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18 फ़रवरी 2025

प्रशासनिक व्यक्तियों को रवैया सुधारने की आवश्यकता

ओडिशा के भुवनेश्वर में कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (KIIT – केआईआईटी) के एक छात्रावास में एक नेपाली छात्रा के मृत पाए जाने के बाद इस निजी इंजीनियरिंग संस्थान में नेपाली विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया. दरअसल नेपाली छात्रा प्रकृति का शव मिलने के बाद संस्थान के कुछ विद्यार्थियों द्वारा इसे आत्महत्या न बताकर हत्या बताया. विद्यार्थियों ने आरोप लगाया कि प्रकृति के बैच का ही भारतीय छात्र उसे प्रताड़ित कर रहा था. शिकायतें करने के बाद भी संस्थान की तरफ से उस लड़के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. यद्यपि मृतक छात्रा के चचेरे भाई की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी भारतीय छात्र को गिरफ्तार करके उसके खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज किया है तथापि विद्यार्थियों का कहना है कि संस्थान इस मामले को दबाने का कार्य करता रहा.

 

इस घटना के बाद कैम्पस में स्थिति तनावपूर्ण होने लगी थी. 16 फरवरी की शाम बी-टेक थर्ड ईयर की नेपाली छात्रा प्रकृति का शव कॉलेज के हॉस्टल में मिलने के बाद नेपाली विद्यार्थियों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. इसी के बाद संस्थान द्वारा जवाबी कार्यवाही करते हुए नेपाली विद्यार्थियों को संस्थान, हॉस्टल छोड़ने के निर्देश दिए गए. विद्यार्थियों का कहना था कि विश्वविद्यालय के स्टाफ ने सभी विद्यार्थियों से तत्काल हॉस्टल खाली करने को कहा. इस दौरान उनके साथ मारपीट किये जाने का भी आरोप लगाया गया. संस्थान की तरफ से अमानवीयता सी दिखाते हुए विद्यार्थियों को दो बसों में भरकर कटक रेलवे स्टेशन पर उतार दिया गया. ये सोचने वाली बात है कि संस्थान के कर्मी नेपाल जाकर वहाँ से विद्यार्थियों को अपने संस्थान में अध्ययन करने हेतु लेकर आते हैं. सैकड़ों की संख्या में नेपाली विद्यार्थी यहाँ इंजीनियरिंग में अध्ययनरत हैं. ऐसे में संस्थान प्रशासन को इन विद्यार्थियों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए.

 

इस सन्दर्भ में एक स्थिति विचारणीय है कि आजकल व्यक्ति हो अथवा संस्थान सभी के ऊपर पद, प्रतिष्ठा का अहंकार बहुत बुरी तरह से हावी है. ये आवश्यक नहीं कि व्यक्ति निजी सेवा में है अथवा सरकारी सेवा में, ये भी आवश्यक नहीं कि वह किस श्रेणी का कर्मचारी है अथवा अधिकारी है, उसके पास यदि किसी भी तरह का अधिकार है तो बहुतायत में वह उसका दुरुपयोग ही करता है. उसके स्तर से काम चाहे छोटा हो अथवा बड़ा, सामने वाले पर पूरी हनक दिखाई जाती है. संस्थानों की स्थिति भी कुछ इससे अलग नहीं है. यहाँ भी विभिन्न पदों पर व्यक्ति ही बैठे हुए हैं जो मूलरूप से अहंकारी शैली को अपनाए हुए रहते हैं. यही कारण है कि केआईआईटी प्रशासन ने पूरे मामले को गम्भीरता से लेते हुए इस घटना के मूल में पहुँचने की कोशिश किये बिना अपनी तानाशाही, अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए नेपाली विद्यार्थियों से संस्थान से बाहर निकाल दिया.

 

अब खबर है कि नेपाली छात्रा की मृत्यु के मामले में अब तक छह लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका हुई है. छात्रा के बैचमेट भारतीय छात्र के बाद संस्थान के तीन डायरेक्टर और दो सिक्योरिटी गार्ड्स को गिरफ्तार किया गया. दो देशों के बीच का मामला होने के कारण आनन-फानन इस मामले की जाँच के लिए ओडिशा सरकार ने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव और उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त-सह-सचिव वाली हाई लेवल फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन कर दिया है. इस कमेटी की जाँच का परिणाम क्या होगा ये तो बाद की बात है मगर इस संस्थान सहित अन्य सभी संस्थानों के पदाधिकारियों, कर्मियों को अपने व्यवहार में बदलाव लाने की आवश्यकता है.


13 अक्टूबर 2022

खुद का आकलन खुद की नजरों में

इधर बहुत दिनों से खुद अपने व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है. अपने आपको अपनी ही नजर से विश्लेषित किया जा रहा है, खुद का आकलन किया जा रहा है. अभी निष्कर्ष रूप में बहुत कुछ तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु बहुत कुछ ऐसा है जो अपने बारे में और भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है. वैसे ऐसा नहीं है कि अपने कामों के बारे में, अपने स्वभाव के बारे में इधर ही कुछ दिन से आकलन करना शुरू किया है. इस तरह का काम बरसों से किया जा रहा है. यदि कहा जाये कि बचपन से तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


उन दिनों हम कक्षा सात या आठ में पढ़ते होंगे. उस समय अपने बाबा जी के साथ सुबह की सैर पर जाया करते थे. बाबा जी के साथ की सैर का लाभ तो मिला ही, उनके बहुत सारे अनुभवों से सीखने का भी अवसर मिला. अजनारी गाँव तक लगभग तीन किमी तक की सैर के दौरान बाबा जी से बहुत सारी सीख, शिक्षाएँ भी मिलती रहती थीं, जिनके द्वारा आज तक मार्गदर्शन मिलता रहता है. बाबा जी ने ही उसी समय सिखाया था कि कभी भी कितनी ही बड़ी समस्या क्यों न हो, उसका समाधान उसके छोटे रूप से सोचना शुरू करो, निकल आएगा. समस्या को बड़ा करके देखने पर समस्या ही बहुत बड़ी समझ आने लगती है तो समाधान खोजना मुश्किल हो जाता है.




ऐसी अनेक शिक्षाओं के साथ बाबा जी ने सिखाया था कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ना अच्छा रहता है. लिखने-पढ़ने की आदत उसी का सुखद परिणाम है. आज भी विगत कई वर्षों से नियम बना हुआ है कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ा अवश्य जाता है, भले ही वह पढ़ना कुछ पृष्ठ का ही हो. इसी तरह से बाबा जी ने एक बात और बताई थी कि दिन भर जो भी काम करो, उनके बारे में रात को सोने के ठीक पहले विचार किया करो. देखो कि कौन सा काम गलत किया, कौन सा काम सही किया. किसकी सहायता की, किसका नुकसान किया. इसके बाद अगले दिन के लिए संकल्प करो कि गलत काम जो आज हुआ, वो कल से नहीं होगा. जो नुकसान दूसरे का किया, वो फिर न होने पाए. ये आदत आज तक बनी हुई है. इसी के चलते कोशिश रहती है, खुद को सुधारने की, अपना स्वभाव सही करने की.


इसी आदत को विगत कुछ समय से विस्तार देने की कोशिश है. खुद को खुद की नजर से देखने, परखने की कोशिश है. ऐसा लगता है हमें खुद के बारे में जैसे संबंधों, रिश्तों, दोस्ती में कई बार सामने वाले पर हम अपनी इच्छा थोपने सी लगते हैं. सामने वाले पर अपना अधिकार सा मानते हुए उससे अपनी बात को मनवाने की चेष्टा करते हैं. यद्यपि ऐसा करवाने के पीछे किसी तरह की गलत मानसिकता नहीं होती है तथापि लगता है कि आखिर सामने वाले की भी अपनी सोच है, उसकी भी अपनी पसंद है. ऐसा होना आम बात है कि कोई काम, कोई बात हमें नापसंद हो, आवश्यक नहीं वही बात हमारे अभिन्न मित्र को भी नापसंद हो. बावजूद ये समझने के हम उसे अपनी पसंद के लिए मजबूर सा करते हैं. बात न मानने की स्थिति में कई बार गुस्सा आता है मगर सामने वाले पर नहीं, खुद पर. लगता है कि आखिर क्यों अपनी बात को अगले पर थोप रहे थे, आखिर उसका भी अपना अधिकार है, किसी बात को मानने या न मानने का, किसी काम को करने या न करने का.


हमारी जिद तरीके की ऐसी हरकत महज इसी भाव में हो जाती है कि हम अगले व्यक्ति पर अपना सम्पूर्ण अधिकार सा मान लेते हैं, समझ लेते हैं. लगातार कोशिश यही है कि अपनी ऐसी आदत पर नियंत्रण कर सकें. अपनी जिद जैसी इच्छा को अपने किसी ख़ास, विशेष पर जबरन न थोपा जाये. 




 

07 सितंबर 2022

दोस्ती, विश्वास, अधिकार का सह-सम्बन्ध

दोस्ती को किसी भी रिश्ते से अलग और सबसे ऊपर माना जाता है. हमारा भी व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि दोस्ती का रिश्ता सबसे अलग होता है. विगत कुछ वर्षों के जो अनुभव रहे हैं, उनके आधार पर इसके साथ कुछ बातों का और भी अनुभव किया है. दोस्ती के साथ-साथ अन्य आयाम भी जुड़कर चलते हैं, जिनके बारे में अक्सर विचार किया नहीं जाता है. संभव है ऐसा करने के पीछे का कारण यही रहता हो कि दोस्ती को सबसे ऊपर माना जाता है. यदि बारीकी से देखा जाये तो दोस्ती के साथ-साथ अधिकार और विश्वास भी उतनी ही महती भूमिका में रहते हैं. इन दोनों को उसी नजरिये से एकसाथ नहीं देखा जा सकता है, जैसा कि दोस्ती को देखा जाता है. 


किसी भी व्यक्ति के साथ दोस्ती में गहराई या मजबूती उसी स्थिति में आती है जबकि उसके साथ विश्वास की मजबूती हो. जहाँ विश्वास में लेशमात्र भी संदेह, संशय रहेगा वहाँ दोस्ती जैसा कुछ भले हो मगर दोस्ती नहीं हो सकती. इसे जान-पहचान, परिचय, सम्बन्ध आदि कुछ भी कहा जा सकता है. असल में दो लोगों के बीच की मेल-मुलाकात, उनके बीच का परिचय, उनके मध्य की बातचीत को दोस्ती के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. दोस्ती का अर्थ ही विस्तार लिए है, गहराई लिए है. दोस्ती महसूस करने की, स्वयं में जीने की स्थिति है न कि किसी रिश्ते का नामकरण. इसलिए दोस्ती में विश्वास का होना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.  




इसके अलावा दोस्ती के साथ जिस अन्य आयाम को हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है वह है अधिकार. अधिकार एक तरह की वह स्थिति है जो दो व्यक्तित्वों को एक-दूसरे में आपस में परिवर्तित कर देती है. ऐसा दोस्ती के सन्दर्भ में ही हमने महसूस किया है, अनुभव किया है. संभव है कि अन्य किसी स्थिति में अधिकार का मंतव्य कुछ और निकलता हो. दोस्ती और अधिकार के बीच के साहचर्य को, सह-सम्बन्ध को जब देखते हैं तो लगता है कि दोस्ती भले ही कितनी प्रगाढ़ हो, दोस्ती में कितनी ही गहराई क्यों न हो मगर अधिकार का दायरा अलग-अलग होता है. जिस व्यक्ति से दोस्ती अपने परम-पावन रूप में पूरी ईमानदारी के साथ हो, आवश्यक नहीं कि उसके ऊपर अधिकार भी उसी शिद्दत से हो. उसी एक व्यक्ति के विभिन्न स्वरूपों, कार्यों आदि में अधिकार की स्थिति बदलती रहती है.  


अक्सर देखने में आता है कि अधिकार को एकआयामी बिंदु मानकर उसे स्वीकार किया जाता है और ऐसी स्थिति में दोस्ती के सन्दर्भ में अक्सर ग़लतफ़हमी पैदा होने लगती है. यहाँ विश्वास और अधिकार की स्थिति में अंतर को भी समझना होगा. विश्वास का अर्थ सीधे-सीधे विश्वास से है. यहाँ कम या ज्यादा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता है. विश्वास है तो है, नहीं है तो नहीं है. ऐसा किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है कि किसी एक कार्य के सन्दर्भ में अथवा किसी परिस्थिति के सम्बन्ध में विश्वास का स्वरूप बदल जाए. इसके उलट अधिकार के अनेकानेक पक्ष सामने आते हैं. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि भले ही आपकी किसी व्यक्ति के साथ अत्यंत गहरी दोस्ती है मगर संभव है कि उसके परिवार के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार आपको नहीं हो. परिवार से इतर उसी व्यक्ति के सन्दर्भ में देखें तो भले ही उस दोस्त के क्रियाकलापों पर, उसके कार्यों पर आपका अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप रहता हो मगर ऐसा भी संभव है कि उसके कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में किसी अन्य तरह का अधिकार आपको न हो. अधिकार के आयाम विभिन्न स्वरूपों में दोस्ती के साथ चलते रहते हैं. यहाँ अधिकार के अलग-अलग स्वरूपों के कारण दो व्यक्तियों की दोस्ती में अंतर के बाद भी दोस्ती का चरम स्वरूप, पावन रूप देखा जा सकता है.  


दोस्ती अत्यंत पवित्र रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते के नामकरण का मोहताज नहीं. उसके लिए किसी तरह की कोई परिधि नहीं. उसके लिए कोई दायरा नहीं. इसके बाद भी व्यक्तिगत संबंधों, अनुभवों, एहसासों के आधार पर महसूस किया है कि दोस्ती के साथ अधिकार का सम्बन्ध वह नहीं है जो दोस्ती के सन्दर्भ में है. दोस्ती, विश्वास, अधिकार की आपसी संरचना को समझने की आवश्यकता है, उनके बीच के सह-सम्बन्ध को भी समझने की आवश्यकता है. अक्सर इन्हीं को समझने की चूक में दोस्ती जैसा रिश्ता पल भर में अपने अस्तित्व को खो देता है. अधिकारों के नाम पर व्यक्ति कई बार अपने दायरे से बाहर भी निकल जाता है. ऐसा करना एक तरह का अतिक्रमण ही होता है. अधिकारों के आयामों को न समझने के कारण, उनको उनकी परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार न करने के कारण दोस्ती के स्वरूप को विकृत होते भी देखा गया है.