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08 फ़रवरी 2022

परिस्थितियों से सीखने को तैयार नहीं इंसान

ऐसा लगता है कि इंसान की याददाश्त अल्पकालिक होती है. उसके कृत्य बताते हैं कि वह अपने अतीत से या फिर तात्कालिक रूप में घटित होने वाले घटनाक्रमों से भी बहुत कुछ सीखता हैं है. ऐसा इसलिए क्योंकि वह बहुत जल्द ही उन सारी स्थितियों को, घटनाओं को भूल जाता है जिनके द्वारा वह कुछ सीखने की बात कहता था. बहुत सारे इधर-उधर के उदाहरणों के बजाय विगत दो वर्षों में समाज में उथल-पुथल मचा देने वाले कोरोनाकाल की ही घटनाओं को देख लें तो समझ आता है कि इंसान की याददाश्त अल्पकालिक है. वैसे याददाश्त के कमजोर होने या अल्पकालिक होने के अलावा यह भी कहा जा सकता है कि इंसान अपने साथ होने वाली घटनाओं से भी कुछ नहीं सीखना चाहता है.


कोरोनाकाल में लॉकडाउन के समय में जिस तरह से व्यक्ति घरों में कैद हुए, जिस तरह से अल्प संसाधनों में दैनिक कार्य सम्पन्न होते रहे, जिस तरह से मनुष्य के संयमित और सीमित कृत्यों से प्रकृति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले थे उनको देखकर बहुतेरे मनुष्यों ने संकल्प सा ले लिया था कि वे इसी तरह से अपनी जीवन-चर्या को आगे बढ़ाएंगे. लॉकडाउन के समय में कुछ छूट दिए जाने के दौरान जिस तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक, वैवाहिक कार्यक्रमों, आयोजनों में लोगों के आने को सीमित किया गया, उसके द्वारा भी बहुत से लोगों ने सीख लेने की बात कही. बहुत से लोगों को शादी-विवाह के आयोजनों में सीमित संख्या में लोगों के शामिल होने का शासन का, सरकार का निर्णय ऐसे आयोजनों में होने वाले अपव्यय को रोकने का यह सबसे अच्छा कदम लगा था. लोगों ने भविष्य के लिए इसी कदम को स्वतः उठाने की, उस पर अमल करने की मानसिकता दर्शायी थी.




लोगों की सभी तरह की धारणाएँ, तमाम तरह के संकल्प उसी समय धराशाही से होते दिखे जिस समय लॉकडाउन को पूरी तरह से हटा लिया गया. कोरोनाकाल के दौरान लगाये गए तमाम सारे प्रतिबंधों को खोल दिया गया तो इंसान अपने पुराने रंग-ढंग में नजर आने लगा. जो व्यक्ति लॉकडाउन में दूरी बनाये रखने की, मास्क पहनने की, कम संख्या में भीड़ जुटाने की बात करता दिखता था, वही खुलेआम भीड़ का हिस्सा बनने लगा, आयोजनों में बिना किसी सुरक्षात्मक कदमों के सहभागिता करने लगा, अपने आयोजनों में भीड़ का आमंत्रण करने लगा. वैवाहिक आयोजन रहे हों या फिर धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रम हो या फिर राजनैतिक, बाजार हों या फिर कार्यालय सभी जगह भीड़ अपनी पूरी क्षमता से दिखाई देने लगी. अब ऐसा लगने लगा कि व्यक्तियों को न तो कोरोना का भय है और न ही कुछ महीनों पहले कोरोना से होने वाली मौतों से उसने कुछ सीखा है.


इन्हीं सबको देखकर लगता है कि इंसान अल्पकालिक स्मृति रखता है, जो सिर्फ उसी समय काम करती है जबकि वह उसी स्थिति से गुजर रहा होता है. 


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05 फ़रवरी 2022

एक बीमारी ने बचाया तो दूसरी ने घेरा बच्चों को

असमंजस का दौर अभी भी समाप्त नहीं हुआ है. भयग्रस्त वातावरण अभी भी बना हुआ है. विविध प्रकार के नुकसान रोज ही सामने आ रहे हैं. विगत दो वर्षों से कोरोना वायरस से लड़ते हुए देश ने बहुत सारे मोर्चों पर सफलता भी पाई है तो बहुत सारे क्षेत्रों में नुकसान भी उठाना पड़ा है. विविध क्षेत्रों के नुकसान का आकलन लगाकर उसकी भरपाई के तरीके भी खोजे जाने लगे हैं. आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में अपनी-अपनी तरह से संसाधनों को एकत्र करके, उपलब्ध संसाधनों को पुनर्जीवन प्रदान करके नुकसान को बहुत हद तक पाटने की कोशिश जारी है. इसी में एक क्षेत्र ऐसा है जिसके नुकसान की तरफ बहुत अधिक न तो ध्यान जा रहा है और न ही उसकी भरपाई के लिए विचार किया जा रहा है.


ऐसा एक क्षेत्र शिक्षा जगत है, जहाँ विगत दो वर्षों से व्यापक असमंजस बना हुआ है. जैसे ही लगता है कि स्थिति कुछ सामान्य होने जा रही है वैसे ही कोरोना का कोई नया वेरिएंट आकर सबको भयग्रस्त कर देता है. ऐसे में सबसे ज्यादा डर बच्चों की सुरक्षा को लेकर ही उत्पन्न होता है. इस भय के चलते ही जहाँ एक तरफ अभिभावक बच्चों को शैक्षिक संस्थानों में भेजने से बचने लगते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी एक तरह का अभिभावकत्व भाव अपनाते हुए शैक्षिक संस्थानों को सबसे पहले बंद करवा देती है.


यह सच है कि बच्चों के स्वास्थ्य, उनकी शारीरिकता को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं की जा सकती है. सरकार का आरम्भ से ही प्रयास रहा है कि बच्चों को इस बीमारी के प्रकोप से बचाए रखा जाये. वैक्सीन की अनुपलब्धता होने की स्थिति में तमाम सारे सुरक्षात्मक उपाय समय-समय पर सरकार की तरफ से, समाज की तरफ से बताये जाते रहे, अपनाये जाते रहे. शैक्षिक संस्थानों का बंद किया जाना भले ही बच्चों को इस बीमारी से बचाए रखने का एक कारगर उपाय बनकर सामने आया हो मगर इसके भी अपनी तरह के नुकसान बच्चों को उठाने पड़े हैं. ऐसे नुकसान ये बच्चे आज भी उठा रहे हैं.


संस्थानों को बंद करवा कर, बच्चों को विद्यालयों में न भेजकर उनकी स्वास्थ्य समस्या के प्रति एक तरह की जागरूकता दिखाई गई, उनको स्वास्थ्य मामलों में भले ही सुरक्षित कर लिया हो मगर इसी के दूसरे पहलू में बच्चों को असुरक्षित भी कर दिया गया है. इस सन्दर्भ में यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो ऑनलाइन कक्षाओं ने बच्चों को कई तरह से नकारात्मक रूप में प्रभावित किया है. कई-कई घंटे मोबाइल, कम्प्यूटर की स्क्रीन में आँखें लगाये बैठे बच्चों को आँखों की समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है. किसी समय मोबाइल और कम्प्यूटर की रौशनी को बच्चों की आँखों, उनके रेटिना के लिए घातक बताया जाता था. अब कोरोना के चलते हुई बंदी ने इसी खतरे के साथ बच्चों को बड़ा होने को विवश किया.


यहाँ एक बिंदु आँखों की समस्या का होना ही नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ एक और शारीरिक समस्या उभरी गर्दन में दर्द की, रीढ़ की हड्डी में विकार की. सामान्य रूप में किसी भी विद्यालय द्वारा कम से कम पाँच घंटे तक ऑनलाइन कक्षाओं का सञ्चालन किया गया. इतनी लम्बी अवधि तक एक अवस्था में बैठ कर, गर्दन को झुकाकर मोबाइल, कम्प्यूटर स्क्रीन में काम करने से बहुतायत बच्चों में रीढ़ की हड्डी की, गर्दन की समस्या उभरी है. इन शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ बहुत से बच्चों में आपसी समन्वय, सहयोग, सामंजस्य आदि जैसी स्थितियों में भी ह्रास देखने को मिला है. इस अवधि में बहुत से बच्चे मानसिक रूप से कमजोर भी हुए हैं. ये और बात है कि उनके द्वारा अपनी पाठ्य-सामग्री को, अपने पाठ्यक्रम को बखूबी पूरा किया गया, अपने शैक्षणिक अंकों के मामले में भी उनमें बहुत ज्यादा नकारात्मकता देखने को नहीं मिली है मगर जिस उद्देश्य के साथ बच्चों को किसी संस्थान में जाना होता है, उस उद्देश्य की पूर्ति न होने के कारण बच्चों के मानसिक विकास में भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.


लॉकडाउन जैसी स्थिति के कारण से बच्चों का बाहर निकलना भी बंद रहा, पार्क, मैदान में खेलना-कूदना भी बंद रहा. अपने मित्रों, विद्यालय के सहयोगियों के साथ मिलना-जुलना न होने के कारण भी उनमें अकेलेपन जैसी मानसिकता ने जन्म लिया है. समूह के साथ मिलकर काम करने की भावना में भी कमी आई है. न केवल खेलने के सन्दर्भ में बल्कि सामूहिक रूप से अध्ययन करने, परीक्षाओं की तैयारी करने के सन्दर्भ में भी इसे देखा जा सकता है. इस तरह की कमी होने से बच्चों के मानसिक विकास का एक पक्ष कहीं न कहीं कमजोर हुआ ही है. बहुत से नौनिहाल तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी आरंभिक अवस्था में विद्यालय के दर्शन ही नहीं किये हैं. उम्र की दृष्टि से उनको आगे की कक्षाओं में भले ही प्रवेश दे दिया जाये, उनके ज्ञान को, शब्द-भंडार को भले ही घर-परिवार के द्वारा समृद्ध कर दिया गया हो मगर विद्यालय की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा से वे निश्चित ही हमेशा के लिए वंचित रह गए हैं. निश्चय ही इससे उनके कोमल मन पर जिस भावना का प्रस्फुटन होना था, वह नहीं हो सका है.


शैक्षिक संस्थानों को आये दिन बंद करके सरकार ने, समाज ने, परिवार ने बच्चों को बीमारी से तो बचा लिया. उनको स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या में जाने से रोक लिया मगर उसके बदले दूसरी तरह की शारीरिक समस्या में अजनाने ही धकेल दिया है. उनके शैक्षणिक विकास के लिए तकनीक का सहारा दिलवाया तो उसके बदले मानसिक समस्या का उपहार भी दे दिया. कोरोना संक्रमण से बच्चों को बचाया गया मगर वे अकेलेपन, अवसाद, गुस्सा, तनाव आदि से संक्रमित होने लगे. बीमारी से बचाव के लिए उठाये गए कदमों ने बच्चों को, नौनिहालों को अजनाने दूसरी तरह की बीमारियों, समस्याओं से ग्रसित करवा दिया. असमंजस के वर्तमान दौर से उबरते हुए बच्चों को उनकी इस नवीन समस्या से, उनकी मानसिक परेशानी से मुक्त करवाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए. यदि सरकार, समाज, शैक्षिक संस्थान, परिवार ऐसा करने में असफल रहते हैं तो देश की बहुत बड़ी भावी पीढ़ी एक अनचाही, अनजानी बीमारी के साथ आगे बढ़ेगी.




(उक्त आलेख दिनांक 05.02.2022 के बीपीएन टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)

08 सितंबर 2021

संवेदनहीन इंसान का विनाश निश्चित है

पिछले साल जब कोरोना की पहली दस्तक देश में हुई थी तो उसके बाद लगे लॉकडाउन के समय लोगों के विचार ऐसे बने जैसे अब वे बहुत कुछ सीख चुके हैं. इसके बाद जैसे ही अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई वैसे ही सब पुराने ढर्रे पर वापस आ गया था. इसके बाद जैसे ही दूसरी खतरनाक, जानलेवा लहर समाज में दिखाई दी तो लगा कि शायद अब इंसान कुछ सीखने की कोशिश करेगा. आपसी संबंधों को लेकर, एक-दूसरे की मदद करने को लेकर, संपत्ति के प्रति तृष्णा को लेकर, धन संग्रह की प्रवृत्ति को लेकर हो सकता है कि इंसान कुछ सीखे. बहुत से लोगों के विचारों को जानने-समझने का अवसर मिला. उससे लगा कि न सही सबके सब मगर कुछ हद तक इंसान अपने आपको बदलने की कोशिश करेगा.




इधर विगत कुछ महीनों से कोरोना से डर-भय जैसी स्थिति जैसे समाप्त ही है. इसी समाप्ति ने बहुत कुछ समाप्त कर दिया है. जिन दिनों आसपास मौत दिख रही थी, अपनों के दूर चले जाने की खबरें आ रही थीं, उस समय बहुतायत लोगों को दार्शनिक की मुद्रा में देखा था, माया-मोह के बंधनों से मुक्त होते देखा था. अब फिर वही कोरोना के पहले की स्थिति दिखाई देने लगी है. इससे एक बात तो समझ आती है कि इंसानी फितरत मूल रूप से अपनी भयावहता को भूल जाने की है. उसके मूल में किसी तरह से न सुधरने की स्थिति छिपी हुई है. देखा जाये तो यह स्थिति खतरनाक है. यदि इंसान सीखने की कोशिश में आगे नहीं बढ़ेगा तो फिर किस तरह से नए-नए मानकों को स्थापित किया जायेगा?


पिछले वर्ष से लेकर अभी तक की जो स्थिति निकली है, जो समय गुजरा है उसमें इंसान ने बहुत कुछ अनुभव किया है. पाया कम है और खोया ज्यादा है. इसके बाद भी ज्यादा से ज्यादा लाभ लेने का लालच, आपदा से गुजर रहे लोगों से भी मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति इस समय देखने को मिली. चिकित्सा से सम्बंधित सामग्री की, दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कालाबाजारी देखने को इसी समय मिली. ये सब यह बताने को काफी है कि इंसान दर्द का अनुभव तभी करता है जबकि वह स्वयं उससे गुजरता है. उसके पहले उसके लिए दूसरे का कष्ट अनुभव करने वाला मामला नहीं बल्कि उससे लाभ लेने वाला मसला होता है. समझने वाली बात है कि यदि व्यक्ति इस कष्टकारी दौर में भी नहीं सुधरा है, इस आपत्तिकाल में भी उसके अन्दर का मानव नहीं जाग सका है, आपदा के इस दौर में भी वह संवेदित नहीं हो सका है तो ऐसे इंसान का पल-पल विनाश की तरफ बढ़ना स्वाभाविक है. ऐसी स्थिति के लगातार बने रहने से समाज का भी विनाश निश्चित है, समाज का ध्वंस भी निश्चित है.


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31 दिसंबर 2020

वर्ष 2020 क्या हम लोगों को याद रहेगा?

वर्ष 2020 क्या हम लोगों को याद रहेगा? ये सवाल इसलिए क्योंकि विगत कुछ दिनों से सोशल मीडिया में, मीडिया में, आपसी बातचीत में इसी साल की चर्चा हो रही है. सभी लोग कामना कर रहे हैं कि ये बुरा साल (उनके हिसाब से) बीते और नया अच्छा साल आये. कुछ लोगों का कहना है कि यह वर्ष 2020 कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा. फिर वही सवाल क्या वाकई ऐसा हो सकेगा? ऐसा इसलिए क्योंकि अभी इसी वर्ष के माह मार्च में जनता कर्फ्यू लगने के तुरंत बाद ही लॉकडाउन लगा दिया गया था. उसके बाद मीडिया में, सोशल मीडिया में न केवल देशव्यापी बल्कि विश्वव्यापी आँकड़े दिखाए जाने लगे. हर तरफ से ऐसी खबरें सामने आने लगीं जैसे कि कोई भयावह राक्षस हर घर में घुसकर सभी को खा जाने पर आतुर है. लोगों में भय, आशंका इस कदर थी कि वे सुनसान गली में भी अपने घर के बाहर निकलने से परहेज कर रहे थे.


समय का चक्र कभी रुका नहीं रहता, सो कोरोना की भयावहता पर भी नहीं रुका. मौतों, बीमारों के आँकड़ों के बीच स्वस्थ होने की सुखद खबरें भी आती रहीं. लोगों के स्वस्थ होने का प्रतिशत लगातार बढ़ते रहने से भी लोगों में आशा का संचार होने लगा. इसी बीच वैक्सीन बनने-बनाने, उसके परीक्षण आदि की खबरों ने भी लोगों में संतोष का भाव जगाया. लॉकडाउन के दौरान जीवन को निरुद्देश्य बताते-मानते लोगों के बीच अनलॉक की प्रक्रिया आरम्भ होने से जीवन के प्रति सकारात्मकता जगी. इसी में धीरे-धीरे अनलॉक को क्रमिक रूप से लागू करते हुए बहुत सारे प्रतिबंधों को दूर कर दिया गया. बहुत सारे कामों को पहले की तरह किये जाने पर जोर दिया जाने लगा. इन सबके बीच सरकार ने सभी को सुरक्षित रहने का सन्देश देने का काम बराबर किया. लोगों को मास्क लगाने, हाथ धोते रहने, शारीरिक दूरी बनाने का सन्देश लगातार सबके बीच प्रत्येक मंच से पहुँचाते रहने का काम सरकारी, गैर-सरकारी मंचों से होता रहा. इसके बाद भी आज बहुतायत लोगों में कोरोना को लेकर, खुद को सुरक्षित रखने को लेकर लापरवाही देखने को मिल रही है.




बाजारों में भीड़, मॉल में भीड़, ऑफिस में शारीरिक दूरी का पालन यथोचित रूप में न दिखना आदि लोगों की लापरवाही को, भूलने की आदत को ही दर्शाता है. भूलने की आदत कोई इसी बीमारी के प्रति ही नहीं है बल्कि हम भारतीयों में यह आम बीमारी है. हम सभी लोग बहुत जल्दी अपने आसपास की घटनाओं को भूल जाते हैं. हमने अपने आसपास की छोटी-छोटी घटनाओं को ही नहीं भुलाया है बल्कि देशव्यापी घटित हुई बड़ी-बड़ी घटनाओं को, वीभत्स घटनाओं को, जघन्य हत्याओं को भी लगातार भुलाने का काम किया है. किसी एक घटना का जिक्र करना बाकी सभी घटनाओं के साथ अन्याय होगा, आप स्वयं अपने दिमाग पर जोर डालकर देखिये और विचार करिएगा कि आपको कौन-कौन सी घटनाएँ, कौन-कौन सा वर्ष भली-भांति याद है. अपनी भूलने की आदत के चलते जल्द ही हम सभी इस वर्ष 2020 को भी भुला देंगे. यह क्षणिक भावुकता है, क्षणिक संवेदना है अन्यथा की स्थिति में देश के बहुत से वर्ष ऐसे निकले हैं जबकि उनमें इस बीमारी से ज्यादा जघन्य घटनाएँ हुई हैं, इससे ज्यादा दिल दहलाने वाली वारदातें हुई हैं.


भूलने की यह बीमारी बहुत हद तक सही भी है. कम से कम इससे दुखों को बहुत लम्बे समय तक ढोते रहने से बचा रहा जाता है. बीते समय के दुःख को भुलाकर आने वाले समय को सुखद बनाने के लिए तत्पर रहने के स्वभाव से हम सभी जल्द ही इस वर्ष 2020 को भूलें और आने वाले अपने समय को सुखमय बनाएँ.


(वर्ष 2020 की अंतिम पोस्ट)


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वंदेमातरम्

14 दिसंबर 2020

कोरोनाकाल की नकारात्मकता में सकारात्मकता

नववर्ष के उल्लास के बीच से निकल कर सामने आया यह वर्ष अब अपने अंतिम चरण में है. कोरोना वायरस की मारक उपस्थिति के बीच इस वर्ष ने नितांत खालीपन पैदा करने के साथ-साथ बहुत कुछ सिखाने का काम भी किया है. आर्थिक दृष्टि से, रोजगार की दृष्टि से, कामगारों, गरीबों, मजदूरों आदि के नजरिये से देखें तो इस वर्ष में अत्यंत कठिनाई भरे दौर देखने को मिले हैं. बहुत से परिवारों ने अपने प्रियजनों को हमेशा-हमेशा के लिए खोया है तो बहुत से परिवारों में इसका खौफ बना रहा. इस वर्ष को बहुत सारी नकारात्मकता के साथ गुजरने वाला वर्ष कहा जा सकता है.


जैसा कि प्रकृति का नियम है तथा सामान्य जीवन में भी देखने को मिलता है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. प्राकृतिक रूप से भी सुख-दुःख, दिन-रात, धरती-आकाश, माता-पिता, पति-पत्नी आदि जैसी युगल अवधारणा हमारे समाज में उपस्थित है. यही वह अवधारणा है जो सामान्य दिनों में, कष्ट के समय में लोगों का विश्वास बढ़ाती है, उनको संयम प्रदान करती है. इस अवधारणा की सशक्तता को यह जाता हुआ वर्ष भी समझाता हुआ समझ आता है.


कोरोना की उपस्थिति होने के बाद जब सरकार द्वारा देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई, उस समय संभवतः किसी को भी इसका भान नहीं था कि यह कुछ दिनों की नहीं बल्कि महीनों तक चलने वाली स्थिति होगी. लॉकडाउन के प्रथम चरण के आगे बढ़ने के बाद ही लोगों में अपने परिवार, अपने परिजनों के प्रति चिंता का भाव बहुत गहराई से दिखाई दिया. जिन परिवारों के बच्चे बाहर शिक्षा में थे अथवा किसी रोजगार में थे उनको वापस घर लाने की कवायद होने लगी. जिन परिजनों में बुजुर्ग लोग थे, कहीं तन्हा रह रहे थे उनके प्रति भी एक तरह की चिंता देखने को मिली थी. परिवार के सक्षम लोग जहाँ एक तरफ अपने बच्चों के सकुशल घर वापसी की कामना कर रहे थे तो वही लोग दूसरी तरफ अपने घर के बुजुर्गों के स्वास्थ्य का, उनकी सेहत का ख्याल रख रहे थे.


बुजुर्गों के मामले में बहुतायत में एक अलग तरह की स्थिति इधर विगत कई वर्षों से देखने को मिल रही थी. जन-जीवन सामान्य रूप से गुजरते रहने के कारण परिवार संयुक्त से एकल और फिर एकल से नाभिकीय रूप में परिवर्तित होने लगे थे. इससे भी परिवार के बुजुर्ग व्यक्तियों को अकेलेपन का सामना करना पड़ रहा था. भौतिकता, आधुनिकता, धन की अंधाधुंध दौड़ में बहुसंख्यक लोगों में परिवार के प्रति, अपने बुजुर्ग परिजनों के प्रति उपेक्षा का भाव भी पनपने लगा था. कोरोना की भयावहता के चलते घरों में कैद रहने के कारण लोगों ने अचानक से परिवार के सदस्यों की अहमियत को समझना शुरू किया.


अधिकांशतः देखने में आता है कि जब कोई हमारे साथ होता है, हमारी नज़रों के सामने होता है, हमारी पहुँच में होता है तब हमें उसकी कदर नहीं होती है. यह स्थिति व्यक्ति, वस्तु, समय आदि सभी के लिए एकसमान रूप से प्रभावी होती है. हमारे पास जिसकी उपलब्धता होती है, उसकी फ़िक्र हम नहीं करते हैं. ऐसा अपने घर-परिवार के बुजुर्गों के मामले में बहुत होता है. उनके हमारे साथ रहने की स्थिति में हमें उनके अनुभवों का, उनके ज्ञान का, उनके कार्यों का भान होते हुए भी उसके बारे में विचार करने का, उनसे सीखने का जरा भी एहसास नहीं होता है. उम्र, समय, कार्यों, अनुभव आदि से बहुत अधिक सक्षम हमारे बुजुर्ग हमारे लिए एक अनमोल खजाना होते हैं, एक परिपक्व संस्थान की भांति हमारे साथ होते हैं मगर हम अपने में मगन उनसे लाभ नहीं ले पाते हैं.


आधुनिकता, भौतिकता की दौड़ में शामिल होकर बुजुर्गों के प्रति एक तरह का उपेक्षा का भाव समाज में दिखाई देने लगा था. भले ही घर-परिवार में बुजुर्गों को यथोचित सुख-सुविधाओं का ढेर लगा दिया जाये मगर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने-जुलने, उनके साथ समय बिताने के मामले में कमी आई थी. लॉकडाउन अवधि ने परिवार के सभी सदस्यों को एकसाथ रहने पर विवश किया. इस दौरान नई पीढ़ी के लोगों ने, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करती पीढ़ी ने भले ही वर्क फ्रॉम होम के द्वारा अपने काम की पूर्ति की हो मगर उंनका सम्बन्ध अपने परिजनों से बना रहा. वीकेंड जैसी शब्दावली में उनका सामना इस दौरान बाजार से नहीं बल्कि घर के लोगों से हुआ, परिवार के अनुभवी बुजुर्गों से हुआ. यह इस नकारात्मक अवधि की सकारात्मकता ही कही जाएगी.


अब जबकि लॉकडाउन के कारण घर में एकसाथ रहने पर लोगों में, विशेष रूप से आधुनिक जीवन-शैली के प्रति दीवानगी की हद तक पागल होकर भागती पीढ़ी ने भी संबंधों का, रिश्तों का महत्त्व समझा है. इस पीढ़ी को घर के बुजुर्गों के अनुभवों, उनकी शिक्षाओं, कार्यों के प्रति सजग बनाये रखने की आवश्यकता है. कोरोना का भयावह काल आज नहीं तो कल समाप्त होगा ही किन्तु इस अवधि में जिस तरह की आत्मीयता परिवारों में बनती दिखाई दी, बुजुर्गों के प्रति सकारात्मकता दिखाई दी, उसे निरंतरता दिया जाना समय की माँग है. विचार इसी बात पर किया जाना चाहिए कि घर के बुजुर्ग स्वयं को अकेला न महसूस करें. परिजनों को भी चाहिए कि वे अपने बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ अपनी जीवन-शैली को सरल बनाने में, अपने कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाने में लेने का प्रयास करें. जीवन में बहुत से पल ऐसे आते हैं जबकि व्यक्ति के सामने असमंजस की स्थिति होती है. ऐसी स्थिति में बहुत बार बुजुर्गों के अनुभव ही सहायक बनते हैं. यह हम सभी ने अनुभव कर लिया है कि आप कुछ भी क्यों न हो जाएँ मगर आपको मानसिक संबल परिजनों द्वारा ही प्राप्त होता है. ऐसे में समय के साथ इस शक्ति को बचाए रखा जाना चाहिए.


आज समय की, समाज की जैसी माँग है उसके अनुसार खुद को आधुनिक बनाना अपराध नहीं, खुद के लिए भौतिकता के संसाधनों का इस्तेमाल करना, उनका जुटाना दोष नहीं है मगर इसमें ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि संसाधनों के जुटाने में कहीं परिवार की असल सम्पदा तो नष्ट नहीं हो रही. घर का वास्तविक खजाना तो बेकार नहीं हो रहा.




(उक्त लेख आज, 14-12-2020 के बीपीएन टाइम्स समाचार पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)
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वंदेमातरम्

09 दिसंबर 2020

साझा करें लॉकडाउन के अपने अनुभव

आज बैठे-बैठे लॉकडाउन की चर्चा शुरू हो गई. इसी चर्चा में उन बंद दिनों की तमाम बातें सामने आईं. तमाम लोगों की बातों से निष्कर्ष निकला कि लॉकडाउन के वे दिन सभी के लिए पहली बार आये थे. बच्चे हों या बुजुर्ग सभी के जीवन में ऐसा समय शायद पहले कभी नहीं आया होगा. जिन लोगों ने पाकिस्तान और चीन के साथ होने वाले युद्ध का माहौल भी देखा होगा उनके लिए भी ये समय नया ही होगा. जैसा कि हम अपने अइया-बाबा से उस समय के बारे में सुनते रहे हैं, तब बहुतायत में ब्लैकआउट हुआ करता था मगर लोगों के बाहर निकलने पर प्रतिबन्ध नहीं था. इस बार कोरोना के चलते अवश्य ही ऐसा हुआ.




इस अप्रत्याशित माहौल के बारे में आज चर्चा छिड़ी तो लगा कि उन दिनों के बारे में लिखा जाना चाहिए. जो लोग लिख सकते हैं वे लिखें और जिनको कभी भी लिखने का अवसर न मिला वे भी इस बारे में लिखें. इस रचनाशीलता को भले ही साहित्यिक विधा में शामिल न माना जाये मगर उन दिनों के अनुभव सभी के लिए अलग-अलग रहे हैं. चौबीस घंटे घर के भीतर रहना, सभी तरह के कार्यों का बंद होना, व्यस्तता भरे कदमों का एकदम से खामोश सा हो जाना आदि-आदि सभी के लिए एक जैसा भले रहा हो मगर इन दिनों के अनुभव सभी के लिए अलग रहे होंगे.


इस बारे में एक पहल आज से आरम्भ की है. बाकी लोग कितना साथ देते हैं, ये अलग बात है मगर हम इस यात्रा पर निकल चुके हैं. यदि सब ठीकठाक रहा तो जल्द ही ऑनलाइन भी, ऑफलाइन भी लॉकडाउन समय के अनुभव, उन दिनों की जीवन-चर्या आपके सामने होगी. ये दिन ऐसे गुजरे जैसे कभी गुजरे नहीं और आगे न ही गुजरें ऐसी कामना है. इस कामना के बाद भी डर है कि जिस तरह की जीवन-शैली मनुष्य अपना चुका है, इस कोरोनाकाल के बाद भी बनाये हुए है, उससे लगता नहीं कि उसने कुछ सीखा है. आज नहीं तो कल संभव है कि इस समाज को इससे भी अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़े. संभव है कि इस लॉकडाउन समय से अधिक गंभीर समय का सामना करना पड़े. हाल-फिलहाल, लगभग पाँच दशक का समय गुजारने के दौरान ऐसी स्थिति देखने को मिली. आगे क्या-क्या देखना होगा, सबकुछ समय के हाथ है.


ऐसी स्थिति के गवाह बनने के बाद सभी से अनुरोध है कि इन दिनों के अपने अनुभवों को अवश्य लिखें. वे हमारे लिए न सही मगर आने वाली पीढ़ी के लिए एक सबक अवश्य बनेंगे.



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वंदेमातरम्

24 नवंबर 2020

न खुद डरिए, न औरों को डराइए

रोज ही आपको सड़क दुर्घटनाओं की खबर पढ़ने को मिलती होगी, दुर्घटनाओं में लोगों के मारे जाने की भी खबरें मिलती होंगीं, हो सकता है कि आप, आपके परिजन, परिचित, सहयोगी आदि कभी बाइक, कार आदि दुर्घटना के शिकार हुए हों, दुर्भाग्य से आपके बीच का कोई सदस्य दुर्घटना में आपने हमेशा-हमेशा को खो दिया हो, तो 

क्या ऐसे किसी हादसे के बाद से आपने यात्रा करना बंद कर दिया?

क्या आपने बाइक, कार आदि पर बैठना बंद कर दिया?

दुर्घटना न हो तो क्या इसके लिए आपने बाइक, कार आदि चलाना छोड़ दिया?

दुर्घटना की आशंका के चलते क्या आपने घर से निकलना ही बंद कर दिया?

क्या और लोगों को आप बाइक, कार दुर्घटनाओं के आँकड़े दिखाकर डराते हैं?

क्या अपने परिचितों में दुर्घटनाओं की भयावहता के बारे में  डर पैदा करते हैं?

क्या आप अपनी सामान्य बातचीत में दुर्घटनाओं की बातें ही करते हैं?


संभव है आप कहेंगे कि ऐसा नहीं करते, तो ऐसा कोरोना को लेकर क्यों कर रहे हैं?


दुर्घटनाएँ देखकर, अपनों के साथ हुए हादसे देखकर, अपने किसी परिचित को इसमें खो देने के बाद आपने ये सब बंद न किया, बस सावधानी बढ़ा दी।


अब आप सुरक्षित यात्रा करने लगे होंगे। हो सकता है कि रफ्तार से बाइक, कार चलानी बंद कर दी हो। बस ऐसे ही सावधान रहिए, सावधानी बरतिए। अनावश्यक न डरिए, न दूसरों को डराइए।



12 सितंबर 2020

साधारण डाक यदि कूड़े के ढेर में मिले तो कोई आश्चर्य नहीं

तकनीकी विकास ने पत्र-लेखन को लगभग समाप्त ही कर दिया है. इधर इसके साथ-साथ एक बात और देखने को मिली है कि साधारण डाक का वितरण भी लगभग शून्य हो गया है. इस जुलाई में पत्र लेखन दिवस पर बहुत से मित्रों को पत्र लिखे थे. इन मित्रों में स्थानीय मित्र भी शामिल थे और देश के अनेक प्रदेशों के मित्र भी शामिल रहे. बहुत से मित्रों को पत्र मिले और बहुत से मित्र अभी तक पत्र से वंचित हैं. कुछ दिन पहले एक पंजीकृत पत्र के वितरण में हो रही अनावश्यक देरी के कारण अपने एक अधिकारी मित्र को अपनी समस्या से अवगत कराया. उनकी सहायता से पत्र तो प्राप्त हुआ मगर इस कोरोना काल में डाक विभाग की समस्या से भी परिचित होने का मौका मिला. उस पत्र के विलम्ब से वितरण का कारण समझ आया.


कोरोना काल के दौर में लागू किये गए लॉकडाउन और ट्रेनों की, परिवहन के अन्य साधनों की आवाजाही बंद करवाने के कारण पत्र वितरण में समस्या आनी स्वाभाविक थी. इस समस्या के चलते मन ने स्वीकार कर लिया कि शहर/जनपद से बाहर के पत्र वितरण में परिवहन के साधनों की उचित उपलब्धता के कारण देरी होना स्वाभाविक है मगर शहर के अन्दर पत्र वितरण में देरी का क्या कारण है? हमने अपने जनपद के मित्रों को तो पत्र लिखे ही साथ ही उरई शहर के अनेक मित्रों को पत्र लिखे. शहर के कुछ मित्रों को पत्र मिल भी गए मगर जनपद के अन्य स्थानों तक पत्र नहीं पहुँचे. समझ नहीं आया कि उरई शहर की डाक को उरई शहर में वितरित करने के लिए कौन सी ट्रेन की आवश्यकता है? यदि जनपद के अन्य स्थानों की बात पर भी विचार करें तो भी अब निजी वाहनों का चलना आरम्भ हो गया है. ऐसे में पत्रों का जनपद में ही, शहर में ही वितरित न हो पाना समझ से परे है.


साधारण डाक वितरण का सुस्त रहना या फिर वितरण ही न किया जाना आज की समस्या नहीं वरन उस समय की भी समस्या है जबकि समाचारों के आदान-प्रदान का माध्यम पत्र ही हुआ करते थे. बहुत अच्छी तरह से याद है कि एक बार हमारे शहर के एक डाकिये की शिकायत पर उसके खिलाफ जाँच बैठाई गई तो मालूम हुआ कि वह सारी की सारी साधारण डाक अपने घर ले जाकर चूल्हे में जला देता है. ऐसी घटनाओं के होने के बाद भी तब डाक व्यवस्था अपने सुव्यवस्थित रूप में काम किया करती थी. आज भी बहुत सी जगहों पर डाक व्यवस्था अच्छी सेवा के रूप में जानी जा रही है. इसका उदाहरण स्वयं हम हैं. कोरोना काल में जैसे ही डाक सेवाएँ सामान्य हुईं वैसे ही हमारी डाक नियमित रूप से आने लगी. सप्ताह में दो-तीन दिन डाक को आना ही होता है. इस बात को हमारे क्षेत्र में अभी तक कार्यरत रहे डाकिये भली-भांति जानते रहे हैं.

कुछ साल पहले तक हम इन डाकियों की परीक्षा भी ले लिया करते थे. खुद ही एक पोस्टकार्ड लिख कर डाल दिया करते थे. उसमें किसी तरह का कोई समाचार न लिख कर कोई नंबर, कोई पंजीकरण संख्या आदि लिख देते थे. पोस्टकार्ड देखने पर समझ आता कि कोई बहुत महत्त्वपूर्ण समाचार नहीं है, कोई अनिवार्य रूप से पहुँचाने वाला सन्देश नहीं है, इसके बाद भी हमारा पोस्टकार्ड हम तक पहुँचता. कई बार डाक की गड़बड़ी हमारे साथ भी हुई मगर उसकी शिकायत के द्वारा वह गड़बड़ी भी दूर करवा दी जाती रही.

फ़िलहाल तो अब पत्र लिखने वाले भी न के बराबर हैं, डाक से सामग्री पाने वाले भी न के बराबर हैं. ऐसे में डाकिये भी डाक की, साधारण डाक की महत्ता को जान-समझ रहे हैं. यदा-कदा आने वाली साधारण डाक यदि कूड़े के ढेर में मिले या फिर नाले में, आग के हवाले चली जाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं.

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21 अगस्त 2020

कोरोना काल में उपजता संदेह

वैश्विक स्तर पर जबसे कोरोना वायरस का हमला दिखाई दिया है तबसे सभी देश लगातार उसके खिलाफ लड़ाई सी छेड़े हुए हैं. संभवतः वैश्विक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ होगा जबकि एक विश्वयुद्ध सा मंजर दिख रहा है, बस शत्रु ही सामने नजर नहीं आ रहा है. सभी देशों को भली-भांति ज्ञात है कि उनका शत्रु कौन है. उनको ये भी जानकारी है कि ये शत्रु किस तरह से और कहाँ-कहाँ आक्रमण कर रहा है. इसके बाद भी इससे निपटने के कारगर तरीके अभी तक विकसित नहीं हो सके हैं.


वैश्विक स्तर पर भी और हमारे देश में भी कोरोना से बचने के उपाय लगातार किये जा रहे हैं इसके बाद भी एक तरह की अनिश्चितता सी बनी हुई है. आरंभिक दौर में सरकार ने संक्रमण गति को कम करने के लिए, इस श्रंखला को तोड़ने के लिए लॉकडाउन भी लागू किया मगर इससे उतने सुखद परिणाम सामने नहीं आये जितनी कि अपेक्षा की जा रही थी. सरकारों को, लोगों को भली-भांति ज्ञात था कि लॉकडाउन इस बीमारी का एकमात्र और अंतिम समाधान नहीं है, इसके बाद भी वायरस की श्रंखला तोड़ने के लिए इसका समुचित पालन किया गया. अब जबकि अनलॉक की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है, कोविड टेस्ट की संख्या बढ़ गई है तो कोरोना से संक्रमित होने वालों की संख्या में भी लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है. इस बढ़ती संख्या के साथ-साथ सुखद एहसास यह है की इस वायरस से संक्रमित लोगों के स्वस्थ होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है.

अभी जबकि विश्व स्तर पर किसी देश ने कोरोना वायरस का इलाज किये जाने का दावा नहीं किया है, किसी भी मेडिकल संस्था ने इसके इलाज का कोई निश्चित फार्मूला भी नहीं बताया है ऐसे में बिना इलाज के मरीजों का स्वस्थ होना एक आश्चर्य माना जा रहा है. मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोगों के द्वारा दावा किया जा रहा कि जिसकी प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है, उसे या तो कोरोना संक्रमण होगा नहीं और यदि हुआ तो वह जल्द स्वस्थ हो जायेगा. इसी के दूसरी तरफ सभी लोगों को सावधान रहने पर जोर दिया जा रहा है है. लोगों को मास्क बाँधने के लिए, मुँह-नाक ढँकने के लिए लगातार प्रेरित किया जा रहा है. इस बीमारी से लड़ते-लड़ते कई महीने निकल गए मगर अभी भी कोई ठोस धरातल पर नहीं खड़ा हो सका है. अभी भी इसके लक्षणों पर संशय बना हुआ है, इसकी संक्रमण दर पर संशय बना हुआ है, इसके संक्रमण होने अथवा न होने को लेकर भी विमर्श चलता रहता है.

इन सबके बीच लगातार संशय का माहौल बना दिखाई देता है. समय के साथ आम नागरिकों में सरकारी कार्य-पद्धति पर, नीतियों पर, मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोगों की बातों पर संदेह किया जाने लगा है. यहाँ एक बात विशेष रूप से गौर करने वाली है कि जबसे देश में कोरोना ने अपने कदम पसारे हैं तबसे चिकित्सा क्षेत्र में कोई दूसरी बीमारी दिखाई ही नहीं दे रही है. अब मरने वालों की जो संख्या आ रही है, मरने वालों की जो खबरें आ रही हैं वे बहुतायत में या कहें शत प्रतिशत कोरोना से होती बताई जा रही हैं. क्या वाकई ऐसा ही है? क्या इस समय देश भर में जितनी मौतें हो रही हैं वे सिर्फ कोरोना से हो रही हैं? क्या अन्य बीमारियों से मरने वालों की संख्या शून्य हो गई है? कई बार मन में संशय उठता है कि इन सबके पीछे कहीं कोई वैश्विक साजिश तो नहीं? इसके पीछे कहीं कोई बहुत बड़ा खेल तो आम नागरिकों के साथ तो नहीं खेला जा रहा है?

ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यह बात सभी चिकित्सक या कहें कि चिकित्सा सेवा से जुड़े लोग बेहतर तरीके से जानते हैं कि कोरोना वायरस का संक्रमण उसी दशा में होना है जबकि किसी भी तरह से संक्रमण मुँह-नाक के सहारे अन्दर चला जाए. किसी संक्रमित व्यक्ति के छूने से कोरोना संक्रमण नहीं फैलना है. इसके बाद भी लगभग सभी जगहों से किसी दूसरे मरीज को चिकित्सा सेवा सहज उपलब्ध नहीं हो पा रही है. किसी भी तरह की बीमारी का इलाज करवाने के पहले मरीज को कोविड टेस्ट से गुजरना पड़ रहा है. ऐसा तब हो रहा है जबकि डॉक्टर्स पूरी तरह से किट में काम कर रहे हैं.

इसके साथ-साथ कोरोना के नाम पर किसी बड़ी साजिश का, किसी उच्च स्तरीय मिलीभगत, खेल का संदेह इस कारण भी है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी भी जाँच करवाई जा रही है और उसके कोरोना संक्रमित होने पर उसकी मृत्यु की गणना कोरोना से मरने वालों के साथ की जाने लगती है. आखिर ऐसा क्यों? जब उसकी मृत्यु कोरोना संक्रमण निर्धारित होने के पहले हो चुकी है तो फिर उसकी मौत को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है? संभव है कि अन्य सुरक्षा कारणों से मरने के बाद भी जाँच के द्वारा कोरोना संक्रमण मृत देह से और जगहों पर फैलने के इरादे से ऐसा किया जा रहा हो मगर ऐसे में भी ऐसी मृत्यु को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ जोड़ना तर्कसंगत नहीं है.
एक और बिंदु ऐसा है जो संदेह जगाता है. आखिर कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बताते समय मात्र उतनी ही संख्या क्यों नहीं बताई जा रही जितने मरीज वर्तमान में एक्टिव हैं? आखिर ठीक पहले मरीज से लेकर अद्यतन संख्या बताने के पीछे क्या कारण है? क्यों इसमें वह संख्या भी शामिल है जो स्वस्थ हो चुके हैं? क्यों इसमें वह संख्या बताई जाती है जिनकी मृत्यु हो चुकी है?

कोरोना मामले में जिस तरह से जल्दबाजी में कदम उठाये गए उनको लेकर शायद इसलिए भी कुछ कहना उचित नहीं क्योंकि इस तरह का संकट अकेले हमारे देश पर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व इसी से जूझ रहा है. सभी के लिए यह बीमारी एकदम नई थी और सुरक्षात्मक कदमों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. ऐसे में उपायों को लेकर, सुरक्षा सम्बन्धी बिन्दुओं को लेकर लगातार सीखने और गलतियाँ करने वाली स्थिति बनी रहना स्वाभाविक है मगर इसकी आड़ में शेष बीमारियों के प्रति गैर-जिम्मेवाराना रवैया अपना लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. ये स्थितियां ऐसी हैं जो कहीं न कहीं संदेह को बढ़ाती हैं.


(उक्त आलेख दिनांक 21-08-2020 के बीपीएन टाइम्स समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)
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17 अगस्त 2020

संदेहास्पद स्थितियाँ हैं कोरोना को लेकर

कोरोना से लड़ाई लगातार चलती जा रही है और एक तरह का अनिश्चय भी बना हुआ है. लॉकडाउन भी हुआ फिर अनलॉक भी शुरू हो गया. कोरोना से संक्रमित होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है साथ ही इससे स्वस्थ होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. बिना इलाज ठीक होना भी एक आश्चर्य माना जा रहा है किन्तु साथ ही दावा किया जा रहा कि जिसकी प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है तो उसे या तो कोरोना संक्रमण होगा नहीं और यदि हुआ तो वह जल्द स्वस्थ हो जायेगा. इसी के दूसरी तरफ सभी लोगों को सावधान रहने पर जोर दिया जा रहा है है. लोगों को मास्क बाँधने के लिए, मुँह-नाक ढँकने के लिए लगातार प्रेरित किया जा रहा है. इस बीमारी से लड़ते-लड़ते कई महीने निकल गए मगर अभी भी कोई ठोस धरातल पर नहीं खड़ा हो सका है. अभी भी इसके लक्षणों पर संशय बना हुआ है, इसकी संक्रमण दर पर संशय बना हुआ है, इसके संक्रमण होने अथवा न होने को लेकर भी विमर्श चलता रहता है.


यहाँ एक बात विशेष रूप से गौर करने वाली है कि जबसे देश में कोरोना ने अपने कदम पसारे हैं तबसे चिकित्सा क्षेत्र में कोई दूसरी बीमारी दिखाई ही नहीं दे रही है. अब मरने वालों की जो संख्या आ रही है, मरने वालों की जो खबरें आ रही हैं वे बहुतायत में या कहें शत प्रतिशत कोरोना से होती बताई जा रही हैं. क्या वाकई ऐसा ही है? क्या इस समय देश भर में जितनी मौतें हो रही हैं वे सिर्फ कोरोना से हो रही हैं? क्या अन्य बीमारियों से मरने वालों की संख्या शून्य हो गई है? कई बार मन में संशय उठता है कि इन सबके पीछे कहीं कोई वैश्विक साजिश तो नहीं? इसके पीछे कहीं कोई बहुत बड़ा खेल तो आम नागरिकों के साथ तो नहीं खेला जा रहा है?


ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यह बात सभी चिकित्सक या कहें कि चिकित्सा सेवा से जुड़े लोग बेहतर तरीके से जानते हैं कि कोरोना वायरस का संक्रमण उसी दशा में होना है जबकि किसी भी तरह से संक्रमण मुँह-नाक के सहारे अन्दर चला जाए. किसी संक्रमित व्यक्ति के छूने से कोरोना संक्रमण नहीं फैलना है. इसके बाद भी लगभग सभी जगहों से किसी दूसरे मरीज को चिकित्सा सेवा सहज उपलब्ध नहीं हो पा रही है. किसी भी तरह की बीमारी का इलाज करवाने के पहले मरीज को कोविड टेस्ट से गुजरना पड़ रहा है. ऐसा तब हो रहा है जबकि डॉक्टर्स पूरी तरह से किट में काम कर रहे हैं.

इसके साथ-साथ कोरोना के नाम पर किसी बड़ी साजिश का, किसी उच्च स्तरीय मिलीभगत, खेल का संदेह इस कारण भी है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी भी जाँच करवाई जा रही है और उसके कोरोना संक्रमित होने पर उसकी मृत्यु की गणना कोरोना से मरने वालों के साथ की जाने लगती है. आखिर ऐसा क्यों? जब उसकी मृत्यु कोरोना संक्रमण निर्धारित होने के पहले हो चुकी है तो फिर उसकी मौत को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है? संभव है कि अन्य सुरक्षा कारणों से मरने के बाद भी जाँच के द्वारा कोरोना संक्रमण मृत देह से और जगहों पर फैलने के इरादे से ऐसा किया जा रहा हो मगर ऐसे में भी ऐसी मृत्यु को कोरोना से होने वाली मौतों के साथ जोड़ना तर्कसंगत नहीं है.

एक और बिंदु ऐसा है जो संदेह जगाता है. आखिर कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बताते समय मात्र उतनी ही संख्या क्यों नहीं बताई जा रही जितने मरीज वर्तमान में एक्टिव हैं? आखिर ठीक पहले मरीज से लेकर अद्यतन संख्या बताने के पीछे क्या कारण है? क्यों इसमें वह संख्या भी शामिल है जो स्वस्थ हो चुके हैं? क्यों इसमें वह संख्या बताई जाती है जिनकी मृत्यु हो चुकी है?

कोरोना मामले में जिस तरह से जल्दबाजी में कदम उठाये गए उनको लेकर शायद इसलिए भी कुछ कहना उचित नहीं क्योंकि इस तरह का संकट अकेले हमारे देश पर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व इसी से जूझ रहा है. सभी के लिए यह बीमारी एकदम नई थी और सुरक्षात्मक कदमों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. ऐसे में उपायों को लेकर, सुरक्षा सम्बन्धी बिन्दुओं को लेकर लगातार सीखने और गलतियाँ करने वाली स्थिति बनी रहना स्वाभाविक है मगर इसकी आड़ में शेष बीमारियों के प्रति गैर-जिम्मेवाराना रवैया अपना लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. ये स्थितियां ऐसी हैं जो कहीं न कहीं संदेह को बढ़ाती हैं.

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28 जुलाई 2020

कोरोना संक्रमित की जगह मानसिक बीमार न हो जाएँ

चीनी वायरस कोरोना के चलते लॉकडाउन चार महीने पहले लगाया गया था. उसके बाद अनलॉक की प्रक्रिया शुरू की गई. बहुत सारी बाध्यताओं के बीच, नियम-कानूनों के साथ लॉकडाउन जैसी स्थिति देखने को मिल रही है. इसके साथ-साथ जीवन वापस पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है. कुछ शर्तों के साथ बाजार खोल दिए गए हैं. ऑफिस भी शुरू किये गए हैं. कारखानों में काम चालू कर दिया गया है. परिवहन, यातायात के साधनों का भी दौड़ना दिखाई पड़ने लगा है. बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, दिखाई दे रहा है जो लॉकडाउन के पहले के जीवन जैसा आभास करवाता है इसके बाद भी पहले जैसी निश्चिंतता, पहले जैसी स्वतंत्रता, पहले जैसा सहज भाव देखने को नहीं मिल रहा है. बहुत कुछ खुला होने के बाद भी, संचालित होने के बाद भी लगता है जैसे बहुत बड़ा बंधन बना हुआ है. यह बंधन बाहरी कम, भीतरी ज्यादा समझ आ रहा है.



शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से बहुत कुछ बंधनों में जकड़ा हुआ लगता है. इसका एहसास भीतर ही भीतर डराता नहीं है वरन परेशान करता है. यह बंधन धीरे-धीरे लोगों के दिल-दिमाग पर हावी होता नजर आ रहा है. लोगों के काम करने में, लोगों के बाजार में खरीददारी करने में, कार्यालयों में अपने काम से जाने के दौरान उनकी क्रियाशीलता में, क्रियाविधि में सहज भाव नहीं है. लगभग सभी लोग किसी न किसी अप्रत्यक्ष शक्ति के द्वारा नियंत्रित होकर कार्य करने में लगे हैं. कोरोना वायरस के कारण उपजी स्थिति ने जैसे लोगों को मानसिक रूप से बीमार बनाना शुरू कर दिया है. सुरक्षात्मक होने के बजाय लोग पैनिक होते जा रहे हैं. लोगों के आपस में बातचीत करने के विषय बदल चुके हैं. घूम-फिर कर बात कोरोना पर, संक्रमितों की संख्या पर, मरने वालों पर आकर टिक जाती है. मेल-मिलाप के वैसे भी अवसर हाल-फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं, ऐसे में फोन द्वारा भी हालचाल लेने पर कोरोना वायरस ही उछल कर सामने आ जाता है.


यह स्थिति किसी भी रूप में सुखद नहीं है. आज न सही, कल को कोरोना वायरस का इलाज मिल ही जायेगा मगर जिस तरह से लोगों की हरकतें, मानसिक और शारीरिक स्थिति बनती जा रही है, उससे निकल पाना बहुत से लोगों के लिए आसान नहीं होगा. कोरोना वायरस से संक्रमित होने के भय, उसके द्वारा होने वाली मौत की डरावनी कल्पना चिंता का विषय है. ऐसे में सभी को आपस में मिलकर कोरोना के अलावा किसी अन्य विषय पर बातचीत करनी चाहिए. मिलने-जुलने पर, ऑफिस में काम करते समय, फोन से बात करते समय उसी तरह से व्यवहार रखना चाहिए जैसा कि कोरोना आने के पहले हुआ करता था. ध्यान रखना होगा कि कहीं हम सब एक वायरस से लड़ाई जीतने के साथ-साथ अपने लोगों की शारीरिक-मानसिक हालत से न हार जाएँ.

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12 जुलाई 2020

तन्हा, एकाकी समाज का आधार रखते हम नागरिक

क्या आने वाले दिनों में ऑनलाइन समारोह समाज की पहचान बनेंगे? क्या आने वाले दिनों में लोगों का विचार-विनिमय का माध्यम ऑनलाइन ही होगा? क्या आने वाले दिनों में हम सभी को अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों का ही उपयोग करना होगा? समाज जिस तरह से एकाकी रूप में बदलता जा रहा था क्या इस चीनी वायरस कोरोना के चलते इस व्यवस्था को सहज स्वीकृति मिल जाएगी? जी तरह से सभी लोग स्वार्थ में लिप्त होकर सिर्फ और सिर्फ खुद के लिए ही काम करने में लगे थे क्या भविष्य में इसी सोच को स्वीकार्यता मिल जाएगी?



ऐसे और भी बहुत से सवाल हैं जो विगत तीन महीनों में दिमाग में कौंधते रहे. पिछले दिनों एक कार्यालय में अत्यावश्यक कार्य से जाना हुआ. वहाँ एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक ऊँची एक सीढ़ी चढ़ने में दिक्कत हो रही थी. वे लगभग तीन-चार मिनट से प्रयास कर रहे होंगे, ऐसा उनकी हालत देखकर लग रहा था. उनके आसपास खड़े लगभग दस-पंद्रह लोगों में से किसी ने उनका हाथ पकड़ कर उनको ऊपर चढ़ाने में सहायता नहीं की. इत्तेफाक की बात कि उसी सीढ़ी से हमें भी चढ़ना था. अपने साथ-साथ एक हाथ से खुद को और एक से उन बुजुर्ग सज्जन को सहारा देकर ऊपर चढ़ाया. इस पर सबसे पहली टिप्पणी यही मिली कि अपने हाथ सेनेटाइज कर लीजिये, आपने इनको छू लिया है. समझ न आया कि आखिर हम किस तरह के पढ़े-लिखे समाज में पहुँचा दिए गए, एक वायरस के द्वारा?


कोरोना वायरस को समझना किसी राकेट साइंस का हिस्सा नहीं इसके बाद भी हम सभी जबरदस्त तरीके से एक-दूसरे को भ्रमित करने में लगे हैं. बहरहाल, आज कोरोना पर नहीं वरन उससे उपजी मानसिकता पर इतनी बात कहनी है कि इसने उन सभी स्वार्थी लोगों को मजबूत किया है जो कभी भी किसी की सहायता नहीं करते थे. वे अब कोरोना संक्रमण के नाम पर खुद को अलग किये हुए हैं. ऐसे लोग जो मदद के लिए आगे आते थे, उनको ऐसे लोगों ने कोरोना से सम्बंधित आँकड़ेबाजी में उलझाकर दूर कर दिया है. ऐसी स्थिति में बहुत कम लोग बचे हैं जो इस स्थिति में भी सहायता के लिए आगे आ रहे हैं. समझना होगा कि कोरोना आज नहीं तो कल चला ही जायेगा. भले ही समाप्त न हो मगर बहुत हद तक नियंत्रण में आ जायेगा मगर सोचना होगा कि हम आज इस दौर में किस तरह का भावी समाज निर्मित करने में लगे हैं?

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27 जून 2020

कोरोना संक्रमण से सम्बंधित कुछ प्रश्नों के उत्तरों की अपेक्षा

कोरोना संक्रमण को लेकर बहुत सी बातें लगातार सामने आ रही हैं. सामाजिक, शारीरिक दूरी बनाये जाने की बातें की जा रही हैं. हाथ धोने के तरीके बताये जा रहे हैं. इन सबके बीच कुछ शंकाएँ हैं, मन में. शंकाएँ इसलिए क्योंकि जो प्रश्न मन में उठते हैं उनके बारे में समाधान खुद से ही खोज लेते हैं मगर उनके बारे में स्पष्ट उत्तर मिलते नहीं.



सवाल ये हैं कि कोरोना संक्रमण फैलने का मूल कारण क्या है?
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यदि दो व्यक्ति एकसाथ सटे हुए बैठे/खड़े हैं. उनमें एक व्यक्ति पॉजिटिव है और दूसरा स्वस्थ. वे आपस में किसी तरह की बातें न करें (ड्रॉपलेट सम्बन्धी कोई कारण न हो) तो भी क्या दूसरा व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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किसी स्वस्थ व्यक्ति ने किसी संक्रमित व्यक्ति से हाथ मिला लिया या फिर किसी संक्रमित वस्तु को छू लिया तो क्या वो पॉजिटिव हो जायेगा?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति/वस्तु को छूने के बाद अपने हाथ को आँख, नाक, मुँह में नहीं लगाता तो भी क्या वह संक्रमित हो जायेगा?
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ऐसी स्थिति में कितने देर रहने के बाद उसकी हथेली संक्रमण मुक्त हो जाएगी, यदि उसे साबुन न मिले, सेनेटाइजर न मिले? या वह संक्रमित ही बनी रहेगी?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी ऐसी जगह बैठ जाए जिसे किसी संक्रमित व्यक्ति ने छू लिया हो या वहाँ कोई संक्रमित व्यक्ति बैठा रहा हो तो क्या वो स्वस्थ व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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कोरोना संक्रमित व्यक्ति के शरीर के किस हिस्से से छूने से संक्रमण फैलेगा? क्या पॉजिटिव व्यक्ति का पूरा शरीर संक्रमित हो जाता है?
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कहा जा रहा है कि संक्रमण मुँह, आँख, नाक के सहारे फेफड़ों तक ही हो रहा है, ऐसे में किसी संक्रमित व्यक्ति का पूरा शरीर किस तरह/किस कारण संक्रमित हो जाता है?
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संक्रमित व्यक्ति जो कपड़े पहने होता है क्या उसका ऊपरी हिस्सा भी संक्रमित रहता है, जिसे उसने अपनी हथेलियों से न छुआ हो?

सवाल तो बहुत सारे हैं मगर सब इन्हीं के आसपास घूमते-टहलते हैं. इनका जवाब इसलिए भी आवश्यक है, ये जरूरी नहीं कि हमें मिलें बल्कि सबको पता होने चाहिए क्योंकि कोरोना के नाम से जिस भय का व्यापार अब हो रहा है वह खतरनाक है. आज ज्यादातर डॉक्टर्स किसी मरीज को देखने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं. वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे बीमार व्यक्ति अपनी आँखों से कोरोना फेंक रहा है.

इन सवालों के जवाब इसलिए भी मालूम होने चाहिए क्योंकि जिस तरह से लोगों का बाहर निकलना हो रहा है, जिस तरह से सभी कार्यालय, संस्थान अपनी सामान्य स्थिति में आ रहे हैं उससे कोरोना संक्रमण बढ़ने की ज्यादा सम्भावना है. मास्क को लेकर, हाथ धोने को लेकर, ड्रॉपलेट को लेकर, मौसम को लेकर, वायरस के जीवित रहने को लेकर जिस तरह से अलग-अलग बातें निकल कर सामने आ रही हैं, वे चिंताजनक हैं. ऐसे में इस तरह के और दूसरे सवालों को उठाया जाना चाहिए, उनका समाधान खोजना चाहिए. सुरक्षा तो अपनी जगह है, संभव है कि ऐसे सवालों से प्राप्त जानकारी से भी सावधानी बढ़ाई जा सके.

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23 जून 2020

बाबा रामदेव की कोरोनिल का प्रभाव

बाबा रामदेव के द्वारा कोरोना वायरस इलाज हेतु दवा का बाजार में उतारा जाना समूचे बाजार में हलचल मचा गया. इसके साथ-साथ विभिन्न विचारधाराओं की धाराओं में भी भँवरें पड़ने लगीं. ऐसा कोलाहल सा दिखाई देने लगा मानो अभी सुनामी आने वाली हो. बाबा की इस दवाई से ऐसी तबाही मचने वाली है जैसी कि कोई चक्रवात मचाता है. देखा जाये तो यदि बाबा रामदेव की ये दवा कारगर सिद्ध हो गई तो विभिन्न ड्रग माफियाओं के हाथों में खेलता दवाई का व्यापार अवश्य ही इस चक्रवात की चपेट में आ जायेगा. ये फिलहाल भविष्य के गर्भ में है कि इस दवा का अंतिम परिणाम क्या होगा.


इधर इसे दूसरे बिन्दुओं के रूप में देखा जाना चाहिए. जबसे कोरोना वायरस के द्वारा संक्रमण फैलना शुरू हुआ है तबसे न केवल जनसामान्य द्वारा बल्कि आयुष मंत्रालय द्वारा भी आयुर्वेदिक काढ़ा पिए जाने की वकालत की जा रही है. ऐसा भी बताया जा रहा है कि कोरोना संक्रमित व्यक्तियों को यही काढ़ा दिए जाने से उनमें संक्रमण कम होने के संकेत मिले हैं और वे इसी के सेवन से स्वस्थ हुए हैं. इसके साथ-साथ नींबू पीने, विटामिन सी लेने, गर्म पानी पीने आदि जैसे कदम आयुष मंत्रालय द्वारा ही सुझाये गए हैं. ये कदम किसी भी रूप में दवाई नहीं हैं और न ही इलाज, इसके बाद भी इनके सेवन को लेकर लगातार सुझाव दिए जा रहे हैं. ऐसे में बाबा रामदेव की दवा को सन्देश की नजर से देखना हास्यास्पद ही है.


समझने का विषय है कि अभी तक भी कोरोना संक्रमण का कोई इलाज सामने नहीं आया है, किसी भी तरह की दवाई, वैक्सीन अभी बनाया नहीं जा सका है. इसके बाद भी देश में कुल संख्या के आधे से अधिक व्यक्ति स्वस्थ हो चुके हैं. क्या इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि जब अभी तक कोई इलाज नहीं है तो फिर स्वस्थ कौन लोग हो रहे हैं और कैसे स्वस्थ हो रहे हैं? यहाँ निश्चित ही वही आयुर्वेदिक काढ़ा अपना प्रभावी असर दिखा रहा है जिसके बारे में मंत्रालय लगातार पैरवी करता रहा है. इसी के सन्दर्भ में बाबा रामदेव की दवा को देखने की आवश्यकता है.

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हमारे आयुर्वेद में तमाम तरह की उपयोगी सामग्री हैं जिनके द्वारा अनेक बीमारियों का इलाज सहजता से हो जाता है. कोरोना के सन्दर्भ में यह लगातार कहा जा रहा है कि व्यक्ति को इस संक्रमण से बचने के लिए प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता है. माना कि किसी दवा के सन्दर्भ में अपना नियम-कानून है तो वह कदम अवश्य उठाया जाना चाहिए मगर यदि लगता है कि बाबा रामदेव की दवाई से प्रतिरोधक क्षमता ही मजबूत हो रही है, किसी तरह का इलाज नहीं तो भी इसे काढ़ा के सापेक्ष उपयोग करने के लिए कहा जा सकता है.

फ़िलहाल तो लग रहा है कि बाबा रामदेव की यह दवा ड्रग माफियाओं के चंगुल में फँसकर भटकने की स्थिति में है. सरकार को ऐसे किसी भी प्रयास को स्वयं संज्ञान में लेते हुए प्रोत्साहित करना चाहिए जो इस भ्रम, संशय, डर के माहौल में एक सकारात्मक सन्देश जनसामान्य के बीच प्रेषित करने का प्रयास कर रहा है. इस दवा को इलाज और इम्युनिटी के सन्दर्भ में देखते हुए प्रयोग की अनुमति देनी चाहिए. इस सन्दर्भ में बस इतना याद रखना चाहिए कि काढ़ा का कोई क्लीनिकल ट्रायल नहीं किया गया है, काढ़ा कोई इलाज नहीं है इसके बाद भी इसे पीने की सलाह दी जा रही है.

हाँ, यदि बाबा रामदेव की इस दवा के अपने नुकसान हैं, शारीरिक-मानसिक समस्या पैदा होने का अंदेशा हो तो इस पर निश्चित ही प्रतिबन्ध लगना चाहिए. इसके साथ-साथ ध्यान यह भी रखना होगा कि इस दवा का सिर्फ इस कारण विरोध हो कि इसे बाबा रामदेव ने बनाया है, एलोपैथिक दवाओं के समानान्तर आयुर्वेद ने इस वायरस की दवा को खोज निकाला है तो यह नितांत क्षुद्र मानसिकता का द्योतक है.  

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22 जून 2020

रक्तवीर से सम्मानित रक्तदाता भी हो रहे अपमानित कोरोना जाँच में

सुबह-सुबह खबर मिलती है कि आपने जहाँ रक्तदान किया था वहाँ रक्तदान करने वाला एक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव निकला है. इसके बाद भी हम संयम बनाये रखते हैं क्योंकि जो नाम हमें बताया गया वह हमारे रक्तदान करने के पहले नहीं था. दूसरी बात कि हमने वहाँ किसी से कोई संपर्क नहीं रखा था. ये बात बताने के बाद भी दोपहर दो बजे फोन पर खबर दी जाती है कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश पर उन सभी को अपना सैम्पल देना है जिन्होंने रक्तदान किया है. अपने स्वास्थ्य और अपने पर विश्वास था इस कारण इस आदेश को स्वीकारते हुए विगत आठ दिनों के अपने संपर्कों पर निगाह दौड़ाई.


इसमें भी सबसे पहले अपने परिवार को ही देखा. न बिटिया को, न श्रीमती जी को खाँसी, बुखार अथवा किसी तरह की अन्य समस्या थी. इसके बाद अन्य लोगों पर भी गौर किया. माना कि एक हम ऐसे व्यक्ति हों जिस पर कोरोना के लक्षण प्रदर्शित न हों मगर ऐसा सबके साथ नहीं हो सकता था. दस जून से लेकर अठारह जून तक की अपनी संपर्क सूची को खुद से खंगाला. इसमें किसी भी एक व्यक्ति को नाममात्र का न तो बुखार आया और न ही जुकाम-खाँसी जैसी कोई स्थिति सामने आई. इस बारे में पूरी तरह से संतुष्ट थे कि हम पॉजिटिव नहीं हैं और न ही हमारे संपर्क में आया कोई व्यक्ति पॉजिटिव है. इसके बाद भी जैसा कि प्रशासन की मंशा थी, अपनी सैम्पलिंग के लिए जिला चिकित्सालय पहुँच गए. जिला स्वास्थ्य विभाग अथवा प्रशासन इस कारण भी इस मामले में तत्परता दिखा रहा था क्योंकि रक्तदान शिविर का आयोजन प्रशासन की अनुमति से हुआ था. इसके साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी का, मीडिया का, समाज के प्रबुद्धजनों का भी इसमें भी सम्मिलिन हुआ था.


शाम को लगी भीड़, सैम्पल देने के लिए 

निश्चित समय पर जिला चिकित्सालय पहुँचना हुआ. सैम्पल लेने के पहले पंजीकरण करवाना था. उस समय ऐसा लग रहा था जैसे सामने जानकारी लेने वाला व्यक्ति कोई अपार विद्वान हो और जानकारी देने वाला निपट निरक्षर. जानकारी लेने के आसपास लगी बाँस-बल्लियों को लेकर धमकी भरे स्वर में डराया भी जा रहा था. डराने के साथ-साथ लगभग धमकाने जैसा स्वर भी दिखाई दे रहा था. हम लोग प्रशासन की तरफ से सैम्पल के लिए भेजे गए थे इसके बाद भी वहाँ तैनात स्वास्थ्य कर्मियों की तरफ से ऐसा व्यवहार किया जा रहा था जैसे कि हम सभी कोरोना वायरस के सीधे कैरियर हैं. खड़े होने, बैठने, बातचीत करने आदि को लेकर जिस तरह से उपेक्षित रवैया वहाँ के कर्मियों का दिखा उससे लगा कि केन्द्र सरकार द्वारा फोन पर सुनाई जा रही कॉलर ट्यून का कोई मतलब नहीं जिसमें कहा जा रहा है कि बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं. यहाँ तो उस व्यक्ति को उपेक्षित किया जा रहा है जो अभी अपना सैम्पल देने आया है.

अति-सक्रिय स्वास्थ्य कर्मी 

इसके अलावा एक और दुखद बात सामने आई वो यह कि जिनको भी सैम्पल के लिए प्रशासन ने बुलाया था वे सब प्रशासन की शब्दावली में रक्तवीर थे. ऐसे लोगों को दो-तीन दिन पहले ही जिला प्रशासन ने सम्मानित भी किया था. इसके बाद भी प्रशासन और रक्तदान करवाने वाले तमाम स्वयंभू अपनी-अपनी जाँच जनपद में लगी ट्रू नेट मशीन से करवा कर फुर्सत पा गए, शेष लोगों को भटकने को छोड़ दिया गया. यहाँ भी पिछला दरवाजा मौजूद रहा. जुगाड़ वालों को इसी मशीन के सहारे जाँचने पर सहमति दिख रही थी मगर सबके लिए नहीं. ऐसे में सभी ने इसे नकारते हुए अपना सैम्पल देने का मन बनाया.

अपनी बारी का इंतजार करते रक्तवीर 

ये सुखद रहा कि दो दिन बाद सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई मगर यहाँ एक बात सोचने वाली है कि एक तरफ प्रशासन की मंशा से, स्वैच्छिक संस्थाओं की मंशा से लोग रक्तदान करने के लिए स्वेच्छा से सामने आते हैं, उसके बाद ऐसी किसी भी घटना पर ऐसे लोगों का साथ न मिलना मनोबल को तोड़ता है. उस दिन अनुभव किया कि सैम्पल देने वालों में कुछ लोग तो ऐसे थे जो मानसिक रूप से कमजोर थे. सोचने वाली बात है कि एक तरफ वे रक्तदान करके रक्तवीर बनते हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक उपेक्षा के चलते दो दिन मानसिक रूप से पशोपेश में रहते हैं. आखिर प्रशासन को इस तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है.

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02 जून 2020

ध्यान रखना, लॉकडाउन और अनलॉक तुम्हारे लिए नहीं

लॉकडाउन के बाद अब नई शब्दावली चलन में आ गई है, अनलॉक. वैसे इन दोनों शब्दों से लोग पहले से परिचित रहे हैं मगर इस सन्दर्भ में पहली बार प्रयोग कर रहे हैं. इस लॉकडाउन लगने, खुलने को लेकर लोगों में अजब सी उथल-पुथल है. जब इसे लगाया गया था तो इनके पेट में मरोड़ उठी थी. उसके बाद जब इसका दूसरा भाग शुरू हुआ तो फिर ज्यादा मरोड़ हुई. पहले मरोड़ उठी थी लगने को लेकर फिर मरोड़ उठी एकाएक लगने को लेकर. श्रमिकों, मजदूरों के परेशान होने को लेकर. इन मरोड़धारियों को जानकारी नहीं थी कि ये क्या होने लगा है. इसी कारण से उस समय बमचक नहीं मचाई जबकि लॉकडाउन शुरू हुआ था. जब कुछ दिन बाद दिमाग ने इसका विश्लेषण, आकलन करना शुरू कर दिया तो सरकार के कदमों की समीक्षा होने लगी.


अब जबकि लॉकडाउन को खोल दिया गया है या कहें कि अनलॉक जैसी स्थिति का आरम्भ हो गया है तो इन्हीं लोगों को फिर समस्या होने लगी है. अब समस्या यह है कि आखिर लॉकडाउन हटाया क्यों जा रहा? इनकी समस्या ये भी है कि जब संख्या कम थी तो लॉकडाउन लगाया गया था, अब जबकि संख्या बढ़ने लगी है तो लॉकडाउन हटाया जाने लगा है. ऐसे लोगों की समस्या ठीक पहले दिन वाली है. तब भी अपना दिमाग न लगाते हुए बस विरोध करना था, आज भी दिमाग न लगाते हुए बस विरोध करना है. कभी सोचा है कि इतने लॉकडाउन के बाद भी संख्या बढ़ रही है तो यदि लॉकडाउन न किया होता तो यही संख्या मार्च के अंत में होती. फिर यही अतिबौद्धिक लोग सरकार के कार्यों की आलोचना करते. सरकार की तैयारियों की बुराई करते.


किसी ने कभी सोचा होगा कि देश को कभी इतनी बड़ी संख्या में पीपीई किट की आवश्यकता पड़ेगी? किसी ने कभी इसका आकलन किया होगा कि देश में कभी भी सामान्यजन को भी एन-95 मास्क की आवश्यकता होगी? किसी भी लैब ने या किसी भी चिकित्सकीय संस्थान सहित किसी भी बुद्धिजीवी ने विचार किया था कि देश को कभी कोरोना टेस्टिंग किट की आवश्कता पड़ेगी? क्या कभी किसी ने विचार किया था कि महज इसी एक बीमारी के लिए देश में प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोगों के सैंपल इकठ्ठा किये जायेंगे, उनकी जाँच की जाएगी? क्या किसी ने कभी अस्पताल जाने के दौरान सोचा होगा कि कोई दिन ऐसा भी आएगा जबकि किसी बीमार के लिए आइसोलेशन वार्ड जैसी जगह भी बनानी पड़ेगी? किसी ने भी ऐसा नहीं सोचा था. संभवतः ऐसा किसी भी देश की सरकार ने नहीं सोचा होगा.

ऐसे में जबकि आपके सामने, परिवार के सामने, देश के सामने, सरकार के सामने ऐसी कोई स्थिति आ जाये जो एकदम से नई हो तो क्या किया जाये? क्या उससे बिना तैयारी के लड़ना शुरू कर दिया जाये? क्या उससे निपटने के साधनों को उपलब्ध नहीं करवाया जाये? बस ध्यान रखें कि सरकार ने आरम्भिक दिनों में लॉकडाउन करके यही सब किया. इतने दिनों में लॉकडाउन के कारण मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ी. लोगों की आवाजाही कम रही, देश भर की सारी गतिविधियाँ ठप्प रहीं जिससे सरकार और उसके सहयोगीजनों को अपनी तैयारी करने का समय मिला. जो देश दे महीने पहले पीपीई किट बनाता न हो वह अब निर्यात करने की स्थिति में है. जिस देश में टेस्टिंग किट बनती न हो वह अब एक दिन में एक लाख से अधिक जाँच कर रहा है. जिस देश की चिकित्सा व्यवस्था को दोयम दर्जे का माना जाता रहा हो उसने रेलवे की बोगियों को महीने भर से कम समय में आइसोलेशन वार्ड में बदल दिया. अब लाखों की संख्या में बेड तैयार हैं, किसी भी असामान्य स्थिति से निपटने को. क्या ये आपके लिए संतोष की बात नहीं है?

संभव है कि बहुतों के लिए इसमें भी सरकारी हेरफेर दिखाई दे तो फिर स्पष्ट शब्दों में इसे ऐसे समझिये. सरकार ने लॉकडाउन आपके लिए नहीं लगाया था बल्कि अपनी तैयारियों के लिए लगाया था. सरकार ने अब अनलॉक किया है तो वो भी आपके लिए नहीं किया है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को सँभालने के लिए किया है. दो महीने के लॉकडाउन में सरकार ने आपको खूब समझा दिया, तोते की तरह रटवा दिया कि कैसे बचना है कोरोना से. क्या-क्या सावधानियाँ अपनानी हैं. उसने आपको हर तरह से प्रशिक्षित कर दिया है. अब ये आपकी मनमर्जी पर है कि आप असावधानी में कोरोना को चपेटते हैं ये फिर कोरोना आपको अपने लपेटे में लेता है. अब ये आपके कदम बताएँगे कि आप अपने कार्य के लिए बढ़ रहे हैं या फिर कोरोना की तरफ जा रहे हैं. मर्जी आपकी क्योंकि स्वास्थ्य है आपका, परिवार है आपका, जान है आपकी.

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22 मई 2020

हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर

फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,
फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.
कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.
आज डरने लगे लोग खुद से मगर.
























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