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22 जुलाई 2026

शब्दों का भटकाव

सम्भवतः आप सभी को ‘शब्द विस्तार’ और ‘शब्द संकुचन’ का अर्थ और उदाहरण की जानकारी होगी.

इसके अलावा अभिधा, लक्षणा, व्यंजना के बारे में बहुत से लोगों ने पढ़ा होगा.

 

उक्त दो के बारे में जानकारी न होने के कारण लोग भटक-भटक कर न जाने कहाँ पहुँच जा रहे हैं. इसी तरह कुछ शब्द अपने आपमें ही एक पहचान बन जाते हैं और व्यक्ति अपनी मानसिक संकुचन की स्थिति में उस शब्द की पहचान के इर्द-गिर्द डोलता-भटकता रहता है. इसे ऐसे समझें कि हमारे आसपास में एक हैं जिनको किसी कारणवश ‘बंदरवा’ से कभी सम्बोधित किया गया था. स्थिति ये है कि आज भी यदि बंदरवा बोल दें तो सब उसी एक व्यक्ति से इसका अर्थ जोड़ देते हैं.

 

कुछ इसी तरह से कल से कुछ भटकन हमारी एक पोस्ट पर है. समझ नहीं पा रहे हैं कि कल को इनकी नाली में, किचेन की सिंक में, बाथरूम के कोने में, बरामदे में ‘कोई विशेष जीव’ टहलता दिखेगा तो ये भटकते लोग क्या कहेंगे, क्या करेंगे? जिस विशेष जीव का नाम वर्ग विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत न होने देने के कारण नहीं लिख रहे हैं, उस विशेष जीव को पालेंगे-पोसेंगे या फिर वही ट्रीटमेंट देंगे, जो उसे हमेशा से दिया जाता रहा है? मानसिकता को, दृष्टि को कम से कम इतना तो खुला रखना चाहिए कि भटकने के बाद भी सबकुछ समझ आए, साफ़ दिखे.


12 सितंबर 2023

हिन्दी शब्दों का अप्रचलित होते जाना सुखद नहीं

हिन्दी से सम्बन्धित दिवस, सप्ताह आदि का आयोजन शुरू होते ही सभी जगह हिन्दी की बात होने लगती है. हिन्दी को लेकर हिन्दी भाषियों और अहिन्दी भाषियों के द्वारा हिन्दी विकास के लिए अपने स्तर पर चर्चा आरम्भ हो जाती है. आज हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के विकास, उसकी उन्नति, राष्ट्रभाषा बनने की राह में आते अवरोध, वैश्विक भाषा बनने की राह, हिन्दी उपन्यास को बुकर मिलने, हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषाई मान्यता मिलने आदि पर चर्चा न करके कुछ ऐसे बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता है. आज बहुत से हिन्दी शब्द सामान्य प्रयोग से बाहर होते जा रहे हैं या कहें कि बाहर किये जा रहे हैं. इनकी जगह पर अंग्रेजी शब्दों को सहजता से इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसी स्थिति के लगातार स्वीकार्यता मिलने से बहुत सारे हिन्दी शब्दों का विलोपन देखना पड़ सकता है. 




देखा जाये तो शब्दों की अपनी ही निराली दुनिया है. इस शाब्दिक दुनिया में ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं हैं मगर वे बहुतायत में बोले जाते हैं, आपसी वार्तालाप में प्रयोग किये जाते हैं. ऐसे शब्दों के अर्थ व्यक्तियों की बातचीत के सन्दर्भ में स्वतः निर्धारित हो जाते हैं. ग्रामीण अंचल में सहज रूप से बोलचाल में आने वाला शब्द ‘ठलुआ’ राजनीति में उस समय खूब चर्चा में रहा जबकि एक राजनैतिक महाशय ने इसे चर्चा के केन्द्र में ला दिया था. शब्दों के ऐसे प्रयोग के साथ-साथ शब्द-संकुचन, शब्द-विस्तार जैसी अवधारणा सहज देखने को मिलती है. हमारे आसपास बहुत से शब्द ऐसे हैं जो अपने मूल अर्थ से अधिक विस्तार पा गए. ‘डालडा’‘टुल्लू’‘ऑटो’‘तेल’ आदि ऐसे ही शब्द हैं जिनका अपना विशेष सन्दर्भ है किन्तु आज ये व्यापकता के साथ प्रयुक्त किये जा रहे हैं. वनस्पति घी के एक ब्रांड के रूप में सामने आये डालडा को आज ब्रांड नहीं वरन उत्पाद के रूप में देखा जाता है. इसी तरह तेल शब्द का अभिप्राय उस उत्पाद से है जो तिल से निकलता है. आज इसका विस्तार होकर अनेक तरह के पदार्थों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा. शब्दों की इसी व्यापकता के सन्दर्भ में आज एक शब्द ‘निर्भया’ भी चर्चा में है. दिल्ली में दिल दहलाने वाली घटना के बाद निर्भया शब्द चलन में आया और आज इसे अन्य दूसरी घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ पाते हैं. बिना उसका मर्म जाने, बिना शब्दों का मूल भाव जाने उसे व्यापक सन्दर्भों में प्रयुक्त किया जाना भाषाई विसंगति ही है. 


शब्द-विस्तार की तरह शब्द-संकुचन की स्थिति भी देखने में आती है. इसके उदाहरण के रूप में ‘कमल’ को लिया जा सकता है. कमल के विविध पर्यायों के अलग-अलग सन्दर्भ, अलग-अलग अर्थ हैं वो चाहे ‘सरोज’ हो, ‘पंकज’ हो या फिर ‘नीरज’ आदि हो. इसके बाद भी किसी भी स्थान विशेष पर खिले हुए कमल-पुष्प को सिर्फ कमल से ही पुकारा जाता है. दरअसल शब्द-संकुचन अथवा शब्द-विस्तार की स्थिति व्यक्ति की उस मानसिकता के कारण उपजती है जहाँ वो किसी भी शब्द अथवा स्थिति के मूल में जाना पसंद नहीं करता. किसी शब्द के मूल अर्थ की जानकारी लेने का प्रयास नहीं करता है, वहाँ भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है. इनके अलावा भाषाई स्तर पर शब्दों के विलुप्त होने की स्थिति भी अब आम हो चली है.


शब्दों का विलुप्त होना उनके चलन में न रहने के कारणशब्द विशेष के कार्यों, वस्तुओं आदि के चलन में न रहने के कारणउनसे गँवईपन का बोध होने के चलते उनको किनारे किये जाने के कारण से होता है. बहुत सारे ऐसे शब्द हमारे बीच से इस कारण गायब हुए क्योंकि उनसे सम्बंधित सेवाओं का, वस्तुओं का प्रचलन ही समाज में नहीं हो रहा है. इनमें ‘भिश्ती’, ‘मसक’, ‘ठठेरा’, ‘सिल-बट्टा’, ‘मूसल’ आदि शब्दों को लिया जा सकता है. किसी समय ग्रामीण अंचलों में धड़ल्ले से बोले जाने वाला ‘फटफटिया’ शब्द ‘मोटरसाईकिल’ से होता हुआ ‘बाइक’ पर आकर रुक गया. इसी तरह से सामान्य बोलचाल में हिन्दी शब्दों की उपलब्धता के बाद भी अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से भी बहुत से शब्द या तो चलन से बाहर हो गए हैं या फिर उसी राह पर हैं. घर में काम आने वाली ‘तश्तरी’ अब ‘प्लेट’ में बदल चुकी है. ‘प्याले’ भी ‘कप’ में बदल गए हैं. ‘फीवर’, ‘वीकनेस’, ‘डॉगी’, ‘केयर’, ‘टेस्टी’, ‘वीसी’, ‘रजिस्ट्रार’, ‘एडमीशन’, ‘लिस्ट’ आदि सहित ऐसे अनेक शब्द हैं जो बहुत तेजी से आम बोलचाल में शामिल होकर मूल हिन्दी शब्दों ‘बुखार’, ‘कमजोरी’, ‘कुत्ता’, ‘स्वादिष्ट’, ‘कुलपति’, ‘कुलसचिव’, ‘प्रवेश’, ‘सूची’ आदि को चलन से बाहर करने में लगे हैं.


भाषाई स्तर पर ये स्थिति चिंताजनक हैहोनी भी चाहिए क्योंकि ऐसे अनेक मूल हिन्दी शब्द अपने अस्तित्व में होने के बाद भी धीरे-धीरे चलन से बाहर होते जा रहे हैं. अपने अस्तित्व में होने के बाद भी शिक्षा क्षेत्र से ‘भौतिकी’, ‘रसायन विज्ञान’ आदि जैसे कुछ शब्द अब चलन से बाहर ही हैं. इनकी जगह पर सहजता से ‘फिजिक्स’,’ केमिस्ट्री’ का प्रयोग होने लगा है. कई बार लगता है कि जब इन्सान ने अपने रिश्तोंसंबंधोंपरिवार तक को विलुप्त होने की स्थिति में पहुँचा दिया है तो फिर शब्दों की बिसात ही क्या है. तकनीकी के बढ़ते जा रहे प्रभाव के चलते एक अबोल स्थिति इंसानों के मध्य पनपती जा रही है. सूचना तकनीकी क्रांति ने बातचीत को भी लगभग समाप्त कर दिया है. संदेशों का आदान-प्रदान करके कर्तव्यों की इतिश्री की जाने लगी है. ऐसी अबोल स्थिति में जबकि संवाद विलुप्त हैंबातचीत में ही शब्द विलुप्त हैं तो फिर भाषाई विलुप्तता से घबराहट किसलिए? 






 

16 नवंबर 2022

एहसासों का दरिया....

भावनाओं का अतिरेक

उमड़ते देखा,

एहसासों का दरिया

इस आँख से उस आँख तक

मचलते देखा,

नजरें चुरा कर

आँखों की बारिश

थामने की कोशिश,

शब्द-शब्द पर लबों को

लरजते देखा।


उक्त पंक्तियाँ पोस्ट के लेखक की ही हैं. कई बार कुछ पंक्तियाँ ही समूची मनोदशा की परिचायक होती हैं. इन पंक्तियों में भी कुछ ऐसा ही है. भावनाओं, एहसासों, संबंधों आदि महज शब्द नहीं होते हैं, यदि इनको माना जाये, इनकी गहराई को समझा जाये तो ये बहुत अधिक आत्मीय और संवेदना से भरे शब्द होते हैं. दो-चार वर्णों से बने इन शब्दों में किसी भी व्यक्ति को बाँधे रखने की शक्ति होती है. कितना भी कठोर दिल इन्सान हो उसकी आँखों को नम कर देने की क्षमता भी इन शब्दों में होती है.


आज के दौर में जहाँ बहुतायत सम्बन्ध, रिश्ते स्वार्थपूर्ति के लिए बनाये जाने लगे हैं वैसे में भावनात्मकता से भरे संबंधों का अपना ही महत्त्व है. इस महत्ता को, इन संबंधों को वही समझ सकता है जो इनको उसी गंभीरता से निभाता हो. इस स्थिति से दो-चार होने पर एहसास हुआ कि कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं, अपनी बात कहने के लिए. बात को कहने से ज्यादा शब्दों को रोकने की कोशिश करनी पड़ती है. शब्दों से ज्यादा आँखों की नमी सबकुछ कह देने को व्याकुल सी दिखती है. खुद को कमजोर न पड़ने देने के साथ-साथ सामने वाले को भी कमजोर न होने देने का प्रयास करना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि शब्दों को प्रकट कर देना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या फिर उनको रोके रखना? आँखों की नमी को छिपाना ज्यादा मुश्किल है या फिर नजरों का न मिलाना?


बहरहाल, ये हमारा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बहुत से क्षणों में बात को न कहना, आँखों की नमी का छलकना, नज़रों का सामने वाले की नजर से बचाना ही सबकुछ कह देता है. इस सबकुछ कहे जाने को समझना ही महत्त्वपूर्ण है. 




21 फ़रवरी 2022

विलुप्त हो चुके शब्दों से परिचय आवश्यक

आज, 21 फरवरी को पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (International Mother Language Day) के रूप में मनाया जाता है. दुनिया में भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देने के साथ-साथ मातृभाषाओं से जुड़ी जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से यह दिन मनाया जाता है. इस दिन को मनाने का उद्देश्य कुछ अलग ही है. सन 1952 में ढाका विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी मातृभाषा का अस्तित्व बनाए रखने के लिए एक विरोध प्रदर्शन किया. तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ बरसा दीं. इससे 16 लोगों की जान चली गई. भाषा के इस बड़े आंदोलन में शहीद हुए लोगों की याद में सन 1999 में यूनेस्को ने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की. कहा जा सकता है कि बांग्ला भाषा बोलने वालों के मातृभाषा के लिए प्यार की वजह से ही आज विश्व में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है.


बांग्लादेशी नागरिकों के अपनी मातृभाषा से प्रेम करने के कारण दिए गए बलिदान ने समूचे विश्व को अपनी-अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम-सम्मान दर्शाने का एक दिन सुनिश्चित किया. वैश्विक स्तर पर जबकि भाषाओं, बोलियों पर उनके अस्तित्व का संकट आया हुआ है उस समय में मातृभाषा दिवस के आयोजन का विशेष महत्त्व हो जाया करता है. आज इस दिवस को मनाने के साथ-साथ इस पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि हम सभी अपनी जिस मातृभाषा को बोल रहे हैं या फिर हमारी जो भी मातृभाषा है, उसके कौन-कौन से शब्द विलुप्त हो चुके हैं अथवा विलुप्त होने की स्थिति में हैं. भाषाओं, बोलियों के विलुप्त होने के पीछे सम्बंधित भाषा-बोली के समुदायों, नागरिकों का कम होते जाना है. इसी तरह किसी शब्द के विलुप्त होने की भी अपनी कहानी है. भाषा, बोली के विलुप्त होने को लेकर सम्बंधित संस्थाएँ सकारात्मक कार्य करने से ज्यादा आँकड़े एकत्र करने के पीछे लगी रहती हैं. उनको लेकर कुछ न कुछ काम भी होता रहता है मगर शब्दों के विलोपन को लेकर बहुत ज्यादा सकारात्मकता देखने को नहीं मिलती है. कोई भी शब्द बहुत ही सामान्य रूप से हमारे बीच से गायब हो जाता है और हमें इसकी भनक तक नहीं लग पाती है.




शब्दों के विलोपन पर जाने के पूर्व एक उदाहरण देना चाहेंगे कि कितनी सहजता से हिन्दी भाषा से या कहें कि देवनागरी लिपि से हिन्दी के गणितीय अंक (१,,, ४ आदि) चलन से गायब हो गए और किसी कोई कोई फर्क नहीं पड़ा. कुछ इसी तरह से हमारे बीच से हमारी भाषा, बोली के बहुत से शब्द धीरे-धीरे गायब होते चले गए और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा. किसी शब्द के विलोपन में दो बातें प्रमुख समझ आती हैं. एक तो आधुनिक शब्दों के आ जाने से, आधुनिक जीवन-शैली के कारण नए-नए शब्दों के आ जाने से पुराने और अटपटे शब्द चलन से धीरे-धीरे बाहर होते चले गए. दूसरी बात ये समझ आती है कि जिस वस्तु, सामग्री आदि के लिए इन शब्दों का प्रयोग होता हो उनका ही चलन से बाहर हो जाना हो गया. सम्बंधित वस्तु, सामग्री ही चलन में नहीं रही तो उनके लिए प्रयोग किये जाने वाला शब्द स्वतः ही चलन से बाहर होकर विलुप्त हो गया.


उदाहरण के लिए यदि देखें तो किसी समय चलन में रहा शब्द फटफटिया समय के साथ गायब हो गया. अब इसके लिए बाइक शब्द ही पूरी तरह चलन में है. देखा जाये तो बाइक से पहले मोटरसाईकिल शब्द का भी खूब प्रयोग हुआ करता था. चूँकि आधुनिक शब्द बाइक के चलन में आ जाने के कारण फटफटिया और मोटरसाईकिल शब्द चलन से बाहर ही हो गए हैं. इसी तरह भिश्ती, मसक शब्द अब पूरी तरह चलन से बाहर हैं. आज की पीढ़ी शायद इन शब्दों के न तो अर्थ जानती होगी और न ही उसने इनको देखा होगा. इसके पीछे का कारण यही है कि इन दोनों शब्दों का प्रयोग जिस वस्तु के लिए हुआ करता था, वे ही चलन से बाहर हैं.


व्यक्तिगत तौर पर हमें लगता है कि ऐसे शब्द जो कभी चलन में रहे थे, उनके बारे में अपनी आने वाली पीढ़ी को बताया जाना चाहिए. आखिर यह भी भाषाई इतिहास का भाग हैं. वैश्विक इतिहास में, राष्ट्रीय इतिहास में हम वर्तमान पीढ़ी को उन सभ्यताओं, संस्कृतियों, वस्तुओं आदि के बारे में पढ़ा रहे हैं जिनका कहीं कोई लेना-देना नहीं, उनका वर्तमान के साथ कोई तारतम्य नहीं कुछ इसी तरह से भाषा में भी उन शब्दों से वर्तमान पीढ़ी का परिचय करवाया जाना चाहिए जो विलुप्त हो गए हैं अथवा विलुप्त होने की दशा में हैं. भाषाई संस्कृति, सभ्यता, गौरव भी मानवीय विकास, गौरव के लिए आवश्यक है.


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27 मई 2021

शाब्दिक आपत्ति वाले समाज में कमीने, छिछोरे की स्वीकार्यता

इधर कुछ दिनों से एक बाल कविता पर बहस चलती देख रहे हैं. यह कविता किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल की गई है. उसके कुछ शब्दों पर आपत्ति जताई गई है. चूँकि सिक्के की तरह किसी भी बात के दो पहलू होते हैं. कुछ ऐसा ही इस कविता के सन्दर्भ में भी हो सकता है. क्या सही है, क्या गलत है इसका आकलन इस पर सभी के मत अलग-अलग हो सकते हैं. कविता के कुछ शब्दों को बालमन पर गलत प्रभाव डालने वाला बताया जा रहा है तो एक पक्ष इन शब्दों को उनकी स्थानीयता के साथ जोड़कर सही मान रहा है. यहाँ हमारा व्यक्तिगत मत उस कविता के न पक्ष में है और न ही विपक्ष में. ऐसा इसलिए क्योंकि कोई एक कविता किसी भी तरह से स्थायी प्रभाव तब तक नहीं डाल सकती जब तक कि उसका कई सालों तक निरंतर वाचन न करवाया जाये.


यदि कोई एक कविता ही किसी भी बालमन को सुधारने, बिगाड़ने का काम करती तो ऐसे लोगों से ही पूछना चाहिए कि उनके अपने समय में पढ़ाई जाने वाली कविताओं को रटने के बाद भी उन्हीं के कालखंड के पुरुष माँ-बहिन की गालियाँ क्यों देते नजर आते हैं? दो-चार शब्दों के सहारे बालमन पर गलत असर पड़ने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में फिल्मों के माध्यम से समाज में लगभग स्वीकार्य शब्दों – सेक्सी, चुम्मा, कमीने, छिछोरे आदि को ऐसी ही पीढ़ी ने रचा है जिसने अपने समय में शालीन शब्दों वाली कविता पढ़ी है.


बहरहाल, उस कविता के कुछ शब्दों पर पढ़ने को मिली बहुत सी आपत्तियों के बाद अपना लिखा एक पुराना आलेख याद आया. यह उस समय लिखा था जबकि फिल्म कमीने बाजार में उतारी गई थी. उसके बाद से तो अशालीन शब्दों की नदी में न जाने कितने शब्द बह चुके हैं. एक बार फिर वही पुराना आलेख आपके बीच.




कमीना.....कमीने....चौंक गये आप? जी हाँ चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे समाज में ये शब्द एक गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. अभी शायद (शायद की जरूरत है?) ऐसी स्थिति आई नहीं है कि इस शब्द को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये. गाली तो गाली ही होती है या समय के साथ उसका भी परिष्कृत रूप सामने आता है? यह सवाल एक हमारे मन में ही अकेले नहीं घुमड़ता होगा, कभी न कभी, कहीं न कहीं आपको भी परेशान करता होगा. अब करता रहे परेशान तो करे जिसको ये शब्द समाज में प्रचलित करने हैं वे तो कर ही रहे हैं.


इस बात से थोड़ा सा इतर....आपको सेक्सी शब्द के बारे में क्या विचार आता है? कुछ सालों तक इस शब्द के मायने कुछ अलग थे. इस शब्द के उच्चारण में एक प्रकार की झिझक देखने को मिलती थी. आज.....आज ये शब्द हम बड़े बेधड़क होकर इस्तेमाल करते हैं. बड़े बैठें हों या फिर छोटे इस शब्द सेक्सी के प्रयोग में कोई शर्म किसी को नहीं है. और तो और सेक्सी शब्द के मायने अब इस रूप में बदले हैं कि हम अपने नन्हे-मुन्नों के लिए भी इस शब्द को प्रयोग करने लगे हैं. कोई विशेष ड्रेस पहना देख कर, किसी विशेष प्रकार के करतब दिखाने पर हम अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए अकसर कह देते हैं कि इस ड्रेस में बड़ा सेक्सी लग रहा है/लगता है. अकसर हम इस शब्द को मजाक के रूप में भी इस्तेमाल कर लेते हैं और क्या हाल है, बड़े सेक्सी बने घूम रहे हो?


इस शब्द की सहज स्वीकार्यता के सापेक्ष देखा जाये तो क्या कमीना शब्द इतना सहज स्वीकार्य है? या हो पायेगा? हो पायेगा का जवाब शायद कोई भी न दे पाये क्योंकि हमारे फिल्मी संसार ने लगभग स्वीकार्यता की स्थिति में तो इस शब्द को लाकर खड़ा कर दिया है. याद है वो गाना मुश्किल कर दे जीना, इश्क कमीना, यह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा था/चढ़ा है. अब इस गाने का विकास-क्रम बढ़ा. अब एक फिल्म आ गई है कमीने. स्वीकार्यता की ओर एक और कदम. जैसे हमारे विचार से सेक्सी शब्द की स्वीकार्यता बढ़ी थी मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी..... से. अब मित्रों में आपस में चर्चा होगी चल कमीने देख आते हैं. माँ के पूछने पर बेटी-बेटे कहेंगे माँ दोस्तों के साथ कमीने देखने जा रहे हैं.  


कई बार इस तरह के शब्दों के प्रयोग करने में उसका अर्थ न मालूम होने की स्थिति होती है पर यह भी उनके लिए होती है जो कम पढ़े-लिखे या निरक्षर होते हैं. जैसे हमारे एक मित्र के घर काम वाली बाई आती थी. वह जब भी अपने सात-आठ साल के बच्चे की कोई शरारत या फिर किसी हरकत का बखान करती तो बड़े ही गर्वोक्ति भरे अंदाज में कहती लला ने ऐसो कर दओ, बड़ो हरामी है.....या बड़ो हरामी होत जा रओ, अपयें मन की करन लगो है अब.....बगैरह-बगैरह. जब एक दिन उसको बताया कि इस शब्द, हरामी का क्या अर्थ होता है तो उसने फिर इसका इस्तेमाल करना बन्द कर दिया.


क्या काम वाली बाई की तरह ही इन फिल्म वालों की स्थिति है? क्या ये लोग भी इन शब्दों के अर्थ नहीं समझते? क्या अब समाज में विकृत मानसिकता को ही फैलाने का चलन काम करेगा? हो कुछ भी अब आने वाले समय में इस तरह के वाक्यों से भी रू-ब-रू होने की सम्भावना है देखो-देखो मेरे बेटे को, इस ड्रेस में कितना कमीना लग रहा है, आज गजब हो गया, तुम्हारे कमीनेपन ने तो मजा बाँध दिया.


क्या आप इसके लिए तैयार हैं? ये लेख उस समय का है जबकि छिछोरे शब्द फ़िल्मी दुनिया ने फिल्म के रूप में उतारा नहीं था. अब तो उदाहरण में इस छिछोरे शब्द को भी जोड़ा जा सकता है.


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ये है वो कविता जो आजकल विवादों में है, अपने कुछ शब्दों के कारण.




23 सितंबर 2020

शब्द-विस्तार और शब्द-संकुचन

हिन्दी साहित्य का अध्ययन करते समय पढ़ा था शब्द-संकुचन और शब्द-विस्तार के बारे में. बहुत से लोगों के लिए ये दो शब्द संयोजन भी आश्चर्य का विषय हो सकते हैं. शब्द-संकुचन और शब्द-विस्तार आजकल संभवतः किसी रूप में पढ़ाया नहीं जा रहा.


आज यहाँ फेसबुक पर चलाए जा रहे एक कपल चैलेंज के सन्दर्भ में ऐसा ही कुछ देखने को मिला. इस सोशल मीडिया ने ही नहीं बल्कि समाज ने इस कपल शब्द की परिभाषा ही बदल कर रख दी है. आज दिन भर की फेसबुक की भागदौड़ में यही नजर आया कि लोगों के लिए कपल का अर्थ महज पति-पत्नी से ही है. इसी को शब्द-संकुचन कहते हैं.


शब्द-संकुचन और शब्द-विस्तार के बारे में एक-दो उदाहरण देकर समझाएँगे तो सबकी समझ में आ जाएगा. हम सभी लोग एक शब्द निरंतर प्रयोग में लाते हैं और वह है तेल. इस शब्द का वास्तविक अर्थ है तिल से निकलने वाले तरल पदार्थ से. यह शब्द-विस्तार का उदाहरण है कि आज समाज में बहुत से तेल हम सभी इस्तेमाल करते हैं. सरसों का तेल, आँवले का तेल, गरी का तेल आदि-आदि. ये शब्द का विस्तार कहा जाता है जबकि किसी भी शब्द के अनेक अर्थ निर्मित हो जाएँ और चलन में आ जाएँ.


इसी तरह शब्द-संकुचन के रूप में हम कमल को देख सकते हैं. कमल के रूप में बहुत से नाम हमारे बीच हैं. सरोवर में खिले तो सरोज, कीचड़ में खिले तो पंकज, जल में खिले तो जलज मगर हम सभी को एक ही शब्द कमल से परिभाषित करते हैं.


कपल शब्द के अनेक अर्थ हैं जो युगल को, दो को, जोड़े को प्रदर्शित करते हैं मगर आज सभी ने पति-पत्नी की ही फोटो यहाँ लगाई. शब्द-संकुचन से शब्द की वास्तविक शक्ति कम हो जाती है. किसी भी दो के जोड़े को सामान्य अर्थों में कपल कहा जा सकता है. इसके बाद भी अंग्रेजी भाषा की संकुचित परिभाषा के चलते सभी लोग एक ही जगह पर अटके रहे.


फिलहाल तो सभी को अपने-अपने कपल की बधाई. बाकी हिन्दी का जो सामान्य सा ज्ञान हमारे पास था, उसे यहाँ बघार दिया. हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान किसी भी गलती के लिए हमें क्षमा करेंगे.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

11 अप्रैल 2019

चित्रों और शब्दों के संयोजन से उभरे शब्द-चित्र

कुछ समय पहले हमारे एक मित्र ने हमारी कविताओं, ग़ज़लों आदि को पढ़कर सुझाव दिया था कि मंच पर भी पढ़ा करो. इसके अलावा और भी बहुत कुछ हमारी रचनाओं की तारीफ के भी कहा गया. साफ़ सी बात है, मित्र है, बचपन का मित्र है तो स्वाभाविक है कि कोई लाग-लपेट तो होनी नहीं है. ऐसा भी नहीं कि कोई स्वार्थ रहा हो तभी उसने ऐसा कहा हो. वो हमारी आदत को जानता भी है कि हम किस कारण मंच से बचते रहे हैं. पहले रोजगार की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं को ही मंच बना रखा था, ऐसे में मंच पर जाना समय की बर्बादी समझ आती थी. ऐसा था भी क्योंकि उरई और आसपास के कवि-सम्मेलनों का देर रात तक चलना हुआ करता था, ऐसा आज भी होता है. यहाँ बहुत शुरू से पढ़ने का समय रात में ही निर्धारित कर रखा था, जिसके चलते रात का समय हम कहीं और खर्चने के मूड में नहीं रहते थे. वैसे ऐसा आज भी है. सिवाय घुमक्कड़ी के रात का समय कहीं और बिताना समय की, रात की बर्बादी समझ आती है. 


बहरहाल, अब न तो प्रतियोगी परीक्षाओं का चक्कर रहा और न ही रोजगार की तलाश में भटकने का सिलसिला और न ही किसी और तरह की भागदौड़. ऐसे में उस दोस्त ने कहना उसकी दृष्टि से सही भी था मगर पता नहीं क्यों इस तरह रुझान बना ही नहीं पाए. ऐसा नहीं कि मंच पर रचनाओं का पाठ नहीं किया या मंच से किसी तरह का भय लगता है मगर पता नहीं क्यों आज भी मन होने के बाद भी अन्दर से इच्छा नहीं होती कि मंच पर पढ़ने का सिलसिला आरम्भ किया जाये. ये भी मालूम है कि मंच अत्यंत सहजता से मिल भी जायेगा क्योंकि बहुत सारे मित्र मंचों पर स्थापित हो चुके हैं. उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन भी करते रहते हैं. इसके बाद भी अनिच्छा बनी ही रही, बनी ही हुई है.

जब उसने इस बार भी अपना प्रयास असफल होते देखा तो उसने एक और सुझाव दिया कि अपनी काव्य रचनाओं को छोटे-छोटे हिस्सों में अपनी फोटो के साथ शेयर करना शुरू करो. इसके लिए उसने आजकल सोशल मीडिया पर छोटे-बड़े कवियों, शायरों, साहित्यकारों के प्रसारित-प्रचारित होते काव्यांशों, गद्यांशों को चित्र सहित दिखाया भी. ऐसे चित्र हमारे पास भी सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से दिन भर किसी न किसी रूप में आते ही रहते हैं. किसी में प्रेम भरी शायरी, किसी में टूटे दिल का दर्द, किसी में दर्शन, किसी में भावनात्मक अपील जैसी, किसी में रिश्तों के निर्वहन की बातें, किसी में दोस्ती की चर्चा. लगा कि ये सुझाव अपनाया जा सकता है. आखिर कौन ऐसा होगा जिसे अपना ही प्रचार अच्छा न लगता हो. उसके द्वारा कई माह पहले दिया गया सुझाव ठंडे बस्ते में चला गया था. इधर दो-चार दिन से अपनी रचनाओं को, स्वयं के द्वारा खींचे गए चित्रों की, खुद बनाये रेखाचित्रों की रखरखाव, उनका संयोजन, व्यवस्थित करने का काम चल रहा था. इसी में कुछ चित्र बनाये हैं. हालाँकि इनको सोशल मीडिया पर भी शेयर किया गया है तथापि आप सबके लिए ब्लॉग पर पुनः इनको लगा रहे हैं. बताइयेगा कि हमारे दोस्त का सुझाया यह प्रस्ताव कैसा रहा?




07 फ़रवरी 2019

शब्दों के निहितार्थ खोल उतारना चाहिए


कहते हैं कि किसी बात को बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए. इसी तरह यह भी कहा जाता है कि जो बात सुनी गई है उस पर आँख बंद करके विश्वास नहीं किया जाना चाहिए. ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि शब्दों के अपने बहुतेरे सम्बन्ध होते हैं, अनेक सन्दर्भ होते हैं. एक-एक शब्द में अनेकानेक सन्दर्भ, अर्थ देखने को मिलते हैं. इन्हीं शब्दों के द्वारा कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है. बहुत बार ऐसा होता है कि कहा कुछ और होता है, उसका अर्थ कुछ और निकलता है और सामने वाला उसका कोई और सन्दर्भ निकालता है. शब्दों के इस तरह से कुछ कहने, कुछ समझने, कुछ अर्थ निकलने को इस कहानी के द्वारा भली-भांति समझा जा सकता है.


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मुल्ला नसरुद्दीन भारत आकर एक योगी के द्वार पर रुका. थका हुआ था, विश्राम मिल जाए ये सोच कर वो योगी के पास आकर पास बैठ गया. वो योगी की बातचीत सुनने लगा जो शिष्यों से चल रही थी. योगी समझा रहा था जीव-दया. कह रहा था कि समस्त जीव एक ही परिवार के हैं. समस्त जीवन जुड़ा हुआ है. इसलिए दया ही धर्म है.
जब योगी बोल चुका तो मुल्ला ने खड़े होकर कहा कि आप बिलकुल ठीक कहते हैं. एक बार मेरी जाती हुई जान एक मछली ने बचाई थी.
योगी तो एकदम हाथ जोड़कर उसके चरणों में बैठ गया. उसने कहा कि धन्य! मैं बीस साल से साधना कर रहा हूं लेकिन अभी तक मुझे ऐसा प्रत्युत्तर नहीं मिला कि किसी पशु ने मेरी जान बचाई हो. मैंने कई पशुओं की जान बचाई है, लेकिन किसी पशु ने मेरी जान बचाई हो, अब तक ऐसा मेरा भाग्य नहीं है. तुम धन्यभागी हो! तुम्हारी बात से मेरा सिद्धांत पूरी तरह सिद्ध हो जाता है. तुम रुको यहां, विश्राम करो यहां.
तीन दिन मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी सेवा हुई. चौथे दिन योगी ने कहा कि अब तुम पूरी घटना बताओ, वह रहस्य, जिसमें एक मछली ने तुम्हारी जान बचा दी थी.
नसरुद्दीन ने कहा कि आपकी इतनी बातें सुनने के बाद मैं सोचता हूं कि अब बताने की कोई जरूरत नहीं है. योगी नीचे बैठ गया, नसरुद्दीन के पैर पकड़ लिए और कहा, गुरुदेव, आप बचकर नहीं जा सकते. बताना ही पड़ेगा वह रहस्य, जिसमें एक मछली ने आपकी जान बचाई.
नसरुद्दीन ने कहा, अच्छा यह हो कि वह चर्चा अब न छेड़ी जाए. वह विषय छेड़ना ठीक नहीं है.
योगी तो बिलकुल सिर रखकर जमीन पर लेट गया. उसने कहा कि मैं छोडूंगा नहीं गुरुदेव! वह रहस्य तो मैं जानना ही चाहूंगा. क्या आप मुझे इस योग्य नहीं समझते?
नसरुद्दीन ने कहा, नहीं मानते तो मैं कहे देता हूं. मैं बहुत भूखा था और एक मछली को खाकर मेरी जान बची. इस तरह एक मछली ने मेरी जान बचाई.
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समझने की बात है, शब्द एक से हो सकते हैं मगर इससे किसी तरह की भ्रांति में पड़ने की जरूरत नहीं है. एक से शब्दों के भीतर भी बड़े विभिन्न सत्य हो सकते हैं. और कई बार विभिन्न शब्दों के भीतर भी एक ही सत्य होता है; उससे भी भ्रांति में पड़ने की जरूरत नहीं है. शब्दों की खोल को हटाकर सदा सत्य को खोजना जरूरी है.


19 अगस्त 2018

चित्र वही जो बिना शब्द के सब कुछ कह दे - विश्व फोटोग्राफी दिवस


आज विश्व फोटोग्राफी दिवस है. ऐसा माना जाता है कि सन 1839 में सबसे पहले में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेकस तथा मेंडे डाग्युरे ने फोटो तत्व को खोजने का दावा किया था. फोटोग्राफी की आधिकारिक शुरुआत लगभग 180 वर्ष पहले, वर्ष 1839 में हुई थी. फ्रांस सरकार ने 19 अगस्त, 1839 को इस आविष्कार को मान्यता दी थी, इसलिए 19 अगस्त को अब विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाता है. फोटोग्राफी के आने से  लोगों में एक-दूसरे को जानने की भावना का विकास तो हुआ ही, साथ ही अपनी संस्कृति-सभ्यता को संरक्षित रखने की भावना भी बढ़ी. फोटोग्राफी ने घुमक्कड़ी करने वालों को भी लाभान्वित किया और उन्हें भी लाभान्वित किया जो घर बैठे ही घुमक्कड़ जिज्ञासा को पूरा करना चाहते हैं.

किसी समय में फोटोग्राफी भले ही कठिन और जटिल शौक में शामिल माना जाता हो मगर आज जबसे मोबाइल सबके हाथ आया है, फोटोग्राफी सहज-सरल हो गई है. तकनीकी, कौशल, ज्ञान आदि की क्लिष्टता से बचने वाला व्यक्ति मोबाइल की सुविधा के चलते आसानी से फोटोग्राफी के शौक को पूरा करने में लगा है. राह चलते, सफ़र में, बस में, ट्रेन में, हवाई यात्रा में, नदी में, समुद्र में, पहाड़ों पर, मैदान में, बाग़ में, सुनसान में, रेगिस्तान में, हरियाली में, ऑफिस में, बाजार में, कार्यक्रमों में, बारिश में, धूप में, जाड़े में, गर्मी में कहाँ-कहाँ गिनाया जाये, ऐसा कोई क्षेत्र बचा नहीं जहाँ इन्सान अब फोटोग्राफी करता नहीं दिखता है.

फोटोग्राफी के सम्बन्ध में, अच्छी फोटो के संबंध में उच्च कोटि के फोटोग्राफर्स के भी अपने-अपने विचार हैं. कोई फोटो अच्छी क्यों होती है, उस फोटो में अच्छा क्या होता है, इस सम्बन्ध में प्रख्यात चित्रकार प्रभु जोशी का कहना है कि हमें फोटो के लिए उसके फ्रेम में क्या लेना है, इससे ज्यादा इस बात का ज्ञान जरूरी है कि हमें क्या-क्या छोड़ना है. देश के सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर में शामिल माने जाने वाले रघुराय का कहना है कि वे कोई भी फोटो खींचने के लिए पहले से उसकी कोई तैयारी नहीं करते. उनका कहना है कि वे किसी भी फोटो को उसके वास्तविक रूप में ही लेना पसंद करते हैं. देखा जाये तो कोई भी फोटो कितना भी अच्छी तरह से क्यों न क्लिक किया गया हो, उसमें तकनीकी पक्ष कितना भी सबल क्यों न हो मगर उसे तब तक बेहतर नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि उसमें कोई विचार न दिखाई दे. एक अच्छा चित्र उसी को माना जाना चाहिए जो मानवीय संवेदनाओं को जगाकर झकझोर दे. सामान्य शब्दों में कहा जाये तो एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होना चाहिए, जो बिना किसी शब्द के सबकुछ कह दे.

आज आपको अपनी कुछ फोटो से, जो मोबाइल से निकाली हैं, आपका परिचय कराते हैं. अच्छी हैं या नहीं, ये आप विचार करियेगा. हमने बस खींच लीं, अपनी समझ से.








08 मई 2016

शाब्दिक विलोपन का संकट

हमारी दादी एक शब्द ‘हुडुकचुल्लू’ का प्रयोग अक्सर करती थीं. किसी व्यक्ति द्वारा कुछ गलत कहने पर, गलत करने पर, काम या बात को न समझ पाने पर वे इस शब्द का प्रयोग करती थीं. इस शब्द का अर्थ हमारी समझ में न तब आया और न अब तक आया. इतना ही समझ आया कि इस शब्द का उपयोग दादी द्वारा बेवकूफी करने वालों के सन्दर्भ में किया जाता था. शाब्दिक दुनिया में ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं हैं मगर आज भी वे बहुतायत में बोले जाते हैं. आपसी वार्तालाप में प्रयोग किये जाते हैं. ऐसे शब्दों के अर्थ व्यक्तियों की बातचीत के सन्दर्भ में स्वतः निर्धारित हो जाते हैं अथवा निर्धारित कर लिए जाते हैं. हाल-फ़िलहाल में राजनीति के क्षेत्र में नवोन्मेषी महाशय ने भी एक अजब से शब्द ठलुआ के द्वारा भाषाई चर्चा को केंद्र में ला दिया. शब्दों के ऐसे प्रयोग के साथ-साथ हिन्दी भाषा में शब्द-संकुचन, शब्द-विस्तार जैसी अवधारणा सहजता से देखने को मिलती है. हमारे आसपास बहुत से शब्द ऐसे होते हैं जो अपने मूल अर्थ से अधिक विस्तार पा जाते हैं. ऐसे कई-कई शब्द अपना मूल अर्थ खोते हुए व्यापकता प्राप्त कर लेते हैं. इनको उससे सम्बंधित वस्तु, घटनाक्रम में प्रयुक्त किया जाने लगता है. डालडा, टुल्लू, ऑटो, तेल आदि ऐसे ही शब्द हैं जिनका अपना विशेष सन्दर्भ है किन्तु आज ये व्यापकता के साथ प्रयुक्त किये जा रहे हैं. वनस्पति घी के एक ब्रांड के रूप में सामने आये डालडा को आज ब्रांड नहीं वरन उत्पाद के रूप में देखा जाने लगा है. इसी तरह तेल शब्द का अभिप्राय उस उत्पाद से है जो तिल से निकलता है. आज इसका विस्तार होकर अनेक तरह के पदार्थों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा. ऐसा ही अन्य दूसरे शब्दों के साथ हो रहा है. शब्दों की इसी व्यापकता के सन्दर्भ में आज एक शब्द निर्भया भी चर्चा में है. दिल्ली में दिल दहलाने वाली घटना के बाद निर्भया शब्द चलन में आया और आज इसे अन्य दूसरी घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ पाते हैं. बिना उसका मर्म जाने, बिना शब्दों का मूल भाव जाने उसे व्यापक सन्दर्भों में प्रयुक्त किया जाना भाषाई विसंगति ही है. 



शब्द-विस्तार की तरह शब्द-संकुचन की स्थिति भी देखने में आती है किन्तु ये कुछ कम है. इसके उदाहरण के रूप में कमल को लिया जा सकता है. कमल के विविध पर्यायों के अलग-अलग सन्दर्भ, अलग-अलग अर्थ हैं वो चाहे सरोज हो, पंकज हो, नीरज आदि हो. देखा जाये तो इन सभी शब्दों के अलग-अलग अर्थ हैं, स्थितिगत अर्थ हैं. इसके बाद भी किसी भी स्थान विशेष पर खिले हुए कमल-पुष्प को सिर्फ कमल से ही पुकारा जाता है. दरअसल शब्द-संकुचन अथवा शब्द-विस्तार की स्थिति व्यक्ति की उस मानसिकता के कारण उपजती है जहाँ वो किसी भी शब्द अथवा स्थिति के मूल में जाना पसंद नहीं करता. किसी शब्द के मूल अर्थ की जानकारी लेने का प्रयास नहीं करता है, वहां भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है. इनके अलावा भाषाई स्तर पर शब्दों के विलुप्त होने की स्थिति भी अब आम हो चली है. इसके पीछे व्यक्ति की मानसिकता प्रभावी रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन करती है.

शब्दों का विलुप्त होना उनके चलन में न रहने के कारण, शब्द विशेष के कार्यों, वस्तुओं आदि के चलन में न रहने के कारण, उनसे गँवईपन का बोध होने के चलते उनको किनारे किये जाने के कारण से होता है. किसी ज़माने में ग्रामीण अंचलों में धड़ल्ले से बोले जाने वाला फटफटिया शब्द मोटरसाईकिल से होता हुआ बाइक पर आकर रुक गया. इसी तरह से रोजमर्रा के प्रयोग में आने वाली तश्तरी अब प्लेट में बदल चुकी है, प्याले भी बहुतायत में कप में बदल गए हैं. अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में भी यही हालत बनी हुई है. अनेकानेक शब्द अंग्रेजी के इस्तेमाल के चलते विलुप्त होने की स्थिति में आ गए हैं. भिश्ती, मसक, ठठेरा, सिल-बट्टा, मूसल आदि शब्दों का चलन से बाहर होने में इन शब्दों से सम्बंधित कार्यों, व्यक्तियों, वस्तुओं का चलन से बाहर होना रहा है.

भाषाई स्तर पर ये स्थिति चिंताजनक है, होनी भी चाहिए किन्तु कई बार लगता है कि जब इन्सान ने अपने रिश्तों, संबंधों, परिवार तक को विलुप्त होने की स्थिति में पहुँचा दिया है तो फिर शब्दों की बिसात ही क्या है. तकनीकी के बढ़ते जा रहे प्रभाव के चलते एक अबोल स्थिति इंसानों के मध्य पनपती जा रही है. पत्र से टेलीफोन पर आने और फिर मोबाइल क्रांति के चलते उनका अतीत में बदल जाने को सबने देखा. इधर सूचना तकनीकी क्रांति ने तो उस मोबाइल से होती बातचीत को भी लगभग समाप्त कर दिया है. संदेशों का आदान-प्रदान करके अब कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाने लगी है. सामने वाले ने तो विभिन्न मंचों का प्रयोग करके आप तक सन्देश भेज दिया. अब यदि आपको फुर्सत है तो उसको पढ़ लें अन्यथा की स्थिति में एक अबोल स्थिति तो बनी ही है. ऐसी अबोल स्थिति में जबकि संवाद विलुप्त हैं, बातचीत में ही शब्द विलुप्त हैं तो फिर भाषाई विलुप्तता से घबराहट किसलिए. हमारे, आपके, सबके बीच से लगातार विलुप्त होती जाती कई-कई चीजों के बीच यदि हम सभी लोग इंसानियत को, मानवता को, भाईचारे को जिन्दा बनाये रखें तो यही बहुत बड़ी उपलब्धि होगी.

03 दिसंबर 2010

कार्यों को महत्त्व देने की जरूरत है, अभी भी शारीरिकता इस पर हावी है


आज विकलांग दिवस को भी मना डाला गया। कुछ औपचारिकताओं का निर्वाह हुआ, कुछ गोष्ठियों का समापन हुआ, कुछ सामान भी बांट दिया गया और हो गई कर्तव्यों की इतिश्री। समाज में आज इस दिन को ही नहीं वरन् किसी न किसी और दिन भी लोगों द्वारा यह दर्शाया जाता रहता है कि विकलांग व्यक्ति किसी से भी कम नहीं है, वह सभी वे सारे काम कर सकता है जो एक साधारण व्यक्ति कर सकता है।

चित्र गूगल छवियों से साभार

साधारण व्यक्ति, विकलांग व्यक्ति........क्या आपको कुछ अन्तर नहीं दिखता है? दिख रहा है न, जब शब्दों में ही इतना अन्तर दिख रहा है तो फिर प्रत्यक्ष रूप में समाज इस अन्तर को कैसे भुला सकता है? समाज कुछ भी कहे, संविधान कुछ भी कहे, व्यक्ति कुछ भी कहें किन्तु सत्यता यही है कि आम आदमी अपने मन में एक अन्तर पाल कर, एक पूर्वाग्रह बनाकर सामान्यजन और विकलांगजन की बात करता है।

इस शब्द को संविधान ने, समाज ने किस तरह और किस रूप में स्वीकारा है यह बात अलग है किन्तु हमारा व्यक्तिगत मत इस शब्द को लेकर अलग है। कोई कुछ भी कहे किन्तु जब एक व्यक्ति विकलांग शब्द की ध्वनि सुनता है तो कहीं कहीं दिल में गहरे तक कष्ट होता है। समाज ने एक चलन बना रखा है कि जो व्यक्ति चलने से, देखने से, सुनने से, हाथों से काम करने से लाचार है उसे सीधे तौर पर विकलांग करार दे दिया जाता है, भले ही वह आदमी किसी आम आदमी से ज्यादा अच्दा और गुणवत्तापूर्ण कार्य कर रहा हो।

इसके समर्थन में बस एक ही उदाहरण देना चाहेंगे कि स्टीफन हॉकिंस का नाम तो आप सभी ने सुना होगा। भौतिकी के क्षेत्र में कार्य कर रहे इस वैज्ञानिक की मात्र एक उंगली ही कार्य करती है और वह इसी उंगली के सहारे ब्राहाण्ड के जन्म पर खोज करने हेतु महामशीन को शुरू कर चुके हैं। क्या इस वैज्ञानिक को मात्र उसकी शारीरिक अक्षमता के कारण विकलांग कह देना उचित रहेगा?

जहां तक विकलांग होने का सवाल है तो इस शब्द की शाब्दिक व्याख्या की जाये तो स्पष्ट होता है कि जो किसी न किसी रूप में किसी अंग से विकल है वही विकलांग हुआ। इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखकर गौर करें तो समाज का बहुत बड़ा वर्ग विकलांग कहलायेगा। चश्मा लगाने वाला भी विकलांग, हकलाने वाला भी विकलांग, छड़ी लेकर चलने वाला भी विकलांग, जिसका पेट खराब रहता हो वह भी विकलांग, गंजा आदमी भी विकलांग हुआ किन्तु समाज का ध्यान इस ओर नहीं जाता है।

यह सम्भव है कि प्रत्येक वह व्यक्ति जो किसी न किसी रूप में अपनी शारीरिक क्षमताओं का पूर्णरूप से प्रयोग नहीं कर पा रहा हो उसे विशेष रूप से सहयोग देने की जरूरत हो सकती है। इस तरह की मदद, सहयोग को ऐसे व्यक्तियों को प्रोत्साहन देने की नीयत से होना चाहिए कि उन पर कोई एहसान करने की दृष्टि से। पता नहीं समाज में किसी क्रियाशील व्यक्ति के कार्यों की अपेक्षा उसकी शारीरिकता को महत्व देना कब कम होगा?

किसी व्यक्ति को मात्र शारीरिक अक्षम होने के कारण नहीं वरन् उसकी प्रतिभा को महत्व देकर प्रोत्साहन अवश्य दें।


26 जुलाई 2009

नाम तेरे कितने नाम??

सुबह-सुबह मोबाइल ने बजना शुरू किया। गुस्सा बहुत आया। रात को सोच कर सोये थे कि देर तक सोयेंगे पर कमबख्त मोबाइल। मन मार कर आने वाले को हाय-हैलो बोला गया। हैलो बोलते ही हमें और तेज गुस्सा आया। दूसरी तरफ वाले ने जो नाम बताया वह हमारे घर में तो क्या दूर-दूर तक न तो रिश्तेदारी-नातेदारी में था और न ही पास-पड़ोस में।
यह सोच कर कि गलत नम्बर है, पूछा किस नम्बर को लगाया है? जवाब में हमारा ही नम्बर बताया गया। फिर पूछा किसने दिया? अबकी जो जवाब मिला उससे लगा कि बात तो हम ही से करनी है।
दरअसल हम कुछ दोस्त मिल कर एक एसोसिएशन बनाये हैं और लोगों को उससे जोड़ने का काम चल रहा है। ‘पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन’ नाम से इस एसोसिएशन में विशेष रूप से पी-एच0डी0 वालों को ही जोड़ा जा रहा है। उसी से जुड़ने के लिए उस तरफ से फोन था।
सामने वाली महिला थी, फिर उससे शालीनता से पूछा कि नम्बर तो हमारा है पर इस नाम का यहाँ कोई नहीं है। जब उसने हमारे दोस्त का नाम बताया कि फलां श्रीमान ने कहा था कि इस नाम वालों से बात कर लें तो पूरी स्थिति पता चल जायेगी। यदि आप कहते हैं कि इस नम्बर का यहाँ कोई नहीं है तो सारी।
अब हमारी समझ में पूरी बात आ गई। जोर की हँसी आई किन्तु अपनी हँसी को रोक कर कहा बताइये क्या जानकारी चाहिए? हम वही बोल रहे हैं जिनका नाम आपको फलां श्रीमान ने बताया है। उस तरफ एक पल को खामोशी छा गई। हम समझ गये कि नाम को लेकर संशय कायम है। हमने तब उनको समझाया कि हमारा ही नाम कुमारेन्द्र है और आप सही व्यक्ति से बात कर रहीं हैं।
आपको पता कि वो मैडम किससे बात करना चाहतीं थीं? वो बात करना चाहतीं थीं ‘कुमारी इन्दिरा’ से। उनके यह बताते ही हम समझ गये कि बेचारे कुमारेन्द्र को संधि-विच्छेद करके कुमारी इन्दिरा बना दिया गया है।
ऐसा अकसर हमारे नाम को लेकर होता रहा है। कभी नादानी में तो कभी प्यार में तो कभी चुहल में। हमारा एक मित्र है संदीप। वैसे तो वह हमें कुमारेन्द्र ही बुलाता है पर जब कभी अपने मूड में होता है तो कुम्मू ही बुलाता है।
हमारे इन्हीं दोस्त के रिश्ते के एक भाई हैं। उनको मालूम है कि हमारा नाम कुमारेन्द्र है पर वे आज भी हमें रामेन्द्र बुलाते हैं और सुनने वाला भी समझ जाता है कि बात हमारी हो रही है।
कालेज के दौरान हमारा एक साथी था, उसने भी हमारे नाम के अलग-अलग हिस्से करके एक अलग ही नाम बना दिया था। यहाँ उस समय कालेज के समय का लड़कपन, चुहलबाजी ही काम करती थी। उसने हमारे नाम को चार हिस्सों में बाँट दिया था - कुमार, इन्द्र, सिंह, सेंगर। इसके बाद इसको अंग्रेजी के शार्टफार्म में बनाकर पुकारता था। ‘किस’ (KISS) - कुमार का K, इन्द्र का I, सिंह का S, सेंगर का S।
इसी तरह और भी कई तरह से लोग उच्चारण में गलती करके नाम के कई रूप बनाते रहे हैं पर मोबाइल से बात करने वाली महिला ने जो नाम दिया उसने तो हमें भी घुमा दिया।

वाह! कैसे हो (कैसी हो) कुमारी इन्दिरा?

11 जुलाई 2009

आज बड़े कमीने लग रहे हो ! ! ! !

‘कमीना’.....‘कमीने’....चौंक गये आप? जी हाँ चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे समाज में ये शब्द एक गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अभी शायद (शायद की जरूरत है?) ऐसी स्थिति आई नहीं है कि इस शब्द को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये।
गाली तो गाली ही होती है या समय के साथ उसका भी परिष्कृत रूप सामने आता है? यह सवाल एक हमारे मन में ही अकेले नहीं घुमड़ता होगा, कभी न कभी, कहीं न कहीं आपको भी परेशान करता होगा। अब करता रहे परेशान तो करे जिसको ये शब्द समाज में प्रचलित करने हैं वे तो कर ही रहे हैं।
इस बात से थोड़ा सा इतर....आपको ‘सेक्सी’ शब्द के बारे में क्या विचार आता है? कुछ सालों तक इस शब्द के मायने कुछ अलग थे। इस शब्द के उच्चारण में एक प्रकार की झिझक देखने को मिलती थी। आज.....आज ये शब्द हम बड़े हि बेधड़क होकर इस्तेमाल करते हैं। बड़े बैठें हों या फिर छोटे इस शब्द ‘सेक्सी’ के प्रयोग में कोई शर्म किसी को नहीं है।
और तो और सेक्सी शब्द के मायने अब इस रूप में बदले हैं कि हम अपने नन्हे-मुन्नों के लिए भी इस शब्द को प्रयोग करने लगे हैं। कोई विशेष ड्रेस पहना देख कर, किसी विशेष प्रकार के करतब दिखाने पर हम अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए अकसर कह देते हैं कि इस ड्रेस में बड़ा सेक्सी लग रहा है, लगता है। अकसर हम इस शब्द को मजाक के रूप में भी इस्तेमाल कर लेते हैं ‘और क्या हाल है, बड़े सेक्सी बने घूम रहे हो?’
इस शब्द की सहज स्वीकार्यता के सापेक्ष देखा जाये तो क्या ‘कमीना’ शब्द इतना सहज स्वीकार्य है? या हो पायेगा? हो पायेगा का जवाब शायद कोई भी न दे पाये क्योंकि हमारे फिल्मी संसार ने लगभग स्वीकार्यता की स्थिति में तो इस शब्द को लाकर खड़ा कर दिया है। याद है वो गाना - ‘मुश्किल कर दे जीना, इश्क कमीना’, यह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा था, चढ़ा है।
अब इस गाने का विकास-क्रम बढ़ा। अब एक फिल्म आ गई है ‘कमीने’....। स्वीकार्यता की ओर एक और कदम। जैसे हमारे विचार से सेक्सी शब्द की स्वीकार्यता बढ़ी थी ‘मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी........’ से। अब मित्रों में आपस में चर्चा होगी चल कमीने देख आते हैं। माँ के पूछने पर बेटी-बेटे कहेंगे-माँ दोस्तों के साथ कमीने देखने जा रहे हैं।
कई बार इस तरह के शब्दों के प्रयोग करने में उसका अर्थ न मालूम होने की स्थिति होती है पर यह भी उनके लिए होती है जो कम पढ़े-लिखे या निरक्षर होते हैं। जैसे हमारे एक मित्र के घर काम वाली बाई आती थी। वह जब भी अपने सात-आठ साल के बच्चे की कोई शरारत या फिर किसी हरकत का बखान करती तो बड़े ही गर्वोक्ति भरे अंदाज में कहती ‘लला ने ऐसो कर दओ, बड़ो हरामी है.....या बड़ो हरामी होत जा रओ, अपयें मन की करन लगो है अब’.....बगैरह-बगैरह। जब एक दिन उसको बताया कि इस शब्द का क्या अर्थ होता है तो उसने फिर इसका इस्तेमाल करना बन्द कर दिया।
क्या काम वाली बाई की तरह ही इन फिल्म वालों की स्थिति है? क्या ये लोग भी इन शब्दों के अर्थ नहीं समझते? क्या अब समाज में विकृत मानसिकता को ही फैलाने का चलन काम करेगा?
हो कुछ भी अब आने वाले समय में इस तरह के वाक्यों से भी रू-ब-रू होने की सम्भावना है ‘‘देखो-देखो मेरे बेटे को, इस ड्रेस में कितना कमीना लग रहा है।’’ ‘‘आज गजब हो गया, तुम्हारे कमीनेपन ने तो मजा बाँध दिया।’’
क्या आप इसके लिए तैयार हैं?