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19 मई 2023

ज़िन्दगी इक सफ़र, दोस्तों संग है सुहाना

ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना, इस गीत को कितनी ही बार सुना है, गुनगुनाया है. इस गाने-गुनगुनाने के क्रम में बहुत बार मन ही मन ज़िन्दगी के बारे में विचार भी किया, उसके गुजरते चले जाने के बारे में भी सोचा. इस सफ़र में अनेक बार ऐसे मौके आये जिसने हँसने के अवसर दिए और ऐसे भी पल आये जिन्होंने आँसू भी दिए. सुख-दुःख, हँसना-रोना, मिलना-बिछड़ना आदि इस ज़िन्दगी के सफ़र के बहुत बड़ा सत्य है. इस सत्य को जानते-समझते हुए भी बहुत बार मन उदास हो जाता है, विचलित हो जाता है. बहुत सी बातें, बहुत सी घटनाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनके कारण दिल न चाहते हुए भी टूट सा जाता है, आत्मविश्वास डगमगा सा जाता है. ऐसी स्थिति में ज़िन्दगी का ये सफ़र उदास, बेरंग सा, बेमकसद सा समझ आने लगता है. लगता है जैसे कि आसपास सबकुछ खाली-खाली है, लगता है जैसे चारों तरफ एक तरह का सन्नाटा है. 


चारों तरफ के चीखते सन्नाटों में, दिल के बिना आवाज़ टूटते जाने के बीच जब ऐसा लगता है कि सबकुछ समाप्त होने वाला है, कुछ भी अपने मन का नहीं है तब दोस्त ही होते हैं जो दिल को संगीतमय बनाते हैं, मन को गुलज़ार करते हैं. यदि व्यक्तिगत रूप से अपनी बात करें तो ज़िन्दगी में बहुत से पल ऐसे आये जबकि लगा कि सबकुछ समाप्त हो गया है, लगा कि मुठ्ठी खाली की खाली रह गई है उन नाजुक से क्षणों में दोस्तों ने कंधे पर अपने साथ की मजबूती भरा हाथ रखा. हमारे खाली होते जा रहे, काँपते हाथों को अपनी हथेली में थामकर उनमें शक्ति का संचार किया है. हम साथ हैं की भाव-भंगिमा के सहारे दिल में, मन में विश्वास का भाव जगाया है. इधर कई दिनों से किसी काम में मन नहीं लग रहा था. किसी भी तरह का नैराश्य न होने के बाद भी एक निराशा जैसी स्थिति बनी हुई थी. सबकुछ ठीक-ठाक होने के बाद भी लगता था जैसे कुछ सही नहीं हो रहा. खुद के कार्यों से असंतुष्टि का भाव न होने के बाद भी खुद से अजब सी नाराजगी जैसी बनी हुई थी. सारे काम नियमित रूप से करने के बाद भी लगता था जैसे कोई काम पूरा नहीं हो रहा.




ऐसे अनकहे से, अनसुलझे से माहौल में एक वाक्य ‘आजकल बहुत निगेटिव हो रहे हो’ से भीतर ही भीतर ही लगा कि क्या वाकई ऐसा हो रहा है? नकारात्मकता जैसी कोई बात न होने के बाद भी यदि बातों-बातों में कोई दोस्त मानसिक स्थिति को, मनोदशा को इस रूप में देख रहा हो तो लगा कि अब खुद के सजग होने की स्थिति है. एक काम बचपन से करते आ रहे हैं, रोज रात को सोने के पहले दिन भर के कामों का आकलन, खुद अपना विश्लेषण. वही काम दिन में किया, खुद के कामों को लेकर, खुद की सक्रियता को लेकर, खुद के आसपास की स्थिति को लेकर, खुद की मनःस्थिति को लेकर. लगा कि भले ही नकारात्मकता हावी न हो रही हो मगर काम में वैसी सकारात्मकता भी नहीं है. ऐसा भी महसूस हुआ कि निष्क्रियता भी नहीं मगर पहले जैसी सक्रियता भी नहीं दिखी. सारे काम हो रहे हैं, फोटोग्राफी भी हो रही, पेंटिंग, स्केचिंग भी हो रही, नियमित लेखन भी हो रहा, पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी नियमित लिखा जा रहा फिर भी ऐसा लगता कि कुछ न किया जाये. सबकुछ करने के बाद भी करने का मन नहीं होता.


दोस्त के एक शब्द निगेटिव होने ने जैसे सोते से उठा दिया. लगा कि वाकई यदि सारे काम करने के साथ-साथ यही एहसास साथ चलता रहा कि कुछ भी नहीं हो रहा है, यदि काम करने के दौरान भी मन में यही भाव बना रहा कि कुछ भी करने का मन नहीं है तो आज नहीं तो कल नकारात्मकता हावी हो ही जाएगी, निगेटिव हो ही जाएँगे. वैसे अपने बहुत सारे मित्रों से, परिचितों से कहा भी है कि हमें अपनी काउंसलिंग करवानी है मगर वे सब इस बात को हँस कर टाल जाते हैं. हमें लगता है कि वाकई हमें अपनी काउंसलिंग करवाने की आवश्यकता है. न होगा तो हम खुद ही अपनी काउंसलिंग करेंगे. अपने उसी दोस्त के कहने के हिसाब से कि सबको कूल कर लेते हो तो खुद को भी कूल कर लो. बहरहाल, ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना, बस उसमें दोस्तों की उपस्थिति का भी रहे होना. 





 

16 अक्टूबर 2022

दिल और दिमाग के द्वंद्व में...

दिल और दिमाग की अपनी ही अलग कहानी है. बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनके लिए दिल और दिमाग में तालमेल नहीं बैठता है. अक्सर जिस बात के लिए दिल तैयार होता है, दिमाग उसके लिए अपनी सहमति नहीं देता है. कई बार इसका उल्टा भी होता है. ऐसा नहीं है कि हर बार दिल ही सही होता है और दिमाग गलत. बहुत बार ऐसा होता है कि दिल सही होता है, तो बहुत बार दिमाग का कहना भी सही होता है. बावजूद इसके व्यक्तिगत अनुभव किया है कि दिल और दिमाग के आपसी सम्बन्ध चाहे जैसे हों मगर उनका सबसे ज्यादा शिकार इन्सान ही बनता है और वही सर्वाधिक कष्ट का सामना करता है.


देखा जाये तो दिल का सम्बन्ध भावनात्मकता से और दिमाग का सम्बन्ध व्यावहारिकता से है. इसके पीछे किस तरह का सिद्धांत काम करता है या नहीं, इसके बारे में तो विस्तृत अध्ययन के बाद ही ज्ञात हो सकता है. यहाँ जो भी कहा जा रहा है, वह हमारा नितांत व्यक्तिगत अनुभव है. दिल के मामले में ज्यादातर मामलों में भावनात्मकता को ही सर्वोपरि देखा है. दिमाग के द्वारा लाख विश्लेषण करने के बाद भी यदि दिल को संवेदनात्मक रूप से कोई बात सही लगती है तो इन्सान उसी को करने के प्रति संवेदित होता है. इसके उलट दिमाग के द्वारा किसी भी बात के होने या न होने, करने या न करने के पीछे पूरी गणित बैठा ली जाती है, उससे सम्बंधित लाभ-हानि का आकलन कर लिया जाता है. ऐसा करने के बाद ही उस स्थिति को विचारणीय मानकर आगे बढ़ना होता है.




आजकल हम स्वयं दिल और दिमाग के झंझावात में झूल रहे हैं. बहुत सी बातें इस तरह से सामने आ रही हैं कि उनके लिए समझ नहीं पाते हैं कि दिल की सुनें या दिमाग की? बहुत सी बातों में लगता है कि दिल सही कह रहा है मगर दिमाग के आकलन पर जाते हैं तो वह भी गलत प्रतीत नहीं होता है. इसी तरह बहुत सी बातों में दिमाग का विश्लेषण एकदम सटीक दिखाई देता है मगर भावनात्मक रूप से दिल की बात भी गलत नहीं लगती है. दिल और दिमाग के बनाये इस तरह के द्वंद्व के बीच हम खुद को घिरा हुआ पाते हैं. बहुत सी स्थितियों में दोनों के बीच का रास्ता निकाल लिया जाता है मगर बहुत बार ऐसा होता है कि खुद को उस घिरी हुई स्थिति से बाहर निकालना मुश्किल मालूम होता है. ऐसी स्थिति अत्यंत जटिल होती है क्योंकि न तो दिल गलत होता है और न ही दिमाग. ऐसी स्थिति में हम व्यक्तिगत रूप से जो काम करते हैं वो ये कि दिल की बात मान लेते हैं. हमारा अपना मानना है कि दिल और दिमाग के द्वंद्व में बात दिल की ही मान लेनी चाहिए क्योंकि एक वही है जो भावनाओं की, एहसासों की परवाह करता है, बिना किसी गणित के, बिना किसी विश्लेषण के अपनी बात कहता है.


ऐसा करना हमारे व्यक्तिगत स्तर की बात है. आप किसकी बात मानते हैं, किसकी बात मानेंगे ये आप अपने आकलन से करियेगा. कहा जा सकता है कि दिमाग लगाइयेगा कि किसकी बात मानी जाये, दिल की या दिमाग की. 





 

06 जनवरी 2022

कुछ है जो असंतुलित किये है

कभी-कभी सब कुछ सही सा दिखने के बाद भी कुछ सही सा नहीं लगता है. अपने आपमें ही ऐसा महसूस होता रहता है जैसे बहुत कुछ छूट सा रहा है, बहुत कुछ अनचाहा सा हो रहा है. कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वैसे देखा जाये तो कभी-कभी ही क्यों ऐसा हर बार होता है जबकि समझना कठिन होता है कि ये बहुत कुछ अनचाहा सा क्यों हो रहा है. मन की, तन की साम्यावस्था बनाये रखना बहुत कठिन हो जाता है. मन और तन का आपसी तालमेल न बैठ पाने के कारण किसी काम को करने की मनःस्थिति भी नहीं बन पाती है. मन कुछ करना चाहता है, दिल कुछ कहता है और देह कुछ और करने लगती है. इस असंतुलन को संतुलित कर पाना बहुत ही मुश्किल काम होता है.


हर बार ऐसी स्थिति के बाद कोई ठोस और कठोर निर्णय लेने का मन करता है मगर संभवतः असंतुलन की स्थिति किसी एक स्थायी निर्णय पर भी नहीं पहुँचने देती है. कई बार लगता है किसी मशीन की तरह, किसी कंप्यूटर की तरह दिल-दिमाग को अपडेट किया जा सकता. किसी तकनीक के द्वारा फॉर्मेट किया जा सकता अपनी मेमोरी को, अपनी स्मृति को. वाकई, यदि मन को, दिल को, दिमाग को किसी कंप्यूटर की तरह फॉर्मेट किया जा सकता, किसी सॉफ्टवेयर की तरह अपडेट किया जा सकता, उसको असामान्य स्थिति होने पर अनइनस्टॉल, इनस्टॉल किया जा सकता. अफ़सोस ऐसा कुछ इंसानी शरीर के साथ, उसके दिल-दिमाग के साथ नहीं किया जा सकता है.


ऐसा न हो पाने के कारण तमाम उलझनों का बोझ उठाये बस चलायमान रखा जा रहा है. खुद को कर्तव्य पथ पर सक्रिय बनाये रखा जा रहा है. ये भी समझ से परे है कि खुद को काम में लगाए हुए हैं अथवा काम में उलझे होने का बहाना बनाये हुए हैं?




29 सितंबर 2021

हृदय को स्वस्थ और मजबूत रखें

आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए लोगों ने अपने शरीर की परवाह किये बिना धनोपार्जन की परवाह करना शुरू कर दिया. वैश्वीकरण के दौर ने इस काम में उत्प्रेरक का काम किया है. अब लोगों को अपने स्वास्थ्य, घर-परिवार से ज्यादा चिंता अपने धन की रहती है, अपनी आर्थिक स्थिति की रहती है. इस कारण से लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है. अव्यवस्थ‍ित दिनचर्या, अनावश्यक तनाव, अशुद्ध खाना-पीना, प्रदूषण आदि के कारण इंसानों में अत्यधिक बीमारियाँ देखने को मिल रही हैं. इनमें भी सर्वाधिक मरीज हृदय रोग के मिल रहे हैं. इसमें भी सबसे बुरी बात ये है कि युवा वर्ग के लोग बहुतायत में ह्रदय रोग के बीमार हो रहे हैं.  


पूरे विश्व में हृदय के प्रति जागरूकता लाने और रोग की समस्याओं से बचने के लिए प्रतिवर्ष 29 सितम्बर को विश्व हृदय दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने की शुरूआत सन 2000 में की गई थी. आरम्भ में इसे प्रतिवर्ष सितम्बर माह के अंतिम रविवार को मनाया गया किन्तु सन 2014 में इसके लिए 29 सितम्बर की तिथि को निर्धारित कर दिया गया.




हृदय को स्वस्थ रखने के लिए निम्नलिखित उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं - 


प्रतिदिन व्यायाम के लिए समय निकालें. इसमें भी सुबह, शाम पैदल चलना अथवा सैर करना बेहतर है.

भोजन के द्वारा भी हृदय रोग की समस्या पर बहुत हद तक नियंत्रण लगाया जा सकता है. इसके लिए भोजन में नमक और वसा की मात्रा कम कर की जा सकती है. इसके साथ-साथ ताजे, मौसमी फल और सब्जियों को भोजन में नियमित रूप से लेना चाहिए.

धूम्रपान नहीं करना चाहिए. यह हृदय के साथ ही कई बीमारियों का कारक है.

इसके अलावा हृदय को तंदुरुस्त रखने के लिए नींद का भरपूर लिया जाना सर्वोत्तम उपाय है.

  

28 दिसंबर 2020

हमारा दिल तो बच्चा है जी

दिल वाकई बच्चा ही होता है. यह किसी फिल्म का डायलाग मात्र नहीं कि दिल तो बच्चा है बल्कि इसे बहुत से लोगों ने अपने जीवन में इस फ़िल्मी डायलाग के पहले भी महसूस किया होगा, इस पंक्ति को कई बार बोला भी होगा. ये भी नहीं कह सकते कि ऐसा सबके साथ होता होगा क्योंकि बहुतेरे लोगों ने अंधी दौड़ में भागते हुए अपने दिल को ही नहीं मारा है बल्कि उसके बचपने को भी मार डाला है. यह आश्चर्य लगेगा आपको मगर यह सत्य है. असल में व्यक्ति की उम्र कितनी भी क्यों न हो जाए, उसके पास अनुभव कितना ही क्यों न हो जाए, वह किसी भी पद पर क्यों न पहुँच जाए मगर उसके अन्दर का बच्चा, उसके दिल का बचपना कभी बड़ा नहीं होता. गौर करिए, मौका मिलते ही, कोई ऐसा अवसर आने पर जबकि बच्चों के साथ घुलने-मिलने का समय हो तो कोई भी व्यक्ति अपना पद, प्रस्थिति, प्रतिष्ठा भुलाकर बच्चों के साथ आनंदित होने लगता है, उनके साथ खेलने लगता है.


दिल का यह बचपना, दिल का इस तरह बच्चा होना बहुत से लोग जीवित बनाये रखते हुए अपनी उम्र के साथ-साथ उसे साथ लिए रहते हैं. इसके उलट बहुत से लोग जीवन के एक मोड़ पर उस बच्चे को कहीं पीछे छोड़ देते हैं, उसकी हत्या कर देते हैं. आज बात दूसरों की नहीं बल्कि खुद अपनी. ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद, उम्र का एक बहुत बड़ा भाग निकालने के बाद, सामाजिक जीवन से बहुत सुखद-दुखद अनुभव हासिल करने के बाद भी हम अपने दिल को अकेला नहीं छोड़ सके हैं. दिल आज भी बचपना करता है. आज भी हमारा मन करता है तो सड़क पर चीखते-चिल्लाते हैं, जैसे कि कभी कॉलेज, स्कूल के समय में करते थे. आज भी मन करता है तो किसी भी कार्यक्रम के पसंद न आने पर हूटिंग करते हैं, मुँह में उँगली डालकर सीटी मारते हैं. दिल की ऐसी हरकतों के साथ-साथ आज भी वे हरकतें भी हमारा दिल कर जाता है जो टीनएजर्स की हरकतें कही जाती हैं.




जी हाँ, हमारा दिल आज भी इश्क, मुहब्बत फरमाने से बाज़ नहीं आता है. फ्लर्ट करने जैसी स्थिति भले ही हम न बनने देते हैं मगर आज भी आये दिन पहली नजर का प्रेम हम कर बैठते हैं. इसके अलावा भी हमारा दिल मुहब्बत कर बैठता है. इस मुहब्बत का इजहार, इकरार करना या न करना उसकी नितांत व्यक्तिगत स्थिति है. हो सकता है कि इस पोस्ट को पढ़ने के साथ ही बहुत से लोगों को आपत्ति होने लगेगी. आपत्ति इसलिए क्योंकि जब कोई व्यक्ति सामाजिक रूप से अपना दायरा बना ले तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वो गधे की तरह सिर झुकाए खड़ा रहे, अपने को बौद्धिक बनाये रहे. कोई क्या कहता है, इससे हमें फर्क नहीं पड़ता है, हम आज भी वही करते हैं जो हमें अच्छा लगता है, हमारे दिल को पसंद आता है.


इसे पता नहीं हमारी स्वीकारोक्ति समझी जाए या फिर कुछ और मगर सच यही है कि यदि आप किसी को निस्वार्थ भाव से पसंद करते हैं, उसके प्रति गलत ख्याल नहीं रखते हैं तो किसी को प्रेम करना, उसे पसंद करना किसी भी रूप में गलत नहीं, ऐसा हमारा मानना है. कोई न कोई आये दिन अपनी किसी न किसी व्यक्तिगत चारित्रिक विशेषता के कारण, अपने गुणों के कारण, अपने कार्यों के कारण पसंद आता रहता है तो इसमें हमें कुछ भी बुरा नहीं समझ आता है. इन दिनों कुछ ऐसा हो भी रहा है. किसी के प्रति एक आकर्षण सा महसूस हो रहा है. ऐसा एहसास खुद में हो रहा है कि उसका साथ ख़ुशी भी देता है, दिल को संतुष्टि देता है. यह एक सामान्य सी स्थिति है और इसको लेकर किसी भी तरह की असामान्यता, असहजता नहीं है. यदि कहा जाता है कि दिल तो बच्चा है तो ये भी कहा जाता है कि ज़िन्दगी चार दिन की है. बस इन चार दिनों को याद रखते हुए उन्हें खुशनुमा तरीके से गुजारने की कोशिश करनी चाहिए.


ज़िन्दगी एक सफ़र की तरह है. जैसे सफ़र में दसियों लोग लोग मिलते, पसंद आते हैं इसके साथ-साथ वे बिछड़ते भी हैं, दूर भी होते हैं मगर ऐसी स्थिति के कारण हम उनके प्रति या खुद अपने प्रति किसी भी तरह का पूर्वाग्रह नहीं रखते हैं. कुछ ऐसा ही हमारे साथ है, दिल के मामले में. कोई पसंद आता है, किसी से प्यार होता है, कोई पसंद आ रहा है, किसी से प्यार हो रहा है तो महज इसलिए कि हमारा दिल तो आज भी बच्चा है जी.


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वंदेमातरम्

19 जुलाई 2020

यादों का हटाया जाना सहज होता तो....

यादें समय-असमय चली आती हैं, कभी परेशान करने तो कभी प्रसन्न करने. इनको आने के लिए न तो किसी से अनुमति की आवश्यकता होती है और न ही इनके आने का कोई समय निर्धारित होता है. क्या घटना है, क्या स्थिति है, कैसी परिस्थिति है इससे भी कोई लेना-देना नहीं, बस इन यादों का मन हुआ और आकर सामने खड़ी हो जाती हैं. अब जबकि ये समय अनलॉक की स्थिति के बाद भी नितांत अपने आपमें ही व्यतीत हो रहा है तब इन यादों ने जैसे दिल-दिमाग पर अपना ही कब्ज़ा कर रखा है. इस समय जीवनशैली नियमित होने के बाद भी, अनुशासित होने के बाद भी कहीं न कहीं थोड़ी सी अनियमित है, थोड़ी सी अनुशासनहीन है. ऐसे में कोई काम पूर्ण मनोयोग से संपन्न नहीं हो पा रहा है. किसी भी काम को करते समय उससे सम्बंधित किसी न किसी तरह की यादें अपना स्वरूप निर्मित कर लेती हैं.



आज की आईएस तकनीकी भरी दुनिया में बहुत सारे इंस्ट्रूमेंट बाजार में उपलब्ध हैं. इनमें से बहुतों के साथ मेमोरी का चक्कर जुड़ा होता है. कई बार उनको कार्यशील बनाये रखने के लिए पुरानी संग्रहित फाइल्स को हटाना होता है, उसमें जमा पुरानी, अनुपयोगी सामग्री को भी हटाना होता है. कई बार मन में आता है कि ऐसा कुछ दिमाग के साथ, दिल के साथ क्यों नहीं है? क्यों इनके साथ ऐसी कोई प्रक्रिया जुड़ी नहीं है जो दिल-दिमाग को भी फोर्मेट कर दे, उसके भीतर जमा अनुपयोगी, बेकार सामग्री को, यादों को हमेशा के लिए डिलीट कर दे.

ऐसा विचार इसलिए आता है क्योंकि हर एक याद ख़ुशी देती हो ऐसा नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि हर एक याद का अपना कोई महत्त्व हो. बहुत बार लगता है कि दिमाग, दिल बहुत सी ऐसी यादों को अपने में समेटे है जिनका होना सिर्फ दुःख ही देता है. ऐसी बहुत सी यादें हैं जिनका होना सिर्फ दुःख का कारण होता है. लगता है कि यदि उनका हटाया जाना सहज होता तो शायद बहुत से लोगों का जीवन सुखमय हो सकता था.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

07 जून 2020

काश कि दिल-दिमाग-मन को फॉर्मेट किया जा सकता

कभी-कभी भावावेश में या फिर अचानक ही अनजाने में ऐसे कदम उठ जाते हैं जिनके बारे में बाद में सोचने पर अफ़सोस होता है. कई बार उन बातों के परिणाम सामने आने के बाद भी अफ़सोस होता है. आवश्यक नहीं कि ऐसी बातों का या कदमों का कोई दुष्परिणाम हो मगर जो भी होता है वो खुद को अच्छा नहीं लगता है. ऐसे में स्वाभाविक है कि यदि आपकी खुद की बातों का जो परिणाम रहा हो वो ही आपको पसंद न आ रहा हो तो दुःख होना स्वाभाविक है. अब पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या हमारे साथ ही ऐसा है?



कुछ बातों का असर कई-कई वर्षों बाद देखने को मिलता है. कुछ बातें तत्काल अपना परिणाम दिखा देती हैं. जिन बातों का असर तत्काल देखने को मिल जाता है, उनके चलते दुःख भी क्षणिक रहता है. इसके उलट ऐसी बातें जिनके परिणाम देर से मिलें उनके बारे में कष्ट भी बहुत लम्बे समय तक रहता है. इन्हीं में बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनका छिपे रहना ही बेहतर होता है मगर कई बार भावनाओं में बह जाने के कारण बातें भी सामने आ जाती हैं. जिस समय भावनाओं का प्रकटीकरण किया जाता है, संभव है कि उस समय माहौल उनके अनुकूल हो मगर जैसे ही वातावरण उन बातों के विपरीत होता है वे बातें कष्ट देने लगती हैं.


ऐसी बातों पर पश्चाताप से भी कोई हल नहीं निकलता है. ऐसी बातों को कहने से संदर्भित क्षमा याचना भी उनके परिणाम से उत्पन्न कष्ट को कम नहीं करती. सोचने वाली बात है कि ऐसी बातों के लिए दोषी व्यक्ति पश्चाताप करना चाहता है मगर इसका कोई निदान नहीं. संभव है कि ये स्थिति अत्यंत कष्टकारी ही होती है. काश कि दिल-दिमाग-मन ऐसे यंत्र होते जिनको समय के साथ फॉर्मेट किया जा सकता. इनमें अच्छी-अच्छी यादों को संग्रहित कर लिया जाता और बुरी-बुरी बातों को, दुःख देने वाली घटनाओं को निकाल दिया जाता. काश ऐसा हो पाता.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

24 मई 2020

दिल और दिमाग के अंतर्संबंध

मानव शरीर में दिल और दिमाग, दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. दोनों के अपने निर्णय होते हैं और जीवन के फैसलों में दोनों के निर्णयों को एक-दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए. किसी भी व्यक्ति के जीवन में कठिन स्थितियों में, नकारात्मक स्थितियों में, विवाद की स्थितियों में, तनाव के समय में दिल की जगह दिमाग की बातों को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल के निर्णय मूल रूप से भावनात्मक एहसास पर आधारित होते हैं. जबकि दिमाग तर्क-क्षमता के द्वारा सही-गलत को परिभाषित करते हुए अपना निर्णय देता है.


दिल का सम्बन्ध सदैव से भावनात्मकता से रहा है. उसके द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण होने से ज्यादा संवेदनात्मक होते हैं. उसका विवेक संबंधों, रिश्तों एहसासों को प्राथमिकता देते हुए व्यक्ति को कार्य करने को प्रेरित करता है. ऐसा नहीं है कि दिल के द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में किसी तरह की त्रुटि होती है अथवा उसका व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. उसके द्वारा मन-मष्तिष्क को भी निर्णय लेने सम्बन्धी दिशा प्राप्त हो जाती है क्योंकि दिमाग भी कहीं न कहीं दिल के निर्णयों पर अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सही-गलत को परिभाषित करता है.



किसी भी व्यक्ति द्वारा निर्णय लेने सम्बन्धी स्थिति में दिल और दिमाग दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं. इस स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन, अपने भविष्य, अपने समय के अनुसार विवेकपूर्ण ढंग से विचार करता है कि उसके लिए अंतिम रूप से क्या सही है. उसी के अनुसार वह निर्णय लेता है. यही वह स्थिति होती है जबकि व्यक्ति के जीवन, भविष्य, कठिन स्थिति, नकारात्मकता, निराशा आदि दशाओं में दिमाग के निर्णयों की विजय हो जाती है. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी व्यक्ति के बहुत ही करीबी व्यक्ति के विवाह का आयोजन है और वह व्यक्ति किसी प्राकृतिक आपदा के कारण जाने में असमर्थ है. ऐसी विषम स्थिति में उसका दिल उसे जाने को प्रेरित करता है मगर दिमाग विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए उसे सही, गलत स्थिति समझाते हुए जाने से रोकता है. निश्चित है कि ऐसे विषम समय में व्यक्ति अपने जीवन की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए विवाह आयोजन में न जाने का निर्णय करता है.

किसी भी इन्सान को गंभीरता की स्थिति में जबकि उसे दिल और दिमाग में से किसी एक को चुनना पड़े तो उसे याद रखना चाहिए कि उसके निर्णय का क्या और कैसा असर होने वाला है. यदि उसके निर्णय का असर किसी व्यक्ति के कैरियर, उसके भविष्य, उसके जीवन पर पड़ने वाला है तब उसे अपने दिमाग की तार्किकता को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल विशुद्ध रूप से भावनात्मकता को वरीयता देता है जबकि दिमाग का ज्ञान मानसिक, शैक्षिक, तार्किक, बुद्धिमत्ता से समूची स्थितियों का आकलन कर निर्णय करता है.

इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि दिल के निर्णयों का महत्त्व नहीं. किसी भी रूप में दिल के विवेक पर दिमाग को हावी करना नहीं है क्योंकि जीवन में दोनों का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है. बिना दिल-दिमाग के कोई भी इन्सान सकारात्मक रूप से किसी स्थिति पर, किसी विचार पर आगे नहीं बढ़ सकता है. मूल रूप से दिल और दिमाग एक-दूसरे से अंतर्सम्बंधित होते हैं. बहुत सी स्थितियों में दिमाग के निर्णयों पर दिल के निर्णयों का भी प्रभाव होता है. जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के बारे में, अपने अभिभावकों के बारे में, अपने बच्चों के बारे में निर्णय लेने की स्थिति में होता है तब वह दिल के ज्ञान को दिमाग के विवेक पर वरीयता देता है. भले ही ये कहा जाये कि बात अपने दिल की सुननी चाहिए परन्तु तार्किक रूप से उसका आकलन दिमाग से करते हुए निर्णयों का सम्मान करना व्यक्ति का दायित्व होना चाहिए.

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(हालाँकि ये पोस्ट पुरानी है मगर आज खुद के दिल-दिमाग की स्थिति में तालमेल, समन्वय की जगह द्वंद्व दिख रहा था. ऐसे में ये पोस्ट याद आई तो इसे फिर प्रकाशित कर दिया.)
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14 मार्च 2020

दिल की अपनी, दिमाग की अपनी - 1700वीं पोस्ट

मानव शरीर में दिल और दिमाग, दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. दोनों के अपने निर्णय होते हैं और जीवन के फैसलों में दोनों के निर्णयों को एक-दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए. किसी भी व्यक्ति के जीवन में कठिन स्थितियों में, नकारात्मक स्थितियों में, विवाद की स्थितियों में, तनाव के समय में दिल की जगह दिमाग की बातों को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल के निर्णय मूल रूप से भावनात्मक एहसास पर आधारित होते हैं. जबकि दिमाग तर्क-क्षमता के द्वारा सही-गलत को परिभाषित करते हुए अपना निर्णय देता है.

दिल का सम्बन्ध सदैव से भावनात्मकता से रहा है. उसके द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण होने से ज्यादा संवेदनात्मक होते हैं. उसका विवेक संबंधों, रिश्तों एहसासों को प्राथमिकता देते हुए व्यक्ति को कार्य करने को प्रेरित करता है. ऐसा नहीं है कि दिल के द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में किसी तरह की त्रुटि होती है अथवा उसका व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. उसके द्वारा मन-मष्तिष्क को भी निर्णय लेने सम्बन्धी दिशा प्राप्त हो जाती है क्योंकि दिमाग भी कहीं न कहीं दिल के निर्णयों पर अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सही-गलत को परिभाषित करता है.


किसी भी व्यक्ति द्वारा निर्णय लेने सम्बन्धी स्थिति में दिल और दिमाग दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं. इस स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन, अपने भविष्य, अपने समय के अनुसार विवेकपूर्ण ढंग से विचार करता है कि उसके लिए अंतिम रूप से क्या सही है. उसी के अनुसार वह निर्णय लेता है. यही वह स्थिति होती है जबकि व्यक्ति के जीवन, भविष्य, कठिन स्थिति, नकारात्मकता, निराशा आदि दशाओं में दिमाग के निर्णयों की विजय हो जाती है. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी व्यक्ति के बहुत ही करीबी व्यक्ति के विवाह का आयोजन है और वह व्यक्ति किसी प्राकृतिक आपदा के कारण जाने में असमर्थ है. ऐसी विषम स्थिति में उसका दिल उसे जाने को प्रेरित करता है मगर दिमाग विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए उसे सही, गलत स्थिति समझाते हुए जाने से रोकता है. निश्चित है कि ऐसे विषम समय में व्यक्ति अपने जीवन की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए विवाह आयोजन में न जाने का निर्णय करता है.

किसी भी इन्सान को गंभीरता की स्थिति में जबकि उसे दिल और दिमाग में से किसी एक को चुनना पड़े तो उसे याद रखना चाहिए कि उसके निर्णय का क्या और कैसा असर होने वाला है. यदि उसके निर्णय का असर किसी व्यक्ति के कैरियर, उसके भविष्य, उसके जीवन पर पड़ने वाला है तब उसे अपने दिमाग की तार्किकता को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल विशुद्ध रूप से भावनात्मकता को वरीयता देता है जबकि दिमाग का ज्ञान मानसिक, शैक्षिक, तार्किक, बुद्धिमत्ता से समूची स्थितियों का आकलन कर निर्णय करता है. 


इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि दिल के निर्णयों का महत्त्व नहीं. किसी भी रूप में दिल के विवेक पर दिमाग को हावी करना नहीं है क्योंकि जीवन में दोनों का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है. बिना दिल-दिमाग के कोई भी इन्सान सकारात्मक रूप से किसी स्थिति पर, किसी विचार पर आगे नहीं बढ़ सकता है. मूल रूप से दिल और दिमाग एक-दूसरे से अंतर्सम्बंधित होते हैं. बहुत सी स्थितियों में दिमाग के निर्णयों पर दिल के निर्णयों का भी प्रभाव होता है. जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के बारे में, अपने अभिभावकों के बारे में, अपने बच्चों के बारे में निर्णय लेने की स्थिति में होता है तब वह दिल के ज्ञान को दिमाग के विवेक पर वरीयता देता है. भले ही ये कहा जाये कि बात अपने दिल की सुननी चाहिए परन्तु तार्किक रूप से उसका आकलन दिमाग से करते हुए निर्णयों का सम्मान करना व्यक्ति का दायित्व होना चाहिए. 
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

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(यह इस ब्लॉग की 1700वीं पोस्ट है.)

04 फ़रवरी 2020

कुछ याद न आया करे


याददाश्त का किसी भी व्यक्ति के जीवन में बड़ा ही महत्त्व माना गया है. ऐसा समझा जाता है कि जिसकी याददाश्त बहुत अच्छी होती है उसे बुद्धिमान कहा जाता है. ऐसे व्यक्तियों को सफलता प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता है. किसी पुस्तक में पढ़ा भी था कि स्वामी विवेकानन्द अपने बचपन में किताब पढ़ते जा रहे थे और उसके पृष्ठ फाड़ कर फेंकते जा रहे थे. ऐसा करते देख उनके पिता ने इसका कारण पूछा तो नरेन्द्र बोले कि उनको किताब याद होती जा रही है. ऐसा सुनकर जब उनके पिता ने इस बात की सत्य जाँची तो वे आश्चर्यचकित रह गए. नरेन्द्र को किताब ज्यों की त्यों, शब्दशः याद थी. स्वामी विवेकानन्द की प्रतिभा, उनके बौद्धिक कौशल का लोहा तो सारी दुनिया आज भी मानती है. याददाश्त का इतना प्रबल रूप प्राप्त कर लेना हर एक के वश की बात नहीं होती है. किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता है अपनी याददाश्त को प्रभावी बनाये रख पाना. उम्र के अनुसार, कार्यक्षमता के हिसाब से, दिनचर्या के चलते भी व्यक्तियों की याददाश्त में विचलन देखने को मिलता है.


याददाश्त का उत्तम होना भले ही किसी भी व्यक्ति को शीर्ष पर पहुंचता हो मगर कई बिन्दुओं पर याददाश्त का अच्छा होना उस व्यक्ति के लिए सुखद नहीं होता है. सैद्धांतिक रूप से भले ही किसी भी व्यक्ति का जीवन बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था जैसे चरणों में बाँट दिया गया हो मगर व्यावहारिक रूप से उसका जीवन प्रतिपल एक नया चरण होता है. हर नए आने वाले पल में वह अपने जीवन को नए रूप में देखता है. ये और बात है कि आने वाले समय को वह वर्तमान पल की आपाधापी में महसूस नहीं कर पाता है, उसका एहसास नहीं कर पाता है. एक-एक पल किसी भी व्यक्ति के जीवन में अपनी अहम् भूमिका का निर्वहन करता है. ऐसे में उन व्यक्तियों के लिए अत्यंत कष्टकारी समय बार-बार सामने आता है जिनकी याददाश्त अच्छी होती है. कुछ भी न भूल पाने वाले व्यक्तियों के लिए अपने अतीत को लेकर आगे बढ़ना बहुत कठिन हो जाता है. असल में दिमाग किसी तरह का कोई कंप्यूटर अथवा मोबाइल नहीं कि जिसे जब मन आया फॉर्मेट कर दिया. दिमाग को बचपन से ही सक्रिय, सचेत, सजग बनाये जाने के कदम उठाये जाने लगते हैं. ऐसे में बहुत से लोगों का दिमाग अत्यंत सक्रिय अवस्था में बना रहता है. उनकी सोचने-समझने और याद करने की शक्ति भी अन्य लोगों से विलक्षण स्थिति में होती है. और मजे की बात यह कि अपने अतीत को लेकर ऐसे लोग ही सबसे ज्यादा परेशान रहते हैं.

अपने अतीत को कितना याद रखा जाये कितना भुलाया जाये यह व्यक्ति के हाथ में होना चाहिए. अपनी याददाश्त की क्रियाशीलता पर किसी व्यक्ति का अधिकार होना ही चाहिए. यादों का पिटारा किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को खुश कम रखता है, उसे रुलाता ज्यादा है. कई बार लगता है याददाश्त का सशक्त होना व्यक्ति की संवेदनशीलता, उसकी भावनात्मकता से भी जुड़ा हुआ मामला है. अक्सर देखने में आया है कि कोई व्यक्ति अपनी खुद की याददाश्त का कितना भी ख़राब होना बताये मगर यदि कोई घटना उसकी भावना से, उनकी संवेदना से जुड़ी होती है तो वह उसे बरसों-बरस याद रहती है. व्यक्तिगत तौर पर हमसे जुड़े हमारे मित्रों की याददाश्त, उनके क्रियाकलापों को देखकर अक्सर इस बिंदु की पुष्टि हुई है. ऐसे में यदि याददाश्त और भावनात्मकता का गहरा सम्बन्ध है तो व्यक्ति को बहुत ज्यादा भावनात्मक नहीं होना चाहिए. उसे अपनी सामर्थ्य और अपने व्यवहार के अनुसार ही अपनी भावनात्मकता का विस्तार करना चाहिए. समय के साथ व्यक्ति के संबंधों में भी परिवर्तन आता है, उनके निर्वहन में भी किसी न किसी तरह के बदलाव आते हैं. इस तरह के परिवर्तन उसकी यादों को, उसकी स्मृतियों को प्रभावित करते हैं. सशक्त याददाश्त के चलते, यादों के पल-प्रति-पल आसपास विचरण करने से परेशान होते व्यक्तियों को अपनी भावनात्मक्र पर अंकुश लगाना चाहिए. दिल-दिमाग न तो कंप्यूटर है और न ही कोई मशीन कि जिसे जब मन आया फॉर्मेट कर दिया. इसे स्वयं के व्यवहार से ही नियंत्रित किया जा सकता है.

28 जनवरी 2020

दिल की नागरिकता के लिए भी बने एक नागरिकता कानून


अपने कॉलेज में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर होने वाले कार्यक्रम में विचार रखना हैं, इसी सन्दर्भ में नेट पर इधर-उधर कुछ वेबसाइट को उलटा-पलटा जा रहा था. कई-कई बिंदु एक जैसे ही मिले और उनका सार यही निकला कि 30 दिसम्बर 2014 तक जो अवैध प्रवासी देश में आ चुके हैं, यदि वे नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं तो उनके प्रार्थना-पत्र पर सरकार विचार करेगी. इसके साथ-साथ मुख्य रूप से जो बिंदु इसमें सर्वाधिक विवाद का विषय बना हुआ है वह है कि छह गैर-मुस्लिमों को ही देश में नागरिकता के लिए पात्र माना गया है. इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को भारत में नागरिकता नहीं दी जाएगी. संशोधनों में यह भी शामिल किया गया है कि अब ऐसे प्रवासी शरणार्थी बारह वर्ष की जगह मात्र छह वर्ष रहने के बाद ही नागरिकता के लिए आवेदन करने के पात्र हो जायेंगे. इसके अलावा और भी अनेकानेक बिंदु हैं जो इस कानून के साथ जुड़े हुए हैं.


नागरिकता संशोधन कानून के प्रावधानों को पढ़ते समय महसूस हुआ कि ऐसा कोई कानून दिल सम्बन्धी मामलों के लिए भी होना चाहिए. किसे दिल के मामले में घुसपैठ करनी है, कौन दिल के मामले में नागरिकता का आवेदन करेगा, कितने वर्ष दिल में रहने के बाद कौन आवेदन का पात्र होगा, किसे दिल सम्बन्धी मामलों के लिए आवेदन का, नागरिकता लेने का अधिकार नहीं होगा यह सबकुछ कानूनी रूप से निर्धारित होना ही चाहिए. दिल का हाल भी अपने देश के जैसा कर दिया है. जिसे देखो वह मुँह उठाये चला आता है और आने के बाद वह यहीं की नागरिकता का दावा भी करता है. ऐसे में समस्या दिल के मालिक को नहीं वरन उसे अवश्य होती है जो दिल की नागरिकता पहले से हासिल किये है. ऐसे में विवाद होना ही होना है. यहाँ एक बात और प्रमुख है जो सभी विवादों की जड़ में है और वो है पहली नजर का मिलना, उसका आकर्षण होना. दिल के मामले में आँखों को अहमियत देने का दुष्परिणाम यही होना था. आँखों का क्या है, सुबह से शाम तक सैकड़ों से मिलती-जुलती हैं, उनकी आँखों में आँखें डाल कर बातें करती हैं, ऐसे में पहली नजर का आकर्षण हो जाना कोई आश्चर्य नहीं.

अब जबकि पहली नजर के आकर्षण को, प्रेम को स्वीकारोक्ति मिली है तो इसका सीधा सा मतलब है कि उसके लिए किसी न किसी ने एक कानून बना रखा है. अब ऐसे कानून का लाभ उठाकर ये पहली नजर वाले सीधे दिल में अपनी नागरिकता के लिए सक्रिय हो जाते हैं. यहाँ मुश्किल तो ये हो जाता है कि जो वर्षों से दिल की नागरिकता लिए बैठा है उस पर ये पहली नजर वाले ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं. इसका कारण ये है कि जो स्थायी रूप से अपनी नागरिकता लेकर बैठा है वह संख्याबल में कम है और इसके उलट पहली नजर वालों की संख्या तो रोज ही बढ़ जाती है. ये संख्या घुसपैठिया रूप में बढ़ रही है. ऐसी स्थिति में अराजकता फैलनी ही है. पहली नजर वालों को एकजुट होकर उपद्रव करना ही है. इस उपद्रव में रोज वे भी शामिल हो जाते हैं जो उस दिन के पहली नजर वाले होते हैं. ऐसे में दिल को किसी तरह के उत्पात से बर्बाद होने से बचाने के लिए कोई न कोई कानून अपेक्षित है. ऐसा इसलिए भी जल्दी किया जाना चाहिए क्योंकि देरी होने की स्थिति में कोई जहीन काण्ड, हसीन बाग़ हो गया तो स्थायी नागरिकता वालों को मुश्किल हो जाएगी. आखिर पहली नजर वाले घुसपैठिया रोज ही बढ़ते जा रहे हैं.

07 दिसंबर 2019

अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ बनना ही लिखा हो


कई बार सामान्य सी बातचीत भी असामान्य चर्चा की तरफ मुड़ जाती है. ऐसी चर्चा किसी निर्धारित बिन्दुओं के आधार पर अथवा किसी निश्चित विषय निर्धारण के द्वारा रास्ता नहीं पकड़ती है. बस बात की बात निकलते-निकलते कहाँ चली जाती है, समझ नहीं आता है. पिछले दिनों अपने मित्र सुभाष के साथ मैसेज के द्वारा चैटिंग हो रही थी. बातचीत का रास्ता अचानक से दूसरों की समस्या की चर्चा करते-करते खुद पर केन्द्रित हो गया. अकारण, बिना बात बातचीत में एक तरह का गाम्भीर्य दिखाई देने लगा. लगा कि दिल-दिमाग की उथल-पुथल कई बार शब्दों के द्वारा ज़ाहिर होने के लिए कोई न कोई माध्यम खोजती है. सत्य क्या है? इसका अभीष्ट क्या है? बातचीत का आधार बने बिना इस तरह की चर्चा का सूत्र किसके हाथों में रहा? सवालों के बीच अनेक बार इसे पढ़ने के बाद भी निरुत्तर रहे. सो लगा कि बस अब समाधान मिले, जो किसी भी रूप में मिले. मन की, दिल-दिमाग की उलझन, उथल-पुथल को विश्राम मिले. पर फिर वही सवाल कि क्या वाकई मनोस्थिति को, उलझन को, उथल-पुथल को कभी विश्राम मिला है, किसी के जीवन में भी?



= ऐसे में अगले ने अपना विश्वास हम पर रखा है... कम से कम हम खुद की नज़रों में अपराधी नहीं होना चाहते हैं. बहुत जगहों पर हम दोषी हैं पर वे नितांत हमारी हैं, व्यक्तिगत.
+ जीवन दोषो से भरा हुआ है लेकिन दोषों को स्वीकार करना ही दोष का शमन है मनुष्य जीवन में. मनुष्य होने की सीमाएं हैं. 
= हमारे दोषों का शमन नहीं, कई जगह विश्वास तोड़ा है.
+ हमें उन सीमाओं का ज्ञान हो जाये उतना ही काफी है. जीवन इतना थोड़ा सा है भाईसाहब कि कुछ भी अभीष्ट प्राप्त नही होता.
= सही बात, मगर जो सुधारा न जा सके और ये भी जानकारी हो कि खुद के कारण बिगड़ा है तो....?
+ कम से कम सच को खुद को ईमानदारी से स्वीकार करने का साहस लाना चाहिए. बस खुद की नजरों में न गिरें. स्वीकारोक्ति भी निश्छलता का ही पर्याय है.
= कम से कम हम अपने बारे में जानते हैं, सो समझते हैं. कुछ गलतियाँ चाह कर भी सुधारी न जा सकती हैं.
+ निश्छलता हर दोष के कलंक को कम करती है. गलतियां नही सुधरती, गलतियां तो घटनाएं हैं. घटना की पुनरावृत्ति न हो यही सुधार है बस. गलतियां तो जीवन का अभिन्न चरण हैं.
= कोशिश यही है.....
+ मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी मनुर्भव का लक्ष्य शायद इसीलिए स्थापित किया गया हमारे ऋषियों द्वारा.
= जब खुद की गलती से किसी और को सजा भुगतते देखते हैं तो ये सारी फिलोसोफी गायब हो जाती है.
+ फिलोसोफी की काट केवल फिलोसोफी ही है वरना मनुष्य मन सिवा बेचैनी की खान के सिवा और क्या है? या तो खाओ पीओ सड़ते रहो, बस. जरा सा चैतन्य हुए तो गलतियां मुंह बाए खडी. फिर यही फिलोसोफी ही तिनके का सहारा है.
= कुछ स्थितियाँ समझ के बाहर हैं, खुद हमारे.
+ आप हर घटना का भौतिक समाधान करते हैं, एकदम जमीनी, प्रशासन की तरह जबकि कुछ घटनाएं राजनैतिक समाधान मांगती हैं.
= कई बार लगता है कि दुनिया जहां की स्थितियाँ सुधारने की कोशिश करते हैं और खुद गलतियों के पाताल में खड़े हैं.
+ यही आपकी जीत है कि आप अनुभव करने की योग्यता रखते हैं.
= या खुद को भ्रमित करने की?
+ कह सकते हैं.
= यही सत्य है.
+ सत्य भी कहाँ एक है? सबके अपने-अपने हैं
= ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ कि बहुत सी जगह खुद को आज तक माफ़ न कर सके. कोशिश करते हैं कि और किसी के साथ गलत न होने दें.
+ गलतियों से खुद को बांधे रखना भी तो एक बन्धन ही है. बन्धन सदा दुख आमन्त्रित करता है. गलितयों को स्वीकारोक्ति ही शमन है.
= खुद की गलतियों से  मुक्ति भी चाहिए.
+ यही जीवन भर का सन्धान शेष रह जाता है. ये तो अनवरत है, यात्रा जैसे. और कम से कम आप यात्रा में हैं.
= यही कष्ट भी है.
+ हमें यात्रा शुरू करनी है. सत्य, लेकिन कष्ट ही मुक्ति भी है शायद. सेल्फ हेल्प डिवाइस.
= कष्ट मुक्ति नहीं, प्रायश्चित है.
+ मुक्ति तो किसी ने देखी नहीं.
= गलती का दुःख कोई और भी सह रहा. उसे कहाँ मुक्ति मिली तो खुद को मुक्ति कैसे?
+ मृत्यु को मुक्ति कह नहीं सकते.
= बात मृत्यु की नहीं.
+ हम समझ रहे.
= अभी एक दिन हमने खुद के मरने का सपना देखा. हम मरे हैं, ठठरी बनी है और हम ही जिन्दा हैं, बता रहे अगले को कि कौन मर गया. समझ न सके कि है क्या ये? क्या चल रहा अचेतन में?
+ इस स्वप्न का कोई विशेष अर्थ होता होगा शायद?
= क्या जानें?
+ आप साक्षी भाव से जीवन की यात्रा में जा रहे शायद, जीवन से मोह भंग मतलब जीवन के उपक्रम से. आत्महत्या नहीं ये.
= ये कह सकते हैं. जीवन से किसी तरह का कोई मोह नहीं. खुद से मरना भी नहीं चाहते, आत्महत्या जैसा. पर कोई डर नहीं कि हमारे बाद सबका क्या होगा.
+ हम समझ रहे. जीवन का अभीष्ट शून्य ही है ये सच है. आपकी इच्छाओं की मृत्यु के सूचक हैं ये स्वप्न.
= ऐसा लग रहा, जैसे बस जी रहे. सच कहें तो इच्छाएं रही ही नहीं. बस किये जा रहे, जो मन में आया.
+ यही तो इच्छाओं की मृत्यु है. हम सब समझ पा रहे. इसी शून्य से जीवन जन्म लेता ही और इसी शून्य में.
= बस इस समय खुद से लड़ रहे, पिछले लगभग दस-बारह साल से.
+ यही तो आपके इच्छाओ की मृत्यु है क्रमशः. इसी लड़ाई से आपको अमृत मन्थना है. आप नितांत अकेले हैं इस यात्रा में. कोई आपको छू भी नहीं सकता. चाह कर भी कोई साथ नहीं चल सकता.
= पता नहीं अमृत मथेगा या हम खुद ही?
+ खुद तो सब ही मथते हैं। आप खुद के साथ साथ अमृत भी मथोगे यही आपका अभीष्ट है. अमृत तो आपको निकालना ही पड़ेगा क्योंकि आप मांग नहीं सकते भगवान से. जो भगवान से नहीं मांग सकता उसे अपना कुंआ खुद खोदना पड़ेगा. ये बात अलग है भगवान उसमें भी टेक्स लेंगे.
= बस अब समाधान चाहते हैं अपनी समस्याओं का, अपनी गलतियों का, अपने आपको मथने का. जो निकलना है, निकल आये अमृत या विष. अमरत्व तो मिलना नहीं शायद नीलकंठ ही बनना लिखा हो? 

+++++++++++

(बातचीत में ‘=’ चिन्ह से हमारी बात और ‘+’ के द्वारा हमारे मित्र सुभाष की)

05 मई 2019

हँसने के लिए दिन की नहीं दिल की आवश्यकता होती है


विश्व हास्य दिवस के दिन ये सोचना ही हास्य पैदा करता है कि अब हँसने के लिए भी एक दिन विशेष की आवश्यकता है. ये भी हँसने वाली बात है कि हँसने-हँसाने के लिए भी किसी शिक्षक की, प्रशिक्षक की आवश्यकता है. ये भी हास्यास्पद स्थिति है कि एक-दो देशों में नहीं वरन आज भारत समेत दुनिया के 108 देशों में छह हजार से भी अधिक हास्य क्लब या लाफ्टर क्लब खुल चुके हैं, जिनमें 25 हजार से ज्यादा विद्यार्थी हँसने का प्रशिक्षण लेते हैं, हँसते हैं. डॉ० मदन कटारिया के ये लाफ्टर क्लब या कक्षाएँ बिना फीस के चलती हैं. डॉ० मदन कटारिया को विश्व हास्य योग आंदोलन की स्थापना का जनक माना जाता है. इनके द्वारा ही विश्व हास्य दिवस का पहला आयोजन 11 जनवरी 1998 को मुंबई में किया गया था. उसके बाद से प्रतिवर्ष मई के पहले रविवार को विश्व हास्य दिवस मनाया जाने लगा.

इस बारे में कोई दोराय नहीं कि हँसना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है. हँसने से ऑक्सीजन का संचार अधिक होता है व दूषित वायु बाहर निकलती है. हँसने से ही शरीर के अंदरूनी अवयवों की कसरत स्वतः हो जाती है. इन्सान के शरीर में पेट और छाती के बीच में एक डायफ्राम होता है जो हँसने के दौरान क्रिया करता हुआ पेट, फेफड़े और यकृत की मालिश कर देता है. इससे इन सभी अवयवों को ताकत तो मिलती ही है, शरीर में रक्त संचार की गति बढ़ जाती है. इससे व्यक्ति का पाचन तंत्र और अधिक सक्रियता, कुशलता से कार्य करने लगता है. असल में हँसना अपने आपमें ही एक तरह की सकारात्मक को समेटे होता है. साफ़ सी बात है कि कोई व्यक्ति दुःख में हँस नहीं रहा होगा. कोई व्यक्ति तमाम सारे कष्टों को सहता हुआ हँसता नहीं है. हँसने का कारण ही व्यक्ति को मिलने वाली ख़ुशी, उसे मिलने वाला सुख है. इसका सीधा सा सम्बन्ध व्यक्ति की मानसिकता से है. हँसता हुआ व्यक्ति अपने आप ही ऊर्जावान बना रहता है. अपनी इसी ऊर्जा और जोश से वह अपने आसपास के माहौल को भी सक्रिय, ऊर्जावान बनाये रखता है.

इन सब बातों को जानने-समझने के बाद भी खुलकर हँसना, ठहाके लगाकर हँसना फूहड़ता की निशानी माना जाने लगा है. ठहाकों या खिलखिला कर हँसने की बात छोड़ दें तो अब हँसना ही जाहिल, गँवार होने की निशानी माना जाने लगा है. ऐसा अक्सर वहाँ महसूस किया जाने लगा है जहाँ कथित तौर पर बौद्धिकता का प्रदर्शन किया जाता है. ऐसे में व्यक्ति अपने कार्यालय में, किसी आयोजन में, बाजार में, बीच सड़क पर, अपने मोहल्ले में खुलकर हँसने से परहेज करने लगा है. अपनी कथित बौद्धिकता के चक्कर में वह अझेल तरीके की चुप्पी धारण करने लगा है. इसी के चलते वह अब सुबह-सुबह, भोर के अँधेरे में पार्कों के कोने में, कहीं खुले मैदानों में अकेले जोर-जोर से हँसने की कोशिश करने लगा है. इस बात का भान खुद में रखने के लिए कि वह हँसना नहीं भूला है, लाफ्टर क्लब में, हँसने की पाठशालाओं में हँसने की नौटंकी करने लगा है. बड़े-बड़े शहरों की बात ही कौन करे अब तो छोटे-छोटे शहरों, कस्बों में भी सुबह-सुबह हँसने के नाम पर पेट फुलाने का, हाथ हवा में तैराने का काम होने लगा है.

समझना चाहिए कि हँसी एक नैसर्गिक क्रिया है जो मन के, दिल के, दिमाग के, शरीर के प्रफुल्ल्ति होने की दशा में स्वतः उत्पन्न होती है. क्या किसी ने किसी बच्चे को हँसने के लिए धन, भौतिकतावादी सामानों, संसाधनों की मदद लेते देखा है? असल में हँसने के लिए किसी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं. किसी धन की आवश्यकता नहीं. किसी संसाधन की जरूरत नहीं. ये व्यक्ति के भीतर से उत्पन्न होने वाली स्व-स्फूर्त ऊर्जा है जो उसे हँसने को प्रेरित करती है. अब ये तो व्यक्ति को स्वतः ही निर्धारित करना पड़ेगा कि उसे किस बात से, किस कार्य से, किस स्थिति से सुख की, आनंद की प्राप्ति होती है. ये उसी व्यक्ति को तय करना होगा कि क्या-क्या उसके मन को, दिल को दिमाग को संतुष्टि देता है, उल्लास देता है, तरंगित करता है. कोई लाफ्टर क्लब, कोई कक्षा, कोई योग, हँसने सम्बन्धी कोई भी जबरन की जाने वाली क्रिया किसी भी व्यक्ति को पल दो पल को हँसने का, हँसाने का आभास तो करवा देगी मगर उसे वाकई हँसा नहीं सकती. इसके साथ-साथ एक बात और याद रखनी होगी कि यदि हँसने के लिए व्यक्ति को किसी लाफ्टर क्लब, किसी कक्षा, किसी योग-क्रिया की, किसी दिवस विशेष की आवश्यकता पड़ती है तो वह व्यक्ति बुरी तरह से बीमार है, शारीरिक रूप से भी, मानसिक रूप से भी. हँसने के लिए किसी बहाने की नहीं, अपने आसपास के माहौल को सकारात्मक बनाने की, सहज बनाने की, प्राकृतिक बनाने की आवश्यकता है. 


इसके बाद भी औपचारिकता में ही सही आज मई के पहले रविवार, 5 मई 2019 को विश्व हास्य दिवस पर शुभकामना कि आप सभी हँसते रहें, हँसते ही रहें.

21 अप्रैल 2019

प्रेम, इश्क इंसानी प्रवृत्ति है न कि दिल, दिमाग की


शारीरिक संरचना में दिल जितना छोटा है, व्यक्ति उसे लेकर उतना ज्यादा ही परेशान है. संबंधों को, रिश्तों को, आपसी ताने-बाने को वह दिल के सन्दर्भ में तौलना शुरू कर देता है. दिल के साथ-साथ देह में एक दिमाग भी होता है. वैज्ञानिक रूप में और चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दिमागी संरचना दिल से कहीं अधिक जटिल होती है. इसके साथ-साथ दिल की क्रियाविधि की तुलना में दिमाग कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहता है. दिल और दिमाग की क्रियाविधि के बारे में यदि संक्षेप में कहा जाये तो एक का सम्बन्ध भावनात्मकता से होता है, एक का सम्बन्ध पूरी तरह से गणितीय विधि पर आधारित होता है. दिल जहाँ किसी भी स्थिति के लिए अपनी भावनाओं पर अंकुश नहीं लगा पाता है वहीं दिमाग उसी घटना पर पूरी विवेचना करने के बाद ही आगे के लिए निर्णय लेता है.


यहाँ समझना होगा कि न तो दिल और न ही दिमाग खुद में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता है. वे किसी भी स्थिति में सिर्फ और सिर्फ व्यक्ति की भावनाओं के द्वारा संचालित होते हैं, उसी व्यक्ति के निर्णय के अनुसार अपना काम करते हैं. इसके बाद भी दिल को भावना का और दिमाग को संतुलन का पर्याय बताया जाने लगता है. अक्सर प्रेमपरक मामलों में दिल को सबसे कोमल मानकर उसी के निर्णयों पर व्यक्ति अपनी राय बनाता है. सोचने वाली बात है कि आज तक किसका दिल उसके शरीर से निकल कर दूसरे के शरीर में चला गया? किसका दिल प्रेम में किसी दूसरे के हाथों में सजा दिखाई दिया? प्रेम में नाकाम रहने पर किसके दिल में छेद हुए, किसके दिल के टुकड़े हुए? किसका दिल कई-कई टुकड़ों में ज़ख़्मी मिला? ऐसा आजतक तो किसी के साथ नहीं हुआ, न ही किसी के दिल के साथ हुआ. इसके बाद भी प्रेम में दिल चला जाता है, दिल टूट जाता है, दिल के टुकड़े हो जाते हैं. क्या ऐसा कभी दिमाग के साथ होता है? जबकि यह सारा कुछ किया-धरा दिमाग का ही होता है.

सोचने वाली बात है कि आजतक किसी धनवान को किसी बीमार, अत्यंत गरीब से प्रेम न हुआ. आजतक किसी का अत्यंत अमीर का दिल किसी सड़क पर टहलते किसी गरीब से न लगा. दिल किसी तरह का भेद नहीं रखता है यह सही हो सकता है मगर क्या किसी दिलवाले या दिलवाली ने अपनी गली में आये किसी भिखारी से प्रेम किया? उसके साथ विवाह करने की जिद की? यदि प्रेम, प्यार, इश्क जैसी स्थितियाँ सिर्फ दिल की उपज हैं तो ऐसा होना चाहिए मगर ऐसा नहीं हुआ. कहीं न कहीं यहाँ भी दिमाग ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया. दिल पर दिमाग हावी हुआ और उसी के हिसाब से दिल संचालित हुआ. इसमें भी दिल, दिमाग से ऊपर उस व्यक्ति के निर्णय ने, उसके विवेक ने अपनी भूमिका निभाई जो दिल-दिमाग के कारण प्रेम, इश्क जैसी स्थिति में उलझने वाला था. ऐसी स्थिति में कहाँ दिल और कहाँ दिमाग? ये सारी की सारी स्थितियाँ सिर्फ और सिर्फ व्यक्ति के अपने मन से संचालित हैं. उसके विवेक पर आधारित हैं. अपनी और सामने वाले की पद, प्रस्थिति के अनुसार उसका दिल, दिमाग काम करना शुरू करता है और उसी के हिसाब से वह प्रेम करता है, इश्क करता है. हाँ, अपवादों का स्थान सदैव इस समाज में रहा है, यहाँ भी है. 

आज के और बीती पीढ़ी के युवाओं से एक बात स्पष्ट रूप से कि प्रेम और इश्क जैसी अवधारणा दिल को खुश करने का माध्यम है न कि दिमाग को. दिमाग सारा गणित सही-गलत के रूप में, लाभ-हानि के रूप में लगाता है और उसी के हिसाब से काम करता है. कभी-कभी ऐसे निर्णयों में व्यक्ति के निर्णयों में दिल-दिमाग का संतुलन न बन पाने का खामियाजा सिर्फ व्यक्ति को निभाना पड़ता है. चाहे उस व्यक्ति के साथ अच्छा हो या बुरा, दोनों ही स्थितियों में दिल और दिमाग उसके शरीर में उसी जगह रहते हैं, जहाँ उसके जन्म लेते समय थे. ऐसे में न तो दिल कहीं जाता है, न कोई चुरा ले जाता है, न दिल के हजार टुकड़े होते हैं, न दिल टूटता है और इसी तरह न दिमाग ख़राब होता है, न दिमाग घूमता है, न दिमाग पगलाता है. जो करता है वह संदर्भित व्यक्ति करता है और सबकुछ अपने विवेक से करता है. हाँ, आलंकारिक दृष्टि में वह कभी इसे दिल का, कभी दिमाग का मसला बताने लगता है.