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03 दिसंबर 2025

दिव्यांगजनों में विश्वास जगाना होगा

03 दिसम्बर का आना हुआ और शासन-प्रशासन की तरफ से सभी जगह दिव्यांगजनों के लिए अंतरराष्ट्रीय विकलांग (दिव्यांग) दिवस को मनाया गया. इस दिवस को लेकर वैसी चहल-पहल नहीं दिखती जैसी कि अन्य दिवसों को लेकर दिखाई पड़ती है. अभी 01 दिसम्बर को ही एड्स दिवस पर जागरूकता के लिए रैलियाँ निकाली गईं, कई जगह गोष्ठियाँ, प्रदर्शनियाँ आयोजित की गईं थीं वैसा कुछ आज देखने को नहीं मिला. इसके पीछे एक मुख्य वजह जो हमें समझ आती है वो यह कि विकलांगता को लेकर समाज में अभी भी एक तरह की दया का भाव बना हुआ है. यदि इस दया के भाव को समाज के साथ-साथ पारिवारिक रूप में, सहयोगियों में, मित्रों में भी उपस्थित माना जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. ऐसा हम स्वयं व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हैं.  

 



बहरहाल, वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा निर्णय लिया गया कि सन 1981 को विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रुप में मनाया जायेगा. इस दिवस का आरम्भ भले ही वर्ष 1981 से कर दिया गया हो मगर सन 1992 से संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवीज़ के रुप में प्रचारित किया जा रहा है. इस दिवस के मनाये जाने का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर दिव्यांगजनों के लिये पुनरुद्धार, रोकथाम, प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनाना है. विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है. इसके बाद से ही सन 1992 से इसे पूरी दुनिया में हर साल से लगातार मनाया जा रहा है.

 

इस दिवस को मनाये जाने के बाद भी, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विकलांग शब्द को दिव्यांग में परिवर्तित कर देने के बाद भी ऐसे लोगों के प्रति समाज की सोच में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है. आज भी दिव्यांगजनों के प्रति विभेद देखने को मिलता है. समाज के बहुत से क्षेत्रों में उनके साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. कई बार उनको उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. आप सब लोगों ने भी महसूस किया होगा और यदि अभी तक ऐसा कुछ आपकी आँखों के सामने से नहीं गुजरा है तो अपने शहर के ऐसे केन्द्रों में जाकर देखिये जहाँ विकलांग व्यक्ति रहते हों, आज भी वे लोग दया, सहानुभूति का पात्र बनते हैं. ऐसे लोग भले ही शिक्षित हों अथवा अशिक्षित, शहरी हो अथवा ग्रामीण, रोजगार में हो अथवा बेरोजगार सभी के साथ समाज की तरफ से एक दया का भाव देखने को मिलता है.




ऐसा होने के पीछे को हम व्यक्तिगत रूप से समाज से अधिक दोष विकलांगता से जूझ रहे लोगों का मानते हैं. कमोबेश बहुतायत विकलांग व्यक्ति समाज से दया, सहानुभूति ही चाहते हैं. कुछ वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में कार्य करने की मंशा से विकलांग शक्ति (जिसे बाद में दिव्यांग शक्ति कर दिया गया) के नाम से एक अभियान शुरू किया. इसके माध्यम से ऐसे विकलांग व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने का मन बनाया था जिनमें किसी न किसी तरह की प्रतिभा हो, कोई न कोई हुनर हो. सोचा था कि ऐसे लोगों के हुनर को समाज के सामने लाकर इनको भी आगे बढ़ने का रास्ता बनाया जाये. इस अभियान से ऐसे विकलांग व्यक्ति बहुत कम जुड़े जिनको अपनी प्रतिभा का, अपने हुनर का प्रतिफल चाहिए था. बहुतायत लोगों के लिए भत्ता, पेंशन, सरकारी अनुदान, लाभ आदि को प्राप्त करना उनका अभीष्ट था.

 

ये सही है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज में सभी विकलांग लोगों को शामिल करने की दिशा में काम करने को प्रेरित करना आज के दिन का उद्देश्य है. ऐसे में जहाँ दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव दूर करना होगा वहीं खुद दिव्यांगजनों को अपने आपको मजबूर, कमजोर मानसिकता से ऊपर लाना होगा. दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने की स्थिति ये है कि ज्यादातर लोग ये नहीं जानते कि उनके घर के आसपास कितने लोग दिव्यांग हैं. लोगों को इसकी भी जानकारी नहीं कि समाज में दिव्यांगजनों को बराबर का अधिकार मिल रहा है या नहीं. ऐसे में दिव्यांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे में, दिव्यांगजनों के बारे में लोगों को जागरुक करने के साथ-साथ दिव्यांगजनों में विश्वास पैदा करने के लिए, दिव्यांगजनों को प्रोत्साहित करने के लिए भी इस दिवस को मनाना बहुत आवश्यक है.


07 दिसंबर 2024

विकलांगता के साथ व्यावसायिक दृष्टि उचित नहीं

 


ये तस्वीर अक्सर सामने आती रहती है. किसकी है, किसने खींची, कहाँ की है ये जानकारी नहीं.


इस फोटो को देखकर हर बार एक ही ख्याल मन में उभरता है, (सही या गलत होना अलग बात) कि इस चित्र को विशुद्ध व्यावसायिक उद्देश्य से खींचा गया है. उसके बाद इसका उपयोग विशुद्ध भावनात्मक रूप से किया जा रहा है. इसके पीछे का क्या मकसद है, ऐसा क्यों किया जा रहा है पता नहीं.


ऐसा इसलिए कह रहे क्योंकि हमारी जानकारी में कोई भी संस्थान जो कृत्रिम पैर बनाता है, जरूरतमंद को उपलब्ध कराता है वो इस पैर को बिना कवर किये नहीं देता है. इस चित्र में इस व्यक्ति के दोनों कृत्रिम पैर बिना कवर के हैं.


व्यावसायिक लाभ लेने के लिए, भावनात्मक फायदा उठाने की दृष्टि से यदि इस व्यक्ति को कथित रूप में शामिल किया गया है तो हम व्यक्तिगत रूप से इसकी निंदा करते हैं. अभी इसी माह के आरम्भ में विकलांग दिवस पर बड़े-बड़े आदर्श बघारे गए. उनको भी ध्यान देने की आवश्यकता है.

 


22 अप्रैल 2024

भुलाए न भूले जो तारीख

समय गुजरता रहता है. दिन, महीने, साल भी गुजरते जाते हैं. इनके साथ-साथ तारीखें भी गुजरती जाती हैं मगर कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो गुजरने के बाद भी अपनी जगह पर रुकी रहती हैं. ऐसा नहीं कि ये तारीखें दिन, महीने, साल के साथ आगे नहीं बढ़तीं, ये भी आगे बढ़ती हैं मगर इन तारीखों में मिले निशान ज्यों के त्यों बने रहते हैं, जिसके कारण ऐसा लगता है कि ये तारीख ज्यों की त्यों अपनी जगह पर रुकी हुई है. लगभग सभी के जीवन में ऐसी कोई न कोई तारीख होती होगी, काश! ऐसी कोई तारीख किसी के जीवन में न आये जो हर पल, हर क्षण अपने होने का दुखद एहसास करवाती रहे. तमाम सारी दुखद तारीखों के बीच एक ऐसी ही दुखद तारीख हमारे लिए 22 अप्रैल है. ये एक ऐसी तारीख है जिसे चाह कर भी न तो हम भुला पा रहे हैं और निश्चित रूप से ताउम्र हमारे अभिन्न में इस तारीख को भुला सकेगा.

 



इस तारीख में जो होना था वो तो हो ही गया मगर इसे न भूल पाने का कारण इस तारीख को मिले वे निशान, वे ज़ख्म हैं जो हर पल साथ हैं, सोते-जागते अपना एहसास कराते हैं. एक दुर्घटना के बाद जो ज़ख्म, जो निशान, जो दर्द मिला उसके बाद बहुत से अपनों-परायों ने सांत्वना देने के लिए, हिम्मत बढ़ाने के लिए कहा कि समय के साथ इसे भूलने की कोशिश करो. अपने आपको काम में व्यस्त करके इस दुर्घटना के ज़ख्म को, निशान को भूलने का प्रयास करो. चूँकि अपने विश्वास, अपनी शक्ति पर विश्वास अखंड है तो सोचा कि एक बार ऐसी कोशिश करने में क्या समस्या है. आखिर जब खुद को मौत के मुँह के सामने खड़ा पाकर भी वापस लाने में किसी तरह की समस्या हमने खुद में महसूस नहीं की तो उस दुर्घटना के ज़ख्म को, दर्द को भुलाने में क्या समस्या? यही सोचकर पिछले कुछ सालों में लगातार प्रयास किया कि इस दर्द को भुला सकें मगर लाख चाहने के बाद भी इसे भुलाना संभव न हुआ.

 

यदि किसी एक दिन के आरम्भ को सुबह से जोड़कर देखें तो आखिर इस ज़ख्म को कैसे भुला दें जबकि नींद खुलने के बाद अपने दोनों पैरों को सामान्य स्थिति में लाने के लिए बीस-पच्चीस मिनट तक उनकी मालिश करनी होती है? कैसे भुला दें अपनी शारीरिक अक्षमता को जबकि स्वयं को खड़ा करने के लिए एक कृत्रिम पैर की आवश्यकता पड़ती है? कृत्रिम पैर के सहारे दोनों पैरों के दर्द को खुद में पीते हुए दैनिक कर्म संपन्न किये जाते हैं, इसे कैसे भूला जा सकता है? घर से बाहर जाने के लिए तैयार होने के पहले दाहिने पैर के क्षतिग्रस्त पंजे पर पट्टी के बाँधने का अनिवार्य कृत्य करना कैसे भुला देगा कि बिना इस पट्टी के चलना संभव नहीं? रात को सोने की कोशिश में बार-बार पंजे को इधर-उधर टकराने से बचाने का काम करते हुए नींद भी लेना, ऐसी कोशिश में कैसे भूल जाएँ 22 अप्रैल को? 2005 में हुई दुर्घटना के बाद से आज इस पोस्ट के लिखे जाने तक एक पल, एक क्षण ऐसा नहीं गुजरा जबकि दाहिने पंजे में, पैर में दर्द न हुआ हो तब कैसे भूल जाएँ इस दर्द को? अपने काम के दौरान, तमाम सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, अकादमिक गतिविधियों के दौरान बाँए कृत्रिम पैर द्वारा दिए जा रहे कष्ट को सहते हुए कैसे भूल जाएँ कि हमारा एक पैर नहीं है?

 



कई बार लगता है कि बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके बारे में कहना बहुत आसान होता है मगर उस कहे को व्यावहारिक रूप देना बहुत कठिन होता है, लगभग असंभव होता है. ऐसा ही कुछ असंभव सा अब हमारे साथ जुड़ा हुआ है. ऐसा ही आजीवन साथ  रहने वाले दर्द हमारे साथ है. हमारे शरीर का अंग न होने के बाद भी शरीर का अंग बने कृत्रिम पैर के साथ पूरे जीवन भागदौड़ करनी है. किसी समय मैदान पर दस हजार मीटर की दौड़ लगाने वाले एथलीट का एक कदम अब बिना छड़ी के नहीं उठता है. ऐसी तमाम स्थितियों को, दिक्कतों कि साथ लेकर एक-एक पल गुजारते समय कैसे भुलाया जा सकता है इस तारीख को? बस आज इस तारीख को याद करते हुए शाम गुजर गई, रात गुजरने वाली है. दर्द जो हमेशा साथ रहना है, उसके लिए क्या रोना? जो ज़ख्म ज़िन्दगी भर के लिए यारी निभाने आया है उसे कैसे भुलाया जाये? ये भी उन्हीं मित्रों, रिश्तेदारों की तरह हैं जिनको छोड़ा भी नहीं जा सकता और जिनसे पीछा छुड़ाया भी नहीं जा सकता. 


 

31 अगस्त 2021

टोक्यो पैरालम्पिक खेलों के वर्गीकरण की जानकारी

टोक्यो पैरालम्पिक में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लाजवाब रहा है. अभी पैरालम्पिक खेल चल रहे हैं. ये खेल अभी पाँच सितम्बर 2021 तक चलने हैं, तब तक और भी ढेर सारे पदक भारतीय खिलाड़ियों द्वारा जीते जाने हैं. ये विश्वास है क्योंकि हमारे खिलाड़ी अत्यंत ऊर्जा, विश्वास के साथ लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं. 


ऐसे बहुत से खेल प्रेमी जो खेलों में बहुत ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, खिलाड़ियों के जीतने पर प्रसन्न भी होते हैं मगर उनमें से बहुत से लोग पैरालम्पिक में किये गए वर्गीकरण को समझ नहीं पाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पैरालम्पिक के बारे में अथवा पैरा खेलों के बारे में जनसामान्य को बहुत अधिक न तो बताया गया है और न ही उनको भी इस बारे में बहुत ज्यादा रुचि है. लोगों के लिए विभिन्न स्पर्धाओं में किये गए वर्गीकरण, खिलाड़ियों की शारीरिक स्थिति के चलते उनकी स्पर्धा को समझ पाना बहुत जायद क्लिष्ट नहीं है. एक बार गंभीरता से इसे जान लिया जाये तो फिर पैरालम्पिक खेलों की विभिन्न स्पर्धाओं के बारे में सहजता से समझा जा सकता है. 




इस बारे में अपने पूर्व आलेख में कुछ समझाने का प्रयास किया था. इसे यहाँ क्लिक करके (पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी) पढ़ा जा सकता है. 


टोक्यो पैरालम्पिक में किस तरह का वर्गीकरण किया गया है, इसे यहाँ क्लिक करके (Paralympic Games Classification) समझा जा सकता है. 


इस बारे में इस आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध पीडीएफ का भी अध्ययन यहाँ क्लिक करके किया जा सकता है. 


जो भी सामग्री लिंक पर उपलब्ध है, वह टोक्यो पैरालम्पिक 2020 की निम्न वेबसाइट से ली गई है. 

https://olympics.com/tokyo-2020/en/paralympics

29 अगस्त 2021

पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी

टोक्यो ओलम्पिक के बाद इस समय टोक्यो पैरालम्पिक चर्चा में है. ये और बात है कि ओलम्पिक की तरह मीडिया में इनको बहुत ज्यादा स्थान नहीं मिल पा रहा है मगर हमारे देश के खिलाड़ी लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करके पैरालम्पिक खेलों की तरफ जनसामान्य का ध्यान खींच रहे हैं. पैरालम्पिक खेल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली खेल प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता में मुख्य रूप से वे खिलाडी सहभागिता करते हैं जो शारीरिक अथवा मानसिक रूप से दिव्यांग (विकलांग) की श्रेणी में आते हैं.  


यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो जानकारी मिलती है कि पैरालंपिक खेलों को दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से आरम्भ किया गया था. सन 1948 में दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों की स्पाइनल चोट को ठीक करने के लिए न्यूरोलोजिस्ट गुडविंग गुट्टमान ने रिहेबिलेशन कार्यक्रम के लिए खेलों का चयन किया. उस समय इन खेलों को अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स के नाम से पहचान मिली थी. कालांतर में सन 1960 में रोम में पहले पैरालम्पिक खेल हुए. इसमें सैनिकों के साथ-साथ आम नागरिक भी भाग ले सकते थे. इन खेलों में उस समय 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. ब्रिटेन के मार्गेट माघन पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले एथलीट बने. उन्होंने तीरंदाज़ी में स्वर्ण पदक जीता. इस पहले पैरालम्पिक खेलों में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे. समय के साथ पैरालम्पिक खेलों में बदलाव होते गए और सन 1976 में अन्य पैरा खिलाड़ियों को भी इन खेलों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया.




पैरालम्पिक में सहभागिता करने वाले खिलाड़ियों को उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है. उनको अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाने के पीछे उद्देश्य यह होता है कि मुकाबला बराबरी का रहे. जैसे हाथ से विकलांग खिलाड़ियों को एक वर्ग में, पैरों से विकलांग खिलाड़ियों को एक अलग वर्ग में रखा जाता है. इसके अलावा पैरालम्पिक खिलाड़ियों के वर्गीकरण में उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनकी श्रेणी का निर्धारण किया जाता है.


किसी खिलाड़ी को पैरा खिलाड़ी मानने के दस मानदंड हैं-

1. माँसपेशियों की दुर्बलता

2. जोड़ों की गति की निष्क्रियता

3. किसी अंग में कोई कमी

4. टाँगों की लम्बाई में अंतर

5. छोटा क़द

6. हाइपरटोनिया यानी माँसपेशियों में जकड़न

7. शरीर के मूवमेंट पर नियंत्रण की कमी

8. एथेटोसिस यानी हाथ-पैरों की उँगलियों की धीमी गति

9. नज़र में ख़राबी

10. सीखने की अवरुद्ध क्षमता.


श्रेणीकरण के साथ-साथ खेलों का भी वर्गीकरण किया जाता है. फील्ड की प्रतियोगिताएं एफ कोड के साथ जानी जातीं हैं. इसमें शॉटपुट, जेवलिन थ्रो, डिसकस थ्रो आदि शामिल हैं. विकलांगता के हिसाब से इन खेलों में लगभग 31 श्रेणियाँ होती हैं. ट्रैक की प्रतियोगिताओं को टी से परिभाषित किया जाता है. इसमें दौड़ और कूदने जैसी प्रतियोगिताएँ शामिल हैं. इन खेलों में 19 श्रेणियाँ होती हैं. सभी खेल स्पर्धाओं को विकलांगता के अनुसार अलग-अलग नंबरों में बाँटा जाता है. जैसे फील्ड की स्पर्धाओं में एफ़-32, एफ़-33, एफ़-34 आदि नंबर देखने को मिलते हैं. यहाँ इन्हीं नंबरों के अनुसार विकलांगता की स्थिति को पहचाना जाता है. जिस स्पर्धा में जितना कम नंबर होता है, उसकी उतनी ही अधिक विकलांगता होती है.


फील्ड और ट्रैक की प्रतियोगिताओं के अलावा, तीरंदाज़ी, बैडमिंटन, साइकिलिंग, निशानेबाज़ी, ताइक्वांडो, जूडो तथा चार व्हीलचेयर वाले खेल (बास्केटबॉल, रग्बी, टेनिस और तलवारबाजी) भी पैरालम्पिक में खेले जाते हैं. व्हीलचेयर पर खेले जाने वाले खेलों की पहचान डब्ल्यूएच-1 या डब्ल्यूएच-2 के नाम से की जाती है. इन खेलों में भी जो खेल खड़े होकर खेले जाते हैं उनको एस से पहचाना जाता है. इसको भी दो अलग-अलग विकलांगता श्रेणियों में बाँटा गया है. यदि शरीर के ऊपरी हिस्से में विकलांगता होती है तो एस के साथ यू लिखा होगा, जिसका अर्थ है अपर लिंब. इसी तरह यदि एस के आगे एल लिखा है तो इसका अर्थ हुआ कि शरीर के निचले हिस्से (लोअर लिंब) में विकलांगता है.




पैरालम्पिक खेलों में खिलाड़ियों के चयन के लिए इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी (आईपीसी) द्वारा मानक का निर्धारण किया गया है. इसमें भी ये आवश्यक नहीं कि किसी खिलाड़ीद्वारा इस मानक इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के बाद भी उसे चयनित नहीं माना जा सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि आईपीसी द्वारा प्रत्येक देश एक निश्चित कोटा है, इस निर्धारित कोटे से ज्यादा ख़िलाड़ी भाग नहीं ले सकते. ऐसे में यदि निर्धारित कोटे से अधिक ख़िलाड़ी निर्धारित मानक लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं उन खिलाड़ियों के बीच फ़ाइनल सेलेक्शन ट्रायल करवाया जाता है. इसमें चयनित खिलाड़ी ही अंतिम रूप से पैरालम्पिक के लिए चयनित होते हैं. इसके अलावा विश्व रैंकिंग के आधार पर भी खिलाड़ियों का चयन होता है.


वर्तमान में देश की तरफ से अनेक खिलाड़ी टोक्यो में अपना प्रदर्शन करने के लिए गए हैं. उन सभी को शुभकामनाएँ.

28 मार्च 2017

सोच यही है कि तुम अक्षम हो

गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा मन की बात में विकलांगजनों के लिए दिव्यांगजन शब्द प्रयोग में लाने की बात कही गई थी. इसके समर्थन में बहुतायत लोग आये थे साथ ही साथ इसके विरोध में भी कई जगह से आवाजें उठी थी. हमने भी व्यक्तिगत रूप से पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री जी से निवेदन किया था कि अच्छी सोच और सार्थक मानसिकता के परिणामस्वरूप वे ऐसा विचार लाये किन्तु यदि दिव्यांग शब्द बदलने के साथ-साथ वे मानसिकता बदलाव का भी आहवान कर दें तो शायद कुछ और भला हो जाये. बहरहाल वे लगातार अपने कार्यों से नए-नए बदलावों का संकेत दे रहे हैं किन्तु उनके कार्यों से लोगों की मानसिकता में बदलाव आता दिख नहीं रहा है. उनके स्वच्छता अभियान को पूर्वाग्रह से देखते हुए विरोध भी किया गया. इसको स्वीकारते हुए कि सफाई सभी के लिए अत्यावश्यक है, अनिवार्य है लोगों का गंदगी करना लगातार जारी है. बदलाव की बयार तभी अपना असर दिखाती है जबकि उसके साथ मानसिकता में परिवर्तन आये. कुछ ऐसा ही दिव्यांग शब्द को लेकर सामने आया. प्रधानमंत्री जी के आहवान पर मीडिया ने, विभागों ने, सरकारों ने, प्रशासन ने विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. मंत्रालयों में भी दिव्यांगजन का इस्तेमाल किया जाने लगा किन्तु मानसिकता में परिवर्तन तनिक भी न दिखाई दिया.


वैसे समाज में आये दिन शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को अलग-अलग तरह से अलग-अलग अनुभवों से गुजरना पड़ता है. कहीं उनके साथ दयाभाव जैसा बोध कराया जाता है तो कहीं उन पर एहसान किये जाने जैसी मानसिकता दिखाई देती है. इसके साथ-साथ कहीं-कहीं वे दुर्व्यवहार का शिकार भी बनते हैं. शाब्दिक रूप से हिंसा का शिकार होने के साथ-साथ वे शारीरिक हिंसा, मानसिक हिंसा का शिकार भी बनते दिख जाते हैं. इसमें कहीं से वे लोग भी पीछे नहीं हैं जो शिक्षित हैं, रोजगार में हैं, व्यवसाय में हैं. ऐसे लोग भी अपनी शारीरिक अक्षमता के चलते आये दिन भेदभाव का, नकारात्मकता का शिकार बनते हैं. समाज के रोज के ऐसे कई-कई उदाहरणों से इतर अभी हाल में ही केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान का बयान न केवल निंदनीय है बल्कि शर्मनाक भी है. उनका ये कहना कि सौ लंगड़े मिलकर भी एक पहलवान नहीं बन सकते, को वे भले ही कहावत का नाम देकर विकलांगजनों (प्रधानमंत्री के शब्दों में दिव्यांगजनों) के अपमान को कम नहीं करता है. संभव है कि ऐसे बयान के पीछे उनकी मानसिकता दिव्यांगजनों का अपमान करना अथवा तिरस्कार करने की न रही हो किन्तु ये तो स्पष्ट है कि उनकी मानसिकता में दिव्यांगजन नकारात्मक भाव लिए हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो क्या वे ऐसा बयान देते?

देखा जाये तो रामविलास पासवान कोई साधारण अथवा सामान्यजन नहीं हैं. वे विगत कई बार के सांसद रहने के साथ-साथ विगत कई सरकारों में केन्द्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य कर चुके हैं. विगत सरकारों की विकलांगजनों के लिए क्या भूमिका रही हो इससे अब कोई फर्क नहीं पड़ता. अब तो वे वर्तमान केंद्र सरकार में भी मंत्री हैं और सहजता से समझ रहे हैं कि विकलांगों अथवा दिव्यांगों के लिए उनकी सरकार की, उनके प्रधानमंत्री की प्राथमिकतायें क्या हैं. ऐसे में उनके द्वारा ऐसा बयान दिया जाना सिर्फ और सिर्फ उनकी मानसिकता का सूचक है. यदि दिव्यांगों के प्रति उनकी सोच सकारात्मक होती तो वे ऐसा बयान कदापि नहीं देते. उनकी सोच समकक्षों के लिए सही है, उनके प्रति सकारात्मक है तभी उन्होंने गठबंधन पर तंज कसते हुए किसी नेता का नाम नहीं लिया, किसी दल का नाम नहीं लिया. आखिर जब वे सौ लँगड़े कहकर अनजाने ही दिव्यांगजनों का मजाक बना रहे थे, तब वे उसी जगह सौ लालू, सौ राहुल, सौ अखिलेश, सौ नीतीश जैसा भी कुछ कह सकते थे. मगर ऐसा उनके द्वारा नहीं कहा गया क्योंकि उनकी सोच में वर्षों से एक ही भाव गहरे तक भरा बैठा है कि लँगड़े लोग कुछ नहीं कर सकते.


विकलांग की जगह दिव्यांग करने से बेहतर होता कि इसी मानसिकता को बदला जाता. जिसने समाज के बहुतायत वर्गों में गहराई से इस बात को बैठा दिया है कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है. समाज से ऐसे उदाहरणों को सामने लाने का काम सरकार को, समाजसेवियों को, शिक्षण संस्थानों को, प्रदेश सरकारों को, जिला प्रशासन को, मीडिया को करना होगा, जिन्होंने अपनी शारीरिक कठिनाई पर विजय प्राप्त करते हुए नए-नए आयाम स्थापित किये हैं. आवश्यक नहीं कि सभी लोग मंत्री बनें, गोल्ड मैडल लायें, पर्वतों की ऊँचाई नापें. एक ऐसा व्यक्ति जो कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दूसरे आम व्यक्तियों से शारीरिक रूप से भिन्न है यदि वो अपनी इसी कठिनाई पर विजय पाते हुए, अपनी मानसिकता को सशक्त बनाकर, आत्मविश्वास को प्रबल बनाकर दो-चार कदम भी आगे बढ़ता है तो वही समाज के लिए अनुकरणीय होना चाहिए. काश! केन्द्रीय मंत्री महोदय पासवान के बयान से सबक लेते हुए समाज के समूचे अंग जागने का काम करें, जिससे आने वाले समय में दिव्यांगजनों के लिए दिमाग में बसी नकारात्मक भावना दूर हो सके. 

29 दिसंबर 2015

शब्द नहीं मानसिकता बदली जाये


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात कि ‘शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के लिए विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का उपयोग किया जाये’ उनकी व्यापक सोच का परिचायक है. उनकी इस सोच को परिलक्षित करती है कि वे समाज में विकलांगों के साथ होते आ रहे भेदभाव से भली-भांति परिचित हैं. इसी भेदभाव को दूर करने की दृष्टि से उन्होंने शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के लिए ‘दिव्यांग’ शब्द का प्रयोग करने की बात कही. यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि समाज के भीतर जिस तरह की मानसिकता विकलांगजनों को लेकर बनी हुई है अथवा उनके साथ जिस तरह का व्यवहार देखने को मिलता है क्या वो समस्या महज एक शब्द को बदल देने भर से दूर हो जाएगी? इससे पहले भी सरकारी स्तर पर शारीरिक अक्षम लोगों के लिए शब्दों में परिवर्तन किये जाते रहे हैं, कभी निःशक्तजन के रूप में तो कभी विकलांगजन के रूप में मगर सामाजिक रूप से, सरकारी रूप से विकलांगों के प्रति सोच में परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. भेदभाव की एक अलग सी स्थिति उनके साथ हमेशा रही है. कहीं उनके साथ दया का भाव होता है तो कहीं उनके साथ तिरस्कार जैसी स्थिति देखने को मिलती है. इन स्थितियों में किंचित मात्र परिवर्तन शारीरिक अक्षम लोगों की खुद की सामाजिक, आर्थिक, पद-प्रतिष्ठा वाली स्थिति के चलते अवश्य हो जाता है किन्तु समग्र रूप में वे समाज के लिए विकलांग ही होते हैं, दया-दृष्टि के, हेय-दृष्टि के पात्र होते हैं.
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प्रधानमंत्री का ‘दिव्यांग’ के साथ उनको दिव्यता का भाव प्रदान किये जाने का निहितार्थ भले ही विकलांगजनों के साथ हो रहे भेदभाव को दूर करना हो, भले ही उनको महज कृपा-पात्र न समझने का भाव रहा हो किन्तु सत्यता यही है कि मात्र शब्द परिवर्तन से कुछ नहीं होने वाला है. शाब्दिक रूप से दिव्यता का बोध कराने का ये कोई पहला उदाहरण नहीं है. इससे पहले भी हमारे समाज में अनादिकाल से स्त्रियों के लिए ‘देवी’ शब्द चलन में है, इसके बाद भी बहुतायत में महिलाओं की स्थिति को दैवीय रूप में स्वीकार ही नहीं किया गया है. बहुसंख्यक महिलाएँ आज भी तिरस्कृत सी हैं, शारीरिक अत्याचार सह रही हैं, शोषण का शिकार हो रही हैं. शाब्दिक रूप से दिव्य-भाव का बोध कराने के लिए, भेदभाव, तिरस्कार से बचाने के लिए शूद्रों के लिए ‘हरिजन’ शब्द चलन में लाया गया. इसके बाद भी उनके साथ भेदभाव में कमी नहीं आई, उनकी सामाजिक स्थिति में जो भी परिवर्तन आया वो ‘हरिजन’ शब्द के कारण नहीं वरन संवैधानिक रूप से मिले आरक्षण के कारण आया. ऐसे में विकलांगजनों को शाब्दिक दिव्यता बोध करवाने के बजाय आवश्यक है कि सामाजिक रूप से लोगों के भावों में परिवर्तन किया जाये. लोगों की मानसिकता में परिवर्तन किया जाये ताकि वे किसी भी विकलांगजन को दया की दृष्टि से, तिरस्कार की नजर से, कृपा करने के भाव से न देखें.
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जहाँ तक सवाल दिव्य-भाव के बनाये जाने से लोगों की मानसिकता में परिवर्तन आने का है तो ये नितांत भ्रामक संकल्पना है. महज शाब्दिक रूप से दिव्य भाव जागृत हो रहे होते तो समाज में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार न होता. ये अपने आपमें सत्य है कि जब कोई भी व्यक्ति अपने कार्यों से, अपनी सेवाओं से, अपने विचारों से अनूठा कार्य करता है तो उसकी उपलब्धियाँ स्वतः ही उसको देवत्व का भाव प्रदान कर देती हैं, स्वयं ही उसको विशिष्ट बना देती हैं. ऐसा न केवल शारीरिक रूप से सामान्य व्यक्तियों के साथ वरन शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के साथ भी हुआ है, जबकि उनकी उपलब्धियों के आधार पर समाज ने उनको देवत्व का बोध कराया है. वैसे व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना है कि समाज में अकारण ही किसी व्यक्ति में, वर्ग में विशिष्ट का, देवत्व का भाव स्थापित कर देना भी समस्या को जन्म देता है. बेहतर हो कि व्यक्ति को व्यक्ति के भाव से देखा-समझा जाये. विकलांग को महज इस कारण से कृपा का पात्र न माना जाये कि वो अपने किसी शारीरिक अंग के कारण सामान्य रूप से परिचालन नहीं कर पा रहा है. किसी भी शारीरिक अक्षम व्यक्ति को महज इस कारण तिरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए कि वो विकलांग होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से अक्षम है. किसी भी विकलांग व्यक्ति को मिल रही सुविधाओं पर ये भान नहीं करवाया जाना चाहिए कि ऐसा करके समाज अथवा सरकार उसके ऊपर कोई एहसान कर रही है. ये हम सभी समझते हैं कि शारीरिक रूप से किसी भी अंग से अक्षम व्यक्ति को सामान्य जीवन व्यतीत करने में कुछ न कुछ कष्ट अवश्य ही होता होगा ऐसे में किसी भी तरह की सहायता उसके ऊपर एहसान नहीं वरन समाज की मुख्यधारा में उसको शामिल किये जाने का प्रयास मात्र होता है. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘दिव्यांग’ शब्द की दिव्यता, उसके भावार्थ को समझते हुए विकलांगजनों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने हेतु, उनके साथ भेदभाव ख़तम करने हेतु निर्विकार भाव से कार्य करें और स्वयं में दिव्यता बोध जागृत करें, स्वयं को दिव्य महसूस करें.

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03 दिसंबर 2014

विकलांगों को दया नहीं सहयोग दें



विभिन्न प्रकार के दिवसों के मनाये जाने की परम्परा का निर्वहन बखूबी होने लगा है. आज ३ दिसम्बर को विश्व विकलांग दिवस का आयोजन होना है, जबकि अभी दो दिन पूर्व ही एड्स दिवस की खुमारी उतर भी नहीं सकी है. प्रशासन अपनी औपचारिकताओं भरी कार्य-प्रणाली के चलते किसी न किसी गैर-सरकारी, समाजसेवी संस्था का सहारा लेता है और ऐसी संस्थाएं भी सरकारी फंड की चंद बूंदों के सहारे अपने कार्यक्रमों का आंकड़ा फिट कर लिया करती हैं. दोनों का काम बन जाता है, दोनों के उद्देश्य पूरे हो जाते हैं, दिवस आसानी से पूरी भव्यता के साथ निपट जाते हैं और हालात ज्यों के त्यों बने रह जाते हैं. विगत कई वर्षों से एड्स दिवस मनाये जाने के बाद न तो इसमें अपेक्षित सुधार देखने को मिला और न ही बाकी दूसरे दिवसों के आयोजनों से सुधार होता दिखा है. संभव है कि ऐसा ही कुछ विश्व विकलांग दिवस पर भी होगा.

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समाज में किसी न किसी कारण से विकलांगता का दंश झेल रहे नागरिक भी निवास कर रहे हैं. इनमें कुछ की विकलांगता जन्मजात है तो कुछ की कतिपय दुर्घटनाओं के कारण. सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा विकलांगों के लिए लगातार योजनाओं का सञ्चालन किया जा रहा है किन्तु उनको सुचारू रूप से क्रियान्वित नहीं किया जा रहा है. देखने में लगातार आ रहा है कि नियम-कानून-योजनाओं के बनने के बाद उसके लागू होने की पूरी प्रक्रिया में बाबू, क्लर्क, दलाल नामक प्रजाति बुरी तरह से हावी हो जाती है. विकलांगों के प्रति ये दया का भाव तो दिखाते हैं किन्तु उसमें एक तरह का तिरस्कार का, उपेक्षा का भाव होता है. विकलांगों से सम्बंधित योजनाओं के कार्यों की पूर्ति में एकबारगी भले ही उनसे सुविधा शुल्क के नाम पर धन की उगाही आमतौर पर की जाने वाली उगाही की तरह न की जा रही हो किन्तु संवेदना का भाव पूरी से तिरोहित होता है. इसके पीछे के कारण को देखा जाये तो स्पष्ट तौर पर समझ में आता है कि समाज में विकलांगों के प्रति दया का भाव तो है पर उनके प्रति जागरूकता का, संवेदना का भाव लगभग शून्य की स्थिति में है.
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बसों, ट्रेनों की यात्रा में किराये से छूट दे देना मात्र ही उनकी सहायता नहीं है वरन यात्रा के दौरान होने वाली समस्याओं को दूर करना भी प्राथमिकता में होना चाहिए. बहुतायत में देखने में आया है कि ट्रेन आरक्षण में शारीरिक विकलांग व्यक्तियों को सबसे ऊपर की बर्थ पर आरक्षण दे दिया जाता है बिना ये जाने-समझे कि वो उस बर्थ पर चढ़ेगा कैसे? बसों के पायदानों की ऊँचाई, उनका संकरा होना आदि भी शारीरिक विकलांगों के लिए कष्ट का कारण बनता है. विभिन्न शैक्षिक सस्थानों, सरकारी संस्थानों, कार्यालयों में रैम्प का न बना होना भी समाज की विकलांगों के प्रति असंवेदनशीलता को दर्शाता है. यहाँ एक बात को याद रखना होगा कि यदि मानसिक विकलांगता है तो अलग बात अन्यथा की स्थिति में किसी भी विकलांग व्यक्ति को कम करके आँकना सामाजिक विकलांगता को ही दर्शाता है. विकलांग व्यक्ति को न तो दया चाहिए, न वो किसी दया का पात्र है. हाँ, किसी शारीरिक अक्षमता के चलते वह समाज की मुख्यधारा के साथ अपने आपको नहीं चला पा रहा है तो उसको हाथ बढ़ाकर साथ ले चलने की आवश्यकता है. समाज का एक-एक व्यक्ति अपनी मानसिकता में सुधार कर ले तो विकलांगता जैसी समस्या समाज से स्वतः ही दूर हो जाएगी. 
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