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28 फ़रवरी 2026

08 मार्च 2021

सामाजिक क्षेत्र में भी पाए जाते हैं पिस्सू

अपने जीवन का बहुत लम्बा समय सामाजिक क्षेत्र में व्यतीत करने के कारण बहुत से व्यावहारिक अनुभवों को करीब से देखने का अवसर मिला है. इन अनुभवों में कुछ अनुभव बहुत सुखद रहे तो कुछ अनुभव तो अत्यंत दुखद रहे. सामाजिक क्षेत्र में बहुत से ऐसे लोगों से परिचय हुआ जो निस्वार्थ भाव से काम करने में विश्वास करते हैं. इसके उलट बहुत से ऐसे लोगों से भी सामना हुआ जिनके लिए सामाजिकता का अर्थ महज मंच, माइक और सम्मान प्राप्त कर लेना रहा है. सामाजिक क्षेत्र में समय के गुजरते रहने के साथ-साथ ऐसे अनुभवों का खजाना हमारे पास बढ़ता ही रहा है. यही कारण है कि बहुत बार सामाजिक क्षेत्र में खुद को सामने लाने की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन होता जा रहा है. जोड़-तोड़ करके मंच हासिल करना, सम्मान प्राप्त करना और ऐसा न हो पाने की दशा में कलह मचा देना, आयोजकों के चरित्र तक पर उँगली उठा देना ऐसे लोगों का सामान्य स्वभाव रहा है.


अपनी सामान्य शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यापक असफलता (आखिर जहाँ चाहते थे, वहाँ चयनित न हो सके) के बाद जब सामाजिक क्षेत्र में कदम रखा तो दिमाग में यही ख्याल था कि इस क्षेत्र में लोग सेवा की भावना से आते होंगे. इस क्षेत्र में जो लोग भी सक्रिय हैं वे निस्वार्थ भाव से अपना समय देते होंगे. आरंभिक अनुभव ही इतने कड़वे निकले कि उन्हीं दिनों में सामाजिक सेवा से दूर होने का मन बना लिया था. कार्यक्रम आरम्भ होने के पहले ही हमें तथाकथित सामाजिक लोगों द्वारा निर्देशित किया जाता कि उनको फलां के पहले बोलने को बुलाया जाये. उनको सम्मान दिया जाये तो फलां के पहले. ऐसे लोगों की कोशिश यह भी रहती कि दूसरे को सम्मान मिलने ही न पाए.




बहरहाल समय ने बहुत कुछ सिखाया और बहुत जल्दी अच्छे-बुरे की पहचान करके खुद को ऐसे जंजालों से दूर कर लेते हैं. सामाजिक क्षेत्र में बीस वर्ष से अधिक समय गुजर गया है, इसके बाद भी स्थिति अभी भी वहीं की वहीं दिखाई दे रही है. ऐसे लोग आज भी मंच के लिए, मंच की कुर्सियों पर बैठने के लिए, सम्मान, पुरस्कार जबरिया माँग कर हड़पने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्थानीय स्तर पर नाम होने के बाद भी ऐसे लोग अपने उपद्रवी स्वभाव, जबरन कब्ज़ा करने की मानसिकता के चलते एकाधिक बार बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये मंचासीन होते देखे गए हैं. बहुत बार सम्मान, पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ करते, डराते-धमकाते भी देखे गए हैं. यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं बल्कि स्वयं अनुभव की हुई, स्वयं देखी गई स्थिति है. यह समझ से परे है कि आखिर मंच की तृष्णा क्यों? आखिर हर मंच से सम्मान पाने की लालसा क्यों? आखिर बिना काम किये खुद को प्रतिस्थापित करने की कुंठित मनोभावना क्यों? आखिर सम्मान न मिलने पर, मंचासीन न किये जाने पर आयोजक के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित सोच क्यों?


जहाँ तक हमारा अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र भी किसी वृक्ष की तरह है, जहाँ पुराने पत्तों को डाली से स्थान छोड़ना होगा और नए पत्तों के खिलने को जगह देनी होगी. हमारा अपना अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र किसी परिपक्वता की माँग करता है जहाँ आपको अपनी जगह स्वयं बनानी पड़ती है. अतीत के अपने कुछ कामों, अपने नाम, मीडिया में अपने परिचय, परिवार के रसूख के बल पर आखिर कब तक नए लोगों से प्रतिस्पर्द्धा की जाती रहेगी? मंच पर जगह, लोगों के दिलों में सम्मान स्वतः पैदा होता है. किसी हनक के चलते, अपने उपद्रवी स्वभाव के चलते, कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने की मानसिकता रखने के चलते सिर्फ बदनामी ही पायी जा सकती है. 


संभव है कि ऐसे लोगों के स्वभाव के चलते आयोजक ऐसे लोगों को मंच प्रदान कर दे, माइक दे दे, सम्मान भी प्रदान कर दे मगर ऐसे लोग समाज में, नागरिकों में, प्रशासन में, मीडिया में स्थायी रूप से जगह नहीं बना पाते हैं. क्षणिक प्रतिष्ठा की चाह में, क्षणिक प्रचार की चाह में ऐसे लोग सिर्फ बदनामी ही पाते हैं. बिना किसी श्रम के, बिना किसी उल्लेखनीय कार्य के मंच, माइक, मंचासीन होने, सम्मान पाने की लालसा ऐसे लोगों के कमजोर व्यक्तित्व का ही परिचायक होता है. देखा जाये तो ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तित्व नहीं बल्कि पिस्सू होते हैं जो सामाजिक क्षेत्र में उभरते हुए वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वों का लहू पी रहे होते हैं.



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वंदेमातरम्

16 दिसंबर 2020

सहायता करने की सच्ची मानसिकता का प्रेरणादायी उदाहरण

सुबह लगभग दस बजे का समय है. बाजार में हलचल अभी शुरू होती जा रही है. दुकानें भी आराम-आराम से खुलती दिख रही हैं. ऐसी ही सामान्य सी सुस्त सुबह में सड़क के किनारे एक महिला बेहोशी की हालत में सड़क किनारे गिरी हुई है. वह अकेली नहीं है बल्कि उसके आसपास कई लोगों की भीड़ भी है. भीड़ भले ही ऐसी न हो जिसे बहुत बड़ी भीड़ कहा जाये मगर इतनी अवश्य है जो सड़क किनारे अचेतावस्था में गिरे किसी भी व्यक्ति की मदद कर सकती है. उस सुबह की भीड़ भी इतनी थी जो उस महिला की सहायता कर सकती थी. इसके बाद भी भीड़ बस तमाशा बने उस महिला को देखे जा रही थी. रुकने वाले रुक जाते थे और रुक कर एक नजारा देख चलने वाले फिर अपने रास्ते चल देते थे. उस रुकी भीड़ में कुछ युवा भी थे, कुछ पुरुष भी, कुछ लड़के भी मगर जिस तरह से स्त्री, पुरुष विभेद विगत कुछ वर्षों में समाज में बना दिया गया है, उससे शायद उनकी भी हिम्मत न पड़ रही थी उस महिला की सहायता करने की. इसके अलावा पुलिस, कानून के तमाम चकल्लस देखते हुए भी बहुत से लोग उस सड़क किनारे बेहोश पड़ी महिला से दूरी बनाये रखे होंगे.


उसी समय एक महिला का सड़क के दूसरी तरफ से निकलना हुआ. दूसरी तरफ से इसलिए क्योंकि उस सड़क पर आवागमन के लिए बने डिवाईडर न केवल सड़क को अलग-अलग भागों में बाँट रहे थे बल्कि सड़क पर चलने वालों को भी दो हिस्सों में अलग-अलग किये हुए थे. समाज में सभी एक प्रवृत्ति के नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारे शरीर से जुड़ी सभी उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतीं. इस एक जैसी प्रवृत्ति न होने के कारण अपनी स्कूटी से सड़क के दूसरी तरफ से चली जाने वाली उस महिला ने सड़क के दूसरी तरफ, डिवाइडर के उस पार कुछ असामान्य सा देखा-समझा. उस महिला ने स्कूटी को वापस सड़क किनारे गिरी अचेत महिला के पास लाकर रोका और फिर जैसा कि किसी भी जागरूक, संवेदित व्यक्ति को करना था, उसने अपना काम शुरू किया.


स्कूटी से उतर कर उस महिला ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर अचेत महिला को होश में लाने का उपक्रम शुरू किया. सजग महिला की हिम्मत, उसकी सक्रियता देख आसपास खड़े कुछ युवकों ने भी अपना सहयोग देना शुरू किया. इतनी देर के बाद जब भीड़ का हिस्सा न बन, एक सक्रिय महिला ने अपनी सजगता दिखाई तो उस अचेत महिला की बंद हथेलियों में से एक में कोई फोटो सी दिखाई दी और दूसरी में एक मोबाइल नंबर लिखा नजर आया. या भी सबकुछ भीड़ को नहीं बल्कि उस स्कूटी वाली महिला को नजर आया. उन्होंने अपने मोबाइल से तत्काल उस नंबर पर बात की. वो नंबर उस अचेत महिला के किसी रिश्तेदार का नहीं था. अब भी स्थिति ज्यों की त्यों थी कि वो महिला कौन है? वह सड़क पर अचेत क्यों पड़ी हुई है? उसके हाथ में लिखा नंबर किसका है? उसकी दूसरी हथेली में दबी फोटो किसकी है? वह यहाँ अचेतावस्था में कैसे पहुँची?


इस बीच उस जागरूक महिला के कहने पर किसी व्यक्ति ने एम्बुलेंस को फोन करके बुलाया. तब तक महिला भी कुछ होश में आती नजर आई. एम्बुलेंस आकर उस महिला को जिला चिकित्सालय ले गई. सक्रिय, जागरूक महिला अपने कार्यक्षेत्र को चल दी, भीड़ अपने-अपने विचार-तर्क गढ़ते हुए अपने-अपने रास्ते चल दी. बात यही समाप्त नहीं हुई, जो सजग रहता है, वह सदैव सजग रहता है. अचेत महिला की सहायता को रुकी उस महिला ने लगातार अपने फोन से चिकित्सालय प्रशसान से, पुलिस प्रशासन से संपर्क बनाये रखा. अंततः जब सुखद खबर ये मिली कि वह अचेत महिला, जो किसी संदेहास्पद वस्तु के खा लेने से अचेत हो गई थी, अब स्वस्थ है, खतरे से बाहर है.


यह पूरी घटना जनपद जालौन के उरई शहर की है. इस घटना को यहाँ सामने लाने का उद्देश्य महज इतना है कि उरई जैसे छोटे से शहर में भी जहाँ कि परिचय का दायरा आसानी से बड़ा किया जा सकता है, वहाँ भी सड़क किनारे अचेत पड़ी एक महिला सहायता को तरसती है. उसके चारों तरफ जमा भीड़ सिर्फ तमाशबीन बनी रहती है. इसके पीछे भले ही कानूनी लफड़े की बात हो या स्त्री, पुरुष विभेद की बात मगर स्थिति सुखद नहीं कही जाएगी.


अब आपको मिलवा दें उस महिला से जो अचानक से उस रास्ते से गुजरीं और बिना किसी लफड़े, समस्या की परवाह करते हुए उस अचेत महिला की सहायता में जुट गईं. वे डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी हैं जो वर्तमान में गांधी महाविद्यालय, उरई में मनोविज्ञान विभाग में कार्यरत हैं साथ ही संगीत, समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं. वे जनपद के ही नहीं बल्कि प्रदेश के अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से सम्बद्ध हैं. सामाजिक सक्रियता बनाये रखना, लोगों की मदद करना उनके खून में है, उनके स्वभाव में है. इसी के चलते उन्होंने बिना किसी तरह की देरी किये, बिना अच्छा-बुरा सोचे उस अचेत महिला की सहायता की.




इस घटना को सामने लाने का उद्देश्य यही है कि हममें से बहुत से लोग कानूनी दांव-पेंच, पुलिस प्रशासन के रवैये से डर कर, घबरा कर बहुत बार सहायता देने से बचते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. यदि हम अपने आपमें सशक्त हैं, ईमानदार हैं और निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता कर रहे हैं तो किसी तरह की समस्या नहीं आती है. हम सभी को डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी जी के इस कदम से सीखने की आवश्यकता है, प्रेरणा लेने की आवश्यकता है. इसी तरह से एक-एक करके समाज की नींव बनती है, समाज की आधारशिला मजबूत होती है, समाज की इमारत भव्य बनती है.



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वंदेमातरम्

16 मई 2020

जिसका दिमाग तुम्हारी तरह पैदल हो, उसे चाटो

रोज-रोज वही लॉकडाउन, वही कोरोना, वही मजदूर, वही सरकार, वही संक्रमण, वही संख्या, वही दुकानदार, वही पैकेज की बात कहाँ तक की जाये? दिमाग पंचर कर डाला कुछ लोगों ने. सुबह से शाम तक बस एक ही रोना. जागने से लेकर सोने तक बस एक ही काम कोरोना-कोरोना. ऐसा लग रहा है कि जैसे कोरोना जाप करके ये लोग उसे आमंत्रित कर रहे हैं. व्यवस्था, सुविधा, राशन, भोजन, कैम्प, क्वारंटाइन, आइसोलेशन, आँकड़े आदि के कारण ऐसा लगने लगा जैसे हम लॉकडाउन में घर में नहीं बल्कि किसी ऐसे सर्वर की चपेट में आ गए हैं, जहाँ बस इन्हीं सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा रहा है.


दिमाग का दही कर देने वाले ऐसे लोगों को पिछले दो-तीन दिन से एक विषय मजदूरों का मिल गया. कोई पैदल आ रहा कोई हजारों रुपये देकर. सरकार ट्रेन चलवा रही तो आफत, न चलवाए तो आफत और उस आफत का शिकार हम. दिन में किसी भी समय सोशल मीडिया के दर्शन करने जाओ ऐसा लगता है जैसे एकमात्र हम ही बेवक़ूफ़ हैं, एकमात्र हम ही सूचना-विहीन हैं. दे दनादन हजारों मैसेज एक बार में मोबाइल के बहाने हमारे सिर पर पटक दिए जाते हैं. इन्हीं में से कुछ तो ऐसे होते हैं जो हमें सरकार समझते हैं या फिर सरकार का ऐसा एजेंट, जिसके इशारे पर सरकारें निर्णय लेती हैं. सरकार ने क्या गलत किया, उसे कैसा करना चाहिए था, उसे क्या नहीं करना चाहिए था ये सब हमें बताया-सुनाया जाता है.

अरे, हम तो कहते हैं कि ये महामारी है, आपदा है जिसे किसी ने भी पहली बार देखा है. ऐसी स्थिति में सरकार निर्णयों के बाद का परिणाम सोच भी नहीं पा रही, आकलन भी नहीं कर पा रही. निर्णय लेने के बाद जो होता है, उसी आधार पर आगे की रणनीति बनाई जाती है. एक पल को यहाँ रुक कर यही धुरंधर, जो सरकार को सुझाव दे रहे हैं, अपने घर की किसी ख़ुशी वाली स्थिति पर ही निगाह डाल लें. लड़की-लड़के की शादी की बात ही ले लें. यदि ऐसा कोई कार्यक्रम पहली बार हो रहा होता है तो घर में होने वाले कार्यक्रमों में, विवाह घर में, वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान तक अनेक अवसर ऐसे आते हैं जबकि चूक समझ आती है. कई बार सामान की कमी दिखाई देती है, कभी सामान का भूल जाना याद आता है, कभी किसी निर्णय के दुष्फल सामने आते हैं तो ऐसे में आप क्या करते हैं? मीडिया को बुलाकर चिल्ला-चिल्लाकर उस सम्बंधित व्यक्ति की बुराई करना शुरू कर देते हैं? क्या उस कमी की चर्चा तुरंत सोशल मीडिया पर डालकर सम्बंधित व्यक्ति को दोष देने लगते हैं? ऐसा कुछ नहीं करते आप क्योंकि वो आपके घर का कार्यक्रम होता है.

असल में आप देश को, सरकार को अपना मानते ही नहीं हैं. यही कारण है कि सुबह से लेकर रात तक सिवाय बकवास करने के आप कुछ नहीं करते हैं. देखा जाये तो आप सिर्फ बकवास ही नहीं करते बल्कि लोगों में डर भरते हैं, लोगों में हताशा पैदा करते हैं. सत्य यही है कि आप ऐसे लोगों की मजबूरी का तमाशा बनाते हैं, ऐसे लोगों की मजबूरी का तमाशा बेचते हैं. बेचिए आप इनकी मजबूरी, इनका तमाशा पर हम जैसे लोगों को क्षमा करिए. आप अपना ज्ञान अपने तक रखिए. अपनी जानकारी से खुद को समृद्ध करिए अथवा उसे मोहरा बनाइये जो आपकी तरह नौटंकी करता हुआ दिमाग से पैदल हो चुका है.


आप जैसे लोगों के लिए ही कहा है हमने....

दर्द उनका देख हम भी रोते हैं,
लगा कर दो पैग चैन से सोते हैं.

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नौटंकी संवेदनात्मक #दुनाली

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

17 अप्रैल 2020

मुश्किल वक्त का साथी है अनाज बैंक

लॉकडाउन के कारण दैनिक आजीविका वालों को संकट का सामना करना पड़ रहा है. इनके साथ-साथ वे लोग भी परेशानी में होंगे जिनके पास आजीविका के अल्प-साधन थे. छोटे दुकानदार, छोटे कामगार आदि भी इस समय आर्थिक समस्या से जूझ रहे होंगे. इस विकट समय में बहुत सी जगहों पर बहुत से समाजसेवी सामने निकल कर आये हैं. इनमें से बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता वाकई सामाजिक सद्भाव, संवेदना के साथ काम कर रहे हैं जबकि इन्हीं में से बहुत से ऐसे हैं जो अपनी फोटो खिंचाने में, उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने में ज्यादा विश्वास रखते हैं. सामाजिक क्षेत्र में कार्य का अनुभव रखने वाले, ईमानदारी और जिम्मेवारी के साथ संवेदनशीलता के साथ बहुत से लोग सूचीबद्ध तरीके से राशन का, भोजन का वितरण कर रहे हैं. ऐसे लोगों द्वारा वितरण होने के कारण खाद्य-सामग्री का उचित तरीके से वितरण हो पा रहा है, उसकी बर्बादी नहीं हो रही है. लॉकडाउन के चलते एकाएक समाजसेवा का भाव जागने वाले लोग बिना किसी योजना के काम करने में लगे हैं. जिसके कारण न केवल यथोचित जगह तक वितरण हो पा रहा है बल्कि खाद्य-सामग्री का भी बहुत नुकसान हो रहा है. सोशल मीडिया पर ही अनेकानेक वीडियो, फोटो देखने को मिल रहे हैं जहाँ अनावश्यक भोजन पैकेट एकत्र करके, जमाखोरी करके रखे गए हैं.


इसके बीच इन्हीं नवोन्मेषी समाजसेवियों द्वारा एक समस्या सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करने की भी आ रही है. एक जरूरतमंद को राशन सामग्री, भोजन सामग्री देते हुए हुए कई-कई लोग एकसाथ फोटो खिंचवाते नजर आ रहे हैं. अनेक जगहों से ऐसी भी खबरें समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई हैं जिसमें जरूरतमंद लोगों ने ऐसे लोगों से राहत सामग्री लेने से इंकार कर दिया जो फोटो खींचने, खिंचवाने के प्रति ज्यादा लालायित दिखे. स्थिति यहाँ तक असहनीय या अशोभनीय हुई कि सरकारी स्तर पर ऐसे कार्य को रोकने के लिए दिशा-निर्देश देने पड़े. इसी में यदाकदा चर्चा उठी अनाज बैंक द्वारा मदद करने, फोटो खींचने, सोशल मीडिया पर अपलोड करने की. असल में ऐसी चर्चाएँ उठना स्वाभाविक भी है क्योंकि बहुत से लोग उत्साह में, संवेदना के साथ सामाजिक कार्य करने निकल पड़ते हैं. उत्साह में किया जाने वाले सामाजिक कार्य बहुत लम्बे समय तक नहीं चल पाते, विशेष रूप से वे जिनमें बहुत बड़ा क्षेत्र शामिल हो जाये, बहुत ज्यादा जनसँख्या शामिल हो जाये. ऐसी स्थिति के सुचारू रूप से नियमित सञ्चालन के लिए एक कार्ययोजना, एक टीम की, ईमानदारी की, समर्पण की आवश्यकता होती है. ऐसी चर्चा करने वाले अनाज बैंक को गंभीरता से समझने का काम संभवतः कर नहीं सके हैं.



ऐसा इसलिए क्योंकि जैसे ही लॉकडाउन की घोषणा हुई उसके दो-तीन दिन बाद ही शहर के अनेक लोगों ने फोन से संपर्क करके अनाज बैंक के कदमों को जानना चाहा. उसके द्वारा भोजन, राशन वितरण के बारे में जानना चाहा. स्पष्ट है कि उन सभी लोगों की मंशा मदद करने की रही होगी मगर जिस तरह का माहौल उरई में, जनपद में दिखाई दे रहा था वैसे में उस भागदौड़ का हिस्सा अनाज बैंक नहीं बनना चाहता था. ख़ुशी की बात यह रही कि प्रशासन स्वतः ही बराबर अनाज बैंक के संपर्क में बना रहा. आखिर उसने न केवल उरई का बल्कि मुख्यालय वाराणसी का काम बहुत ही नजदीक से देखा-सुना था. ऐसे में अनाज बैंक ने शहर में चल रही भगदड़ का हिस्सा बनने के बजाय प्रशासन की सुविधा, निर्देशानुसार सहायता उपलब्ध करवाई.

बैंक की औपचारिक कार्यवाही सभी निकासी खाताधारक महिलाओं को करनी होती है 

बहरहाल, अनाज बैंक प्रतिमाह मजबूर, गरीब, विधवा, लाचार महिलाओं को पाँच किलो अनाज उपलब्ध कराता है. खाद्य-सामग्री में उपलब्धता के आधार पर परिवर्तन भी होता रहता है मगर मात्रा कम से कम पाँच किलो ही रहती है. प्रतिमाह होने वाले इस वितरण कार्यक्रम का बाकायदा रिकॉर्ड बनाया जाता है. इसी के अंतर्गत वितरण कार्य की फोटो, वीडियो बनाया जाता है, उन्हें जनमानस के संज्ञान में लाने के लिए इंटरनेट पर अपलोड भी किया जाता है. वर्तमान समय में चल रही मदद और उसकी फोटो लेने तथा अनाज बैंक द्वारा ली जाने वाली फोटो-वीडियो का एक मूलभूत अंतर है. वह यह कि अनाज बैंक से जुड़ी महिलाएँ किसी तरह का दान, मदद नहीं लेती वरन उनका बाकायदा अनाज बैंक में एक खाता खोला जाता है. वे यहाँ की नियमित निकासी खाताधारक होती हैं. उनको बैंक से जोड़ने के पहले भौतिक सत्यापन किया जाता है. उनके पास उपलब्ध किसी भी पहचान-पत्र, किसी भी दस्तावेज की फोटोप्रति अनाज बैंक में जमा करवाई जाती है. प्रतिमाह वितरण में शामिल होने वाली निकासी खाताधारक महिलाओं की संख्या, पहचान निश्चित है. कुछ इसी तरह की प्रक्रिया अनाज बैंक की सहायता करने वालों के साथ अपनाई जाती है. उनका जमा खाता खोला जाता है. वे बैंक के जमा खाताधारक कहलाते हैं. उनके द्वारा किया गया सहयोग किसी भी तरह की दान शब्दावली के अंतर्गत नहीं आता है बल्कि उनके खाते में उनकी जमाराशि होता है. इसे भी अनाज बैंक धनराशि के रूप में नहीं वरन खाद्य-सामग्री के रूप में स्वीकारता है.

प्रत्येक निकासी खाताधारक का होता है रिकॉर्ड

इसके बाद भी यदि आलोचनात्मक दृष्टि से भी इसका विश्लेषण करते हुए मान लें कि निकासी खाताधारक, जमा खाताधारक अनाज बैंक की अपनी शब्दावली है. लोगों के बीच अपनी तुष्टिकरण की नीति के लिए बनाये गए शब्द हैं तो भी एक बात स्पष्ट यह होती है कि अनाज बैंक द्वारा प्रतिमाह किये जाने वाला वितरण का यथोचित रिकॉर्ड होता है. उसके द्वारा महज मदद करने के नाम पर मदद करने का काम नहीं किया जाता है. वर्तमान परिदृश्य में यदि अनाज बैंक से जुड़ी महिलाओं को लाभार्थी माना भी जाये तो नियमानुसार लाभार्थियों की संख्या, पहचान निश्चित होती है. उनका एक रिकॉर्ड होता है. यह एक तरह की वैसी ही सरकारी प्रक्रिया है जो कि सरकार द्वारा अपनी विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों की फोटो वीडियो, रिकॉर्ड, पहचान आदि के सम्बन्ध में पूरी करनी होती है. यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि लॉकडाउन के समय में प्रशासन द्वारा अनाज बैंक की खाताधारक महिलाओं की मदद की गई. उनके लिए उपलब्ध राशन सामग्री को अनाज बैंक द्वारा ही वितरित करवाया गया. अप्रैल माह में हुए इस वितरण को किसी भी रूप में सार्वजनिक नहीं किया गया. अनाज बैंक द्वारा सदैव इसका ध्यान रखा जाता है कि किसी भी महिला के सम्मान को ठेस न पहुँचे. समस्त निकासी खाताधारक महिलाओं को अनाज बैंक पारिवारिक सदस्य के रूप में सम्मान भी देता है. किसी भी पावन पर्व पर उसके साथ परिजनों की भांति ही व्यवहार किया जाता है. फिलहाल, अनाज बैंक मुख्यालय वाराणसी में चौबीस घंटे रसोई का सञ्चालन कर रहा है. उरई स्थिति बुन्देलखण्ड अनाज बैंक लॉकडाउन में भी प्रशासन की मंशा के अनुसार काम कर रहा है. लॉकडाउन के बाद वह अपने मूल रूप में कार्य करता रहेगा. गरीब, मजबूर, बेबस, विधवा महिलाओं की सहायता करता रहेगा.


महिला दिवस के अवसर पर सभी निकासी खाताधारक महिलाओं का सम्मान भी 

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

10 अप्रैल 2020

सामंजस्य के अभाव में बर्बाद होती राहत सामग्री

लॉकडाउन के शुरू होते ही सभी जगह समाजसेवियों की भीड़ सी उमड़ आई है. दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के अलावा सभी कुछ बंद होने के कारण बहुत से लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है. प्रतिदिन काम करने, कमाई करने वालों के सामने निश्चित ही खाने का संकट आया है. ऐसे में जबकि लोगों का बाजार निकलना बंद है, रोजगार के साधन बंद हैं, आय के स्त्रोत बंद हैं तब ऐसे लोगों के सामने निश्चित ही राशन की, भोजन की समस्या उत्पन्न होनी ही थी. ऐसे विषम समय में सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले आगे आये. ऐसे सभी लोग साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने घर में बने रहने से बेहतर बाहर निकल कर लोगों की सेवा, सहायता करना समझा. प्रतिदिन ऐसे लोगों की टोलियाँ शहर की सड़कों पर निकल कर लोगों की सहायता करने में लगी हुई हैं. जरूरतमंदों को राशन उपलब्ध करवा रही हैं. राशन उपलब्ध करवाने का काम प्रशासन द्वारा भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ समाजसेवी भी तन्मयता से इस कार्य में लगे हैं.


महामारी के इस दौर में एक तरफ समाजसेवियों द्वारा सहायता की जा रही है वह सराहनीय है मगर इसके साथ-साथ यह एक तरह की समस्या भी उत्पन्न कर रही है. बहुत से लोग बिना किसी तालमेल के, बिना किसी सामंजस्य के, बिना किसी निर्देशन के काम करने में लगे हुए हैं. इससे सहायता के साथ-साथ यह हो रहा है कि एक-एक परिवार को कई-कई बार सहायता मिल जा रही है और कुछ परिवार ऐसे हैं जहाँ सहायता सामग्री पहुँच ही नहीं पा रही है. इससे सम्बंधित अब तमाम वीडियो और फोटो सामने आने लगी हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि सहायता सामग्री, भोजन सामग्री नालियों में, कूड़े के ढेर पर पड़ी हुई है. कहीं-कहीं सामग्री के बाजार में बेचे जाने की खबरें भी सामने आई हैं. इसके अलावा ऐसे भी परिवार पकड़ में आये हैं जिनके पास पर्याप्त भोजन सामग्री, राशन होने के बाद भी वे सहायता सामग्री लेते जा रहे हैं.

यहाँ देखा जाये तो दोनों पक्ष दोषी नजर आते हैं. एक तरफ सभी को ऐसा लगने लगा है जैसे यदि इस समय सहायता के लिए बाहर न निकले तो उनके समाजसेवी होने पर खतरा आ जायेगा. ऐसा लग रहा है जैसे देश में पहली बार ऐसा संकट आया है जबकि गरीब मुश्किल में है. ऐसा लग रहा है जैसे सभी बस सहायता करने के, भोजन सामग्री देने के ही पक्ष में हैं. इसी तरह जो वर्ग, परिवार मुश्किल में है वह भी अपनी लालसा को, तृष्णा को रोक नहीं पा रहा है. वह एक जगह से सामग्री पाने के बाद भी खुद को दूसरी जगह से राशन लेने के लिए खड़ा कर देता है. ऐसे में सामग्री का आधिक्य होना ही है. जहाँ एक तरफ समाजसेवियों का आपसी समन्वय वितरण व्यवस्था में झोल पैदा कर रहा है वहीं दूसरी तरफ जरूरतमंद सामग्री की अधिकता देखकर भविष्य के लिए जमाखोरी की तरफ बढ़ रहा है.  यह स्थिति किसी के लिए भी सुखद नहीं है. इससे सामग्री बर्बाद हो रही है, लोगों के पास आवश्यकता से अधिक सामग्री पहुँच रही है, सभी जरूरतमंदों के पास सामग्री यथोचित रूप में नहीं पहुँच पा रही है.

ऐसे में भले कह दिया जाये कि यहाँ प्रशसन को ध्यान रखना चाहिए था मगर सोचिये कि प्रशासन कहाँ-कहाँ ध्यान दे? क्या एक शहर के सभी सामाजिक सेवियों की जिम्मेवारी नहीं बनती थी कि वे आपस में समन्वय बनाकर राहत सामग्री का वितरण करते? क्या यह भी उचित कदम नहीं होता कि प्रशासन की मदद करने के लिए सभी लोग एक जगह पर सारी सामग्री का एकत्रण करके उसे सूचीबद्ध करके वितरण करते? क्या ऐसा गलत होता कि जिस व्यक्ति, परिवार के पास एक बार सामग्री पहुँच जाती, उसके पास दोबारा न पहुँचे ऐसी कोई व्यवस्था कर ली जाती, ऐसा चाहे आधार कार्ड के द्वारा होता या राशन कार्ड के द्वारा? फ़िलहाल तो अभी समाजसेवियों की भीड़ सड़कों पर है और बहुत सी राहत सामग्री नालियों, कूड़े के ढेरों पर मिल रही है. अभी भी संभलने की आवश्यकता है.

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