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18 अक्टूबर 2025

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो

‘दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो’ यह वाक्य कितना सुन्दर, सार्थक, सशक्त और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दीपों की कतार, मोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी आतिशबाजी, विविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे... अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.

 

भारतीय परम्परा, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में विभिन्न मनमोहक ऋतुएँ हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों, समरसता, सौहार्द्र, भाईचारे आदि की भी प्रतिस्थापना करते ये पर्व दिखाई देते हैं. किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. इनका उद्देश्य सदैव यही हो कि सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की स्थापना हो. व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़े रखने का माध्यम यही पर्व-त्यौहार बनें. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.

 



वर्तमान में स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है. दीपावली का रंगीन-रोशनीपरक उद्देश्य ‘इस दीपावली आप क्या खिला रहे हैं’ की सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत सा खड़ा दिखाई देता है. इसी आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ, खिलखिलाती हँसी नहीं वरन् उनकी फटी-फटी सी आँखें, अचम्भित से हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने विदेशी आतिशबाजी आकर अपना विस्तार करने लगती है. गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है जब कि किसी और के हाथों में मंहगे गिफ्ट प्रदर्शित होने लगते हैं.

 

हमारे घरों में आज लक्ष्मी जी के रात में उतर कर आने की संकल्पना कार्य नहीं करती वरन् लक्ष्मी जी के वर्तमान धौंसपरक स्वरूप से अपने आपको प्रतिष्ठित करने की भावना कार्य करती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों का उपयोग करके हम दीपावली का त्यौहार नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. ऐसी विद्रूपकारी, हास्यास्पद स्थितियों में अब हँसी भी नहीं आती है बल्कि सरोकारों के संकुचित होते जाने को देखकर आँखों में आँसू अवश्य ही उतर आते हैं. हमारी स्वयं को स्थापित करने की सोच के कारण समाज से समरसता और भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन सा होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?

 

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.


30 अक्टूबर 2024

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो, यह वाक्य सुन्दरसार्थक और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दियों की जगमगमोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाशरंग-बिरंगी आतिशबाजीरोशनियों के साथ फूटते पटाखे आदि अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चोंयुवाओंबुजुर्गोंपुरुषों-महिलाओं का स्वाभाविक रूप हर्षोल्लासित होना दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाईलोगों से मिलना-जुलनामिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.

 

भारतीय संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में प्रकृति के अन्तर्गत मनमोहक ऋतुओं की तरह से विविध पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेषता यह है कि इन्हें धार्मिकता के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक संदर्भों की, समरसता की, सौहार्द्र की, भाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते हैं. इसका उद्देश्य यही है कि इनके द्वारा सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.

 



वर्तमान में स्थितियों में कुछ परिवर्तन हुआ है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब चकाचौंध के वशीभूत होता जा रहा है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली के बीच दीपावली का उद्देश्य सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत खड़ा दिखाई देता है. इस आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ, खिलखिलाती हँसी नहीं दिखती वरन् मोबाइल के पीछे सेल्फी लेने वाले हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता में हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. मिठाई के पैकेट स्वयं को तुच्छ और गरिमाहीन सा महसूस करने लगते हैं जब किसी ब्रांडेड कम्पनी की चाकलेट का डिब्बा खुलकर मुँह चिढ़ाने लगता है. बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने कोई विदेशी आतिशबाजी अपने अस्तित्व का विस्तार करने लगती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों का उपयोग करके हम दीपावली नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. इस तरह की सोच के कारण समाज से समरसता और भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?

 

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे.

 

हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक ही नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा. 

25 अक्टूबर 2022

मिट जाएँ सबके अँधेरे




बहुत से काम औपचारिकता में करने पड़ते हैं. कुछ ऐसा ही काम अब त्योहारों-पर्वों पर शुभकामनायें देना लगने लगा है. अब बहुत कुछ होने के बाद भी एक खालीपन स्पष्ट दिखाई देता है. एक ऐसा इंतजार जो कभी समाप्त नहीं होना है मगर वह बना रहता है. इस खालीपन के साथ, एक इंतजार के साथ मन को, दिल को समझाया जाता है. दिल सब जानता है, मन सब समझता है इसके बाद भी इस सत्य को स्वीकारने की इच्छा नहीं होती है. 

सब कुछ जानने-समझने के बाद भी एक रिक्तता के साथ एक इंतजार. 

दीपावली सबके अँधेरे मिटाकर उनके जीवन में उजाला लाए. 



 

22 अक्टूबर 2022

दीपमालिके के स्वागत में एक दीप प्रज्ज्वलित करें

असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतम् गमय यह वाक्य एक तरफ सत्य की तरफ जाने का सन्देश देता है वहीं साथ में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है. चारों ओर दीपों की कतारमोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाशरंग-बिरंगी आतिशबाजीविविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे, सभी अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चों कायुवाओं काबुजुर्गों कापुरुषों-महिलाओं का हर्षोल्लासित होना स्वाभाविक सा दिखाई देता है. सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाईलोगों से मिलना-जुलनामिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.


भारतीय परम्परा मेंसंस्कृति में पर्वोंत्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहां जितनी अनुपम वैविध्यपूर्ण प्रकृति में मनमोहक ऋतुएं हैंठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह रही है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों कीसामाजिक संदर्भों कीसमरसता कीसौहार्द्र कीभाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते दिखाई देते हैं. होना भी यही चाहिए किसी भी पर्व काकिसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. हमारा उद्देश्य सदैव यही हो कि हमारे कदमों से सामाजिकता का विकास हो हीसामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करनाउत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.




इधर सामाजिक स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरणवैश्वीकरणऔद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजतासरलता को विखण्डित सा कर दिया है. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नातेहमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है.  


त्यौहार अब नितांत औपचारिकताओं में सिमटाए जाने लगे हैं. संबंधों मेंरिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती हैबाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने को मिलने लगी है विदेशी सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मीमिट्टी के दिएरुईमोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं. मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगेडिजाइनर मोमबत्तियों के सामनेअजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है. हर एक पटाखे के फूटने के साथहर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथहर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों मेंरिश्तों में भी आई है. अंधकार सिर्फ अमावस की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व मेंस्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है. काले आसमान में रौशनी बिखेरती आतिशबाजीघर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिएमकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं.


नैराश्य के ऐसे वातावरण के बाद भीकृत्रिम चकाचौंध के बीच भीदीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भीसामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने कोएक प्रकार के आवरण को गिराने कोअसामाजिकता को मिटाने कोसामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीचमंहगी से मंहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियां देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह कोअपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त मेंतन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़ेहमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहेअपनी खुशी से दूसरे बच्चों मेंऔर लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आंगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती हैबस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह सेउमंग से परिवर्तन कासमरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.

 





 

15 नवंबर 2020

त्योहारों से गायब होती जा रही है मिठास

अब दीपावली आती है तो ज्ञानियों को लेकर आती है. अब धुएँ से, पटाखों के शोर से पर्यावरण को नुकसान होने की बात कही जाती है जबकि बचपन में पढ़ा था कि पटाखों के शोर, धुएँ से जहरीले कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं. पता नहीं तब गलत पढ़ाया जाता था या कि अब गलत ज्ञान दिया जा रहा है? पटाखों के अलावा किन-किन चीजों से पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है, किस-किस कदम से प्रदूषण फ़ैल रहा है, इस पर सार्थक चर्चा नहीं हो रही है. बहरहाल, ये तथाकथित ज्ञानियों का क्षेत्र है और इस पर वे तभी सक्रिय होते हैं जबकि हिन्दू धर्म से सम्बंधित त्यौहार, पर्व सामने दिख रहे हों. दीपावली पर हम बचपन में भी खूब पटाखे फोड़ा करते थे और आज भी फोड़ते हैं. अब अंतर ये आया है कि अब खूब नहीं फोड़े जाते क्योंकि खूब फोड़ने के लिए घर में हमसे छोटे बच्चे मौजूद हैं.




बचपन में दीपोत्सव के पाँचों दिन पटाखों की गूँज सुनाई पड़ती थी. रंग-बिरंगी आतिशबाजी के बीच कड़ाबीन का अपना गज़ब आकर्षण हुआ करता था. हम बच्चों के बीच उनको चलाने वाला विशेष महत्त्व रखता है. कड़ाबीन या फिर किसी भी दूसरे आवाज़ वाले पटाखों को चलाने में कलाबाजी की आवश्यकता होती थी. आग लगाना और उसके चलने के पहले ही उस पटाखे की पहुँच से दूर हो जाना बहुत ही फुर्तीला और सावधानी भरा कदम माना जाता था. ऐसा तब और भी अधिक कलाबाजी का काम समझा जाता था जबकि चारों तरफ से किसी न किसी रूप में आतिशबाजी चलने में लगी हो. देर रात तक पटाखे चलाने के बाद सुबह-सुबह की ठंडक में बचे-बचाए, बिना चले पटाखों को बीनने का काम गुप्तचर रूप में किया जाता. अधचले, बिना चले पटाखे एक तरह के बोनस का स्वाद दिया करते थे.


अब पहले की तरह पारिवारिक सदस्यों का इकठ्ठा होना भी नहीं होता है. आतिशबाजी भी पहले की तरह सामूहिकता में नहीं चलाई जाती है. मोहल्ले की गलियाँ, घरों की छतें अब पहले की तरह गुलज़ार नहीं दिखाई देती हैं. अब पहले की तरह अधचले, बिना चले पटाखों को बीनने वाले जासूस भी नहीं दिखाई देते हैं. अब ऐसा लगता है जैसे त्यौहार को बस मनाना है. यह भी एक तरह की औपचारिकता सी लगने लगी है. इस औपचारिकता के निर्वहन में वो पहले जैसी मिठास गायब होती चली जा रही है. तथाकथित ज्ञानियों को पर्यावरण की चिंता है मगर सामाजिकता से गायब हो रही मिठास की चिंता नहीं है. घरों-घरों तक में फैलते जा रहे एकाकी सामाजिक प्रदूषण के प्रति कोई भी सचेत नहीं है.


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#कुमारेन्द्र 

12 नवंबर 2020

शुभ हो धनतेरस

दीपमालिके पर्व का शुभारम्भ होते ही मन हर्षित, प्रफुल्लित हो उठता है। मूलतः आज धनतेरस तिथि से इसका आयोजन आरम्भ हो जाता है। 

आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ 

धनतेरस शुभ हो 

मंगलकामना कि आप सभी के जीवन में खुशियों की रोशनी चमके।

10 नवंबर 2020

दीपावली के पटाखों संग मस्ती

दीपावली के आते ही प्रदूषण ज्यादा दिखाई देने लगता है. विगत कई वर्षों से ऐसा देखने में आ रहा है कि जैसे ही किसी हिन्दू पर्व का आना होता है वैसे ही ज्ञान देने वालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. दीपावली पर पटाखे न चलाने की सलाह, होली पर रंग न खेलने की सलाह. एक पर्व के कारण प्रदूषण का फैलना और दूसरे के कारण पानी की बर्बादी को मुख्य कारण बताया जाता है. आज जब भी ऐसी बातों को देखते हैं तो याद आता है वर्षों पुराना समय, स्मृति में कौंध जाते हैं अपने बचपन के दिन. उस समय तो आज से ज्यादा पटाखे चलते थे, हम सब आज से ज्यादा पटाखे चलाते थे मगर कभी धुएँ का, प्रदूषण का रोना नहीं रोया गया. ऐसे में आज समझना होगा कि इस धुएँ की वास्तविक समस्या क्या है.


इस पर चर्चा बाद में, पहले अपनी दीपावली की चर्चा जो पुराने दिनों में हम सभी ने बड़ी मस्ती से मनाई है, की कुछ बातें. सभी चाचा लोग सपरिवार उरई नियमित रूप से आया करते थे. पटाखों की संख्या तो निश्चित थी ही नहीं. सबकी उम्र के अनुसार खूब सारे पटाखे दिन में धूप में सुखाये जाते या कहें कि उनकी नमी को दूर किया जाता. इक्का-दुक्का पटाखे तो हम बच्चे लोग बस ये जाँचने के नाम पर ही चला मारते कि पटाखे सही से सूखे हैं या नहीं. किसी तरह इंतजार करते-करते शाम आती. शाम को पूजन के बाद सबसे ज्यादा जल्दी छत पर जाकर दिए, मोमबत्तियाँ लगाने की, पटाखे चलाने की रहती.




पटाखे चलाते समय सावधानी पूरी तरह से रखी जाती इसके बाद भी ऐसी कोई न कोई घटना हो जाती जो लम्बे समय तक हँसी पैदा करती. लम्बे समय तक क्या, कुछ घटनाएँ तो ऐसी हैं कि आज तक उनकी चर्चा करके ठहाके लगाये जाते हैं. कभी अनार का रुक-रुक कर चलना, कभी चखरी का उछल-उछल कर घूमना, कभी राकेट का बजाय ऊपर जाने के छत के ही चक्कर लगा लेना आदि ऐसी घटनाएँ हैं जो हर दीपावली पटाखे चलाते समय अपने आप याद आ जाती हैं.




अब शासन के निर्देशों पर ही पटाखे चलाने का समय निर्धारित हो गया है. आवाज़ का, रौशनी का, पटाखों का मानक तक निर्धारित कर दिया गया है. अबकी समाचार आ रहे हैं कि बहुत सी जगहों पर पटाखों को बैन कर दिया गया है. पर्यावरण की चिंता करती सरकारों ने कभी अपने आसपास देखा है कि पटाखों के अलावा और कहाँ से प्रदूषण फ़ैल रहा है? तमाम कारखाने, तमाम कारें, टैक्सी आदि इतनी बुरी तरह से धुआँ फैलाते हैं कि उनके आगे पटाखों का धुआँ कहीं नहीं ठहरता. इसके बाद भी सबके निशाने पर दीपावली ही है. सड़क पर चलती कारों, घरों, कार्यालयों में चौबीस घंटे चलते एसी के कारण होने वाले प्रदूषण की, पर्यावरण नुकसान की चिंता किसी सरकार को नहीं है. इस तरह की मानसिकता से एक सवाल दिमाग में हर बार कौंधता है कि कहीं त्योहारों के समय का ये नाटक हिन्दू त्योहारों-पर्वों को सीमित करने की, समाप्त करने की कोई साजिश तो नहीं?


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#कुमारेन्द्र

07 नवंबर 2018

समरसता का एक दीपक प्रज्ज्वलित करें


असतो मा सदगमय॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय॥ मृत्योर्मामृतम् गमय॥ यह वाक्य एक तरफ सत्य की तरफ जाने का सन्देश देता है वहीं साथ में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है। इसी तरह दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो भी सुन्दर, सार्थक, सशक्त और मनोहारी प्रतीत होता है। चारों ओर दीपों की कतार, मोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी आतिशबाजी, विविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे, सभी अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं। बच्चों का, युवाओं का, बुजुर्गों का, पुरुषों-महिलाओं का हर्षोल्लासित होना स्वाभाविक सा दिखाई देता है। सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं। नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं। दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है। घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई-पकवान का बनना आदि-आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है।


भारतीय परम्परा में, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है। यहां जितनी अनुपम वैविध्यपूर्ण प्रकृति में मनमोहक ऋतुएं हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं। देश में लगभग प्रत्येक दिन किसी न किसी रूप में पर्वों का, त्यौहारों का अनुष्ठान होता रहता है। इन त्यौहारों की विशेष बात यह रही है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है। ये पर्व धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों की, सामाजिक संदर्भों की, समरसता की, सौहार्द्र की, भाईचारे की भी प्रतिस्थापना करते दिखाई देते हैं। होना भी यही चाहिए किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए। हमारा उद्देश्य सदैव यही हो कि हमारे कदमों से सामाजिकता का विकास हो ही, सामाजिक सरोकारों की भी स्थापना होती रहे। किसी समय में व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़े रखने का माध्यम यही पर्व-त्यौहार हुआ करते हैं। दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है।

इधर सामाजिक स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है। सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है। यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है। भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है। इसी आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियां, खिलखिलाती हंसी नहीं वरन् उनकी फटी-फटी सी आंखें, अचम्भित से हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं। कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं। गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है।  

त्यौहार अब नितांत औपचारिकताओं में सिमटाए जाने लगे हैं। संबंधों में, रिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती है, बाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने को मिलने लगी है, सामान की खरीददारी करने वाली निगाहों से ज्यादा देहयष्टि को घूरने वाली नजरें ज्यादा हो गईं हैं। विदेशी सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मी, मिट्टी के दिए, रुई, मोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं। मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगे, डिजाइनर मोमबत्तियों के सामने, अजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है। हर एक पटाखे के फूटने के साथ, हर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथ, हर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों में, रिश्तों में भी आई है। अंधकार सिर्फ अमावस की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व में, स्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है। काले आसमान में रौशनी बिखेरती आतिशबाजी, घर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिए, मकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं।

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है। हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है। बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को। इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा। भारीभरकम खर्चों के बीच, मंहगी से मंहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियां देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे। उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे। यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे। हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आंगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है। उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें। आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा।


04 नवंबर 2018

त्योहारों पर पक्षपाती निर्णय


समय के साथ किस तरह स्थितियाँ बदल जाती हैं या कहें कि बदल दी जाती हैं, इसका एहसास किसी को नहीं होता. एक समय था जबकि हमारा बचपन था तब मैदान बच्चों से भरे रहते थे. शाम को घर बैठे रहना डांट का कारण बनता था. हरहाल में शाम को थोड़ी देर मैदान में जाकर कुछ न कुछ खेलना अनिवार्य हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट है. अब मैदान एकदम खाली हैं. शाम को घर से बाहर निकलना बच्चों के लिए अनिवार्य नहीं है. अब वे बाहर हाथ-फिर चलाने के बजाय या तो मोबाइल पर उंगलियाँ चलाते हैं या फिर टीवी पर आँखें. इसी तरह हमें अच्छे से याद है कि पहले नियमित रूप से मिलना-जुलना हुआ करता था. सम्बन्ध कभी भी दो पर दो के नहीं रहे वरन पारिवारिक रहे. बिना किसी औपचारिकता के बेधड़क एक-दूसरे के घर आना-जाना हुआ करता था. न केवल आना-जाना वरन खाना-पीना भी. ऐसा एक-दो दिन का हाल नहीं हुआ करता था बल्कि बहुतायत में यही हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट हो गई है. अब बाहर जाना होता है तो किसी के घर नहीं वरन किसी होटल में, रेस्टोरेंट में. अब यदि किसी के घर जाना होता भी है तो अकेले, पारिवारिक आना-जाना न के बराबर दिखाई देता है. इसमें भी किसी के घर जाने के पहले उसकी अनुमति सी चाहिए होती है. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके घर जाने पर उसके न मिलने पर समय की बर्बादी होगी वरन इसलिए कि जिस समय मिलने जाना है उस समय वह अपने किसी टीवी कार्यक्रम को देखे में तो व्यस्त नहीं. किसी लाइव शो को देखने में, किसी मैच में चिल्लाने में, किसी रोने-ढोने वाले सीरियल देखने में तो मगन नहीं.


कुछ ऐसे ही हालात त्योहारों को लेकर सामने आ रहे हैं. उसमें भी विशेष रूप से हिन्दुओं के त्यौहार को लेकर. इस्लाम में ताजिया कितना भी बड़ा बनाया जाने, सड़क पर निकाला जाये कोई दिक्कत नहीं. हाँ, दही-हांडी की ऊँचाई निर्धारित होगी. बकरीद में कितने भी बकरे काट दिए जाएँ कोई प्रदूषण नहीं फैलना उसके खून, खाल, मांस से न पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होना है, ऐसा बस उतनी देर में ही होगा जबकि दीपावली के पटाखे फोड़े जायेंगे. हाईवे का निर्माण होना है तो मंदिरों के हटाये जाने पर विकास-कार्य का हवाला दिया जायेगा मगर यदि मामला किसी मस्जिद के, मजार के हटाने का आता है तो वहां मजहबी भावनाएं घायल होने लगती हैं. मंदिर में प्रवेश की बात आती है तो यह सभी का अधिकार होता है मगर यदि बात मस्जिद में प्रवेश की आ जाये तो वहां मजहबी भावनाओं में अदालत हस्तक्षेप नहीं करती. इन विकट स्थितियों के बीच यदि बचपन याद करते हैं तो याद आता है दीपावली का निबंध. जिसमें कि हम पढ़ा करते थे कि दीपावली दीपों, आतिशबाजी, रौशनी का पर्व है. इसके पटाखों के धुंए से कीड़े-मकोड़े-मच्छर आदि मर जाते हैं. अब देख रहे है कि पटाखों के चलाये जाने पर भी कानूनी पकड़ बनाई जाने लगी है.

संभव है कि आज की स्थितियों में इन्सान ने अपने लाभ के लिए पटाखों को पहले के मुकाबले अधिक हानिकारक बना दिया हो मगर क्या पूरे साल में बस एक रात में कुछ घंटे पटाखे चलाना ही प्रदूषण को बढ़ाता है? यदि निष्पक्ष ढंग से देखा जाये तो चौबीस घंटे मकानों, कार्यालयों, बाजारों, दुकानों आदि में चलते एसी, सड़कों पर लाखों की संख्या में दौड़ती एसी कारें, कारखानों से निकलना धुआँ आदि क्या पर्यावरण को संरक्षित कर रहा है? क्या इन सबसे प्रदूषण नहीं फैलता है? ऐसे में महज एक रात में कुछ घंटों को कानूनी शिकंजे में कसने की जो नीति अपनाई जा रही है वह एक दृष्टि से भले ही तार्किक समझ आ रही हो मगर जबकि एक-एक आदमी, निर्णय देने वाले लोग भी उसी सिस्टम का हिस्सा बने हुए हैं जो प्रदूषण फैला रहा है तब आतिशबाजी नियंत्रण सम्बन्धी निर्णय पक्षपातपूर्ण समझ आते हैं. एक तरह की शिगूफेबाजी ही नजर आती है.

कोई भी पर्व, त्यौहार हो सभी के लिए सुखदायी हो, ऐसी कामना है मगर यदि धर्म-मजहब देखकर उनके कृत्यों पर निर्णय दिए जायेंगे तो यह सामाजिक विभेद की स्थिति पैदा करेगा. ऐसे में सुखदायी स्थिति, सौहार्द्र बनना कहीं से भी सहज नहीं समझ आता.

09 नवंबर 2015

अंधकार मिटाने में असफल आतिशबाजी

दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के साथ आतिशबाजी चलाने की जो शुरुआत होती वो दीपावली गुजर जाने के बाद भी लगभग एक सप्ताह तक चलती रहती. आश्चर्य होता है आज के बच्चों को ये सुनकर कि हम बचपने में बीस-पच्चीस दिनों तक दीपमालिके पर्व का आनंद पूरे उल्लास से मनाते रहते थे. दशहरा का आना अपने आपमें सूचक होता था कि अब रौशनी का, आतिशबाजी का, पटाखों का पर्व आ गया है. छोटे-छोटे हाथों में नन्ही सी पिस्तौल और उसमें आगे बढ़ती पटाखे की रील का अपना ही अजब जादू था. तब हमारे शहर में आतिशबाजी विक्रय हेतु अलग से स्थान निर्धारित नहीं किया गया था. छोटा सा शहर, कम आबादी, छोटा सा बाज़ार और उसी बाज़ार में सजी हुई आतिशबाजी की दुकानें. दिन के तेज उजाले में भी इन दुकानों की अपनी साज-सज्जा, बिजली के बल्बों की झालर बालमन को लुभाती थी. अनार, फुलझड़ी, राकेट, बम आदि के रंग-बिरंगे डिब्बे अपनी ओर आकर्षित करते. स्कूल से घर वापसी में रुक-रुक कर इन दुकानों को निहारना, मन ही मन में तय करना कि इस बार पिताजी से किस आतिशबाजी को मंगवाने की जुगत लगाना है आज भी रोमांचित कर जाता है.
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रोज रात को सोते समय एक दिन कम होने की ख़ुशी होती और अगली सुबह इस बात की प्रसन्नता कि आज लौटते में कोई नई आतिशबाजी, कोई नए पटाखे को दीपावली के लिए चुना जायेगा. दिन गिनते-गिनते, आतिशबाजी चुनते-चुनते दीपावली पर्व की आहट सुनाई देने लगती. धनतेरस को सजा हुआ बाज़ार, बर्तनों की, इलेक्ट्रॉनिक सामानों की इक्का-दुक्का दुकानों की सजावट पूरे बाज़ार को खुशनुमा बना देती. आज की तरह बाइक्स का तेज़ रफ़्तार दौड़ना नहीं होता था, लोगों की भीड़ में आज की तरह की अंधाधुंध स्थिति नहीं थी और वो एक-दूसरे से धक्कामुक्की करती नहीं दिखती थी, बाज़ार में टहलते-घूमते लोगों में अनजानापन नहीं था सबके बीच अपनत्व सा दिखाई देता था, कोई गले मिल बधाइयों का आधान-प्रदान करते मिल जाता, बाज़ार में कोई बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने में शर्म महसूस नहीं करता था, कोई स्नेह से सिर पर हाथ फेरता हुआ सुखी जीवन का आशीष देकर आगे बढ़ जाता. धनतेरस पर दिखावे के लिए खरीददारी न होकर बस शगुन के नाते हलकी-फुलकी खरीददारी परिवार के बड़े लोगों द्वारा कर ली जाती और हम बच्चे जगमगाती दुकानों को देखते-निहारते दीपावली पर पटाखे फोड़ने की योजना बनाने में लग जाते. लईया, खीलें, गट्टे, मिट्टी के दिए, पटाखे आकर हम बच्चों के उत्साह को और बढ़ा जाते. परिवार के अन्य सदस्यों का आना त्यौहार के उत्साह को चार चाँद लगा देता.
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अंततः दीपावली की अंधियारी रात आती है जिसका अंधकार मिटाने को मिट्टी के दिए छतों की चहारदीवारी पर सज जाते. किसी-किसी घर पर बिजली के बल्बों की रौशनी कौंधती दिखती. गणेश-लक्ष्मी पूजन के साथ हम बच्चों का धमाल शुरू हो जाता. आतिशबाजी की, दीयों की, मोमबत्तियों की, पटाखों की रौशनी और शोर में अमावस का अँधेरा कहीं दूर छिप जाता. पटाखे छोड़ने की उमंग देर रात तक आसमान को छूती रहती, बिना किसी दवाब के, बिना प्रशासनिक आदेश के पटाखों का शोर स्वतः स्फूर्त रूप से थम जाता और रात सर्दी के आगोश में सोने चली जाती और हम बच्चे भी अपनी-अपनी रजाइयों में सिमटने लगते. नींद से बोझिल होती आँखें बार-बार बंद होने को झुकती मगर दिमाग में सुबह उठकर अधचले पटाखों को बटोरने की योजना बन रही होती. कहाँ-कहाँ कौन सा पटाखा नहीं फूट सका था, छत पर चली पटाखों की कौन सी लड़ी अधूरी ही चल सकी थी, नमी के चलते किस फुलझड़ी ने अपने आधे ही रंग बिखेरे थे इन सबका हिसाब-किताब लगाते-लगाते कब नींद आ जाती और कब सुबह की हलकी ठंडक में हम बच्चे छत पर अधचले पटाखों को खोज रहे होते पता ही नहीं चलता.

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अब नितांत औपचारिकताओं में त्यौहार सिमटा दिए गए हैं. संबंधों में, रिश्तों में पहले की तरह गर्माहट नहीं दिखाई देती है, बाज़ारों में अपनत्व कम कटुता ज्यादा देखने को मिलने लगी है, सामान की खरीददारी करने वाली निगाहों से ज्यादा देहयष्टि को घूरने वाली नजरें ज्यादा हो गईं हैं, कदम-कदम पर अपनों से ज्यादा  खाकी वर्दी वाले डंडा लिए दिखाई देते हैं, बाज़ार की जगह सिकुड़कर इतनी छोटी हो जाती है कि जगह होने के बाद भी जबरन धक्का-मुक्की किये जाने का एहसास होता है. विदेशी सामानों के बीच आज भी कई-कई छोटे बच्चे-बच्चियाँ साँचे में ढले गणेश-लक्ष्मी, मिट्टी के दिए, रुई, मोमबत्तियाँ आदि बेचते दिखते हैं मगर मशीनों से निर्मित चमकते-दमकते गणेश-लक्ष्मी की भव्य मूर्तियों के आगे स्टाइलिश दीयों के आगे, डिजाइनर मोमबत्तियों के सामने, अजब-गजब रूप से चमक बिखेरती झालरों के सामने इनका अंधकार ज्यों का त्यों रहता है. हर एक पटाखे के फूटने के साथ, हर एक दिया रौशनी बिखेरने के साथ, हर बार और अकेले त्यौहार मनाने के साथ एहसास होता है कि मंहगाई सामानों में ही नहीं आई है संबंधों में, रिश्तों में भी आई है; अंधकार सिर्फ अमावस की रात को ही घना नहीं हुआ है बल्कि अपनत्व में, स्नेह में भी घनीभूत होकर छा गया है. काले आसमान में रौशनी बिखेरती आतिशबाजी, घर की छत पर चमक बिखेर कर शांत हो जाते दिए, मकान की दीवारों से लिपटी विदेशी झालरें अपनी क्षणभंगुर चमक से एक पल को तो अंधकार दूर कर देती हैं किन्तु समाज में लगातार बढ़ते जाते अंधकार को दूर नहीं कर पा रही हैं.  
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21 अक्टूबर 2014

पर्व सामाजिक समरसता लाते हैं, इनके द्वारा विद्वेष न फैलाएं



समाज जिस तेजी से तकनीक के मामले में आधुनिक होता जा रहा है उसी तेजी से आपसी संबंधों के मामले में पिछड़ता जा रहा है. एक तरफ लोग इस बात से प्रसन्न हैं कि देश मंगल तक जा पहुँचा किन्तु इस बात के लिए दुखी नहीं हैं कि रिश्तों के नाम पर समाज रसातल में जा रहा है. लोग बड़ी ही गर्वोक्ति के साथ इस बात को बताते हैं कि वे सुदूर देशों के लोगों के साथ सम्पर्क स्थापित किये हुए हैं किन्तु उन्हें इस बात से हीन भावना महसूस नहीं होती कि उन्हें अपने पड़ोसी के बारे में कोई जानकारी नहीं है. वे विदेशी संस्कृति को अपनाये जाने के जबरदस्त समर्थक दिखते हैं किन्तु अपने ही देशवासियों के साथ सौहार्द्र स्थापित करने में पीछे रह जाते हैं. जिनके लिए रंगरेलियाँ मनाने में, जाम छलकाने में, रंगीन पार्टियों करने में लाखों-लाख रुपये फूँकना स्टेटस सिम्बल होता है वे सामाजिक सद्भाव, अपनत्व, भाईचारा बढ़ाने वाले त्योहारों-पर्वों के आयोजनों को ढकोसला बताने से नहीं चूकते हैं. इस तरह के अनेक उदाहरण हमें अपने आसपास देखने को मिल जाते हैं. देखा जाये तो कहीं न कहीं ये एक तरह की सामाजिक विकृति को दर्शाते हैं. ये सामाजिक विकृति समाज में आपसी वैमनष्यता के रूप में, विद्वेष के रूप में, आपसी तनाव के रूप में फैलती दिख रही है और इसका असर अब उन पर्वों, त्योहारों, समारोहों आदि पर पड़ने लगा है जो कहीं न कहीं सामाजिक सद्भाव बढ़ाने में सहायक बनते हैं, आपस में स्नेह बनाये रखने में मददगार होते हैं, समन्वय की-सामूहिकता की भावना का विकास करते हैं. 
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अब त्योहारों को त्यौहार के नाम पर नहीं वरन हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर मनाया जाता है; स्त्री-पुरुष के नाम पर मनाया जाता है; धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता के नाम पर मनाया जाता है. और ये बहुतायत में हिन्दू पर्वों-त्योहारों के नाम पर किया जा रहा है. ऐसा महज एक दीपावली के नाम पर ही नहीं हो रहा वरन लगभग प्रत्येक हिन्दू त्यौहार-पर्व को अब कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. होली को पानी का अपव्यय वाला, दुर्गा पूजा को सामाजिक विद्वेष फ़ैलाने का, रामनवमी को-दशहरा को हिंदुत्व स्थापित करने का, रक्षाबंधन-करवाचौथ को स्त्री आधीनता का, नागपंचमी को जानवरों पर अत्याचार करने का, दीपावली को प्रदूषण फ़ैलाने वाला सिद्ध करने का कुत्सित प्रयास लगातार हो रहा है. किसी भी पर्व-त्यौहार को साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता के चश्मे से देखने से बेहतर है कि उसके द्वारा सामाजिक सद्भाव स्थापित करने का प्रयास किया जाये. हिन्दू पर्वों-त्योहारों को फिजूल, अपव्यय वाला बताने के स्थान पर उसमें समाहित शिक्षाओं का, उसमें समाहित संस्कृति पालन का प्रचार किया जाना चाहिए.
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दीपावली के इस पावन पर्व का ही उदाहरण लिए जाये तो स्पष्ट है कि ये पर्व अपने आपमें स्वच्छता लाने का, अँधेरा मिटाने का, सबके साथ खुशियाँ बांटने का पर्व है. घरों को रंग-रोगन से सजाकर, रंगोली से निखार कर, दियों की रौशनी में, पटाखे फोड़कर उल्लास दर्शाकर, सबको गले लगा मिठाई खिलाकर सामाजिक समरसता फ़ैलाने का सन्देश स्पष्ट रूप से मिलता है. हम सभी के प्रयास यही हों कि पर्वों-त्योहारों के माध्यम से सामाजिक समरसता पैदा की जा सके, आपसी विद्वेष को दूर किया जाये, बुराइयों को मिटाया जाये, खुशियों को बाँटा जाए. किसी समय ऐसा किया भी जाता था, ऐसा होता भी था जबकि दीपावली को सुरक्षित तरीके से मनाये जाने के बारे में चर्चा की जाती थी. अब दीपावली न मनाये जाने की बात की जाती है, इसे प्रदूषण फ़ैलाने वाला, धन की बर्बादी वाला, शोर-धुआँ पैदा करने वाला बताया जाने लगा है. अब भी दीवाली पर पटाखे फोड़ें, रौशनी करें किन्तु साथ ही याद रखें कि हमारे किसी कदम से हमारे समाज को नुकसान न हो. यदि हम एक कदम भी इस ओर बढ़ा पाते हैं तो फिर जगमग दीपावली का वास्तविक आनन्द उठा सकते हैं.

चित्र गूगल छवियों से साभार 

14 नवंबर 2012

दीपावली की शुभकामनायें



          दीपावली की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान के साथ एक और पर्व की समाप्ति हो गई। तमाम सारी औपचारिकताओं के साथ आज बहुत सारे कार्यों का निर्वहन किया जा रहा है, ठीक उसी तरह से पर्वों, रिश्तों का निर्वहन होने लगा है। भारतीय समाज में अनेक ऐसे त्यौहार हैं जिनका आयोजन, हर्षोल्लास के साथ उनको मनाये जाने का उपक्रम कई-कई दिनों पूर्व से होने लगता है। एक-दूसरे से मिलना, कार्यक्रम को खुशी-उमंग से मिल-जुल कर मनाये जाने की तैयारियां, खाद्य-पदार्थ-मिठाइयां आदि के बनाये जाने की उपक्रम, रिश्तेदारों-मित्रों से मिलने-जुलने का कार्यक्रम आदि की तैयारियां करते-करते कब त्यौहार सम्पन्न हो जाता, पता ही नहीं चलता। 

          इसके विपरीत आजकल स्थिति यह है कि त्यौहार, पर्व आदि तमाम औपचारिकताओं के साथ ही मनाये जाते हैं। पूरी तरह से इनको व्यावसायिकता ने, बाजारवाद ने घेर लिया है। आत्मीयता के स्थान पर दिखावे का जोर बहुत ज्यादा हो गया है। आपसी मिलने-जुलने के स्थान पर फोन का उपयोग, एसएमएस का प्रयोग किया जाने लगा है। तड़क-भड़क के द्वारा अपनी शानो-शौकत को प्रकट करने का तरीका खोजा जाने लगा है। ऐसे तमाम कदमों के द्वारा समाज में जबरदस्त रूप से भाईचारे में कमी देखने को मिली है।

          इस दीपावली पर ही इस तरह के नजारे देखने को मिले जिन्हें देखकर लगा कि आज की चकाचौंध भरी दुनिया में, दिखावे की दुनिया में, स्वार्थपरक सम्बन्धों में ये त्यौहार एक प्रकार की औपचारिकताओं के साथ निर्वहन किये जा रहे हैं। रिश्तों की गर्माहट, सम्बन्धों की मिठास कहीं दूर खो गई है। सुधार कितना होगा, किस तरह होगा, किसके द्वारा होगा, ये कहना बहुत ही कठिन है किन्तु एक बात स्पष्ट रूप से समझ आती है कि यदि आने वाले दिनों में समाज के इस तरह के औपचारिक व्यवहार को समाप्त नहीं किया गया तो जीव-जन्तुओं की अनेक विलुप्त होती प्रजातियों की तरह ही अनेक भारतीय त्यौहार-पर्व भी विलुप्त होने की श्रेणी में शामिल हो जायेंगे।

          वर्तमान की तमाम विसंगतियों के बीच अच्छी सोच और सकारात्मकता की उम्मीद के साथ सभी को दीपावली की शुभकामनायें।