सम्भवतः आप सभी को ‘शब्द विस्तार’ और ‘शब्द संकुचन’ का अर्थ और उदाहरण की जानकारी
होगी.
इसके अलावा अभिधा, लक्षणा,
व्यंजना के बारे में बहुत से लोगों ने
पढ़ा होगा.
उक्त दो के बारे में जानकारी न होने के कारण लोग भटक-भटक कर न जाने कहाँ पहुँच
जा रहे हैं. इसी तरह कुछ शब्द अपने आपमें ही एक पहचान बन जाते हैं और व्यक्ति अपनी
मानसिक संकुचन की स्थिति में उस शब्द की पहचान के इर्द-गिर्द डोलता-भटकता रहता है.
इसे ऐसे समझें कि हमारे आसपास में एक हैं जिनको किसी कारणवश ‘बंदरवा’ से कभी सम्बोधित
किया गया था. स्थिति ये है कि आज भी यदि बंदरवा बोल दें तो सब उसी एक व्यक्ति से इसका
अर्थ जोड़ देते हैं.
कुछ इसी तरह से कल से कुछ भटकन हमारी एक पोस्ट पर है. समझ नहीं पा रहे हैं कि कल
को इनकी नाली में, किचेन की सिंक
में, बाथरूम के कोने में,
बरामदे में ‘कोई विशेष जीव’ टहलता दिखेगा
तो ये भटकते लोग क्या कहेंगे, क्या करेंगे? जिस विशेष जीव
का नाम वर्ग विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत न होने देने के कारण नहीं लिख रहे हैं,
उस विशेष जीव को पालेंगे-पोसेंगे या फिर
वही ट्रीटमेंट देंगे, जो उसे हमेशा
से दिया जाता रहा है? मानसिकता
को, दृष्टि को कम से कम इतना तो
खुला रखना चाहिए कि भटकने के बाद भी सबकुछ समझ आए, साफ़ दिखे.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें