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23 जुलाई 2025

नशे की तरफ बढ़ते युवा-कदम

हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया, एक गीत की इस पंक्ति ने युवाओं को बहुत प्रभावित किया है. उनके लिए इस पंक्ति का सन्दर्भ उन्मुक्त रूप से धुँआ उड़ाना भर है. इसके वशीभूत युवाओं की बहुत बड़ी संख्या जगह-जगह कहीं छिपे रूप मेंकहीं उन्मुत भाव से धुआँ उड़ाती नजर आती है. ऐसे युवाओं को गीत की इस पंक्ति ने जितना प्रभावित किया है उतना इसके अगले भाग ने नहीं किया है. धुँए से खेलती इस पीढ़ी को मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गयावाला दर्शन याद नहीं है. रील बनाने में खोयी रहने वाली, अपने आपको स्वतंत्रता से उद्दंडता की तरफ ले जाती पीढ़ी को कतई भान नहीं है कि किसी भी गीत की पंक्तियों का अनुसरण करना और ज़िन्दगी की वास्तविकता को समझना दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं. ज़िन्दगी को जीने के अंदाज, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाये रखने की कार्य-शैली से इतर आज का युवा नशे की दुनिया में हँसते-मुस्कुराते हुए प्रवेश कर रहा है. उसके लिए ये किसी खतरे का सूचक नहीं बल्कि एक तरह का एडवेंचर है, जिसे वह किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहता है.

 

सामाजिक रूप से यह स्थिति चिंताजनक है कि जिस उम्र में किशोरों, युवाओं को अपने दैहिक सौष्ठव की तरफ, बौद्धिक विकास की तरफ, अध्ययन की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए उस उम्र में वे नशे का शौक पालने में लगे हैं. शौक-शौक में कभी-कभी ही नशे की तरफ बढ़े कदम कब उनकी मजबूरी बन जाते हैं, उनको इसकी भनक तक नहीं लगती है. शौकिया उठाये गए कदम की मजबूरी में फँसकर वे इसे ज़िन्दगी जीने का तरीका समझने लगते हैं. अपनी मस्तीअपनी दुनियाअपनी स्वतंत्रता में इनको आभास ही नहीं होता है कि वे कब ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने लगे हैं.

 



ऐसी स्थितियों के लिए पूरी तरह से युवाओं को अथवा किशोरों को दोष देना भी उचित नहीं है. देखा जाये तो भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के अभिभावक भी शामिल हैं. आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते अनुशासन का पाठ सिखाने वाले, जीवन की जिम्मेदारियों से परिचय कराने वाले अभिभावक अपने ही बच्चों के मित्र रूप में परिवर्तित हो गए. मैत्री भरे कथित वातावरण में अब बच्चों को किसी भी संसाधन की, उत्पाद की महत्ता समझाने के बजाय उसकी सहज उपलब्धता करवाई जा रही है. अनुशासन-मुक्त लाड़-प्यार में उपलब्ध संसाधनों के चलते ऐसे बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती हैन समय कीन कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. इसी मानसिकता के कारण समाज का बहुसंख्यक युवा वर्ग गैर-जिम्मेदारी का परिचय देते हुए उद्दंड नजर आने लगा है. इसी का दुष्परिणाम है कि अधिकांश बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति पनप रही है, वे गलत रास्तों की तरफ बढ़ जाते हैं, नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं.

 

नशा-मुक्त समाज की संकल्पना समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की चाह है. इसके बाद भीनशे के दुष्प्रभाव की जानकारी होने के बाद भी युवाओं में ही नहीं बल्कि समाज में नशे के प्रति आसक्ति लगातार बढती ही जा रही है. शादी-विवाह के समारोहकिसी भी हर्ष-उमंग का अवसर होनायुवाओं की अपनी मस्ती आदि अब बिना नशे के पूरी नहीं हो पाती है. कहीं न कहीं समाज में इस तरह के नशे को स्वीकार्यता मिल चुकी है. किसी भी तरह का आयोजन होछोटे-बड़े स्तर के क्लब या होटल हों सभी में किसी न किसी रूप में नशे की उपस्थिति देखने को मिलने लगी है. बहुत सी जगहों पर खुलेआम या चोरी-छिपे ड्रग्स पार्टियाँहुक्का बार आदि जैसी संकल्पना धरातल पर देखने को मिलती है. दुर्भाग्य यह है कि ऐसे आयोजनों में बहुतायत में किशोरों का, युवाओं का सम्मिलन रहता है. आधुनिकता के परिवेश में लिपटी ऐसी पार्टियों में सिगरेट, शराब की आड़ में नशीले तत्त्वों, विभिन्न ड्रग्स की सहज पहुँच बनी होती है.  

 

नशा-मुक्त समाज की अवधारणा को पूरा करने के लिए सर्वप्रथम तो ऐसे नशीले पदार्थों की आवक पर ध्यान देने की जरूरत है; उसके स्त्रोतों को पकड़ने की जरूरत है; इनको बाज़ार में खपाने वाले तत्त्वों को खोजने की जरूरत है. इसके साथ-साथ यह भी समझना होगा कि आखिर नशे की गिरफ्त में विशेष रूप से युवा वर्ग क्यों आ रहा हैइसके लिए समाज में युवाओं कीकिशोरों की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरणवैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावनाजल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊँचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसाकम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. इस दौड़ में एक बार शामिल हो जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ केउन्नति केसमर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.

 

सरकार कोसमाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फँस गया है उसको समझाने कीसँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सकेसामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सकेकर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे. 

 


05 जनवरी 2025

अपराध के व्यामोह में युवा पीढ़ी

विगत कुछ समय में बच्चों, किशोरों से संदर्भित जिस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं, उनको देखकर ऐसा महसूस हो रहा है कि भले ही समाज में विकास का क्रम बना हुआ है मगर नैतिकता में, सामाजिकता में निरंतर गिरावट आ रही है. सामाजिक और नैतिक रूप से इस पीढ़ी को उस तरह से अनुशासित नहीं किया जा सका है, जैसी कि समाज में अपेक्षा होती है. इस पीढ़ी को नैतिक रूप से वैसा जिम्मेवार नहीं बनाया गया है जैसा कि किसी इंसान के लिए अपेक्षित होता है. सामाजिकता के नाम पर भी यह पीढ़ी संज्ञा-शून्य ही नजर आती है. ऐसा नहीं है कि वर्तमान समय के समस्त बच्चों, किशोरों के सन्दर्भ में ये सही है मगर बहुतायत में इस पीढ़ी के साथ यही समस्या बनी हुई है. उसके लिए नैतिकता, सामाजिकता से कहीं अधिक बड़ी बात उनका अपना मनोरंजन, अपना पैशन हो गया है. इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार बैठे होते हैं, बिना ये जाने-समझे कि उनका एक गलत कदम किसी की जान भी ले सकता है.

 

इस तरह से भाव-विहीन होती जा रही पीढ़ी के किशोरों, बच्चों द्वारा की गई हरकतों की संख्या उँगलियों में गिने जाने से बहुत आगे निकल चुकी है. बीते दिनों पुणे का केस देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ था जहाँ एक किशोर की तेज रफ़्तार कार से दो व्यक्तियों की मृत्यु हो गई. यहाँ गौरतलब ये है कि उस किशोर को जरा सा भी भय समाज का अथवा अपने परिवार का नहीं था कि उसके द्वारा नशे में कार को तेज रफ़्तार से चलाया जा रहा है, जबकि वह खुद नाबालिग है और अभी उसका कार ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं बना है. ऐसी गैर-कानूनी स्थिति से उस लड़के के भयभीत न होने की स्थिति उस समय स्पष्ट हो गई जबकि वह अपने अमीर पिता के रसूख के चलते न केवल जमानत पर रिहा हो गया बल्कि मेडिकल टेस्ट में भी एल्कोहल न होना पाया गया. इससे भी बड़ी बात ये हुई कि अदालत द्वारा उसको तीन सौ शब्दों का निबंध लेखन, कुछ दिनों यातायात पुलिस के साथ नियम-कानून सीखने का काम सजा के तौर पर मिला. एक और घटना के रूप में उत्तराखंड के एक स्कूल की घटना का जिक्र करना भी यहाँ आवश्यक हो जाता है जहाँ पर एक लड़के द्वारा अपनी ही कक्षा की चौदह वर्ष की लड़की का अश्लील वीडियो बनाकर वायरल कर दिया गया. बदनामी के डर से उस लड़की ने आत्महत्या कर ली. इस मामले में अदालत द्वारा उस लड़के को इस आधार पर जमानत नहीं दी गई क्योंकि अदालत ने उसे अनुशासनहीन माना और जमानत पर उसकी रिहाई को समाज के लिए खतरा बताया




ऐसी यही दो घटनाएँ ही नहीं हैं बल्कि लगभग रोज ही इस तरह की घटनाएँ हमारे आसपास हो रही हैं. यदि इन घटनाओं के मूल में देखें तो स्पष्ट रूप से समझ में आएगा कि जिस तरह की जीवन-शैली वर्तमान में होती जा रही है, उससे परिवार में, समाज में एक-दूसरे के लिए अब समय ही नहीं रह गया है. संयुक्त परिवारों के बिखरने के साथ-साथ सामाजिक ढाँचे में हुए विघटन ने भी अपने पड़ोसियों से संबंधों में मधुरता का, दायित्व का लोप करवा दिया है. इसके चलते भी मोहल्ले में, आसपास के घरों में बच्चों पर ध्यान दिए जाने की सामाजिकता समाप्त ही हो चुकी है. सामाजिक विकास के क्रम में अब जबकि ये पढ़ाया जाने लगा हो कि अभिभावक और बच्चे अब दोस्त हैं, बचपन की गोद में खेलते बच्चों को भी उनके स्टेटस का, उनकी इज्जत-बेइज्जती का पाठ सिखाया जाने लगा हो तो स्वाभाविक सी बात है कि बच्चों में, किशोरों में खुद में एक तरह का जिम्मेवार होने का भाव जागने लगता है. देखा जाये तो यह भाव-बोध उनको एक तरह की नकारात्मकता की तरफ ले जाता है. यही कारण है कि कम उम्र में नशे का शिकार हो जाना, तेज रफ़्तार से वाहन चलाना, शारीरिक संबंधों का बनाया जाना, रोमांचकता के लिए जीवन को खतरे में डालना, अपने शौक और थ्रिल के लिए आपराधिक कृत्य में संलिप्त हो जाना आदि सहजता से समाज में दिखने लगा है.

 

दरअसल कोरोनाकाल में लॉकडाउन के दौरान जिस तरह शिक्षा के लिए मोबाइल, कम्प्यूटर, इंटरनेट को बच्चों के लिए अनिवार्य सा बना दिया गया था, वह लॉकडाउन की समाप्ति के बाद यथावत बना हुआ है. इसका सुखद परिणाम सामने भले ही न आया हो मगर अनेकानेक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ मानसिक समस्याओं ने, सामाजिक समस्याओं ने, आपराधिक घटनाओं ने अवश्य ही जन्म ले लिया है. चौबीस घंटे इंटरनेट की, मोबाइल की उपलब्धता ने बच्चों, किशोरों को अपनी उम्र से पहले ही युवा कर दिया है. इसके इनके स्वभाव में, दैनिक-चर्या में फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, हैवानियत, नृशंसता, क्रूरता आदि का समावेश होता जा रहा है. इसकी दुखद परिणति हिंसक, आपराधिक घटनाओं के रूप में हम सभी आये दिन देख रहे हैं. समाज को जल्द से जल्द इस पर विचार करते हुए संस्कारित, सामाजिक वातावरण का निर्माण अपने ही परिवार से करना पड़ेगा. इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम से कम उपयोग करने का कदम उठाना होगा. शिक्षा, संस्कारों को मोबाइल, कम्प्यूटर के स्थान पर परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा, शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से दिए जाने का कार्य पुनः करना होगा.

 


28 फ़रवरी 2022

नशे की गिरफ्त में युवा

हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, एक गीत की ये पंक्ति आज के युवाओं को बहुत उत्साहित करती है. इस एक पंक्ति के उत्साह में वे जगह-जगहकहीं छिपे भाव मेंकहीं खुलेआम उन्मुत रूप में धुआँ उड़ाते दिख जाते हैं. धुआँ उड़ाते इन किशोरों को उस गीत की धुआँ उड़ाती पंक्ति तो उत्साहित कर जाती है मगर उसके ठीक पहले का हिस्सा याद नहीं रहता. वह हिस्सा जो साफ़-साफ़ कहता है कि मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, इस हिस्से को ये युवा भुलाने का काम कर रहे हैं. उनको इसका भान नहीं है कि गीत की पंक्तियों का अनुसरण करना और ज़िन्दगी की वास्तविकता के साथ चलना दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं. इसको जानने-समझने से इतर आज का युवा नशे की दुनिया में हँसते-मुस्कुराते हुए प्रवेश कर रहा है.


नशे की शौकिया प्रवृत्ति कब उनके लिए मजबूरी बन जाती है, इसकी उनको भनक तक नहीं लगती है. वे इसे भी ज़िन्दगी जीने का एक तरीका समझते रहते हैं. अपनी मस्ती, अपनी दुनिया, अपनी स्वतंत्रता में इन किशोरों अथवा युवाओं को आभास ही नहीं रहता है कि वे कब ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से ही खिलवाड़ करने लग जाते हैं. ऐसी स्थितियों के लिए पूरी तरह से युवाओं को अथवा किशोरों को दोष देना भी उचित प्रतीत नहीं होता है. देखा जाये तो भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के माता-पिता भी शामिल दिखाई देते हैं. लाड़-प्यार के चलते उनके लिए सभी अत्याधुनिक संसाधन सहज मुहैया करवा दिए जाते हैं. ऐसे में युवाओं को न तो धन की महत्ता समझ आती हैन समय कीन कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. इसी मानसिकता के कारण समाज की बहुसंख्यक युवा आबादी नशे की गिरफ्त में है.




नशा-मुक्त समाज की संकल्पना समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की चाह है. इसके बाद भीनशे के दुष्प्रभाव की जानकारी होने के बाद भी युवाओं में ही नहीं बल्कि समाज में नशे के प्रति आसक्ति लगातार बढती ही जा रही है. शादी-विवाह के समारोहकिसी भी हर्ष-उमंग का अवसर होनायुवाओं की अपनी मस्ती आदि अब बिना नशे के पूरी नहीं हो पाती है. कहीं न कहीं समाज में इस तरह के नशे को स्वीकार्यता मिल चुकी है. किसी भी तरह का आयोजन हो, छोटे-बड़े स्तर के क्लब या होटल हों सभी में किसी न किसी रूप में नशे की उपस्थिति देखने को मिलने लगी है. बहुत सी जगहों पर खुलेआम या चोरी-छिपे ड्रग्स पार्टियाँ, हुक्का बार आदि जैसी संकल्पना धरातल पर देखने को मिलती है.


जब समाज के एक बहुत बड़े वर्ग में ऐसी स्थिति की स्वीकार्यता होगी तो नशा-मुक्ति की अवधारणा पूरी तरह से सफल नहीं हो सकती है. नशा-मुक्त समाज की जितनी संकल्पना अभी तक सामने आई है उसके अनुसार सभी का एकमात्र विरोध उन नशीले तत्त्वों से है जो अवैध रूप से बाज़ार में चोरी-छिपे बेचे जा रहे हैं. विभिन्न ड्रग्स को लेकर समाज में एक तरह का विरोध लगातार देखने को मिलता है. देश के महानगरों से निकल-निकल कर अब ये बुराई दूर-दराज के गाँवों में भी पहुँच गई है. अनेक तरह की ड्रग्स अवैध तरीके से खरीदी-बेची जा रही हैसिगरेट-इंजेक्शन आदि के सहारे शरीर में पहुँचाई जा रही है. 


ये सोचने वाली बात है और अध्ययन का विषय होना चाहिए कि ऐसे नशीले पदार्थ बाज़ार में आ कैसे जा रहे हैंसुरक्षा एजेंसियां क्या महज नेताओं की सुरक्षा का जायजा लेने के लिए रह गई हैंक्या हमारा सुरक्षा तंत्र महज बचाव कार्यों के लिए ही प्रयुक्त होने लगा हैपहली बात तो ऐसे नशीले पदार्थों की आवक पर ध्यान देने की जरूरत हैउसके स्त्रोतों को पकड़ने की जरूरत हैइनको बाज़ार में खपाने वाले तत्त्वों को खोजने की जरूरत है. इसके साथ-साथ यह भी समझना होगा कि आखिर नशे की गिरफ्त में विशेष रूप से युवा वर्ग क्यों आ रहा हैइसके लिए समाज में युवाओं की, किशोरों की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरणवैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावनाजल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊंचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसाकम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. जहाँ घुस जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ केउन्नति केसमर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.


 सरकार कोसमाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फंस गया है उसको समझाने कीसँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सकेसामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सकेकर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे. 


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08 अक्टूबर 2021

नशे की गिरफ्त में युवा

हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, एक गीत की ये पंक्ति आज के किशोरों को बड़ा उत्साहित करती है. इस एक पंक्ति के उत्साह में वे जगह-जगह, कहीं छिपे भाव में, कहीं खुलेआम उन्मुत रूप में धुआँ उड़ाते दिख जाते हैं. शहर की एक सड़क के किनारे खुले तमाम सारे कोचिंग सेंटर्स के आसपास झुण्ड के झुण्ड में दिखते किशोर और उन झुंडों पर तैरते धुंए के बादल. ये किसी एक शहर का दृश्य नहीं होता आजकल, लगभग सभी शहरों में ऐसी स्थिति दिख रही है. धुआँ उड़ाते इन किशोरों को उस गीत की धुआँ उड़ाती पंक्ति तो उत्साहित कर जाती है मगर उसके ठीक पहले का हिस्सा याद नहीं रहता. वह हिस्सा जो साफ़-साफ़ कहता है कि मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, इस हिस्से को ये युवा, किशोर कई तरीके से भुलाने का काम कर रहे हैं. बिना फ़िक्र के फ़िक्र को उड़ाने की कोशिश और उसी कोशिश में तेज रफ़्तार बाइक के द्वारा ज़िन्दगी को भी उड़ाते जा रहे हैं.

 

आपको आश्चर्य लगे मगर सच यही है. रुके हैं तो धुंए में खोए हैं और चल रहे है तो हवा से बातें कर रहे हैं. ये एक तरह की जीवन-शैली बनती जा रही है आज के बहुसंख्यक युवाओं की, किशोरों की. ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से ही खिलवाड़ करते हुए इन बच्चों को आभास नहीं है कि वे क्या करने की कोशिश में अपने घर से बाहर निकलते हैं और क्या करने लग जाते हैं. भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के माता-पिता भी शामिल दिखाई देते हैं. लाड़-प्यार के चलते बच्चों के लिए सभी अत्याधुनिक संसाधन सहज मुहैया करवा दिए जाते हैं. ऐसे में बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती है, न समय की, न कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. माता-पिता के प्यार को, उनके द्वारा मेहनत से जुटाई जाने वाली सुविधाओं को, उनके द्वारा एक आवाज़ पर उपलब्ध करवाए जाने वाले संसाधनों को ये बच्चे अपना अधिकार सा समझते हैं. उनकी आवश्यकताओं की सहज पूर्ति हो जाने के कारण वे इसकी महत्ता तो समझते ही नहीं हैं, दूसरों को भी तिरस्कृत समझते हैं. 

 



समाज में युवाओं की, किशोरों की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरण, वैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावना, जल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊंचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसा, कम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. जहाँ घुस जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ के, उन्नति के, समर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.

 

सरकार को, समाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फंस गया है उसको समझाने की, सँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सके, सामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सके, कर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे. 


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06 अक्टूबर 2021

नशा मुक्त समाज की अवधारणा

फ़िल्मी सितारों के या फिर उनकी संतानों के किसी मामले में पकड़े जाने के बाद सम्बंधित मामला राष्ट्रव्यापी बन जाता है. इधर फ़िल्मी संसार के किंग खान कहे जाने वाले शाहरुख़ के पुत्र का नशे सम्बन्धी मामले में पकडे जाने के बाद चारों तरफ इसी की चर्चा है. बहुतेरे लोग इसे भी राजनैतिक रंग देकर, सांप्रदायिक रंग देकर मुख्य मुद्दे को दरकिनार करने की कोशिश में हैं. बहरहाल, क्या होगा शाहरुख़ के बेटे आर्यन का और क्या होगा आने वाले दिनों में नशीले पदार्थों के धंधे का, ये अभी इस एक प्रकरण से कह पाना मुश्किल है मगर कहीं न कहीं नशा-मुक्त समाज की आवश्यकता समझ आती है. अब चर्चा इस पर होनी चाहिए कि किस तरह से समाज को नशे की लत से दूर किया जाये?


नशा-मुक्त समाज की संकल्पना समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की चाह है. ऐसा होने के बाद भी, नशे के दुष्प्रभाव ज्ञात होने के बाद भी समाज में नशे के प्रति आसक्ति लगातार बढती ही जा रही है. शादी-विवाह के समारोह, किसी भी हर्ष-उमंग का अवसर होना, युवाओं की अपनी मस्ती आदि अब बिना नशे के पूरी नहीं हो पाती है. शराब के जाम छलकना, बीयर के झागों का बनना-बिगड़ना, सिगरेट के धुंए के छल्लों का हवा में उड़ना, तम्बाकू-पान की पीक की चित्रकारी अब आम बात लगती है. कहीं न कहीं समाज में और सरकार में इस नशे को स्वीकार्यता मिल चुकी है. अब इस तरह के नशे को लेकर उसके सार्वजनिक स्थलों पर, खुलेआम उपयोग पर कार्यवाही करने की खबरें आती हैं. समाज के लोग इसे समझते हैं और सरकारी तंत्र शराब की बिक्री बढ़ाने के साथ-साथ इसकी नकली बिक्री पर रोक लगाने का काम करती है. संभवतः लाइसेंस प्रक्रिया से गुजरने के कारण कहीं न कहीं शराब, सिगरेट, बीयर, तम्बाकू, गुटखा आदि को स्वीकार लिया गया है बस तनिक सामाजिकता के चलते शराब, बीयर के खुलेआम प्रयोग पर प्रशासन और आम नागरिक सक्रिय से दिखते हैं.

 


नशा-मुक्त समाज की जितनी संकल्पना अभी तक सामने आई है या फिर जितनी समझ में आई है उसके अनुसार सभी का एकमात्र विरोध उन नशीले तत्त्वों से है जो अवैध रूप से बाज़ार में चोरी-छिपे बेचे जा रहे हैं. विभिन्न ड्रग्स को लेकर समाज में एक तरह का विरोध लगातार देखने को मिलता है. देश के महानगरों से निकल-निकल कर अब ये बुराई दूर-दराज के गाँवों में भी पहुँच गई है. अनेक तरह की ड्रग्स अवैध तरीके से खरीदी-बेची जा रही है, सिगरेट-इंजेक्शन आदि के सहारे शरीर में पहुँचाई जा रही है. 


विभिन्न सरकारों की, सामाजिक संस्थाओं की, सामाजिक व्यक्तियों की समूची कवायद इसी नशे से मुक्ति की रही है किन्तु किसी का भी प्रयास एक बार भी इसके मूल को जानने की नहीं रही है. ये समझना होगा कि आखिर नशे की गिरफ्त में लोग, विशेष रूप से युवा वर्ग क्यों आ रहा है? ऐसे नशीले पदार्थ बाज़ार में आ कैसे जा रहे हैं? सुरक्षा एजेंसियां क्या महज नेताओं की सुरक्षा का जायजा लेने के लिए रह गई हैं? क्या हमारा सुरक्षा तंत्र महज बचाव कार्यों के लिए ही प्रयुक्त होने लगा है? पहली बात तो ऐसे नशीले पदार्थों की आवक पर ध्यान देने की जरूरत है, उसके स्त्रोतों को पकड़ने की जरूरत है, इनको बाज़ार में खपाने वाले तत्त्वों को खोजने की जरूरत है. यदि ऐसा होता है तो नशा-मुक्त समाज का बहुत बड़ा चरण अपने आप पूरा हो जायेगा.


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04 मार्च 2019

धुँए और रफ़्तार में सिमटती ज़िन्दगी


हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, एक गीत की ये पंक्ति आज के किशोरों को बड़ा उत्साहित करती है. इस एक पंक्ति के उत्साह में वे जगह-जगह, कहीं छिपे भाव में, कहीं खुलेआम उन्मुत रूप में सिगरेट फूँकते दिख जाते हैं. शहर की एक सड़क के किनारे खुले तमाम सारे कोचिंग सेंटर्स के आसपास झुण्ड के झुण्ड में दिखते किशोर और उन झुंडों पर तैरते धुंए के बादल. ये किसी एक शहर का दृश्य नहीं होता आजकल, लगभग सभी शहरों में ऐसी स्थिति दिख रही है. सिगरेट का धुआँ उड़ाते इन किशोरों को उस गीत की धुआँ उड़ाती पंक्ति तो उत्साहित कर जाती है मगर उसके ठीक पहले का हिस्सा याद नहीं रहता. वह हिस्सा जो साफ़-साफ़ कहता है कि मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया. इस हिस्से को ये युवा, किशोर कई तरीके से भुलाने का काम कर रहे हैं. बिना फ़िक्र के फ़िक्र को उड़ाने की कोशिश और उसी कोशिश में तेज रफ़्तार बाइक के द्वारा ज़िन्दगी को भी उड़ाते जा रहे हैं.


आपको आश्चर्य लगे मगर सच यही है. रुके हैं तो धुंए में खोए हैं और चल रहे है तो हवा से बातें कर रहे हैं. ये एक तरह की जीवन-शैली बनती जा रही है आज के बहुसंख्यक युवाओं की, किशोरों की. ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से ही खिलवाड़ करते हुए इन बच्चों को आभास नहीं है कि वे क्या करने की कोशिश में अपने घर से बाहर निकलते हैं और क्या करने लग जाते हैं. भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के माता-पिता भी शामिल दिखाई देते हैं. लाड़-प्यार के चलते बच्चों के लिए सभी अत्याधुनिक संसाधन सहज मुहैया करवा दिए जाते हैं. ऐसे में बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती है, न समय की, न कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. माता-पिता के प्यार को, उनके द्वारा मेहनत से जुटाई जाने वाली सुविधाओं को, उनके द्वारा एक आवाज़ पर उपलब्ध करवाए जाने वाले संसाधनों को ये बच्चे अपना अधिकार सा समझते हैं. उनकी आवश्यकताओं की सहज पूर्ति हो जाने के कारण वे इसकी महत्ता तो समझते ही नहीं हैं, दूसरों को भी तिरस्कृत समझते हैं. 

अक्सर ऐसे बहुत सारे बच्चों को कॉलेज आते-जाते समय, शाम को नियमित घूमने की अपनी आदत के समय देखते हैं. कई बार मौका ऐसा आता है कि कोई न कोई आकर टकरा जाता है. कोई हमसे टकराता है, कोई कभी डिवाइडर से टकराता है, कभी किसी दूसरे वाहन से टकराता है. समझाने की स्थिति में उनके द्वारा ऐसा व्यवहार देखने को मिलता है जैसे लगता है कि बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो. उनके हाव-भाव ऐसे लगते हैं जैसे कई सारी जिंदगियां उनके माता-पिता ने पैसे के बल पर खरीद कर अपनी अलमारी में सुरक्षित कर रखी हैं. एक ये चली जाएगी तो दूसरी वाली से काम चला लेंगे. बहरहाल, ये बच्चे दूसरे के समझाने से क्या ही समझेंगे, जब कि वे अपने ही माता-पिता की बात नहीं समझ रहे हैं. कहना न होगा कि धुँए और रफ़्तार के सहारे ये युवा, किशोर ज़िन्दगी की खतरनाक यात्रा ही कर रहे हैं. इससे वे अभी भले ज़िन्दगी का साथ निभा पायें मगर भविष्य में ज़िन्दगी अवश्य ही उनका साथ देने में आनाकानी करने लगेगी.

31 दिसंबर 2014

मोमबत्तियाँ.. जाम.. होंठों की जुगलबन्दियाँ.. लड़खड़ाते मदमस्त बदन... शो मस्ट गो ऑन



अभी समापन नहीं हुआ मगर सेज सज गई है आगमन की. स्वागत को तैयार हैं रंगीन जगमग बत्तियाँ, छलकने को बेताब हैं जाम से बाहर आने को मदमस्त पेय, थिरकने को सज-संवर चुकी हैं अल्लहड़ जवानियाँ, बेहूदा शोर अपने आपको वातावरण में बिखेर देने को छटपटा रहा है. कल तक शाम को निकला पड़ते थे जो झुण्ड, समूह हाथों में मोमबत्तियाँ-तख्तियाँ लेकर आज वे ही लबरेज होंगे नई-नई अदाओं से. ये आयोजन कोई साधारण आयोजन नहीं, स्वागत है इक्कीसवीं सदी के एक और वर्ष का. कितना मस्तमौला माहौल, सब कुछ विस्मृत कर देने की हद तक पहुँच जाने का जूनून. लगता नहीं कि जिन आँखों में आज रात मादकता तैर रही होगी, उन आँखों ने किसी की मौत पर आँसू बहाए थे; ये अंदाज़ा लगाना कठिन होगा कि जो हाथ लड़खड़ाते जिस्मों को संभालने को आतुर हो रहे होंगे, वे हाथ किसी की सहायता के लिए उठे थे; कितना दुष्कर होगा उन लरजते होंठों से होंठों का मिलन जिन होंठों से किसी शोषित को न्याय दिलाने की आवाज़ उठी थी.
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उफ़..!!! एक झटके में दुःख, दर्द को बिसराकर अपने में सिमट जाने का हुनर हम भारतीयों में कबसे, कैसे आ गया; वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा के मध्य एक मैं और एक तू की संकल्पना ने कैसे जन्म ले लिया; मानसिक आकर्षण से इतर शारीरिक निकटता की भावभूमि कब यहाँ बनकर तैयार हो गई पता ही नहीं चला. इस पता नहीं चलने वाली दुरुहता के मध्य ये भी संशय बनने लगा कि क्या अब हम वाकई आभासी रिश्तों, संबंधों की इमारत तैयार करने में लगे हुए हैं? क्या अब हमारी संवेदनाओं, शुभकामनाओं, मंगलकामनाओं आदि का कोई मोल नहीं रह गया है? आयोजनों की औपचारिकताओं में सिमटती चली जा रही जिंदगी में क्या शुभकामनाओं के आदान-प्रदान में भी औपचारिकता का सम्मिश्रण होने लगा है? क्यों साल-दर-साल शुभकामनायें देने-लेने के बाद भी सुख हमसे कोसों दूर है; क्यों हमारी बेटियाँ आज भी असुरक्षित हैं; क्यों हमारे परिवारों पर कष्टों का साया है; क्यों हमारी आँख में आंसुओं की धारा है? क्यों-क्यों-क्यों??
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ऐसे और भी सवाल हैं जो नववर्ष के आयोजन के सीने पर चिपक जाते हैं किन्तु... किन्तु तो किन्तु है, कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. मृत्यु तो नितांत सत्य है, मरना-जीना नितांत प्राकृतिक है, आना-जाना एक चक्र है. इस प्राकृतिक चक्र के लिए दुनिया का परिचालन रुकता नहीं, रोका जाता हैं. दिन की रौशनी से रात को गुलजार नहीं किया जाता और रात के अंधेरों को दिन की कालिख नहीं बनाया जाता. लोग कल भी मरते थे, लोग आज भी मर रहे हैं, लोग कल भी मरते रहेंगे. मोमबत्तियाँ जलाने वाले हर कालखंड में मिलेंगे, श्रद्धा-पुष्प प्रत्येक कालखंड में अर्पित किये जाते रहेंगे. शोक के साथ हर्ष का साम्य ही ज़िन्दगी की जीवन्तता की निशानी है. तो फिर... जस्ट चिल यार... कम ऑन कूल ड्यूड.... शो मस्ट गो ऑन, कल जिन हाथों में मोमबत्तियाँ-तख्तियाँ थी, आज छलकते जाम होंगे, मदमस्त-लड़खड़ाते बदन होंगे; कल जो होंठ चीख रहे थे न्याय के लिए, आज वो आपसी जुगलबंदी में मगन होंगे. कल जो-जो हो रहा था, वो कल फिर-फिर होगा... बस आज की रात जश्न ही जश्न होगा. सब कुछ बिसराने का मौसम होगा.

16 दिसंबर 2014

नशा-मुक्त समाज स्थापना से पूर्व



नशा-मुक्त समाज की संकल्पना मोदी जी की देन नहीं है वरन समाज का प्रत्येक जागरूक व्यक्ति चाहता है कि समाज नशा-मुक्त रहे, यहाँ तक कि नशे के लती व्यक्ति भी नहीं चाहते हैं कि उनकी संतानें नशे की गिरफ्त में आयें. ऐसा होने के बाद भी, नशे के दुष्प्रभाव ज्ञात होने के बाद भी समाज में नशे के प्रति आसक्ति लगातार बढती ही जा रही है. शादी-विवाह के समारोह, किसी भी हर्ष-उमंग का अवसर होना, युवाओं की अपनी मस्ती आदि अब बिना नशे के पूरी नहीं हो पाती है. शराब के जाम छलकना, बीयर के झागों का बनना-बिगड़ना, सिगरेट के धुंए के छल्लों का हवा में उड़ना, तम्बाकू-पान की पीक की चित्रकारी अब आम बात लगती है. कहीं न कहीं समाज में और सरकार में इस नशे को स्वीकार्यता मिल चुकी है. अब इस तरह के नशे को लेकर उसके सार्वजनिक स्थलों पर, खुलेआम उपयोग पर कार्यवाही करने की खबरें आती हैं. समाज के लोग इसे समझते हैं और सरकारी तंत्र शराब की बिक्री बढ़ाने के साथ-साथ इसकी नकली बिक्री पर रोक लगाने का काम करती है. संभवतः लाइसेंस प्रक्रिया से गुजरने के कारण कहीं न कहीं शराब, सिगरेट, बीयर, तम्बाकू, गुटखा आदि को स्वीकार लिया गया है बस तनिक सामाजिकता के चलते शराब, बीयर के खुलेआम प्रयोग पर प्रशासन और आम नागरिक सक्रिय से दिखते हैं.
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नशा-मुक्त समाज की जितनी संकल्पना अभी तक सामने आई है या फिर जितनी समझ में आई है उसके अनुसार सभी का एकमात्र विरोध उन नशीले तत्त्वों से है जो अवैध रूप से बाज़ार में चोरी-छिपे बेचे जा रहे हैं. विभिन्न ड्रग्स को लेकर समाज में एक तरह का विरोध लगातार देखने को मिलता है. देश के महानगरों से निकल-निकल कर अब ये बुराई दूर-दराज के गाँवों में भी पहुँच गई है. अनेक तरह की ड्रग्स अवैध तरीके से खरीदी-बेची जा रही है, सिगरेट-इंजेक्शन आदि के सहारे शरीर में पहुँचाई जा रही है. विभिन्न सरकारों की, सामाजिक संस्थाओं की, सामाजिक व्यक्तियों की समूची कवायद इसी नशे से मुक्ति की रही है किन्तु किसी का भी प्रयास एक बार भी इसके मूल को जानने की नहीं रही है. ये समझना होगा कि आखिर नशे की गिरफ्त में लोग, विशेष रूप से युवा वर्ग क्यों आ रहा है? ऐसे नशीले पदार्थ बाज़ार में आ कैसे जा रहे हैं? सुरक्षा एजेंसियां क्या महज नेताओं की सुरक्षा का जायजा लेने के लिए रह गई हैं? क्या हमारा सुरक्षा तंत्र महज बचाव कार्यों के लिए ही प्रयुक्त होने लगा है? पहली बात तो ऐसे नशीले पदार्थों की आवक पर ध्यान देने की जरूरत है, उसके स्त्रोतों को पकड़ने की जरूरत है, इनको बाज़ार में खपाने वाले तत्त्वों को खोजने की जरूरत है. यदि ऐसा होता है तो नशा-मुक्त समाज का बहुत बड़ा चरण अपने आप पूरा हो जायेगा.
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इसके साथ-साथ समाज में युवाओं की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरण, वैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावना, जल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊंचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसा, कम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. जहाँ घुस जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ के, उन्नति के, समर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.
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सरकार को, समाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फंस गया है उसको समझाने की, सँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सके, सामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सके, कर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे.