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22 मार्च 2026

पानी की बर्बादी को रोकना होगा

मनुष्य के लिए पानी हमेशा से एक महत्वपूर्ण और जीवन-दायक पेय रहा हैये बात हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है. इसके साथ ही इस बात से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं कि कि जल सभी के जीवित रहने के लिए अनिवार्य है. ऐसा माना जाता है कि मनुष्य बिना भोजन के लगभग दो माह तक जीवित रह सकता है किन्तु बिना पानी के एक सप्ताह भी जीवित रहना मुश्किल है. इधर मानवीय क्रियाकलापों के कारण धरती लगातार पेयजल-विहीन होती जा रही है. जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से विश्व भर में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत कीजिसकी घोषणा वर्ष 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में की गई. इसके अंतर्गत सर्वप्रथम वर्ष 1993 में 22 मार्च के ही दिन सम्पूर्ण विश्व में जल संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता लाने का कार्य किया गया. 



पूरी धरती के 70 प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी इसका कुल एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. आज सभी को जल की उपलब्धता करवाना मुख्य मुद्दा है. आने वाले समय में बिना जल-संरक्षण के ऐसा कर पाना कठिन कार्य होगा. इस दृष्टि से जल संरक्षण भी एक बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति भी एक मुद्दा बना हुआ है क्योंकि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इसके चलते संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष 35 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. विकासशील देशों में जल से उत्पन्न रोगों को कम करना स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है. आज हमारा देश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व जल-संकट से जूझ रहा है. जल सहयोग के रूप में प्रमुख कार्य पानी के बारे में जागरूकता बढाने और उसकी अहमियत की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का होना चाहिए. जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी होगी और पानी की बर्बादी को रोकना होगा. इसके अतिरिक्त वर्षा जल के संरक्षण के उपाय खोजने होंगे तथा घरेलू उपयोग में भी जल-संरक्षण के प्रति सचेत होना पड़ेगा. यदि हम आज इसका उपयोग सावधानी एवं किफायत से न करेंगे तो भविष्य में स्थिति अत्यंत ही गंभीर हो सकती है.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल करअव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता हैशेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबोंजलाशयोंकुँओं आदि को गन्दगी सेकूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव होनए-नए तालाबोंकुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर परसीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैंउपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगेभविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.

12 सितंबर 2025

जल के साथ न खेलें खेल

हम सभी को संभवतः याद हो कि कुछ समय पूर्व खबर आई थी कि चेन्नई देश का पहला ऐसा शहर हो गया है जहाँ भूमिगत जल पूरी तरह से समाप्त हो गया है. यह खबर चौंकाने से ज्यादा डराने वाली होनी चाहिए थी मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. इस खबर ने हम लोगों को न ही चौंकाया और न ही डराया. इसे एक समाचार की तरह, एक जानकारी की तरह देखने-सुनने के बाद जल के साथ खेल करना जारी रखा. यह असंवेदनशीलता तब है जबकि हम सभी को जानकारी है कि धरती के सत्तर प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी मात्र एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. ऐसा अनुमान है कि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इस अनुपलब्धता के कारण संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष पैंतीस लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है.

 

जल-संकट की स्थिति को यदि अपने देश के सन्दर्भ में देखे तो वर्तमान में लगभग बीस करोड़ भारतीयों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं हो पाता है. नगरों में भूगर्भीय जल का अत्यधिक दोहन होने के कारण शहरी क्षेत्र जल-संकट से परेशान हैं. पेयजल की कमी होने से एक तरफ पेयजल संकट बढ़ा है वहीं दूसरी तरफ पानी की लवणीयता भी बढ़ी है. देश में औद्योगीकरण ने, जनसंख्या की तीव्रतम वृद्धि ने जल-संकट उत्पन्न किया है. प्रतिदिन बढ़ती जनसंख्या के आँकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद प्रतिव्यक्ति पानी की उपलब्धता में साठ प्रतिशत की कमी आयी है. सरकार के नीति आयोग ने जल संकट के प्रति आगाह करने वाली कंपोज़िट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्सए नेशनल टूल फॉर वाटर मेज़रमेंटमैनेजमेंट ऐंड इम्प्रूवमेंट नामक एक रिपोर्ट  में माना था कि भारत अपने इतिहास के सबसे भयंकर जल संकट से जूझ रहा है. देश के क़रीब साठ करोड़ लोगों अर्थात पैंतालीस प्रतिशत जनसंख्या को पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. इसी रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2020 तक देश के इक्कीस प्रमुख शहरों में भूगर्भ जल समाप्त हो जाएगा. वर्ष 2030 तक देश की चालीस प्रतिशत आबादी को पीने का पानी उपलब्ध नहीं होगा.

 



चेन्नई के साथ-साथ दिल्ली, हैदराबाद, बेंगलुरु आदि को भूगर्भ जल संकट के रूप में चिन्हित किया जाना नीति आयोग के आँकड़ों की भयावहता को दर्शाता है. इस भयावहता की तरफ आज भी लोग संवेदित नहीं हो सके हैं. जिस देश में जहाँ सदानीरा नदियाँ बहा करती थीं, कुँए, तालाब, झीलें जल के परंपरागत स्त्रोत हुआ करते थे, वहाँ जल-संकट उत्पन्न होना वहाँ के नागरिकों द्वारा उठाये जाने वाले असंवेदित कदम ही हैं. नगरीकरण ने परंपरागत जल-स्त्रोतों- कुँओं, तालाबों और झीलों को निगल लिया है. देश में वर्तमान में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 2000 घनमीटर है. यदि हालात न सुधरे तो आगामी वर्षों में जल की उपलब्धता घटकर 1500 घनमीटर रह जायेगी. वैज्ञानिक आधार पर जल की उपलब्धता का 1680 घनमीटर से कम हो जाने का अर्थ पेयजल से लेकर अन्य दैनिक उपयोग के लिए पानी की कमी का होना है.

 

पानी की दिन पर दिन विकराल होती जा रही समस्या के समाधान के लिए गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि जल की उपलब्धता लगातार कम हो रही और उसके उलट इसकी माँग लगातार बढ़ती जा रही है. देखा जाये तो जल का चौतरफा उपयोग किया जाता है. कृषि में, घरेलू कार्यों में, उद्योगों में तो मुख्य रूप से जल का उपयोग होता ही है, इसके अलावा रासायनिक क्रियाओं में, पर्यावरणीय उपयोग में भी जल का बहुतायत उपयोग किया जाता है. अतः सरकारों और समुदायों को उचित जल प्रबंधन की ओर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है. देश में प्रतिवर्ष बारिश के द्वारा लगभग चार हजार अरब घनमीटर जल की उपलब्ध होता है किन्तु मात्र आठ प्रतिशत जल ही संरक्षित हो पाता है. वर्षा जल को तकनीक के माध्यम से एकत्र किया जा सकता है. इसके लिए बरसात के पानी को खुले में रेन वाटर कैच पिट बनाकर उसे धरती में समाहित कर सकते हैं. इससे एक तो वर्षा जल की बहुत बड़ी मात्रा बर्बाद होने से बचेगी साथ ही जल संचयन के द्वारा भूगर्भ जल स्तर भी बढ़ाया जा सकता है. शहरों में प्रत्येक आवास के लिए रिचार्ज कूपों का निर्माण किया जाना चाहिएजिससे वर्षा का पानी नालों में न बहकर जमीन में संचयित हो जाये. इसके अलावा प्रत्येक मकान में आवश्यक रुप से वाटर टैंक बनाये जाने चाहिए, जिनमें वर्षा जल को संरक्षित किया जा सके. जल-संकट के दौरान या फिर घरेलू उपयोग की अन्य अवस्था में इस पानी का उपयोग किया जा सकता है.

 

वास्तव में आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जल के किसी भी रूप का पूरी तरह से संरक्षण करें. यह जल भले ही भूगर्भ के रूप में हो, वर्षा जल हो, घरेलू, औद्योगिक रूप से उपयोग का जल हो. इन सभी का पूर्ण रूप से संचय करना होगा. आवश्यकता इसके प्रति लोगों की मानसिकता विकसित करने की, लोगों को प्रोत्साहित करने की. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल करअव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. अब जल को बचाए जाने की आवश्यकता है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबोंजलाशयोंकुँओं आदि को गन्दगी सेकूड़ा-करकट से बचाने के साथ-साथ नए तालाबोंकुँओं आदि का निर्माण भी करना होगा. भविष्य की भयावहता को वर्तमान हालातों से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी. अब समय है कि जल से होने वाले खेल को रोका जाये.

 


07 जून 2023

जल संकट की भयावहता को समझना होगा

जल-संकट से जूझती धरती और धरती-वासियों को पर्याप्त पेयजल उपलब्धता, जल-उपलब्धता के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं. इन्हीं प्रयासों के बीच जो खबर आई है वह अत्यंत भयावह है. दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन को दुनिया का पहला जल-विहीन शहर घोषित किया गया है. यहाँ की सरकार ने अप्रैल 2023 के बाद से पानी की आपूर्ति करने में असमर्थता जताई है. वहाँ नहाने पर रोक लगा दी गयी है. दस लाख लोगों के कनेक्शन काटने की तैयारी चल रही है. पेट्रोल पंप की तरह से केपटाउन में जगह-जगह पानी के टैंकर लगाये गए हैं, जहाँ एक निश्चित मात्रा में पानी मिलेगा. निकट भविष्य में ऐसी खबरें दुनिया के तमाम देशों से सुनाई देने की आशंका है.


जल हमेशा से सम्पूर्ण प्रकृति के लिए एक महत्वपूर्ण और जीवनदायक तत्त्व रहा है. विशुद्ध रासायनिक स्थिति के बाद भी इसे प्रयोगशाला में मानव उपयोग योग्य नहीं बनाया जा सकता है. यह एक प्राकृतिक अवस्था है, जिसके कारण इसकी आवश्यकता मनुष्य के जीवन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण तरीके से है. वर्तमान में स्थिति यह है कि सम्पूर्ण धरती के 70 प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी इसका कुल एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. सभी को जल की उपलब्धता करवाना आज का मुख्य मुद्दा है. स्वच्छ पेयजल की अनुपलब्धता के चलते संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष 35 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है.




समूचे विश्व की भांति हमारा देश भी जल संकट की समस्या से जूझ रहा है. यहाँ के शहरी क्षेत्रों में, ग्रामीण क्षेत्रों में भी जल संकट की समस्या पैदा हुई है. वर्तमान में 20 करोड़ भारतीयों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं हो पाता है. नगरों में भूगर्भीय जल का अत्यधिक दोहन होने के कारण शहरी क्षेत्र जल-संकट से परेशान हैं. पेयजल की कमी होने से एक तरफ पेयजल संकट बढ़ा है वहीं दूसरी तरफ पानी की लवणीयता भी बढ़ी है. सरकार के नीति आयोग ने जल संकट के प्रति आगाह करने वाली कंपोज़िट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (CWMI), अ नेशनल टूल फॉर वाटर मेज़रमेंट, मैनेजमेंट ऐंड इम्प्रूवमेंट नामक एक रिपोर्ट  जारी की थी. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने का पानी उपलब्ध नहीं होगा. नीति आयोग की इस रिपोर्ट को महज सरकारी आँकड़ा कहकर झुठलाया नहीं जा सकता है और न ही अनदेखा किया जा सकता है. अनुमान है कि सन 2025 तक भारत में पानी की माँग में वर्तमान की तुलना में 50 प्रतिशत वृद्धि हो जाएगी.


पानी की दिन पर दिन विकराल होती जा रही समस्या के समाधान के लिए गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है. सरकारों और समुदायों को उचित जल प्रबंधन की ओर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है. सबके द्वारा जल प्रबंधन हेतु कारगर कदम अपनाये जाएँ. प्रयास यह हो कि किसी भी तरह की बड़ी जल-परियोजनाओं की जगह छोटे जलाशयों का निर्माण हो. बड़ी परियोजनाओं की तरफ जाना तभी उचित है जबकि इनकी अनिवार्यता हो अन्यथा छोटे-छोटे जलाशयों के द्वारा अधिक जनसंख्या को जल की उपलब्धता करवाई जाए.


देश की बहुत बड़ी जनसंख्या शहरों में निवास कर रही है. इसके साथ ही शहर की ओर पलायन भी हो रहा है. इसके चलते न केवल घरेलू उपयोग में वरन औद्योगिक कार्यों में जल की आवश्यकता बढ़ी है. जल माँग के सापेक्ष आपूर्ति नहीं हो रही है. ऐसे में शहर के उपयोग पश्चात् व्यर्थ जल को रोककर उसका पुनर्चक्रीकरण हो. इससे एक तो उपयोग पश्चात् जल व्यर्थ नहीं जायेगा साथ ही उसके पुनः उपयोग में लाये जाने के कारण माँग और आपूर्ति के बीच का अंतर भी कम करने में सहायता मिलेगी. कृषि में सिंचाई और ऐसे कार्यों, जिनमें जल की आवश्यकता होती है, ऐसी तकनीकों को अपनाया जाना चाहिए जिनके द्वारा कम से कम मात्रा में जल का उपयोग हो और अधिक से अधिक लाभ मिल सके. इसके लिए ड्रिप तथा स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी जल संरक्षण तकनीकों को अपनाया जाना चाहिए. रेन वाटर हारवेस्टिंग को प्रोत्साहन देकर भी बहुत हद तक जल-संकट को दूर किया जा सकता है. तालाबों, कुओं आदि में एकत्रित जल से सिंचाई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे भूमिगत जल का उपयोग कम हो. इसके लिए बड़े-बड़े खेतों में जलाशय योजना को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.


शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी अपने मकानों की छतों पर वर्षा जल को तकनीक के द्वारा एकत्र भी कर सकते हैं. इसके लिए वे छतों से गिरने वाले बरसात के पानी को खुले में रेन वाटर कैच पिट बनाकर उसे धरती में समाहित कर सकते हैं. इससे वर्षा जल बहुत बड़ी मात्रा में बर्बाद होने से बचेगा साथ ही जल संचयन के द्वारा भूगर्भ जल स्तर भी बढ़ाया जा सकेगा. शहरों में प्रत्येक आवास के लिए रिचार्ज कूपों का निर्माण किया जाना चाहिए, जिससे वर्षा का पानी बहकर बर्बाद होने के स्थान पर जमीन में संचयित हो सके. वर्षा जल को संरक्षित करने के लिए मकानों में आवश्यक रुप से वाटर टैंक बनाये जाने चाहिए. जल-संकट या घरेलू उपयोग की स्थिति में इस पानी का उपयोग किया जा सकता है.


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जल का पूरी तरह से संरक्षण करें. यह भले ही भूगर्भ के रूप में हो, वर्षा जल हो, घरेलू, औद्योगिक रूप से उपयोग का जल हो. इन सभी का पूर्ण रूप से संचय करना होगा. आवश्यकता इसके प्रति लोगों की मानसिकता विकसित करने की, लोगों को प्रोत्साहित करने की है. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि कमियाँ निकाल कर, अव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. अब जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव हो जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षा जल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबों, जलाशयों, कुँओं आदि को गन्दगी से, कूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव हो नए-नए तालाबों, कुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. भविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. हमारी एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी. 

 





 

24 जून 2019

जल संकट भविष्य की नहीं, आज की ही भयावहता है


यह सार्वभौमिक सत्य है कि समूचे विश्व के क्षेत्रफल का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा पानी से लबालब है. ऐसा होने के बाद भी वैश्विक स्तर पर जल-संकट बना हुआ है. इसका कारण है और वह कारण उपलब्ध जल का खारा होना है. सत्तर प्रतिशत के आसपास जल होने में पीने योग्य जल मात्र तीन प्रतिशत ही है, शेष उपलब्ध जल खारा है. इसमें भी एक समस्या है और वह यह कि उपलब्ध तीन प्रतिशत पेयजल में से महज एक प्रतिशत जल का उपयोग किया जाता है. औद्योगीकरण, जनसंख्या विस्फोट, पर्यावरण के साथ खिलवाड़ आदि से जहाँ प्राकृतिक संतुलन डगमगाया है उसी के दुष्परिणाम से जल का संकट सामने आया है.  इस संकट में वृद्धि उस समय और होने लगी है जबकि जल-प्रदूषण बढ़ने लगा है.


सेंट्रल वाटर कमीशन बेसिन प्लानिंग डारेक्टोरेट, भारत सरकार 1999 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में आने वाले वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में जल की खपत बढ़ती ही रहेगी. इससे भी जल-संकट और बढ़ने की आशंका है. इस रिपोर्ट में विभिन्न वर्षों एवं क्षेत्रों में भारत में जल की माँग प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि वर्ष 2000 में सिंचाई क्षेत्र में सर्वाधिक जल की माँग 542 बिलियन क्यूबिक मीटर रही जो बढ़कर वर्ष 2025 में 910 बिलियन क्यूबिक मीटर हो जाएगी. इसी तरह घरेलू उपयोग में जल की माँग मात्रा वर्ष 2000 में 42 बिलियन क्यूबिक मीटर थी जो बढ़कर वर्ष 2025 में 73 बिलियन क्यूबिक मीटर हो जाएगी. रिपोर्ट में इसी तरह से उद्योग, ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में जल की माँग को दिखाया गया है. इन तमाम क्षेत्रों में कुल माँग वर्ष 2000 में 634 बिलियन क्यूबिक मीटर रही जिसके वर्ष 2025 में बढ़कर 1092 बिलियन क्यूबिक मीटर होने की सम्भावना इस रिपोर्ट में दर्शायी गई है. स्पष्ट है कि देश में आने वाले वर्षों में हर क्षेत्र में जल की माँग निरंतर बढ़ती जा रही है. इस माँग के बढ़ने के अनुपात में पूर्ति न होने के कारण जल-संकट अवश्य ही बढ़ेगा. 

यहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य है कि जल-संकट का मूल कारण जल की बढ़ती माँग नहीं है. अब सवाल यही उठता है कि यदि जल की बढ़ती माँग जल-संकट का कारण नहीं है तो फिर इसका कारण क्या है? असल में देखा जाये तो देश में जल का उपयोग नियंत्रित ढंग से नहीं होता है. इसके साथ-साथ जनसामान्य द्वारा जल-संरक्षण के प्रति भी जागरूकता नहीं दिखाई जाती है. इससे भी जल का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है. एक अनुमान के अनुसार देश में लगभग 15 प्रतिशत जल का उपयोग होता है शेष बहकर बर्बाद हो जाता है. इसके अलावा घरों से, उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ भी जल को प्रदूषित कर रहे हैं. इससे भी पानी का संकट पैदा हो रहा है. 

यदि भविष्य के घनघोर जल-संकट से निपटने का विचार मानव अपने मन में नहीं लाता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि आने वाले समय में जल के लिए विश्व युद्ध हो जाये. हाल-फिलहाल बड़े-बड़े कदमों के उठाये जाने के बजाय छोटे-छोटे कदमों को उठाकर जल-संकट से बचा जा सकता है. जल के प्रति प्रत्येक व्यक्ति में गंभीरता आये इसके लिए आवश्यक है बचपन से ही घरों, स्कूलों के माध्यम से सभी को जल-संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाये. कुछ कानूनी कदम इस तरह के भी उठाये जाने चाहिए जिनके चलते लोग जल का दुरुपयोग करने से बचें. भू-गर्भ जल की, पेयजल की बर्बादी के प्रति उनमें डर का भाव जागे. घर के, उद्योगों के अपशिष्ट का उचित प्रबंधन किया जाना चाहिए, जिससे कि नदियों में, तालाबों में जल प्रदूषित न हो सके. इसके अलावा वर्षा के जल का संरक्षण करने सम्बन्धी कदम उठाये जाने की आवश्यकता है. इसके साथ-साथ यह देखने में आया है कि समाज में धर्म सम्बन्धी कार्यों के प्रति लोगों में एक सजग भावना रहती है. इसलिए जल संवर्धन सम्बन्धी कार्यों को धार्मिकता से जोड़कर उनका प्रसार करना चाहिए. सामाजिक स्तर पर किसी धर्म सम्बन्धी कदम की तरफ सभी का ध्यान सहजता से जाता है और उसके प्रति जागरूकता भी बढ़ती है. आने वाले समय के लिए हम सभी को आज सजग होना पड़ेगा, आज ही जागरूक होना पड़ेगा अन्यथा की स्थिति में कल को गंभीर जल-संकट से सामना करना पड़ सकता है.

22 मार्च 2018

आज और कल के लिए जल बचाओ


मनुष्य के लिए पानी हमेशा से एक महत्वपूर्ण और जीवन-दायक पेय रहा है, ये बात हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है. इसके साथ ही इस बात से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं कि कि जल सभी के जीवित रहने के लिए अनिवार्य है. ऐसा माना जाता है कि मनुष्य बिना भोजन के लगभग दो माह तक जीवित रह सकता है किन्तु बिना पानी के एक सप्ताह भी जीवित रहना मुश्किल है. इधर मानवीय क्रियाकलापों के कारण धरती लगातार पेयजल-विहीन होती जा रही है. जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से विश्व भर में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत की, जिसकी घोषणा वर्ष 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में की गई. इसके अंतर्गत सर्वप्रथम वर्ष 1993 में 22 मार्च के ही दिन सम्पूर्ण विश्व में जल संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता लाने का कार्य किया गया. 


पूरी धरती के 70 प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी इसका कुल एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. आज सभी को जल की उपलब्धता करवाना मुख्य मुद्दा है. आने वाले समय में बिना जल-संरक्षण के ऐसा कर पाना कठिन कार्य होगा. इस दृष्टि से जल संरक्षण भी एक बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति भी एक मुद्दा बना हुआ है क्योंकि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इसके चलते संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष 35 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. विकासशील देशों में जल से उत्पन्न रोगों को कम करना स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है. आज हमारा देश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व जल-संकट से जूझ रहा है. जल सहयोग के रूप में प्रमुख कार्य पानी के बारे में जागरूकता बढाने और उसकी अहमियत की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का होना चाहिए. जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी होगी और पानी की बर्बादी को रोकना होगा. इसके अतिरिक्त वर्षा जल के संरक्षण के उपाय खोजने होंगे तथा घरेलू उपयोग में भी जल-संरक्षण के प्रति सचेत होना पड़ेगा. यदि हम आज इसका उपयोग सावधानी एवं किफायत से न करेंगे तो भविष्य में स्थिति अत्यंत ही गंभीर हो सकती है.

पानी के लिए लगभग समूचे देश में हाहाकार मचा हुआ है. इस हाहाकार में सर्वाधिक बुरी स्थिति में बुन्देलखण्ड क्षेत्र दिखाई दे रहा है. अब तो नित्य ही खबरें सामने आ रही हैं जिनसे ज्ञात हो रहा है कि कई-कई इलाकों में तो दसियों दिन से पानी की एक बूँद के दर्शन भी नहीं हुए हैं. कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ भूगर्भीय जल स्तर पिछले वर्षों के मुकाबले और नीचे चला गया है. ये जानते-समझते हुए कि पानी न केवल मनुष्य के जीवन हेतु वरन जीव-जंतुओं के लिए भी अनिवार्य तत्त्व है, जल संरक्षण के उपाय गंभीरता से किये ही नहीं जा रहे हैं. बुन्देलखण्ड के सन्दर्भ में देखें तो यहाँ के भू माफियाओं ने, खनन माफियाओं ने विगत कई वर्षों से हरे-भरे बुन्देलखण्ड को उजाड़ने का कुचक्र रचाया हुआ है. कुछ गंभीर अध्येताओं के अध्ययन रिपोर्टों को आधार बनायें तो वर्तमान में बुन्देलखण्ड में कुल क्षेत्रफल का दस प्रतिशत से कम जंगल बचे हुए हैं. किसी समय में इस वन-सम्पदा का क्षेत्रफल चालीस प्रतिशत के आसपास ठहरता था. इन जंगलों के समाप्त होने के मूल में यहाँ के पर्वतों का लगातार मिटते जाना भी है. पत्थरों के द्वारा आर्थिक लाभ लेने के स्वार्थ ने यहाँ के माफियाओं ने पहाड़ों को, जंगलों को पूरी तरह से मिटा दिया है. एक बहुत बड़े इलाके में दिन-रात चलती क्रेशर मशीनों के कारण किलोमीटरों तक धूल के बादल बने दिखाई देते हैं. इस धूल ने रहे-सहे वृक्षों पर, पेड़-पौधों पर, उपजाऊ जमीन पर अपना कब्ज़ा कर रखा है. हरियाली के स्थान पर सफ़ेद चादर सी लगातार गहराती जा रही है.

बुन्देलखण्ड में जल-संकट का हाल तब है जबकि यहाँ नदियों, जलाशयों, कुँओं आदि की पर्याप्त उपलब्धता है. यमुना, बेतवा, नर्मदा, काली, सिंध, धसान, केन आदि नदियों; कीरत सागर, मदन सागर, सेमरताल आदि के साथ-साथ बुन्देलखण्ड का कश्मीर कहा जाने वाला चरखारी है, जो अपनी झीलों के कारण प्रसिद्द है. इसके अलावा पातालतोड़ कुँओं की उपलब्धता भी यहाँ है. असीमित भूगर्भीय जलस्त्रोत धुरहट जैसे स्थान बुन्देलखण्ड में हैं. इसके बाद भी यहाँ जल संकट का होना यहाँ के निवासियों के जागरूक न होने, संवेदनशील न होने का ही परिचायक है. भू एवं खनन माफिया तो लगातार यहाँ की वन सम्पदा का, पर्वत श्रेणियों का नाश करके जल-संकट पैदा कर ही रहे हैं, ज्यादा से ज्यादा आर्थिक लाभ लेने के लालच में बड़े-बड़े किसानों द्वारा भी भूगर्भीय जल स्त्रोतों का जबरदस्त ढंग से विदोहन किया जा रहा है. इसने भी जल स्तर को लगातार कम करके भी जल-संकट पैदा किया है. एक अनुमान के अनुसार बुन्देलखण्ड में औसत बारिश 95 सेंटीमीटर होती है. इसके चलते कृषि योग्य जलसंकट लगभग बना ही रहता है. ऐसे में यहाँ उन्हीं कृषि फसलों को वरीयता दी जाती रही है जिनमें सिंचाई के लिए कम से कम पानी की आवश्यकता हो. इधर कुछ वर्षों से आर्थिक लाभ के चलते ऐसी फसलों का चयन भी किसानों द्वारा किया जाने लगा जिनमें अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है. इस कारण से नलकूपों के माध्यम से भू-गर्भीय जल स्त्रोतों से पानी खींचकर उन्हें सुखाया जाने लगा. एक अनुमान के मुताबिक बुन्देलखण्ड में प्रतिवर्ष भूजल स्तर में दो से चार मीटर तक की गिरावट आ रही है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि हालात कितने भयावह होते जा रहे हैं.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल कर, अव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता है, शेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबों, जलाशयों, कुँओं आदि को गन्दगी से, कूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव हो, नए-नए तालाबों, कुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर पर, सीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैं, उपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगे? भविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.

26 अप्रैल 2016

भयावह जल-संकट की स्थिति में बुन्देलखण्ड

पानी के लिए लगभग समूचे देश में हाहाकार मचा हुआ है. इस हाहाकार में सर्वाधिक बुरी स्थिति में बुन्देलखण्ड क्षेत्र दिखाई दे रहा है. अब तो नित्य ही खबरें सामने आ रही हैं जिनसे ज्ञात हो रहा है कि कई-कई इलाकों में तो दसियों दिन से पानी की एक बूँद के दर्शन भी नहीं हुए हैं. कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ भूगर्भीय जल स्तर पिछले वर्षों के मुकाबले और नीचे चला गया है. ये जानते-समझते हुए कि पानी न केवल मनुष्य के जीवन हेतु वरन जीव-जंतुओं के लिए भी अनिवार्य तत्त्व है, जल संरक्षण के उपाय गंभीरता से किये ही नहीं जा रहे हैं. बुन्देलखण्ड के सन्दर्भ में देखें तो यहाँ के भू माफियाओं ने, खनन माफियाओं ने विगत कई वर्षों से हरे-भरे बुन्देलखण्ड को उजाड़ने का कुचक्र रचाया हुआ है. कुछ गंभीर अध्येताओं के अध्ययन रिपोर्टों को आधार बनायें तो वर्तमान में बुन्देलखण्ड में कुल क्षेत्रफल का दस प्रतिशत से कम जंगल बचे हुए हैं. किसी समय में इस वन-सम्पदा का क्षेत्रफल चालीस प्रतिशत के आसपास ठहरता था. इन जंगलों के समाप्त होने के मूल में यहाँ के पर्वतों का लगातार मिटते जाना भी है. पत्थरों के द्वारा आर्थिक लाभ लेने के स्वार्थ ने यहाँ के माफियाओं ने पहाड़ों को, जंगलों को पूरी तरह से मिटा दिया है. एक बहुत बड़े इलाके में दिन-रात चलती क्रेशर मशीनों के कारण किलोमीटरों तक धूल के बादल बने दिखाई देते हैं. इस धूल ने रहे-सहे वृक्षों पर, पेड़-पौधों पर, उपजाऊ जमीन पर अपना कब्ज़ा कर रखा है. हरियाली के स्थान पर सफ़ेद चादर सी लगातार गहराती जा रही है. 

बुन्देलखण्ड में जल-संकट का हाल तब है जबकि यहाँ नदियों, जलाशयों, कुँओं आदि की पर्याप्त उपलब्धता है. यमुना, बेतवा, नर्मदा, काली, सिंध, धसान, केन आदि नदियों; कीरत सागर, मदन सागर, सेमरताल आदि के साथ-साथ बुन्देलखण्ड का कश्मीर कहा जाने वाला चरखारी है, जो अपनी झीलों के कारण प्रसिद्द है. इसके अलावा पातालतोड़ कुँओं की उपलब्धता भी यहाँ है. असीमित भूगर्भीय जलस्त्रोत धुरहट जैसे स्थान बुन्देलखण्ड में हैं. इसके बाद भी यहाँ जल संकट का होना यहाँ के निवासियों के जागरूक न होने, संवेदनशील न होने का ही परिचायक है. भू एवं खनन माफिया तो लगातार यहाँ की वन सम्पदा का, पर्वत श्रेणियों का नाश करके जल-संकट पैदा कर ही रहे हैं, ज्यादा से ज्यादा आर्थिक लाभ लेने के लालच में बड़े-बड़े किसानों द्वारा भी भूगर्भीय जल स्त्रोतों का जबरदस्त ढंग से विदोहन किया जा रहा है. इसने भी जल स्तर को लगातार कम करके भी जल-संकट पैदा किया है. एक अनुमान के अनुसार बुन्देलखण्ड में औसत बारिश 95 सेंटीमीटर होती है. इसके चलते कृषि योग्य जलसंकट लगभग बना ही रहता है. ऐसे में यहाँ उन्हीं कृषि फसलों को वरीयता दी जाती रही है जिनमें सिंचाई के लिए कम से कम पानी की आवश्यकता हो. इधर कुछ वर्षों से आर्थिक लाभ के चलते ऐसी फसलों का चयन भी किसानों द्वारा किया जाने लगा जिनमें अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है. इस कारण से नलकूपों के माध्यम से भू-गर्भीय जल स्त्रोतों से पानी खींचकर उन्हें सुखाया जाने लगा. एक अनुमान के मुताबिक बुन्देलखण्ड में प्रतिवर्ष भूजल स्तर में दो से चार मीटर तक की गिरावट आ रही है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि हालात कितने भयावह होते जा रहे हैं.


अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल कर, अव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता है, शेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबों, जलाशयों, कुँओं आदि को गन्दगी से, कूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव हो, नए-नए तालाबों, कुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर पर, सीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैं, उपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगे? भविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.
 

(चित्र चित्रकूट जिले में विशेष बुन्देलखण्ड पैकेज से निर्मित रसिन बाँध है. इसे प्रवासनामा से लिया गया है.)