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20 मार्च 2019

मारना भी है, बचाना भी है


सोशल मीडिया के दौर में किसी भी व्यक्ति की निगाह से कोई दिवस बचकर निकल जाये, ऐसा हो नहीं सकता. अनेक दिवस तो ऐसे हैं जिनको विशुद्ध नक़ल करने की दृष्टि से मनाया जा रहा है, कुछ दिवस ऐसे हैं जिनको वास्तविकता में गंभीरता से मनाया जाना चाहिए मगर उनमें औपचारिकता की जा रही है और कुछ दिवस तो नितांत भेड़चाल के चलते मनाये जा रहे हैं. इसी भेड़चाल की तरह से मनाये जाने वाले दिवसों में विश्व गौरैया दिवस है. आज, 20 फरवरी को इसे मनाया जाता है, गौरैयों को बचाने का सन्देश देने के लिए. समाज भी कितना औपचारिक हो गया है. सन्देश को ग्रहण कर लेता है, आदान-प्रदान कर देता है और फिर अपने आपको गौरैया बचाने के अभियान का महत्त्वपूर्ण अंग समझने लगता है. असलियत यह है कि तरक्की पसंद इंसान ने तकनीक का प्रयोग करते हुए मानवीय रिश्तों को विस्मृत किया ही है जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों के प्रति भी कुछ ज्यादा ही असंवेदनशील हुआ है. ये और बात है कि सोशल मीडिया पर प्रचार की खातिर वह संवेदित नजर आने लगा है. यहाँ ये समझना थोड़ा मुश्किल ही प्रतीत होता है कि उसकी संवेदनशीलता वास्तविक है अथवा इसमें भी प्रचार-नाम-यश की भूख छिपी हुई है.


कुछ संवेदित लोग गौरैया बचाने को निकल पड़े हैं. शहरों के बीच से वृक्षों को समाप्त करके कंक्रीट के जंगल खड़े देने वाले लोग, घरों से खुलापन, लॉन का अस्तित्व मिटा देने वाले लोग चिंतातुर हैं कि अब गौरैया उनके घरों में, उनके आँगन में दिखाई नहीं देती. ऐसे लोगों से सवाल महज इतना कि पहले वे लोग ही बताएं कि उनमें से कितने लोगों ने अपने-अपने बहुमंजिला मकानों में आँगन रख छोड़े हैं? गौरैया की चिंता में व्याकुल लोग जरा इस बात पर प्रकाश डालें कि उनमें से कितने फिक्रमंद अपने-अपने घरों की छतों पर नियमित रूप से जाते हैं? गौरैया के घोंसले के लिए चिंता करने वाले अपने दिल पर हाथ रखकर बताएं कि कितने लोग हैं जिन्होंने अपने-अपने घरों के भीतर गौरैया को घोंसला बनाने दिया है?

गौरैया बचाने के पहले ये समझना आवश्यक है कि गौरैया समाप्त क्यों होने लगी हैं? क्यों उनका घर-आँगन में फुदकना, चहचहाना बंद सा हो गया है? इसको समझने के लिए न तो जीव-जंतु विशेषज्ञ होना आवश्यक है और न ही किसी शास्त्र का विद्वान वरन साधारण सी सामाजिकता का होना आवश्यक है. नितांत साधारण सी बात है कि गौरैया सदैव से स्वच्छ वातावरण में रहना पसंद करती रही है. उसने अपने घोंसले के निर्माण के लिए घरों को, खिड़कियों को, बरामदे के किनारों को, मकान की खाली, अनुपयोगी जगह को प्राथमिकता में रखा है. अब अपने आसपास नजर दौड़ाने पर पता चलता है कि स्वच्छता तो हमने रहने ही नहीं दी है. गाड़ियों के धुँए ने प्रदूषण को बढ़ाया है तो शहर के किनारे बनते-उगते आये छोटे-छोटे कल-कारखानों ने उगलते धुँए ने भी वातावरण को, हवा को जहरीला किया है. ऐसी जहरीली हवा में जहाँ इंसान सांस लेने में कष्ट का अनुभव कर रहा है तो वहां कोमल स्वभाव वाली गौरैया की तकलीफ को सोचा जा सकता है. इसके साथ-साथ कानफोडू शोर के चलते भी गौरैया को मानवीय समाज के साथ अपना समाज विकसित करने में समस्या उत्पन्न हो रही है. शांत माहौल में चहचहाने वाली, फुदकने वाली गौरैया के अस्तित्व के लिए ये शोरगुल नकारात्मक भूमिका निभा रहा है. वातावरण की अस्वच्छता, प्रदूषण, शोरगुल, मोबाइल रेडियेशन आदि के चलते गौरैया के अस्तित्व पर संकट के बादल गहराने लगे हैं.


गौरैया बचाने की मुहिम छेड़ने वालों को भी भली-भांति ये सारे तत्त्व ज्ञात हैं, इसके बाद भी बिना किसी ठोस, सकारात्मक प्रयासों के गौरैया बचाने की मुहिम चलाई जा रही है, गौरैया के लिए मानव-निर्मित घोंसले बनाये जा रहे हैं, छतों पर, मुंडेरों पर गौरैया के लिए दाना-पानी का बंदोवस्त करने के सन्देश छोड़े जा रहे हैं. किसी पक्षी के अस्तित्व की रक्षा के लिए ये बेहतर प्रयास कहे जा सकते हैं मगर तब जबकि इनके पीछे महज प्रचार पाने की लालसा न हो, महज फोटो खिंचवाने की लालसा न हो. यदि वाकई में गौरैया को बचाने के प्रयास करने हैं तो हमें वातावरण को स्वच्छ रखने की कोशिश करनी चाहिए. पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने के कदम उठाये जाने चाहिए. मोबाइल रेडियेशन को कम से कम करने का प्रयास करना चाहिए. ऐसे में फिर सवाल, कि क्या वाकई में इंसान ऐसा कर पायेगा? क्या वाकई ऐसा कर पाने की मानसिकता को पैदा कर पायेगा? यदि इंसान अपने वातावरण को, पर्यावरण को, हवा-पानी को, जंगल-जमीन आदि को बचाने के लिए आगे न आया तो गौरैया को चील, गिद्ध, बाज, नीलकंठ, कठफोड़वा, टिटहरी, कौआ आदि की तरह विलुप्त सा करेगा ही साथ ही अपने अस्तित्व को भी विलुप्त करेगा.  

20 मार्च 2018

हमारे आँगन आज भी खेलती है गौरैया


आज, २० मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है. वर्तमान परिदृश्य जिस तरह का है उसमें वर्तमान पीढ़ी के बहुत से बच्चों ने गौरैया को देखा भी नहीं होगा. ऐसे बच्चों-युवाओं के लिए गौरैया तस्वीरों में, फिल्मों में देखने वाला पक्षी बन गया है. महानगरों में, मेट्रो शहरों के अलावा ऐसे शहर जहाँ आधुनिक सभ्यता तेजी से फैलती जा रही है वहाँ मानव का विकास तो हुआ मगर गौरैया का विनाश होता चला गया. गौरैया अचानक ही हम लोगों के जीवन से गायब नहीं हुई है. सत्तर-अस्सी के दशक में जन्म लेने वाली पीढ़ी ने तो गौरैया के साथ अपना बचपन गुजारा है, संभव है कि कहीं-कहीं नब्बे के दशक में जन्मे लोगों ने भी गौरैया के साथ थोडा-बहुत खेलकूद कर लिया हो. इसके बाद की जन्मी पीढ़ी ने बमुश्किल गौरैया को देखा-सुना होगा. 


आज तो गौरैया हमारे घरों के आँगन, छतों में मिलना तो बहुत दूर की बात होती जा रही है, वह शहर में भी गिनी-चुनी संख्या में, गिनी-चुनी जगहों पर दिखाई दे रही है. जिन लोगों ने भी इसके साथ अपना बचपन बिताया है, अपने दिन बिताये हैं उन्हें भली-भांति याद होगा कि इस नन्हीं चिड़िया का जीवन-चक्र इंसानी माहौल के बीच, मानव-परिजनों के बीच ही बीतता था. परिवार के छोटे-बड़े कामों में घर की छत, आँगन का उपयोग किया जाता था. रोजमर्रा के कामों के साथ-साथ किसी भी तरह के आयोजनों में खाद्य-पदार्थों का समूचा प्रक्रम घर-परिवार के बीच ही संपन्न होता था. गेंहू, अनाज का धोना-सुखाना, अचार, पापड़, चिप्स आदि के बनाये जाने, उनके सुखाये जाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया घर के छत-आँगन में ही संपन्न होती थी. इसके अलावा परिजनों का भोजन करना एकसाथ होता था और वो भी घर के बरामदे में, खुले में ही. सर्दियों में तो छत या खुली जगह पूरे परिवार की डायनिंग टेबल बन जाया करती थी. ऐसे में जहाँ पूरा परिवार एकसाथ बैठकर अपना पेट भर रहा हो उस नन्हीं गौरैया का परिवार कैसे भूखा रह जाता? थालियों, कटोरियों के बीच से उसके नन्हे से पेट के लिए खाद्य-सामग्री सहज रूप से स्वतः ही निकलती रहती थी.


इधर अब मानव गौरैया को बचाने की वकालत करने में लगा है, उसके पहले वह ये तो जान ले कि इस नन्हे पक्षी को विलुप्त पक्षी की श्रेणी में खड़ा करने वाला भी वही इन्सान है. गाँव वीरान होते जा रहे हैं. छोटे शहर बड़े शहरों की नक़ल करने में लगे हैं. बड़े शहर महानगर बनते जा रहे हैं. महानगर मेट्रो बनने की दौड़ में शामिल हैं. ऐसे में चारों तरफ कंक्रीट के जंगल ही खड़े दिखाई देते हैं. छोटे-छोटे, खुले मकानों की जगह पर बड़ी-बड़ी इमारतें, बहुमंजिली इमारतें, दबड़े, जेलनुमा अपार्टमेंट्स दिखाई देने लगे हैं. जंगल तो लगातार समाप्त होते ही जा रहे हैं, शहरों में से भी बड़ी तेजी से पार्क, बाग़-बगीचे, पेड़-पौधे विलुप्त हो रहे हैं. बड़े-बड़े पेड़ों के समाप्त होने के साथ-साथ घरों में से रोशनदान भी समाप्त हो चुके हैं. आँगन-छतें तो पहले से ही गायब हैं. आधुनिकता के चलते एक तिनका भी घर के कोने में न देखने वाला इन्सान गौरैया का घोंसला कैसे बर्दाश्त कर सकता है. परिणामस्वरूप घोंसला-विहीन गौरैया कहाँ, कैसे अपने अंडे देती? कहाँ उन्हें सेती? कैसे बच्चे उनमें से जन्म लेते?


इन सबके अलावा मोबाइल टावर से होने वाले रेडियेशन ने भी गौरैया को नुकसान पहुँचाया है. इसी तरह से ग्लोबल वार्मिंग के चलते बढ़ते तापमान ने भी उसकी जान ली है. हम लोग यदि चंद छोटे-छोटे सकारात्मक, सार्थक कदम उठा लें तो आज भी बची-खुची गौरैयाओं के सहारे उनकी संख्या को बढ़ाया जा सकता है. यदि हमारा घर आज भी ऐसी स्थिति में है जहाँ अहाता है, खुला स्थान है तो वहां गौरैया के घोंसले बनाने लायक जगह की व्यवस्था की जा सकती है. यदि हमारा घर छोटा है तो उसकी बालकनी में, खिड़की के रोशनदान में इन चिड़ियों को आहार और घरौदें बनाने के लिए कृत्रिम घरौंदों की व्यवस्था कर सकते हैं. उनके लिए पानी, खाद्य-पदार्थ का इंतजाम कर सकते हैं. घरों में सुरक्षित स्थानों पर गौरैया के घोंसले बनाने वाली जगहों का विकास किया जा सकता है और ऐसा न होने पर लकड़ी, प्लास्टिक के डिब्बों या मिट्टी के घोंसले बनाकर लटकाये जा सकते हैं.

आज की पीढ़ी यदि इस लेख को पढ़ेगी तो समझ ही नहीं सकेगी कि किसकी बात हो रही है? उनकी जानकारी के लिए संक्षिप्त रूप में, घरेलू गौरैया एक ऐसा पक्षी है जो यूरोप और एशिया में सामान्य रूप से हर जगह पाया जाता है. शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह ही प्रजातियां पाई जाती हैं. ये हैं हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो. इनमें हाउस स्पैरो को ही गौरैया कहा जाता है. यह शहरों में ज्यादा पाई जाती हैं. यह एक छोटी चिड़िया है जो हल्की भूरे रंग की होती है. इसके शरीर पर छोटे-छोटे पंख, हलकी पीली चोंच व हलके पीले रंग के पैर होते हैं. नर गोरैया की पहचान उसके गले के पास बने काले धब्बे से होती है. मादा गौरैया में ऐसा धब्बा नहीं पाया जाता. नर गौरैया के सिर का ऊपरी भाग, नीचे का भाग और गालों पर पर भूरे रंग का होता है. गला चोंच और आँखों पर काला रंग होता है और पैर भूरे होते हैं. मादा के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होता है. बहुत सी जगहों पर नर गौरैया को चिड़ा और मादा चिड़ी या चिड़िया भी कहते हैं. सामान्यतः यह चिड़िया हमारे घरों के आसपास रहना पसंद करती है.


अपने आसपास रहने वाले इस पक्षी के बिना हम सबको बुरा लगता है, लगना भी चाहिए. हम लोगों के साथ खेलकूद कर अपना जीवन हम लोगों के साथ गुजारने वाली ये नन्हीं गौरैया आज कभी-कभार ही दिखाई देती है. वह फिर से हमारे साथ रहे. फिर से हमारे साथ खाए-पिए. फिर से हमारे साथ छत-आँगन में टहले-उड़े. यदि यह सब संभव करना है तो हम इंसानों को अपनी जीवन-शैली में कुछ बदलाव करने होंगे. नन्हीं गौरैया को बचाने के लिए कुछ सार्थक, ठोस कदम उठाने होंगे.

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सारे चित्र लेखक द्वारा कैमरे से निकाले हुए हैं.

21 मार्च 2016

मारो और बचाओ

तरक्की पसंद इंसान के चेतना के द्वार विगत कुछ वर्षों से कुछ अधिक ही खुल रहे हैं. तकनीक का प्रयोग करते हुए जहाँ वो मानवीय रिश्तों के प्रति कुछ हद तक असंवेदनशील हुआ है तो जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों के प्रति कुछ ज्यादा ही संवेदित हुआ है. यहाँ ये समझना थोड़ा मुश्किल ही प्रतीत होता है कि उसकी संवेदनशीलता वास्तविक है अथवा इसमें भी प्रचार-नाम-यश की भूख छिपी हुई है. कुछ वर्षों पहले बाघ बचाने की मुहिम चली थी और एक-दो वर्षों के तमाम हथकंडे अपनाये जाने के बाद बताया गया कि बाघों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गई है. आश्चर्य इसका था कि विज्ञापनों, टीवी चैनलों आदि के माध्यम से होते प्रचार से प्रभावित होकर ऐसे-ऐसे लोग, ऐसे-ऐसे क्षेत्रों में बाघ बचाओ मुहिम के लिए निकल पड़े थे, जहाँ बाघों का कभी भी कोई नामोनिशान नहीं था. अब कुछ संवेदित लोग गौरैया बचाने को निकल पड़े हैं. शहरों के बीच से वृक्षों को समाप्त करके कंक्रीट के जंगल खड़े देने वाले लोग, घरों से खुलापन, लॉन का अस्तित्व मिटा देने वाले लोग चिंतातुर हैं कि अब गौरैया उनके घरों में, उनके आँगन में दिखाई नहीं देती. ऐसे लोगों से सवाल महज इतना कि पहले वे लोग ही बताएं कि उनमें से कितने लोगों ने अपने-अपने बहुमंजिला मकानों में आँगन रख छोड़े हैं? गौरैया की चिंता में व्याकुल लोग जरा इस बात पर प्रकाश डालें कि उनमें से कितने फिक्रमंद अपने-अपने घरों की छतों पर नियमित रूप से जाते हैं? गौरैया के घोंसले के लिए चिंता करने वाले अपने दिल पर हाथ रखकर बताएं कि कितने लोग हैं जिन्होंने अपने-अपने घरों के भीतर गौरैया को घोंसला बनाने दिया है?

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गौरैया बचाने के पहले ये समझना आवश्यक है कि गौरैया समाप्त क्यों होने लगी हैं? क्यों उनका घर-आँगन में फुदकना, चहचहाना बंद सा हो गया है? इसको समझने के लिए न तो जीव-जंतु विशेषज्ञ होना आवश्यक है और न ही किसी शास्त्र का विद्वान वरन साधारण सी सामाजिकता का होना आवश्यक है. नितांत साधारण सी बात है कि गौरैया सदैव से स्वच्छ वातावरण में रहना पसंद करती रही है. उसने अपने घोंसले के निर्माण के लिए घरों को, खिड़कियों को, बरामदे के किनारों को, मकान की खाली, अनुपयोगी जगह को प्राथमिकता में रखा है. अब अपने आसपास नजर दौड़ाने पर पता चलता है कि स्वच्छता तो हमने रहने ही नहीं दी है. गाड़ियों के धुँए ने प्रदूषण को बढ़ाया है तो शहर के किनारे बनते-उगते आये छोटे-छोटे कल-कारखानों ने उगलते धुँए ने भी वातावरण को, हवा को जहरीला किया है. ऐसी जहरीली हवा में जहाँ इंसान सांस लेने में कष्ट का अनुभव कर रहा है तो वहां कोमल स्वभाव वाली गौरैया की तकलीफ को सोचा जा सकता है. इसके साथ-साथ कानफोडू शोर के चलते भी गौरैया को मानवीय समाज के साथ अपना समाज विकसित करने में समस्या उत्पन्न हो रही है. शांत माहौल में चहचहाने वाली, फुदकने वाली गौरैया के अस्तित्व के लिए ये शोरगुल नकारात्मक भूमिका निभा रहा है.
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वातावरण की अस्वच्छता, प्रदूषण, शोरगुल आदि के साथ तकनीक के विकास-क्रम में इंसान ने अपना विकास तो किया मगर जीव-जंतुओं के लिए संकट ही पैदा किया है. इस विनाश-क्रम में इंसान ने एक कदम की और वृद्धि की है, जबकि मोबाइल रेडियेशन के चलते भी गौरैया के अस्तित्व पर संकट के बादल गहराने लगे हैं. गौरैया बचाने की मुहिम छेड़ने वालों को भी भली-भांति ये सारे तत्त्व ज्ञात हैं, इसके बाद भी बिना किसी ठोस, सकारात्मक प्रयासों के गौरैया बचाने की मुहिम चलाई जा रही है, गौरैया के लिए मानव-निर्मित घोंसले बनाये जा रहे हैं, छतों पर, मुंडेरों पर गौरैया के लिए दाना-पानी का बंदोवस्त करने के सन्देश छोड़े जा रहे हैं. किसी पक्षी के अस्तित्व की रक्षा के लिए ये बेहतर प्रयास कहे जा सकते हैं मगर तब जबकि इनके पीछे महज प्रचार पाने की लालसा न हो, महज फोटो खिंचवाने की लालसा न हो. यदि वाकई में गौरैया को बचाने के प्रयास करने हैं तो हमें वातावरण को स्वच्छ रखने की कोशिश करनी चाहिए. पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने के कदम उठाये जाने चाहिए. मोबाइल रेडियेशन को कम से कम करने का प्रयास करना चाहिए. ऐसे में फिर सवाल, कि क्या वाकई में इंसान ऐसा कर पायेगा? क्या वाकई ऐसा कर पाने की मानसिकता को पैदा कर पायेगा? यदि इंसान अपने वातावरण को, पर्यावरण को, हवा-पानी को, जंगल-जमीन आदि को बचाने के लिए आगे न आया तो गौरैया को चील, गिद्ध, बाज, नीलकंठ, कठफोड़वा, टिटहरी, कौआ आदि की तरह विलुप्त सा करेगा ही साथ ही अपने अस्तित्व को भी विलुप्त करेगा. वैसे भी ‘बेटी बचाओ’ के द्वारा वह अपने अस्तित्व को बचाने की मुहिम में लगा ही हुआ है.
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20 मार्च 2013

गौरैया से गुलज़ार आज भी हमारा आँगन



अभी-अभी हमारे एक मित्र का फोन आया कि आज गौरैया दिवस है. एक-दो फोटो-वोटो चिपका दो. हमने कहा कि पहले मरवा डाली अब उनकी तस्वीर चिपकाते फिरो.

सब लोग चाहे कितना भी खाली-खाली महसूस करते हों गौरैया के लिए पर हम इस मामले में घनघोर धनी हैं. हमारे घर पर पर्याप्त संख्या में ये उपस्थित हैं..कई ने तो घोंसले बनाकर अपना स्थायी बसेरा सा कर लिया है.

इन्हीं में से दो-चार की फोटो.......हमारे घर के ठीक सामने की....