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07 जुलाई 2026

मन में घुसती अश्लीलता

जिस तरह से अश्लीलता, सेक्स, नंगपन, कामुकता आदि को ग्लोरिफाई करके मोबाइल के माध्यम से रील्स बनाकर, लाइव शो के रूप में, गीत-संगीत-कार्यक्रम के द्वारा लोगों के दिमाग में घुसाया जा रहा है, उस पर रोक लगाने की आवश्यकता है. चौबीस घंटे नग्न/अर्धनग्न देह, यौन-सम्बन्धों में लिपटे दृश्य, अश्लीलता में रचे संवाद, कामुकता में रचे हाव-भाव के निर्बाध प्रदर्शन, प्रसारण के दुष्परिणाम की को अभी हम लोग गम्भीरता से समझ नहीं रहे हैं. फुटकर-फुटकर में सामने आती कुछ घटनाओं पर रोना रो लेते हैं, कुछ विरोध प्रदर्शन कर लेते हैं, कुछ अपराधियों की ठुकाई कर लेते हैं और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं.

 

समाज में फैलता जा रहा लिजलिजापन धीरे-धीरे हमारे परिवारों में, हमारे दिल-दिमाग में भी फैलता जा रहा है. किसी बेटी, महिला के साथ होने वाली किसी अमानुषिक घटना पर अपना रोष प्रकट कर लेते हैं, कुछ कठोर विचाराभिव्यक्ति कर लेते हैं और फिर वापस उसी लिजलिजेपन में लोट लगाने लगते हैं. लगभग मुफ्त के भाव से मिलते इंटरनेट से मुफ्त में मिलती कामुकता, नग्न देह, सेक्स को रोके जाने के लिए हम सबको जागना होगा. यदि आज ऐसा करने को न उठे तो कल को दरिंदगी वाली घटना का शिकार.......?????????

 

समझे??

 


26 अप्रैल 2026

अंत की ओर बढ़ता समाज?

पिता द्वारा अपने बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने की, माँ द्वारा अपनी संतान को कुँए में फेंकने की, पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे की हत्या करवाने-करने की, प्रेमी-प्रेमिका द्वारा सम्बन्धों में बाधक बनने पर परिजनों की हत्या कर देने की घटनाएँ अब लगभग रोज ही पढ़ने को मिलने लगी हैं. आपराधिक कृत्यों की ये घटनाएँ समाचार मात्र नहीं हैं बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का, पारिवारिक मूल्यों के समाप्त होते जाने का संकेत हैं. इस तरह की घटनाएँ बताती हैं कि इंसान का तेजी के साथ मानसिक और सामाजिक क्षरण होता जा रहा है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य जब घृणित अपराधों का ताना-बाना बुना जाने लगता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी सामाजिकता में बड़ी गिरावट आ चुकी है. इन घटनाओं को किसी एक व्यक्ति की अथवा व्यक्तियों के समूह की विकृति कह कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. देखा जाये तो ऐसी घटनाएँ हमारी बदलती जीवनशैली, गिरते नैतिक मूल्यों और बढ़ते अलगाव के कारण उत्पन्न होती हैं.

 

दरअसल आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने व्यक्ति को मानसिक दबाव में जकड़ लिया है. इस दबाव ने उसे अकेलेपन का भी एहसास कराया है. ऐसी स्थिति में उसे अनुभव होने लगता है कि उसके प्रति लोगों का, परिवार का, समाज का समर्पण नहीं है. सामान्य रूप में कहा जाये तो वह व्यक्ति स्वयं को सामुदायिक समर्थन-विहीन समझने लगता है. वर्तमान नाभिकीय परिवारों और फ्लैट कल्चर ने व्यक्ति के अकेलेपन को और बढ़ा दिया है. इस एकाकीपन ने मनुष्य को भावनात्मक रूप से कमजोर तो बनाया ही है साथ ही मानसिक अवसाद जैसी स्थिति ने उसे हिंसक भी बना दिया है. इसी अवसाद, हिंसक व्यवहार, अकेलेपन ने परिवारवाद के स्थान पर व्यक्तिवाद को प्रमुखता दी है और इसके चलते नैतिक मूल्यों का पतन चारों ओर दिखाई देने लगा है. न केवल समाज में अपरिचित लोगों के मध्य बल्कि परिवार में भी स्वार्थ और कुत्सित वासनाओं से भरा व्यवहार चलन में आता जा रहा है. रिश्तों की पवित्रता पर व्यक्तिवाद और कामुकता हावी होती जा रही है. यह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में लोगों ने सही और गलत के बीच का अंतर समझना बंद कर दिया है.

 



सामाजिक अकेलेपन, व्यक्तिवाद, संकुचित सोच के साथ-साथ यदि विस्तीर्ण रूप में विचार करें तो वर्तमान में व्यक्ति के मन-मष्तिष्क को अपने नियंत्रण में करते जा रहे डिजिटल युग, सोशल मीडिया को भी नकारा नहीं जा सकता है. इसके चलते चरित्र निर्माण, नैतिकता, सहानुभूति आदि तो पूरी तरह से रसातल की ओर जा रहे हैं. इस दुनिया ने मनुष्य के भीतर एक तरह की होड़ पैदा करवा दी है. दूसरों की चमक-धमक, उसकी आभासी शानो-शौकत देखने से वह खुद को हीन महसूस करने लगता है. ऐसी कथित हीनभावना के कारण मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे ईर्ष्या, क्रोध पनपने लगता है. इस तरह की नकारात्मकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य इंटरनेट पर परोसी जा रही हिंसा और अश्लीलता के द्वारा किया जाने लगता है. लगातार आँखों के सामने से गुजरती हिंसा, वीभत्सता ने मानवीय मस्तिष्क को संज्ञा-शून्यता की स्थिति में ला खड़ा किया है. ये सहज रूप में देखने में आया है कि अब दुर्घटना की, अपराध की, मृत्यु की, हिंसा की खबरें विचलित करने के स्थान पर उनको शेयर करने के लिए उकसाती हैं. इस संवेदनहीनता ने मानसिक विकार को जन्म दिया है जो मनुष्य को अपराध के रास्ते पर ले जाता है.

 

नैतिकता, मूल्य, सामाजिकता, पारिवारिकता, हिंसा, अश्लीलता आदि को भले ही एकबारगी सामाजिक विघटन के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाये किन्तु यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कानून व्यवस्था के कारण भी आपराधिक प्रवृत्ति वालों के हौसले बुलंद रहते हैं. इन घटनाओं के पार्श्व में न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी और कानून के भय का कम होना भी शामिल है. यद्यपि केवल कानून से समाज नहीं सुधर सकता है तथापि इसके लिए समाज को भी बदलना होगा. हमें फिर से उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहाँ इंसान, इंसानियत, रिश्तों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि का सम्मान होता था. जहाँ परिवार का अस्तित्व था, रिश्तों में मर्यादा थी, आपस में संवादहीनता नहीं थी, पारिवारिक सदस्य एक दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे.

 

समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करनी होगी. शिक्षा क्षेत्र में जीवन कौशल, संवेगात्मक बुद्धि पर ध्यान देना होगा जिससे लोग संवेदनशील इंसान भी बन सकें. मन-मष्तिष्क को, ह्रदय को विचलित करने वाली ये घटनाएँ हमारे लिए एक चेतावनी है. यदि हमने अब भी अपने सामाजिक और नैतिक ढाँचे को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो रिश्तों की गरिमा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी. तकनीक और आधुनिकता के साथ-साथ अपने मूल्यों और संस्कारों को भी विकसित करना होगा. ध्यान रखना होगा कि इस तरह के आपराधिक कृत्यों से केवल एक परिवार का नहीं बल्कि यह एक सभ्यता का, एक समाज का अंत होता है. जीवन की आपाधापी में, कथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए हमें एक पल को रुक कर विचार करना होगा कि कहीं हम समाज को उसके अंत की तरफ तो नहीं ले जा रहे? 

 


22 मार्च 2026

पानी की बर्बादी को रोकना होगा

मनुष्य के लिए पानी हमेशा से एक महत्वपूर्ण और जीवन-दायक पेय रहा हैये बात हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है. इसके साथ ही इस बात से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं कि कि जल सभी के जीवित रहने के लिए अनिवार्य है. ऐसा माना जाता है कि मनुष्य बिना भोजन के लगभग दो माह तक जीवित रह सकता है किन्तु बिना पानी के एक सप्ताह भी जीवित रहना मुश्किल है. इधर मानवीय क्रियाकलापों के कारण धरती लगातार पेयजल-विहीन होती जा रही है. जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से विश्व भर में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत कीजिसकी घोषणा वर्ष 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में की गई. इसके अंतर्गत सर्वप्रथम वर्ष 1993 में 22 मार्च के ही दिन सम्पूर्ण विश्व में जल संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता लाने का कार्य किया गया. 



पूरी धरती के 70 प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी इसका कुल एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. आज सभी को जल की उपलब्धता करवाना मुख्य मुद्दा है. आने वाले समय में बिना जल-संरक्षण के ऐसा कर पाना कठिन कार्य होगा. इस दृष्टि से जल संरक्षण भी एक बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति भी एक मुद्दा बना हुआ है क्योंकि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इसके चलते संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष 35 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. विकासशील देशों में जल से उत्पन्न रोगों को कम करना स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है. आज हमारा देश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व जल-संकट से जूझ रहा है. जल सहयोग के रूप में प्रमुख कार्य पानी के बारे में जागरूकता बढाने और उसकी अहमियत की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का होना चाहिए. जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी होगी और पानी की बर्बादी को रोकना होगा. इसके अतिरिक्त वर्षा जल के संरक्षण के उपाय खोजने होंगे तथा घरेलू उपयोग में भी जल-संरक्षण के प्रति सचेत होना पड़ेगा. यदि हम आज इसका उपयोग सावधानी एवं किफायत से न करेंगे तो भविष्य में स्थिति अत्यंत ही गंभीर हो सकती है.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल करअव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता हैशेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबोंजलाशयोंकुँओं आदि को गन्दगी सेकूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव होनए-नए तालाबोंकुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर परसीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैंउपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगेभविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.

07 मार्च 2026

साधू-संन्यासी और लम्बे काले बाल

कई बार अचानक से मन में कोई विचार उत्पन्न होता है और उस बारे में आसपास खोजबीन करने की इच्छा होने लगती है.


इस बारे में बहुत समय से गौर किया जा रहा था कि जो साधु-संन्यासी-संत आदि होते हैं, उनके सिर पर भरपूर बाल दिखाई पड़ते हैं. जिन्होंने स्वतः ही मुंडन करा रखा है, उनकी बात अलग अन्यथा की स्थिति में साधु-संन्यासी-संत आदि को गंजे वाली स्थिति में, कम बालों वाली स्थिति में नहीं ही देखा है. लगा, ऐसा तो नहीं कि हम लोगों ने अपना रहन-सहन, जीवन-शैली आदि इस तरह की कर ली है कि शैम्पू, क्रीम, तेल आदि का आधुनिक रूप, रासायनिक रूप प्रयोग में लाने लगे हैं?


जो भी हो मगर कुछ तो है जो आधुनिक युवाओं को कम समय में ही गंजा किये जा रहा है और ये बाबा लोग घनघोर बालों के साथ दिख रहे हैं.

04 जनवरी 2026

उँगलियाँ बनी आँखें, बिन्दु बने अक्षर

04 जनवरी को ब्रेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018 में आधिकारिक रूप से 04 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस घोषित किया. इसके बाद ही पहला अंतरराष्ट्रीय ब्रेल दिवस 04 जनवरी 2019 को मनाया गया. यह दिवस लुईस ब्रेल के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने दृष्टिहीनों के लिए एक लिपि का निर्माण किया. उनके नाम पर ही इस लिपि को ब्रेल लिपि कहते हैं. इस लिपि में बिन्दु का प्रयोग किया जाता है और इनको उँगलियों के पोरों के सहारे छू कर महसूस किया जाता है. एक-एक बिन्दु के स्पर्श से शब्द का निर्माण होता है और दृष्टिहीन व्यक्ति अपनी पढ़ाई को पूरा करता है.

 


लुईस ब्रेल का जन्म फ्रांस के कुप्रे गाँव में 04 जनवरी 1809 को हुआ था. मात्र तीन वर्ष की उम्र में खेलते समय चाकू जैसे एक औजार की चोट से उनकी एक आँख में चोट लग गई. आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण बच्चे लुईस को सही से इलाज न मिल सका. इस कारण से चोटिल आँख का इन्फेक्शन दूसरी आँख में भी फैल गया. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आठ वर्ष की उम्र तक आते-आते लुईस पूरी तरह नेत्रहीन हो गए. लुईस जब बारह वर्ष के हुए उसी समय उनको जानकारी मिली कि फ्रांसीसी सेना के लिए ‘नाइट राइटिंग’ नामक एक खास कूटलिपि बनाई गई है, इस लिपि के द्वारा सैनिक अंधेरे में गुप्त संदेश पढ़ सकते हैं. लुईस ने अपने स्कूल के पादरी के माध्यम से इस कूटलिपि को विकसित करने वाले कैप्टन चार्ल्स बार्बर से मुलाकात की. इनसे मुलाकात के बाद ही उनके मन में नेत्रहीनों के लिए एक लिपि बनाने का विचार आया. इसके बाद सन 1829 तक छह बिन्दुओं पर आधारित ‘ब्रेल लिपि’ तैयार कर ली.

 

वर्तमान में इस लिपि की तकनीक को इतना उन्नत कर लिया गया है कि अब इसका उपयोग कम्प्यूटर कीबोर्ड और स्मार्टफोन के सॉफ्टवेयर में भी व्यापक रूप से किया जा रहा है.


25 दिसंबर 2025

स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित होते युवा

दिन का समय, चलती ट्रेन का डिब्बा, दो विषमलिंगी युवा, बेशर्म-अमर्यादित आचरण, सार्वजनिक रूप से होती अंतरंगता. अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए उन वीडियो ने दिखाया कि किस तरह से देह की माँग और यौनेच्छा की पूर्ति ने पारम्परिक मान्यताओं को ध्वस्त ही कर दिया. चलती ट्रेन के सार्वजनिक कोच में नितांत बेशर्मी के साथ युवाओं की गतिविधियों ने समाज की इस प्रचलित धारणा को और बल दिया कि आज की पीढ़ी संस्कारों, मर्यादा को भूलकर स्वार्थ में लिप्त होती चली जा रही है. इस घटना के पहले भी युवाओं की अंतरंगता सम्बन्धी वीडियो, चित्र सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे हैं. इन वीडियो, चित्रों में युवा बदलते रहे, उनके संसर्ग करने के स्थान बदलते रहे मगर सभी में मानसिकता एक ही रही, अपने परिवेश, अपने संस्कार, अपनी मर्यादा का त्याग करना. कॉलेज, लाइब्रेरी, पार्क, लिफ्ट, बाज़ार, पार्किंग आदि-आदि सार्वजनिक स्थल खुलेआम बेशर्मी भरे कृत्यों के गवाह बनने लगे.

 

वैश्वीकरण, आधुनिकता के दौर में ऐसा बहुत पहले से ही मान लिया गया था कि खुद के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए युवाओं ने किसी भी तरह के बंधन को मानना बंद कर दिया है. अभिभावकों को एक दोस्त की तरह से मान लेने की अवधारणा ने भी उनके प्रति गम्भीरता का ह्रास करवा ही दिया था. इस तरह की मानसिकता, सोच ने युवाओं को जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की, उनको स्वावलम्बी बनाया वहीं उनको उन्मुक्त भी बनाया, उद्दंड भी बनाया. ऐसे उन्मुक्त, उद्दंड युवाओं ने सामाजिक परिदृश्य में सिर्फ और सिर्फ स्वयं का ही अस्तित्व स्वीकारते हुए शेष सभी को नगण्य मान लिया है. इनको न तो उम्र का लिहाज है, न ही रिश्तों का. यही कारण है कि इनके द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ की, किसी बुजुर्ग व्यक्ति की परवाह न करते हुए अशालीन ढंग से प्रेमालाप किया जाता है, नशेबाजी की जाती है, स्टंट किये जा रहे हैं अब तो यौन-सम्बन्ध भी बनाये जाने लगे हैं. सड़कों, पार्कों, मॉल, बाजार आदि में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमने से इतर अब तो एक-दूसरे के साथ चुम्बन लेते हुए भी युवा जोड़े दिख जाना आम हो गया है. उन्मुक्तता, उद्दंडता का आलम ये है कि इनको ये भी परवाह नहीं होती है कि वर्तमान दौर में जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरों के द्वारा उनके कृत्य रिकॉर्ड हो रहे होंगे. उनको इस बात की भी चिंता नहीं कि आज प्रत्येक हाथ में स्मार्टफोन होने के कारण किसी भी कृत्य की, घटना की रिकॉर्डिंग हो जाना, उसका वायरल हो जाना बहुत सामान्य सी बात हो गई है.

 

ऐसी घटनाओं के पीछे के कारणों को खोजने और उनका समाधान करने पर गम्भीरता से चिंतन करने के बजाय यह कह देना आसान लगता है कि ये सब पश्चिमी सभ्यता का दुष्प्रभाव है, यह सब वैश्वीकरण के कारण हो रहा है. क्या हम सभी ने ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद भी ये विचार किया है कि हम अपने परिवार के किशोरों, युवाओं के कृत्यों, उनके व्यवहार, उनके दोस्तों आदि के बारे में जानने-समझने का प्रयास करें? क्या अपने परिवार के बच्चों के पहनावे, उनकी दिनचर्या आदि में आने वाले बदलावों को लेकर कभी उनसे कोई सवाल किया है? बहुतायत में इनका जवाब न में ही होगा क्योंकि आज बहुतायत परिवारों में बच्चों को समझाने की, उनको संस्कार सिखाने की, उनको मर्यादित आचरण करने की सीख देना लगभग बंद ही हो गया है. आज के आधुनिकता भरे दौर में ऐसा करना दकियानूसी माना जाने लगा है, पिछड़ा माना जाने लगा है और शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा को स्वयं को दकियानूसी-पिछड़ा घोषित करवाना चाहेगा.

 

संस्कार सिखाने का तात्पर्य किशोरों, युवाओं को जंजीरों में बाँधना नहीं होता है बल्कि उनको सामाजिकता का ज्ञान देना होता है. उनको मर्यादित बनाने का अर्थ पाषाणकालीन सभ्यता में भेजना नहीं होता बल्कि उम्र-रिश्तों का सम्मान करना सिखाना होता है. शालीन बनाने का तात्पर्य उनको पिछड़ा बनाना नहीं होता बल्कि उचित जीवनशैली का निर्वहन करना बताना होता है. प्रत्येक कार्य को भौतिकता से जोड़ देना, किसी भी तरह के आचरण को स्वतंत्रता समझ लेना, सार्वजनिक रूप से अशालीन हो जाने को आधुनिक मान लेना कदापि उचित सोच नहीं है. यदि इस तरह की सोच पर, ऐसे कृत्यों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, परिवार से ही संस्कारों का बीजारोपण नहीं किया गया तो ऐसी स्थितियों के निकट भविष्य में और भयावह होने में कोई संशय नहीं.


03 दिसंबर 2025

दिव्यांगजनों में विश्वास जगाना होगा

03 दिसम्बर का आना हुआ और शासन-प्रशासन की तरफ से सभी जगह दिव्यांगजनों के लिए अंतरराष्ट्रीय विकलांग (दिव्यांग) दिवस को मनाया गया. इस दिवस को लेकर वैसी चहल-पहल नहीं दिखती जैसी कि अन्य दिवसों को लेकर दिखाई पड़ती है. अभी 01 दिसम्बर को ही एड्स दिवस पर जागरूकता के लिए रैलियाँ निकाली गईं, कई जगह गोष्ठियाँ, प्रदर्शनियाँ आयोजित की गईं थीं वैसा कुछ आज देखने को नहीं मिला. इसके पीछे एक मुख्य वजह जो हमें समझ आती है वो यह कि विकलांगता को लेकर समाज में अभी भी एक तरह की दया का भाव बना हुआ है. यदि इस दया के भाव को समाज के साथ-साथ पारिवारिक रूप में, सहयोगियों में, मित्रों में भी उपस्थित माना जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. ऐसा हम स्वयं व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हैं.  

 



बहरहाल, वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा निर्णय लिया गया कि सन 1981 को विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रुप में मनाया जायेगा. इस दिवस का आरम्भ भले ही वर्ष 1981 से कर दिया गया हो मगर सन 1992 से संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवीज़ के रुप में प्रचारित किया जा रहा है. इस दिवस के मनाये जाने का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर दिव्यांगजनों के लिये पुनरुद्धार, रोकथाम, प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनाना है. विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है. इसके बाद से ही सन 1992 से इसे पूरी दुनिया में हर साल से लगातार मनाया जा रहा है.

 

इस दिवस को मनाये जाने के बाद भी, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विकलांग शब्द को दिव्यांग में परिवर्तित कर देने के बाद भी ऐसे लोगों के प्रति समाज की सोच में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है. आज भी दिव्यांगजनों के प्रति विभेद देखने को मिलता है. समाज के बहुत से क्षेत्रों में उनके साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. कई बार उनको उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. आप सब लोगों ने भी महसूस किया होगा और यदि अभी तक ऐसा कुछ आपकी आँखों के सामने से नहीं गुजरा है तो अपने शहर के ऐसे केन्द्रों में जाकर देखिये जहाँ विकलांग व्यक्ति रहते हों, आज भी वे लोग दया, सहानुभूति का पात्र बनते हैं. ऐसे लोग भले ही शिक्षित हों अथवा अशिक्षित, शहरी हो अथवा ग्रामीण, रोजगार में हो अथवा बेरोजगार सभी के साथ समाज की तरफ से एक दया का भाव देखने को मिलता है.




ऐसा होने के पीछे को हम व्यक्तिगत रूप से समाज से अधिक दोष विकलांगता से जूझ रहे लोगों का मानते हैं. कमोबेश बहुतायत विकलांग व्यक्ति समाज से दया, सहानुभूति ही चाहते हैं. कुछ वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में कार्य करने की मंशा से विकलांग शक्ति (जिसे बाद में दिव्यांग शक्ति कर दिया गया) के नाम से एक अभियान शुरू किया. इसके माध्यम से ऐसे विकलांग व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने का मन बनाया था जिनमें किसी न किसी तरह की प्रतिभा हो, कोई न कोई हुनर हो. सोचा था कि ऐसे लोगों के हुनर को समाज के सामने लाकर इनको भी आगे बढ़ने का रास्ता बनाया जाये. इस अभियान से ऐसे विकलांग व्यक्ति बहुत कम जुड़े जिनको अपनी प्रतिभा का, अपने हुनर का प्रतिफल चाहिए था. बहुतायत लोगों के लिए भत्ता, पेंशन, सरकारी अनुदान, लाभ आदि को प्राप्त करना उनका अभीष्ट था.

 

ये सही है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज में सभी विकलांग लोगों को शामिल करने की दिशा में काम करने को प्रेरित करना आज के दिन का उद्देश्य है. ऐसे में जहाँ दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव दूर करना होगा वहीं खुद दिव्यांगजनों को अपने आपको मजबूर, कमजोर मानसिकता से ऊपर लाना होगा. दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने की स्थिति ये है कि ज्यादातर लोग ये नहीं जानते कि उनके घर के आसपास कितने लोग दिव्यांग हैं. लोगों को इसकी भी जानकारी नहीं कि समाज में दिव्यांगजनों को बराबर का अधिकार मिल रहा है या नहीं. ऐसे में दिव्यांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे में, दिव्यांगजनों के बारे में लोगों को जागरुक करने के साथ-साथ दिव्यांगजनों में विश्वास पैदा करने के लिए, दिव्यांगजनों को प्रोत्साहित करने के लिए भी इस दिवस को मनाना बहुत आवश्यक है.


28 नवंबर 2025

ई-कचरे का बढ़ता खतरा

जलवायुध्वनिमृदा प्रदूषणों के बीच अपना विकराल रूप धारण कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे की तरफ अभी समाज बहुत गम्भीर नहीं दिखता है. आम जनमानस समझने की कोशिश नहीं कर रहा कि इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट भी पर्यावरण के लिए, मानव के लिए खतरा बन गया है. इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट को सामान्य बोलचाल में ई-कचरा के रूप में जाना जाता है. प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण टूटने, पुराने होने के कारण फेंक दिए जाते हैं, वह ई-कचरा ही है. उचित तरीके से इसका निपटान, पुनर्चक्रण नहीं होने से ये स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा बन जाते हैं. ई-कचरे में कम्प्यूटर, मोबाइल, घरेलू उपकरण, व्यावसायिक उपकरण, माइक्रोवेवरिमोट कंट्रोलबिजली के तारस्मार्ट लाइटस्मार्टवॉच आदि आते हैं.

 

सामाजिक रूप से यह बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि समाज का जिस तेजी से डिजिटाइजेशन हो रहा है, उसी तेजी से ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. आधुनिक तकनीक और मानव जीवन शैली में आने वाले बदलाव के कारण ऐसे उपकरणों का उपयोग दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है जो विषैले, हानिकारक पदार्थों के जनक बनते हैं. ट्यूबलाइटसीएफएल जैसी रोज़मर्रा वाली वस्तुओं में पारे जैसे विषैले पदार्थ पाए जाते हैं जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं. ऐसा अनुमान है कि पूरी दुनिया में लगभग 488 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर के चौथे संस्करण में बताया गया कि दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन दर्ज ई-कचरे के पुनर्चक्रण की तुलना में पाँच गुना तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट में बताया गया कि 2022 में रिकॉर्ड 62 मिलियन टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ जो 2010 की तुलना में 82 प्रतिशत अधिक है. इसके 2030 तक 32 प्रतिशत तक बढ़कर 82 मिलियन टन होने की सम्भावना है. विश्व स्तर पर रिकॉर्ड 62 बिलियन किलो ई-कचरा उत्पन्न हुआ जो प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष औसतन 7.8 किलो के बराबर है. 2022 में यूरोप ने प्रति व्यक्ति 17.6 किलो के हिसाब से सर्वाधिक ई-कचरा उत्पन्न किया.

 



ई-कचरे में मरकरीकैडमियम और क्रोमियम जैसे कई विषैले तत्त्व शामिल होते हैं. इनके निस्तारण के असुरक्षित तौर-तरीकों से मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. इससे अनेक तरह की बीमारियाँ होने की आशंका रहती है. भूमि में दबाने से ई-कचरा मिट्टी और भूजल को दूषित करता है. जब मिट्टी भारी धातुओं से दूषित हो जाती है तो उस क्षेत्र की फसलें विषाक्त हो जाती हैंजो अनेक बीमारियों का कारण बन सकती हैं. भविष्य में कृषियोग्य भूमि को भी अनुपजाऊ हो सकती है. मिट्टी के दूषित होने के बाद ई-कचरे में शामिल पारालिथियमलेड, बेरियम आदि भूजल तक पहुँचती हैं. धीरे-धीरे तालाबोंनालोंनदियों, झीलों आदि का पानी अम्लीय और विषाक्त हो जाता है. यह स्थिति मानवों, जानवरोंपौधों आदि के लिए घातक हो सकती है. ई-कचरा में शामिल विषाक्त पदार्थों का नकारात्मक प्रभाव मस्तिष्कहृदययकृतगुर्दे आदि पर बहुत तेजी से दिखाई देता है. इसके साथ-साथ मनुष्य के तंत्रिका तंत्र और प्रजनन प्रणाली को भी यह प्रभावित कर सकता है.

 

ई-कचरा के निपटान की अपनी स्थितियाँ, अपनी चुनौतियाँ हैं. इस कारण सबसे ज्यादा जोर इसके पुनर्नवीनीकरण पर दिया जा रहा है. पुनर्नवीनीकरण के द्वारा प्लास्टिक, धातु, काँच आदि को अलग-अलग करके उसको पुनरुपयोग योग्य बनाया जाता है. वैश्विक स्तर पर अब 81 देश ऐसे हैं जिन्होंने ई-कचरे से संबंधित कोई नीतिकानून या विनियमन अपनाया है. इन 81 देशों में से 67 ने विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) सिद्धांत लागू किया है, 46 ने अपने नियमों में राष्ट्रीय ई-कचरा संग्रहण लक्ष्य निर्धारित किए हैं और 36 ने राष्ट्रीय स्तर पर ई-कचरा पुनर्चक्रण लक्ष्यों को अपनाया है. भारत भी ई-कचरे से संबंधित कोई नीतिकानून या विनियमन को अपनाने वाले देशों में शामिल है इसके बाद भी यहाँ ई-अपशिष्ट प्रबंधन से सम्बन्धित अनेक चुनौतियाँ हैं. सबसे बड़ी चुनौती जन भागीदारी का बहुत कम होना है. इसके पीछे उपभोक्ताओं की एक तरह की अनिच्छा है जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रीसाइक्लिंग के लिये बनी रहती है. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक और चुनौती इस रूप में सामने आई है कि देश में बहुत से घरों में ई-कचरे का निस्तारण बड़े पैमाने पर होने लगा है. यह स्थिति तब है जबकि भारत में ई-कचरे के प्रबंधन के लिये वर्ष 2011 से कानून लागू है जो यह अनिवार्य करता है कि अधिकृत विघटनकर्त्ता और पुनर्चक्रणकर्त्ता द्वारा ही ई-कचरा एकत्र किया जाए. इसके लिये वर्ष 2017 में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम 2016 अधिनियमित किया गया है.

 

तकनीक, आधुनिक जीवनशैली, आवश्यकता आदि की आड़ लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग भले ही अंधाधुंध तरीके से किया जाने लगा हो मगर यह स्वीकारना होगा ई-कचरा भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, गैजेट्स का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है और बहुतायत समाज का इन्हीं पर निर्भर होते जाना खतरे का सूचक है. आज की युवा पीढ़ी के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुविधा के लिए कम, पैशन के लिए ज्यादा उपयोग किया जा रहा है. ऐसे में उनके द्वारा उपकरणों को जल्दी-जल्दी बदल दिया जाता है. नवीन तकनीक के कारण भी बहुतेरे उपकरण आउटडेटेड हो जाते हैं. यह भी ई-कचरा की मात्रा को बढ़ाने का काम कर रहा है.

 

पर्यावरण की, मानव, जीवों की सुरक्षा की खातिर लोगों को केवल हवा, पानी, भूमि, पेड़-पौधों को बचाने के बारे में ही सजग नहीं होना है बल्कि ई-कचरा के प्रति भी सावधान होने की आवश्यकता है. बेहतर हो कि जीवनशैली को संयमित, नियंत्रित किया जाये. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यावश्यक होने पर ही उपयोग किया जाये. उनके निस्तारण के लिए औपचारिक क्षेत्र की सहायता ली जाये. सम्भव है कि मानव समाज कुछ हद तक आने वाले खतरे को टाल सके.  


25 अक्टूबर 2025

हिंसात्मक गतिविधियों से भरा समाज

ये किसी तरह के समाज का निर्माण कर लिया हम लोगों ने? सुबह आँख खुलने से लेकर रात सोने तक कहीं न कहीं से हिंसात्मक खबरों का आना लगा ही रहता है. इन खबरों का केन्द्र देश ही नहीं रहता है बल्कि विश्व स्तर पर चारों तरफ से इसी तरह की खबरें सुनाई पड़ती हैं. कहीं दो व्यक्ति आपस में लड़ने में लगे हैं, कहीं दो परिवारों के बीच कलह मची हुई है, कहीं दो राज्यों के बीच विवाद की स्थिति है तो कहीं दो देशों में युद्ध चल रहा है. ऐसा लगता है जैसे समाज में चारों तरफ अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का समावेश बना हुआ है. सद्भाव, सहजता, शांति, धैर्य आदि को जैसे भुला ही दिया गया है. पारिवारिक सम्बन्धों में, रक्त-सम्बन्धियों में विभेद इस स्तर तक है कि एक-दूसरे की जान तक ले ली जा रही है. समाज की इकाई एक व्यक्ति के दायरे से बाहर निकल कर देखें तो एक देश के रूप में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. विस्तारवाद की नीति के चलते, अपने वर्चस्व को, प्रभुता को थोपने की नीयत के चलते जहाँ बड़े-बड़े देशों द्वारा छोटे-छोटे देशों को किसी न किसी रूप में अपने कब्जे में किये जाने की मानसिकता काम करती है, वहीं महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को नियंत्रित करने की नीतियाँ निर्धारित करती हैं.

 

समाज की वर्तमान स्थिति यह है कि यहाँ प्रेम, करुणा, शांति, अहिंसा से अधिक बैर, वैमनष्यता, हिंसा आदि दिखाई दे रही है. क्या कभी इस पर विचार किया गया कि आखिर ऐसा क्या है इंसानी स्वभाव के मूल में कि उसे सदियों से प्रेम, सौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है मगर वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है? आये दिन खबरें मिलती हैं मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की, उनकी हत्या की. आये दिन देखने में आ रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले किये जा रहे हैं, उनकी जान ले ली जा रही है. लगभग नित्यप्रति की खबर बनी हुई है किसी की हत्या, कहीं लूट, कहीं अपहरण, कहीं मारपीट. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. गम्भीरता से विचार किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि हिंसा, अत्याचार, क्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. कोई व्यक्ति वह चाहे आम नागरिक हो या फिर अधिकार प्राप्त व्यक्ति, सभी के मन में कहीं न कहीं एक तरह का हिंसात्मक भाव-बोध छिपा होता है. आम नागरिक अपने इसी भाव-बोध के वशीभूत अपने आस-पड़ोस में हिंसात्मक गतिविधियाँ करता है तो वही किसी तानाशाही मानसिकता वाला राष्ट्राध्यक्ष विस्तारवादी मानसिकता के चलते अपने आसपास के देशों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है.

 

यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि आदिमानव से महामानव बनने की होड़ में लगे इंसान को लगातार प्रेम, दया, करुणा आदि का पाठ पढ़ाया जाता रहा है. उसे समझाया जाता रहा है कि हिंसा गलत है, वह चाहे जीव पर हो, निर्जीव पर हो, पेड़-पौधों पर हो. इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. आपसी वैमनष्यता से उसे दूर रहना चाहिए. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे किसी ने नहीं सिखाया कि कैसे दूसरे से बैर भावना रखनी है. उसे किसी भी तरीके से नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जा रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया, जिसे सिखाने के सम्बन्ध में कोई संस्थान नहीं है वे कार्य उसने न केवल भली-भांति सीख रखे हैं वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. ऐसा लगता है जैसे उसने अपने आसपास तनावपूर्ण माहौल वाली दुनिया बनाने का ही संकल्प ले रखा है.

 

इस तरह की दुनिया में जहाँ सब कुछ स्वार्थ पर आधारित होने लगा है; जहाँ व्यक्तियों की, देशों की प्रतिष्ठा का आधार अधिकार, उसका आर्थिक स्तर, शक्ति प्रदर्शन आदि होने लगा हो वहाँ आपस में खाई बनना स्वाभाविक है. वैश्विक परिदृश्य में दो देशों के बीच विगत कई वर्षों से चल रहे युद्ध, संघर्ष इसके सशक्त उदाहरण हैं. यदा-कदा संघर्ष विराम के नाम पर चंद दिनों की शांति भले ही देखने को मिल जाए, भले ही कोई अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा ले किन्तु तनाव, संघर्ष, हमला आदि पुनः अपनी तीव्रता के साथ आरम्भ हो जाते हैं. नागरिकों के हितार्थ लिए जाने वाले निर्णय अचानक से भुला दिए जाते हैं. ऐसी स्थिति न केवल चिंतनीय है बल्कि भयावह भी है.

 

सामाजिक रूप से कितने भी प्रयास किये जाएँ किन्तु इंसानों का मूल स्वभाव बदले बिना शांति सम्भावना की स्थिति अब संभव नहीं लगती है. वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैं, अपने आदर्श हैं, अपने विचार हैं, अपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारा, सबके आदर्श दूसरे की विचारधारा, आदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठता, हीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं.

 


18 अक्टूबर 2025

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो

‘दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो’ यह वाक्य कितना सुन्दर, सार्थक, सशक्त और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दीपों की कतार, मोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी आतिशबाजी, विविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे... अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.

 

भारतीय परम्परा, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में विभिन्न मनमोहक ऋतुएँ हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों, समरसता, सौहार्द्र, भाईचारे आदि की भी प्रतिस्थापना करते ये पर्व दिखाई देते हैं. किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. इनका उद्देश्य सदैव यही हो कि सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की स्थापना हो. व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़े रखने का माध्यम यही पर्व-त्यौहार बनें. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.

 



वर्तमान में स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है. दीपावली का रंगीन-रोशनीपरक उद्देश्य ‘इस दीपावली आप क्या खिला रहे हैं’ की सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत सा खड़ा दिखाई देता है. इसी आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ, खिलखिलाती हँसी नहीं वरन् उनकी फटी-फटी सी आँखें, अचम्भित से हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने विदेशी आतिशबाजी आकर अपना विस्तार करने लगती है. गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है जब कि किसी और के हाथों में मंहगे गिफ्ट प्रदर्शित होने लगते हैं.

 

हमारे घरों में आज लक्ष्मी जी के रात में उतर कर आने की संकल्पना कार्य नहीं करती वरन् लक्ष्मी जी के वर्तमान धौंसपरक स्वरूप से अपने आपको प्रतिष्ठित करने की भावना कार्य करती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों का उपयोग करके हम दीपावली का त्यौहार नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. ऐसी विद्रूपकारी, हास्यास्पद स्थितियों में अब हँसी भी नहीं आती है बल्कि सरोकारों के संकुचित होते जाने को देखकर आँखों में आँसू अवश्य ही उतर आते हैं. हमारी स्वयं को स्थापित करने की सोच के कारण समाज से समरसता और भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन सा होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?

 

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.


30 सितंबर 2025

अंतर्मन का रावण मारें

विजयादशमी का पर्व पूरे जोश-उत्साह के साथ मनाया जाता है. रावण का पुतला जलाया जाता है. सांकेतिक रूप से सन्देश देने के लिए प्रतिवर्ष बुराईअत्याचार के प्रतीक को सत्य और न्याय के प्रतीक के हाथों मरवाया जाता है इसके बाद भी समाज में असत्यहिंसाअत्याचारबुराई बढ़ती जाती है. साल-दर-साल रावण का पुतला फूँकने के बाद भी समाज से न तो बुराई दूर हो सकी और न ही असत्य को हराया जा सका है. देखा जाये तो विजयादशमी का पावन पर्व आज सिर्फ सांकेतिक पर्व बनकर रह गया है. इंसानी बस्तियों में छद्म रावण कोछद्म अत्याचार को समाप्त करके लोग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. दरअसल समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. व्यक्तियों के बिना समाज का कोई आधार ही नहीं. समाज की समस्त अच्छाइयाँ-बुराइयाँ उसके नागरिकों पर ही निर्भर करती हैं. इसके बाद भी नागरिकों में समाज के प्रति कर्तव्य-बोध जागृत नहीं हो रहा है. समाज के प्रतिसमाज की इकाइयों के प्रतिसमाज के विभिन्न विषयों के प्रति नागरिक-बोध लगातार समाप्त होता जा रहा है. इसी के चलते समाज में विसंगतियाँ तेजी से बढ़ रही हैं. आलम ये है कि नित्य-प्रति एक-दो नहीं सैकड़ों घटनाएँ हमारे सामने आती हैं जो समाज की विसंगतियों को दृष्टिगत करती हैं.

 

प्रत्येक वर्ष पूरे देश में प्रत्येक नगर में, कस्बे में रावण को जलाने का कार्य किया जाता है, इसके बाद भी देश भर में रावण के विविध रूप अपना सिर उठाये घूमते दिखते हैं. कहीं आतंकवाद के रूप में, कहीं हिंसा के रूप में; कहीं जातिवाद के रूप में, कहीं क्षेत्रवाद के रूप में; कहीं भ्रष्टाचार के रूप में, कहीं रिश्वतखोरी के रूप में. यही वे स्थितियाँ हैं जो समझाती हैं कि आत्मा अमर-अजर है. यदि वाकई देह की मौत के साथ-साथ आत्मा की भी मृत्यु हो जाती तो जिस समय राम ने रावण को मारा था उसी समय उसी वास्तविक मौत हो गई होती. वह अपने विविध रूपों के साथ प्रत्येक कालखण्ड में अराजकता की स्थिति को पैदा नहीं कर रहा होता. आत्मा की अमरता के कारण ही रावण प्रत्येक वर्ष अपना रूप बदल कर हमारे सामने आ खड़ा होता है और हम हैं कि विजयादशमी को उसके पुतले को जलाकर इस मृगमारीचिका में प्रसन्न रहते हैं कि हमने रावण को मार गिराया है. वास्तविकता में रावण किसी भी वर्ष मरता नहीं है बल्कि वह तो साल-दर-साल और भी विकराल रूप धारण कर लेता है; साल-दर-साल अपार विध्वंसक शक्तियों को ग्रहण करके अपनी विनाशलीला को फैलाता रहता है.

 



सुनने में बुरा भले लगे मगर कहीं न कहीं हम सभी में किसी न किसी रूप में एक रावण उपस्थित रहता है. इसका मूल कारण ये है कि प्रत्येक इन्सान की मूल प्रवृत्ति पाशविक है. उसे परिवारसमाजसंस्थानों आदि में स्नेहप्रेमभाईचारा आदि सिखाया जाता है जबकि हिंसाअत्याचारबुराई आदि कहीं भी सिखाई नहीं जाती है. ये सब दुर्गुण उसके भीतर जन्म के साथ ही समाहित रहते हैं जो वातावरणपरिस्थिति के अनुसार अपना विस्तार कर लेते हैं. यही कारण है कि इन्सान को इन्सान बनाये रखने के जतन लगातार किये जाते रहते हैंइसके बाद भी वो मौका पड़ते ही अपना पाशविक रूप दिखा ही देता है. कभी परिवार के साथ विद्रोह करकेकभी समाज में उपद्रव करके. कभी अपने सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करके तो कभी किसी अनजान के साथ धोखाधड़ी करके. यहाँ मंतव्य यह सिद्ध करने का कतई नहीं है कि सभी इन्सान इसी मूल रूप में समाज में विचरण करते रहते हैं वरन ये दर्शाने का है कि बहुतायत इंसानों की मूल फितरत इसी तरह की रहती है.

 

अपनी इसी मूल फितरत के चलते समाज में महिलाओं के साथ छेड़खानी कीबच्चियों के साथ दुराचार कीबुजुर्गों के साथ अत्याचार कीवरिष्ठजनों के साथ अमानवीयता की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं. जरा-जरा सी बात पर धैर्य खोकर एक-दूसरे के साथ हाथापाई कर बैठनाहत्या जैसे जघन्य अपराध का हो जानासामने वाले को नीचा दिखाने के लिए उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर बैठनास्वार्थ में लिप्त होकर किसी अन्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना आदि इसी का दुष्परिणाम है. ये सब इंसानों के भीतर बसे रावण के चलते है जो अक्सर अपनी दुष्प्रवृतियों के कारण जन्म ले लेता है. अपनी अतृप्त लालसाओं को पूरा करने के लिए गलत रास्तों पर चलने को धकेलता है. यही वो अंदरूनी रावण है जो अकारण किसी और से बदला लेने की कोशिश में लगा रहता है. इसके चलते ही समाज में हिंसाअत्याचारअनाचारअविश्वास का माहौल बना हुआ है. अविश्वास इस कदर कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भय लगने लगा है, आपसी रिश्तों में संदिग्ध वातावरण पनपने लगा है.

 

हममें से कोई नहीं चाहता होगा कि समाज मेंपरिवार में अत्याचार-अनाचार बढ़े. इसके बाद भी ये सबकुछ हमारे बीच हो रहा हैहमारे परिवार में हो रहा हैहमारे समाज में हो रहा है. हमारी ही बेटियों के साथ दुराचार हो रहा है. हमारे ही किसी अपने की हत्या की जा रही है. हमारे ही किसी अपने का अपहरण किया जा रहा है. करने वाले भी कहीं न कहीं हम सब हैंहमारे अपने हैं. ऐसे में बेहतर हो कि हम लोग रावण के बाहरी पुतले को मारने के साथ-साथ आंतरिक रावण को भी मारने का काम करें. हमें संकल्प लेना पड़ेगा कि देश में फैले विकृतियों के रावणों को जलाने का, मारने का कार्य करें. अपने आपको चारित्रिक शुचिता की शक्ति से सँवारें ताकि गली-गली, कूचे-कूचे में घूम-टहल रहे रावणों को मार सकें. तब हम वास्तविक समाज का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक इन्सान का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक रामराज्य की संकल्पना स्थापित कर सकेंगे.


26 सितंबर 2025

उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो


 

अरे साहब, जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती समझ आये तो उसे पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए.... ठीक वैसे ही जैसे खिलाड़ी मैदान में गिरने के बाद खुद को एकदम फ्री छोड़ देता है....

कानूनी आयु घटाने का सोचने से बेहतर है कि ये उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो... न उम्र, न सोचा-विचारी, बस सम्बन्ध ही सम्बन्ध....

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दैनिक जागरण, कानपुर

25.09.2025


08 सितंबर 2025

कुछ कर या न कर मगर सोशल मीडिया में डाल

अभी कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र का मिलना हुआ. तमाम सारी बातों के बाद चलते समय वे एक बिन्दु हमारी तरफ उछाल गए और चलते-चलते बोले कि इस पर कुछ लिखिए. उनका कहना था कि आजकल त्रयोदशी संस्कार में ये देखना आम बात हो गई है कि लोग आते हैं, बैठते हैं और फिर खुद को एक तरह के वीआईपी स्टेटस में रखते हुए 'बस जरा प्रसाद ले लेंगे' बोलकर कुछ न कुछ खाद्य-सामग्री मँगवा कर उसका स्वाद ले लेते हैं.

 

मित्र का कहना एकदम सही है. आजकल यही हो भी रहा है. किसी समय में ऐसी व्यवस्था उनके लिए बनाई गई होगी जो किसी तरह से अक्षमता का अनुभव करते होंगे मगर आज ये स्टेटस सिम्बल बन गया है. संस्कार से सम्बंधित स्थान पर पड़ी कुर्सियों पर बैठना और फिर वहीं पर खीर, बूँदी, रसगुल्ला आदि-आदि मँगवा कर ग्रहण करना और चलते बनना.

 

इस पर विस्तार से लिखा जायेगा. इस तरह की स्थिति के साथ-साथ अब एक और स्थिति देखने को मिल रही है और वो है त्रयोदशी संस्कार में पहुँच कर वहाँ फोटो सेशन करवाने की. दिवंगत व्यक्ति के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने पर, वहाँ किसी परिचित के मिल जाने पर, किसी माननीय के प्रकट हो जाने पर, किसी जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी आदि के आ जाने पर फोटो सेशन करवाने का अर्थ समझ नहीं आता.

 

बहरहाल, अब जमाना करने से ज्यादा दिखाने का है. गोपनीय रखने से ज्यादा अगोपन का है. खुद तक सीमित रखने से ज्यादा सोशल मीडिया में डालने का है. वाकई ज़माना अब 'नेकी कर कुँए में डाल' से ज्यादा 'कुछ कर या न कर मगर सोशल मीडिया में डाल' का है.


01 सितंबर 2025

वर्तमान दौर की कविता

कविता लिखना

कितना आसान हो गया है अब.

कुछ भी लिखते जाओ

छोटे छोटे वाक्यों में.

न छंद की चिंता

न लय की फ़िकर,

जो मन में आए

उसे शब्दों में ढाल दो,

कई-कई हिस्सों में बाँट दो

फिर देखो गौर से

तुमको दिखेगी एक कविता

बलखाती काव्य रचना.

मत परवाह करो

कि रस, अलंकार, मात्राएँ

सिरे से गायब हैं,

तुकांत, अतुकांत का

सिरदर्द पाले बिना

बस लिखते जाओ कुछ भी,

शब्द भारी भरकम हों

या फिर हों आम बोलचाल के

बस, शब्द होने चाहिए.

न कोई ज्ञान

न कोई आदर्श

न किसी तरह का प्रवचन,

बस, लिखते जाओ

जब तक कि

तुम ख़ुद न थक जाओ

लिखते-लिखते,

शब्दों को

धकेलते-धकेलते,

रुको, रुक कर देखो

नजर आने लगी कविता?

देखो न!

देखो जरा ध्यान से

ये भी तो

बन गई है एक कविता.

करो वाह वाह

या कि आह आह

हमें इससे क्या?

हमें तो लीपना था,

कुछ थोपना था

सो रख दिया सामने,

समझ सको तो ठीक

न समझ सको

तो भी हमें क्या?

हमने तो लिख दी

एक कविता,

आज के दौर की

एक अद्भुत कविता.

 

28 अगस्त 2025

कहीं और से नियंत्रित होता मोबाइल

एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोन के कॉल डायलिंग सम्बन्धी कुछ बदलाव के बाद अधिकतम लोग ऐसे बिलबिला रहे जैसे कोई अचम्भा हो गया. स्मार्ट फ़ोन की नज़र में आप जैसे बिलबिलाने लोग ही बेवकूफ हैं. आज से नहीं बल्कि स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट के गठबंधन के समय से ही समझाया जा रहा है कि आपके हाथ में सिर्फ़ मोबाइल पकड़ना और स्क्रॉल करना है. बाक़ी सभी कंट्रोल तो उसके पास हैं जो आपको ये मुफ्त सुविधाएँ दे रहा है.


सोचिए, आप कोई एक विज्ञापन देख लें फिर वैसे ही आपकी स्क्रीन पर आने लगते हैं. आप कुछ सर्च कर लें वही आपको दिखने लगता है. कोई रील देख लें फिर उसी तरह की रील आपके सामने से गुजरने लगती हैं. अभी ये बदलाव बहुत छोटा सा बदलाव है. आपकी लोकेशन उनके पास है, आपका बैंक खाता उनके पास है, आपका एटीएम, उसका पिन उनको पता है, आपका आधार-पैन-पासवर्ड आदि सब उनके पास है. सबकुछ तो इंटरनेट से जुड़ा है और वही सबकुछ मोबाइल से लिंक करवाया जा रहा है. यही मोबाइल आपके हाथ में होने के बाद भी दूसरे के नियन्त्रण में है. 


एक जरा से बदलाव के बाद भी आप सजग न हुए, संगठित हो इस लिंक-लिंक खेल के विरोध में न उतरे, अपने तमाम खातों पर मजबूत पासवर्ड न बनाये, हैशटैग खेल और मुफ्तखोरी से बाहर न निकले तो अगला बदलाव हमारे-आपके खातों में, दस्तावेज़ों में, जानकारियों में होगा.

 

13 अगस्त 2025

बदलाव एवं उपलब्धियों भरी सुखद यात्रा

देश के गौरवशाली इतिहास की छत्रछाया में अमृतकाल जैसी अवधारणा संग स्वतंत्रता का उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है. यह समय गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे बढ़ रही है. बहुत से लोगों के लिए इसे भले राजनैतिक कदम, सरकारी एजेंडा कहा जाता हो मगर स्वतंत्रता के उत्सव को उमंग-उत्साह के साथ ही मनाये जाने की आवश्यकता है. यह एक तरफ जहाँ हमारी प्राचीन वैभवशाली संस्कृति, सभ्यता से परिचय कराता है वहीं वर्तमान युवा पीढ़ी को हमारे वीर-वीरांगनाओं का वह बलिदान याद करवाता है, जिसके चलते आज ऐसे उत्सव मना रहे हैं.

 

स्वतंत्रता के इन वर्षों में बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जिनका सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने आज़ादी से अब तक कुछ पाया नहीं है? क्या अभी तक की यात्रा में किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है? विगत उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि पूर्वाग्रह मुक्त होकर समग्र रूप में देखें तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाएगी कि जब देश स्वतंत्र हुआ तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी. आज स्थिति यह है कि कृषिप्रधान कहे जाने के बाद भी देश का आर्थिक ढाँचा अकेले कृषि आधारित नहीं है, अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 54 प्रतिशत है.

 



शिक्षा के बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. नालंदा, तक्षशिला जैसे शैक्षणिक संस्थानों के नष्ट कर दिए जाने के बाद महसूस हो रहा था कि शायद देश का शैक्षणिक विकास बहुत देर में हो. इस आशंका को विगत वर्षों की यात्रा में गलत सिद्ध किया गया है. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. नेशनल मेडिकल काउंसिल के अनुसार 2024-25 में 766 मेडिकल कॉलेज हैं, इनमें से 423 सरकारी और 343 निजी मेडिकल कॉलेज हैं. क्या इसे विकास या उपलब्धियों के रूप में नहीं देखा जायेगा? इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. तकनीक के मामले में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले. किसी समय दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, अन्तरिक्ष स्टेशन पर किसी भारतीय का जाना, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं, उसमें अश्लीलता की, अपराध की दीमक लगा दी है.

 

ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जिनके आधार पर बहुत सारे लोग देश की वास्तविक उपलब्धियों को विस्मृत कर जाते हैं. वे भूल जाते हैं हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति को जहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. ये और बात है कि संवैधानिक नियमों की आड़ में यहाँ एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन जाता है मगर यही संवैधानिक खूबसूरती भी है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.