बड़े भाई सोमेन्द्र सिंह 'कुक्कू भैया' की पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर में....
28.02.2026
उरई (जालौन) उ०प्र०
बड़े भाई सोमेन्द्र सिंह 'कुक्कू भैया' की पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर में....
28.02.2026
उरई (जालौन) उ०प्र०
अपने जीवन का बहुत लम्बा समय
सामाजिक क्षेत्र में व्यतीत करने के कारण बहुत से व्यावहारिक अनुभवों को करीब से
देखने का अवसर मिला है. इन अनुभवों में कुछ अनुभव बहुत सुखद रहे तो कुछ अनुभव तो
अत्यंत दुखद रहे. सामाजिक क्षेत्र में बहुत से ऐसे लोगों से परिचय हुआ जो
निस्वार्थ भाव से काम करने में विश्वास करते हैं. इसके उलट बहुत से ऐसे लोगों से
भी सामना हुआ जिनके लिए सामाजिकता का अर्थ महज मंच, माइक और सम्मान प्राप्त कर लेना रहा है. सामाजिक क्षेत्र में
समय के गुजरते रहने के साथ-साथ ऐसे अनुभवों का खजाना हमारे पास बढ़ता ही रहा है.
यही कारण है कि बहुत बार सामाजिक क्षेत्र में खुद को सामने लाने की मानसिकता में
व्यापक परिवर्तन होता जा रहा है. जोड़-तोड़ करके मंच हासिल करना, सम्मान प्राप्त करना और ऐसा न हो पाने की दशा में कलह मचा देना, आयोजकों के चरित्र तक पर उँगली उठा देना ऐसे लोगों का सामान्य स्वभाव रहा
है.
अपनी सामान्य शिक्षा और
प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यापक असफलता (आखिर जहाँ चाहते थे, वहाँ चयनित न हो सके) के बाद जब
सामाजिक क्षेत्र में कदम रखा तो दिमाग में यही ख्याल था कि इस क्षेत्र में लोग सेवा
की भावना से आते होंगे. इस क्षेत्र में जो लोग भी सक्रिय हैं वे निस्वार्थ भाव से
अपना समय देते होंगे. आरंभिक अनुभव ही इतने कड़वे निकले कि उन्हीं दिनों में
सामाजिक सेवा से दूर होने का मन बना लिया था. कार्यक्रम आरम्भ होने के पहले ही
हमें तथाकथित सामाजिक लोगों द्वारा निर्देशित किया जाता कि उनको फलां के पहले
बोलने को बुलाया जाये. उनको सम्मान दिया जाये तो फलां के पहले. ऐसे लोगों की कोशिश
यह भी रहती कि दूसरे को सम्मान मिलने ही न पाए.
बहरहाल समय ने बहुत कुछ सिखाया
और बहुत जल्दी अच्छे-बुरे की पहचान करके खुद को ऐसे जंजालों से दूर कर लेते हैं.
सामाजिक क्षेत्र में बीस वर्ष से अधिक समय गुजर गया है, इसके बाद भी स्थिति अभी भी वहीं की
वहीं दिखाई दे रही है. ऐसे लोग आज भी मंच के लिए, मंच की
कुर्सियों पर बैठने के लिए, सम्मान,
पुरस्कार जबरिया माँग कर हड़पने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्थानीय स्तर पर नाम
होने के बाद भी ऐसे लोग अपने उपद्रवी स्वभाव, जबरन कब्ज़ा
करने की मानसिकता के चलते एकाधिक बार बिना बुलाये, बिना
आमंत्रित किये मंचासीन होते देखे गए हैं. बहुत बार सम्मान,
पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ करते, डराते-धमकाते भी देखे गए हैं.
यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं बल्कि स्वयं अनुभव की हुई, स्वयं
देखी गई स्थिति है. यह समझ से परे है कि आखिर मंच की तृष्णा क्यों? आखिर हर मंच से सम्मान पाने की लालसा क्यों? आखिर
बिना काम किये खुद को प्रतिस्थापित करने की कुंठित मनोभावना क्यों? आखिर सम्मान न मिलने पर, मंचासीन न किये जाने पर
आयोजक के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित सोच क्यों?
जहाँ तक हमारा अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र भी किसी वृक्ष की तरह है, जहाँ पुराने पत्तों को डाली से स्थान छोड़ना होगा और नए पत्तों के खिलने को जगह देनी होगी. हमारा अपना अनुभव है कि सामाजिक क्षेत्र किसी परिपक्वता की माँग करता है जहाँ आपको अपनी जगह स्वयं बनानी पड़ती है. अतीत के अपने कुछ कामों, अपने नाम, मीडिया में अपने परिचय, परिवार के रसूख के बल पर आखिर कब तक नए लोगों से प्रतिस्पर्द्धा की जाती रहेगी? मंच पर जगह, लोगों के दिलों में सम्मान स्वतः पैदा होता है. किसी हनक के चलते, अपने उपद्रवी स्वभाव के चलते, कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने की मानसिकता रखने के चलते सिर्फ बदनामी ही पायी जा सकती है.
संभव है कि
ऐसे लोगों के स्वभाव के चलते आयोजक ऐसे लोगों को मंच प्रदान कर दे, माइक दे दे, सम्मान भी प्रदान कर दे मगर ऐसे लोग
समाज में, नागरिकों में, प्रशासन में, मीडिया में स्थायी रूप से जगह नहीं बना पाते हैं. क्षणिक प्रतिष्ठा की
चाह में, क्षणिक प्रचार की चाह में ऐसे लोग सिर्फ बदनामी ही
पाते हैं. बिना किसी श्रम के, बिना किसी उल्लेखनीय कार्य के मंच, माइक, मंचासीन होने, सम्मान
पाने की लालसा ऐसे लोगों के कमजोर व्यक्तित्व का ही परिचायक होता है. देखा जाये तो
ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तित्व नहीं बल्कि पिस्सू होते हैं जो सामाजिक
क्षेत्र में उभरते हुए वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वों का लहू पी रहे होते हैं.
सुबह लगभग दस बजे का समय है. बाजार में हलचल अभी शुरू होती जा रही है. दुकानें भी आराम-आराम से खुलती दिख रही हैं. ऐसी ही सामान्य सी सुस्त सुबह में सड़क के किनारे एक महिला बेहोशी की हालत में सड़क किनारे गिरी हुई है. वह अकेली नहीं है बल्कि उसके आसपास कई लोगों की भीड़ भी है. भीड़ भले ही ऐसी न हो जिसे बहुत बड़ी भीड़ कहा जाये मगर इतनी अवश्य है जो सड़क किनारे अचेतावस्था में गिरे किसी भी व्यक्ति की मदद कर सकती है. उस सुबह की भीड़ भी इतनी थी जो उस महिला की सहायता कर सकती थी. इसके बाद भी भीड़ बस तमाशा बने उस महिला को देखे जा रही थी. रुकने वाले रुक जाते थे और रुक कर एक नजारा देख चलने वाले फिर अपने रास्ते चल देते थे. उस रुकी भीड़ में कुछ युवा भी थे, कुछ पुरुष भी, कुछ लड़के भी मगर जिस तरह से स्त्री, पुरुष विभेद विगत कुछ वर्षों में समाज में बना दिया गया है, उससे शायद उनकी भी हिम्मत न पड़ रही थी उस महिला की सहायता करने की. इसके अलावा पुलिस, कानून के तमाम चकल्लस देखते हुए भी बहुत से लोग उस सड़क किनारे बेहोश पड़ी महिला से दूरी बनाये रखे होंगे.
उसी समय एक महिला का सड़क के दूसरी तरफ से निकलना हुआ. दूसरी तरफ से इसलिए क्योंकि उस सड़क पर आवागमन के लिए बने डिवाईडर न केवल सड़क को अलग-अलग भागों में बाँट रहे थे बल्कि सड़क पर चलने वालों को भी दो हिस्सों में अलग-अलग किये हुए थे. समाज में सभी एक प्रवृत्ति के नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारे शरीर से जुड़ी सभी उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतीं. इस एक जैसी प्रवृत्ति न होने के कारण अपनी स्कूटी से सड़क के दूसरी तरफ से चली जाने वाली उस महिला ने सड़क के दूसरी तरफ, डिवाइडर के उस पार कुछ असामान्य सा देखा-समझा. उस महिला ने स्कूटी को वापस सड़क किनारे गिरी अचेत महिला के पास लाकर रोका और फिर जैसा कि किसी भी जागरूक, संवेदित व्यक्ति को करना था, उसने अपना काम शुरू किया.
स्कूटी से उतर कर उस महिला ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर अचेत महिला को होश में लाने का उपक्रम शुरू किया. सजग महिला की हिम्मत, उसकी सक्रियता देख आसपास खड़े कुछ युवकों ने भी अपना सहयोग देना शुरू किया. इतनी देर के बाद जब भीड़ का हिस्सा न बन, एक सक्रिय महिला ने अपनी सजगता दिखाई तो उस अचेत महिला की बंद हथेलियों में से एक में कोई फोटो सी दिखाई दी और दूसरी में एक मोबाइल नंबर लिखा नजर आया. या भी सबकुछ भीड़ को नहीं बल्कि उस स्कूटी वाली महिला को नजर आया. उन्होंने अपने मोबाइल से तत्काल उस नंबर पर बात की. वो नंबर उस अचेत महिला के किसी रिश्तेदार का नहीं था. अब भी स्थिति ज्यों की त्यों थी कि वो महिला कौन है? वह सड़क पर अचेत क्यों पड़ी हुई है? उसके हाथ में लिखा नंबर किसका है? उसकी दूसरी हथेली में दबी फोटो किसकी है? वह यहाँ अचेतावस्था में कैसे पहुँची?
इस बीच उस जागरूक महिला के कहने पर किसी व्यक्ति ने एम्बुलेंस को फोन करके बुलाया. तब तक महिला भी कुछ होश में आती नजर आई. एम्बुलेंस आकर उस महिला को जिला चिकित्सालय ले गई. सक्रिय, जागरूक महिला अपने कार्यक्षेत्र को चल दी, भीड़ अपने-अपने विचार-तर्क गढ़ते हुए अपने-अपने रास्ते चल दी. बात यही समाप्त नहीं हुई, जो सजग रहता है, वह सदैव सजग रहता है. अचेत महिला की सहायता को रुकी उस महिला ने लगातार अपने फोन से चिकित्सालय प्रशसान से, पुलिस प्रशासन से संपर्क बनाये रखा. अंततः जब सुखद खबर ये मिली कि वह अचेत महिला, जो किसी संदेहास्पद वस्तु के खा लेने से अचेत हो गई थी, अब स्वस्थ है, खतरे से बाहर है.
यह पूरी घटना जनपद जालौन के उरई शहर की है. इस घटना को यहाँ सामने लाने का उद्देश्य महज इतना है कि उरई जैसे छोटे से शहर में भी जहाँ कि परिचय का दायरा आसानी से बड़ा किया जा सकता है, वहाँ भी सड़क किनारे अचेत पड़ी एक महिला सहायता को तरसती है. उसके चारों तरफ जमा भीड़ सिर्फ तमाशबीन बनी रहती है. इसके पीछे भले ही कानूनी लफड़े की बात हो या स्त्री, पुरुष विभेद की बात मगर स्थिति सुखद नहीं कही जाएगी.
अब आपको मिलवा दें उस महिला से जो अचानक से उस रास्ते से गुजरीं और बिना किसी लफड़े, समस्या की परवाह करते हुए उस अचेत महिला की सहायता में जुट गईं. वे डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी हैं जो वर्तमान में गांधी महाविद्यालय, उरई में मनोविज्ञान विभाग में कार्यरत हैं साथ ही संगीत, समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं. वे जनपद के ही नहीं बल्कि प्रदेश के अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से सम्बद्ध हैं. सामाजिक सक्रियता बनाये रखना, लोगों की मदद करना उनके खून में है, उनके स्वभाव में है. इसी के चलते उन्होंने बिना किसी तरह की देरी किये, बिना अच्छा-बुरा सोचे उस अचेत महिला की सहायता की.
इस घटना को सामने लाने का उद्देश्य यही है कि हममें से बहुत से लोग कानूनी दांव-पेंच, पुलिस प्रशासन के रवैये से डर कर, घबरा कर बहुत बार सहायता देने से बचते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. यदि हम अपने आपमें सशक्त हैं, ईमानदार हैं और निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता कर रहे हैं तो किसी तरह की समस्या नहीं आती है. हम सभी को डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी जी के इस कदम से सीखने की आवश्यकता है, प्रेरणा लेने की आवश्यकता है. इसी तरह से एक-एक करके समाज की नींव बनती है, समाज की आधारशिला मजबूत होती है, समाज की इमारत भव्य बनती है.
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| महिला दिवस के अवसर पर सभी निकासी खाताधारक महिलाओं का सम्मान भी |