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08 फ़रवरी 2025

नकारात्मक कार्य-शैली का नतीजा आप की हार

सत्ताईस बरसों तक विपक्षी गलियारे में टहलते रहने के बाद भाजपा को दिल्ली विधानसभा का सत्ता सुख प्राप्त हो गया. 70 सीटों वाली दिल्ली में भाजपा ने 48 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया जबकि पिछले बारह सालों से सरकार चला रही आम आदमी पार्टी 22 सीटों में ही सिमट गई. आम आदमी पार्टी का इतनी कम सीटों में सिमट जाना संख्यात्मक रूप से इस कारण आश्चर्यजनक लग रहा है कि अपने पहले चुनाव में ही आम आदमी पार्टी द्वारा चमत्कारिक रूप से 28 सीटें जीत कर अपनी पहचान को साबित किया था. अन्ना आन्दोलन की लहर, लोकपाल बिल बनाये जाने का मुद्दा, भ्रष्टाचार विरोधी छवि के साथ पहले चुनाव के चमत्कारिक प्रदर्शन को अद्भुत प्रदर्शन में बदलते हुए 2015 एवं 2020 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने क्रमशः 67 एवं 62 सीटों पर विजय हासिल की थी. केन्द्रीय राजनीति में बेहतर प्रदर्शन करने वाली भाजपा को इन दोनों विधानसभा चुनावों में क्रमशः 03 एवं 08 सीटों से संतोष करना पड़ा था, वहीं कांग्रेस इन दोनों चुनावों में अपना खाता ही नहीं खोल सकी. आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर विजय हासिल की थी किन्तु विधानसभा में उसका प्रदर्शन एकदम लचर रहा.

 

आम आदमी पार्टी के पहले चुनाव की सफलता को अन्ना आन्दोलन लहर की सहानुभूति का परिणाम मानने वालों को भले ही चुनाव परिणामों की संख्यात्मकता ने गलत साबित किया हो मगर आम आदमी पार्टी खुद को सही साबित करने में विफल ही रही. यही कारण रहा कि दो बार प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता प्रदान किये जाने के बाद भी अंततः इस बार दिल्ली के मतदाताओं ने उससे किनारा करना ही उचित समझा. वर्तमान 2025 विधानसभा चुनाव परिणामों को आम आदमी पार्टी के समर्थक भले ही सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकम्बेंसी) कह कर खुद को सांत्वना देने का प्रयास करें मगर सत्यता यही है कि पिछले बारह बरसों के अपने कार्यकाल में आम आदमी पार्टी द्वारा अपनी उसी विचारधारा, अपने उन्हीं सिद्धांतों से लगातार दूरी बनाई जाती रही, जिनके सहारे वह सत्ता में आई थी. अपने कार्यों, अपने विचारों, अपनी कार्य-शैली आदि के चलते आम आदमी पार्टी ने और स्वयं अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह से नकारात्मक माहौल बना रखा था, उससे दिल्ली के मतदाताओं में निराशा उत्पन्न हो चुकी थी. यही कारण रहा कि दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्य-शैली पर भरोसा करते हुए इस बार विधानसभा भाजपा को सौंप दी. दिल्ली के मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अरविन्द केजरीवाल को भी हराया, मनीष सिसौदिया के साथ-साथ सत्येंद्र जैन और सौरभ भारद्वाज को भी बाहर का रास्ता दिखाया. एक दशक से अधिक समय की कार्य प्रणाली, व्यवहार को देखने के बाद मतदाताओं को न मुफ्त की रेवड़ियाँ पसंद आईं और न ही कट्टर ईमानदार वाली कथित छवि ने प्रभावित किया.

 



आम आदमी पार्टी की हार के पीछे भले ही भाजपा की अपनी तैयारी, रणनीति, मोदी का चेहरा समेत अनेक कारक समाहित माने जा सकते हैं, किन्तु आम आदमी पार्टी और उनके शीर्ष नेताओं के कारनामे भी उसकी हार के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जो दल भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से जन्मा हो, जिस राजनैतिक दल के खिलाफ पूरा आन्दोलन छेड़े रहा हो सत्ता में आने के लिए उसी से हाथ मिला लिए. कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ सैकड़ों पृष्ठों के जो सबूत सार्वजनिक मंच से दिखाए जाते थे, वे अचानक ही गायब हो गए. भ्रष्टाचार विरोध के द्वारा सत्ता में आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने लगे. खुद को कट्टर ईमानदार कहने वाले अरविन्द केजरीवाल भी इससे बच न सके. उनके सहित मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाना पड़ा.

 

नई तरह की साफ-सुथरी, ईमानदार और वैकल्पिक राजनीति का वादा करने वाले केजरीवाल ने तो सिद्धांतों की, ईमानदारी की उस समय धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं जबकि उनको जेल जाना पड़ा. बात-बात पर नैतिकता की दुहाई देने वाले अरविन्द केजरीवाल द्वारा जेल जाने के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया गया. इसके बजाय उनके द्वारा जेल से ही सरकार चलाने की ऐसी जिद दिखाई गई जो भारतीय राजनीति में अचम्भित करने वाली घटना थी. भ्रष्टाचार विरोध, नैतिकता की बात करने वाले केजरीवाल ने सत्ता सुख के लिए अनेक राज्यों में उन्हीं दलों, नेताओं के साथ हाथ मिलाया जिनके दामन में भ्रष्टाचार, दंगों, घोटालों आदि के दाग लगे हैं. व्यवस्था परिवर्तन करने, राजनीति का ढंग बदलने की बात करने वाले केजरीवाल और उनके साथी लगातार न केवल भ्रष्टाचार में लिप्त होते चले गए बल्कि काम-काज के मामलों में भी असफल सिद्ध हुए. सरकारी विद्यालयों, चिकित्सालयों, मोहल्ला क्लीनिक, सड़कें, यमुना साफ़-सफाई, बिजली, पानी आदि के मामलों में आम आदमी पार्टी लगातार असफल ही रही. विडम्बना यह रही कि तमाम सारी नाकामियों के बाद भी केजरीवाल द्वारा इनका जिम्मेदार स्वयं को, अपने नेताओं को, अपनी पार्टी को न मानकर दूसरों पर दोषारोपण किया जाता रहा. अलग तरह की राजनीति के नाम पर बिना किसी सबूत के, बिना किसी आधार के बाकी सभी पार्टियों और उनके नेताओं को चोर-बेईमान बताया जाने लगा. इसकी हद तो उस समय हुई जबकि वर्तमान चुनाव से ठीक पहले उन्होंने सीधे-सीधे हरियाणा की भाजपा सरकार पर यमुना के पानी में जहर मिलाने, नागरिकों के नरसंहार की साजिश रचने का अत्यंत गम्भीर आरोप लगा दिया. यह कदम केजरीवाल की गैर-जिम्मेदार राजनीति की सारी सीमाओं का लाँघना था.

 

फिलहाल तो आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के कारनामों की लम्बी सूची है, उनके कांड भी लम्बे-चौड़े हैं, अमानतुल्लाह खान, ताहिर हुसैन पर दंगों के आरोप तय हो चुके हैं, इस वास्तविकता को न केवल आम आदमी पार्टी के नेताओं ने समझा बल्कि दिल्ली के मतदाताओं ने भी समझा. यही कारण रहा कि दिल्ली में चुनावी मौसम के ठीक बीच में आम आदमी पार्टी के सात विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. यहाँ पार्टी छोड़ने की परम्परा भी पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही शुरू हो गई थी. शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, मयंक गांधी, कुमार विश्वास, कैलाश गहलोत आदि ऐसे नाम हैं जो केजरीवाल की कार्यप्रणाली, उनकी मनमानी से असहमति के चलते पार्टी से बाहर हो गए. इन सब बातों का भी असर चुनाव परिणाम पर पड़ा. मतदाताओं में यह धारणा बन चुकी थी कि अब पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.

 

दिल्ली चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठना बेवजह भी नहीं. क्षेत्रफल की दृष्टि से भले ही दिल्ली छोटा राज्य हो मगर देश की राजधानी होने के कारण वह राजनीति के केन्द्र में रहता है. देश की राजनीति की तरह ही यहाँ की राजनीति भी विचारधारा और पार्टी के मजबूत शीर्षक्रम पर आधारित है. स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति आम आदमी पार्टी के पास नहीं है. आम आदमी पार्टी भले ही स्वयं को कट्टर ईमानदारी, अलग तरह की राजनीति करने वाली, व्यवस्था परिवर्तन करने वाली विचारधारा का पोषण करने वाली बताती रही हो मगर सत्यता यही है कि उसकी कोई विचारधारा नहीं है. उसका जन्म किसी विचारधारा के कारण नहीं बल्कि सत्ता में आने के उद्देश्य से ही हुआ है. आम आदमी पार्टी का गठन करते समय केजरीवाल के स्वयं ही कहा था कि मजबूरी में हम लोगों को राजनीति में उतरना पड़ा. हमें राजनीति नहीं आती है. हम इस देश के आम आदमी हैं जो भ्रष्टाचार और महँगाई से दुखी हैं, उन्हें वैकल्पिक राजनीति देने के लिए आए हैं. ऐसे में पार्टी के लिए बिना किसी ठोस विचारधारा के उसके विधायकों का वैचारिक दृष्टिकोण से एकजुट बने रहना भी एक चुनौती होगी. दिल्ली की सत्ता में रहते हुए केजरीवाल को अपने विधायकों को सँभाले रखना मुश्किल हो रहा था, अब विपक्ष में रहते हुए उनको साधे रखना आसान नहीं होगा. विचारधारा शून्यता के साथ-साथ शराब घोटाले और शीशमहल जैसे मुद्दों ने पार्टी की कट्टर ईमानदारी छवि पर भी दाग लगाया है. केजरीवाल, सिसौदिया का हारना अन्य प्रदेशों की इकाइयों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा. ऐसे में यदि आम आदमी पार्टी को, केजरीवाल को राजनीति का लम्बा रास्ता तय करना है तो उनको दूसरों पर दोषारोपण करने के स्थान पर अपने गिरेबान में झाँकना होगा. अपने कारनामों पर, अपनी कार्य-शैली पर चिंतन करना होगा. कट्टर ईमानदार, अजेय बने रहने के अहंकारी दम्भ से बाहर निकलना होगा.  


23 मई 2024

व्यवस्था परिवर्तन करने का खोखला दावा

देश की राजधानी से भ्रष्टाचार विरोधी एक आन्दोलन उभरता है जो धीरे-धीरे तमाम सारे युवाओं, अनेक बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों, गैर-राजनैतिक संगठनों के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनता है. आन्दोलन के साथ जुड़े लोगों ने देश से भ्रष्टाचार समाप्ति की कामना कर डाली, भ्रष्ट-रिश्वतखोर व्यक्तियों के जेल के पीछे होने की कल्पना कर ली, देश में लोकपाल व्यवस्था होने का सपना बुन डाला. हजारों-हजार लोगों के सपनों, कामनाओं को अपनी सीढ़ी बनाकर राजनैतिक क्षेत्र में जन्मी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता सँभाली. राजनीति को बदलने का दावा करने वाले, व्यवस्था परिवर्तन करने के नारे लगाने वाले जब सत्तासीन हुए तो उनके साथ जुड़े लोगों के साथ-साथ आशान्वित नागरिकों में आशा का संचार हुआ था.

 



ईमानदारी का चोला पहनकर आये लोगों ने, राजनीति को बदलने का दावा करने लोगों ने राजनीति को बदलकर रख दिया. संभवतः देश की राजनीति में ऐसा पहली बार हुआ होगा, पहले राजनैतिक दल के साथ ऐसा हुआ होगा कि उसका मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री दोनों ही पद पर रहते हुए जेल में हैं. ऐसा आबकारी घोटाले मामले के कारण हुआ. राजनीति से, देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने का संकल्प लेकर सामने आई आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जेल में है. इसे इस पार्टी की कार्यशैली ही कहा जायेगा कि इसके साथ आन्दोलन-काल में जुड़े लोगों को या तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है या फिर वे किसी न किसी तरह के मामलों में जेल में हैं. विगत कई दशकों में राजनीति में माफियाओं के, अपराधियों के घुस आने से गंद तो फैली हुई थी, इन लोगों ने उस गंद को और अधिक मचमचा दिया है. न केवल अपने बयानों से बल्कि अपने कामों से भी सिवाय विवाद पैदा करने के कुछ नहीं किया गया. अभी हालिया काण्ड इसका जीता-जागता उदाहरण है.

 

ये हालिया काण्ड आम आदमी पार्टी की महिला सांसद के साथ मारपीट किये जाने जाने का है. आश्चर्य की बात है कि एक सांसद को मुख्यमंत्री आवास पर पीटे जाने की घटना होती है. आबकारी घोटाले में जेल गए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को चुनाव प्रचार हेतु कुछ दिन के लिए अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया. उनके बाहर आने के बाद ही आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने आरोप लगाया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार द्वारा उनके साथ मारपीट की गई. यहाँ विशेष बात ये है कि आरोप लगाने वाला व्यक्ति, साजिशकर्ता, घटनास्थल आदि सबकुछ आम आदमी पार्टी से सम्बंधित है मगर राजनैतिक व्यवस्था बदलने आये महानुभावों का कहना है कि ये भाजपा की साजिश है.  

 

मारपीट की इस घटना का अंजाम क्या होगा ये देखने वाली बात है लेकिन आम आदमी पार्टी के विगत तमाम कृत्यों से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि इनका मकसद किसी भी रूप में राजनैतिक शुचिता का पालन करना नहीं है. व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर इनको महज सत्ता हासिल करनी थी, जिसे हासिल करके वे मलाई खाने में लगे हैं. राजनीति बदलने के लिए, भ्रष्टाचार मुक्ति के लिए, लोकपाल लाने के लिए इनके द्वारा चलाया गया आन्दोलन अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है. देश के नागरिकों की याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं हुई होगी कि वे इसे भूल गए हों. सभी को अच्छी तरह से याद होगा कि आन्दोलन के दौरान केजरीवाल द्वारा मंचों से पानी का मीटर फूँकते हुए, सैकड़ों कागजों का बंडल दिखाते हुए दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को कटघरे में खड़ा किया जाता था; अनेकानेक राजनैतिक व्यक्तियों के, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के नाम लेकर उन पर भ्रष्टाचार का, रिश्वतखोरी का, परिवारवाद का आरोप लगाते हुए उनको जेल में डालने की हुँकार भरी जाती थी; अपने आपको शुचिता का एकमात्र केन्द्र साबित करने के लिए अनेकानेक आदर्शवादी बयान दिए जाते थे मगर असलियत इससे बहुत दूर निकली.

 

राजनीति से भ्रष्टाचार दूर करना तो दूर की बात रही, खुद इनका शीर्ष नेतृत्व भ्रष्टाचार मामलों में संलिप्त नजर आने लगा. व्यवस्था बदलने आये लोगों ने व्यवस्था के नाम पर संविधान का मखौल बनाना शुरू कर दिया. राजनैतिक शुचिता स्थापित करने आई पार्टी का शीर्ष नेतृत्व न केवल बाहर बल्कि सदन में भी कभी प्रधानमंत्री के लिए, कभी एलजी के लिए अपमानजनक शब्दावली का प्रयोग करता दिखाई दिया. राजनैतिक बदलाव करने की असलियत का पता इसी से लगता है कि जब ये लोग अथवा इनके मुखिया अरविन्द केजरीवाल आन्दोलन कर रहे थे तब इनका मुख्य उद्देश्य भ्रष्ट नेताओं को जेल पहुँचाना था. अब यही चुनावी गठबंधन में उनके साथ हाथ मिला बैठे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगा रहे हैं कि वे सबको जेल भेजना चाहते हैं. समझ से परे है कि जिन-जिन नेताओं का नाम लेकर केजरीवाल उनको जेल भेजना चाहते थे, अब उनको जेल जाने से बचाने में क्यों लगे हुए हैं? जिस कांग्रेस को भ्रष्ट बताकर, दिल्ली की जनता को बदलाव का सपना दिखाकर अपने पहले चुनाव पश्चात् कांग्रेस से ही गठबंधन करके सत्ता में आये थे. यदि उनका उद्देश्य दिल्ली की व्यवस्था को दुरुस्त करना था तो इस्तीफ़ा देकर नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा होता. आन्दोलन की नागरिक-सहानुभूति के द्वारा वे खुद को मुख्यमंत्री के रास्ते से प्रधानमंत्री पद तक ले जाना चाहते थे.

 

यदि आन्दोलन के परिदृश्य से उपजे आदर्शवादी विचारों, बयानों को दरकिनार करते हुए वास्तविकता का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि अरविन्द केजरीवाल जबरदस्त महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति हैं. यही कारण है कि राजनीति में, सत्ता में बने रहने के लिए उनके द्वारा लगातार उन्हीं बातों, सिद्धांतों, व्यक्तियों से समझौता, गठबंधन किया गया जिनके खिलाफ वे आवाज़ उठाते रहे हैं. स्वाति मालीवाल के आरोपों के बाद केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार की गिरफ़्तारी भले हो गई हो मगर केजरीवाल की चुप्पी कुछ अलग ही संकेत करती है. फ़िलहाल, राजनीति बदलने आये लोगों ने जनभावनाओं के साथ खेलते हुए वही गंदगी फैला रखी है जो अन्य राजनैतिक दलों द्वारा फैलाई जाती रही है.

 


18 मई 2024

गंद फैलाने में लगे व्यवस्था परिवर्तक

राजनीति को बदलने का दावा करने वाले तमाम तरह के सपने दिखाकर आन्दोलन के रास्ते सक्रिय राजनीति में आये लोगों ने वाकई राजनीति को बदलकर रख दिया है. विगत कई दशकों में राजनीति में माफियाओं के, अपराधियों के घुस आने से गंद तो फैली हुई थी, इन लोगों ने उस गंद को और अधिक मचमचा दिया है. न केवल अपने बयानों से बल्कि अपने कामों से भी सिवाय विवाद पैदा करने के कुछ नहीं किया गया. अभी हालिया काण्ड इसका जीता-जागता उदाहरण है. 


आम आदमी पार्टी की एक महिला सांसद के साथ मारपीट किये जाने की घटना सामने आई. आश्चर्य की बात ही कही जाएगी कि एक सांसद को एक मुख्यमंत्री आवास पर मारपीट किये जाने की घटना होती है. आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार द्वारा मारपीट की गई. यहाँ विशेष बात ये है कि ये सभी लोग आम आदमी पार्टी के हैं मगर अब राजनैतिक व्यवस्था बदलने आये महानुभावों का कहना है कि ये सब भाजपा की साजिश है.


मारपीट की इस घटना का अंजाम क्या होगा ये देखने वाली बात है लेकिन आम आदमी पार्टी के विगत तमाम कृत्यों से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि इनका मकसद किसी भी रूप में राजनैतिक शुचिता का पालन करना नहीं है. व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर इनको महज सत्ता हासिल करनी थी, जिसे वे हासिल करके मलाई खाने में लगे हैं. व्यवस्था के नाम पर कभी संविधान का मखौल बनाना, कभी प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक शब्दावली प्रयोग करना, जानबूझकर विवादों को जन्म देना इनका मुख्य कार्य बना हुआ है. राजनैतिक बदलाव को करने की असलियत का पता इसी बात से लगता है कि जब ये लोग अथवा इनके मुखिया अरविन्द केजरीवाल आन्दोलन कर रहे थे तब इनका मुख्य उद्देश्य भ्रष्ट विरोधी नेताओं को जेल पहुँचाना था. अब यही चुनावी गठबंधन में उनके साथ हाथ मिला बैठे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाने में लगे हैं कि वे सबको जेल भेजना चाहते हैं. समझ से परे है कि जिन-जिन नेताओं का नाम लेकर केजरीवाल उनको जेल भेजना चाहते थे, अब वे उनको जेल जाने से बचाने में क्यों लगे हैं? 





 

11 मई 2024

चुनाव प्रचार हेतु अंतरिम जमानत

मामला चूँकि माननीय अदालत से सम्बंधित है, उसके आदेश से सम्बंधित है इस कारण समझ नहीं आता कि इस बारे में क्या लिखा जाये, क्या कहा जाये? दिल्ली के मुख्यमंत्री को अदालत द्वारा महज इस कारण अंतरिम जमानत मिल जाती है कि उनको चुनाव प्रचार करना है. समझ नहीं आता कि ये किस तरह की न्याय व्यवस्था है जहाँ जेल में बंद व्यक्ति को महज इस कारण से अंतरिम जमानत मिल जाती है कि उसे लोकसभा चुनाव में प्रचार करना है. संभवतः ये अपनी तरह का पहला मामला होगा?

बहरहाल, अदालत के आदेश पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं. बावजूद इसके सवाल मन में उभरता है कि क्या इस आधार पर कोई भी व्यक्ति अंतरिम जमानत पाने का अधिकारी हो जाता है? एक ऐसा व्यक्ति जो जेल में बंद है और वह चुनाव में उतरने के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करता है तो क्या उसे भी अंतरिम जमानत दी जाएगी? क्या ऐसे व्यक्ति जो अभी भी जेलों में बंद हैं और वे राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं, तब भी क्या उनको चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाएगी? संभव है कि चुनाव प्रचार करना संवैधानिक अथवा मौलिक अधिकार नहीं हो किन्तु यदि माननीय अदालत किसी एक व्यक्ति को इस आधार पर राहत देती है तो फिर यह निर्णय अन्य लोगों के लिए नजीर के रूप में काम करेगा. 




 

22 मार्च 2024

राजनैतिक गलियारे के व्यवस्था परिवर्तक

आखिरकार कई-कई समन को अस्वीकार करने वाले अरविन्द केजरीवाल को ईडी ने अपने चंगुल में ले ही लिया. आबकारी नीति मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लिया गया. आम आदमी पार्टी के इससे पहले कई जनप्रतिनिधि जेल में हैं. मनीष सिसौदिया, संजय सिंह, सतेन्द्र जैन आदि पहले से गिरफ्तार होकर जेल में हैं. अब अरविन्द केजरीवाल गिरफ्तार कर लिए गए हैं और छह दिन की रिमांड पर हैं. संभव है कि वे भी अपने साथियों के बीच जल्द ही दिखाई देंगे. 


अरविन्द केजरीवाल की गिरफ़्तारी ने भी एक तरह का अलग रिकॉर्ड बना दिया है. देश में यह पहला मामला है जबकि किसी मुख्यमंत्री को उसके पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया है. यहाँ उनकी गिरफ़्तारी से सम्बंधित सवाल-जवाब अथवा विमर्श की तरफ इस पोस्ट को कतई नहीं ले जाना है. आज इस विषय पर पोस्ट लिखने का सन्दर्भ महज इतना है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुए आन्दोलन से, लोकपाल को लाने के संकल्प के साथ जन्मे एक दल ने और उसके नेताओं ने आम आदमी के विश्वास को न केवल तोडा है बल्कि घनघोर तरीके से चकनाचूर भी कर दिया है.




अन्ना आन्दोलन के दौरान जिस तरह से इन नेताओं द्वारा बड़ी-बड़ी बातें की गईं, खुद को ईमानदारी का एकमात्र प्रतिनिधि बताया गया, दूसरे दलों के नेताओं के सैकड़ों-सैकड़ों कागजों में भ्रष्टाचार के सबूत दिखाए गए, खुद को राजनीति की, सत्ता की चकाचौंध से बाहर रखने के जुमले फेंके गए, बच्चों तक की कसमें खाई गईं और अंततः सबके सब ही एक ही रंग में रँगे नजर आये. दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ खुले मंचों से लहराए जाने वाले कागजात सत्ता में आने के बाद न जाने कहाँ गायब हो गए? जिस कांग्रेस के खिलाफ पूरा आन्दोलन चलाया गया, उसी के साथ मिलकर सरकार बनाई गई. इसके बाद भी इन सबका खुद को व्यवस्था बदलने वाला, नई तरह की राजनीति करने का ढोल पीटना बंद नहीं किया गया.


जो सारे कार्य इन लोगों ने अपने लिए निषिद्ध मान रखे थे, कह रखे थे, वे सारे के सारे अपनाए गए. आम जनमानस को इससे समस्या पैदा होने वाली नहीं थी और न है. आखिर राजनीति के गलियारों में यह कोई नई या अनोखी बात नहीं है. कोई भी दल हो आज बात भले सिद्धांतों की, शुचिता की, ईमानदारी की करता हो मगर काम स्वार्थपरक ही करेगा, सत्तालोलुप रहेगा. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से, इनके नेताओं के रंग बदलने से नकारात्मक प्रभाव उन छोटे-छोटे सामाजिक संगठनों पर पड़ा जो वाकई में छोटे से क्षेत्र में ईमानदारी से, कुशलता के साथ कार्य कर रहे थे. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से सबसे निचले स्तर के व्यक्ति की ईमानदारी, शुचिता पर, उसके कार्यों पर संदेह किया जाने लगा है. आम जनमानस में एक धारणा गहरे तक बैठ गई कि किसी भी रूप में समाज से भ्रष्टाचार को दूर नहीं किया जा सकता है. कोई कितना भी आन्दोलन करे, कसमें खाए, खुद को ईमानदार बताता घूमे लेकिन यह सब सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए, स्वार्थ-पूर्ति के लिए ही किया जाता है.


आन्दोलन से लेकर अद्यतन इनके कृत्यों को देखने के बाद बचपन में किसी कक्षा में पढ़ी डाकू खड्ग सिंह और बाबा भारती की कहानी याद आ गई. 





 

23 मार्च 2018

राजनैतिक हथकंडा है केजरीवाल की माफ़ी


आन्दोलन के गर्भ से जन्मी आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अपनी माफ़ी-यात्रा को ज़ारी रखा है. उनके द्वारा पंजाब के पूर्व कैबिनेट मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया से माफी मांगे जाने के तीन दिन बाद ही केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल से भी माफी मांगी गई है. केजरीवाल ने इन तीनों राजनैतिक व्यक्तियों से लिखित में माफ़ी माँगी है. अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया को लिखे माफीनामे में केजरीवाल ने लिखा कि अब मैं जान गया हूं कि सारे आरोप निराधार हैं, इसलिए मैं आपके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप और बयान वापस लेता हूं और उनके लिए माफी भी मांगता हूं. कुछ इसी तरह की भाषा का प्रयोग केजरीवाल ने गड़करी को लिखे माफीनामा में किया है. केजरीवाल ने इस माफीनामे में कहा है कि मेरी आपसे कोई निजी रंजिश नहीं है. पूर्व में दिए अपने बयान के लिए अफसोस जताता हूं. हम घटना को पीछे छोड़ते हुए कोर्ट में केस को बंद करने की कार्यवाही करते हैं. केजरीवाल ने नितिन गडकरी के भारत के सर्वाधिक भ्रष्ट लोगों की सूची में शामिल होने की बात कही थी. जवाब में  गडकरी ने उन पर मानहानि का केस दायर किया था.


असल में केजरीवाल द्वारा कांग्रेस, भाजपा सहित अनेक दलों के कई नेताओं के खिलाफ आरोप लगाये जा चुके हैं. इन तमाम नेताओं में से तैंतीस नेताओं ने केजरीवाल पर मानहानि का केस कर रखा है. ऐसे में जबकि अब केजरीवाल द्वारा माफ़ी मांगने और केस समाप्त करने को तीन नेताओं को लिखा जा चुका है, तो उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वे जल्द ही बाकियों से भी माफ़ी मांगने का काम करेंगे. असल में केजरीवाल अपने ऊपर दर्ज तैंतीस मानहानि मुकदमों से परेशान हो चुके हैं और अब इनसे छुटकारा पाना चाहते हैं. इसलिए वह माफी मांग रहे हैं. केजरीवाल के माफीनामे की इस प्रक्रिया से सबके अलग-अलग विचार सामने आने लगे हैं. एक तरफ इससे जहाँ उनके पार्टी के पदाधिकारी तथा अन्य नेता असहमत दिख रहे हैं वहीं केजरीवाल का समर्थन करने अले बहुत से लोग उनके माफीनामे को सार्थक कदम बता रहे हैं.

पंजाब के मजीठिया से माफ़ी मांगने के मुद्दे पर पंजाब आम आदमी पार्टी में खुलकर विद्रोह सामने आया. पंजाब विधानसभा चुनाव 2017 के चुनाव प्रचार में केजरीवाल ने मजीठिया पर ड्रग्स के धंधे में शामिल होने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे. पंजाब में उनकी सरकार आने पर मजीठिया को सलाखों के पीछे भेजने तक की बात केजरीवाल द्वारा कही गई थी. इसी प्रकरण को लेकर मजीठिया ने उनके खिलाफ मानहानि का दावा ठोका था. अब जबकि केजरीवाल ने उनसे लिखित में माफी मांग ली है तो उनके इस कदम पर आम आदमी पार्टी की पंजाब ईकाई ने जबरदस्त आपत्ति व्यक्त की है. पंजाब प्रभारी और सांसद भगवंत मान ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है. इसके अलावा उपाध्यक्ष अमन अरोड़ा ने भी इस्तीफा दे दिया है. इसके साथ-साथ पंजाब के आम आदमी पार्टी विधायकों ने केजरीवाल से स्पष्ट तौर पर कहा है कि वे राज्य में पार्टी के कामकाज में दखल न दें.

इसके अलावा गड़करी से माफ़ी मांगने के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी की नेता अंजली दमानिया ने केजरीवाल के इस कदम से अपने आपको ठगा हुआ बताया है. अंजली दमानिया ने ही सबसे पहले भ्रष्टाचार के आरोप गड़करी पर लगाए थे. दमानिया के उन्हीं आरोपों का सहारा लेकर केजरीवाल ने गड़करी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें सबसे भ्रष्ट नेताओं की सूची में शामिल किया था. इसके बाद अंजली ने गडकरी के खिलाफ 2014 लोकसभा का चुनाव भी नागपुर से चुनाव भी लड़ा था, लेकिन गडकरी यहां बड़े अंतर से जीते थे. इसी तरह आम आदमी पार्टी की ओर राज्यसभा में भेजे गए संजय सिंह ने स्पष्ट किया है कि वह अरविंद केजरीवाल के मसले पर कुछ नहीं कहेंगे लेकिन इस बात पर बराबर कायम रहेंगे कि मजीठिया ड्रग्स डीलर है और उसे जेल जाना चाहिए. इनके अलावा कुमार विश्वास ने भी केजरीवाल के माफीनामे पर असहमति व्यक्त की है.

पार्टी के आलाकमान नेताओं, सांसदों, विधायकों, पदाधिकारियों का केजरीवाल के माफीनामे से सहमत न होना स्पष्ट करता है कि ये कदम केजरीवाल ने न तो राष्ट्रहित में उठाया है और न ही दिल्ली राज्य के हित में. असल उच्चतम न्यायालय नेताओं के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में करने का आदेश दे चुका है. केजरीवाल बखूबी समझते हैं कि इन मामलों में उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा. संसाधनों के अभावों और अनेकानेक अन्य आरोपों से जूझ रही पार्टी के लिए इतने अदालती मामलों का आना एक तरह का बोझ ही है. इसके अलावा केजरीवाल को यह भी ज्ञात है कि यदि किसी भी मानहानि मामले में उन्हें सजा हो गई तो उनकी राजनीति पर ग्रहण भी लग सकता है. असल में केजरीवाल के माफी मांगने की यह एक प्रमुख वजह है.

व्यक्तिगत रूप से अपने राजनैतिक कैरियर को बचाने के साथ-साथ अरविन्द केजरीवाल पार्टी की राजनीति को भी बचाए रखना चाहते हैं. उनको इसका सहजता से भान है कि आगामी वर्ष में लोकसभा का चुनाव होना है. चार साल गुजर जाने के बाद भी केंद्र सरकार पर, उसके किसी मंत्री, सांसद पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं. नोटबंदी, जीएसटी जैसे मुद्दे पर विपक्षियों द्वारा तमाम विरोध के बाद भी आमजनमानस ने केंद्र सरकार के निर्णय के साथ अपनी सहमति व्यक्त की थी. विगत चार सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुए चुनावों में भाजपा लगातार विजयी होती रही है. उन राज्यों में जहाँ उसके लिए एक-एक सीट निकालना कभी स्वप्न हुआ करता था, आज सरकार बनाये हैं या फिर सरकार में शामिल हैं. ऐसे में राजनीति में एक अलग तरह का खेल खेल रहे केजरीवाल जानते हैं कि जनता को भाजपा, मोदी के खिलाफ करना आसान नहीं होगा. ऐसे में बजाय जनता को उनके खिलाफ करने के किसी न किसी कदम से अपनी तरफ मोड़ा जाये. इसके पीछे कारण यह है कि दिल्ली की सत्ता दोबारा संभालने के बाद से केजरीवाल की पार्टी विधायकों की साख बहुतेरे मुद्दों में गिरी है. कई सारे विधायक अनेकानेक मामलों में संलिप्त भी पाए गए हैं. लगभग दो दर्जन से अधिक विधायकों की सदस्यता पर भी तलवार लटक गई है. प्रशासनिक अधिकारी के साथ हाथापाई का ताजातरीन मामला भी उनके गले की फांस बना ही हुआ है. बतौर मुख्यमंत्री उनका और दिल्ली उपराज्यपाल विवाद भी लगातार सुर्ख़ियों में रहा है. सरकारी मशीनरी का, धन का प्रचार-प्रसार के लिए दुरुपयोग का मामला भी केजरीवाल को झेलना पड़ा है. इन तमाम सारे मामलों से केजरीवाल की उस छवि को जबरदस्त धक्का लगा है जो उनके दिल्ली मुख्यमंत्री बनने के दौरान बनी हुई थी. उनकी राजनीति में वही सारे लक्षण परिलक्षित होने लगे हैं, जिनसे अकुलाकर दिल्ली की जनता ने उन्हें मुख्यमंत्री की सीट तक पहुँचाया था. ऐसे में उनके और उनकी पार्टी के लिए न केवल आगामी लोकसभा चुनाव में वरन दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी मुश्किलें आ सकती हैं.

ऐसा नहीं कि केजरीवाल को ऐसी स्थितियों का भान नहीं होगा. अपने आने वाली मुश्किलों को देखते हुए ही केजरीवाल ने माफ़ी-राजनीति करने का निर्णय लिया है. उनके इस कदम से भले ही उनकी पार्टी के लोग उनसे सहमत नहीं दिख रहे हों मगर उनके समर्थकों द्वारा इसे राजनीति में एक सार्थक कदम बताया जा रहा है. असल में केजरीवाल इस कदम से जनता की सहानुभूति जुटाने की जुगत में लगे हैं. जिन विकास-कार्यों को आगे बढ़ाने की बात वे आज कर रहे हैं वही बात विगत तीन-चार वर्षों में उनके द्वारा क्यों नहीं की गई? किसी भी आरोप के साथ कई-कई सबूत होने का दम भरने वाले केजरीवाल के माफ़ी मांगने का सीधा सा अर्थ है कि वे आरोप महज राजनीति करने के लिए लगाये गए थे? केजरीवाल ने विगत कुछ सालों के आन्दोलन और राजनीति के द्वारा आसानी से समझ लिया है कि यहाँ की जनता चुनाव के दौरान बहुत पीछे का दौर याद नहीं रखती है. इसके साथ ही मतदान करते समय जनता भावुकता में भी निर्णय लेती है. आन्दोलन की भावुकता के बाद सत्ता का स्वाद चखने वाले केजरीवाल आगामी चुनावों में इस स्वाद को ख़राब नहीं करना चाहते हैं. जनता की इसी भावुकता को माफीनामे का मुलम्मा चढ़ा कर वे और मासूमियत से जनता के सामने फिर से प्रस्तुत करना चाहते हैं. जिससे सत्ता का बना हुआ स्वाद ख़राब न होकर पुनः उनके मुख में ज्यों का त्यों लगा रहे.



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यह आलेख जनसंदेश टाइम्स, दिनांक 23-03-2018 के सम्पादकीय में प्रकाशित है.