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08 जुलाई 2025

इसे दोस्ती नहीं कहते यारो!

फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स, इस आधुनिक शब्दावली से आप परिचित हैं? संभवतः नहीं ही होंगे किन्तु युवा वर्ग इससे अवश्य ही परिचित होगा. दरअसल विगत वर्षों में समाज ने जिस तेजी से विकास किया है, नवीनतम तकनीकी को अपनाया है उसी तेजी से उसने आधुनिक जीवनशैली को अपनाया है, उनके परिदृश्य में अपना विकास किया है. इस विकास को अपनाने में सर्वाधिक सक्रियता युवाओं ने, विशेष रूप से विषमलिंगी युवा जोड़ों ने दिखाई है. जिसके चलते समाज की प्रचलित, बंधी-बंधाई सी परिभाषाओं, शब्दावलियों से अलग इस तरह की नवीन अवधारणाओं जन्म होता रहता है. इस तरह की नवीन जीवनशैली ने, नवीन रिश्तों ने तमाम सारे सामाजिक, पारिवारिक बंधनों को, मान्यताओं को नकारते हुए अपनी ही मान्यताएँ, अपने ही जीवन-मूल्य स्थापित किये हैं.

 

इन नवीन परिभाषाओं, मान्यताओं ने न केवल ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ बदला है बल्कि रिश्तों का, संबंधों का स्वरूप भी परिवर्तित किया है. इस तरह की मान्यताओं को संस्कृति, सभ्यता, जीवन-मूल्य आदि के सापेक्ष देखने के स्थान पर तात्कालिक आवश्यकता, क्षणिक सामाजिक अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स में दोस्ती का सन्दर्भ दो विषमलिंगियों के आपस में मिलने से है. यह एक ऐसा रिश्ता है जिसमें दो विषमलिंगी बिना किसी प्रतिबद्धता के, शारीरिक रूप से अंतरंग होते हैं. यहाँ आपसी सम्बन्ध का नाम दोस्ती होता है मगर यह दोस्ती उस रूप में नहीं होती जो प्रतिबद्धता की बात करे. एक-दूसरे के प्रति समर्पण, विश्वास का भाव रखे. इस हाथ दे, उस हाथ ले वाली बात यहाँ लागू होती है और यहीं से आरम्भ होती है बेनिफिट्स वाली अवधारणा. यहाँ रिश्तों की बुनियाद आपसी शर्तों के आधार पर काम करती है जहाँ भावनाओं का कोई मोल नहीं. वर्तमान आर्थिक, भोगवादी मानसिकता में जहाँ अकेलापन हैकाम का असीमित बोझ हैकार्य-स्वरूप में अनियमितता है वहाँ इस तरह के सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से बनते देखे जाते हैं. सहजता से कुछ भी कहीं भी मिल जाने की स्थिति ने इस प्रकार के रिश्तों को और भी तवज्जो दी है. किसी के सामने कोई जिम्मेदारी वाला भाव नहीं. माँग और आपूर्ति का सिद्धान्त यहाँ पूरी तरह से लागू होता है.

 



ऐसे रिश्तों की गहराई में जाकर देखना होगा कि हम जिस समाज की कल्पना कर रहे हैं वह किस प्रकार के रिश्तों से बनता हैयह सार्वभौम सत्य है कि आज के युग में परिवारों के टूटने का चलन तेजी से बढ़ा है. लड़के और लड़कियों में कार्य करने कीघर से बाहर रह कर कैरियर बनाने की मानसिकता में अन्य जरूरतों के साथ-साथ शरीर ने भी अपनी जरूरत के अनुसार रिश्तों को स्वीकारना सीखा है. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स को वह युवा वर्ग, जिसकी ये जरूरत है स्वीकार चुका है क्योंकि समाज का यह वर्ग आज प्रत्येक कार्य के ऊपर सेक्स को महत्व दे रहा है. इनकी स्वच्छंद सोच पर उनके अभिभावकों का नियंत्रणसमाज का नियंत्रण दकियानूसी समझा जाने लगा है. जल्द से जल्द अपने आपको सफलता के मुकाम पर ले जानेआधुनिकता के नाम पर कुछ भी करने को स्वतंत्रता मान लेने की मानसिकता ने युवाओं को एक प्रकार की अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. इस दौड़ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैकेजवैश्वीकरण की रंगीन मानसिकताबाँहों में विपरीतलिंगी साथी, सड़क पर बेतहाशा दौड़ते वाहनधन का अंधाधुंध दुरुपयोग आदि उत्प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं.

 

युवा वर्ग जिसे समूचा विश्व मुट्ठी में बंद दिखता हैएक क्लिक पर समूची दुनिया उन्हें अपने सामने खड़ी दिखाई पड़ती हैऐसे में वह अपने को किसी से भी कमतर नहीं समझता है. इसमें युवा कहाँ जाकर स्वयं को नियंत्रित करेगा; आर्थिक प्राथमिकता के दौर में नैतिक पतन को कौन सँभालेगा, कहा नहीं जा सकता. आज का युवा पूरी तरह से स्वतंत्रता पाने को लालायित है. अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति, भले ही किसी भी तरह से हो, करने के लिए उत्साहित है. स्वतंत्रता के नाम पर, अभिव्यक्ति के नाम पर उच्छृंखलता, उन्मुक्तता को ज़िन्दगी का मूल समझ कर युवा कभी वन नाईट स्टैंड की, कभी लिव-इन रिलेशन की, कभी लिविंग टुगेदर की, कभी फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स की मरीचिका में भटकता रहता है. यहाँ इस तरह के संबंधों को, ऐसी दोस्ती को महत्त्व देने वाले युवा जोड़ों को संबंधों की, रिश्तों की भावना को समझना होगा. ऐसे सम्बन्ध क्षणिक संतुष्टि देते भले प्रतीत हों मगर अपनत्व के अभाव में इनके पार्श्व में संतुष्टि नहीं होती है, गम्भीरता नहीं होती है.

 

ऐसे रिश्ते को प्राथमिकता देने वाले युवा जोड़ों को दोस्ती का, दोस्त का, शारीरिक सम्बन्धों का अर्थ और सन्दर्भ समझना होगा. यदि दो विषमलिंगी दोस्ती करना चाहते हैं तो उसके लिए आवश्यक है कि वे इस तरह के रिश्ते को पूरी गरिमा के साथ समझें. दोस्ती का तात्पर्य उन दोनों लोगों के लिए क्या है, इस समझ और स्वीकृति के साथ रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहिए. दो विषमलिंगी मित्रों को यह समझना होगा दोस्तों के बीच अंतरंगता का अर्थ सिर्फ शारीरिक संबंध ही नहीं हैं. मित्र की इच्छाओं, उसकी आवश्यकताओं को जानना-पहचानना भी महत्वपूर्ण है और इसके लिए खुला संवाद, भावनात्मक समर्थन, निस्वार्थ सहयोग प्रदान करना भी एक तरह की अंतरंगता है. दोस्ती, प्यार, शारीरिक सम्बन्ध आदि के मायने समझते हुए दोस्ती को, दोस्त को फ़िल्मी फूहड़पन से बचाए जाने की आवश्यकता है. दोस्ती को लाभ के लिए न करें, दोस्त लाभ के लिए न बनाएँ अर्थात दोस्ती में स्वार्थ या व्यक्तिगत लाभ के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. यह एक अनमोल रिश्ता है जो बिना किसी शर्त के विश्वास, प्यार और सहयोग पर आधारित होना चाहिए. ध्यान रखें, दोस्त मुश्किल समय में साथ देने वाले होते हैं. प्रोत्साहित करने वाले, बेहतर इंसान बनाने वाले होते हैं. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स कुछ भी हो सकते हों मगर फ्रेंड नहीं हो सकते.


09 जून 2025

मानसिकता के संक्रमणकाल में समाज

हत्या तो हत्या है और जिसने भी की है उसे सजा मिलनी ही चाहिए. यह केवल किसी क्रिया की प्रतिक्रिया देना मात्र नहीं होता बल्कि एक हँसते-खेलते इन्सान को हमेशा के लिए शांत कर देना होता है. एक परिवार को ज़िन्दगी भर के लिए न भरने वाला घाव देना होता है. समाज के बीच खुद हत्यारे के परिवार को भी शर्मिंदगी से जीवन गुजारने की सजा देना होता है. अभी हाल के चर्चित राजा-सोनम रघुवंशी मामले में इंदौर के इस नवदम्पत्ति जोड़े के अचानक से गायब हो जाने की खबर के बाद पति राजा का शव मिलना और पत्नी सोनम का गायब होना शासन-प्रशासन पर, मेघालय के पर्यटन पर, पर्यटकों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहा था. राजा की लाश मिलने के सत्रह दिन बाद अचानक से सोनम पुलिस को मिली. उसकी गिरफ्तारी हुई अथवा उसने आत्मसमर्पण किया, ये बाद की बात है. उसी के ऊपर अपने पति की हत्या करवाने का शक जताया जा रहा है,  हत्या उसी ने की या करवाई इस बारे में अंतिम सत्य तो बाद में पता चलेगा मगर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे समाज, परिवार, विवाह संस्था रसातल में पहुँचने ही वाले हैं. मीडिया, सोशल मीडिया में इस तरह से बयानबाजी हो रही है मानो पति-पत्नी संबंधों में हत्या जैसा ये पहला और आश्चर्यजनक मामला हो.

 



इस एक घटना के साथ कुछ महीने पहले हुए नीले ड्रम कांड को, पॉलीथीन में पति के टुकड़े भरने वाले कांड को जोड़ा जा रहा है. पुरुष समाज को, पतियों को एकदम से डर के साये में देखा जाने लगा है. ऐसा लगने लगा है जैसे कि हर पत्नी हत्यारिन हो और हर पति तलवार-चाकू की नोंक पर. सोचिएगा एक पल को कि इस घटना से सारा समाज सदमे में क्यों है? क्या इसलिए कि पत्नियाँ अब पतियों की हत्या करने-करवाने लगीं? क्या इसलिए कि महिलाओं ने इस हत्याकारी क्षेत्र में पुरुषों/पतियों के एकाधिकार पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया? क्या इसलिए कि पत्नी के रूप में एक महिला का इस तरह का स्वरूप समाज ने इक्कीसवीं सदी में भी नहीं सोचा था? कहीं इसलिए तो सदमे जैसी स्थिति नहीं कि एक सेक्स सिम्बल के रूप में, एक उत्पाद के रूप में, विज्ञापन के लिए नग्न-अर्धनग्न अवस्था में सुलभ रूप में समझ आने वाली आधुनिक महिला अब साजिश रचती, हत्या करती-करवाती नजर आने लगी है? इस छवि में भी आश्चर्य कैसा, सदमा कैसा? टीवी के माध्यम से ऐसी स्त्रियाँ पहले ही आपके घर में, आपके बेडरूम में, आपके बच्चों के बीच स्थापित हो चुकी हैं. इन तथाकथित आधुनिक जीवन-शैली जीने वाली महिलाओं को करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार करने के साथ-साथ साजिश रचते भी दिखाया जाता है. परिवार में विखंडन करवाती इस धारावाहिक स्त्री को बाहर हत्या करते, हत्या की साजिश रचते भी दिखाया जा रहा है. आखिर इस क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही है.

 

यदि समाज इस कारण सदमे में है कि एक महिला सामान्य भाव से, बिना किसी घबराहट-भय के एक हत्याकांड में शामिल है तो गौर करिएगा, ससुराल में एक बहू-पत्नी की हत्या में पति रूपी पुरुष के साथ सास, जेठानी, ननद जैसी स्त्रियाँ भी शामिल रही हैं. एक महिला को जलाते समय, उसका गला घोंटते समय जब एक महिला के रूप में उनके हाथ नहीं काँपे तो फिर सोनम के हत्यारी होने की आशंका पर इतनी हलचल क्यों? वैसे यहाँ याद रखने वाली एक बात ये भी है कि इसी देश में बरसों तक जन्मी-अजन्मी बेटियों को मौत की नींद में सुलाने वाले हाथों में ज्यादातर हाथ महिलाओं के ही रहे हैं. हाँ, एक सत्य ये अवश्य है कि पिछले कुछ सालों में ख़ुद महिलाओं ने ही महिलाओं के पक्ष में बने क़ानूनों का जिस तरह दुरुपयोग किया है, उससे आज जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ, पारिवारिक-सामाजिक दायित्व-बोध को समझने वाली महिलाओं ने भी ऐसी महिलाओं का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया है.

 

समाज की बहुतायत महिलाओं का ऐसी हत्यारी महिलाओं के विरोध में खड़े होने का कारण समाज में व्याप्त सकारात्मकता का होना है. देखा जाये तो समाज कई-कई मानसिकता वालों से, अनेक प्रकार की मनोदशा वालों से मिलकर संचालित होता है. समाज में दोनों तरह के स्त्री और पुरुष हैं. हत्यारी मानसिकता स्त्री और पुरुष दोनों में है, संस्कारी मानसिकता भी दोनों में है. ऐसा नहीं है कि समाज के सभी स्त्री और पुरुष समाज का भला करते घूम रहे हों, उनमें कोई बुराई न हो और ऐसा भी नहीं है कि समाज में स्त्री-पुरुष सिर्फ हत्या, साजिश ही करने में लगे हों. स्व-मानसिक स्थिति के चलते इन्सान अपने क़दमों को उठाता है और घटना को अंजाम देता है. ये और बात है कि इंटरनेट की, रील की, आधुनिकता की चकाचौंध में रची-बसी दुनिया ने संस्कारों को, संस्कृति को, जीवन-मूल्यों को, परिवार को, समाज को, यहाँ के व्यवस्थित ताने-बाने को तिलांजलि दे दी है. संबंधों का, रिश्तों का कोई मोल अब जैसे दिखता ही नहीं है. आधुनिकता के चक्कर में सिर्फ और सिर्फ विखंडन, ध्वंस, परित्याग आदि ही देखने को मिल रहा है. ऐसी मानसिकता के बीच भी यदि सामाजिक संरचना की, पारिवारिक ढाँचे की, विवाह संस्था की परवाह करने वाले लोग हैं, महिलाएँ हैं, पुरुष हैं तो निश्चित रूप से परिदृश्य अभी पूरी तरह से काला नहीं हुआ है, पूरी तरह से अंधकारमय नहीं हुआ है. रौशनी की एक सम्भावना अभी भी है. अब इस सम्भावना में रील की इस आभासी दुनिया में झूमते मम्मी-पापा-बच्चों को तय करना होगा कि वे किस तरह की मानसिकता के इंसान बनना चाहते हैं. किस तरह की मानसिकता का समाज बनाना चाहते हैं.

 


21 मई 2025

चाय की एक प्याली से बने रिश्ते की मिठास

1990 की बात है जबकि स्नातक की पढ़ाई हेतु ग्वालियर के साइंस कॉलेज में एडमिशन लिया और रहने के लिए आशियाना बनाया इसी कॉलेज के हॉस्टल को. प्रवेश की सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद अगस्त महीने में स्वतंत्रता दिवस के एक-दो दिन पहले हॉस्टल में अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर आ गए. पहली मंजिल पर मिला कमरा नंबर 11. पिताजी के अभिन्न परिचित सदस्य के बेटे राजीव त्रिपाठी हमारे रूम-मेट थे. राजीव का उरई से ही होने के कारण किसी अनजाने मित्र के साथ कमरे में रहने का डर-भय समाप्त हो चुका था.

 

यहाँ तक एक परिचय हॉस्टल के आरम्भिक दिनों से. पोस्ट का असल विषय तो ये है कि हॉस्टल के दिनों में चाय के कारण एक ऐसा रिश्ता बन गया जो कभी सोचा नहीं था. आज इस पोस्ट को लिखने का कारण भी यही है कि आज 21 मई को अन्तर्राष्ट्रीय चाय दिवस है और ऐसे में मन में आया कि चाय की और कोई महत्ता हो या न हो मगर हमारे लिए एक महत्ता ये है कि एक रिश्ता चाय के कारण बना जो आज भी पूरी गरिमा और स्नेह के साथ चल रहा है.

 

हॉस्टल में रहते हुए करीब दो महीने हो गए थे. रैगिंग जैसी किसी डरावनी चीज से हॉस्टल का नाता नहीं था बल्कि हम सभी छात्रों में आपस में बड़े-छोटे का नाता था. यहाँ सर या किसी और औपचारिक सम्बोधन के स्थान पर अपने से बड़ों को भाईसाहब कहने का चलन था. हॉस्टल का माहौल भी पूरी तरह से पारिवारिक था. न तो किसी कमरे में कोई ताला लगाता था और न ही किसी सामान में ताला लगा मिलता था. ऐसा लगता था जैसे सभी सामान एक-दूसरे का है. सभी के बीच आपस में कोई औपचारिकता नहीं. मैस में खाना खाते समय एक-दूसरे के सामान का उपयोग करना हो अथवा अन्य किसी वस्तु का उपयोग, कहीं कोई संकोच नहीं हुआ करता था.

 

बाँए से - अक्षय भाईसाहब, हम, राकेश भाईसाहब (हॉस्टल के दिन-बलवंत भैया पहाड़ी पर-1991)

हॉस्टल के उन दिनों में कैसे अचानक से चाय पीने की आदत लग गई, पता नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि जितना याद आ रहा है, चाय पीने की आदत जैसी इंटरमीडिएट तक नहीं पड़ी थी उस समय तक सामान्य ढंग से जितनी चाय एक दिन में पीने को मिलती थी, उतनी ही पी जाती थी. इधर हॉस्टल में रहने के कारण चाय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं रहा सो खूब चाय पी जाने लगी. उस समय हॉस्टल में कई लोग थे जो चाय पीते थे मगर एक-दो लोग ही थे जो हॉस्टल में चाय बनाने की व्यवस्था किये थे. ऐसे एक-दो लोगों में एक हम थे, जिनके पास चाय से सम्बंधित समस्त सामग्री चौबीस घंटे उपलब्ध रहती थी. हमारे कमरे की कभी-कभी की बैठकी में कुछ मित्र, कुछ भाईसाहब के चाय का शौक पूरा हो जाया करता था.

 

उन्हीं दिनों हॉस्टल में कुछ नए साथियों का आना हुआ. शायद इसे ही संयोग कहा जायेगा या फिर पूर्व-निर्धारित लिखित विधि का विधान कि कई-कई नए सदस्यों के आने के बीच में दो लोगों से अनायास ही आकर्षण वाला परिचय हुआ, जैसे स्वतः ही. एक अक्षय कटोच भाईसाहब से और दूसरा नवीन शर्मा से. अक्षय भाईसाहब हमसे एक क्लास आगे थे और नवीन हमारे ही साथ. दो-चार दिनों की सामान्य मुलाकातों के बाद एक दिन मैस से रात का खाना खाकर निकलने पर अक्षय भाईसाहब ने रोका और बोले क्यों चिंटू, सुना है तुम अपने कमरे पर चाय बनाते हो? एकबारगी लगा कि कहीं ये कोई अपराध तो नहीं जो हमारे सीनियर द्वारा ऐसा सवाल किया गया मगर अगले ही पल खुद को संयमित करते हुए संक्षिप्त सा जवाब दिया, जी. ठीक है, जब रात में बनाओ तो एक कप हमें भी पिला दिया करना, अक्षय भाईसाहब का स्नेहिल आदेश हम तक आया और अक्षय भाईसाहब ग्राउंड फ्लोर के अपने कमरा नंबर 29 की तरफ चल दिए.

 

उसी रात को चाय बनाकर एक गिलास में चाय 11 नंबर कमरे से 29 नंबर कमरे तक जाती. ये क्रम लगभग हफ्ते-दस दिन चला कि एक दिन अक्षय भाईसाहब ने कहा कि क्यों अपने कमरे में अकेले चाय के लिए परेशान होते हो. यहीं आ जाया करो, सब लोग इकट्ठे चाय पिया करेंगे. उनका इकट्ठे चाय पीने के बारे में उनका खुद के साथ-साथ नवीन और राकेश शर्मा भाईसाहब की तरफ इशारा करना था. उसी रात जब चाय के लिए अक्षय भाईसाहब के कमरे में जाना हुआ तो चाय के सारे सामान के साथ उनका रूम भी सुसज्जित हमारा इंतजार कर रहा था. समय के साथ चाय, खाना-पीना, पढ़ाई, कॉलेज, बाजार आदि जाना एकसाथ होने लगा.

 



अक्षय भाईसाहब द्वारा उन्हीं दिनों कुछ बातें बहुत ही स्पष्ट रूप से समझाई गईं, जैसे कोई बड़ा समझाता है उसका सुखद परिणाम ये है कि आज हॉस्टल छोड़े हुए अक्षय भाईसाहब को 33 वर्ष और हमें 32 वर्ष हो गए हैं मगर हमारे और उनके बीच एक चाय के साथ बना बड़े-छोटे भाई का रिश्ता आज तक पूरी ईमानदारी, पावनता के साथ चल रहा है. भाभी का स्नेह भी हमे उसी तरह से मिलता है जैसे किसी देवर को मिलता होगा. अक्षय भाईसाहब को लेकर हमारे और भाभी के बीच में खूब मजाक होता है. अक्सर सामने होने पर भाईसाहब बस ख़ामोशी से हँसते हुए इधर-उधर हो लेते हैं.

 

वाकई सोच में, मानसिकता में, व्यवहार में, बर्ताव में यदि ईमानदारी है, निष्ठा हो, स्नेह हो, आदर हो तो एक प्याली चाय के साथ बने संबंधों में, रिश्तों में मिठास सालों-साल बनी रहती है.


22 मार्च 2025

कामुकता, नग्नता का बाज़ार न बन जाये ये समाज

अवैध संबंधों में बाधक बनती पत्नी की हत्या कर लाश को ब्रीफकेस में भरा, प्रेमी के साथ मिलकर पत्नी ने पति की हत्या कर लाश के टुकड़े-टुकड़े करके ड्रम में छिपाया, रील बनाने से मना करने पर माँ ने बेटे की हत्या कर दी, आपत्तिजनक स्थिति में देख लेने पर बेटे ने माँ-बाप को मौत के घाट उतारा जैसी अनेक खबरों से नित्य ही हम सबका सामना होता है. ये दो-चार पंक्तियाँ बानगी हैं आज के समाज की जहाँ ऐसा लग रहा है कि न तो रिश्तों का कोई महत्त्व रह गया है और न ही मर्यादा का कोई स्थान बचा है. बहुसंख्यक लोगों की आँखों से शर्म-लिहाज पूरी तरह से समाप्त हो गई है. ऐसे लोगों द्वारा सगे रक्त-सम्बन्धियों के साथ, अपने परिजनों के साथ दुराचार करने, उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने का अपराध सहज रूप में किया जाने लगा है. ऐसा महसूस होने लगा है जैसे लोगों के लिए शारीरिकता का, यौन संबंधों का ही महत्त्व रह गया है. उनके लिए जीवन की पूर्णता यौन संतुष्टि प्राप्त करने में ही है. 


समाज का बौद्धिक वर्ग आये दिन ऐसी घटनाओं पर मंचों के माध्यम से, सोशल मीडिया के द्वारा चर्चा कर लेता है किन्तु इसके मूल में जाने का, उसके समाधान का प्रयास नहीं करता है. गौर करिए इक्कीसवीं सदी के आरम्भ होने के कुछ वर्ष पूर्व से ही, जबकि आधुनिकता, वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण शब्द सामाजिक आसमान पर तैरने में लगे थे. कालांतर में विकास के नाम पर चली आई तकनीकी क्रांति ने, मोबाइल क्रांति ने समूचे सामाजिक ढाँचे को हिला कर रख दिया. स्त्री-पुरुष संबंधों, पति-पत्नी के आंतरिक संबंधों की गोपनीयता एकदम से फटकर परदे से बाहर आ गई. आधुनिकता के नाम पर, पश्चिमीकरण के नाम पर, वैश्वीकरण के नाम पर नग्नता को, अश्लीलता को, यौन-संबंध को, दैहिक आकर्षण को प्रमुखता दी जाने लगी. किसी समय पारिवारिक नियोजन के लिए अपनाए गए निरोध का परिवर्तनीय उपयोग अवैध संबंधों में अनचाहे गर्भ से बचने के लिए, एचआईवी से सुरक्षित रहने के लिए होने लगा. उस सुरक्षित समझे जाने वाले उपाय के शालीन, शर्म भरे विज्ञापन उन्मुक्त, कामपिपासु मानसिकता का प्रदर्शन करते दिखने लगे.




दैहिक उन्मुक्तता का, वैचारिक फूहड़ता का, कामुकता का चित्रण इसी एक कदम के रूप में सामने नहीं आया बल्कि बहुसंख्यक विज्ञापनों में नजर आने लगा. उत्पाद स्त्रियों का हो या फिर पुरुषों का, वृद्धजनों का हो या फिर बच्चों का, घरेलू सामान हो या फिर पूजा की सामग्री, वस्त्र हों या फिर अधोवस्त्र, शैक्षिक सामग्री हो या फिर सौन्दर्य प्रसाधन सभी के किसी न किसी रूप में स्त्रियों की कामुक, अर्धनग्न छवि को उकेरा जाने लगा. इनके अलावा लाइव शो हों, कॉमेडी शो हो, संगीत का कार्यक्रम हो, बच्चों की नृत्य प्रस्तुति हो ये सब भी द्विअर्थी संवाधों, फूहड़ भाव-भंगिमा का प्रदर्शन करने लगे. ऐसा लगने लगा कि बिना सेक्स के, बिना यौनेच्छा के व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है. इस मानसिकता को और अधिक विकृत बनाने के लिए स्मार्टफोन, इंटरनेट का साथ मिल गया. अब हर हाथ में समूची दुनिया घूम रही थी. बच्चे उम्र के बहुत पहले ही स्त्री-पुरुष देह के अगोपन को गोपन कर रहे थे. बंद कमरे से भीतर पति-पत्नी के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त संबंधों की दैहिक क्रिया को शिक्षण संस्थानों, पार्कों, खेतों आदि के सुनसान में क्रियान्वित किया जाने लगा. इस उच्छृंखल, अशालीन, अमर्यादित जीवन-शैली ने न केवल विवाह संस्था को कमजोर किया बल्कि समूची सामाजिक, पारिवारिक संरचना को ही ध्वस्त सा कर दिया.


परिवार में आपस में ही अविश्वास का माहौल दिखाई देने लगा. आपसी संबंधों में भी संदेह नजर आने लगा. रिश्तों की मर्यादा को तिलांजलि सी दे दी गई. संस्कारों का कहीं अंतिम संस्कार सा कर दिया गया. बहुतेरी सामाजिक गतिविधियाँ देह के इर्द-गिर्द ही घूमने लगीं. वैवाहिक समारोह में संगीत समारोह के नाम पर नग्नता, फूहड़ता ठुमके लगाने लगी तो खेलों में चियर्स लीडर के नाम पर दैहिक प्रदर्शन को थिरकने का अवसर दिया जाने लगा. सोचने वाली बात है कि समाज में देह, यौन सम्बन्ध को केन्द्र-बिन्दु कब, कैसे और क्यों बनाया जाने लगा? क्यों प्रतिभा को शारीरिक आकर्षण के पीछे धकेल दिया गया? क्यों अवैध शारीरिक संबंधों ने मर्यादित रिश्तों को निगल लिया? क्यों देह के आकर्षण ने संस्कारों की बुनियाद को खोखला कर दिया? सेल्युलाइड परदे के विकल्प के रूप में हर हाथ में सिमटी छोटी सी स्क्रीन में चमकते ओटीटी चैनल्स, सोशल मीडिया की रील्स आदि में थिरकती, चमकती, लहराती कामुक नग्न/अर्धनग्न देह पर सामाजिक चिंतन, विमर्श के द्वारा कोई ठोस कदम उठाना होगा. ऐसा न कर पाने की स्थिति में यह समाज संवेदनहीनता, फूहड़ता, कामुकता, नग्नता, अशालीनता का बाज़ार बना नजर आयेगा. 


13 अक्टूबर 2022

खुद का आकलन खुद की नजरों में

इधर बहुत दिनों से खुद अपने व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है. अपने आपको अपनी ही नजर से विश्लेषित किया जा रहा है, खुद का आकलन किया जा रहा है. अभी निष्कर्ष रूप में बहुत कुछ तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु बहुत कुछ ऐसा है जो अपने बारे में और भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है. वैसे ऐसा नहीं है कि अपने कामों के बारे में, अपने स्वभाव के बारे में इधर ही कुछ दिन से आकलन करना शुरू किया है. इस तरह का काम बरसों से किया जा रहा है. यदि कहा जाये कि बचपन से तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


उन दिनों हम कक्षा सात या आठ में पढ़ते होंगे. उस समय अपने बाबा जी के साथ सुबह की सैर पर जाया करते थे. बाबा जी के साथ की सैर का लाभ तो मिला ही, उनके बहुत सारे अनुभवों से सीखने का भी अवसर मिला. अजनारी गाँव तक लगभग तीन किमी तक की सैर के दौरान बाबा जी से बहुत सारी सीख, शिक्षाएँ भी मिलती रहती थीं, जिनके द्वारा आज तक मार्गदर्शन मिलता रहता है. बाबा जी ने ही उसी समय सिखाया था कि कभी भी कितनी ही बड़ी समस्या क्यों न हो, उसका समाधान उसके छोटे रूप से सोचना शुरू करो, निकल आएगा. समस्या को बड़ा करके देखने पर समस्या ही बहुत बड़ी समझ आने लगती है तो समाधान खोजना मुश्किल हो जाता है.




ऐसी अनेक शिक्षाओं के साथ बाबा जी ने सिखाया था कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ना अच्छा रहता है. लिखने-पढ़ने की आदत उसी का सुखद परिणाम है. आज भी विगत कई वर्षों से नियम बना हुआ है कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ा अवश्य जाता है, भले ही वह पढ़ना कुछ पृष्ठ का ही हो. इसी तरह से बाबा जी ने एक बात और बताई थी कि दिन भर जो भी काम करो, उनके बारे में रात को सोने के ठीक पहले विचार किया करो. देखो कि कौन सा काम गलत किया, कौन सा काम सही किया. किसकी सहायता की, किसका नुकसान किया. इसके बाद अगले दिन के लिए संकल्प करो कि गलत काम जो आज हुआ, वो कल से नहीं होगा. जो नुकसान दूसरे का किया, वो फिर न होने पाए. ये आदत आज तक बनी हुई है. इसी के चलते कोशिश रहती है, खुद को सुधारने की, अपना स्वभाव सही करने की.


इसी आदत को विगत कुछ समय से विस्तार देने की कोशिश है. खुद को खुद की नजर से देखने, परखने की कोशिश है. ऐसा लगता है हमें खुद के बारे में जैसे संबंधों, रिश्तों, दोस्ती में कई बार सामने वाले पर हम अपनी इच्छा थोपने सी लगते हैं. सामने वाले पर अपना अधिकार सा मानते हुए उससे अपनी बात को मनवाने की चेष्टा करते हैं. यद्यपि ऐसा करवाने के पीछे किसी तरह की गलत मानसिकता नहीं होती है तथापि लगता है कि आखिर सामने वाले की भी अपनी सोच है, उसकी भी अपनी पसंद है. ऐसा होना आम बात है कि कोई काम, कोई बात हमें नापसंद हो, आवश्यक नहीं वही बात हमारे अभिन्न मित्र को भी नापसंद हो. बावजूद ये समझने के हम उसे अपनी पसंद के लिए मजबूर सा करते हैं. बात न मानने की स्थिति में कई बार गुस्सा आता है मगर सामने वाले पर नहीं, खुद पर. लगता है कि आखिर क्यों अपनी बात को अगले पर थोप रहे थे, आखिर उसका भी अपना अधिकार है, किसी बात को मानने या न मानने का, किसी काम को करने या न करने का.


हमारी जिद तरीके की ऐसी हरकत महज इसी भाव में हो जाती है कि हम अगले व्यक्ति पर अपना सम्पूर्ण अधिकार सा मान लेते हैं, समझ लेते हैं. लगातार कोशिश यही है कि अपनी ऐसी आदत पर नियंत्रण कर सकें. अपनी जिद जैसी इच्छा को अपने किसी ख़ास, विशेष पर जबरन न थोपा जाये. 




 

07 सितंबर 2022

दोस्ती, विश्वास, अधिकार का सह-सम्बन्ध

दोस्ती को किसी भी रिश्ते से अलग और सबसे ऊपर माना जाता है. हमारा भी व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि दोस्ती का रिश्ता सबसे अलग होता है. विगत कुछ वर्षों के जो अनुभव रहे हैं, उनके आधार पर इसके साथ कुछ बातों का और भी अनुभव किया है. दोस्ती के साथ-साथ अन्य आयाम भी जुड़कर चलते हैं, जिनके बारे में अक्सर विचार किया नहीं जाता है. संभव है ऐसा करने के पीछे का कारण यही रहता हो कि दोस्ती को सबसे ऊपर माना जाता है. यदि बारीकी से देखा जाये तो दोस्ती के साथ-साथ अधिकार और विश्वास भी उतनी ही महती भूमिका में रहते हैं. इन दोनों को उसी नजरिये से एकसाथ नहीं देखा जा सकता है, जैसा कि दोस्ती को देखा जाता है. 


किसी भी व्यक्ति के साथ दोस्ती में गहराई या मजबूती उसी स्थिति में आती है जबकि उसके साथ विश्वास की मजबूती हो. जहाँ विश्वास में लेशमात्र भी संदेह, संशय रहेगा वहाँ दोस्ती जैसा कुछ भले हो मगर दोस्ती नहीं हो सकती. इसे जान-पहचान, परिचय, सम्बन्ध आदि कुछ भी कहा जा सकता है. असल में दो लोगों के बीच की मेल-मुलाकात, उनके बीच का परिचय, उनके मध्य की बातचीत को दोस्ती के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. दोस्ती का अर्थ ही विस्तार लिए है, गहराई लिए है. दोस्ती महसूस करने की, स्वयं में जीने की स्थिति है न कि किसी रिश्ते का नामकरण. इसलिए दोस्ती में विश्वास का होना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.  




इसके अलावा दोस्ती के साथ जिस अन्य आयाम को हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है वह है अधिकार. अधिकार एक तरह की वह स्थिति है जो दो व्यक्तित्वों को एक-दूसरे में आपस में परिवर्तित कर देती है. ऐसा दोस्ती के सन्दर्भ में ही हमने महसूस किया है, अनुभव किया है. संभव है कि अन्य किसी स्थिति में अधिकार का मंतव्य कुछ और निकलता हो. दोस्ती और अधिकार के बीच के साहचर्य को, सह-सम्बन्ध को जब देखते हैं तो लगता है कि दोस्ती भले ही कितनी प्रगाढ़ हो, दोस्ती में कितनी ही गहराई क्यों न हो मगर अधिकार का दायरा अलग-अलग होता है. जिस व्यक्ति से दोस्ती अपने परम-पावन रूप में पूरी ईमानदारी के साथ हो, आवश्यक नहीं कि उसके ऊपर अधिकार भी उसी शिद्दत से हो. उसी एक व्यक्ति के विभिन्न स्वरूपों, कार्यों आदि में अधिकार की स्थिति बदलती रहती है.  


अक्सर देखने में आता है कि अधिकार को एकआयामी बिंदु मानकर उसे स्वीकार किया जाता है और ऐसी स्थिति में दोस्ती के सन्दर्भ में अक्सर ग़लतफ़हमी पैदा होने लगती है. यहाँ विश्वास और अधिकार की स्थिति में अंतर को भी समझना होगा. विश्वास का अर्थ सीधे-सीधे विश्वास से है. यहाँ कम या ज्यादा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता है. विश्वास है तो है, नहीं है तो नहीं है. ऐसा किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है कि किसी एक कार्य के सन्दर्भ में अथवा किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में विश्वास का स्वरूप बदल जाए. इसके उलट अधिकार के अनेकानेक पक्ष सामने आते हैं. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि भले ही आपकी किसी व्यक्ति के साथ अत्यंत गहरी दोस्ती है मगर संभव है कि उसके परिवार के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार आपको नहीं हो. परिवार से इतर उसी व्यक्ति के सन्दर्भ में देखें तो भले ही उस दोस्त के क्रियाकलापों पर, उसके कार्यों पर आपका अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप रहता हो मगर ऐसा भी संभव है कि उसके कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में किसी अन्य तरह का अधिकार आपको न हो. अधिकार के आयाम विभिन्न स्वरूपों में दोस्ती के साथ चलते रहते हैं. यहाँ अधिकार के अलग-अलग स्वरूपों के कारण दो व्यक्तियों की दोस्ती में अंतर के बाद भी दोस्ती का चरम स्वरूप, पावन रूप देखा जा सकता है.  


दोस्ती अत्यंत पवित्र रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते के नामकरण का मोहताज नहीं. उसके लिए किसी तरह की कोई परिधि नहीं. उसके लिए कोई दायरा नहीं. इसके बाद भी व्यक्तिगत संबंधों, अनुभवों, एहसासों के आधार पर महसूस किया है कि दोस्ती के साथ अधिकार का सम्बन्ध वह नहीं है जो दोस्ती के सन्दर्भ में है. दोस्ती, विश्वास, अधिकार की आपसी संरचना को समझने की आवश्यकता है, उनके बीच के सह-सम्बन्ध को भी समझने की आवश्यकता है. अक्सर इन्हीं को समझने की चूक में दोस्ती जैसा रिश्ता पल भर में अपने अस्तित्व को खो देता है. अधिकारों के नाम पर व्यक्ति कई बार अपने दायरे से बाहर भी निकल जाता है. ऐसा करना एक तरह का अतिक्रमण ही होता है. अधिकारों के आयामों को न समझने के कारण, उनको उनकी परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार न करने के कारण दोस्ती के स्वरूप को विकृत होते भी देखा गया है.