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13 नवंबर 2025

निष्क्रिय कार्यव्यवस्था

निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के प्रशासनिक ढाँचे की, अधिकारियों की, कर्मचारियों की निष्क्रिय कार्यप्रणाली निराशा पैदा करने लगी है. पिछले दो-तीन साल में व्यक्तिगत समस्याओं के साथ-साथ अन्य लोगों की परेशानियों के सम्बन्ध में की गई अनेक शिकायतों में नकारात्मकता ही हाथ लगी. इस तरह की स्थिति से भ्रष्ट, लापरवाह, पक्षपाती कार्य-संस्कृति को, कार्य-प्रणाली को, आचरण को, व्यक्तियों को बेलगाम होने का अवसर मिलता है. ऐसे में तमाम सारी विसंगतियों की, अव्यवस्थाओं की, भ्रष्टाचार की, निरंकुशता की शिकायत करना समय, श्रम, धन, क्षमता आदि का अपव्यय लगता है.

 

बावजूद इसके शांत होकर तो बैठा नहीं जा सकता है, विसंगतियों को सहन भी नहीं किया जा सकता है, भ्रष्ट कार्य-संस्कृति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. सवाल ख़ुद से ही पूछते हैं कि क्या कभी ये दशा सुधरेगी? क्या कभी पारदर्शी व्यवस्था बनेगी? क्या समूचे तंत्र में दायित्व बोध जागेगा? क्या जनमानस की समस्याओं के प्रति संवेदनात्मक वातावरण बनेगा?

 

ऐसे अनेक प्रश्नों के साथ संघर्ष चलता रहेगा! चलता ही रहेगा!!





18 फ़रवरी 2025

प्रशासनिक व्यक्तियों को रवैया सुधारने की आवश्यकता

ओडिशा के भुवनेश्वर में कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (KIIT – केआईआईटी) के एक छात्रावास में एक नेपाली छात्रा के मृत पाए जाने के बाद इस निजी इंजीनियरिंग संस्थान में नेपाली विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया. दरअसल नेपाली छात्रा प्रकृति का शव मिलने के बाद संस्थान के कुछ विद्यार्थियों द्वारा इसे आत्महत्या न बताकर हत्या बताया. विद्यार्थियों ने आरोप लगाया कि प्रकृति के बैच का ही भारतीय छात्र उसे प्रताड़ित कर रहा था. शिकायतें करने के बाद भी संस्थान की तरफ से उस लड़के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. यद्यपि मृतक छात्रा के चचेरे भाई की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी भारतीय छात्र को गिरफ्तार करके उसके खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज किया है तथापि विद्यार्थियों का कहना है कि संस्थान इस मामले को दबाने का कार्य करता रहा.

 

इस घटना के बाद कैम्पस में स्थिति तनावपूर्ण होने लगी थी. 16 फरवरी की शाम बी-टेक थर्ड ईयर की नेपाली छात्रा प्रकृति का शव कॉलेज के हॉस्टल में मिलने के बाद नेपाली विद्यार्थियों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. इसी के बाद संस्थान द्वारा जवाबी कार्यवाही करते हुए नेपाली विद्यार्थियों को संस्थान, हॉस्टल छोड़ने के निर्देश दिए गए. विद्यार्थियों का कहना था कि विश्वविद्यालय के स्टाफ ने सभी विद्यार्थियों से तत्काल हॉस्टल खाली करने को कहा. इस दौरान उनके साथ मारपीट किये जाने का भी आरोप लगाया गया. संस्थान की तरफ से अमानवीयता सी दिखाते हुए विद्यार्थियों को दो बसों में भरकर कटक रेलवे स्टेशन पर उतार दिया गया. ये सोचने वाली बात है कि संस्थान के कर्मी नेपाल जाकर वहाँ से विद्यार्थियों को अपने संस्थान में अध्ययन करने हेतु लेकर आते हैं. सैकड़ों की संख्या में नेपाली विद्यार्थी यहाँ इंजीनियरिंग में अध्ययनरत हैं. ऐसे में संस्थान प्रशासन को इन विद्यार्थियों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए.

 

इस सन्दर्भ में एक स्थिति विचारणीय है कि आजकल व्यक्ति हो अथवा संस्थान सभी के ऊपर पद, प्रतिष्ठा का अहंकार बहुत बुरी तरह से हावी है. ये आवश्यक नहीं कि व्यक्ति निजी सेवा में है अथवा सरकारी सेवा में, ये भी आवश्यक नहीं कि वह किस श्रेणी का कर्मचारी है अथवा अधिकारी है, उसके पास यदि किसी भी तरह का अधिकार है तो बहुतायत में वह उसका दुरुपयोग ही करता है. उसके स्तर से काम चाहे छोटा हो अथवा बड़ा, सामने वाले पर पूरी हनक दिखाई जाती है. संस्थानों की स्थिति भी कुछ इससे अलग नहीं है. यहाँ भी विभिन्न पदों पर व्यक्ति ही बैठे हुए हैं जो मूलरूप से अहंकारी शैली को अपनाए हुए रहते हैं. यही कारण है कि केआईआईटी प्रशासन ने पूरे मामले को गम्भीरता से लेते हुए इस घटना के मूल में पहुँचने की कोशिश किये बिना अपनी तानाशाही, अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए नेपाली विद्यार्थियों से संस्थान से बाहर निकाल दिया.

 

अब खबर है कि नेपाली छात्रा की मृत्यु के मामले में अब तक छह लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका हुई है. छात्रा के बैचमेट भारतीय छात्र के बाद संस्थान के तीन डायरेक्टर और दो सिक्योरिटी गार्ड्स को गिरफ्तार किया गया. दो देशों के बीच का मामला होने के कारण आनन-फानन इस मामले की जाँच के लिए ओडिशा सरकार ने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव और उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त-सह-सचिव वाली हाई लेवल फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन कर दिया है. इस कमेटी की जाँच का परिणाम क्या होगा ये तो बाद की बात है मगर इस संस्थान सहित अन्य सभी संस्थानों के पदाधिकारियों, कर्मियों को अपने व्यवहार में बदलाव लाने की आवश्यकता है.


20 जून 2024

सरकार के खिलाफ गलत टिप्पणी पर कार्यवाही

उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी सेवकों द्वारा प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, इंटरनेट तथा डिजिटल मीडिया में वक्तव्य देने या पोस्ट करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है.

जारी शासनादेश के तहत अब कोई भी राज्यकर्मी सरकार की नीतियों या फिर विभागीय निर्णयों के प्रति गलत टिप्पणी करेगा तो उस पर कार्रवाई हो सकती है.






 

16 फ़रवरी 2023

अनुशासन का स्वयं में पालन करना सीखें

ऐसा बहुत बार सबके देखने में आता होगा कि उनके शहर में किसी न किसी संस्था के कार्यक्रम में किसी न किसी प्रशासनिक अधिकारी को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है. अतिथि रूप में शब्दों में बदलाव होते रहना अलग बात है. कोई मुख्य अतिथि के रूप में, कोई विशिष्ट अतिथि के रूप में. किसी कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारी का आना उस कार्यक्रम के संयोजक के लिए मानो गर्व की बात होती है. एक तरफ हम सभी जनप्रतिनिधियों को, प्रशासनिक अधिकारियों को जनता का सेवक बताते नहीं थकते हैं मगर यदि इनको अपने किसी कार्यक्रम में बुलाना है तो ये किसी भगवान से कम नजर नहीं आते हैं. किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के या फिर जनप्रतिनिधि के आने से कार्यक्रम संयोजक को अपने आपमें बहुत अधिक गौरव की अनुभूति होने लगती है. उस समय वह भूल जाता है कि अभी कुछ दिन पहले ही वह इनको जनता का सेवक बताते हुए गरियाने में लगा हुआ था. 




बहरहाल, जनप्रतिनिधियों का हाल तो इस देश के नागरिकों ने पहले से ही ख़राब कर रखा है. एक सामान्य नागरिक भी ये मानने लगा है कि राजनीति बहुत गन्दी, बेकार चीज है. इसकी बात करना खुद को कलंकित करने जैसा है. इसके उलट आज भी देश के नागरिकों के लिए सिविल सेवा का अधिकारी किसी भगवान से कम नहीं. उसकी निगाह में किसी प्रशासनिक अधिकारी का चयन विश्व की सबसे कठिन परीक्षा के बाद होना होता है. एक सामान्य से व्यक्ति के लिए निश्चित ही कोई प्रशासनिक अधिकारी किसी भगवान से कम नहीं होता है, जब वह देखता है कि उस एक व्यक्ति के चारों तरफ जी-जी करने वालों की, जी-हुजूरी करने वालों की भीड़ लगी है. लाल-नीली बत्तियाँ भले ही उनकी गाड़ियों से उतर गई हों मगर जिस तरह से खाकी के कारण उनकी हनक बीच बाजार देखने को मिलती है, वह किसी भगवान से कम नहीं.


ऐसे हनक वाले भगवान को यदि कोई अपने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनाता है तो वह गलत नहीं करता है. गलत तो वे लोग होते हैं जो उस कार्यक्रम के दिए गए समय पर वहाँ पहुँच जाते हैं. समय पर पहुँचने पर जानकारी होती है कि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रशासनिक भगवान अभी आये नहीं हैं. उनको आने में अभी समय लगना है. कार्यक्रम संयोजक द्वारा आमंत्रित भगवान के दर्शन वह सामान्य नागरिक भी करना चाहता है, सो वह चुपचाप अपने समय की बर्बादी देखता हुआ वहाँ बैठा रहता है. यहाँ एक मूल बात प्रशासनिक अधिकारियों को समझने की आवश्यकता है कि आज भी बहुत सारे युवा ऐसे हैं जो उनको आदर्श मानते हुए सिविल सेवा की तैयारी में लगे रहते हैं. ऐसे युवाओं के लिए सिविल सेवा में जाना हनक के लिए नहीं बल्कि समाजसेवा के लिए होता है. ऐसी सोच के बाद जब वह देखता है कि उनका आदर्श प्रशासनिक अधिकारी स्वयं अनुशासित नहीं है, तो वह भी कहीं न कहीं उस हनक के वशीभूत वैसा ही आचरण करने की मानसिकता बना लेता है.


प्रशासनिक अधिकारियों को चाहिए कि वे स्वयं में अनुशासित रहकर अपनी आने वाली पीढ़ी को एक सकारात्मक सन्देश दें. प्रशासनिक अधिकारी आये दिन विद्यालयों, महाविद्यालयों के विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होते रहते हैं, अपने पद के अहंकार में, उसकी हनक में वे सभी कार्यक्रमों में निश्चित रूप से बहुत अधिक विलम्ब से पहुँचते हैं. ऐसी स्थिति में वे उन बच्चों के सामने अथवा ऐसे किसी अन्य कार्यक्रम में किसी तरह का आदर्श प्रस्तुत नहीं कर रहे होते हैं. उन प्रशासनिक अधिकारियों को खुद में यह जिम्मेवारी महसूस करनी चाहिए कि वे समय का अनुपालन करें, स्वयं में अनुशासित रहे. ऐसा करके वे समाज को एक सन्देश दे सकते हैं.