04 नवंबर 2026

एक खंडहर में मिला अर्थशास्त्र के महान विद्वान प्रो. जे.के. मेहता का चेंबर!

यहाँ प्रकाशित आलेख माननीय गोविन्द निषाद जी का है. यह आलेख उनके द्वारा फेसबुक पर Allahabad tales प्रोफाइल पर लिखा गया था. उनको साधुवाद कि उनके कारण देश के एक महान विद्वान के बारे में हम लोग जान सके. इस पोस्ट में प्रयुक्त चित्र भी उन्हीं के द्वारा अपनी पोस्ट में लगाये गए.

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कभी-कभी इतिहास की तलाश में निकलिए तो ऐसी चीजें हाथ लग जाती हैं, जिनकी आपने कल्पना भी नहीं की होती। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

 

दरअसल, मैंने कहीं पढ़ा था कि वर्ष 1910 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने आठ फैकल्टी के लिए इंडियन प्रेस से आधी जमीन खरीदी थी। इसमें इंडियन प्रेस द्वारा बनवाया गया तीन भवन भी था, दो आज तक मौजूद है। यह जानने के बाद मेरे मन में उस इमारत को देखने की जिज्ञासा पैदा हुई और एक दिन मैं उसे खोजने निकल पड़ा।

 




इकोनॉमिक्स विभाग के पीछे पहुँचा तो वहाँ एक पुरानी, खंडहरनुमा इमारत दिखाई दी। कभी इस भवन में विश्वविद्यालय के कर्मचारी रहा करते थे, लेकिन आज इसकी हालत बेहद जर्जर है। हालांकि, मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि इस इमारत की तलाश मुझे भारतीय अर्थशास्त्र के एक बड़े विद्वान प्रोफेसर जे.के. मेहता के चेंबर तक पहुँचा देगी।

 

जैसे ही मैं उस चेंबर के दरवाजे के पास पहुँचा, मेरी नजर वहाँ लिखे नाम पर पड़ी- प्रोफेसर जे.के. मेहता। यकीन मानिए, उस क्षण मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में तीन साल पढ़ाई की थी। इस दौरान प्रोफेसर जे.के. मेहता के विचारों और उनके प्रसिद्ध 'आवश्यकता विहीनता के सिद्धांत' (Theory of Want Lessness) को भी पढ़ा था लेकिन कभी यह कल्पना नहीं की थी कि एक दिन अचानक उनके चेंबर के सामने खड़ा होऊँगा।

 




जमशेद कैखुसरो मेहता, जिन्हें दुनिया प्रोफेसर जे.के. मेहता के नाम से जानती है, भारतीय अर्थशास्त्र के महत्वपूर्ण विद्वानों में से एक थे। उन्होंने अर्थशास्त्र को केवल धन, उत्पादन और उपभोग तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे भारतीय दर्शन और नैतिक चिंतन से जोड़ने का प्रयास किया। उनका आवश्यकता विहीनता का सिद्धांत कहता है कि मनुष्य के वास्तविक सुख का रास्ता अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को लगातार बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें सीमित करने में है। उनके अनुसार, आवश्यकताओं को कम करके ही मनुष्य संतोष और वास्तविक मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है।

 

और आज उसी महान अर्थशास्त्री का चेंबर मेरे सामने था। यह पूरा स्थान कभी उनके उपयोग के लिए आवंटित था। भवन की दीवारों और दरवाजों पर आज भी कुछ पुराने नामों के निशान दिखाई देते हैं। लेकिन जिस जगह कभी विद्वानों की आवाजाही और बौद्धिक गतिविधियां रही होंगी, वह आज खंडहर में तब्दील हो चुकी है।

 




इस इमारत की बदहाली देखकर मन में एक सवाल जरूर उठा- क्या हमारी ऐतिहासिक और शैक्षणिक विरासत की यही नियति है? जिस विश्वविद्यालय ने देश को बड़े-बड़े विद्वान दिए, वहाँ उन विद्वानों से जुड़ी स्मृतियाँ इस तरह उपेक्षित पड़ी हैं। इमारत की हालत देखकर लगता है कि यदि जल्द संरक्षण नहीं हुआ तो शायद कुछ वर्षों बाद इसका अस्तित्व भी समाप्त हो जाए।

 

खैर, इस विरासत को बचाने के लिए मैं फिलहाल कुछ कर नहीं सकता, लेकिन उस दिन एक छोटी-सी ऐतिहासिक खोज ने मुझे बेहद खुशी दी। जिस प्रोफेसर को कभी किताबों में पढ़ा था, अचानक उनके चेंबर के सामने खड़े होने का अवसर मिल गया।

 

मेरे लिए उस दिन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि इतिहास के पन्नों में पढ़े गए प्रोफेसर जे.के. मेहता से जुड़ी एक जीवंत स्मृति को अपनी आँखों से देख पाया।






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