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15 जनवरी 2026

जिन्दगी जिन्दाबाद: पीड़ा के विरुद्ध जिन्दगी की घोषणा - डॉ. लखन लाल पाल

जिन्दगी जिन्दाबाद’ डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की आत्मकथा है। आत्मकथा का यह दूसरा भाग उनके जीवन की एक ऐसी दुर्घटना पर केंद्रित है, जिसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर लगातार एक टीस उठती रहती है। कई जगह पढ़ते-पढ़ते रुकना पड़ता है। यह रचना केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि उसके दर्द को जीवंत रूप में महसूस किया जाता है। घटना अत्यंत पीड़ादायक और मर्मस्पर्शी है, किंतु लेखक जिस सहजता से उसे अभिव्यक्त करता है, वह काबिले-तारीफ है। भाषा का प्रवाह इतना स्वाभाविक है कि पाठक बिना किसी अटकन या भटकन के उसके साथ बहता चला जाता है।

 

यह आत्मकथा पीड़ादायक होते हुए भी कहीं भी सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास नहीं करती। लेखक बस कहता चला जाता है—अपने अपनों के साथ, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ। पीड़ा को पीते हुए, उसी पीड़ा के बीच वह अपने लिए हँसी-ठिठोली का एक छोटा-सा अंतराल निकाल लेता है। इस मर्माहत पीड़ा को वह अकेले ही सहने का प्रयास करता है, ताकि परिवारजन उसके दर्द को जान न सकें।

 



22 अप्रैल 2005 की शाम लेखक का ट्रेन से भीषण एक्सीडेंट हो जाता है। एक पैर जाँघ से कटकर दूर जा गिरता है, दूसरा पैर टखने से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। कितना खून बहा होगा और वह दृश्य कितना भयावह रहा होगा—कल्पना मात्र से रूह काँप जाती है। लेखक की जीवटता का प्रमाण यह है कि इतनी भयावह स्थिति में भी वह स्वयं को बेहोश नहीं होने देता और पूरी चेतना के साथ अपने को सँभाले रखता है।     

 

हम प्रायः ऐसी घटनाएँ फिल्मों या टीवी धारावाहिकों में देखते हैं। वे क्षणिक रूप से हमें द्रवित कर देती हैं, किंतु ठीक होने की प्रक्रिया को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वास्तविक जीवन में यह प्रक्रिया हर क्षण करुण क्रंदन में बीतती है। हर पल दर्द के दरिया में डूबे रहना पड़ता है। यही दर्द का दरिया इस पूरी आत्मकथा में प्रवाहित होता रहता है।

 

इसी समय पिता का निधन, माँ की स्थिति, एक वर्ष पहले ब्याह कर आई नवयुवती पत्नी निशा और दोनों भाइयों की मानसिक अवस्था—इन सबको लेखक ने जिस संवेदनशीलता से जिया है, उसे पढ़ते हुए पाठक उन परिस्थितियों की गहराई को समझ पाता है। पर यह दर्द का दरिया उस क्षण हार मानने लगता है, जब लेखक साहस और धैर्य को अपनी नौका बना लेता है। उस नौका से वह अकेला नहीं, बल्कि पूरा परिवार, मित्र और रिश्तेदार धीरे-धीरे पार लगने लगते हैं।

 

ऑपरेशन का दृश्य, पैरों से लगातार बहता खून और तीन-चार महीनों तक चलने वाली मरहम-पट्टी—हर बार की पट्टी असहनीय पीड़ा से दिल-दिमाग को झकझोर देती है। इसके बावजूद लेखक के चेहरे पर बनी रहने वाली मीठी मुस्कान और बीच-बीच में फूट पड़ने वाले ठहाके यह एहसास ही नहीं होने देते कि वह अपने शरीर का एक आवश्यक अंग हमेशा के लिए खो चुका है और अब कृत्रिम पैर के सहारे जीवन जीना है।

 

मैं डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी से सन् 2006 से जुड़ा हूँ। दुर्घटना के बाद उन्होंने ‘स्पंदन’ पत्रिका का संपादन शुरू किया था, जिसमें मेरी एक बुंदेली कहानी प्रकाशित हुई। तभी से हम साहित्यिक मित्र बने। इन उन्नीस-बीस वर्षों में कभी यह अनुभव नहीं हुआ कि यह व्यक्ति इतनी गहरी पीड़ा से गुज़रा है—और आज भी गुज़र रहा है। यह रचना पढ़कर अब उस जीवटता का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। क्या इंसान है भाई!

 

इस आत्मकथा का एक अत्यंत प्रभावशाली जीवित पात्र डॉक्टर रवि है—लेखक का बचपन का मित्र और आर्थोपेडिक सर्जन। लेखक ने पूरे विश्वास के साथ स्वयं को उसके हवाले कर दिया था—यह सोचकर कि अब यह मुझे मरने नहीं देगा।

 

पढ़ते समय मेरा ध्यान बार-बार डॉक्टर रवि पर ठहर जाता है। उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या रही होगी? लेखक ने तो स्वयं को उसे सौंप दिया था, पर उसके लिए हर क्षण अनदेखी अनहोनी से जूझना था। एक डॉक्टर के लिए सभी मरीज समान होते हैं, किंतु यहाँ तो लंगोटिया यार का रिश्ता था। एक छोटी-सी चूक भी जीवन भर का बोझ बन सकती थी। ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले परिवार के हस्ताक्षर लेने का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक है। यहाँ पेशेगत नियम और व्यक्तिगत संबंधों का द्वंद्व गहराई से उभरता है। इस रचना को पढ़ते हुए डॉक्टर रवि का पात्र लंबे समय तक मन से ओझल नहीं हो पाता।

 

आत्मकथा की भाषा-शैली, उसका प्रवाह और स्वयं तथा दूसरों की मानसिकता को अभिव्यक्त करने का कौशल इसे विशिष्ट बनाता है। यही कारण है कि यह रचना पाठक को एक ही बैठक में पढ़ने को विवश कर देती है।   

 

इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद मैं बस इतना ही कह सकता हूँ—

डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, वाकई ‘जिन्दगी जिन्दाबाद’।

-- डॉ. लखन लाल पाल की प्रतिक्रिया 

07 जनवरी 2026

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का प्रकाशन

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का प्रकाशन हो गया है...

हमारे बारे में, हमारे एक्सीडेंट के बारे में, उसके बाद की स्थिति के बारे में बहुत से लोग सवाल करते हैं, प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं. ऐसे अनगिनत सवालों का एक ही जवाब.... 'ज़िन्दगी जिन्दाबाद'

इसे चाहने वालों के लिए श्वेतवर्णा की वेबसाइट चौबीस घंटे खुली हुई है..... यहाँ क्लिक करें





20 दिसंबर 2025

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष जल्द ही आपके साथ होगा

वर्ष 2025 भी जाने की तैयारी कर रहा है. जितने दिन इस अंतिम महीने में निकल गए हैं, अब उतने दिन भी शेष नहीं बचे हैं. समय की गति के अनुसार आना और जाना लगा ही रहना है. कल को इसी वर्ष का स्वागत किया था, अब इसी को विदा करने का समय आ गया है. कुछ ऐसा ही आने वाले वर्ष 2026 के साथ भी होगा. इन आते-जाते वर्षों के स्वागत और विदाई के बीच याद बस यही रह जाता है कि उस एक वर्ष में हम सबने क्या किया? क्या पाया, क्या खोया? क्या सुखद रहा, क्या दुखद रहा?


आप सभी सुधिजनों को याद होगा कि वर्ष 2019 में आत्मकथा ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी आपके बीच हमारी बातों को लेकर उपस्थित हुई थी. उसी समय हमारे शुभेच्छुजनों ने प्रेरित किया था कि वर्ष 2005 में हुई दुर्घटना के बाद की अपनी जीवन-यात्रा को भी एकसूत्र में पिरोकर प्रकाशित करवाया जाये. विचार तो था कि वर्ष 2020 में इसे भी ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में प्रकाशित करवाया जायेगा. अक्सर ऐसा होता है कि सोचा कुछ जाता है और हो कुछ जाता है, हमारे साथ भी यही हुआ. ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष करने बैठे तो हाथों ने काँपना शुरू कर दिया, आँखों ने नम होना शुरू कर दिया, दर्द ने अपना अलग रूप दिखाना शुरू कर दिया. इन सबके बीच कुछ दुखद घटनाओं ने हिला दिया और ज़िन्दगी जिन्दाबाद को बीच में रोक देना पड़ा. यद्यपि समय के दिए गए आघातों से उबरते हुए ज़िन्दगी जिन्दाबाद को ब्लॉग पर कहानी के रूप में लिखते रहे.

 



इसी लेखन को एडिट करके, पुस्तक के रूप में संयोजित करके इस जाते हुए वर्ष 2025 में आप सबके बीच लाने का मन बना लिया है. जल्दी ही ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को आप सब अपने बीच पाएँगे. ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी की तरह आप सबका स्नेह ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को भी मिलेगा, ऐसा विश्वास है.


28 नवंबर 2020

रिश्ते अनमोल हैं, उनका कोई नाम नहीं

भारतीय राजनीति में राजमाता के रूप में सम्मानजनक रिश्ता बनाने वालीं विजयाराजे सिंधिया जी की आत्मकथा आज हमें आशीर्वाद देने को प्राप्त हुई. उनके यथार्थ का प्रतिबिम्ब बनती राजपथ से लोकपथ पर को देखकर बहुत सी यादें ताजा हो गईं. जनमानस के लिए राजमाता हमारे लिए बुआ जी रहीं. यह रिश्ता भी ऐसा रहा जो किसी सम्बोधन से मुक्त समझा-माना जा सकता है. एक पल को सोचिए कि जिनको हम बुआ पुकारते हों, उनके भाई-भाभी को हम मामा-मामी कहते हों, कैसा महसूस होगा आपको? कुछ इसी तरह का रिश्ता बना हुआ है उस परिवार से.




आपकी राजमाता, हमारी बुआ जी जनपद जालौन से सम्बन्ध रखती हैं. उनका मायका यहीं है और परिजन उरई में निवास करते हैं. इस परिवार से हमारे परिवार का बहुत पुराना रिश्ता आजतक बना हुआ है. चलिए, पारिवारिक इतिहास-भूगोल के स्थान पर वो बात जो हम कहने यहाँ आये हैं. बुआ जी के भाई श्री सुरेन्द्र सिंह मोना उरई में ही सपरिवार रह रहे हैं. हम बचपन से उनका अपने घर आना-जाना देख रहे हैं. उनका आना हम छोटे बच्चों के लिए इसलिए भी सुखद होता था क्योंकि वे पिताजी से मुलाकात करने के बाद जब चलने को होते तो हम भाइयों सहित मोहल्ले के बच्चों को अपनी जीप में बिठाकर एक चक्कर लगवाते थे. पिताजी को वे अपने छोटे भाई की तरह मानते रहे और हम लोग तब उनको कभी मोना अंकल, कभी मोना ताऊजी कहते थे.


जब हम छोटे थे तो एकाधिक बार पिताजी के साथ अंकल के घर जाना हुआ, उस समय की बहुत याद नहीं है मगर एक बार उस समय जबकि हम इंटरमीडिएट में थे, किसी काम से घर गए. अंकल से अपनी धर्मपत्नी से हमारा परिचय करवाया. हमने अपने पारिवारिक रिश्तों के चलते मोना अंकल के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़कर जैसे ही आंटी के पैर छूने चाहे तो उन्होंने मना कर दिया. पहले तो हमारी समझ में नहीं आया कि ऐसा क्या हो गया हमसे कि आंटी ने पैर छूने से रोक दिया मगर अगले ही पल सारी बात समझ आ गई. असल में मोना अंकल हमारे ननिहाल के पास के गाँव के हैं, साथ ही हमारे एक मामाजी के अभिन्न मित्रों में रहे हैं. वे हमारे मामा लोगों को अपने सगे भाइयों तरह मानते रहे हैं. यह रिश्ता आंटी को ज्ञात था ऐसे में उन्होंने मोना अंकल से उस दिन साफ़-साफ़ कहा कि वे भले ही हमसे पैर छुवाएँ, अंकल कहलवाएं मगर वे न पैर छूने की, न आंटी कहने की अनुमति देंगीं. उस दिन से हम उनको मामी सम्बोधित करते रहे.


बचपन में जब भी पिताजी के साथ राजमाता से मिलना हुआ तो पिताजी उनको जिज्जी कहते थे और हम बुआ जी. वही सम्बोधन बराबर बना रहा. बुआ जी से स्वतंत्र रूप से मिलना उस समय हुआ जबकि हम ग्वालियर से बी०एससी० कर रहे थे. हमारे हॉस्टल वार्डन चंदेल साहब ने उनसे मिलवाया, पिताजी का परिचय दिया उसके बाद उनके ग्वालियर आने पर बुआ जी हमें बुलवा लेतीं. बहुत स्नेह के साथ मिलतीं, उरई की जानकारी लेतीं, अपने परिचित सभी लोगों के हालचाल लेतीं. उन्होंने कभी हमारे बुआ कहने पर कुछ नहीं कहा सो उनको बुआ ह कहते रहे. मोना अंकल ने भी अंकल कहने पर कोई आपत्ति न की तो उनको आजतक अंकल ही कहते हैं. उनकी धर्मपत्नी ने आंटी कहने पर अपनी असहमति व्यक्त की तो वे हमारे लिए आज भी मामी जी के रूप में स्मृतियों में बसी हैं.


आज उस घर में मोना अंकल की तीसरी पीढ़ी युवावस्था में है मगर हमें पहले जैसा ही स्नेह भाइयों, भाभियों, बच्चों से मिलता है. यह संबंधों, रिश्तों की पावनता, विश्वास और संस्कारों की बात होती है कि जहाँ खून का रिश्ता न हो वहाँ रक्त-सम्बन्धियों से अधिक मजबूत रिश्ता तीन-तीन पीढ़ियों तक चलता रहे. सच ही है कि रिश्तों का नाम सिर्फ पहचान के लिए होता है अन्यथा रिश्ते अनमोल हैं, उनका कोई नाम नहीं, कोई सीमांकन नहीं.


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23 अप्रैल 2020

लोकल फोन से करते रहे एसटीडी कॉल

आज के बच्चे पैदा होते ही फोन, मोबाइल का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं. हमें अच्छी तरह याद है कि उस समय हम कक्षा आठ में पढ़ा करते थे. हमारे मन्ना चाचा तब कानपुर में भारतीय स्टेट बैंक में सेवारत थे. एक बार घर आने पर उन्होंने अपने बैंक का फोन नम्बर पिताजी को यह कहते हुए दिया कि यह फोन हमारी टेबिल पर ही है अब सीधे बात हो जाया करेगी. हमने और हमारे छोटे भाई ने भी चाचा से उनका फोन नम्बर ले लिया.


हमने कक्षा छह से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा राजकीय इंटर कालेज से प्राप्त की है. इसके पास ही जिला चिकित्सालय है, जहाँ हमारी मामी श्रीमती पुष्पा राजे उन दिनों नौकरी किया करतीं थीं. मामा-मामी चिकित्सालय के कैम्पस में ही रहा करते थे. हम अपने दोस्तों सहित लगभग रोज ही मामा-मामी के घर जाया करते थे. इसी आवागमन के दौरान हमने एक दिन देखा कि चिकित्सालय में इंमरजेंसी वार्ड में एक फोन लगाया जा रहा है. हम लोगों के लिए बड़ी ही आश्चर्य की चीज थी वह फोन. अब मौका लगते ही हम लोग फोन को छूकर देख आते थे. अभी तक तो फोन अपने प्रधानाचार्य के कमरे में ही लगा देखा था या फिर मामी के आफिस में पर यहाँ कभी छूने को तो मिला नहीं था.

एक दिन मन में आया कि चाचा से बात की जाये. मामा डॉ० जुगराज सिंह क्षत्रिय, जिन्हें हम बच्चे आज तक डॉक्टर मामा के नाम से बुलाते हैं, से पूछा कि जो फोन यहाँ लगा है उससे बात कैसे होती है? मामा ने बताया कि उसमें नम्बर लिखे हैं, जिस फोन नम्बर पर बात करनी हो उनको घुमाओ और जब एक ट्रिन-ट्रिन जैसी आवाज सुनाई दे तो उसमें एक रुपये का सिक्का डाल दो. उन्होंने हमसे पूछा कि कहाँ बात करनी है तो हमने कहा बस ऐसे ही जानकारी कर रहे थे.


अब समझ में आ गया था कि फोन कैसे करना है. वहाँ जाकर एक-दो नम्बर को घुमा कर ट्रिन-ट्रिन की आवाज भी सुन आये थे और अपनी छोटी सी जेबखर्च की राशि में से एक रुपया गँवा कर आवाज भी सुन आये थे. लगा कि अब चाचा से बात करनी आसान हो जायेगी. एक रुपये में जब चाहो चाचा से बात कर लो. खुशी तो बहुत थी पर ये मालूम नहीं था कि ये पब्लिक टेलीफोन है जो मात्र लोकल ही काम करेगा.

एक दिन चुपचाप फोन के पास पहुँचे, एक हथेली में चाचा की बैंक का नम्बर और दूसरी में एक का सिक्का दबाये. नम्बर घुमाये और इन्तजार कि अब ट्रिन-ट्रिन की आवाज सुनाई दे, नहीं सुनाई दी. एक बार, दो बार, तीन बार.... फिर न जाने कितनी बार नम्बर घुमाया पर आवाज सुनाई नहीं दी. पहले लगा कि शायद फोन खराब है. तभी एक आदमी ने आकर बात की तो लगा कि हम लोग ही गड़बड़ कर रहे हैं. अब हताश, हारे हुए खिलाड़ी की तरह से वापस लौटे. दुख था चाचा से बात न हो पाने का फिर लगा कि कहीं गलत नम्बर तो नहीं लिख लिया? दिमाग दौड़ाते हुए घर आये, नम्बर देखा, एकदम सही.
घर में पिताजी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई. अगले दिन कालेज से मामा के पास गये और अपनी समस्या बताई. मामा ने समझाया कि इस फोन से बस लोकल ही बात हो सकती है, एस०टी०डी० नहीं. तब अपनी मूर्खता पर बहुत हँसी आई जो गाहेबगाहे आज भी फोन करने की बात सोच-सोच का आ ही जाती है. नादानी भले ही रही हो पर फोन करने का एहसास, फोन छूने का एहसास आज भी है.  

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19 मार्च 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन आरम्भ

जैसा कि आप सबसे आज, 19 मार्च के लिए कहा था, ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद का ऑनलाइन प्रकाशन आज से आरम्भ कर दिया है. 

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद से जुड़ने के लिए आपको इसके ब्लॉग पर जाना होगा या फिर इसके पेज पर. इसका प्रकाशन वहीं पर किया जायेगा. 

ब्लॉग और फेसबुक पेज की लिंक नीचे हैं. आप सभी के सहयोग की अपेक्षा है. आगे जैसी आपकी इच्छा.
आभार 

ब्लॉग लिंक 
https://zindagi-zindabad.blogspot.com/ 
+
फेसबुक पेज लिंक 

https://www.facebook.com/zindagiizindabad
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03 मार्च 2020

ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

प्रकृति ने जितने रंग अपने में समाहित कर रखे हैं, वे सभी इस ज़िन्दगी में देखने को मिल जाते हैं. इन रंगों में हँसी के, ख़ुशी के, रोने के, ग़म के, याद रखने के, भूलने के, अपनों के, गैरों के, जीत के, हार के आदि-आदि समाहित रहते हैं. इन रंगों के साथ सह-सम्बन्ध बनाकर खुद को रंगीन बनाये रखने का नाम ही ज़िन्दगी है. ज़िन्दगी के इन तमाम रंगों को हमने बहुत करीब से देखा है, महसूस किया है, उनमें खुद को रंगे पाया है. 

जैसे व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में किसी न किसी तरह के रंगों से आनंदित होता रहता है, उसी तरह उसे ज़िन्दगी के रंगों का भी स्वागत करना चाहिए. जैसे व्यक्ति अपने मनोनुकूल रंगों का चुनाव करता है, वैसे ही ज़िन्दगी भी व्यक्ति के मन को जांचने-परखने के लिए रंगों का चुनाव करके उसके पास भेजती है या कहें ज़िन्दगी खुद को उन्हीं रंगों में रंगने का प्रयास करती है.


ज़िन्दगी के इन्हीं तमाम अच्छे-बुरे रंगों को अपने बहुत निकट पाया है. इनके द्वारा ज़िन्दगी को रंगीन होते ही देखा है. न प्रकृति के रंगों को बेनूर माना है ठीक वैसे ही ज़िन्दगी से मिलते रंगों में भी जीवंतता भरने की कोशिश की है. ज़िन्दगी को पूरी जिंदादिली से जीने की कोशिश की है. सोचने वाली बात है कि यदि चार दिन की ज़िन्दगी मिली है तो उसे रोकर क्यों बिताया जाए. हँसते हुए ज़िन्दगी के साथ जिंदादिली से यात्रा की जानी चाहिए. आखिर ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद है, रहनी चाहिए.


ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में अपने जीवन के कुछ मिले-जुले रंगों से आपको रंगने जल्द ही आ रहे हैं. इस यात्रा में आप ऑनलाइन हमारे साथ रह सकते हैं. इस यात्रा के रंग अभी हाल-फिलहाल सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर बिखेरे जायेंगे. आप भी इस फुहार में, इस रिमझिम में शामिल होकर हमारे साथ बोलिए, ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

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03 जनवरी 2020

ज़िन्दगी जिन्दाबाद - अपनी कहानी का एक और घोष

अपनी उम्र के चार दशक गुजारने के बाद आत्मकथा लिखना हुआ. इसमें अपने जीवन के चालीस वर्षों की वह कहानी प्रस्तुत की गई जिसे हमने अपनी दृष्टि से देखा और महसूस किया. कुछ सच्ची कुछ झूठी के रूप में आत्मकथा कम अपनी जीवन-दृष्टि ही सामने आई. व्यावसायिक रूप से, प्रकाशन की आर्थिक दृष्टि के रूप से यह कहाँ ठहरती है, कह नहीं सकते मगर हमारे तमाम चाहने वालों ने इसे हाथों-हाथ लिया है. जैसा कि इस पुस्तक में उल्लेख भी किया है, वही यहाँ भी करना अपेक्षित महसूस होता है कि तीस साल गुजारने के बाद अचानक ही लगा था कि अपनी कहानी लोगों के सामने लाना चाहिए. उस सोच के साथ खुद से ही एक प्रश्न किया कि आखिर लोग क्यों हमारे जीवन को समझना-जानना-पढ़ना चाहेंगे? इसी प्रश्न के बाद एक दशक और गुजार दिए. चालीस वर्ष की उम्र होने के बाद इस प्रश्न का उत्तर खुद ही दिया कि अपनी कहानी लोगों को आदर्श के लिए नहीं, लोगों को प्रवचन देने के लिए नहीं, लोगों के कुछ बताने के लिए नहीं वरन हमने अपने इन चालीस वर्षों को किस तरह से देखा है, उस रूप में पेश करने का माध्यम मात्र है.



जब अपने आपको ही प्रश्न का उत्तर मिल गया तो लगा कि अब कुछ सच्ची कुछ झूठी लिखा जाना ही चाहिए. लिखने के दौरान खुद से ही लड़ना-जूझना होता रहा. क्या लिखना है, क्या छोड़ना है समझ न आता. एक घटना को लिखते तो उससे सम्बंधित दूसरी घटना याद आ जाती. बहरहाल, अपने आपसे लड़ते-जूझते कुछ सच्ची कुछ झूठी का प्रकाशन हुआ. परिजनों का, गुरुजनों का आशीर्वाद-प्यार मिला. दोस्तों का, सहयोगियों का स्नेह मिला. पाठकों का आशीर्वाद मिला. बहुत सारी प्रतिक्रियाओं का आना हुआ. ज्यादातर प्रतिक्रियाओं में प्रोत्साहन ही दिया गया. इसे अपने आपमें हिम्मत का काम बताया गया कि महज चालीस वर्ष में आत्मकथा लिखने का जोखिम उठा लिया. इसी क्रम में हमारे गुरुजी डॉ० दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी का फोन भी आया. उनका आशीर्वाद हमारे शोध-कार्य से लेकर आज तक बना हुआ है. उनके द्वारा भी पुस्तक को पढ़ा गया. इसी क्रम में उन्होंने आशीर्वाद देते हुए अपेक्षा व्यक्त की कि इसके आगे की कहानी का उनको इंतजार है. उन्होंने हमारी ट्रेन दुर्घटना और उसके बाद की हमारी दिनचर्या, क्रियाकलाप, कार्यों आदि को लेकर एक और पुस्तक का स्नेहिल निर्देश जैसा दिया. 

ये भी हमारे जीवन में लिखा था. वर्ष 2005 तमाम सारी दिक्कतों, दुखों के साथ हमारे लिए शारीरिक कष्ट लेकर आया था. एक ट्रेन दुर्घटना में अपना बायाँ पैर गँवा दिया था तथा दाहिना पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. दुर्घटना के बाद से आज तक के डेढ़ दशक बाद भी दाहिने पैर में दर्द को एक सेकेण्ड को भी राहत नहीं है. अपनी दुर्घटना के बाद के चार-पाँच वर्ष के दौरान जिस तरह का व्यवहार समाज से, अपनों से, गैरों से देखने को मिला उसने मन में उसकी अभिव्यक्ति का रास्ता बना दिया था. सोचते थे कि अपनी कहानी लिखने के पहले दुर्घटना के बारे में, उसके बाद जिस तरह का वातावरण अपने आसपास देखा, उसे लिखा जाये. ऐसी सोच के साथ लगता था कि आखिर समाज हमारे दर्द को क्यों पढ़ना चाहेगा? उसे आखिर हमारे दर्द से क्या मिलेगा? अब जबकि हमारी दुर्घटना को डेढ़ दशक होने को आये हैं, उसके बाद तमाम सारे काम ज्यों के त्यों चल रहे हैं तब लग रहा है कि अपने जीवन को उन लोगों के लिए अवश्य एक प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जो अपने जीवन से निराश हैं. इसमें भी हमारे शुभेच्छुजनों का स्नेह शामिल है.


नया वर्ष 2020 आरम्भ हो चुका है. कुछ सच्ची कुछ झूठी हमारा ड्रीम प्रोजेक्ट था, जो विगत वर्ष आप सबके सामने आया. अब इस वर्ष अपनी दुर्घटना के बाद के एक दशक को, उस दौर में बीती अच्छी-बुरी घटनाओं को, अपने गिरने-उठने को, लोगों के पास आने-दूर जाने की घटनाओं को प्रस्तुत किये जाने का विचार है. इसमें भी कोशिश यही रहेगी कि अपने दुःख का, अपनी समस्या का रोना न रोया जाये बल्कि कुछ दुखी लोगों को हंसाने की कोशिश की जाये. आखिर ज़िन्दगी हँसने के लिए ही है. ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में जल्द ही हमारी ज़िन्दगी का एक और पक्ष आपके सामने होगा. संभव है कि पुस्तकाकार रूप में आने के पहले आपके सामने उसका नेट संस्करण उपस्थित रहे. शेष तो समय के गर्भ में है, हाँ, ये निश्चित है कि इस वर्ष के अंत तक ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष आप भी हमारे साथ कर रहे होंगे.

28 जुलाई 2019

जुड़िये हमारी 'कुछ सच्ची कुछ झूठी' से


आखिरकार लम्बे इंतजार के बाद कुछ सच्ची कुछ झूठी का प्रकाशन हो ही गया. विगत दो-तीन वर्षों से लगातार प्रकाशन की, लेखन की, संपादन की स्थिति में होने के कारण हमारा यह ड्रीम प्रोजेक्ट थमा हुआ था. रुका हुआ नहीं कह सकते क्योंकि इस पर लगातार काम चल रहा था. जब स्थिति खुद पर लिखने की हो, अपने जीवन को कागज़ पर उतार कर सार्वजनिक करने की हो तब अनेक तरह की ऊहापोह जैसी स्थितियां भी सामने आने लगती हैं. इस पुस्तक के लिए एक लम्बे समय से दिमाग काम कर रहा था और दिल भी इसके लिए समान रूप से दिमाग का साथ दे रहा था. ऐसे में विभिन्न घटनाओं को लिखना, तमाम घटनाओं को जानबूझ कर छोड़ना, बहुत सी घटनाओं पर काल्पनिकता का आवरण ओढ़ाना, बहुत सी बातों को एक आवरण के सहारे नए रंग में पेश करना आदि ऐसे कदम थे जो अपनाने थे. इस बारे में हमारा मानना यह रहा है कि अपने जीवन को सार्वजनिक करने का यह मंतव्य कतई नहीं होना चाहिए कि दूसरे के जीवन में उथल-पुथल मच जाये. इसी कारण से सब कुछ सच्ची-सच्ची होने के बाद भी उसमें ऐसा झूठ चढ़ाया गया जो सच होने के बाद भी सच न लगे.


बहरहाल, अब जबकि अंजुमन प्रकाशन, प्रयागराज से इसका प्रकाशन हो चुका है. यह पुस्तक अमेज़न पर भी बिक्री के लिए उपलब्ध है तो आप सभी से अपेक्षा है कि इसे पढ़ेंगे और हमारे बारे में हमें ही बताने का कष्ट करेंगे.

अंजुमन प्रकाशन के बारे में जानकारी नीचे की लिंक पर दी गई है. वीनस केसरी जी ने पूरी तन्मयता से हमारे ड्रीम प्रोजेक्ट को सफल बनाने का प्रयास किया है, उनका आभार.

अमेज़न की लिंक भी नीचे दी जा रही है. आप यहाँ से कुछ सच्ची कुछ झूठी को मंगवा सकते हैं.

आप सभी का स्नेह अपेक्षित है.

13 अप्रैल 2019

डाइनिंग टेबल की सत्ता और संस्कृति


इधर बहुत लम्बे समय से कुछ पढ़ा नहीं जा रहा था. कुछ अजीब तरह की व्यस्तताएँ अनावश्यक रूप से घेरे हुए थीं. कुछ ऐसा भी इन दिनों हुआ कि खुद आलस्य के साथ दोस्ती कर ली थी. इसके अलावा चुनावी माहौल आने के चलते होने वाली खुद बुलाई व्यस्तता के साथ-साथ सोशल मीडिया की गैर-जरूरी उठापटक में भी फँसे हुए थे. इन तमाम सारे कारणों या कहें बहानों के बीच तमाम सारे काम हो रहे थे बस कुछ पढ़ना नहीं हो पा रहा था. मोबाइल पर पढ़ने की आदत तो लगभग न के बराबर है. हमारे भतीजे द्वारा सादर दिया गया किंडल अस्त्र भी पढ़ाये रखने को कारगर होता नहीं लग रहा था. लैपटॉप भी बहुत ज्यादा आकर्षित नहीं कर पा रहा था कि उस पर ही कुछ पढ़ा जाए. ऐसे में खुद अपने से लड़ते हुए आखिरकार जिला पुस्तकालय जाकर दो-चार नई किताबों को तलाशा गया, नई इस रूप में, जिन्हें हमने पढ़ न रखा हो. इनमें से एक पुस्तक हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा दशद्वार से सोपान तक को पढ़ना शुरू किया. इसका कवर देखते ही उस एक प्रकाशक की मूर्खता पर हँसी आई जिसका कहना था कि किसी साहित्यकार की आत्मकथा में उसका चित्र कवर पेज पर नहीं होता है. ऐसा उसने इस सन्दर्भ में कहा था क्योंकि हमने खुद की आत्मकथा में कवर पेज पर अपना चित्र प्रकाशित करने की शर्त रखी थी. अंततः इसी कारण वो प्रकाशक एक बड़ी आत्मकथा प्रकाशित करने से चूक गया.

बहरहाल, बच्चन जी की आत्मकथा दशद्वार से सोपान तक पढ़ने के दौरान एक जगह उनकी एकबात पर विशेष रूप से ध्यान गया. उनके द्वारा महाभारत का सन्दर्भ देते हुए खाना खाने की मेज पर बैठने सम्बन्धी स्थिति के बारे में लिखा गया है. उनकी बात के अनुसार अमिताभ के आवास प्रतीक्षा में खाना खाने की गोल मेज है. जिसमें उन्होंने सहज ही अपनी-अपनी जगह चुन ली और रोज उसी पर बैठने लगे. इस बैठने सम्बन्धी दिशा का जिक्र उन्होंने महाभारत के सन्दर्भ में किया. उसका यहाँ कोई अर्थ नहीं, यहाँ सन्दर्भ इसका कि बहुतायत घरों में जहाँ खाना खाने की मेज का उपयोग किया जाता है वहाँ पारिवारिक सदस्यों के बैठने की जगह निर्धारित सी हो जाती है. ऐसा कुछ अमिताभ बच्चन की एक फिल्म बागवान में भी दिखाया गया है.

हो सकता है कि खाने की मेज का चलन आने पर ऐसा किसी सामाजिक स्थिति के कारण किया गया हो या फिर पारिवारिक स्थिति के पद, उम्र, अनुभव, रिश्ते, सम्बन्ध आदि के चलते ऐसा किया गया हो. इस बैठक व्यवस्था के पीछे का मूल बिंदु क्या है, यह अलग शोध का विषय हो सकता है, जिस पर यद्यपि अभी हमारी कोई रुचि नहीं. जहाँ-जहाँ हमने खाने की मेज पर बैठने की पारिवारिक व्यवस्था देखी वहाँ उम्र के साथ-साथ प्रस्थिति का भी ख्याल किया गया. इसे भी घर-परिवार में किसी एक व्यक्ति के प्रति सम्मान भाव भी कहा जा सकता है साथ ही इसे उसके प्रति सत्तासीन होने के भाव की आवृत्ति पैदा करना भी हो सकता है. जो व्यक्ति परिवार में सम्मान का पात्र है उसे सम्मान मिलता ही है फिर खाने की मेज पर उसकी बैठकी को लेकर इतनी सजगता क्यों? कभी लगता है कि खाने की मेज भी एक तरह से राजशाही जैसा वातावरण पैदा करती है. सबके हिसाब से सबकी जगह का निर्धारण किया जाना और निर्धारण पश्चात् उसका उसकी जगह पर ही बैठना. संभव है कि कभी जगह का परिवर्तन होने पर परिवारों में फ़िल्मी नौटंकी न होती हो मगर बहुतेरे घरों में इस बैठकी को लेकर एक तरह की सुरक्षात्मक सावधानी बरतते अवश्य देखा गया है. कुछ घरों में हमने स्वयं ऐसा होते देखा है, जहाँ पारिवारिक सदस्य की प्रस्थिति के अनुसार उसकी सीट का निर्धारण हो जाता है. आखिर ऐसा क्यों? क्या खाने की मेज पर बैठना भी व्यक्ति की प्रस्थिति का परिचायक है? क्या खाने की मेज पर बैठक व्यवस्था भी किसी शासन-सत्ता जैसी व्यवस्था का सूचक है? कहीं खाने की मेज पर बैठक व्यवस्था किसी विशेष व्यक्ति के अधिकारों को तो प्रदर्शित नहीं करती? 

चूँकि अभी तक हम लोगों द्वारा खाने की मेज का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है. कतिपय कारणों से अब जमीन पर बैठकर भोजन करना असंभव हो गया है अन्यथा पहले सभी सदस्य जमीन पर पालथी मार कर ही बैठते और भोजन का सामूहिक आनंद लिया करते थे. संभव हो कि डाइनिंग टेबल पर भोजन करने का अपना संस्कार हो, अपनी संस्कृति हो पर क्या वह संस्कृति घर, होटल, किसी आयोजन आदि में एकसमान ही रहती है? चलिए, इस पर कुछ खोजबीन के बाद कुछ और कहा-लिखा जायेगा. तब तक हम बच्चन जी की आत्मकथा से निपट लें.



08 फ़रवरी 2019

कुछ सच्ची कुछ झूठी के कुछ कवर पेज









आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी के लिए कुछ कवर तैयार किये हैं. अभी ये अंतिम नहीं हैं, बस दिमाग दौड़ाया जा रहा है कि क्या कैसे बनाया जाए. फोटो अपनी ही लगानी है क्योंकि आत्मकथा है. बाकी इसका अंतिम रूप अभी बनना बाकी है.
सुझाव आमंत्रित हैं. 

08 जनवरी 2019

कुछ सच्ची कुछ झूठी


हर व्यक्ति का कोई न कोई ड्रीम प्रोजेक्ट होता है. हमारा भी एक ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है. वह है हमारी आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी. विगत कुछ वर्षों से इसका लेखन चल रहा था. कभी कुछ जोड़ा जाता, कभी कुछ हटाया जाता. पिछले लगभग एक वर्ष से यह पूर्णता की स्थिति में लैपटॉप में सुरक्षित थी. कुछ परिचितों के भरोसे उसके प्रकाशन के लिए हाथ-पैर मारे मगर सभी जगह से निराशा ही हाथ लगी. इसके बाद दिमाग से नमी-गिरामी प्रकाशकों का ख्याल निकाल दिया. सबके अपने नखरे तो हम कौन से कम नखरेबाज. एक पल में निर्णय लिया कि अब इसे किसी नामी प्रकाशक से नहीं छपवायेंगे भले ही वो घर आ जाये. इसके बाद विगत कुछ माह से इधर-उधर हाथ-पैर चलाये.


इस हाथ-पैर चलाने के बाद एक बात लागू हुई, हमारे साथ. वो ये कि बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा. हुआ ऐसा कि एक दिन हमारे प्रिय लखन लाल मिलने घर आये. बातचीत के दौरान उन्होंने कुछ सच्ची कुछ झूठी की चर्चा छेड़ दी. जब उनको पता चला कि अभी भी वो पाण्डुलिपि के रूप में लैपटॉप में सुरक्षित है तो वे तुरंत उसके प्रकाशन करवाने के लिए बोले. उनकी बातों से लगा कि एक वे ही नहीं बहुत से लोग इंतजार में हैं. लोगों की क्या कहें, हम खुद अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के धरालत पर उतर आने के इंतजार में हैं. बस, बात की बात में उन्होंने तुरंत एक प्रकाशक के नाम पर अपनी सहमति देते हुए अंतिम मुहर लगाई.
लखन की विश्वासपरक सहमति के बाद तुरत-फुरत प्रकाशक से बात करके सारी बात अंतिम रूप से तय की. इसके बाद कुछ सच्ची कुछ झूठी को प्रकाशन हेतु प्रेषित कर दिया. सब कुछ ठीक रहा तो फरवरी अंतिम सप्ताह में या कि मार्च पहले सप्ताह में हमारी कथा आपके हाथ होगी.

05 जनवरी 2019

बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं


मुलाकात जब पहली बार हुई तो न फिल्मों की तरह पहली नजर वाला आकर्षण उभरा, न पहली नजर के प्रेम जैसा कुछ एहसास हुआ. कुछ दिनों की कुछ मुलाकातें जो हँसी-मजाक के साथ ख़तम हो गईं. हम दोनों की अपनी-अपनी राहें थीं, अध्ययन वालीं, सो आगे चल दिए. पढ़ने को, एक ठो डिग्री लेने को. पर वो कहते हैं न कि दुनिया गोल है, किसी न किसी दिन फिर मिलते हैं. हम दोनों फिर मिले, अबकी कुछ साल बाद मिले.


पहली बार की मुलाकात के समय के मुकाबले अबकी मुलाकात में हम दोनों कुछ परिपक्व भी थे. इस परिपक्वता में भी पहली नजर के आकर्षण जैसा कुछ न हुआ, न इधर, न उधर. इसके बाद मुलाकातें हुई, कई बार हुईं, नियमित न सही मगर जल्दी-जल्दी हुईं. वैचारिकता के अपने-अपने धरातल निर्मित हो चुके थे. सोचने-समझने की मानसिकता भी विकसित हो चुकी थी. क्या सही है, क्या गलत है की दृष्टि विकसित हो चुकी थी. ऐसे में महज आकर्षण जैसा कुछ नहीं होना था. यदि होना होता तो पहली बार की मुलाकात में हुआ होता. पहली बार मिलने पर न हुआ तो कई साल जब दोबारा मिले, तब ऐसा होना था मगर नहीं हुआ. 

ऐसा भी नहीं कि सौन्दर्य बोध का अभाव रहा हो. आँखों में चुम्बकीय आकर्षण, चेहरे पर प्राकृतिक मुस्कान, सादगी का प्रतिरूप होने के बाद भी पहली नजर के आकर्षण से बचने का कारण शायद ये रहा हो कि उसे कभी भी देह के मापदंडों पर नहीं आँका. बहरहाल, समय गुजरता रहा, मुलाकातें चलती रहीं मगर ख़ामोशी उसी तरह बनी रही.

उस ख़ामोशी के साए में कुछ स्वर गूँजे... कुछ कहने का प्रयास हुआ...

उस दिन उससे पहली बार मिलना तो हो नहीं रहा था. पहले भी कई-कई बार मुलाकात हो चुकी थी, ये बात और है कि पहली मुलाकात में एक आकर्षण सा महसूस हुआ था. उस पहली मुलाकात के कई वर्षों बाद जब उससे मिलना हुआ तो ठीक वही एहसास हुआ जो पहली मुलाकात के समय हुआ था. मिलना-जुलना नियमित तो नहीं किन्तु होता रहा. आपस में बातचीत, हँसी-मजाक, छेड़छाड़, गपशप किन्तु उस शाम का मिलने ने दिल को झंकृत कर दिया. समझ नहीं आ रहा था कि ये प्यार है या फिर जब पहली बार मुलाकात हुई थी, वो प्यार था?

बेधड़क किसी से भी कुछ भी कह देने की सामर्थ्य कहीं चुकती सी लगने लगी. बहती नदी के धारे संग-संग भावनाएं बन रही थीं, दोस्त की बाँह थामे हिम्मत बटोरने की कोशिश की जा रही थी. अंततः बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं और कभी उसका कहा सत्य साबित हुआ कि आँसू सँभाल कर रखिये, किसी दिन हमारे लिए भी बहाने पड़ेंगे.



24 अप्रैल 2018

विश्व पुस्तक दिवस पर नई पुस्तक-लेखन आरम्भ - 'रात का शहर'


कल पुस्तक दिवस मनाया गया. जिनको पुस्तकों से प्रेम है उन्होंने तो जोश के साथ मनाया और जिनको पुस्तकों के प्रति प्रेम दर्शाना था उन्होंने सेल्फी के साथ मनाया. किताबों के प्रति हमारे लगाव का एक बहुत बड़ा कारण आनुवांशिक कहा जा सकता है. पिताजी को और बाबाजी को जबरदस्त शौक था पढ़ने का. बाबाजी को हमने पूरे दिन कुछ न कुछ पढ़ते बराबर देखा है. समाचार-पत्र को वे इस तरह पढ़ते कि कोई एक समाचार भी उनसे बचकर नहीं निकल पाता. इसी तरह पिताजी को हमने एक दिन में उपन्यास समाप्त करते देखा है. उरई में हमारे परिचित की एक दुकान हुआ करती थी. मंगलवार साप्ताहिक बंदी के चलते दुकान बंद रहती. पिताजी को उस एक दिन में किताब समाप्त करते देखा है. इसके अलावा तमाम सारी पत्रिकाएँ हमारे घर में आती. हम बच्चों के लिए भी अनेक पत्रिकाएँ पिताजी लाया करते थे. चंपक, लोटपोट, चंदामामा, गुड़िया, नंदन, सुमन सौरभ, चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी आदि से परिचय बराबर होता रहता था. आगे चलकर राजन-इक़बाल सीरीज ने खूब आकर्षित किया. न जाने कितनी कॉमिक्स हम दोस्तों के बीच इधर से उधर होती रहतीं. पढ़ने के इस शौक में उस समय चार चाँद लग गए जबकि कक्षा छह में एडमीशन लेने पर जीआईसी कैम्पस में राजकीय पुस्तकालय के दर्शन हो गए. आज भी राजकीय पुस्तकालय नियमित रूप से जाना होता है. आज भी पुस्तकों के साथ दोस्ती बहुत गहरी है. सफ़र में आज भी कई-कई किताबें हमारी सहयात्री बनती हैं.


पढ़ने के अपने शौक के बीच याद नहीं कि कब बचपन में लिखने का भी शौक लग गया था, जो आज तक बना हुआ है. उस समय हमारी उम्र शायद नौ-दस वर्ष की रही होगी जबकि हमने अपनी पहली कविता लिखी थी. पिताजी की तरफ से हमेशा ऐसे कामों के लिए प्रोत्साहन मिलता रहा. उन्होंने उस कविता को उस समय दैनिक भास्कर, स्वतंत्र भारत और आज में प्रकाशित करवाया था. बहरहाल, समय के साथ पढ़ना-लिखना दोनों बढ़ता ही रहा. किताबों की संख्या अलमारी में बराबर बढ़ती रही. लिखने वाली सामग्री भी बढ़ती रही. इस लिखने के शौक का जब छपास रोग से संपर्क हुआ तो लिखना और तेज हो गया. अब चूँकि छपने के लिए भी लिखना था सो पढ़ना और भी ज्यादा जरूरी हो गया, सो पढ़ना उससे भी अधिक तेज हो गया. कालांतर में तकनीकी विकास ने लेखन को ब्लॉग, वेबसाइट ने विकास के आयाम दिए. बहुत कुछ लिख-पढ़ लेने के बाद कुछ अपने बारे में लिखने-बताने की इच्छा हुई तो आत्मकथा कुछ सच्ची, कुछ झूठी का लेखन शुरू किया. अपने चालीस वर्ष के जीवन को जैसे देखा-समझा, इतने वर्षों में बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव हुए, बहुत से अपने-पराये साथ आये उन सभी अनुभवों को इकठ्ठा करने का काम किया.


आत्मकथा लेखन पूर्ण हुआ और उसके प्रकाशन की प्रक्रिया आरम्भ करनी है, बस किसी प्रकाशक की सहमति के इंतजार में हैं. इस बीच कुछ अन्य विषयों पर पुस्तक लिखने का विचार बन रहा था. जिसमें से एक पुस्तक काव्य-रूप में है. इसमें एक शहर को जिंदगी से, व्यक्तियों से, किसी स्थान से, किसी सजीव-निर्जीव से, समय-काल-परिस्थिति आदि से सम्बंधित करके दिखाया गया है कि वह शहर रात में किस तरह की अनुभूति करता है. आत्मकथा लेखन के पश्चात् इसी पुस्तक रात का शहर को लिखने का विचार था. कल पुस्तक दिवस के अवसर इसे आरम्भ किया है. दस-बारह पंक्तियों की काव्य-रचना के द्वारा इसी अनुभूति को रात के शहर के सम्बन्ध में दर्शाने का प्रयास किया गया है. अभी बने खाँचे के अनुसार विचार ये किया है कि महज इक्यावन काव्य-रचनाओं का संकलन किया जायेगा.
एक काव्य-रचना को उदाहरण स्वरूप देखिएगा-

यादों में बस गया था वो रात का शहर,
इक अफसाना बन गया वो रात का शहर.

सूनी गली के घर से झांकती आँखें,
फैक्ट्री से लौटते पिता को ताकती राहें.

झींगुरों के गीतों से सन्नाटों का बिखरना,
पहरेदारों की तरह था कुत्तों का विचरना.

खांसना-खखारना किसी बुजुर्ग पड़ोसी का,
गूंजता स्वर ले लो मूंगफली, लईया, पट्टी का.

झिर-झिर कर आती रौशनी हलकी सी,
अंधकार को जीतने की कोशिश ज़ारी थी,

खम्बे के उस बल्ब को किसी की नजर लग गई,
घुप्प अन्धकार में घिर गया वो रात का शहर.

22 अप्रैल 2018

कितनी-कितनी कतरनें सुरक्षित हैं इस दिल में


शाम जितनी तेजी से गहराती जा रही थी, कार भी उसी गति से भागने में लगी थी. प्रकृति और इन्सान की इस भागमभाग से कहीं अधिक तेज दर्द की लहर सिर से पैर तक उठकर अन्दर तक हिलाकर रख दे रही थी. आँखों में अनेकानेक कौंधते सपनों के बीच चंद शंकाएं जन्मती. सपने मचलते, आने वाले समय में बहुत कुछ करने को प्रेरित करते मगर उसी के बीच सुराख़ खोजकर शंकाओं का जन्म डराता भी. भविष्य के सपने एकाएक गायब होते दिखते और लगता कि आशंकाएँ विकराल रूप धर कर एक और बुरी खबर का निर्माण करने में लगी हैं. ऐसा महसूस होता मानो कार के भीतर की चीखती ख़ामोशी आशंकाओं को अपना रूप धरने का अवसर दे रही है. ख़ामोशी को तोड़ने की कोशिश में सपनों को, आशंकाओं को दरकिनार करते हुए वर्तमान को सबल बनाया जाने लगता. गहराते अंधकार के साए से बाहर निकलने की जद्दोजहद में परिवार, जिम्मेवारियाँ, सपने, कर्तव्य आदि-आदि न जाने क्या-क्या न दिमाग में उथल-पुथल मचाये था. झपकती पलकों, बंद होती आँखों, टूटती साँसों, ढीली पड़ती नब्ज़, सूखते होंठों, अपलक निहारते बेचैन अपनों के बीच खुद को बनाये रखने की, बचाए रखने की, विश्वास कमजोर न होने देने की लड़ाई उस पूरी रात चलती रही.


आहिस्ता-आहिस्ता धड़कन खोते जा रहे दिल के विश्वास ने दोस्ती को आवाज़ दी और उसके हाथों में अपने आपको सौंपते हुए भी परिवार के भविष्य की चिंता सता रही थी. अपने अस्तित्व की चिंता व्यक्त की जा रही थी. नव-परिवार की संकल्पना के आधार को नया आधार देने की बात की जा रही थी. कुछ न होने देने के विश्वास के बीच हांफती साँसें डरा जाती मगर विश्वास की डोर एक-दूसरे को थामे रही और साँसों को भटकने नहीं दिया गया. अंधकार-रौशनी, आसमान-धरती, चाँद-तारे, तेज शोर-सन्नाटा, शीतल एहसास-जलती आग की गरमी, हथेलियों की मजबूत पकड़-रेत की तरह सबका छूटते जाना न जाने क्या-क्या अनुभव गुजरते जा रहे थे. औजारों के शोर डराते मगर अपनी ही चीखों के बीच खुद को संभालने के बीच आँखें अपने विश्वास को तलाशती. परिजनों की अपनी चिंताओं के बीच, दोस्तों के अपनत्व के बीच हम सब एक-दूसरे को दिलासा देने की कोशिश करते दिखते. आँखों में छलकते आँसुओं को अपनी पलकों में छिपा होंठों पर मुस्कान लिए मिलते. वे अपने दुःख का एहसास छिपाना चाहते हम अपने दर्द को पीने में लगे रहते.

एक दशक से अधिक का समय गुजरता हुआ लगभग रोज ही उसी जगह खड़ा कर देता है जहाँ से दर्द की लहर उठना शुरू हुई थी. एक-एक पल दर्द की सीमाओं को तोड़ता हुआ आज भी नस-नस में समा जाता है. देह के इस दर्द के अलावा भी बहुतेरे दर्द मिले, अपनेपन के सुखद एहसास के बीच बहुतेरे सुख भी मिले. अपनों के भी, गैरों के भी. लगता है बहुत बार कि सामने आना चाहिए सबकुछ. क्यों और किसके लिए सब कुछ अपने अन्दर ज़ज्ब किये रहा जाये? बहुत कुछ होता है जो कह कर भी नहीं कहा जा सकता है. बहुत कुछ होता है जो अनकही रूप में कह लिया जाता है. इस कही-अनकही के बीच की कड़ी बनानी है जो अपनों से भी जोड़ेगी, जो गैरों से भी जोड़ेगी. है बहुत कुछ उस दर्द के सिवाय भी जो सिर्फ सहा ही गया. है बहुत कुछ भी उस रात के सिवाय जो सुबह में बदला नहीं गया. है बहुत कुछ बताने को जो कहकर भी कभी कहा नहीं गया. दर्द की, दिलासा की, अपनेपन की, विश्वास की, दोस्ती की, ममता की, भाईचारे की, बंधुत्व की, सामाजिकता की, आलोचना की न जाने कितनी-कितनी कतरनें हैं जो सुरक्षित हैं उसी दिल में जो उस रात न धड़कते हुए भी धड़क रहा था, आज भी धड़क रहा है. 


23 मई 2014

कभी हसरत थी आसमां छूने की, अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की - 800वीं पोस्ट




ये पोस्ट हमारे ब्लॉग की आठ सौवीं पोस्ट है, कुछ अलग हट के लिखने की सोच रहे थे और कई-कई मुद्दों पर दिमाग जाने के बाद भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखा जाये. क्या-क्या और किस-किस पर नहीं लिखा इतनी सारी पोस्ट में. मई २००८ के आरम्भ में शुरू किये अपने इस ब्लॉग के द्वारा विभिन्न मुद्दों पर लिखा, बहुत से लोगों का स्नेह मिला, बहुत से लोगों का कोप भी सहा; कुछ लोग जुड़ते चले गए, कुछ लोग जुड़-जुड़ कर भी दूर होते गए. ऐसे में लगा कि कुछ अपनी इस यात्रा के बारे में ही लिखा, बताया जाए. इसमें भी मन नहीं भरा क्योंकि इस बारे में पहले भी लिख चुके हैं. फिर लगा कि इस पोस्ट में विशुद्ध अपने बारे में ही कुछ लिखा जाये क्योंकि अपने ऊपर ही कुछ नहीं लिखा अभी तक. (दूसरा तो कोई वैसे ही हम पर लिखने से रहा)  इधर बहुत समय से खुद पर लिखने के लिए कुछ सोचा भी जा रहा है, वो भी आत्मकथा के रूप में.
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जिंदगी के चार दशक कम नहीं होते हैं अपने बारे में कुछ लिखने के लिए और यही सोचकर आत्मकथा लिखना शुरू भी कर दिया है. हाँ, आत्मकथा लिखना है तो नाम भी रखना पड़ेगा, सो ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी’ नाम भी सोच लिया है. कुछ मित्रों को इस नाम पर ‘कुछ झूठी’ शब्द पर आपत्ति हुई, हो सकता है कि उनकी आपत्ति सही हो किन्तु हमारी दृष्टि में आत्मकथा खुद की कहानी लिखने से ज्यादा खुद के द्वारा जीवन के समझने को, लोगों को देखने-परखने को, अपने प्रति लोगों के नजरिये को, अपने साथ गुजरे तमाम पलों के अनुभवों को समेटने-सहेजने का माध्यम मात्र है. इसमें सच तो सच के रूप में है ही किन्तु कुछ ऐसे सच, जिसके सामने आने से दूसरों की सामाजिकता, दूसरों के व्यक्तिगत जीवन, दूसरों की गोपनीयता पर किसी तरह का संकट आता हो; किसी की मर्यादा, किसी का सम्मान, किसी के आदर्शों को ठेस पहुँचती हो, को कुछ कल्पनाशीलता का आवरण ओढ़ा कर पेश किया जायेगा. हमारे लिए यही ‘कुछ झूठी’ साथ रहेगा किन्तु सत्य के साथ.
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दरअसल हमने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सहा है. बहुत कुछ अनुभव इस तरह के हैं जिन्होंने समय से पूर्व हमें बड़ा बना दिया. सुख की बारिश को देखा है तो दुखों की तपती धूप भी सही है; गैरों का साथ पाया है तो अपनों को बेगाने होते भी देखा है; समाज के कठोर धरातल पर खुद को खड़ा किया है तो ठोकर खाकर खुद को संभाला भी है. बनते-बिगड़ते कार्यों से, खट्टे-मीठे अनुभवों से, बचपन-युवावस्था से, घर-बाहर से, दूसरों से-अपने आपसे, सुख-दुःख से बहुत-बहुत कुछ सीखा है. हताशा, निराशा, नकारात्मकता को कभी भी खुद पर हावी नहीं होने दिया है. जीवन को खुशनुमा बनाये रखे का हमने एक मूलमंत्र बना रखा है कि ‘भूतकाल से सीखकर वर्तमान को सुधारो, भविष्य कैसा होगा ये किसी को नहीं पता है.’ और यही कारण है कि हँसना.. खूब खुलकर हँसना हमारी आदत में है; हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाना हमारी फितरत में है (सिगरेट वाला धुआँ नहीं); मौज-मस्ती, यारी-दोस्ती निभाना हमारी दिनचर्या में है; अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीना हमारी जीवनशैली में है; बेधड़क होकर, निडर होकर, बेख़ौफ़ होकर जीना हमारी विरासत में है. और ये उसी स्थिति में संभव है जबकि आपके साथ आपके अपने तो हों ही, गैर भी आपके अपनों जैसे लगते हों और यही हमारी सम्पदा है, हमारी पूँजी है. हमारा पूरा परिवार तो हमारे साथ है ही, हमारे मित्र, हमारे सहयोगी भी हमारे अपने हैं और इस पूँजी के दम पर ही “कभी हसरत थी आसमां छूने की, अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की” को अपना दर्शन बना रखा है.
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इस ब्लॉग की 800वीं पोस्ट