहीं, संवैधानिक नहीं मगर एक देश में जहाँ चाहे घुसपैठ करने का अधिकार सारे विश्व को चाहिए, आतंकियों को चाहिए, हमारे उन मित्र के तमाम वामपंथी मित्रों को चाहिए. कम से कम हमारे स्तर से ये नहीं हो सकता. हमारे मित्र को अपने घर की सुरक्षा जितनी पसंद है, जितनी प्राथमिक है उतनी ही हमें अपने देश की सुरक्षा की प्राथमिकता है. जानवरों, चोर-उचक्कों, आतंकियों, भिखारियों का यदि घर में घुसना पसंद नहीं तो हमें इनका देश में घुसना पसंद नहीं. अब समस्या उनकी है और वे ही इसका जवाब दें कि ये सारी प्रजाति किसी एक ही मजहब में क्यों मिलती हैं?

18 दिसंबर 2019

आतंकियों के नए हथियारों से सचेत रहने की आवश्यकता

ये  आवश्यक नहीं कि आप अथवा आपका शहर आतंकिओं के निशाने पर हो और वहाँ किसी तरह का बम धमाका हो, किसी तरह की गोलीबारी हो. बिना इसके भी आतंकी अथवा उनके स्लीपर सेल अपना काम करने के लिए नए-नए रास्ते तलाशने लगे हैं. इसे किसी तरह का आकलन अथवा अनुमान मान कर अनदेखा करने की आवश्यकता नहीं है. आतंकियों द्वारा अब ऐसा किया जा रहा है. अभी हाल ही में वाराणसी से संचालित विशाल भारत संस्थान प्रमुख और अनाज बैंक के संस्थापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव इसी तरह के एक हमले में घायल हो गए हैं. राजीव श्रीवास्तव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केन्द्रीय पदाधिकारी और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के प्रमुख इन्द्रेश कुमार जी के शिष्य होने के साथ-साथ अत्यंत नजदीकी हैं. ऐसे में ज़ाहिर सी बात है कि प्रशासन की तरफ से मुख्य रूप से समूचे घटनाक्रम का संज्ञान लिया गया. 


जांच के बाद स्पष्ट हुआ कि एक एक निजी कार्यक्रम से वापस आते समय राजीव श्रीवास्तव की बाइक में एक जीप द्वारा टक्कर मारी गई. अपने आपमें सजग और चैतन्य रहने वाले राजीव जी इस टक्कर पर संभल गए मगर उन्हें किसी आतंकी हमले का अंदेशा नहीं था. वे इसे महज एक सड़क की सामान्य घटना समझ अपने गंतव्य के लिए चलते रहे. इसी बीच उसी जीप ने एक बार फिर उनको टक्कर मार दी. इस बार टक्कर कुछ तेज रही और किसी अनहोनी से परे राजीव जी बजाय संभल पाने के दुर्घटना का शिकार हो गए. उन पर हुए इस हमले में उनकी जान तो बच गई मगर उनका दाहिना पैर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया.


राजीव जी पर हुए हमले के बाद जब प्रशासन सक्रिय हुआ तो कुछ पुरानी दुर्घटनाओं का तारतम्य बैठाने का प्रयास किया गया. कुछ दिनों पूर्व संघ के मोहन भागवत जी की कार भी एक ट्रक दुर्घटना का शिकार हुई थी. इसी तरह से कुछ संघ पदाधिकारी भी आये दिन सड़क दुर्घटनाओं का शिकार बन रहे हैं. प्रशासन की गुप्त सूचनाओं और जानकारियों से ऐसा मालूम हुआ है कि मजबूर मुस्लिम बच्चों की परवरिश करने के साथ-साथ तीन तलाक मुद्दे, धारा 370, राम जन्मभूमि मंदिर, नागरिकता संशोधन, जनसँख्या कानून आदि पर सक्रिय रूप से कार्य करने के कारण राजीव श्रीवास्तव विगत काफी समय से कट्टरपंथियों के निशाने पर थे. उनके पहले उनके संस्थान की एक मुस्लिम महिला सदस्य को भी काफी लम्बे समय से मुस्लिम कट्टरपंथियों की धमकियाँ मिलती रही हैं. इन सबसे बिना भयभीत हुए राजीव जी और उनके सभी सदस्य लगातार मुस्लिम हितों के लिए कार्य करते आ रहे हैं.

अब जबकि इस मामले में स्पष्ट हो चुका है कि आतंकियों द्वारा इस तरह की दुर्घटनाओं को अपना हथियार बना लिया गया है जहाँ न किसी तरह का धमाका होना है, न किसी तरह की गोलीबारी. ऐसी दुर्घटनाओं को शासन-प्रशासन द्वारा भी महज सड़क दुर्घटना मान कर लगभग भुला दिया जाता है. चूँकि राजीव श्रीवास्तव का मामला कहीं न कहीं हाई प्रोफाइल मामला बन गया और उसकी जांच के बाद से इस तरह के संकेत भी मिल गए. ऐसे में सभी नागरिकों को सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है. किसी भी दुर्घटना अथवा अन्य तरीके की ऐसी घटनाओं को महज संयोग समझकर विस्मृत करने की आवश्यकता नहीं है. सभी जिम्मेवार नागरिकों को सजग रहने की जरूरत है और प्रशासन का सहयोग करने की आवश्यकता है. एक-एक व्यक्ति के जागने से ही आतंकियों के हौसलों को तोड़ा जा सकता है.


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डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
मीडिया प्रभारी/प्रवक्ता - विशाल भारत संस्थान

01 मई 2019

मोदी की कूटनीतिक वैश्विक सोच को दर्शाती है ये विजय


इस बार विचार किया था कि अपने संसदीय क्षेत्र के निर्वाचन होने तक राजनैतिक पोस्ट लिखने से बचा जायेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में सभी लोग, उसमें हम भी शामिल हैं, पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. सभी का किसी न किसी दल, विचारधारा के प्रति एक तरह का पूर्वाग्रह बना हुआ है. इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो खुद को निरपेक्ष मानते, बताते हैं. कहने को ऐसे लोग खुद को भले ही निरपेक्ष कहते हों, भले ही वे किसी दल के समर्थक न होते हों मगर विरोधी अवश्य होते हैं. ऐसे लोगों का विरोध सिर्फ और सिर्फ भाजपा से होता है. भाजपा के विरोध में वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, किसी के साथ भी जा सकते हैं. ऐसा इस चुनाव में होते दिख भी रहा है. टुकड़े गैंग का सदस्य खड़ा हुआ है तो भाजपा विरोधी तत्त्व उसके समर्थन में उपस्थित हो गए. देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का दम मारने वाले भी ऐसे गैंग का सहारा अपने वरिष्ठ सदस्य के प्रचार के लिए ले रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए आतंकवादियों को मारने के सबूत चाहिए होते हैं. ऐसे लोगों के लिए एक आतंकी के पक्ष में अदालत खुलवाने की कोशिश होती है. ऐसे लोगों द्वारा ही हिन्दू आतंकवाद की कहानी गढ़ी जाती है. 


फ़िलहाल, कहने को बहुत कुछ है मगर लिखना इसलिए नहीं क्योंकि आज की पोस्ट का सन्दर्भ उससे कतई नहीं है. आज, एक मई को दो घटनाएँ अपने आपमें अभूतपूर्व कही जा सकती हैं, वे घटित हुईं. इनमें एक घटना आतंकी मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने सम्बन्धी रही. चीन की तरफ से विगत कई मौकों पर वीटो लगाकर ऐसा करने में अड़ंगा लगाया जाता रहा मगर इस बार उसके द्वारा ऐसा नहीं किया गया. पिछले लम्बे समय से संयुक्त राष्ट्र की तरफ से उसे वैश्विक आतंकी घोषित करवाने सम्बन्धी भारत के कूटनीतिक प्रयासों को उस समय सफलता मिली जबकि चीन ने अपना वीटो पावर हटा कर इसका समर्थन कर दिया. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा संसद, पठानकोट और पुलवामा जैसे हमलों को अंजाम देने वाले आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया गया है. यह भारत की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है. इस जीत के कुछ दिनों पूर्व पाकिस्तान से हमारे जांबाज अभिनंदन का सुरक्षित वापस आना भी एक कूटनीतिक सफलता थी. दोनों मामलों में विश्व समुदाय ने भारत का खुलकर साथ दिया और उसी का परिणाम रहा कि पाकिस्तान और चीन दवाब में आये. इस घटना पर वर्तमान केंद्र सरकार को जिस तरह से उसके अन्य राजनैतिक साथी दलों की तरफ से बधाई, शुभकामनायें मिलनी चाहए थीं वे नहीं मिली हैं.

इस घटना के अलावा आज की एक घटना वाराणसी से बीएसएफ के बर्खास्त जवान का नामांकन पत्र का खारिज होना है. यह सामान्य अर्थों में बहुत बड़ी घटना समझ न आ रही हो मगर इसके सन्दर्भ बहुत गहरे हैं. संदर्भित व्यक्ति बीएसएफ से बर्खास्त जवान है, जिसका विगत महीनों में एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उसके द्वारा सेना में भोजन सम्बन्धी समस्या को उठाया गया था. फिलहाल, मुद्दा यहाँ यह नहीं वरन यह है कि उस व्यक्ति के द्वारा पहले निर्दलीय नामांकन किया गया, बाद में उसे गठबंधन ने अपना प्रत्याशी बनाया. दोनों नामांकन पत्रों में जानकारियों में अंतर होने के साथ-साथ जो सबसे बड़ी बात है वह उसका बर्खास्त होना. क्या कोई बर्खास्त जवान चुनाव लड़ सकता है? वाराणसी से किसी बर्खास्त जवान का चुनाव क्षेत्र में उतारना, वो भी मोदी के खिलाफ एक सोची-समझी योजना थी. यदि वाकई वह जवान अथवा बीएसएफ के बहुत सारे जवान सेना के सम्मान में ही मैदान में उतर रहे थे तो उनको उस व्यक्ति के खिलाफ चुनाव में उतरना चाहिए था, जिसने खुलेआम सेना को रेपिस्ट कहा था. मगर ऐसा नहीं हुआ, न ऐसा होने जा रहा है क्योंकि इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ भाजपा का विरोध, मोदी का विरोध है.

फिलहाल तो भाजपा विरोधी और मोदी विरोधी संज्ञाशून्य जैसी स्थिति में होंगे. वे किसी भी रूप में रहें, खुश रहें क्योंकि अभी सम्पूर्ण देश वर्तमान केंद्र सरकार की वैश्विक कूटनीतिक विजय की ख़ुशी मना रहा है. मोदी जी की अंतर्राष्ट्रीय स्तर यात्राओं का यह सुफल निकला है.



01 मार्च 2019

रुख परिवर्तन न करे अब भारत

भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन की वापसी का ऐलान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपनी संसद में किया. आज चंद घंटों बाद उनका प्रवेश भारतीय सीमा में हो जायेगा और संभव है कि पिछले कई दिनों से चला आ रहा तनाव दूर हो. इसके पीछे सम्भावना अभी इसलिए है क्योंकि संसद में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपने शांति प्रयासों की तरफ बढ़ते कदमों को रोककर एक तरह से फिर परमाणु हमले जैसी धमकी दी है. इसके पीछे की मानसिकता को कोई भी समझ सकता है. दरअसल भारतीय वायुसेना की हालिया कार्यवाही के बाद से पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है. उसके द्वारा लगातार यही प्रयास हो रहा है कि आतंकवादियों पर की गई भारतीय कार्यवाही को वह पाकिस्तान पर हुई कार्यवाही साबित कर सके. भारत द्वारा पुलवामा हमले से सम्बंधित डोजियर भेजने के बाद भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने संसद में आतंकियों के खिलाफ किसी भी तरह की कार्यवाही करने सम्बन्धी कोई बयान नहीं दिया. इसके उलट उनके बयान से परमाणु हमले की धमकी की बू आती है. उन्होंने संसद में साफ तौर पर कहा कि मैं हिंदुस्तान को आज इस प्लेटफ़ॉर्म से कह रहा हूँ कि इसे आगे ना लेके जाएँ क्योंकि जो भी आप करेंगे पाकिस्तान मजबूर होकर रिटेलिएट करने के लिए. वो मुल्क जिसके पास ये हथियार हैं, सोचना भी नहीं चाहिए इस तरफ.


एक तरफ इस तरह की बयानबाजी, वो भी संसद में और दूसरी तरफ भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर की रिहाई को शांति प्रयासों की दिशा में बढ़ाया गया कदम बताना पाकिस्तान के दोहरे चरित्र का परिचायक है. असल में पाकिस्तानी आतंकी संगठनों जैश-ए-मोहम्मद और जैश-ए-तैयबा के खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत पाकिस्तान जुटा नहीं सकता है. ऐसे में उसकी कोशिश यही सिद्ध करने की है कि कश्मीर में अथवा भारत में जिस तरह की आतंकी कार्यवाहियां आये दिन होती रहती हैं, उनके पीछे पाकिस्तानी आतंकी संगठनों का नहीं वरन भारत की दमनकारी नीतियों का परिणाम है.

यही वह बिंदु है जहाँ पर भारत को नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय कूटनीति, पाकिस्तान के सामने न झुकने का अड़ियल रवैया और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और रुख का पाकिस्तान पर भारी दवाब था. ऐसे में बिना शर्त हमारे विंग कमांडर की वापसी निश्चित ही भारतीय कूटनीति की, कठोर रुख की जीत है मगर इसके बाद भी सम्पूर्ण घटनाक्रम को एकसूत्र में बांधते हुए भारत को सतर्क रहने, समझने की जरूरत है. भारतीय वायुसेना के हमले के तुरंत बाद पाकिस्तान का एफ-16 विमानों से भारतीय सीमा में हमला करने की नियत से घुसना, पाकिस्तानी वायुसेना को करार जवाब देते हुए उसके एक विमान को मार गिराना तथा उसी में दुर्भाग्यवश भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर का पाकिस्तान की गिरफ्त में आ जाना भले ही परिस्थिति रही मगर पकिस्तान ने तत्काल उसे अपने पक्ष में करने का प्रयास किया. पुलवामा हमले में उसके आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद द्वारा ली गई जिम्मेवारी ने पाकिस्तान की भारत विरोधी मानसिकता को वैश्विक स्तर पर साबित कर दिया था. इसके अलावा मसूद का पाकिस्तान में खुलेआम शरण पाना भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबको दिखाई दे रहा है. ऐसे में भारतीय वायुसेना पायलट की गिरफ़्तारी को पाकिस्तान द्वारा अपनी साख में सुधार करने के अवसर के रूप में लिया.  

पाकिस्तानी जनता द्वारा विंग कमांडर अभिनंदन के साथ की जा रही मारपीट के बीच पाकिस्तानी सेना द्वारा बचाने का, पाकिस्तानी सेना द्वारा घायलावस्था में उससे पूछताछ करने का फिर चाय की चुस्की के बीच संक्षिप्त सी बातचीत का वीडियो लगातार आते रहना अपने आपमें बहुत कुछ कहता है. इन सबका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच पाकिस्तान को शांति की राह पर चलने वाला, मानवतावादी दृष्टिकोण रखने वाला साबित करना रहा है. ऐसा करने के कारण विंग कमांडर को रिहा करना उसके लिए अनिवार्य बन गया था मगर इसे जिस तरह से प्रसारित किया जा रहा है यदि उसके सन्दर्भ में भारत की तरफ से चूक होती है तो फिर आतंकवाद के खिलाफ चल रही उसकी लड़ाई कमजोर पड़ने की आशंका है. ये स्पष्ट है कि भारत को अब और अधिक दृढ़ संकल्प और अदम्य इच्छाशक्ति के साथ आतंकवाद का सामना करने की आवश्यकता है. भारत को यही प्रयास करना है कि किसी भी रूप में पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों के बीच दवाब में उठाये गए इस कदम को अपने पक्ष में मोड़ ले जाये. पाकिस्तानी सेना इस घटना के बाद कोई भी मौका नहीं चूकेगी जिससे भारत का नुकसान न किया जा सके. भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर से जो समर्थन आतंकवाद के खिलाफ वर्तमान कार्यवाही में मिला है उसे किसी कीमत पर कम नहीं होने देना है. 

भारत द्वारा पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा भारतीय सीमा का अतिक्रमण करने के सम्बन्ध में विरोध दर्ज करवा दिया गया है. इसके साथ-साथ विदेश मंत्रालय ने भी साफ़-साफ़ कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसकी धरती (पाकिस्तान) से संचालित आतंकवादी शिविरों के खिलाफ कार्यवाही पर पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय दायित्व और द्विपक्षीय प्रतिबद्धता दिखाने के बजाय भारत के खिलाफ आक्रामक तेवर दिखा रहा है. ऐसा स्पष्ट तौर पर लग रहा है कि अब भारत मूकदर्शक बनकर बैठा देखता नहीं रहेगा. उसके दृष्टिकोण में बदलाव साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है. वह पूर्ण शांति प्रयासों के साथ अपने आतंवादी विरोधी कदमों को बढ़ा रहा है. विज्ञान दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना कि पायलट प्रोजेक्ट हो गया, अब कुछ रियल होगा के भी अपने सन्दर्भ निहित हैं.



26 फ़रवरी 2019

उत्साह बना रहे, जोश बना रहे, दुश्मन जिन्दा न रहे, आतंकी जिंदा न रहे


सुबह आँख खुले और खबर ऐसी मिले तो निश्चय ही सीना 56 इंच से कहीं अधिक बड़ा समझ आने लगता है. समाचार-पत्रों की अपनी बाध्यताएं होने के कारण यह खुशखबरी उनके द्वारा तो नहीं मिली मगर नियमित रूप से सुबह-सुबह ताजा खबरों के लिए जैसे ही नेट की खिड़की को खोला तो गौरवपूर्ण एक झोंका अन्दर उतरता चला गया. अपनी तसल्ली के लिए कई-कई जगहों पर घूम-फिर कर देखा तो सभी जगह उसी तरह की आनंदित, गौरवशाली बयार चल रही थी. सभी उसकी शीतलता में, उसके जोश में उत्साहित नजर आ रहे थे. सब भारत माता की जय, जय हिन्द, जय हिन्द की सेना के जयघोष के साथ उल्लासित दिखाई दे रहे थे. आखिर खबर ही ऐसी थी. इंटरनेट पर सबसे तेजी से प्रसारित होने वाली खबर में आज कि यही सबसे बड़ी और जोश भरने वाली खबर रही. पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई की खबर. भारत के 12 मिराज 2000 जेट ने पाकिस्तान में 1000 किलो के बम गिराए. भारतीय वायुसेना के इस एयरस्ट्राइक में 200-300 आतंकवादी मारे जाने की खबर.


ऐसी खबरें सुनकर किसी भी उस भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो ही जायेगा जो पुलवामा में आतंकी हमले में  जवानों की मौत का बदला लेना चाहता होगा. यद्यपि पुलवामा हमले के कुछ घंटों के भीतर ही उस हमले के मास्टरमाइंड को सेना ने मार गिराया था किन्तु कुछ बड़ा होने वाला है की सोच के साथ भारतीय नागरिक उससे संतुष्ट नहीं थे. ऐसे में भारतीय वायुसेना के 12 मिराज 2000 एयरक्राफ्ट ने बालाकोट, चकोटी और मुजफ्फराबाद में बम गिराए जाने, कई आतंकी लॉन्च पैड ध्वस्त होने की खबर ने कुछ राहत दी है. खबर यह भी है कि इस हमले में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का कंट्रोल रूम अल्फा-3 भी पूरी तरह ध्वस्त हो गया है. पुलवामा हमले के बाद ऐसी एक प्रतिक्रिया की आवश्यकता भी महसूस हो रही थी. इससे न केवल पाकिस्तान को सबक मिलेगा वरन भारतीय सेना का, सैनिकों का हौसला भी बढ़ेगा.

इस कार्यवाही का तिथिवार भी अपना महत्त्व है. पुलवामा में हमारे सैनिकों पर हमला हुआ था 14 फरवरी को. 26 फरवरी उन शहीदों की त्रयोदशी संस्कार पर भारतीय वायुसेना ने सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है जवानों को.


भारतीय सेना, सैनिकों के हौसले के साथ-साथ आज इस खबर के आने के बाद सोशल मीडिया में भी जोश हाई बना हुआ दिख रहा है. उत्साहित नागरिकों के विचार उनकी पोस्ट, कमेन्ट में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं. एक नजर उन पर भी डाल ली जाये.
=> भारतीय वायुसेना - हम जब आएंगे, गर्मी थोड़ा बढ़ जाएगी.
=> सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना ने पहले करीब 5 किलो टमाटर फेंके और जैसे ही कंगले बाहर टमाटर लूटने निकले, बम मार दिए.
=> इस बार हमला पीओके में नही बल्कि पाकिस्तान में हुआ है.
=> साथियो! How Is The Josh?
=> 1971 के बाद पहली बार भारतीय वायुसेना ने सीमा पार किया है। इस नाते यह ऐतिहासिक घटना है.
=> 26 फरवरी के दिन 26 जनवरी जैसा माहौल बनाने वाले मोदी जी देश के पहले प्रधानमंत्री बने.  
=> वो शांति पुरस्कार भी लेगा.. और पाकिस्तान की ओखली में धनिया भी कूट देगा...
=> वीर सावरकर की पुण्य तिथि के दिन आप सर्जिकल स्ट्राइक करते हैं और फिर गाँधी शांति पुरस्कार का वितरण करने राष्ट्रपति भवन पहुँच जाते हैं... अपने मोदीजी भी ग़ज़ब हैं!
=> आज दिल से पीएम @narendramodi को सलाम करता हूँ.आतंकियों को उनके घर में घुसकर यूँ मारने का फैसला बड़े जिगर वाला ही ले सकता है.
=> अभी तो फाइटर प्लेन्स के इंजिन की कार्बन ही चेक की गई है.  
=> ये तो Try boll था। #वन्देमातरम्.
=> उरी के बाद अगली सुपरहिट मूवी होगी पुलवामा, और अगर फिर भी न सुधरे, तो फ़ाइनल फ़िल्म होगी "एक था पाकिस्तान"
=> पाकिस्तान के खिलाफ अभी तो शुरुआत है, हमको तो जमीन पूरा समतल चाहिए... अपने यहाँ के लड़के उधर जाकर क्रिकेट प्रैक्टिस करेंगे!
=> पाकिस्तान के तशरीफ पर भारतीय वायु सेना ने 1000किलो के पैलेट के निशान बनाए.
=> हम हिंदुस्तानी है 12 दिनों तक शोक रखते है.13 वे दिन काम पर लग जाते हैं.
=> अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे बहुत ठुकाई है. मोदी जी दिल खोल कर हमला करो, देश आपके साथ है.
=> जैसे राम इधर शबरी के जूठे बेर खा रहे थे -उधर रावण की लंका ढहा रहे थे, तैसे मोदी इधर चरण धो रहे थे, उधर पाकिस्तान की धुनाई.
=> आज तो बस #जय_छप्पन_इन्चेश्वर.
=> नया हिंदुस्तान है, घर में घुस के मारेगा, जय हिंद जय भारत.
=> उधर 72 हूरों के मैनेजर ने भारत को कड़ी आपत्ति जताई है।। उसका कहना है कि भारत ने बिना ऑर्डर दिए ज्यादा माल डिलीवर कर दिया गया अब इत्ती जल्दी इत्ती हूरों का इंतजाम हम कैसे करें।।
=> जय हिंद की सेना हमें तुम पर नाज़ है...देश को इसी का इंतज़ार था...भारतीय वायुसेना ने पहला कदम उठाया.  
=> भारत सरकार ने अपने रुख में बदलाव करते हुए डोजियर देने की जगह डोज देने की परंपरा शुरू कर दी है. 

पोस्ट लगातार आ रही हैं लोगों की. उत्साह बना रहे, जोश बना रहे, बस दुश्मन जिन्दा न रहे. आतंकी जिंदा न रहे. जय हिन्द. जय हिन्द की सेना.


26 नवंबर 2018

देश तो आज भी खतरे में हैं


आज से 10 वर्ष पहले 26 नवंबर 2008 को सिर्फ मुंबई नहीं दहली थी बल्कि पूरा देश दहल उठा था. चंद आतंकी शत्रु देश पाकिस्तान से जलमार्ग से आये और आते ही मौत बरसाने लगे. भारतीय सेना के, पुलिस के कुछ जांबाज़ लोगों के साथ-साथ कुछ जांबाज़ नागरिकों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए उन आतंकियों के मंसूबों को ध्वस्त किया. ये सब तो वो है जो परदे के सामने दिखाई दे रहा था. इसके उलट जो कुछ परदे के पीछे चल रहा था उसे ध्वस्त करने का काम किया एक मात्र अमर बलिदानी तुकाराम ओम्बले ने. उन्होंने अपनी जान देकर उन आतंकियों में से एक अजमल कसाब को जिंदा पकड़ लिया. सोचिये एक पल को यदि वह आतंकी जिंदा न पकड़ा जाता तो क्या होता? भगवा आतंकवाद की, हिन्दू आतंकियों की काल्पनिक अवधारणा पुष्ट होकर भारतीय धरा पर प्रकट होने को तैयार थी. इसके लिए हिन्दू-विरोधियों द्वारा पूरी स्क्रिप्ट तैयार कर ली गई थी. सबकी पहचान हिन्दू आतंकी के रूप में कराना था. इसके लिए किताबें तैयार थीं, लेख तैयार थे. इसका उदाहरण है हिन्दू-विरोधियों का पूरी बेशर्मी से इस आतंकी हमले पर एक पुस्तक का विमोचन. इसमें इस आतंकी हमले को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साजिश बताया गया. इस अवसर पर विपक्ष के दिग्गज नेता सहित कई मौलवी और राजनैतिक दल के नेता मौजूद थे.


यह एक ऐसा हमला था जो न केवल भारतीय अस्मिता पर किया गया था वरन सोची-समझी साजिश के तरह हिंदुत्व की अवधारणा पर किया गया था. ऐसा इसलिए भी क्योंकि उस मीडिया द्वारा जो उस खतरनाक समय में भी अपनी टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में हमारे सैनिकों की, कमांडो की स्थिति, पोजीशन को लाइव दिखाने में लगी थी, उसी मीडिया द्वारा लगातार कसाब को कलावा पहने दिखाया गया. उस बिकाऊ मीडिया द्वारा बार-बार, लगातार यही प्रयास होता रहा कि कहीं से भी एक सबूत हिन्दू-आतंकवाद के समर्थन में सामने आ जाये. फ़िलहाल ऐसा नहीं हुआ और तमाम सारे सबूतों के आधार पर सिद्ध भी हुआ कि उस आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ है. यह कितनी विद्रूप स्थिति है कि राजनैतिक आधार पर भले ही राजनैतिक दलों के, राजनीतिज्ञों के विभेद हों मगर यही विभेद देश के लिए बनाये जाने लगे हैं. एक राजनैतिक दल के नेता उसी पाकिस्तान में जाकर टीवी पर खुलेआम अपने देश के प्रधानमंत्री को हटाये जाने के लिए मदद मांगते दिखाई देते हैं. ऐसी हरकतों से न केवल उस देश की हिम्मत बढ़ेगी बल्कि आतंकियों के हौसले भी बढ़ेंगे.


आज उस हमले के एक दशक बाद भी भले ही हमारी सुरक्षा एजेंसियां कहती हों कि हम सुरक्षित हैं, भले ही हमारी सेना हम सभी को इसके लिए आश्वस्त करती हो कि हम सब सुरक्षित हैं, हमारा पुलिस प्रशासन भले ही हमारी सुरक्षा के दावे करता हो मगर अंदरूनी सत्य यह है कि मात्र सत्ता कि खातिर ये हिन्दू-विरोधी नेता कब क्या कर बैठें, इनका भरोसा नहीं. इनके लिए किसी न किसी रूप में हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा को पुष्ट करना है, भले ही इसके लिए देश को ही दाँव पर क्यों न लगाना पड़े. ऐसे में सोचने वाली बात है कि देश कैसे सुरक्षित है? देशवासी कैसे सुरक्षित हैं?

14 अप्रैल 2017

सैनिकों का मनोबल न गिरे, ध्यान रखना

किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं. 


जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है? 

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.   

01 नवंबर 2016

आतंकी का समर्थन दुर्भाग्यपूर्ण

जेल से भागे सिमी के आठ आतंकी दस घंटे के भीतर पुलिस द्वारा मार गिराए गए. जिस तेजी से मीडिया ने सिमी के आतंकी जेल से फरार की खबर देकर अपना काम किया उसी तेजी से उन आठों के मारे जाने की खबर नकारात्मक रूप में चलाकर पुलिस विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया. मीडिया के द्वारा उन आठों आतंकवादियों को उनके एनकाउन्टर के बाद मासूम और निरीह साबित किया जाने लगा, जिनको चंद घंटे पहले वो आतंकवादी घोषित किये था. देश भर में मीडिया, सोशल मीडिया पर मध्य प्रदेश पुलिस की इस कार्यवाही को लेकर बहस चलने लगी. अकारण आतंकवादियों के समर्थन में लोग जुटने शुरू हो गए. ऐसा महज इस कारण होने लगा क्योंकि मारे जाने वाले सारे आतंकी मुस्लिम समुदाय से थे और उनको मार गिराने वाली पुलिस भाजपा शासित प्रदेश की है. उन आठों आतंकियों के समर्थन में बुद्धिजीवियों का, नेताओं का, राजनैतिक दलों का इस तरह जुटना चिंताजनक है. ये उसी तरह से घातक है जिस तरह देश में काम करती आतंकियों की स्लीपर सेल घातक हैं. 


आठों आतंकी जिस तरह से जेल से भागे, जिस तरह से उन्होंने वहाँ के हवालदार की हत्या की, जिस तरह से इनमें से कुछ आतंकी इससे पूर्व भी अन्यत्र जेल से भागने में सफल रहे थे उससे स्पष्ट है कि वे न तो निर्दोष थे और न ही मासूम. विगत दिनों उन्हीं की तरफ से खुलेआम देश में तालिबान आने का, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या के नारे लगाये गए उससे भी उनके मंसूबे स्पष्ट हो रहे थे. ये कितना विडम्बनापूर्ण है कि यहाँ एक तरफ पुलिस की कार्यवाही की इस मामले में आलोचना की जाती है कि उसके द्वारा जिम्मेवारी को, दायित्व को सही ढंग से निर्वाह नहीं किया जाता है. अब जबकि किसी तरह से उनके द्वारा आठों फरार आतंकियों को ख़तम कर दिया गया है तो उसे फर्जी एनकाउन्टर का नाम देकर पुलिस का मनोबल गिराया जा रहा है. एक पल को मान लिया जाये कि पुलिस की तरफ से किसी भी तरह की मिली-भगत के बाद उन आठों आतंकियों को मारा गया. ऐसे में यहाँ सवाल उठता है कि यदि उन आठों आतंकियों को पकड़ा न गया होता और वे पुलिस की गिरफ्त से बच गए होते तो क्या देश में, समाज में सौहार्द्र बनाने का काम करते? यदि उनको जिन्दा पकड़ लिया गया होता और वापस जेल में डाल दिया गया होता तब वे किस तरह से कानून की मदद कर रहे होते?

यहाँ विगत में हुई इसी तरह की अन्य घटनाओं के सन्दर्भ में जाने की बजाय इस्मत जहाँ काण्ड को याद कर लेना काफी रहेगा. उसके मारे जाने पर भी संवैधानिक पद पर बैठे एक व्यक्ति ने उसे अपने प्रदेश की बेटी तक बता डाला था. कुछ इसी तरह से इन आठों आतंकियों के साथ हो रहा है. हवालदार को मारना सत्य है. जेल से भागना सत्य है. इनका सिमी से जुड़ा होना सत्य है. इनके द्वारा तालिबान के पक्ष में नारे लगाना सत्य है. इनका मारा जाना भी सत्य है. इस अंतिम सत्य में कथित जनों द्वारा फर्जी होने की शब्दावली जोड़कर इसे विवादित बनाया जा रहा है. एक पार्टी भाजपा, एक व्यक्ति मोदी के विरोध में स्तर इस हद तक नीचे गिर जायेगा ये कभी सोचा नहीं गया था. दुर्भाग्यपूर्ण है कि यहाँ एक आतंकी के मारे जाने पर उसके समर्थन में मानवाधिकार से लेकर सरकार, शासन, बुद्धिजीवी तक खड़े हो जाते हैं किन्तु एक हवालदार के मारे जाने पर, एक पुलिस वाले के मारे जाने पर किसी को उसकी सुधि नहीं होती है. समाज में जिस तरह से ऐसे माहौल का निर्माण किया जा रहा है उससे आने वाले दिनों में आतंकियों को यहाँ के ऐसे कथित लोगों पर गर्व होने लगेगा. ऐसे लोगों की आड़ में ही देश के भीतर सक्रिय स्लीपर सेल वारदातों को अंजाम देती रहती है. देश में शांति की चाह रखने वालों को, आतंकवाद का खात्मा होने की मंशा रखने वालों को ऐसे लोगों का खुलकर विरोध करना ही होगा.  

01 अक्टूबर 2016

युद्ध नहीं, बदला नहीं अपनी ताकत दिखाई है

आखिरकार भारतीय सेना द्वारा चिरप्रतीक्षित कदम उठाकर देश के दुश्मनों को खुली चुनौती दे दी है. पाक अधिकृत कश्मीर में दो से तीन किमी अन्दर तक घुसकर चालीस के आसपास आतंकियों को ढेर कर देने का, आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को मटियामेट कर देने का जांबाजी भरा कार्य उरी आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा पाकिस्‍तान के खिलाफ बड़ी कार्रवाई के रूप में सामने आया है. भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्‍मीर में घुसकर सर्जिकल स्‍ट्राइक किया है. इसके तुरन्त बाद मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशक ले. रणबीर सिंह ने इसकी जानकारी दी. सर्जिकल स्ट्राइक के तुरन्त बाद मीडिया के माध्यम से जानकारी देना खुली चुनौती ही है. पाकिस्तान की छुटपुट आतंकी घटनाओं को सेना के साथ-साथ समूचा देश अत्यंत संयम से सहन कर रहा था किन्तु उरी की आतंकी घटना के बाद से समूचे देश में गुस्से का ज्वार फूट पड़ा था. लोगों में केंद्र सरकार के विरुद्ध भी अविश्वास जैसा माहौल बनता नजर आने लगा था. समूचे देश के नागरिक सेना के समर्थन में खड़े होकर पाकिस्तानी आतंकवाद का अंतिम और एकमात्र विकल्प युद्ध को ही मान रहे थे.


पाकिस्तान के विरुद्ध नफरत भरे माहौल में, दुर्दांत आतंकी घटना के बाद भी केंद्र सरकार ने संयम से काम लेते हुए कूटनीति भरे कदमों को उठाने की समझदारी दिखाई. ये बात सभी लोग समझते हैं कि ऐसे में जबकि पाकिस्तान जैसा आतंक-पसंद देश परमाणु अस्त्रों से सुसज्जित है, युद्ध किसी भी रूप में अंतिम और तर्कपूर्ण कदम नहीं होगा. ऐसे में बलूचिस्तान का मुद्दा उठाना, पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मलेन में शामिल न होने का निर्णय, पाकिस्तान के साथ जल संधि पर पुनर्विचार किये जाने सम्बन्धी बैठक, पाकिस्तान को मोस्ट फेवरिट नेशन के दर्जा समाप्त करने सम्बन्धी विचार के बाद पाकिस्तान एकदम से बैकफुट पर दिखाई दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि इन कदमों के बाद ही उसके राजदूत का बयान आया कि जंग किसी मामले का हल नहीं. जम्मू-कश्मीर के लोगों को अपने भविष्य का फैसला करने के लिए बेहतर मौका मिलना चाहिए. अगर उन्हें लगता है कि वे भारत के साथ ज्यादा खुश हैं तो वे वहीं रहें, पाकिस्तान को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है.भारत के सार्क सम्मलेन में शामिल न होने के निर्णय के बाद अन्य कई देशों द्वारा इंकार किया जाना भारत की कूटनीति की जीत ही है और आज इसी तरह के युद्ध की आवश्यकता है. 


इस कूटनीतिक विजय के बीच भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक के द्वारा सम्पूर्ण देशवासियों को, शहीदों के परिजनों को ये सन्देश देने का काम किया है कि भारतीय सेना पडोसी देश की आतंकी घटनाओं को, हरकतों को सामान्य रूप से सहन करने वाली नहीं है. उसकी एक-एक हरकत का, एक-एक शहीद की शहादत का सटीक समय पर इसी तरह से बदला लिया जायेगा. सेना की ये कार्यवाही उन लोगों के लिए भी सन्देश है जो देश में रहकर भी देश-विरोधी ताकतों के हितार्थ बयान देते रहते हैं. यकीनन आज युद्ध अंतिम विकल्प नहीं है किन्तु भारतीय सेना ने आज जिस तरह से खुलेआम पाक समर्थित कश्मीर में कार्यवाही की है वह न सिर्फ आतंकियों के हौसलों को तोड़ेगी वरन झूठा अहंकार पाले पाकिस्तान को भी सबक सिखाएगी. उरी आतंकी घटना के बाद से, पाकिस्तान की तमाम नापाक हरकतों के बाद भी केंद्र सरकार के संयम दिखाने, सेना के धैर्य दिखाने पर देश का नायक, सेना के नायक बधाई के पात्र हैं. भविष्य की समस्त रणनीति, कूटनीति में उनकी विजय की शुभकामनाओं सहित जय हिन्द, जय हिन्द की सेना.

17 जुलाई 2016

प्रातःस्मरणीय आतंकियों से एक निवेदन

सम्मानित, महान और प्रातःस्मरणीय आतंकवादियो,
सादर नमन

आपके द्वारा आतंक फ़ैलाने के लिए, लोगों को मारने के लिए, समाज में दहशत फ़ैलाने के लिए किये जा रहे नित नए प्रयोग को देखते हुए मन हो उठा आपको सम्मानित कहने का, महान कहने का. आपने बम, बंदूकों, राकेट लोंचर आदि का प्रयोग करने के साथ-साथ आत्मघाती दस्तों का भी बड़ी सुन्दरता से प्रयोग किया है. आपके द्वारा कारों, साईकिलों, टिफिन बॉक्स आदि का धमाकेदार उपयोग पूर्व में लगातार किया जाता रहा है किन्तु जिस तरह से आपने हवाई जहाज का और हाल ही में ट्रक का इस्तेमाल किया वो अतुलनीय है, वन्दनीय है. आपकी इसी अद्भुतधर्मिता ने हमें आपका कायल बना दिया. आतंक फ़ैलाने के लिए नए-नए तरीकों की खोज करने में, ऐसे-ऐसे तरीकों को अपनाने में जिनके बारे में सुरक्षा एजेंसियां सोच भी न पायें, आम आदमी समझ भी न पाए, आपका जवाब नहीं. आपके इसी अंदाज़ से प्रभावित होकर, आपकी आत्मघाती जीवटता के चलते ही आपको सम्मानित, महान और प्रातःस्मरणीय से संबोधित किया जा रहा है. इसमें आप या आपके समर्थक कहीं कोई कनेक्शन न ढूंड़ने लगिएगा क्योंकि आप लोग भले ही कोई कनेक्शन न सोचें पर आपके प्रति घनघोर श्रद्धा-भक्ति रखने वाले आपके पैरोकार और किसी के परम चाटुकार अवश्य ही कोई कनेक्शन खोज निकालेंगे.

बहरहाल, आपको अवगत कराना है कि आप सम्पूर्ण विश्व में आतंक का अत्याधुनिक प्रयोग अमल में ला रहे हैं किन्तु हमारे देश में वही सदियों पुराने तरीके. ये भेदभाव हमारे देश में रह रहे आपके समर्थकों को कतई मंजूर नहीं. यही कारण है कि आपके एक गुर्गे को हमारी सेना द्वारा हूरों के पास भेजे जाने के बाद से आपके कथित समर्थक बौराए घूम रहे हैं. आपसे कुछ निवेदन है कि आप बेधड़क होकर अपना धमाकेदार कार्यक्रम देश में कहीं भी अंजाम दें किन्तु उसमें अत्याधुनिक शैली का प्रयोग हो. वैसे तो आप लोगों के पास सम्पूर्ण विश्व में घूमने और पटाखे फोड़ने की आज़ादी है पर हमारे भारत देश में अब ये और भी सहज-सुलभ हो गया है. नाहक ही आप लोग इतनी सुबह, कभी देर रात काम करते हैं; कभी इतनी हड़बड़ी में होते हैं कि कई-कई बम बिना फूटे ही रह जाते हैं; कभी महीनों हो जाते हैं और आप लोग पटाखों की आवाज़ हम लोगों को नहीं सुनवाते हैं. हम आपको अब विश्वास दिलाना चाहते हैं कि आपके रास्ते यहाँ बहुत आसान हैं.

१ - यहाँ आपके संगठन के अलावा और भी बहुत से लोग हैं जो आपके लिए पलक-पाँवड़े बिछाए रहते हैं. किसी के लिए आप माननीय होते हैं, तो किसी के लिए आप लोग बेटी-भाई होते हैं, किसी की आँखें आपके एनकाउंटर पर जार-जार रोती हैं.

हमारे देश के राष्ट्रीय स्तर के बहुत से नेता ऐसे हैं, जिनकी आँखों में आपके प्रति विशेष स्नेह है. वे आपके रूप में हमारे देश के नागरिकों को वोट-बैंक के रूप में स्थापित कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं. अपने वोट-बैंक को साधने के लिए वे कभी भी खुलकर आपके खिलाफ बोलने की जहमत ही नहीं उठा सकते, कार्यवाही क्या खाक करेंगे.

अब हमारे नेतागण एक कदम और आगे आ गए हैं. वे चाटुकारिता की हद से आगे निकल कर बजाय कोई ठोस कार्यवाही करने के आतंकियों के कनेक्शन निकालने लगे हैं; रिश्तेदारी बताने लगे हैं. कोई बेटी हो जाती है, कोई शांतिदूत बन जाता है, कोई मासूम नजर आता है. अब ऐसे में काहे का डरना, आओ आराम से और निपटा कर चले जाओ.

एक बात और, अब बेधड़क, खुलेआम घूमो, अब कोई आपके बारे में एलर्ट जारी करने की, पूर्व-सूचना देने की हिम्मत ही नहीं करेगा. अब यहाँ की राजनीति के चपेटे में सुरक्षा एजेंसियां भी आ गईं हैं. कोई एक के ऊपर हाथ रखे है, कोई दूसरी को अपने पिंजरे में पाले है, कोई खुद को लावारिस सा समझ रही है. अब जब पूर्व-सूचना को गलत बताया जाता है, किसी भी तरह की पकड़ा-धकड़ी पर उसे जबरन हस्तक्षेप बताया जाता है तो कोई काहे को सूचनाओं को एकत्र करेगा.

हाँ, अब यहाँ मरने का खौफ लेकर तो बिलकुल न आना. पहली बात तो कोई पकड़ने वाला या मारने वाला ही नहीं क्योंकि यहाँ सुरक्षा तंत्र तभी प्रभावी होता है जब उसे आलाकमान से आदेश मिलता है और आज के दौर में आलाकमान अपना वोट-बैंक देखती है. अब मान लो मुठभेड़ हो भी गई तो पहले तो ये पकड़ने का काम करते हैं, सबूतों को एकत्र करने के लिए (पता नहीं आचार रखते हैं क्या?) यदि पकड़ गए तो दस-पंद्रह वर्ष आराम से बिरयानी खाना, मौका लग जाए तो कहीं से चुनाव लड़ने का भी जुगाड़ भिड़ा लेना. कहीं धोखे में यदि मार डाला गया तो संभव है कि आपके घर-परिवार वालों को आर्थिक मदद मिल जाए क्योंकि यहाँ ये साबित करने वाले भी बहुत हैं कि आपको फ़र्ज़ी एनकाउंटर में मारा गया.

हम जानते हैं कि आप लोग तो मजहब के नाम पर अपने आपको कुर्बान कर रहे हो; जिहाद कर रहे हो. वैसे ये सही किया, अभी तक इधर-उधर छुटपुट बम फोड़ने से, हिन्दू धर्म-स्थलों पर धमाके करने से आप लोगों की कोई पहचान थोड़े बन रही थी बल्कि यहाँ के चाटुकार नेताओं ने आप लोगों का प्रतिद्वंद्वी भगवा आतंकवादऔर खड़ा कर दिया था. आपके धमाके से लोगों को, चाटुकारों को भी लगना चाहिए कि आपने धर्म पर हमला किया है, संस्कृति पर हमला किया है. ये आपके लिए गौरव की बात है.

७ – आप लोगों की पहचान अब वैश्विक स्तर पर भी बन चुकी है. पहले तो आपके इतने मेहनतकश प्रयासों को भारत-पाकिस्तान का अंदरूनी मामला बता दिया जाता था. अब जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर आपने अपने कार्यक्रमों को आयोजित करना शुरू किया, जैसे-जैसे विभिन्न तरीकों से लोगों को मौत देना शुरू की, उनको भी समझ आने लगा कि आप किसी एक-दो देश की परिधि में नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व में छा जाने वाला प्रभाव रखते हैं.

तो फिर आप सब निसंकोच, बेधड़क, निर्द्वंद्व होकर अपने पटाखे बनाओ और फोड़ते रहो. ट्रक, कर, हवाईजहाज का भी प्रयोग करो. चिंता न करो, यहाँ क्या है, अत्यधिक जनसँख्या है..कुछ सैकड़े मर भी गए तो कौन सा तूफ़ान आ जायेगा. बस नेताओं को न मार डालना क्योंकि वे तो देश चलाते हैं, वे मर गए तो देश कौन चलाएगा?


आपको नमन करता आपका शुभचिंतक