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28 सितंबर 2024

ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता

ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता के सन्दर्भ में अक्सर विचार करते हैं, शासन-प्रशासन के प्रयासों को देखते हैं. इसे कम से कम अब सही ढंग से समझने की कोशिश होनी चाहिए. हमारा सन्दर्भ है कि यदि एक बालिग व्यक्ति किसी दो-पहिया या चार-पहिया वाहन को अथवा उससे बड़े वाहन को चला लेता है तो फिर उसके लिए ड्राइविंग लाइसेंस लेने की बाध्यता क्यों? अपने देश में बहुतायत में ड्राइविंग लाइसेंस किसी भी स्थिति में व्यक्ति को कुछ सिखाते नहीं. न वाहन चलाना, न ट्रेफिक के नियम, न सड़क के नियम. यदि मान भी लिया जाये कि ड्राइविंग लाइसेंस देने से पहले वो सबकुछ सिखाया जाता है जो एक वाहन चालक के लिए आवश्यक है तब भी सड़क पर सबसे ज्यादा दुर्घटना उन्हीं के द्वारा होती हैं जो ड्राइविंग लाइसेंस धारक हैं.

 

यहाँ दो बातें ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन चालन के सन्दर्भ में याद रखनी चाहिए कि ड्राइविंग लाइसेंस की अहमियत यदि सिर्फ व्यक्ति की पहचान तक है तो फिर वर्तमान में बहुत से प्रमाण व्यक्ति की पहचान के हैं. आधार कार्ड इसमें सबसे आगे दिख रहा है. अब आगे बढिए, यदि सड़क पर किसी व्यक्ति द्वारा कोई दुर्घटना की जाती है या फिर उससे हो जाती है तो उससे सम्बंधित कई बिंदु हैं जो व्यक्ति की पहचान सिद्ध करते हैं. एक तो वह वाहन पंजीकृत होगा. उसका नंबर होगा. उसके आधार पर संदर्भित व्यक्ति की पहचान की जा सकती है.

 

दुर्घटना वाली स्थिति में व्यक्ति तीन तरह से मिल सकता है. घायल, मृत या फिर दुर्घटना स्थल से फरार. यदि व्यक्ति घायल है तो उसकी पहचान के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह स्वयं अपनी पहचान सिद्ध करेगा. यदि व्यक्ति मृत है तो फिर उसके पास से मिले दस्तावेजों के आधार पर उसकी पहचान की जाएगी. इसमें आधार कार्ड या कोई अन्य पहचान पत्र काम करेगा. इसके साथ-साथ यदि व्यक्ति फरार है तो फिर सम्बंधित वाहन का पंजीकरण, उसका नंबर सम्बंधित व्यक्ति तक पहुँचा देगा. अब यदि वाहन और व्यक्ति दोनों ही फरार हैं तो फिर ड्राइविंग लाइसेंस क्या चूं-चूं बोलेगा?

 

विगत कई सालों का व्यक्तिगत अनुभव है कि ड्राइविंग लाइसेंस के नाम पर व्यक्ति का शोषण किया जा रहा है. इस माध्यम से दलाली पनप रही है, रिश्वतखोरी को बढ़ावा मिल रहा है. अनाप-शनाप तरीके से, मनमाफिक ढंग से अधिकारियों, दलालों की मिलीभगत से ड्राइविंग लाइसेंस के नाम पर भ्रष्टाचार चरम पर है. सोचियेगा, ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता क्यों जबकि दुर्घटनाएँ तो लाइसेंस वाले भी कर रहे हैं?


08 जून 2022

सड़क दुर्घटनाएँ और नागरिक कर्तव्य

आजकल सड़क दुर्घटनाओं के समाचार सुनाई देना आम बात हो गई है. इन दुर्घटनाओं में मारे जाने वालों में अधिकतम संख्या बच्चों की दिख रही है. ये चिंताजनक है मगर इसके बाद भी ऐसा लगता है जैसे समाज के बहुतायत लोग इस तरफ से मुँह मोड़े बैठे हैं. यदि आसपास के माहौल पर गौर करें तो बच्चों, किशोरों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के मूल में कारण तेज रफ़्तार वाहन का चलाया जाना है. बाइक के खुलेआम होते स्टंट, चार पहिया वाहन का अनियंत्रित रफ़्तार से दौड़ाया जाना, सुरक्षा मानकों का न मानना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण सड़क दुर्घटनाएँ आम हो चली हैं. ऐसी घटनाओं पर समाज क्षणिक प्रतिक्रिया देते हुए प्रशासन को दोषी बना देता है. 


किसी भी तरह की दुर्घटना पर शासन-प्रशासन को जिम्मेवार बताकर अपने आपको दोषमुक्त कर लेने की संकल्पना आज सहज रूप में दिखाई देने लगी है. क्या वाकई एक सामान्य नागरिक का दायित्व, उसका कर्तव्य इतना ही है? क्या वाकई समूची जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ प्रशासन की है? हम नागरिकों की, माता-पिता की, घर-परिवार की कोई जिम्मेवारी नहीं है? क्या शैक्षणिक संस्थानों का एकमात्र उद्देश्य पाठ्यक्रम को समाप्त करवाना भर रह गया है? क्या शिक्षकों का, शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व नहीं है कि वे अपने यहाँ पढ़ने वाले बच्चों को सजगता, सतर्कता, सुरक्षा के बारे में जागरूक करें?  क्या पारिवारिक स्तर पर बच्चों को संयमित रहने, अनुशासित रहने के बारे में नहीं बताया जा सकता है?




इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि उसके शहर में, उसके कस्बे में स्कूल यूनिफार्म पहने किशोर बाइक स्टंट करते किसी न किसी सड़क पर दिख जाते हैं. तेज गति से फर्राटा भरती बाइक, बिना हेलमेट के चलाई जाती बाइक, तीन-तीन लोगों का बाइक पर जमे होना किसी के लिए आपत्तिकारक नहीं रह गया है. यदि इस तरह की हरकतों को रोकने का काम किया जा रहा है तो सिर्फ प्रशासन द्वारा, आम नागरिक ऐसी टोकाटाकी से खुद को दूर ही रखे हैं. इसका कारण इन उद्दंड युवाओं, किशोरों द्वारा गाली-गलौज करना, हाथापाई करना है.


नियमानुसार स्कूल में पढ़ रहे बच्चों का ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बन सकता है. ऐसे में विडम्बना यह है कि ऐसे बच्चों को न तो घर-परिवार में रोका जाता है और न ही सड़क पर यातायात पुलिस के द्वारा उनको प्रतिबंधित किया जाता है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि स्कूल के बच्चे को बाइक किसी घर से ही मिली होगी. चाहे वो उसका अपना घर रहा हो अथवा उसके किसी दोस्त का. क्या उनके माता-पिता का दायित्व नहीं बनता है वे बच्चों को बाइक चलाने से रोकें. यहाँ दुर्घटना होने की स्थिति में प्रशासनिक लापरवाही से अधिक पारिवारिक लापरवाही का मामला सामने आता है. ऐसी कई-कई दुर्घटनाएँ नदियों, बाँधों, रेलवे ट्रेक, सड़क, आदि पर आये दिन दिखाई देती हैं.


प्रथम दृष्टया ऐसे मामलों में प्रशासन को दोषी ठहराया जा सकता है. किसी भी नागरिक की सुरक्षा का दायित्व प्रशासन का है. महज इतने भर से आम नागरिक अथवा परिवार भी अपने दायित्व से मुँह नहीं मोड़ सकता है. बच्चों को घर में, स्कूल में जागरूक किया जाना चाहिए. न केवल अपनी सुरक्षा वरन अन्य दूसरे नागरिकों की सुरक्षा के बारे में बताया जाना चाहिए. हमें समझना होगा कि प्रशासनिक तंत्र के पास नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक-विकास के, समाज-विकास के अनेकानेक कार्य होते हैं. एक सामान्य अवधारणा में नागरिकों की संख्या की तुलना में सरकारी मशीनरी, प्रशासनिक तंत्र बहुत-बहुत छोटा और अत्यंत सीमित है. उसकी पहुँच प्रत्येक क्षेत्र में बना पाना न तो व्यावहारिक है और न ही सरल है. ऐसे में आम नागरिक की भी जिम्मेवारी बनती है कि वो समाज में प्रशासनिक भूमिका निर्वहन के लिए खुद को तैयार करे. जीवन कितना अनमोल है इसकी अहमियत बच्चों को, नौजवानों को बताये जाने की आवश्यकता है.


ध्यान रखना चाहिए कि जिन बच्चों को देश की, समाज की आधारशिला रखनी है, उसका भविष्य बनना है उनका यूँ चले जाना किसी के हित में नहीं है. किसी भी बच्चे का, नौजवान का चले जाना जितना हानिकारक और दुखद एक परिवार के लिए है, उतना ही किसी समाज और देश के लिए भी है. यदि समाज का एक-एक नागरिक, माता-पिता, शिक्षक स्वयं को प्रशासन का अंग मानकर बच्चों को सचेत करने का कार्य करें, बच्चों को अनुशासित करने का दायित्व निभाएं, बच्चों को जीवन की महत्ता के बारे में समझाएँ तो आये दिन बच्चों की लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है. बच्चों को असमय मौत के आगोश में जाने से रोका जा सकता है. परिवार, समाज, देश की अमूल्य क्षति को रोका जा सकता है.  


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