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23 फ़रवरी 2021

अइया को याद करते हुए

कहते हैं कि समय घावों को भर देता है. इसके बाद भी कुछ बातें, कुछ यादें ऐसी होती हैं जिनको समय भी धुंधला नहीं कर पाता है. वे मन-मष्तिष्क पर ज्यों की त्यों अंकित रहती हैं. वे यादें, वे बातें अक्सर, समय-असमय सामने आकर खड़ी हो जाती हैं. गुजरता समय लगातार गुजरता रहता है. इस समय-यात्रा में बहुत कुछ बदलता रहता है. कुछ नया जुड़ता है, कुछ छूट जाता है. इस जुड़ने-छूटने में, मिलने-बिछड़ने में सजीव, निर्जीव समान रूप से अपना असर दिखाते हैं. इस क्रम में बहुत सी बातें स्मृति-पटल का हिस्सा बन जाती हैं. कुछ अपने दिल के करीब होकर, दिल में बसे होकर भी आसपास नहीं दिखते. उनकी स्मृतियाँ, उनके संस्मरण उनकी उपस्थिति का एहसास कराते रहते हैं. यही एहसास उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता का परिचायक है. बरस के बरस गुजरते जाते हैं, दशक के दशक गुजरते जाते हैं मगर इन्हीं स्मृतियों के सहारे लगता है जैसे सब कुछ कल की ही बात हो. ऐसा उस समय और भी तीव्रता से सामने आता है जबकि वह तिथि विशेष आँखों के सामने से गुजर जाए.


23 फरवरी एक ऐसी ही तारीख है कि जब पीछे पलट कर देखते हैं तो दो दशक की यात्रा दिखाई देती है. इस तारीख से जुड़ी बातें स्वतः याद आने लगती हैं. बहुत कुछ स्मरण हो आता है. याद आता है बहुत से अपने लोगों का साथ चलना, बहुत से अपने लोगों का ही साथ होना. साथ होकर भी साथ न दिखना. साथ न दिखते हुए भी साथ रहना. ऐसे ही लोगों में एक हमारी अइया भी हैं. जी हाँ, अइया यानि कि हमारी दादी. इस तारीख को ही अइया हम सबको छोड़कर बहुत दूर चली गईं, जहाँ से न उनका आना संभव है और न हम लोगों का जाना. ये विधि का विधान है कि किसी को इस संसार में आना होता है और उस आने वाले को किसी न किसी दिन जाना होता है. अवस्था कैसी भी हो अपने सदस्य के जाने का दुःख होता ही है. अइया के जाने का दुःख तो था ही. संतोष इसका था कि उनके अंतिम समय में पूरा परिवार उनके सामने था, उनके साथ था, जैसा कि बाबा के साथ न हो सका था. अइया के चले जाने के दो दशक बाद भी एक-एक घटना, एक-एक बात जीवंत है. उनके कमरे के साथ, उनके सामान के साथ, उनकी यादों के साथ. जिस दिन उनको पेंशन मिलती, हम तीनों भाइयों को वे कुछ न कुछ देतीं मगर उस नाती को कुछ ज्यादा धनराशि मिलती जो उनको लेकर जाता था. (इस वर्ष यह दुर्भाग्य रहा हमारे परिवार का कि अइया के इन तीन नातियों में से एक नाती उनके पास चला गया. मिंटू ही उनको खूब परेशान करता रहता था. वह अक्सर अइया को यह कहते हुए परेशान करता कि पेंशन के पैसों से हमें ज्यादा पैसे दिया करो नहीं तो किसी दिन हम रात में पूरे रुपये निकाल लेंगे आपकी डोलची से.)




खाने-पीने को लेकर होती चुहल, उनके पुराने दिनों को लेकर होती बातें, उनकी कुछ बनी-बनाई धारणाओं पर हँसी-मजाक बराबर होता रहता, जो उनके बाद बस याद का जरिया है. अपने अंतिम समय तक वे इसे मानने को तैयार न हुईं कि सीलिंग फैन कमरे की हवा को ही चारों तरफ फेंकता है, उसमें किसी तरह का बिजली का करेंट नहीं होता है. वे अपनी त्वचा दिखाकर बराबर कहती कि ये पंखा बिजली से चलता है और बिजली फेंकता है. तभी हमारी खाल जल गई है. इसी तरह की धारणा रसोई गैस को लेकर बनी हुई थी. गैस की शिकायत होने पर वे कहती कि गैस की रोटी, सब्जी, दाल खाई जाएगी तो पेट में गैस ही बनेगी. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अइया की याद में आये आँसुओं को मुस्कान में बदल देतीं हैं.


उस दिन सामान्य से हँसी-मजाक के बीच उन्होंने अपनी मनपसंद गुझिया खायी और फिर अचानक ही दूसरे लोक की यात्रा के लिए जैसे चलने को तत्पर हो गईं. हम लोग बस देखते ही रह गए. ऐसा लगा जैसे वे अपनी विगत दस-बारह दिन की शारीरिक समस्या को जैसे एक झटके में दूर कर चुकी हैं. ऐसा लगा जैसे उन्हें सारे परिवार के एकसाथ होने का इंतजार था. फ़िलहाल तो अइया को गए काफी लम्बा समय हो गया मगर उनकी बहुत सी बातें आज भी ज्यों की त्यों दिल-दिमाग में बसी है.


आज उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन अर्पित हैं.


22 नवंबर 2020

बचपन के साथी से दिल की बातें कहने का मन है

बचपन के उन दिनों में समझ न थी कि डायरी लेखन क्या होता है? डायरी लिखने के नाम पर क्या लिखा जाता है? शैतानी, मस्ती, मासूमियत भरे उन दिनों में बाबा जी ने हम भाइयों को एक दिन डायरी देते हुए डायरी लेखन को प्रोत्साहित किया. पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया कि क्या लिखना होगा इसमें. बाबा जी हम लोगों को खेल-खेल में बहुत सी जानकारियाँ देते रहते थे. घर के अलावा सुबह की सैर के समय भी बहुत सी व्यावहारिक जानकारियाँ, पढ़ाई से सम्बंधित जानकारियाँ बाबा जी हम तीनों भाइयों को देते थे. उस दिन डायरी हाथ में लिए खड़े थे और एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे. ग्यारह-बारह वर्ष की हमारी अवस्था में डायरी लेखन जैसा नया सा शब्द सामने आ गया. पहले तो लगा कि कोई पढ़ाई जैसा काम होगा मगर जब बाबा जी द्वारा डायरी लेखन के बारे में, उसमें क्या लिखना है, कैसे लिखना है आदि समझाया गया तो बिना एक पेज, एक शब्द लिखे डायरी लेखन कलात्मक समझ आया.


नई-नई डायरी मिली थी, नया-नया काम मिला था सो पहले दिन ही रात को सोने के पहले कुछ लिखा गया. अब तो ठीक-ठीक याद भी नहीं कि उस रात लिखा क्या था डायरी में मगर दूसरी सुबह बाबा जी को दिखाकर यह पुष्टि करनी चाही थी कि जो लिखा है वो सही है या नहीं. बाबा जी की तरफ से शाबासी मिली तो डायरी लिखने की तरफ रुझान बढ़ा. समय गुजरता रहा, लेखन का शौक था ही तो डायरी लेखन भी साथ-साथ चलता रहा. आरम्भिक वर्षों में नियमितता नहीं बन सकी थी, लेखन भी उसी बालसुलभ मानसिकता से भरा हुआ था. क्या खेला, स्कूल में क्या किया, किसके साथ शरारत की, स्कूल से घर वापसी में क्या-क्या शैतानियाँ सड़क पर की गईं, किसके साथ मारपीट हुई, किसके साथ लड़ाई की आदि-आदि घटनाएँ डायरी में सजती रहीं.




स्कूल से निकल कर हम कॉलेज आ गए और डायरी लेखन का शौक भी कुछ परिपक्वता प्राप्त करने लगा था. उन्हीं दिनों हॉस्टल में किसी दिन डायरी गायब कर दी गई. नितांत व्यक्तिगत विधा होने के बाद भी डायरी पढ़ी गई, बवाल मचा और अंततः डायरी को फाड़ कर फेंक देना पड़ा. उस एक घटना ने बहुत आहत किया और कई वर्षों तक डायरी का लिखा जाना नहीं हो सका. डायरी भले न लिखी जा रही थी मगर मनोभावों को किसी न किसी रूप में लिखते रहते. कभी कविताओं के रूप में लिखते तो कभी लेख के रूप में. कभी-कभी मन करता तो किसी कागज़ पर लिख कर उसे पढ़ते और फिर फाड़कर  रद्दी में बदल देते. कुछ वर्षों बाद फिर डायरी लेखन शुरू किया मगर कुछ समय बाद उस लेखन को भी फट जाना पड़ा. मन के भाव मन में ही कैद रहने लगे.


समय के साथ तकनीक ने अपनी करवट बदली, उसके साथ-साथ बहुत कुछ बदल गया. इसी बदलाव में ब्लॉग सामने आया. मानो मन के विचारों को पंख मिल गए हों. अब खूब लिखा जाने लगा. इसके बाद भी कागज-कलम की संगत से मोह न छूटा. डायरी के रूप में न सही बल्कि अन्य रूपों में मनोभावों का लिखना होता रहा. अब फिर मन कर रहा है डायरी लिखने का. कागज़-कलम के साथ अपनी दोस्ती को और आगे ले जाने का साथ ही तकनीकी मित्र ब्लॉग को भी साथ में लेकर सफ़र करने का. डायरी लेखन से या कहें कि मन के भावों को प्रकट कर देने से बहुत शांति मिलती है. दिमागी उथलपुथल को भी बहुत आराम मिलता है. देखा जाये तो खुद में भी एक तरह की शक्ति का आभास होता है. ऐसा शायद इसलिए होता होगा क्योंकि डायरी लेखन ईमानदारी माँगती है और कोई व्यक्ति अपनी पूरी ईमानदारी से अपना सत्य लिख रहा है तो वह अपने को ही मजबूत कर रहा है.


लिखना तो बराबर होता रहा है, इसलिए लेखन का संकोच कतई नहीं है. विचारों की लहरें फिर उछाल मार रही हैं डायरी लेखन के लिए. अपने बचपन के साथी के साथ फिर से यात्रा करने की इच्छा है. उसके साथ फिर अपने दिल की, अपने मन की बातें कहने का, बाँटने का मन है.


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22 अक्टूबर 2020

समोसे के स्वाद के लिए होती शैतानियाँ

शैतानियाँ, शरारतें कहीं से भी सीखनी नहीं पड़ती हैं. कोई सिखाता भी नहीं है. यह तो बालपन की स्वाभाविक प्रकृति होती है जो किसी भी बच्चे की नैसर्गिक सक्रियता के बीच उभरती रहती है. स्कूल में हम कुछ मित्रों की बड़ी पक्की, जिसे दांतकाटी रोटी कह सकते हैं, दोस्ती थी. कक्षा में एकसाथ बैठना. भोजनावकाश के समय एकसाथ बैठकर भोजन करना. आपस में मिल-बाँटकर भोजन करना. इस मंडली में एक मित्र मनोज के पिताजी घरेलू सामानों की एक दुकान थी. लगभग रोज शाम को मनोज का दुकान पर जाना होता था. जैसा कि बालसुलभ स्थितियों में होता है, उसके पिता लाड़-प्यार में यह कहते हुए कि शाम को दुकान के मालिक तुम हो, कुछ पैसे उसे दे दिया करते थे. हम मित्र भी दस-पाँच पैसे लेकर आया करते थे. आज की पीढ़ी को ये आश्चर्य लगेगा जिसको हजारों रुपये में जेबखर्च मिलता हो कि उस समय हम लोगों को पांच-दस पैसे कभी-कभी मिलते थे. ये आज आश्चर्य भले हो मगर उस समय किसी अमीर से कम स्थिति नहीं होती थी हम दोस्तों की. ऐसा रोज तो नहीं होता था पर जिस दिन ऐसा संयोग बनता था कि ठीक-ठाक मुद्रा जेब में आ गई तो सुबह की प्रार्थना के समय ही योजना बनाकर कक्षा में सबसे पीछे बैठा जाता था.

 

कक्षा में पीछे बैठने के अपने ही विशेष कारण हुआ करते थे. असल में स्कूल परिसर में या उसके आसपास किसी बाहरी व्यक्ति को किसी तरह का खाने-पीने का सामान बेचे जाने की अनुमति नहीं थी. स्कूल समय में किसी बच्चे को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी ताकि स्कूल का कोई विद्यार्थी बाहर का कोई सामान न खा लें. इसको सख्ती से पालन करवाने के लिए भोजनावकाश के समय किसी न किसी शिक्षक की मुस्तैदी स्कूल के मुख्य गेट पर दिखाई देने लगती थी. ऐसे में हम दोस्त अपने खुरापाती दिमाग की मदद से कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग भागने के लिए किया करते थे. यह खुराफात भी स्कूल चलने के समय हुआ करती थी. उस समय कक्षाएँ चलने के कारण मुख्य गेट पर शिक्षकों की चौकस निगाहों में कुछ न कुछ ढील सी बनी रहती थी. इसके पीछे उनकी सोच ये हुआ करती थी कि बच्चे कक्षाएँ चलने के दौरान बाहर नहीं निकलेंगे और हम लोग किसी दिन इसी ढील का लाभ उठा लिया करते थे.

 

स्कूल के एकदम पास में एक छोटा सा होटल हुआ करता था, जिसे सभी अन्नू का होटल के नाम से जानते थे. उसके समोसे बहुत ही स्वादिष्ट होते थे. चूँकि भोजनावकाश में अध्यापकों की मुस्तैदी के कारण उन समोसों का स्वाद लिया जा संभव नहीं हो सकता था. ऐसे में कक्षा में सबसे पीछे बैठना समोसों तक पहुँच बनाने में सहायक हो जाता था. हम दोस्त आपस में पैसे इकट्ठे करके एक दोस्त को जिम्मेवारी देते समोसे लाने की. ज्यादातर इसके लिए रॉबिन्स को ही चुना जाता. वह कभी पानी पीने की, कभी बाथरूम जाने की अनुमति लेकर अन्नू के होटल तक अपनी पहुँच बनाता. और कभी-कभी बिना अनुमति के कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग किया जाता था. स्कूल का मुख्य द्वार लोहे की अनेक रॉड से मिलकर बना हुआ था, जिसमें से थोड़े से प्रयास के बाद हम बच्चे लोग आसानी से निकल जाया करते थे.

 

अन्नू के होटल तक झटपट जाने और फटाफट वापस आने की कला में माहिर रॉबिन्स अपनी नेकर की दोनों जेबों में कुछ समोसे भर कर कक्षा में दिखाई देने लगता. कक्षा में सबसे पीछे बैठी पूरी मित्र-मंडली अगले ही पल स्वादिष्ट समोसों का स्वाद ले रही होती थी. कक्षा में सबसे पीछे बैठने का मूल कारण स्कूल के मुख्य द्वार पर नजर रखना और फिर अपनी रणनीति में कामयाब होने के तत्काल बाद कक्षा में ही समोसे का स्वाद लेना रहता था. आज जब कभी रॉबिन्स के मिलने पर स्कूल की घटनाएँ, स्कूल के दोस्तों की चर्चा होती है तो वह बिना कहे नहीं चूकता है कि तुम लोगों ने हमें खूब दौड़ाया, हमारी जेबों में खूब तेल लगवाया. रॉबिन्स को इस कारण भी ये घटना और भी अच्छे से याद है क्योंकि आये दिन घर में उसकी इसी बात पर कुटाई हो जाया करती थी कि नेकर की जेबें तेल से गन्दी कैसे हो जाती हैं.


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21 अक्टूबर 2020

मुँह में चाँदी की चम्मच का सवाल

इधर बहुत लम्बे समय से विचार बन रहा था कि अपने ब्लॉग पर राजनीतिक, सामाजिक विवादों वाली पोस्ट नहीं लिखेंगे. इस ब्लॉग पर अब अपने जीवन की घटनाओं को, संस्मरणों को लिखेंगे. सामाजिक, राजनैतिक विषयों से सम्बंधित विवादित पोस्टों को लिखने का, उन पर विमर्श करने का कोई अर्थ समझ नहीं आ रहा है. इधर लोग अपने बनाये खाँचों में रहने के आदी होते जा रहे हैं. वे जो कह-कर रहे हैं, वही सही है, शेष गलत है. इस मानसिकता के चलते आपसी विद्वेष बढ़ने के और कुछ नहीं हो रहा है. दो-तीन दिन से अपने संस्मरण लिखने का विचार कर रहे थे मगर कुछ समझ नहीं आ रहा था. आज अचानक अपनी ही एक पुरानी पोस्ट नजर आ गई. उसी को फिर से आप सबके बीच कुछ संशोधनों के साथ लगा रहे हैं.


चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना बचपन में इस वाक्य को जब भी पढ़ते, सुनते थे तो सोचा करते थे कि एक बच्चा कैसे इतनी बड़ी चम्मच लेकर पैदा होता होगा? हालांकि उस समय तो बच्चों के पैदा होने की प्रक्रिया ही हम लोगों की समझ से परे थी, कोई आज के बच्चे तो थे नहीं कि सब कुछ टी0वी0 पर, इंटरनेट पर दिखता हो। धीरे-धीरे अक्ल आई और उक्त वाक्य का सही अर्थ समझा। उस छुटपन में भी पिताजी के साथ, कभी अपने बाबाजी के साथ साइकिल पर बैठ कर स्कूल जाते हुए शहर में शान बघारतीं एक दो मोटरगाड़ियों को देखकर, कुछेक स्कूटरों को फरफराते देखकर लालच सा आता।




उन्हीं दिनों एक बड़ी ही रोचक घटना हुई जिसको लेकर आज तक परिवार में सभी हँसी-मजाक कर लेते हैं। हमारे मकान मालिक बहुत बुजुर्ग थे और उनके कोई सन्तान भी नहीं थी। सम्पन्नता के साथ-साथ उनको कंजूसी भी काफी सम्पन्नता में प्राप्त हुई थी। उनके पास उस समय एम्बेसडर कार थी, पूरे मुहल्ले में इकलौती कार। वह कार हम बच्चों के लिए बड़ी ही कौतूहल की वस्तु थी। अपने दोस्तों के साथ स्कूल में इसी बात पर रोब झाड़ लिया करते थे कि हमारे वकील बाबा के पास कार है। (उन मकान मालिक को जो कि एडवोकेट थे, बुजुर्ग होने के कारण हम बच्चे बाबा कहते थे) पता नहीं अपनी वृद्धावस्था के कारण, कंजूसी के कारण या फिर किसी पर भी विश्वास न करने के कारण जब उनको लगने लगा कि अब कार चलाना उनकी अवस्था के अनुरूप नहीं रहा तो उन्होंने उस कार को बेच दिया। बाबा अपनी कार स्वयं ही चलाते थे कभी कोई ड्राइवर नहीं रखा। कार बेच कर एक साइकिल खरीद ली।


इस घटना की घर में, मुहल्ले में बड़ी ही चर्चा हुई कि चचा को कंजूसी बहुत चढ़ी है, वृद्ध हो रहे हैं ऐसे में साइकिल चलायेंगे। अरे! एक ड्राइवर ही रख लेते, पैसे की कौन सी कमी है आदि-आदि बातें हम बच्चों के कानों में पड़ती ही रहतीं। हम छोटी बुद्धि के बालक कुछ समझ में तो आता नहीं था कि आखिर ये चक्कर क्या है? समझ कुछ आता नहीं बस ये ख़राब लगता कि अब कार में घूमने को नहीं मिलेगा।


धन, सपत्ति, पद, प्रतिष्ठा से इतर एक दिन हमने अपनी अम्मा से कहा जैसे वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है क्या वैसे पिताजी अपनी साइकिल बेचकर कार नहीं खरीद सकते? अम्मा हँस दीं और प्यार से सिर पर हाथ फेरकर बोलीं अब तुम ही कार खरीदना और हम दोनों को घुमाना।


हम तो भौचक्के से रह गये थे कि जो सवाल हमने पूछा अम्मा ने उसका उत्तर तो दिया नहीं हमारे सिर पर एक काम और बता दिया। अम्मा की बात हमारे दिमाग में घूमती रही, आज भी घूमती है। पिताजी तो हमें छोड़कर चले गए, उनको कार से घुमाने का सपना हमारे लिए एक सपना ही रह गया। हालाँकि हम आज भी कार न ले सके। ऐसी स्थिति जो हमने बचपन में देखी थी और आज समाज में देखते हैं तो बचपन में सुने-पढ़े उस वाक्य का अर्थ समझ आता है। आज कुछ लोगों को देखने पर पता चलता है कि चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना किसे कहा जाता है। एक तरफ युवा वर्ग है जो अपनी बेकारी से, घर-परिवार के भरण-पोषण की समस्या से जूझ रहा है और एक तरफ वो युवा वर्ग है जो अपने मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर घूम रहा है, अपने बाप-दादा की, अपनी पुश्तैनी संपत्ति पर सिर्फ ऐश कर रहा है। एक तरफ ऐसे युवा हैं जो अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए किसी का वरदहस्त चाहते हैं और दूसरी ओर ऐसा युवा वर्ग है जिसकी चाटुकारिता में बड़े-बड़े अपने को धन्य समझ रहा है। देश के सर्वोच्च पद के लिए एक युवा का नाम उसकी काबिलियत के कारण नहीं मुँह में दबी चाँदी की चम्मच के कारण ही तो आ रहा है।


ऐसे में खुद से ही एक सवाल करते हैं और खामोश रह जाते हैं कि क्या देश का हर बच्चा चाँदी की चम्मच मुँह में दबाकर पैदा नहीं हो सकता है?


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11 अक्टूबर 2020

तीन रुपए की उधारी ने रोका रिश्ते का रास्ता

फिल्मों के सीक्वेल बनने के दौर में बर्थडे का सीक्वेल बनाया जाना वर्ल्ड रिकॉर्ड हो सकता है. इसके लिए सारिका को और धर्मेन्द्र को ही श्रेय दिया जाना चाहिए. आपको आश्चर्य लग रहा होगा न? लगना भी चाहिए आखिर अवसर भी ऐसा है. अमिता दीदी के स्नेहिल सान्निध्य में सारिका की बर्थडे के अवसर पर धर्मेन्द्र द्वारा सप्रेम प्रदान किया गया गिफ्ट सभी के लिए सरप्राइज बना हुआ था. इस सरप्राइज को दूर करने के लिए ही बर्थडे का सीक्वेल बनाया गया.



अब पार्टी के नाम पर जो-जो होना था वो तो हुआ ही. लज़ीज़
, सुस्वादु व्यंजन की तस्वीरें भोजनात्मक हिंसा को रोकने की दृष्टि से सार्वजनिक नहीं की जा रही हैं. बस अदरख वाली मजेदार चाय की चुस्की, वो भी कुल्ल्हड़ की सोंधी महक और स्वाद के संग, वाली तस्वीरें ही सार्वजनिक करने के अधिकार दिए गए हैं. इस चुस्की के बीच तीन रुपये की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ना, चुहलबाजी करते हुए मित्र की ससुराल में देर रात अपने बेधड़क अंदाज़ से ग्रामवासियों में अनजाना सा भय भर आना, मित्र के सम्बन्धी संग षड्यंत्रकारी विवाह के अवसर को पैदा करवाने की असफल कोशिशों के साथ न जाने कितनी-कितनी कहानियों ने ड्राइंग रूम को ठहाकों से भर दिया.




सीक्वेल को सफल बनाने में मिलनसार
, हँसमुख विवेक जी अपने जोशीले-फुर्तीले अंदाज में उसका निर्देशन करने से नहीं चूके. मुन्नू भाईसाहब और चच्चू की जुगलबंदी सदैव की तरह माहौल को जीवंत बनाती रही. राकेश द्विवेदी जी और सत्येन्द्र पस्तोर जी उसमें अपना तड़का लगाकर वहाँ की फिजाओं में बिखरती कहानियों के क्रम को और विस्तार देते रहे. शेष लोग तो फोटो में दिख ही रहे हैं, जो नहीं दिख रहे वे इस सीक्वेल में अपनी-अपनी भूमिका निभा कर निकल लिए. इसमें अपने दायित्व बोध का ईमानदारी से निर्वहन करने वाले शिवेश भाईसाहब के साथ अंकुर शुक्ला का नाम लिया जा सकता है. धर्मेन्द्र भी अपनी भूमिका को निभाते हुए गायब हो गए. उनसे अगली पार्टी में आपसे मुलाक़ात करवाई जाएगी क्योंकि अभी तो पार्टी शुरू हुई है.


अब आज की सबसे अधिक पसंद की गई कहानियों में तीन रुपए की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ पाने की कुछ चर्चा. हम सबके बीच के, सबके चहेते भाईसाहब की युवावस्था के दिन थे. उरई के प्रसिद्द व्यंजन का स्वाद उनको किशोरावस्था में लग गया था. यह व्यंजन ऐसा है जिसका आनंद बहुतायत नागरिक उठा रहे हैं और बहुत से ऐसे हैं जो दीवारों, सड़कों, कपड़ों आदि को लाल भी करने की कलाकारी दिखाते रहते हैं.


फिलहाल, आगे की मूल चर्चा. उनकी उम्र हो गई थी विवाह योग्य सो एक परिवार खोजबीन करते हुए उनके घर तक पहुँचा. अब पता नहीं उनका सम्बन्ध वहाँ नहीं होना था अथवा हम लोगों को एक मजेदार संस्मरण प्राप्त होना था सो लड़की वालों की मुलाकात सीधे उन्हीं भाईसाहब से हो गई. घर में कोई और बड़ा न होने के कारण बातचीत का अगला क्रम चलता उसके पहले ही तीन रुपये की उधारी का धमाका हो गया.


मेहमाननवाजी के क्रम में पानी वगैरह के साथ बात आगे बढ़ने से पहले ही उरई के प्रसिद्द व्यंजन को खाने की इच्छा व्यक्त की गई. उनके खुद के और उनके अभिन्न मित्र के पास न तो वह व्यंजन पुड़िया निकली और न ही उसे मँगवाने के लिए समुचित धन निकला. समुचित धन से तात्पर्य आप लोग हजार-लाख रुपयों से न लगा लीजिएगा. व्यंजनविहीन और धनविहीन जेबों को देखने के बाद घर आये हुए सम्बन्धियों ने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाल कर व्यंजन मँगवाने की आतुरता दिखाई.


बस, अब आप समझे समुचित धन. ये उस दौर की बात चल रही है जबकि व्यंजन-पुड़िया चवन्नी-अठन्नी के भाव मिला करती थी. भावी दूल्हा बनने का ख्वाब आँखों में लगभग सजा चुके भाईसाहब ने अपने किसी चेले लला को रुतबे सहित आवाज़ दी. लला प्रकट हुए तो मेहमानों की जेब से निकले पाँच रुपये भाईसाहब के हाथों से गुजरते हुए लला की हथेलियों तक पहुँच गए. भावी दूल्हे ने लला को आदेश सुनाया, दुकान पर जाकर दो रुपइया के मौनी गुटका ले अइयो और तीन रुपइया उधार हैं बे चुका दइयो.


समझ सकते होंगे आप, मेहमान के पाँच रुपयों से ही उनके लिए व्यंजन-पुड़िया (अब तो आप समझ ही गए होंगे इसे, ये है गुटखा) मँगवाना और अपने तीन रुपए उधार चुका देना संबंधों को आगे न ले जा सका. हमें तो लगता है कि बेचारे लड़की वाले यहाँ चूक कर गए. उन भाईसाहब ने जिस अधिकार से पाँच रुपयों से खातिरदारी और अपनी उधारी को निपटा दिया, वैसा अधिकार जताने वाला लड़का मिलना गौरव की बात होती उन लड़की वालों के लिए. बहरहाल, वे लोग इस गौरव से वंचित रह गए और हम लोगों को एक रोचक संस्मरण के साथ ठहाके लगाने का मौका अवश्य दे गए.


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26 दिसंबर 2019

इस नहीं दिखे सूर्यग्रहण से उस दिखे सूर्यग्रहण तक

आज 26 दिसम्बर को वर्ष 2019 का अंतिम सूर्यग्रहण हुआ. जबसे इस बारे में जानकारी हुई, उसी समय से कैमरा, मोबाइल,चश्मे आदि दुरुस्त करके रख लिए थे. सीधे-सीधे सूर्यग्रहण देखने की मनाही थी, इस बारे में समझाया भी जा रहा था मगर मन में था कि कम से कम कैमरे के द्वारा उस पल को कैद अवश्य कर लेंगे. इधर कुछ दिनों से पड़ती जबरदस्त ठण्ड और शीत लहर की परवाह किये बिना सुबह से सूर्यग्रहण से परिचित होने के लिए तैयार बैठे थे. कैमरा, मोबाइल, लेंस, चश्मा आदि भी हमारा साथ देने को तैयार थे. छत पर चढ़े तो बस मौसम ही साथ देने के मूड में नहीं था. जैसी की सम्भावना व्यक्त की गई थी कि इस तरफ पूर्ण सूर्यग्रहण जैसा कुछ नहीं दिखेगा मगर मन में था कि कुछ न कुछ तो अवश्य ही दिखेगा. इस कुछ न कुछ दिखने की जगह कुछ भी न दिखने वाली स्थिति सामने आ गई. सूर्यग्रहण तो अलग रहा सूर्य ही नहीं दिखाई दे रहा था. आसमान को बादलों ने, हलके-फुलके कोहरे ने इस तरह अपने आगोश में ले रखा था कि कहीं से भी सूर्य की एक झलक भी दिखाई नहीं दे रही थी. कहीं से भी सूर्य की रौशनी का कोई एक अंश भी नहीं दिखाई दे रहा था न ही उसका आभास हो रहा था. 

26-12-2019 के आसमान में खेलते पक्षी 

छत पर अपने कैमरा लटकाए मौसम की कलाकारियाँ, चिड़ियों की चहल-पहल को कैद करने लगे और इसके साथ ही याद आने लगा वर्ष 1995 का अक्टूबर माह में पड़ा खग्रास सूर्यग्रहण. दीपावली या शायद उसके बाद का दिन था. उरई में चाचा-चाची लोग भी मौजूद थे. सभी भाई-बहिन भी धमाचौकड़ी के साथ उपस्थित थे. हम सभी बच्चों को बड़ों की तरफ से ख़ास हिदायत दे रखी गई थी कि कोई भी छत पर नहीं जायेगा. कोई भी सूर्यग्रहण नहीं देखेगा. आँखों के नुकसान, रौशनी चले जाने जैसी स्थितियों से डराया भी जा रहा था. इन सब धमकियों, डरावने माहौल के बीच हमने अपने मित्र अश्विनी से एक दिन पहले ही पूरी योजना बना रखी थी.


सूर्यग्रहण वाला दिन आया. सुबह-सुबह की गुलाबी सी ठंडक मौसम को ठंडा बनाये ही थी, हम अपनी योजना के क्रियान्वित करने की राह देख रहे थे. सभी लोग टीवी के सामने जमे बैठे थे. हम बच्चे भी टीवी पर सूर्यग्रहण की तमाम स्थितियों को गौर से देखने का मन बनाये बैठ चुके थे. इधर हमारा मन टीवी के बजाय छत की तरफ लगा हुआ था. घर में हमारे सबसे बड़े होने के चलते सारे छोटे भाई-बहिन हमारे कदम की प्रतीक्षा करने में लगे थे. खबरों से इतनी जानकारी थी कि खग्रास सूर्यग्रहण होना है, किसी डायमंड रिंग जैसी स्थिति भी बननी है. हम किसी भी कीमत पर इस स्थिति को देखने से नहीं चूकना चाहते थे. अपने मित्र के साथ बनाई योजना में तमाम सारे काले चश्मे इकठ्ठा कर लिए गए थे. एक्स-रे प्लेट की कई-कई परतों वाले अनेक चश्मे (सभी बच्चों और बड़ों के हिसाब से) तैयार करके पहले से रख लिए थे. हमें अंदाजा था कि एक बार भले ही डांट पड़ जाये मगर अपनी आँखों से साक्षात् पूर्ण सूर्यग्रहण देखने का मोह कोई न छोड़ सकेगा.

कुछ ऐसी बनी थी उस दिन भी डायमंड रिंग

उधर टीवी में जैसे ही सूर्यग्रहण आरम्भ होने की स्थिति बनती दिखी, हमने सभी भाई-बहिनों को इशारा किया और अपने दोस्त के साथ चुपचाप छत पर सरक गए. आँखों में स्व-निर्मित चश्मे चढ़ा कर उस स्थिति को देखा तो आश्चर्य में डूब गए. सुबह की चमक एकदम से गायब हो गई. आसमान में कुछ तारे भी चमकने लगे. घरों के आसपास और घरों में घोंसले बनाये पंछी अचानक अँधेरा होने से अजीब सी चहचहाहट के साथ उड़ान भरने लगे. हम बच्चे शोरगुल के साथ सूर्यग्रहण का आनन्द ले रहे थे. हमने सभी को पहले से ही सचेत कर दिया था कि कोई भी दो-चार सेकेण्ड से ज्यादा एक बार में सूरज की तरफ नहीं देखेगा. हम सबका शोर सुनकर घर के सभी बड़े लोग भी छत पर आ गए. आसपास के घरों से भी कुछ लोग छत पर आकर सूर्यग्रहण का नजारा देखने लगे. डायमंड रिंग का बनना अपने आपमें अद्भुत था. चंद मिनट के इस अलौकिक नज़ारे को देखने के बाद जैसा कि सोचा था हलकी सी डांट हमारी ही पड़ी मगर सबने बाद में हमारे कदम के लिए यह भी माना कि इसी के चलते यह दृश्य बजे टीवी के साक्षात् देखने को मिला.

1995 के बाद से तमाम बार सूर्यग्रहण देखने का अवसर मिला पर उस दिन जैसा दृश्य देखने को नहीं मिला. उस समय आज की तरह हर हाथ में मोबाइल कैमरे भी नहीं हुआ करते थे सो उस समय की खुद की खींची कोई फोटो भी नहीं है मगर वो दृश्य आज भी ज्यों का त्यों दिल-दिमाग में बना है. आज यही सोचा था कि जैसा भी दृश्य होगा बिटिया रानी को दिखाया जायेगा मगर आसमान के बादलों ने ऐसा न होने दिया. अगली बार सही, हाँ, इस न दिखे सूर्यग्रहण ने उस दिखाई दिए सूर्यग्रहण तक अवश्य पहुँचा दिया.




18 मई 2019

बलवंत भैया कोठी का भूत


उस रात राकेश भाईसाहब के हाथ की टॉर्च एकदम से बंद हो गई. पता नहीं ये टॉर्च की गलती थी या फिर भाईसाहब की घबराहट. भाईसाहब तो पहले से ही वहाँ जाने से घबरा रहे थे. वैसे डराया तो हम सभी को गया था, किसी न किसी रूप में मगर जैसे एक सनक थी वहाँ जाने की. और वहाँ पहुँचकर कुछ देर बाद जब अन्दर से पत्थरों की बारिश होने लगी तो लगा कहीं किसी गिरोह का कारनामा तो नहीं ये? फिर उसी समय सामने से आदमकद सफ़ेद छवि का सामने आना और वापस गायब हो जाना होने लगा. इससे घबराहट अकेले राकेश भाईसाहब पर हावी न हुई, घबराहट तो कहीं न कहीं हम सबमें ही थी, बस उसका अनुपात सभी में अलग-अलग रहा था. घबराहट या डर इसका नहीं था कि सामने सफ़ेद आदमकद स्वरूप दिखाई दे रहा था, थोड़ा बहुत भय इसका था कि अन्दर से होती पत्थरबाजी कहीं हम लोगों में से किसी को चोटिल न कर दे. इसके अलावा नवीन और हमारी आकुलता कि सामने वाले पर हमला बोल दो, जो होगा देखा जायेगा. हम दोनों के दोनों हाथों में ही गुप्ती और हॉकी थी. सामने लहराती हुए सफ़ेद आदमकद छवि पर हमला करने को लेकर असमंजस इसलिए भी बना हुआ था कि कहीं हम लोगों में से ही कोई साथी न हो. इस बात का भरोसा ज्यादा था कि कोई साथी ही है क्योंकि अन्दर से आते पत्थर हम लोगों पर न बरसने के बजाय आसपास गिरने में लगे थे.


इस पत्थरबाजी और उस कथित भूत के दिखने-छिपने के बीच हम लोगों ने अपनी चाय भी पी और साथ लाये गए परांठे भी खाए. चूँकि हम लोग आटा, पानी, तवा, घी आदि सहित अन्य सामानों का बोझ अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे इस कारण परांठे तो हॉस्टल में बना लिए गए, उसके बाद तय हुआ कि चाय कोठी पर ही बनाई जाएगी. ये आसान था, बस साथ में स्टोव ले जाना था, दूध और चाय-शकर. बर्तन के रूप में भगौना और गिलास. देर रात अक्षय भाईसाहब, राकेश भाईसाहब, नवीन और हम अपने हॉस्टल के पीछे स्थित पहाड़ी पर बनी बलवंत भैया की कोठी की चल दिए. हम चारों लोगों के साथ-साथ अतुल भाईसाहब का रोज शाम का नियम था बलवंत भैया की कोठी पर जाने का. एक शाम तय किया कि यहाँ आकर चाय पी जाये किसी रात में. जिस रात का निर्धारण किया गया, उसी शाम अपनी नियमित सैर के दौरान पहाड़िया पर जाकर जगह वगैरह देख ली गई, साँप-बिच्छू आदि से बचाव के साधन अपना लिए गए, जगह को पहले से साफ़ करके चिन्हित कर दिया गया ताकि देर रात पहचानने में समस्या न हो. 

रात को पहुँच भी गए अपने तय स्थान पर. स्टोव जलाकर चाय का बनाना शुरू हुआ. चाय बनी, फिर गिलासों में निकाल कर उसका और परांठों का आनंद लिया जाने लगा. उसी समय बलवंत भैया की कोठी के अन्दर से पत्थरों का बरसना शुरू हुआ. इक्का-दुक्का पत्थरों के गिरने तक तो हम लोग आपस में बतियाते हुए चाय-परांठों का स्वाद लेते रहे मगर जब पत्थरों के गिरने की रफ़्तार और संख्या बढ़ गई तो आशंका उठी. आशंका इसकी कि कहीं कोठी के अन्दर कोई गैंग तो नहीं जो हम लोगों के यहाँ होने से अपने को असुरक्षित महसूस करने लगा हो और उसने ये पत्थरबाजी शुरू कर दी हो. इस संशय के बीच अचानक से कोठी के भीतर से एक सफ़ेद छवि सामने आई और कुछ सेकेण्ड के बाद गायब हो गई. गायब क्या हुई होगी, कोठी के पीछे चली गई होगी. इसी दौरान टॉर्च बंद हुई और हम लोगों के हमलावर होने को अक्षय भाईसाहब ने रोका. उसी दौरान वह सफ़ेद छवि फिर प्रकट हुई. इस बार हम लोगों ने उस पर पत्थरों से हमला बोल दिया. इसके बाद वो छवि स्थायी रूप से गायब हो गई.

उसके कुछ देर बाद हम लोग बलवंत भैया की कोठी के आसपास टहल कर, अपनी ही तरह की जासूसी सी करके हॉस्टल वापस लौट आये. उस रात हम लोगों के लौटने पर हमारे कुछ साथी बड़े मूड में दिखे, जिससे एहसास हो गया था कि कोई और नहीं ये सारी शरारत हॉस्टल के ही भाइयों की रही. हालाँकि व्यक्तिगत हमसे कभी किसी ने सीधे तौर पर नहीं बताया मगर उस सफ़ेद छवि के पीछे पप्पू भाईसाहब का होना हम सबके विश्वास में रहा. फिलहाल, उस रात का अपना ही एक अलग रोमांच आज तक गुदगुदा जाता है.

05 जनवरी 2019

बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं


मुलाकात जब पहली बार हुई तो न फिल्मों की तरह पहली नजर वाला आकर्षण उभरा, न पहली नजर के प्रेम जैसा कुछ एहसास हुआ. कुछ दिनों की कुछ मुलाकातें जो हँसी-मजाक के साथ ख़तम हो गईं. हम दोनों की अपनी-अपनी राहें थीं, अध्ययन वालीं, सो आगे चल दिए. पढ़ने को, एक ठो डिग्री लेने को. पर वो कहते हैं न कि दुनिया गोल है, किसी न किसी दिन फिर मिलते हैं. हम दोनों फिर मिले, अबकी कुछ साल बाद मिले.


पहली बार की मुलाकात के समय के मुकाबले अबकी मुलाकात में हम दोनों कुछ परिपक्व भी थे. इस परिपक्वता में भी पहली नजर के आकर्षण जैसा कुछ न हुआ, न इधर, न उधर. इसके बाद मुलाकातें हुई, कई बार हुईं, नियमित न सही मगर जल्दी-जल्दी हुईं. वैचारिकता के अपने-अपने धरातल निर्मित हो चुके थे. सोचने-समझने की मानसिकता भी विकसित हो चुकी थी. क्या सही है, क्या गलत है की दृष्टि विकसित हो चुकी थी. ऐसे में महज आकर्षण जैसा कुछ नहीं होना था. यदि होना होता तो पहली बार की मुलाकात में हुआ होता. पहली बार मिलने पर न हुआ तो कई साल जब दोबारा मिले, तब ऐसा होना था मगर नहीं हुआ. 

ऐसा भी नहीं कि सौन्दर्य बोध का अभाव रहा हो. आँखों में चुम्बकीय आकर्षण, चेहरे पर प्राकृतिक मुस्कान, सादगी का प्रतिरूप होने के बाद भी पहली नजर के आकर्षण से बचने का कारण शायद ये रहा हो कि उसे कभी भी देह के मापदंडों पर नहीं आँका. बहरहाल, समय गुजरता रहा, मुलाकातें चलती रहीं मगर ख़ामोशी उसी तरह बनी रही.

उस ख़ामोशी के साए में कुछ स्वर गूँजे... कुछ कहने का प्रयास हुआ...

उस दिन उससे पहली बार मिलना तो हो नहीं रहा था. पहले भी कई-कई बार मुलाकात हो चुकी थी, ये बात और है कि पहली मुलाकात में एक आकर्षण सा महसूस हुआ था. उस पहली मुलाकात के कई वर्षों बाद जब उससे मिलना हुआ तो ठीक वही एहसास हुआ जो पहली मुलाकात के समय हुआ था. मिलना-जुलना नियमित तो नहीं किन्तु होता रहा. आपस में बातचीत, हँसी-मजाक, छेड़छाड़, गपशप किन्तु उस शाम का मिलने ने दिल को झंकृत कर दिया. समझ नहीं आ रहा था कि ये प्यार है या फिर जब पहली बार मुलाकात हुई थी, वो प्यार था?

बेधड़क किसी से भी कुछ भी कह देने की सामर्थ्य कहीं चुकती सी लगने लगी. बहती नदी के धारे संग-संग भावनाएं बन रही थीं, दोस्त की बाँह थामे हिम्मत बटोरने की कोशिश की जा रही थी. अंततः बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं और कभी उसका कहा सत्य साबित हुआ कि आँसू सँभाल कर रखिये, किसी दिन हमारे लिए भी बहाने पड़ेंगे.



28 सितंबर 2017

छाता लगाकर बस में यात्रा

रोडवेज बस से कालपी अपने चाचा-चाची के पास जाना हो रहा था. बरसात का मौसम था. तब पानी भी आज के जैसे छिटपुट नहीं बल्कि खूब जमकर बरसता था. इधर बस ने उरई छोड़ा ही है कि बादलों ने अपनी छटा बिखेरी. खूब झमाझम पानी. बस की खिड़कियाँ बंद कर दी गईं.

तेज बारिश के चलते कुछ बूँदें अन्दर घुस आने में सफल हो जा रही थीं. उनके चलते अपनी तरह का ही आनंद आ रहा था. तभी ये आनंद ऊपर से आता मालूम हुआ. ऊपर देखा तो बस की छत से एक-दो बूँद पानी टपक रहा है.

कुछ देर तक तो टपकती बूंदों में बड़ा अच्छा लगा मगर कुछ देर में उनके गिरने की गति बढ़ गई. हम और हमारा छोटा भाई, उस समय चार-पांच साल वाली अवस्था में होंगे, उन टपकती बूंदों से भीगने लगे तो हमको वहाँ से उठाकर दूसरी सीट पर बिठा दिया गया. कुछ देर में वहां से भी पानी गिरने लगा.

बाहर पानी लगातार तेज होता जा रहा था. बस की जंग लगी छत में पानी का भरना बराबर हो रहा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि जगह-जगह से पानी बुरी तरह से अन्दर टपकने लगा. कुछ लोग जो इस मौसम की मार को समझते थे वे अपने साथ छाता लेकर चल रहे थे. आनन-फानन उन दो-चार लोगों ने अपने-अपने छाते खोल कर बस के बच्चों को भीगने से बचाया.

आज भी खूब तेज बारिश होने पर या फिर बारिश के समय होने वाली यात्रा में वो छाता लगाकर की गई बस-यात्रा जरूर याद आ जाती है. 


30 मार्च 2017

पहली हवाई-यात्रा से पहुँचे पोर्ट ब्लेयर : अंडमान-निकोबार यात्रा

कोई काम पहली बार किया जा रहा हो तो उसमें उत्साह, उमंग, रोमांच जैसी अनुभूति होती है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ हो रहा था. पहली बार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की यात्रा और पहली बार ही हवाई-यात्रा करने का अवसर हाथ आने वाला था. टिकट की बुकिंग से लेकर उसकी अन्य औपचारिकताओं के बारे में समुचित जानकारी इकठ्ठा कर मारी थी. कई वर्षों की हाँ-ना के बाद अंडमान-निकोबार जाने का कार्यक्रम बन पाया था, सो उसमें कोई अड़ंगा नहीं चाह रहे थे, किसी भी तरह का. इधर कुछ वर्षों से हमारी यात्राओं के साथ एक अजीब सा संयोग जुड़ता रहा है. कहीं भी जाने का कार्यक्रम बनाया तो उसमें किसी न किसी तरह का व्यवधान आ गया. दो बार जम्मू-कश्मीर का प्रोग्राम बनाया तो वहाँ बाढ़ के चलते नहीं जा पाए. नेपाल जाने का फ़ाइनल हो गया था तो वहाँ भूकंप ने तबाही मचा दी. इसी तरह एक साल अपनी छोटी बहिन दिव्या के पास जाने को बड़ोदा के लिए ट्रेन में बैठ भी गए तो बीच रास्ते उतरना पड़ा, वहाँ चालू हो गए हार्दिक पटेल के उत्पात के कारण. हाल ही में पहली बार अंडमान-निकोबार की यात्रा जब प्लान कर रहे थे तो उस समय भी अड़ंगा लगने जैसा माहौल बन गया था. समाचारों से पता चला कि हैवलॉक में तूफ़ान आने से बहुत सारे लोग वहाँ फँस गए हैं. तब उस कार्यक्रम को आगे बढ़ाना पड़ा. इस बार यात्रा फ़ाइनल हो गई थी. चुनावी मौसम होने के कारण बसों का चलना लगभग बंद सा था, सो झाँसी से ट्रेन पकड़ने की सुविधा के लिए कार बुक कर ली थी. इस यात्रा के लिए आरंभिक अड़ंगे रात में ही लगते दिखे, जब सोते समय अचानक गर्दन की नस खिंच गई और उसका हिलना-डुलना बंद सा हो गया. लगभग एक घंटे की मालिश, कसरत, मशक्कत के बाद गर्दन नार्मल हुई. दूसरा अड़ंगा लगता सुबह समझ आया जबकि कार ड्राईवर ने फोन पर बताया कि उसकी कार चुनाव ड्यूटी के लिए पुलिस प्रशासन ने पकड़ ली है. कोई घंटे भर बाद उसी ने अपने परिचित की निजी कार की व्यवस्था करवाई और हम लोग झाँसी के लिए निकल सके.


पहली हवाई-यात्रा का रोमांच तो हम तीनों लोगों को महसूस हो रहा था क्योंकि हम तीनों (हमारी, पत्नी निशा और बेटी परी) की ये पहली हवाई-यात्रा थी. सामान का वजन, सारे आवश्यक कागजात, पहचान-पत्र आदि सँभालकर झाँसी से दिल्ली पहुँचे. घर वालों के लिए देर रात दिल्ली उतरना चिंता का कारण बना हुआ था. इस कारण नॉएडा में रह रही छोटी बहिन रिमझिम और लखनऊ में रह रहा छोटा भाई हर्षेन्द्र फोन से लगातार संपर्क में रहे. रिमझिम ट्रेन यात्रा से ही उबेर कैब बुक करने, फिर टैक्सी से एअरपोर्ट रूट, टैक्सी किराये आदि की जानकारी देती रही. दिल्ली में कैब सम्बन्धी आरंभिक अड़ंगे से निपटते हुए देर रात लगभग दो बजे एअरपोर्ट पहुँच गए. फ्लाइट सुबह सवा सात बजे थी जिस कारण एअरपोर्ट पर सुरक्षा, चेक-इन, बोर्डिंग पास आदि औपचारिकतायें सुबह पाँच बजे के आसपास से शुरू हो जानी थी. जरा से आराम के चक्कर में सोते रह जाने के अनजान डर के कारण होटल में रुकने के बजाय एअरपोर्ट पर रुकना ज्यादा सही लगा. वहाँ पहुँचकर लाउन्ज में पड़ी तमाम कुर्सियों में से अपनी मनपसंद जगह छाँटकर उन्हीं पर पसर लिए.


सोना तो हुआ नहीं पर आराम जैसा कुछ हो गया था. बिटिया रानी भी नई जगह के उत्साह में कभी इधर-उधर टहलने लगती, कभी लेट जाती. समय होते ही हम लोग आवश्यक औपचारिकताओं को निपटाने में लग गए. सुरक्षा जाँच के समय कृत्रिम पैर के चलते अधिकारी ने हमें अलग रूम में ले जाकर जाँच की अनुमति अपने अधिकारी से माँगी. कृत्रिम पैर को अलग स्कैन मशीन से जाँचने के बाद संतुष्ट अधिकारी ने अन्दर जाने की अनुमति दे दी. उसी अधिकारी से जब हमने फोटोग्राफी करने सम्बन्धी जानकारी चाही तो उसने हँसते हुए जवाब दिया कि आप हमारी सुरक्षा व्यवस्था को छोड़कर कहीं भी फोटोग्राफी कर सकते हैं. गेट नंबर 49 से टाटा विस्तारा की फ्लाइट हम लोगों को पकड़नी थी. वहाँ बने मार्गदर्शक चिन्हों के सहारे आगे बढ़ते चले. उस समय आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता और गर्वानुभूति हुई जब अन्दर सूर्य नमस्कार मुद्राओं को दर्शाता स्मारक दिखाई दिया. सुबह की पहली किरण फूट कर बाहर उजियारा करने वाली थी और अन्दर हम लोग सूर्य नमस्कार मुद्राओं के साथ फोटोग्राफी करते हुए आलोकित हो रहे थे. गेट तक पहुँचने के लिए जगह-जगह मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म बने हुए थे, जिन पर बिटियारानी उछल-कूद करते हुए, मस्ती करती चली जा रही थी. 



निश्चित समय पर संकेत होते ही हम लोग प्लेन में सवार हुए. क्रू मेम्बर्स के द्वारा स्वागत, समय-समय पर आवश्यक खाद्य-पदार्थों का वितरण, फ्लाइट सम्बन्धी अन्य जानकारियों का दिया जाना आदि सबकुछ व्यवस्थित, नियंत्रित सा संचालित हो रहा था. खिड़की के बाहर बादलों का रुई के फाहों की तरह कभी साथ-साथ उड़ना, कभी प्लेन के नीचे आ जाना, कभी एकदम साफ़ आसमान अद्भुत अनुभव का एहसास करा रहा था. दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर को चली फ्लाइट को कोलकाता में थोड़ी देर रुकना था. प्लेन के उतरने के पूर्व कोलकाता की बड़ी-बड़ी ऊंची इमारतों का खिलौनों के जैसे दिखना, सड़कों, नदी आदि का किसी मानचित्र सा दिखाई देना आँखों को लुभा रहा था. कोलकाता एअरपोर्ट का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर है. वहाँ लगे बड़े से बोर्ड पर चमकते वास्तविक नेता का नाम देखकर मन ही मन नेताजी को नमन किया. लगभग चालीस मिनट रुकने के बाद हम लोगों को लेकर प्लेन दोबारा उड़ चला. 







पोर्ट ब्लेयर उतरने के लगभग बीस-पच्चीस मिनट पहले क्रू मेम्बर्स की तरफ से ख़राब मौसम होने के संकेत देते हुए सीट बेल्ट बाँधने के निर्देश दिए गए. सामान्य स्थिति में बना हुआ प्लेन हलके-हलके से हिचकोले खाता हुआ समझ आया. उस समय प्लेन घनघोर बादलों के बीच से गुजर रहा था. आसमान में उड़ते बादलों को खिड़की के एकदम करीब महसूस करना अद्भुत था. अंडमान-निकोबार की सीमा में घुसते ही खिड़की से टापुओं की हरियाली, समुद्र का नीला-हरा रंग आँखों को आकर्षित कर रहा था. धीरे-धीरे प्लेन ने उतरना शुरू किया. बस्ती नजर आ रही थी. पोर्ट ब्लेयर की नैसर्गिक सुन्दरता अपना बखान खुद कर रही थी. लगभग साढ़े बारह बजे दोपहर में जब पोर्ट ब्लेयर में कदम रखा तो सबसे पहले उस वीर पुरुष को नमन किया जिसके नाम से पोर्ट ब्लेयर के एअरपोर्ट का नामकरण किया गया है; जिसके नाम से सेलुलर जेल के अंग्रेज अधिकारी तक भयभीत रहते थे; जिसको भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में दो बार काला पानी की सजा सुनाई गई थी. जी हाँ, वीर सावरकर (विनायक दामोदरदास सावरकर) को प्रणाम करते हुए हम लोग एअरपोर्ट के बाहर जाने वाले गेट पर आ पहुँचे.




 छोटा भाई नीरज, बिटिया आशी के साथ प्रसन्नचित्त मुद्रा में पहले से ही मौजूद था. एअरपोर्ट पर मोबाइल ऑन करते ही सबसे पहले उसके वहाँ आ जाने सम्बन्धी कॉल मिल गई थी. छह घंटे प्लेन की (दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर), लगभग छह घंटे ट्रेन की (झाँसी से दिल्ली), दो घंटे कार की (उरई से झाँसी) की यात्रा के साथ-साथ लगभग ढाई घंटे झाँसी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार का समय और लगभग साढ़े पाँच घंटे दिल्ली एअरपोर्ट पर रुकने का समय आदि मिलाकर लगभग बाईस घंटे की यात्रा के बाद घर पहुँचकर सुकून मिला. बहू नेहा के हाथ की बनी चाय की चुस्की संग सबके हालचाल का आदान-प्रदान करते हुए, बतियाते हुए अंडमान-निकोबार आने का वर्षों से लटका कार्यक्रम पूरा हुआ. आप लोगों को लग रहा होगा कि इतने लम्बे सफ़र के बाद भी थकान जैसी कोई बात हमने नहीं की. अरे, इतने लम्बे सफ़र की थकान को तो बिटियारानी आशी ने अपनी मीठी-मीठी, रोचक बातों से कार में ही दूर कर दिया था. 

13 सितंबर 2016

रुला जाता है बुढ़वा मंगल

उस दिन बुढ़वा मंगल था. स्थानीय अवकाश होने के कारण विद्यालय, कार्यालय, कचहरी आदि में छुट्टी थी. पिताजी भी घर पर ही थे. छोटा भाई हर्षेन्द्र अपने कुछ मित्रों के साथ उरई के पास बने संकट मोचन मंदिर गया हुआ था. हम भी अपनी छुट्टी के चलते ग्वालियर नहीं गए थे. मंदिर वगैरह जाने का, बुढ़वा मंगल को होने वाला दंगल देखने का ऐसा कोई विशेष शौक न तो हमारा था और न ही हमारे मित्रों का. ऐसे में दोपहर को घर में ही आराम से पड़े थे. बात सन 1991 की है, तब हाथ में न तो मोबाइल होता था, न मेज पर कंप्यूटर और न ही इंटरनेट जैसा कुछ. सो किताबों से अपनी दोस्ती को सहज रूप से आगे बढ़ा रहे थे.

तभी किसी ने दरवाजे को बहुत जोर-जोर से पीटना शुरू किया. साथ में वो व्यक्ति पिताजी का नाम लेता जा रहा था. दरवाजा पीटने की स्थिति से लग रहा था कि उसे बहुत जल्दी है. हम शायद जोर से चिल्ला बैठते मगर उसके द्वारा पिताजी का नाम बार-बार, चिल्ला-चिल्ला कर लेते जाने से लगा कि कोई ऐसा है जो उम्र में पिताजी से बड़ा है. जल्दी से उठकर दरवाजा खोला तो सामने गाँव के द्वारिका ददा हैरान-परेशान से खड़े थे. इतनी देर में अन्दर से पिताजी भी बाहर आ गए. “चाचा की तबियत बहुत ख़राब है.” ददा के मुँह से इतना ही निकला.

“कहाँ हैं?” के सवाल पर उनके हाथ का इशारा पास के डॉक्टर देवेन्द्र के क्लीनिक की तरफ गया. हमने बिना कुछ आगे सुने, उस तरफ पूरी ताकत से दौड़ लगा दी. बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बने उनके क्लीनिक के सामने एक जीप खड़ी थी और गाँव के कुछ लोग. हमने जल्दी से जीप के पीछे वाले हिस्से में चढ़कर देखा, बाबा चादर ओढ़े लेते हुए थे.

“बाबा, बाबा” हमारी आवाज पर कोई हरकत नहीं हुई. तब तक पिताजी, अम्मा भी आ गए. डॉक्टर देवेन्द्र ने जीप में अन्दर जाकर बाबा को देखा और नकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया.

“डॉक्टर साहब, ऐसा नहीं हो सकता, जरा फिर से देख लीजिये.” अम्मा जी का रोआंसा सा स्वर उभरा. पिताजी, हमारी और गाँव के बाकी लोगों की आँखों में पानी भर आया. डॉक्टर साहब ने दोबारा जाकर जाँच की और जीप से उतर कर फिर वही जवाब दिया.

एक झटके में लगा जैसे समूचा परिवार ख़तम हो गया. अइया गाँव में ही थीं. रोने-बिलखने के बीच बाबा की पार्थिव देह को गाँव ले जाने की ही सलाह पिताजी को दी गई. मोहल्ले के कुछ लोगों को खबर दी गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये. तब दूरसंचार सुविधा भी आज के जैसी अत्याधुनिक नहीं थी. तीनों चाचा लोग दूर थे, उनको कैसे खबर दी जाए, पिताजी इस सोच में थे. टेलीफोन से, तार से, जाकर जैसे भी हो उनको खबर दी जाए, इसकी जिम्मेवारी मोहल्ले के लोगों ने ले ली.

17 सितम्बर 1991, दिन मंगलवार, बुढ़वा मंगलवार, हम लोग उसी जीप में बैठकर बाबा की देह को लेकर गाँव चल दिए. वे बाबा जो उसी सुबह तक लगभग 75-76 वर्ष की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ, तंदरुस्त, सक्रिय थे और अचानक हम सबको छोड़कर चले गए. काम करने के दौरान सुबह दीवार से सिर टकरा जाने, गाँव के नजदीक के कस्बे माधौगढ़ में प्राथमिक उपचार के बाद उरई लाया गया. जहाँ वे बिना किसी तरह की सेवा करवाए इस निस्सार संसार में हम सबको अकेला कर गए.


जमींदार परिवार का होने के बाद भी बाबा जी ने अपने समय में बहुत कठिनाइयों का सामना किया. पढ़ाई के समय भी संघर्ष किया. आज़ादी की लड़ाई में खुलकर भाग भले न लिया हो पर आन्दोलनों में भागीदारी की. एकबार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र बनने का मौका आया तो ये कहकर मना कर दिया कि ऐसा कोई काम उन्होंने नहीं किया कि उन्हें सेनानी कहा जाये. बाबा जी से बहुत कुछ सीखने को मिला. मेहनत, आत्मविश्वास, कर्मठता, निर्भयता, जोश, जीवटता, सकारात्मक सोच आदि-आदि गुणों का जो क्षणांश भी हममें मिलता है वो उनकी ही देन है. आज 25 वर्ष हो गए उनको हमसे दूर हुए मगर ऐसा लगता है जैसे वो बुरा वक्त कल की ही बात हो. बुढ़वा मंगल हर बार रुला जाता है. 

16 मार्च 2016

बहते आँसुओं के बीच

शाम को पिताजी के अभिन्न मित्र, हमारे पारिवारिक सदस्य ‘दादा’ का आना हुआ, साथ में दो-चार और लोग भी. आते ही पिताजी की तबियत के बारे में जानकारी की. उनके जानकारी करने ने जैसे उन सभी संदेहों को मिटा दिया जो सुबह से दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए थे. आँसू भरी आँखों और भरे गले से इतना ही पूछ पाए, पिताजी को क्या हुआ? दादा ने जो स्नेहिल हाथ हमारे सिर पर फिराया वो आज तक बरक़रार है. बिना किसी के कुछ कहे सब स्पष्ट हो गया, मतलब दोपहर बाद से जो दिलासा दी जा रही थी वो सब सिर्फ तसल्ली देने के लिए थी. वो डरावनी शाम कैसे आँसुओं भरी रात में बदली आज भी समझ नहीं आया. लोगों का आना-जाना, समझाना और हमारा पूरा ध्यान अपनी जिम्मेवारियों पर, अपनी अम्मा पर, अपने दोनों छोटे भाईयों पर, जो पिताजी के पास पहुँचने को सुबह ही निकल चुके थे. अम्मा ने कैसे अपने को संभाला होगा? दोनों भाइयों ने कैसे समूची स्थिति का सामना किया होगा? कैसे पिताजी को इस रूप में देखा होगा?

कठोर हकीकत को स्वीकारते हुए सामाजिक निर्वहन में लग गए. बहते आँसुओं के बीच डायल किये जाते नंबर, मोबाइल से बातचीत, हिचकियों के बीच किसी अपने के न रहने की दुखद खबर का दिया जाना चलता रहा. अब इंतजार था पिताजी के आने का, पिताजी के आने का कहाँ, पिताजी के पार्थिव शव के आने का. क्या हुआ होगा? कैसे हुआ होगा? कितनी परेशानी हुई होगी? क्या परेशानी हुई होगी? यहाँ से तो अच्छे भले गए थे, फिर अचानक हुआ क्या? सवाल अपने आपसे बहुत से थे और जवाब किसी का भी नहीं था. किससे पूछते? क्या पूछते? चाचा लोग, अम्मा, भाई लोग सभी उसी मनोदशा में होंगे, जिसमें हम थे. सवालों की इस भँवर में गिरते-पड़ते हम, हमारी पत्नी आँसुओं के सैलाब में बीते दिनों को याद करते रहे. पारिवारिक, सामाजिक मान्यताओं के साथ-साथ पिताजी के अनुशासन के चलते उनसे कम से कम बातचीत, काम की बातचीत के चलते उस रात एहसास हुआ कि अपने ही पिताजी से कभी खुलकर बात न कर पाए. आज भी बात कचोटती है पिताजी से बहुत बातचीत न हो पाने की. एक वो समय था और एक आज के बाप-बेटे हैं, लगता है जैसे दो मित्र हैं अलग-अलग आयुवर्ग के. क्या सही है, क्या गलत पता नहीं.. क्योंकि सही अपना समय भी नहीं लगता आज और आज का समय भी हमें नहीं सुहाया आजतक.

बहरहाल, अब एक दशक से ज्यादा हो गया पिताजी को गए. अब बस आसपास के आयोजन, आसपास की हलचल, घर-परिवार की क्रियाविधि, क्रियाकलाप देखकर इतना ही कह पाते हैं कि पिताजी होते तो ऐसा होता, ऐसा न होता. बहुत कुछ अधूरा रह गया था, उनके द्वारा देखना, उनके द्वारा पूरा करना. कोशिश तो बराबर रही कि हम पूरा कर सकें, बड़े होने के नाते सभी छोटों को उनकी कमी न महसूस होने दें मगर पिता तो पिता ही होता है, कोई भी उसकी जगह नहीं ले सकता. हम भी नहीं ले सके हैं, नहीं ले सकेंगे क्योंकि हमारे पिताजी वाकई हमारे पूरे परिवार की धुरी थे, आज भी होंगे, यही सोचकर उनके सोचे हुए काम पूरे करने की कोशिश में हैं. अब इसमें कितना सफल होंगे, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, परिवार के बाकी लोग बताएँगे.


बहते आँसुओं के साथ पल-पल उनको याद करते हुए. बस याद ही करते हुए, यादों में ही बसाये हुए उनके बताये-बनाये रास्तों पर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. 

21 नवंबर 2015

कूड़े का ढेर, भूख और केले के छिलके

इंसान की जिन्दगी में बहुत सी स्थितियाँ ऐसी होतीं हैं जब वह एकदम असहाय होता है और इस तरह की स्थितियों से बाहर आने के लिए वह कुछ भी कर बैठता है। ऐसी विषम स्थिति किसी भी व्यक्ति के जीवन में कई बार भूख के कारण भी आती है। वैसे भी कहा गया है कि पेट जो न कराये वह कम है। भूख में आदमी को दम तोड़ते भी सुना है, किसी भी स्थिति तक गिरते देखा है, चोरी करते सुना है, अपना जिस्म बेचते भी सुना है। बड़े से बड़े कई व्यक्तित्वों के बारे में उनकी इस दशा में संघर्ष करते गुजरने के बारे पढ़ा-सुना है। भूख और गरीबी की विकट स्थिति में लड़ने-जूझने की, जिन्दा रहने की मारामारी में उठाये गये अनेकानेक कदमों के बारे में प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी के बारे में पढ़ रखा है। उनके भूख मिटाने के बारे में पढ़ा है कि अपने मुंबई के आरंभिक प्रवास के दौरान वे किसी न किसी बहाने से पुलिस की पकड़ में आने की कोशिश करते थे और इस तरह वे अपने आवास और भूख का प्रबंध कर लेते थे। बहुत बार ऐसा होने की दशा में वे कूड़े के ढेर से अपना भोजन तलाशते पाए गए, ऐसा भी पढ़ा है। ऐसी स्थितियों में न केवल वे गुजरे हैं वरन आज भी कई-कई बच्चों, युवाओं को ऐसी विषम परिस्थिति से गुजरते देखा जाता है।
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कुछ इसी तरह की दशा से हमें रूबरू होने का कुअवसर उस समय मिला जब हम अपनी स्नातक की पढ़ाई के लिए सन् 1990 में ग्वालियर गये। हमारा रहना हॉस्टल में होता था और ग्वालियर में ही हमारे एक चाचाजी के रहने के कारण उनके घर भी आना-जाना होता था। हॉस्टल के जीवन ने बहुत कुछ सिखाया, बहुत कुछ सीखने को मजबूर भी किया। कुछ इसी तरह का एक हादसा उस समय हमारे साथ गुजरा जबकि हम अपने नियमित चरण में चाचा जी के घर जा रहे थे। चूंकि उरई जैसे छोटे से शहर से निकल कर ग्वालियर जैसे शहर में आने पर कुछ अलग तरह का उल्लास रहता था, कुछ अलग सा एहसास आसपास उमड़ता-घुमड़ता था। ऐसे में वहाँ के ऐतिहासिक नज़ारे देखने का, वहाँ की सड़कों पर घूमने का अपना अलग ही मजा आता था। इसी आनंद के वशीभूत हम हॉस्टल से चाचा के घर हमेशा रास्ते बदल-बदल कर जाया करते थे। एक दिन अपनी यात्रा के दौरान हमने रेलवे स्टेशन की ओर से जाने का फैसला किया। रेलवे स्टेशन के पास के ओवरब्रिज से चढ़ते हुए रेलवे स्टेशन का नजारा और सामने खड़े किले का दृश्य बहुत ही मजेदार लगता था, अपने आपमें अद्भुत सौन्दर्य प्रदर्शित करता था।
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उस दिन जैसे ही ओवरब्रिज पर चढ़ने के लिए अपनी साइकिल को मोड़ा तो उसी मोड़ पर लगे कूड़े के ढ़ेर में एक बारह-तेरह साल का लड़का बैठा दिखा। ऐसे दृश्य अमूमन हमेशा ही किसी न किसी कूड़े के ढ़ेर पर दिखाई देते थे कि छोटे-छोटे लड़के-लड़कियाँ कुछ न कुछ बीनते नजर आते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही लगा किन्तु ऐसा नहीं था। वह लड़का बजाय कूड़ा-करकट बीनने के कुछ और ही करता नजर आया। एक पल को झटका सा लगा, वह लड़का कूड़े के ढेर में पड़े केले के छिलकों को खा रहा था। दिमाग को झटका दिया और अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाने के लिए पैडल पर जोर लगाया। मुश्किल से तीन या चार कदम ही साइकिल चल पाई होगी कि मन में उथल-पुथल मचने लगी। ब्रेक लगाये और वहीं खड़े हो गये अब न तो समझ में आये कि आगे बढ़ें या फिर इस लड़के के लिए कुछ करें। मन में उठे विचारों के साथ-साथ वास्तविकता जेब की स्थिति पर भी विचार कर रही थी। महीने के सीमित जेबखर्च में अपने निश्चित खर्चों के बीच और कुछ सोच पाना संभव भी नहीं हो पाता था। फिर भी मन ही मन में कुछ विचार करके अगले ही पल साइकिल को घुमा कर उस लड़के के पास खड़ा कर दिया। ‘क्यों क्या कर रहे हो? की आवाज सुनकर उस लड़के के हाथ से केले का छिलका छूट गया, उसको लगा कि कहीं यह भी अपराध न कर रहा हो। उसके मुँह से कोई आवाज ‘कुछ नहीं’ निकली, बस वह चुपचाप खड़ा हो गया।
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उसकी हालत और केले के छिलके के प्रति अपनत्व भाव से ये तो समझ आ गया कि वो लड़का काफी भूखा है। उसको जब इसका एहसास कराया कि वो कुछ अपराध नहीं कर रहा था, हम उसके साथ कुछ बुरा नहीं करने जा रहे हैं तो उस लड़के ने अपने बारे में, अपनी भूख के बारे में स्पष्ट किया। खाना खाने के लिए उससे पूछा तो उसने सिर हाँ की स्थिति में हिला दिया। उसको अपने साथ लेकर स्टेशन के बाहर बने होटलों की ओर आ गए। अब समस्या यह आई कि उसको होटल में बिठाकर खिलाने को कोई भी तैयार नहीं हुआ। ऐसे में उस एक होटल की तरफ, जहाँ उस समय सोलह रुपये में एक थाली भोजन की मिलती थी, मुड़े। वहाँ भी वही स्थिति सामने आई, होटल वाले ने उस बच्चे को होटल के अन्दर आकर खाना खाने से मना कर दिया और थाली बाहर देने को मना कर दिया। इधर-उधर निगाह दौड़ा कर कुछ समाचार-पत्र और कुछ पॉलीथीन इकट्ठा किये, हॉस्टल का, छात्रों का, महाविद्यालय का भय उसको दिखाया और उस भूखे बच्चे के लिए भोजन प्राप्त किया।

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तब से लेकर आज तक बहुत सी अच्छी बुरी घटनाओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से देखा-सुना है किन्तु आज भी वह घटना दिमाग से निकाले नहीं निकलती है। तब से लेकर आज तक एक नियम सा बना लिया है कि कभी भी माँगने वालों को, स्टेशन पर, ट्रेन में भीख माँगने वाले को, कूड़ा बीनने वाले बच्चों को कुछ रुपये देने की बजाय उनको खाना खिला देते हैं। इधर दो-तीन दिन से कुछ इसी तरह की घटनाएँ हमारे आसपास घटित होती दिख रही हैं। जिससे फिर ये दशकों पुरानी घटना याद आ गई, जो आपके सामने है। 

23 मई 2014

कभी हसरत थी आसमां छूने की, अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की - 800वीं पोस्ट




ये पोस्ट हमारे ब्लॉग की आठ सौवीं पोस्ट है, कुछ अलग हट के लिखने की सोच रहे थे और कई-कई मुद्दों पर दिमाग जाने के बाद भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखा जाये. क्या-क्या और किस-किस पर नहीं लिखा इतनी सारी पोस्ट में. मई २००८ के आरम्भ में शुरू किये अपने इस ब्लॉग के द्वारा विभिन्न मुद्दों पर लिखा, बहुत से लोगों का स्नेह मिला, बहुत से लोगों का कोप भी सहा; कुछ लोग जुड़ते चले गए, कुछ लोग जुड़-जुड़ कर भी दूर होते गए. ऐसे में लगा कि कुछ अपनी इस यात्रा के बारे में ही लिखा, बताया जाए. इसमें भी मन नहीं भरा क्योंकि इस बारे में पहले भी लिख चुके हैं. फिर लगा कि इस पोस्ट में विशुद्ध अपने बारे में ही कुछ लिखा जाये क्योंकि अपने ऊपर ही कुछ नहीं लिखा अभी तक. (दूसरा तो कोई वैसे ही हम पर लिखने से रहा)  इधर बहुत समय से खुद पर लिखने के लिए कुछ सोचा भी जा रहा है, वो भी आत्मकथा के रूप में.
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जिंदगी के चार दशक कम नहीं होते हैं अपने बारे में कुछ लिखने के लिए और यही सोचकर आत्मकथा लिखना शुरू भी कर दिया है. हाँ, आत्मकथा लिखना है तो नाम भी रखना पड़ेगा, सो ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी’ नाम भी सोच लिया है. कुछ मित्रों को इस नाम पर ‘कुछ झूठी’ शब्द पर आपत्ति हुई, हो सकता है कि उनकी आपत्ति सही हो किन्तु हमारी दृष्टि में आत्मकथा खुद की कहानी लिखने से ज्यादा खुद के द्वारा जीवन के समझने को, लोगों को देखने-परखने को, अपने प्रति लोगों के नजरिये को, अपने साथ गुजरे तमाम पलों के अनुभवों को समेटने-सहेजने का माध्यम मात्र है. इसमें सच तो सच के रूप में है ही किन्तु कुछ ऐसे सच, जिसके सामने आने से दूसरों की सामाजिकता, दूसरों के व्यक्तिगत जीवन, दूसरों की गोपनीयता पर किसी तरह का संकट आता हो; किसी की मर्यादा, किसी का सम्मान, किसी के आदर्शों को ठेस पहुँचती हो, को कुछ कल्पनाशीलता का आवरण ओढ़ा कर पेश किया जायेगा. हमारे लिए यही ‘कुछ झूठी’ साथ रहेगा किन्तु सत्य के साथ.
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दरअसल हमने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सहा है. बहुत कुछ अनुभव इस तरह के हैं जिन्होंने समय से पूर्व हमें बड़ा बना दिया. सुख की बारिश को देखा है तो दुखों की तपती धूप भी सही है; गैरों का साथ पाया है तो अपनों को बेगाने होते भी देखा है; समाज के कठोर धरातल पर खुद को खड़ा किया है तो ठोकर खाकर खुद को संभाला भी है. बनते-बिगड़ते कार्यों से, खट्टे-मीठे अनुभवों से, बचपन-युवावस्था से, घर-बाहर से, दूसरों से-अपने आपसे, सुख-दुःख से बहुत-बहुत कुछ सीखा है. हताशा, निराशा, नकारात्मकता को कभी भी खुद पर हावी नहीं होने दिया है. जीवन को खुशनुमा बनाये रखे का हमने एक मूलमंत्र बना रखा है कि ‘भूतकाल से सीखकर वर्तमान को सुधारो, भविष्य कैसा होगा ये किसी को नहीं पता है.’ और यही कारण है कि हँसना.. खूब खुलकर हँसना हमारी आदत में है; हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाना हमारी फितरत में है (सिगरेट वाला धुआँ नहीं); मौज-मस्ती, यारी-दोस्ती निभाना हमारी दिनचर्या में है; अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीना हमारी जीवनशैली में है; बेधड़क होकर, निडर होकर, बेख़ौफ़ होकर जीना हमारी विरासत में है. और ये उसी स्थिति में संभव है जबकि आपके साथ आपके अपने तो हों ही, गैर भी आपके अपनों जैसे लगते हों और यही हमारी सम्पदा है, हमारी पूँजी है. हमारा पूरा परिवार तो हमारे साथ है ही, हमारे मित्र, हमारे सहयोगी भी हमारे अपने हैं और इस पूँजी के दम पर ही “कभी हसरत थी आसमां छूने की, अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की” को अपना दर्शन बना रखा है.
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इस ब्लॉग की 800वीं पोस्ट