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15 मई 2026

प्रतियोगी परीक्षाएँ और सुरक्षा जाँच का झमेला

प्रतियोगी परीक्षाएँ और पहनावे को लेकर बहुत सी पोस्ट सामने आती हैं. प्रशासन के द्वारा परीक्षा शुचिता के नाम पर अपनाये जाने वाले बहुत से कदमों का विरोध हम भी करते हैं. परीक्षा केन्द्र पर कलावा कटवाना, विवाहित महिलाओं का मंगलसूत्र उतरवाना, चेन लगी पैंटों में से चेन काटना आदि-आदि ऐसे कृत्य हैं जिनका लगातार विरोध होता है. इसके बाद भी एक बात को सहज रूप में स्वीकारते भी हैं कि परीक्षा के समय के पहनावे, साथ में लायी जाने वाली सामग्री, प्रतियोगी द्वारा क्या-क्या करना है, क्या-क्या नहीं करना है आदि-आदि के बारे में दिशा-निर्देश प्रवेश-पत्र पर स्पष्ट रूप से दिए जाते हैं. शासन-प्रशासन की तरफ से जारी किये गए प्रवेश-पत्र पर स्पष्ट रूप से दिए गए निर्देशों को या तो पढ़ा नहीं जाता है अथवा पढ़कर भी अनदेखा कर दिया जाता है. स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए होने के बाद भी यदि प्रतियोगी विद्यार्थी गलती करता है तो भले ही ऐसा अनजाने में हुआ हो मगर इसके लिए स्वयं विद्यार्थी को और अभिभावक को ध्यान रखना चाहिए. उनको इस बात का स्मरण होना चाहिए कि वे किसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए जा रहे हैं, जिसके लिए साल भर मेहनत की गई है. ऐसी स्थिति में भी यदि लापरवाही विद्यार्थी की तरफ से हो रही है तो इसका साफ़ सा अर्थ है कि विद्यार्थी परीक्षा के लिए न तो ईमानदार है और न ही सजग.  

 

ये मान लिया जाये कि सारे दिशा-निर्देश दिए होने के बाद भी यदि विद्यार्थी उन पर ध्यान नहीं दे रहा है तो यहाँ एक बात प्रशासन को भी ध्यान रखनी चाहिए कि तमाम सारी कवायद के बाद भी पेपर लीक होने की घटनाएँ हो जाती हैं. ये घटनाएँ उस समय तो हो नहीं रही होती हैं जबकि विद्यार्थी परीक्षा केन्द्र के मुख्य द्वार पर खड़ा होता है. ऐसा भी नहीं है की वह कलावा में, मंगलसूत्र में, बड़े बालों में किसी तरह की अदृश्य तकनीक को छिपाकर ले जा रहा होगा. इसलिए ऐसे में उनके द्वारा सुरक्षा के नाम पर, जाँच के नाम पर अनावश्यक कदमों को उठाकर परीक्षार्थियों को परेशान नहीं करना चाहिए. उनको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पेपर लीक करवाने वाला न तो कलावा पहने होगा, न चेन वाली पेंट पहने होगा, न मंगलसूत्र पहने होगा, न फुल बाँह की शर्ट पहने होगा. जिसे पेपर लीक करने का खेल करना होता है, परीक्षार्थी को पास करवाने का ठेका लिया होता है वे शासन-प्रशासन के इंतजामों से कहीं आगे का इंतजाम किये होते हैं. ऐसे अपराधियों की धरपकड़ होती भी है, होनी ही चाहिए ताकि उन विद्यार्थियों के साथ गलत न हो सके जो मेहनत के साथ तैयारी करके अपना भविष्य बनाने के लिए परीक्षा में बैठते हैं. बावजूद इसके शासन-प्रशासन द्वारा अनावश्यक रूप से उठाये जाने वाले कदमों पर रोक लगनी चाहिए, उनको नियंत्रित होना चाहिए.

 

क्या चाहता है शासन-प्रशासन कि कल को परीक्षार्थी सिर्फ चड्डी-बनियान में परीक्षा-केन्द्र पर उपस्थित हो?


12 अप्रैल 2026

'विद्यार्थी' शब्द को 'छात्र' न बनायें

सामान्य बोलचाल में 'विद्यार्थी' शब्द के लिए 'छात्र' शब्द निःसंकोच, बहुतायत में प्रयोग होते दिखाई देता है. कभी विचार नहीं किया था कि ऐसी गलती शासन स्तर से देखने को भी मिलेगी. निदेशालय से जारी इस पत्र में एकाधिक जगह पर 'छात्र' शब्द का उपयोग किया गया है. यदि 'विद्यार्थी' शब्द लिखने में समस्या या कोई तकनीकी बाध्यता थी तो छात्र/छात्रा लिखा जा सकता था. यद्यपि निदेशालय की इस त्रुटि के लिए उनको पत्र लिख दिया गया है तथापि लगता नहीं है कि इसमें सुधार होगा. स्व-घोषित विद्वतजनों को समझाना, विशेष रूप से उनकी गलती पर, अत्यंत दुष्कर कार्य होता है.




13 नवंबर 2025

निष्क्रिय कार्यव्यवस्था

निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के प्रशासनिक ढाँचे की, अधिकारियों की, कर्मचारियों की निष्क्रिय कार्यप्रणाली निराशा पैदा करने लगी है. पिछले दो-तीन साल में व्यक्तिगत समस्याओं के साथ-साथ अन्य लोगों की परेशानियों के सम्बन्ध में की गई अनेक शिकायतों में नकारात्मकता ही हाथ लगी. इस तरह की स्थिति से भ्रष्ट, लापरवाह, पक्षपाती कार्य-संस्कृति को, कार्य-प्रणाली को, आचरण को, व्यक्तियों को बेलगाम होने का अवसर मिलता है. ऐसे में तमाम सारी विसंगतियों की, अव्यवस्थाओं की, भ्रष्टाचार की, निरंकुशता की शिकायत करना समय, श्रम, धन, क्षमता आदि का अपव्यय लगता है.

 

बावजूद इसके शांत होकर तो बैठा नहीं जा सकता है, विसंगतियों को सहन भी नहीं किया जा सकता है, भ्रष्ट कार्य-संस्कृति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. सवाल ख़ुद से ही पूछते हैं कि क्या कभी ये दशा सुधरेगी? क्या कभी पारदर्शी व्यवस्था बनेगी? क्या समूचे तंत्र में दायित्व बोध जागेगा? क्या जनमानस की समस्याओं के प्रति संवेदनात्मक वातावरण बनेगा?

 

ऐसे अनेक प्रश्नों के साथ संघर्ष चलता रहेगा! चलता ही रहेगा!!





14 अप्रैल 2024

रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के साथ अन्याय



रानी लक्ष्मीबाई की यह प्रतिमा उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में उरई नगर में लगी हुई है. शहर के मध्य में स्थित टाउनहॉल के सामने स्थित इस प्रतिमा के साथ इस तरह का अन्याय, अशोभनीय हरकत लगभग प्रत्येक पर्व, त्यौहार, जयंती आदि पर की जाती है. सजावट के नाम पर कभी घोड़े का सहारा लिया जाता है तो कभी रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा सहारा बनती है. 

कई-कई बार इस बारे में सम्बंधित व्यक्तियों को जानकारी भी दी गई, सुधार भी करवाया गया मगर ये हर बार की कहानी बनी हुई है. ये नया हाल इसी 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती के अवसर पर किया गया है. प्रतिमा सजाने के चक्कर में बिजली की झालर को घोड़े के कान से बाँध दिया गया है. 

अब इसके साथ-साथ आप लोग रानी लक्ष्मीबाई की तलवार को न देखने लगिएगा. अंग्रेजों द्वारा झुकाई न जा सकी तलवार को प्रशासन द्वारा बराबर झुकाए रखा गया है, तोड़े रखा गया है. इस बारे में कई बार लिखित रूप से शिकायत की जा चुकी है मगर प्रशासन के कानों में जूँ नहीं रेंगती है. 

स्वतंत्र देश में हम लोग अभिशप्त हैं शायद अपने महानुभावों की ये दुर्दशा, अपमान देखने को. 



 

28 जुलाई 2023

पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने की कहानी

आये दिन दशरथ मांझी की पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने की कहानी सामने आती है। काम तारीफ करने लायक हो सकता है पर कुछ प्रश्न उठते हैं इसके पीछे से मन में और हर बार अनुत्तरित से रह जाते हैं। आप लोग भी विचार करिए, मन कर जाए तो उत्तर खोजने में मदद करिए।

==> पहाड़ किसी की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होता। क्या इस तरह किसी भी पहाड़ को खोद कर रास्ता बना देना कानूनी है?

==> आज पहाड़ को तोड़कर रास्ता बना, कल को पार्क, मैदान बनाने लग जाएँ लोग तो क्या वह कानूनन सही होगा?

==> दशरथ मांझी ने पहाड़ तोड़ा तो उसकी टूटन, पत्थर भी निकला होगा, वो कहाँ गया? किसने उसका उपयोग किया?

==> यदि बिना लागत के उस पत्धर को उपयोग में लिया गया तो यह राजस्व की हानि नहीं? क्या एक तरह से प्राकृतिक सम्पदा की चोरी नहीं?

==> पहाड़ तोड़कर बनाई सड़क को प्रशासन ने या किसी अन्य सरकारी अथॉरिटी ने पक्का भी किया होगा, डामरीकरण किया होगा। उसका खर्चा किस विभाग ने उठाया होगा?

==> क्या बिना नक्शे के बनी सड़क को प्रशासनिक स्तर पर बनवाया जा सकता है?


सोचिएगा। हो सकता हम गलत हों, जानकारी अधूरी हो तो आप सहायता करिएगा।

 

 

07 जुलाई 2023

डिवाइडर का खेल

विगत कई वर्षों से उरई नगर पालिका की राजनीति में उतार-चढ़ाव जैसी स्थिति बनी रही. न तो राजनैतिक दल समझ सके कि ये हो क्या रहा है और न ही मतदाताओं की समझ में आया कि वे करते क्या हैं? मतदाताओं ने मूड बनाया तो किसी एक दल को जिता दिया और अगली ही बार दूसरे दल के हाथ में अध्यक्ष पद को सौंप दिया. नामांकन, मतदान से लेकर मतगणना तक के शोर-शराबे के बाद मतदाता एक आवाज़ नहीं उठाते कि क्या सही हो रहा, क्या गलत हो रहा.




वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष के कार्यकाल को शुरू हुए अभी एक-दो महीने ही बीते हैं कि उठापटक शुरू हो गई है. पिछले अध्यक्ष द्वारा शहर की बहुत सी सड़कों पर डिवाइडर का निर्माण करवाया गया था. इन सड़कों में विशेष रूप से कालपी रोड था, जहाँ पहले तो अपनी मनमर्जी से सड़क पर गड्ढे खुदवा कर डिवाइडर बनवाने का विचार था. बाद में ऊपर से हथौड़ा चला तो अध्यक्ष जी अपना हथौड़ा भूल गए. बावजूद इसके न्यायालय को छोड़कर शेष सड़क पर डिवाइडर का निर्माण करवा दिया गया. आज देखने को मिला कि वे सारे के सारे डिवाइडर उखड़े पड़े हुए हैं. सड़क के किनारे टूटे-उखाड़े हुए डिवाइडर का पड़ा होना अपने आपमें कहानी है.


इस समय शहर में सुन्दरीकरण के नाम पर तोड़-फोड़ मची हुई है. कहीं प्रशासन द्वारा पिछले बजट को ठिकाने लगाया जा रहा है, कहीं वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष द्वारा नए बजट की जुगाड़ की जा रही है. इस पूरे प्रकरण में, पूरी प्रक्रिया में कोई नहीं पूछ रहा कि आखिर बने-बनाए उचित निर्माण को क्यों तोड़ा जा रहा है? यदि इन्हीं डिवाइडर की बात करें तो कहीं से कोई सवाल नहीं उछला कि ये क्यों तोड़े जा रहे? यदि पिछले अध्यक्ष द्वारा बनवाए गए डिवाइडर गलत थे तो तत्कालीन जिलाधिकारी अथवा उच्चाधिकारियों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? इसका अर्थ यही लगाया जाये कि उनका निर्माण सही था. यदि निर्माण सही था तो अब तोड़े जाने का किसी उच्चाधिकारी द्वारा विरोध क्यों नहीं किया गया? क्या माना जाये कि बजट को ठिकाने लगाने में ऊपर से नीचे तक सब मिले हुए हैं?




वैसे देखा जाये तो उरई में डिवाइडर का खेल कोई नया नहीं है. सबसे पहले लोहे के डिवाइडर लाये गए थे, जो अस्थायी थे और उनको उपयोगिता के अनुसार कहीं भी लगाया जा सकता था. सैकड़ों की संख्या में बने वे डिवाइडर कब कबाड़ में बदल गए पता ही नहीं चला. उनकी जगह पत्थर के डिवाइडर बनवाए गए, जो छोटे-छोटे हिस्सों में थे. वे भी लोहे वालों की तरह की टूट-फूट का शिकार होते हुए कबाड़ का हिस्सा बनते रहे. अभी कुछ पत्थर के डिवाइडर कोंच रोड पर अंतिम साँसें भरते देखे जा सकते हैं. लोहे के बने डिवाइडर में से कुछ अपनी अंतिम साँसें गिनते हुए कभी मेडिकल पर, कभी किसी चौराहे पर अपने अस्तित्व को दिखाते मिल जाते हैं.




बहरहाल, नगर पालिका अध्यक्ष हों या फिर प्रशासनिक उच्चाधिकारी, सभी अपने आपमें प्रशासन हैं. इसलिए जो हो रहा वो सही. हम जैसे लोग तो वैसे भी अडंगा लगाने वाले, उँगली करने वाले कहे जाते हैं. आगे भी कहे जाते रहेंगे मगर खामोश नहीं बैठेंगे.

 






 

08 जून 2022

सड़क दुर्घटनाएँ और नागरिक कर्तव्य

आजकल सड़क दुर्घटनाओं के समाचार सुनाई देना आम बात हो गई है. इन दुर्घटनाओं में मारे जाने वालों में अधिकतम संख्या बच्चों की दिख रही है. ये चिंताजनक है मगर इसके बाद भी ऐसा लगता है जैसे समाज के बहुतायत लोग इस तरफ से मुँह मोड़े बैठे हैं. यदि आसपास के माहौल पर गौर करें तो बच्चों, किशोरों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के मूल में कारण तेज रफ़्तार वाहन का चलाया जाना है. बाइक के खुलेआम होते स्टंट, चार पहिया वाहन का अनियंत्रित रफ़्तार से दौड़ाया जाना, सुरक्षा मानकों का न मानना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण सड़क दुर्घटनाएँ आम हो चली हैं. ऐसी घटनाओं पर समाज क्षणिक प्रतिक्रिया देते हुए प्रशासन को दोषी बना देता है. 


किसी भी तरह की दुर्घटना पर शासन-प्रशासन को जिम्मेवार बताकर अपने आपको दोषमुक्त कर लेने की संकल्पना आज सहज रूप में दिखाई देने लगी है. क्या वाकई एक सामान्य नागरिक का दायित्व, उसका कर्तव्य इतना ही है? क्या वाकई समूची जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ प्रशासन की है? हम नागरिकों की, माता-पिता की, घर-परिवार की कोई जिम्मेवारी नहीं है? क्या शैक्षणिक संस्थानों का एकमात्र उद्देश्य पाठ्यक्रम को समाप्त करवाना भर रह गया है? क्या शिक्षकों का, शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व नहीं है कि वे अपने यहाँ पढ़ने वाले बच्चों को सजगता, सतर्कता, सुरक्षा के बारे में जागरूक करें?  क्या पारिवारिक स्तर पर बच्चों को संयमित रहने, अनुशासित रहने के बारे में नहीं बताया जा सकता है?




इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि उसके शहर में, उसके कस्बे में स्कूल यूनिफार्म पहने किशोर बाइक स्टंट करते किसी न किसी सड़क पर दिख जाते हैं. तेज गति से फर्राटा भरती बाइक, बिना हेलमेट के चलाई जाती बाइक, तीन-तीन लोगों का बाइक पर जमे होना किसी के लिए आपत्तिकारक नहीं रह गया है. यदि इस तरह की हरकतों को रोकने का काम किया जा रहा है तो सिर्फ प्रशासन द्वारा, आम नागरिक ऐसी टोकाटाकी से खुद को दूर ही रखे हैं. इसका कारण इन उद्दंड युवाओं, किशोरों द्वारा गाली-गलौज करना, हाथापाई करना है.


नियमानुसार स्कूल में पढ़ रहे बच्चों का ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बन सकता है. ऐसे में विडम्बना यह है कि ऐसे बच्चों को न तो घर-परिवार में रोका जाता है और न ही सड़क पर यातायात पुलिस के द्वारा उनको प्रतिबंधित किया जाता है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि स्कूल के बच्चे को बाइक किसी घर से ही मिली होगी. चाहे वो उसका अपना घर रहा हो अथवा उसके किसी दोस्त का. क्या उनके माता-पिता का दायित्व नहीं बनता है वे बच्चों को बाइक चलाने से रोकें. यहाँ दुर्घटना होने की स्थिति में प्रशासनिक लापरवाही से अधिक पारिवारिक लापरवाही का मामला सामने आता है. ऐसी कई-कई दुर्घटनाएँ नदियों, बाँधों, रेलवे ट्रेक, सड़क, आदि पर आये दिन दिखाई देती हैं.


प्रथम दृष्टया ऐसे मामलों में प्रशासन को दोषी ठहराया जा सकता है. किसी भी नागरिक की सुरक्षा का दायित्व प्रशासन का है. महज इतने भर से आम नागरिक अथवा परिवार भी अपने दायित्व से मुँह नहीं मोड़ सकता है. बच्चों को घर में, स्कूल में जागरूक किया जाना चाहिए. न केवल अपनी सुरक्षा वरन अन्य दूसरे नागरिकों की सुरक्षा के बारे में बताया जाना चाहिए. हमें समझना होगा कि प्रशासनिक तंत्र के पास नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक-विकास के, समाज-विकास के अनेकानेक कार्य होते हैं. एक सामान्य अवधारणा में नागरिकों की संख्या की तुलना में सरकारी मशीनरी, प्रशासनिक तंत्र बहुत-बहुत छोटा और अत्यंत सीमित है. उसकी पहुँच प्रत्येक क्षेत्र में बना पाना न तो व्यावहारिक है और न ही सरल है. ऐसे में आम नागरिक की भी जिम्मेवारी बनती है कि वो समाज में प्रशासनिक भूमिका निर्वहन के लिए खुद को तैयार करे. जीवन कितना अनमोल है इसकी अहमियत बच्चों को, नौजवानों को बताये जाने की आवश्यकता है.


ध्यान रखना चाहिए कि जिन बच्चों को देश की, समाज की आधारशिला रखनी है, उसका भविष्य बनना है उनका यूँ चले जाना किसी के हित में नहीं है. किसी भी बच्चे का, नौजवान का चले जाना जितना हानिकारक और दुखद एक परिवार के लिए है, उतना ही किसी समाज और देश के लिए भी है. यदि समाज का एक-एक नागरिक, माता-पिता, शिक्षक स्वयं को प्रशासन का अंग मानकर बच्चों को सचेत करने का कार्य करें, बच्चों को अनुशासित करने का दायित्व निभाएं, बच्चों को जीवन की महत्ता के बारे में समझाएँ तो आये दिन बच्चों की लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है. बच्चों को असमय मौत के आगोश में जाने से रोका जा सकता है. परिवार, समाज, देश की अमूल्य क्षति को रोका जा सकता है.  


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17 फ़रवरी 2022

जालौन प्रशासन की चुनावी कसरत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर चारों तरफ सरगर्मी दिखाई दे रही है. प्रशासन अपने स्तर पर सक्रिय है, राजनैतिक दल अपनी तरह से सक्रिय हैं, मीडिया अपनी तरह से सक्रिय है. मीडिया जगह-जगह पहुँच कर मतदाताओं के विचार जान रहा है. जनता में किस दल को लेकर, किस प्रत्याशी को लेकर क्या मंथन हो रहा है इस पर लगातार अपने कार्यक्रमों का संचालन-प्रसारण कर रहा है. राजनैतिक दल अपने-अपने स्तर पर मतदाताओं को लुभाने में लगे हुए हैं. सच्चे-झूठे वादों को फेंका-लपेटा जा रहा है. अपने-अपने कामों की गलत-सही सूची दिखाई जा रही है. विभिन्न दलों के कार्यकर्ता अपने-अपने हिसाब से पूरा जोर लगाये पड़े हैं. इनके साथ-साथ प्रशासन अपने स्तर पर सक्रिय है. उसके सामने निष्पक्ष, पारदर्शी, ईमानदार, हिंसामुक्त चुनाव को सम्पन्न करवाने की चुनौती है. इस चुनौती के साथ-साथ अधिक से अधिक मतदान के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए भी वह सक्रिय बना हुआ है.


प्रदेश के अन्य जनपदों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है मगर जनपद जालौन में जिला प्रशासन द्वारा अधिक से अधिक मतदान के लिए कुछ ज्यादा ही मेहनत की जा रही है. इस मेहनत में उसके द्वारा शिक्षा विभाग को भी दौड़ा दिया गया है. जनपद स्तर पर मतदाताओं को प्रोत्साहित करने या कहें कि मतदान करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. इसके लिए महाविद्यालयों में बुलउआ (बुलावा) टोली का निर्माण करने का आदेश भी महाविद्यालयों में प्रेषित किया गया. इस टोली के द्वारा मतदान दिवस के पूर्व मोहल्ले-मोहल्ले जाकर लोगों को पीले चावल देकर मतदान के लिए आमंत्रित करना है. मतदान वाले दिन भी इस टोली के सदस्यों द्वारा मतदाताओं को आमंत्रित करना है.


प्रशासन द्वारा एक और काम करवाने की कवायद की गई, जो संभवतः पूरे प्रदेश में अकेले जनपद जालौन में हुआ होगा. इसकी पहल भी संभवतः शिक्षा विभाग द्वारा की गई है, ऐसा सम्बंधित आदेश और गतिविधि को देखकर लगता है. इस आयोजन में विद्यार्थियों द्वारा अपने बांयी हथेली पर मेंहदी लगानी है. इसमें उसे किसी तरह की कोई डिजायन नहीं बनानी है बल्कि उसे अपनी हथेली पर लिखवाना है ‘जालौन वोट करेगा अबकी बार, 20 फरवरी दिन रविवार.’ प्रत्येक महाविद्यालय से कम से कम पचास विद्यार्थियों को ऐसा करना है.


हमारे महाविद्यालय में भी इस मेंहदी कार्यक्रम का आयोजन किया गया. बहुत सारे विद्यार्थियों द्वारा अपनी हथेली पर मेंहदी द्वारा उक्त स्लोगन को लिखा गया. विद्यार्थियों में छात्र भी शामिल रहे. महाविद्यालय में ऐसे कार्यक्रमों में प्राध्यापकों की भी सहभागिता रहती है, सो इस आयोजन में यहाँ के प्राध्यापकों ने भी जोर-शोर से सहभागिता की. वैसे जोर-शोर से सहभागिता तो जिला प्रशासन की भी रही. इसमें जिलाधिकारी और जिला विद्यालय निरीक्षक भी अपनी हथेलियों पर मेंहदी लगवाते देखे गए.

जिलाधिकारी जालौन 

जिला विद्यालय निरीक्षक जालौन 

गांधी महाविद्यालय, उरई प्राध्यापकजन 

गांधी महाविद्यालय, उरई के विद्यार्थी 

हमने भी लगवा ली मेंहदी 

हिन्दी विभाग प्राध्यापक 

जिला विद्यालय निरीक्षक जालौन सहित अन्य प्रतिष्ठित जन


04 सितंबर 2021

घर की मुर्गी को मुर्गी ही समझा गया


 

कल शिक्षक दिवस है. इस अवसर पर सरकारी, गैर-सरकारी आयोजन होते हैं, शिक्षकों को सम्मानित करने के. इस वर्ष स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. ऐसे में जानकारी हुई थी कि उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में 75 शिक्षकों का (महाविद्यालय स्तर पर) सम्मान किया जाना है. 


इस बारे में रात को आधिकारिक सूचना भी प्राप्त हो गई. अपने महाविद्यालय से सम्मानित होते कई शिक्षकों के बीच हमारा भी नाम चमक रहा है. अच्छा लगा अपने लोगों के बीच सम्मानित होने में. यद्यपि सम्मान समारोह कल होना है मगर ख़ुशी अभी से है. ख़ुशी इसलिए भी हो रही है कि भले ही ये शासन-प्रशासन का कार्यक्रम हो मगर 'घर की मुर्गी दाल बराबर' वाली बात को थोड़ा किनारे कर दिया गया है. सरकारी नीति के तहत ही सही, सभी जनपदों में ही सही 'घर की मुर्गी को मुर्गी ही' समझा गया है.


सभी को बधाई, शुभकामना. सभी शिक्षकों को, गुरुजनों को शिक्षक दिवस की शुभकामनायें.

12 जून 2021

बाल श्रम के प्रति सामाजिक नजरिया ही सही नहीं

बाल श्रम की जब भी बात होती है तब हम सभी सार्वजनिक रूप से अपने आदर्श स्वरूप में दिखने लगते हैं. जैसे ही बाल श्रम की बात ख़त्म होती है वैसे ही तुरंत सबकुछ भूल कर हम भी एक सामान्य इंसान की तरह पेश आने लगते हैं. हमारा एक मानना ये है कि यदि हम किसी भी तरह से कोई सकारात्मक काम कर सकें तो उसे कर देना चाहिए क्योंकि वर्तमान में सकारात्मकता की कमी देखने को मिल रही है. कुछ ऐसी ही स्थिति में बाल श्रम भी आता है. आवश्यक नहीं कि बाल श्रम में किसी बालक का काम करना ही शामिल किया जाये. उसके द्वारा किसी भी तरह का ऐसा काम जो उसकी आयु, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार सही नहीं वह उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक है, अपने आपमें बाल श्रम की स्थिति में आता है.


इधर बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सहभागिता करने के कारण, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण, किसी न किसी रूप में मीडिया के संपर्क में बने रहने के कारण और उससे अधिक घूमने की प्रवृत्ति होने के कारण आये दिन ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ जाता है जबकि वहाँ बाल श्रम जैसी स्थिति दिखाई देती है. आज के सन्दर्भ में एक घटना याद आ रही है जो लगभग छह-सात साल पुरानी होगी.


हमारे उरई के एक गेस्ट हाउस में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. हम अपनी आदत के अनुसार पीछे बैठे हुए फोटो खींचने में लगे हुए थे. उसी समय हमने देखा कि हॉल में पहली पंक्ति में बैठे लोगों को पानी पिलाने का काम दो बच्चे कर रहे हैं. दोनों की उम्र लगभग आठ-दस साल की रही होगी. जितना आश्चर्य उनकी उम्र को देखकर हुआ उतना ही आश्चर्य पहली पंक्ति में बैठे अतिथियों को देखकर हुआ. उसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी बैठे हुए थे. उनके पीछे की पंक्तियों में मीडिया के लोग, जनपद के गणमान्य नागरिक बैठे हुए थे मगर किसी की तरफ से उन बच्चों के काम करने पर सवाल नहीं किया गया.


उन बच्चों के पानी पिलाने के बाद बाहर निकलने पर उनके पीछे हमने जाकर उनकी जानकारी ली. उन दोनों में बड़ी उम्र की एक लड़की थी. हमारी किसी भी बात का जवाब दिए बिना वह अपने साथ के छोटे लड़के को लेकर उस तरफ चली गई जहाँ नाश्ता, खाना बन रहा था. लगभग दस मिनट बाद एक आदमी हमारे पास आया. उसने जरा गम्भीर सी स्थिति बनाते हुए कारण जानना चाहा उन बच्चों से पढ़ाई के बारे में, उनकी उम्र के बारे में, उनके परिवार के बारे में पूछने को लेकर.


हमने उस व्यक्ति को आश्वस्त किया कि कोई पुलिस जैसा मामला नहीं है, बस हम सामान्य रूप से पूछ रहे थे. जब उस व्यक्ति को लगा कि हम उनका अनिष्ट नहीं करना चाहते हैं तो उसने बताया कि वह उन दोनों बच्चों का मामा है. उन दोनों बच्चों की माँ उसके साथ खाना बनाने का काम करती है. उन बच्चों के पिता का कुछ साल पहले निधन हो गया है. ऐसे में वह अपनी बहिन को अपने साथ इस खाना बनाने वाले काम में लगाये है. इसी के साथ इन बच्चों को काम करने के बदले सौ रुपये देता है. उनकी पढ़ाई के बारे में उसने जानकारी दी कि वे दोनों स्कूल में पढ़ते हैं. रात के समय का खाना होने की दशा में अथवा स्कूल की छुट्टी होने पर उनको भी साथ ले आता है.


अब इसे लेकर वह कितना सही बोला या कितना गलत ये तो वही जाने मगर जब चाय-नाश्ते के समय में उन प्रशासनिक अधिकारियों से, जनप्रतिनिधियों से उन बच्चों के बारे में सवाल किये तो कोई संतुष्टि देने वाला जवाब तो नहीं मिला बल्कि ये सुनने को मिला कि उनकी फोटो कहीं छपवा न देना. सोचा जा सकता है कि जब आँखों देखते हुए हमारे तंत्र की ऐसी स्थिति है तो परदे के पीछे कैसे-कैसे खेल न होते होंगे.


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09 जुलाई 2020

खातिरदारी नहीं सार्वजनिक सजा मिले अपराधियों को

इसे शायद मानवाधिकार का उल्लंघन माना जायेगा मगर हमारा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि दुर्दांत अपराधियों को, आतंकियों को सार्वजनिक रूप से अत्यंत कष्टकारी और दुखद मौत देनी चाहिए. उनको दी जाने वाली सजा इतनी भयावह और दर्दनाक हो कि आने वाले समय में लोग अपराध करने से डरें. फाँसी या फिर आजीवन कारावास किसी भी रूप में कोई सजा नहीं. फाँसी के बाद अपराधी तो सभी तरह के कष्टों से मुक्त हो गया, भुगतता है उसका परिवार. इसी तरह से आजीवन कारावास में अपराधी बड़े ही चैन की नींद लेते हैं. दुर्दांत अपराधियों का और उनके रसूख की जानकारी आज जन-जन को रहती है, ये और बात है कि व्यक्ति अपनी और अपने परिवार की जान की चिंता करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं करता है.



व्यक्तिगत स्तर पर हमारा मानना है कि किसी भी तरह के ऐसे अपराधियों को, जिनका बहुत सारे केस में हाथ है, जिनका आपराधिक इतिहास भी प्रमाण सहित प्रशासन के पास है उनके सम्बन्ध में किसी तरह की रियायत नहीं होनी चाहिए. अपराधियों को जिन्दा बनाये रखना, उनकी खातिरदारी करते रहना किसी भी तरह की अकलमंदी नहीं है. ये कहना कि उनके द्वारा सबूतों को इकठ्ठा कर लिया जायेगा, रसूखदार लोगों पर शिकंजा कस लिया जायेगा, सिर्फ टहलाने की बातें हो सकती हैं. देश में बहुत से अपराधी ऐसे हैं जिनको अभी तक जिन्दा रखा गया है, जिनसे बहुत सारे प्रमाण मिल चुके हैं मगर कोई बताये कि किस रसूखदार के गिरेबान में आज तक पुलिस ने हाथ डाल पाया है? हत्या, अपहरण, बलात्कार सहित ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें संरक्षण गृह की बालिकाओं तक के साथ अपराध किया जाता है, किस मामले में आजतक किसी रसूखदार व्यक्ति की गिरफ़्तारी हुई है? किसी एक केस का नाम लेकर बाकी दूसरे केसों को कमजोर बताना यहाँ मकसद नहीं है, यहाँ बस यही बताना है कि सबूतों का इकठ्ठा किया जाना, अपराधियों के बयानों पर रसूखदारों पर शिकंजा कसने की बातें बस जनता को टहलाने के लिए हैं.

एक-दो बार नहीं, अनेक बार ऐसी खबरें सामने आई हैं जबकि रसूखदारों से सम्बन्ध रखने वाले अपराधियों को जेल में वीआईपी सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जाती रही हैं. बहुत से अपराधी ऐसे हैं जिनके बारे में साफ़ तौर पर मीडिया में आता रहा है कि वे जेल से भी अपने आपराधिक कृत्यों को सहजता से संचालित करते रहते हैं. आये दिन जेल में मोबाइल का मिलना, अन्य सामानों का मिलना इसी बात की तरफ इशारा करता है. ऐसे में किसी भी दुर्दांत अपराधी को जिन्दा रखते हुए, उसकी खातिरदारी करते हुए किसी न किसी रूप में प्रशासन को ही हतोत्साहित करना है. प्रशासन की अपनी ही जिम्मेवारियाँ कम नहीं हैं, ऐसे में अपराधियों की खातिरदारी करवाने से बचना चाहिए. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह का तंत्र हमारे समाज में अब स्थापित हो चुका है, वहाँ किसी भी रसूखदार पर हाथ डालना सहज नहीं. ऐसे में अपराधियों से मिलने वाले सबूतों, प्रमाणों का अचार डालने से बेहतर है कि उनको सार्वजनिक रूप से ऐसी सजा दी जाये जिसे देखकर, सुनकर बाकियों के हाथ-पैर काँप जाएँ. न सही पूरी तरह से मगर बहुत हद तक अंकुश लगेगा अपराध पर, ऐसा हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है. हाँ, इसके लिए अपराधियों के मानवाधिकारों की चिंता करना बंद करना होगा.

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22 जून 2020

रक्तवीर से सम्मानित रक्तदाता भी हो रहे अपमानित कोरोना जाँच में

सुबह-सुबह खबर मिलती है कि आपने जहाँ रक्तदान किया था वहाँ रक्तदान करने वाला एक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव निकला है. इसके बाद भी हम संयम बनाये रखते हैं क्योंकि जो नाम हमें बताया गया वह हमारे रक्तदान करने के पहले नहीं था. दूसरी बात कि हमने वहाँ किसी से कोई संपर्क नहीं रखा था. ये बात बताने के बाद भी दोपहर दो बजे फोन पर खबर दी जाती है कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश पर उन सभी को अपना सैम्पल देना है जिन्होंने रक्तदान किया है. अपने स्वास्थ्य और अपने पर विश्वास था इस कारण इस आदेश को स्वीकारते हुए विगत आठ दिनों के अपने संपर्कों पर निगाह दौड़ाई.


इसमें भी सबसे पहले अपने परिवार को ही देखा. न बिटिया को, न श्रीमती जी को खाँसी, बुखार अथवा किसी तरह की अन्य समस्या थी. इसके बाद अन्य लोगों पर भी गौर किया. माना कि एक हम ऐसे व्यक्ति हों जिस पर कोरोना के लक्षण प्रदर्शित न हों मगर ऐसा सबके साथ नहीं हो सकता था. दस जून से लेकर अठारह जून तक की अपनी संपर्क सूची को खुद से खंगाला. इसमें किसी भी एक व्यक्ति को नाममात्र का न तो बुखार आया और न ही जुकाम-खाँसी जैसी कोई स्थिति सामने आई. इस बारे में पूरी तरह से संतुष्ट थे कि हम पॉजिटिव नहीं हैं और न ही हमारे संपर्क में आया कोई व्यक्ति पॉजिटिव है. इसके बाद भी जैसा कि प्रशासन की मंशा थी, अपनी सैम्पलिंग के लिए जिला चिकित्सालय पहुँच गए. जिला स्वास्थ्य विभाग अथवा प्रशासन इस कारण भी इस मामले में तत्परता दिखा रहा था क्योंकि रक्तदान शिविर का आयोजन प्रशासन की अनुमति से हुआ था. इसके साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी का, मीडिया का, समाज के प्रबुद्धजनों का भी इसमें भी सम्मिलिन हुआ था.


शाम को लगी भीड़, सैम्पल देने के लिए 

निश्चित समय पर जिला चिकित्सालय पहुँचना हुआ. सैम्पल लेने के पहले पंजीकरण करवाना था. उस समय ऐसा लग रहा था जैसे सामने जानकारी लेने वाला व्यक्ति कोई अपार विद्वान हो और जानकारी देने वाला निपट निरक्षर. जानकारी लेने के आसपास लगी बाँस-बल्लियों को लेकर धमकी भरे स्वर में डराया भी जा रहा था. डराने के साथ-साथ लगभग धमकाने जैसा स्वर भी दिखाई दे रहा था. हम लोग प्रशासन की तरफ से सैम्पल के लिए भेजे गए थे इसके बाद भी वहाँ तैनात स्वास्थ्य कर्मियों की तरफ से ऐसा व्यवहार किया जा रहा था जैसे कि हम सभी कोरोना वायरस के सीधे कैरियर हैं. खड़े होने, बैठने, बातचीत करने आदि को लेकर जिस तरह से उपेक्षित रवैया वहाँ के कर्मियों का दिखा उससे लगा कि केन्द्र सरकार द्वारा फोन पर सुनाई जा रही कॉलर ट्यून का कोई मतलब नहीं जिसमें कहा जा रहा है कि बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं. यहाँ तो उस व्यक्ति को उपेक्षित किया जा रहा है जो अभी अपना सैम्पल देने आया है.

अति-सक्रिय स्वास्थ्य कर्मी 

इसके अलावा एक और दुखद बात सामने आई वो यह कि जिनको भी सैम्पल के लिए प्रशासन ने बुलाया था वे सब प्रशासन की शब्दावली में रक्तवीर थे. ऐसे लोगों को दो-तीन दिन पहले ही जिला प्रशासन ने सम्मानित भी किया था. इसके बाद भी प्रशासन और रक्तदान करवाने वाले तमाम स्वयंभू अपनी-अपनी जाँच जनपद में लगी ट्रू नेट मशीन से करवा कर फुर्सत पा गए, शेष लोगों को भटकने को छोड़ दिया गया. यहाँ भी पिछला दरवाजा मौजूद रहा. जुगाड़ वालों को इसी मशीन के सहारे जाँचने पर सहमति दिख रही थी मगर सबके लिए नहीं. ऐसे में सभी ने इसे नकारते हुए अपना सैम्पल देने का मन बनाया.

अपनी बारी का इंतजार करते रक्तवीर 

ये सुखद रहा कि दो दिन बाद सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई मगर यहाँ एक बात सोचने वाली है कि एक तरफ प्रशासन की मंशा से, स्वैच्छिक संस्थाओं की मंशा से लोग रक्तदान करने के लिए स्वेच्छा से सामने आते हैं, उसके बाद ऐसी किसी भी घटना पर ऐसे लोगों का साथ न मिलना मनोबल को तोड़ता है. उस दिन अनुभव किया कि सैम्पल देने वालों में कुछ लोग तो ऐसे थे जो मानसिक रूप से कमजोर थे. सोचने वाली बात है कि एक तरफ वे रक्तदान करके रक्तवीर बनते हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक उपेक्षा के चलते दो दिन मानसिक रूप से पशोपेश में रहते हैं. आखिर प्रशासन को इस तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है.

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30 सितंबर 2019

वाहन चालकों के अलावा भी बहुत सी जानें कीमती हैं साहब!


शासन-प्रशासन इस समय इस चिंता में हैं कि कैसे वाहन चालकों की जान बचाई जाये. ऐसा पढ़कर आपको आश्चर्य लगेगा. लगना भी चाहिए क्योंकि बात ही ऐसी है. पिछले दिनों वाहन सम्बन्धी अधिनियम में जबरदस्त बदलाव करते हुए जुर्माने को कई-कई गुना बढ़ाया गया. कई प्रदेशों से अचानक से बड़ी-बड़ी धनराशि वाले चालानों के काटे जाने की खबरें आनी शुरू हो गईं. वाहनों के कागजातों को सही रखने, पूर्ण रखने के सम्बन्ध में जितना जोर दिया गया, उससे कहीं अधिक जोर दोपहिया वाहन चालकों के हेलमेट पहनने पर, कार चालक के सीट बेल्ट लगाने पर दिया गया. मंत्री स्तर से ऐसे बयान भी आये कि सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ही जुर्माने को बढ़ाया गया है. समझ नहीं आया कि शासन-प्रशासन को सिर्फ वाहन चालकों की जान की ही चिंता क्यों है? सरकार की प्राथमिकता में अन्य नागरिकों की जान की सुरक्षा इस प्राथमिकता में क्यों नहीं है, जिस प्राथमिकता में वाहन चालकों की है? स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा, जान-माल सुरक्षा के प्रति अभी भी लापरवाही दिखाई दे रही है. 

बहरहाल, सरकार क्या विचार कर रही है, क्या कदम उठा रही है इस पर चर्चा करना अभी इस पोस्ट का अभीष्ट नहीं है. इस पोस्ट का मंतव्य महज इतना दिखाना है कि जिम्मेवार प्रशासन भी अपने कदमों को उसी स्थिति तक उठाता है जितना कि उसे आदेशित किया जाता है. कहते हैं न कि ‘जितनी चाभी भरी राम ने, उतना चले खिलौना’ कुछ ऐसा ही रवैया प्रशासन का रहता है या कहें कि अभी वर्तमान में ऐसा बना हुआ है. जबसे मोटर अधिनियम में बड़े बदलाव हुए हैं, प्रशासन पूरी तत्परता से, तन्मयता से दोपहिया वाहन चालकों के हेलमेट को पकड़ने में लगा है. जो बिना हेलमेट पकड़ में आये उनको चालान पकड़ा दिया जा रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे एकमात्र उसी व्यक्ति की जान कीमती है जो दोपहिया वाहन चला रहा है. ऐसा सभी जगहों की तरह से जनपद जालौन में भी हो रहा है. जिला मुख्यालय उरई में ऐसी तत्परता कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रही है.


इसी तत्परता के बीच उरई में एक ऐसी सड़क पर, जहाँ दिन में कई बार जिला प्रशासन का, अधिकारियों का निकलना होता है, असुरक्षा विगत कई वर्षों से बनी हुई है. शहर के बीचों-बीच बने एक प्रसिद्द मंशापूर्ण हनुमान मंदिर के पास कुछ ऐसी स्थिति बनी हुई है. शहर की मुख्य सड़क और मंदिर को जाने वाली सड़क आपस में मिली हुई है मगर दोनों के बीच कई फीट का फासला (ऊँचाई) है. मुख्य सड़क और मंदिर वाली सड़क के बीच के अंतर को एक तिरछी स्थिति से पाटने की कोशिश की गई है. इस सड़क पर पूरे दिन काफी आवाजाही रहती है. इसका कारण एक तो इसका जनपद जालौन और उसके आगे अन्य मुख्य नगरों को मिलाना है. इसी सड़क पर आगे चलकर परिवहन विभाग का बस स्टैंड भी बना हुआ है, जहाँ उत्तर प्रदेश परिवहन की सभी बसों का जाना होता है. इसके साथ-साथ इसी सड़क पर जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक कार्यालय, आवास होने के साथ-साथ सभी मुख्य अधिकारियों के कार्यालय और आवासों के बने होने से भी आवाजाही बराबर बनी रहती है. दक्षिणमुखी  हनुमान जी का मंदिर होने के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच इस मंदिर की विशेष महत्ता है. इस कारण से मंगलवार और शनिवार को यहाँ विशेष रूप से भीड़ हुआ करती है. इसके बाद भी प्रशासन द्वारा कभी भी यहाँ पर किसी तरह की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई, जिससे किसी अनहोनी की स्थिति में सड़क से वाहन या पैदल नागरिक को फिसल कर मंदिर वाली सड़क गिरने से रोका जा सके.


सोचने वाली बात है कि सड़क की व्यस्त आवाजाही के बीच छोटे-बड़े वाहनों का निकलना, परिवहन विभाग की बसों की नियमित आवाजाही के चलते यहाँ वाहन चालक और पैदल यात्री असुरक्षित ही हैं. यह तो सौभाग्य है लोगों का कि छुटपुट घटनाओं के अलावा यहाँ अभी तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है. लगता है प्रशासन अभी किसी बड़ी दुर्घटना के इंतजार में है. तब तक बिना हेलमेट वालों को पकड़ कर उनकी जान की सुरक्षा में व्यस्त रहा जाये.  




27 सितंबर 2019

लोकतान्त्रिक तानाशाही का प्रत्यक्ष उदाहरण


हाल ही में एक मामला संज्ञान में आया जो पुलिस से संदर्भित था. पुलिस का नाम सामने आते ही पसीने छूट जाते हैं लोगों के, हमारे भी छूट जाते हैं. अक्सर हम अपने मित्रों से कहते भी हैं कि हमारा और पुलिस का सम्बन्ध उतना ही है जितना हमारा और चंद्रमा का. हम उसे देख सकते हैं, महसूस कर सकते मगर उसे छू नहीं सकते, वो भी हमें न देख सकता है, न महसूस कर सकता है. बहरहाल, इस मामले में अनावश्यक रूप से तूल दिया गया. कई बिन्दुओं पर लगा कि मामले को जबरिया आपराधिक मोड़ दिया जा रहा है. रात का समय था और पुलिस के लोग भी जानते हैं कि एक समय विशेष के बाद आला अधिकारीयों से संपर्क न तो फोन पर संभव होता है और न ही व्यक्तिगत रूप से. रात के मामले या तो निपट ही जाते हैं या फिर वे सलाखों के भीतर रात गुजारने के साथ ही निपटते हैं. इधर ऐसा लग रहा था जैसे सारी प्लानिंग पहले से कर रखी गई हो. दोषी कोई और मगर पकड़ा किसी और को. किसी तरह से कोई हस्तक्षेप न हो सके इसलिए एक संवेदनशील कहानी जोड़ी गई. निर्दोष मामले को संवेदनशील बनाने और राजनैतिक हस्तक्षेप रोकने के लिए मामले को लड़की छेड़ने से जोड़ दिया गया. लड़की कौन, ये उनको भी न पता था जो मामले की पैरवी कर निर्दोषों को फँसाने में लगे थे.


एक बार मामला पुलिस के पक्ष में आया कि दोनों तरफ से अपनी-अपनी कवायद शुरू हुई. खाकी के पास असीमित कानूनी अधिकार और जनता के पास उसके चुने हुए प्रतिनिधियों का सहारा. यहाँ समस्या और विकत थी. प्रशासन के आला अधिकारी या तो सोये हुए थे या फिर उनके मोबाइल को उन तक पहुँचाया ही नहीं गया. अब ले-देकर मामला जनप्रतिनिधियों तक पहुँचाने का समझ आया. यहाँ स्थिति तो बद से बदतर निकली. सत्ता पक्ष के एड़ी से चोटी तक के नेतागीरी करने वालों को, जनप्रतिनिधि कहलाने वालों को, प्रतिनिधि कहलाने वालों को, पदाधिकारी कहने वालों को सिसियाते-मिमियाते देखा. बजाय निर्दोष लोगों की पैरवी करने के वे लोग भी खाकी की कहानी में अपना सिर मटकाते नजर आये. ऐसी घटना जो हुई न हो, ऐसी बात जिसका कोई ओर-छोर न हो उस पर भी जनप्रतिनिधि किसी तरह से अपनी बात को मजबूती के साथ नहीं रख सके. मामला हाथ से सरकता हुआ वापस फिर जनता के हाथ आ गया. निर्दोष व्यक्तियों के परिवारों के पास आ गया. रात करवटें बदलते रहने के अलावा कोई काम न था क्योंकि चुने हुए प्रतिनिधि सुनी-सुनाई, बनी-बनाई कहानी को सुनकर मस्त-मगन लेटे थे.

ऐसी घटना जो हुई ही नहीं, जिसका कोई प्रमाण नहीं, जिसका कोई गवाह नहीं उसमें भी सत्ताधारी कुर्तेबाज़ बस हाथों की कठपुतली बने नज़र आए. बात जहाँ से शुरू हुई थी वहीं पहुँच गई. अपना-अपना शेयर सेट करने के माहिर लोगों ने किसी तरह से अपना दायित्व न निभाया. वोट लेने के समय चरणों में लोटने वाले वही चरण सम्बंधित पक्ष के सिर पर मारते समझ आये. अंततः जिसका डर था वही हुआ. बातचीत के सारे रास्ते बंद करते हुए कानूनी रास्ता न चाहते हुए भी अपनाना पड़ा. एक ऐसी गलती की सजा मानने को मजबूर करना पड़ा जो किसी ने की ही नहीं. फ़िलहाल तो पूरी रात और पूरे दिन के बाद घटनाक्रम एक बिंदु पर आकर रुका मगर सबकी असलियत सामने आ गई. अब बड़ी-बड़ी गाड़ियों की बड़ी-बड़ी नेम प्लेट्स और हूटर की हनक में सड़कों, विभागों में तैरते इन (अ)राजनेताओं को प्रत्यक्ष मिलकर नमन किया जाएगा, किसी दिन.

28 अप्रैल 2019

ऐसे जागरूक मतदाताओं के सहारे जिंदा है हमारा लोकतंत्र


इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव को देश का महापर्व घोषित कर दिया गया है. शासन-प्रशासन अपने-अपने स्तर पर पूरा दम लगाकर अधिक से अधिक मतदान करवाने की कोशिश में लगा हुआ है. ऐसे में मतदान कितना होगा ये बाद की बात है मगर जैसा कि पहले भी कहा था कि मतदाता जागरूकता किसी के कहने से नहीं होती वरन यह स्व-स्फूर्त प्रक्रिया है जो अंतःकरण से उपजती है. जिसे भी जरा सा भी भान है अपनी जिम्मेवारी का, अपने कर्तव्य का, देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली के प्रति विश्वास का, देश की सरकार के कार्यों के प्रति सकारात्मकता का वह अपने आपको मतदान के लिए प्रेरित कर ही लेता है. मतदान के लिए खुद को तैयार कर ही लेता है. उसे न तो प्रशासन की गोष्ठियों की आवश्यकता होती है, न रैलियों की, न नारे लिखी तख्तियों की, न आदर्श बूथ की. ऐसे लोग अपने आप मतदान के लिए सतर्क रहते हैं, जागरूक रहते हैं.


ऐसा उदाहरण आज विश्व के पहले अनाज बैंक के बुन्देलखण्ड स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की उरई शाखा में देखने को मिला जबकि वहाँ की लाभार्थी खाताधारक महिलाएँ जनपद जालौन में 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने के प्रति उत्साहित दिखीं. अनाज बैंक उरई शाखा प्रतिमाह दो बार एक महिला को पांच किलो अनाज प्रदान करता है, इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी भूखा न सोये. सभी महिलाएं ऐसी हैं जो अकेली हैं, वृद्ध हैं, अत्यंत गरीब हैं, मजबूर हैं, निराश्रित हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जो शिक्षित नहीं हैं. सामान्य अक्षर-ज्ञान से भी वंचित हैं, अपने नाम को लिखना भी नहीं जानती हैं. बहुत सी महिलाएं अत्यंत वृद्ध हैं. इसके बाद भी ख़ुशी की बात यह है कि दो-चार महिलाओं को छोड़कर सभी महिलाएं अभी तक मतदान करती रही हैं. अबकी बार कुछ महिलाओं के वोट कट गए हैं; कैसे, क्यों इसकी जानकारी उनको भी नहीं है और अनाज बैंक शाखा को भी समय से नहीं हो सकी.  

अप्रैल माह के दूसरे वितरण के दौरान आज सभी महिलाओं से मतदान करने सम्बन्धी चर्चा हुई. सभी महिलाओं ने पूर्व में अपने मतदान करने की बात कही. कुछ महिलाओं ने अपने वोट के इस बार कट जाने की समस्या बताई. उनकी बातों से लग रहा था, जैसे कि उनका वोट कट जाना गलत हुआ. उन्हीं महिलाओं में से अत्यंत वृद्ध महिला ने यहाँ तक कहा कि वह कल मतदान दिवस पर अपना आधार कार्ड लेकर अपने बूथ जाएगी. वहां किसी अधिकारी से बात करके वोट डलवाने के लिए कहेगी क्योंकि वह पहले वोट डालती रही है. सोचिये, जिस देश के नागरिकों में इस तरह का ज़ज्बा होगा, वहां का लोकतंत्र खतरे में कैसे आ सकता है? ये ऐसी महिलाएं हैं जिनको सीधे-सीधे अपने किसी जनप्रतिनिधि से काम नहीं पड़ना है. इनको किसी सरकार में बालू, शराब के ठेके नहीं चाहिए हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं जिनके किसी परिजन को कोई सिफारिश भी नहीं करवानी है. ये सभी महिलाएं बस इतना समझ सकी हैं कि देश में सरकार के बनाने-गिराने में वोट का महत्त्व है. इसी कारण वे अपना वोट देना चाहती हैं. उनके ये जानने का प्रयास नहीं किया कि वे किसे अपना वोट देना चाहती हैं और न ही उन्होंने ये बताने-पूछने की चेष्टा की. 

सुखद ये लगा जानकर कि जहाँ आज के दौर में जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों से रुष्ट होकर पढ़ा-लिखा मतदाता वोट डालने से विरक्त होने लगा है वहीं ऐसी महिलाएं अपने मतदान को लेकर सजग हैं. मतदान को छुट्टी का दिन मानकर पढ़ा-लिखा मतदाता कहीं सपरिवार पिकनिक पर निकल जाता है वहीं ये महिलाएं सबह-सुबह मतदान करने के प्रति जागरूक दिखीं. शिक्षित मतदाताओं के लिए शासन-प्रशासन द्वारा आये दिन तमाम तरह की नौटंकी करते हुए उनको जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं ये महिलाएं स्व-प्रेरण से मतदान के लिए जागरूक हैं. ऐसी महिलाओं, ऐसे मतदाताओं के कारण ही इस देश का लोकतंत्र जिन्दा है, इस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली सक्रिय है. नमन है ऐसी महिलाओं को, ऐसे जागरूक मतदाताओं को.  

27 अप्रैल 2019

एकमात्र काम बस मतदाता जागरूकता कार्यक्रम


चुनाव अपने चरम पर है और सभी जगह प्रशासन भी मुस्तैदी से जुटा हुआ है. चुनाव सम्बन्धी जो तैयारियाँ चल रही हैं, उनको लेकर जितना ध्यान प्रशासन स्तर पर रखा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा जोर इस बार मतदाता जागरूकता को लेकर दिख रहा है. दिन भर किसी न किसी रूप में मतदाताओं को जागरूक करने का काम किया जा रहा है. इस काम में प्रशासनिक मशीनरी जितना अधिक शामिल है, उससे कहीं ज्यादा उसने निजी मशीनरी को लगा रखा है. जागरूकता के नाम पर निजी संस्थानों को, सामाजिक कार्य करने वालों को लगा रखा गया है. कहीं-कहीं इनके द्वारा स्वेच्छा से काम किया जा रहा है और कहीं-कहीं प्रशासन द्वारा जबरिया तरीके से इनसे मतदाता जागरूकता के कार्य करवाए जा रहे हैं.


निश्चित ही चुनाव हमारे देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण भाग है और इसमें हर एक व्यक्ति को अपनी भागीदारी निभानी चाहिए. देखा जाये तो बहुत से भागों में ऐसा होता भी है. वे सरकारी लोग जिन पर सरकार का, प्रशासन का नियंत्रण है, चुनाव ड्यूटी में लगाये जाते हैं. यहाँ ऐसे लोगों की अपनी मजबूरी होती है और वे इस कार्य से खुद को सहजता से अलग भी नहीं कर पाते हैं. इस बार कई जगहों से प्रशासन द्वारा असंवेदनशील रवैया अपनाये जाने की खबरें भी मिली हैं. महिलाओं की निर्वाचन सम्बन्धी ड्यूटी लगाने में भी संवेदना का भाव नहीं दिखाया गया है. कई जगह बुजुर्ग कर्मियों के साथ भी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाये जाने की बातें सामने आई हैं. इसके साथ-साथ चुनाव ड्यूटी से बचे लोगों को और चुनाव ड्यूटी में लगे लोगों को मतदाता जागरूकता के इतने काम सौंपे गए, लगा जैसे वर्तमान निर्वाचन में जागरूकता एक प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आया हो. विद्यालयों के वे बच्चे भी इसमें शामिल किये गए जिन्हें अभी मतदान करने में समय है. कोचिंग सेंटर्स, विद्यालयों आदि को लगभग रोज ही किसी न किसी कार्यक्रम करने को, रैली निकालने को, गोष्टी आयोजित करने को मजबूर किया जाता रहा है. इस समय की भीषण गर्मी में बच्चों को धूप में रैली निकालने के लिए मजबूर करना किसी भी रूप में मानवीय तो समझ नहीं आया.

आज के दौर में मतदान करने वाला बहुत हद तक जागरूक है, इसके बाद भी यदि उसमें किसी तरह की सुसुप्तावस्था आई है तो वह जनप्रतिनिधियों के रवैये के चलते. उनके बेरुखे व्यवहार ने मतदाताओं को मतदान से दूर किया है. इसी तरह प्रशासन के तानाशाही भरे रवैये ने भी आम आदमी को प्रशासन से दूर किया है, उसके प्रति खौफ सा पैदा किया है. आज जिस तरह से शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधि अपने कार्य करने का तरीका बनाये हैं, उससे आमजनमानस में सिर्फ और सिर्फ भ्रष्ट तस्वीर बनी है. इसी के चलते प्रशासन के मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आम जनता को सिर्फ धन कमाने के, सरकारी पैसे को खपाने का माध्यम मात्र नजर आता है. प्रशासन ज्यादा से ज्यादा मतदाता जागरूकता कार्यक्रम करवा कर, अधिक से अधिक मतदान करवा कर अपनी प्रोफाइल को बढ़िया कर लेने की कोशिश में रहते हैं. चुनाव संपन्न होने के बाद उनका रवैया भी जनप्रतिनिधियों जैसा हो जाता है. वे भी आम जनता की समस्याओं की तरफ से अपने आपको दूर ले जाते हैं. 


असल में आज जनप्रतिनिधियों ने, प्रशासन ने जनता के बीच से अपना विश्वास खो सा दिया है. आये दिन के कार्यों से इसकी झलक भी दिखाई देती है. यदि हालिया मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों की चर्चा की जाये तो आये दिन निकलने वाली रैलियों से शहर की सड़कों पर जाम की स्थिति बनती है. चिलचिलाती धूप में राहगीर फँसे होते हैं, बच्चे फँसे होते हैं, मरीज तड़प रहे होते हैं मगर उस जाम को घंटों तक खुलवाने के लिए किसी तरह की प्रशासनिक मदद, सहयोग नहीं मिलता है. ऐसे भी जागरूकता से क्या फायदा जो अपने शहर के लोगों को ही कष्ट में खड़ा कर दे. असल में जागरूकता कहीं बाहर से ठेल-ठेल कर नहीं लाई जा सकती है. यह विशुद्ध अंतःप्रेरण का सुफल है. आज से दशकों पहले के चुनावों का दौर भी भली-भांति याद है जबकि लोग सुबह से ही मतदान करने के लिए हँसते-हँसते चल दिया करते थे. तब न तो आज की तरह रैलियाँ थीं, न गोष्ठियाँ, न नारेबाजी, न तख्तियाँ, न सेल्फी पॉइंट. तब लोग मतदान करना अपना कर्तव्य समझते थे और इसके लिए सजग रहते थे. जब तक एक-एक मतदाता चुनाव को, मतदान को अपनी जिम्मेवारी नहीं समझेगा,, अपना कर्तव्य नहीं मानेगा तब तक ऐसे ही मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलते रहेंगे. प्रशासन अपना काम करता रहेगा, मतदाता अपना काम करते रहेंगे, जनप्रतिनिधि अपना काम करते रहेंगे. इन सबके बीच देश का लोकतंत्र आगे बढ़ता ही रहेगा, लोकतान्त्रिक प्रणाली आगे बढ़ती रहेगी.

22 जनवरी 2019

बच्चों को सिखाएँ जीवन का महत्त्व


कोचिंग सेंटर्स की बढ़ती संख्या और उसमें आने वाले बच्चों का सैलाब. कोचिंग क्लास छूटते ही सैकड़ों की संख्या में बच्चों का सडकों पर निकल आना किसी भी छोटे-बड़े शहर का आम नजारा हो गया है. वर्तमान दौर में अंकों की मारा-मारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का अथक दबाव, सबसे आगे रहने की गलाकाट प्रतिद्वंद्विता के चलते लगभग प्रत्येक बच्चा आज विद्यालयों में जाने की बजाय कोचिंग में जाता दिखाई दे रहा है. किसी बच्चे का कोचिंग जाना, अतिरिक्त रूप से पढ़ना किसी भी रूप में बुरा या गलत नहीं है. जिस तरह से वैश्वीकरण के दौर में समूचा विश्व एक जगह सिमटता दिखाई देने लगा है उसमें अधिक से अधिक जानकारी, ज्ञान किसी के लिए भी अपेक्षित है. समस्या कोचिंग सेंटर्स की बढ़ती संख्या से भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या के चलते इनका बढ़ना स्वाभाविक है. असल समस्या वह है जो दिखाई देने के बाद भी किसी को दिखाई नहीं दे रही है. आये दिन इन्हीं बातों पर शासन-प्रशासन द्वारा जागरूकता कार्यक्रम चलाये जाते हैं. इसके बाद भी खुद प्रशासन इस तरफ से आँखें मूँदे बैठा है. 


कोचिंग क्लासेज के छूटते ही वहां से निकले बच्चों का बाइक रेस में शामिल हो जाना एक अनिवार्य सा कदम हो गया है. कोचिंग सेंटर्स में आते समय तो वे अलग-अलग होते हैं लेकिन वहाँ से एकसाथ बड़ी संख्या में निकलने के बाद उन नाबालिग बच्चों की बाइक, स्कूटी का सडकों पर अंधाधुंध तरीके से दौड़ना खतरे का ही सूचक है. बेतरतीब दौड़ती बाइक, एक-एक बाइक पर तीन-तीन लोगों का बैठे होना, बिना अपनी जान की परवाह किये दूसरे व्यक्ति की जान के लिए आफत बने इन बच्चों को अंदाजा भी नहीं होता कि कैसे एक चूक उनकी जान पर भारी पड़ जाएगी. अपने घर-परिवार, अपने माता-पिता की चिंता से बेफिक्र वे बस अपनी बाइक दौड़ाने में तत्पर रहते हैं. वैसे चिंता जैसा शब्द शायद यहाँ उचित नहीं क्योंकि यदि उनके घर-परिवार या माता-पिता को उन बच्चों की चिंता होती तो वे कम उम्र में उनके लिए तेज रफ़्तार बाइक, स्कूटी की व्यवस्था ही नहीं करते. यदि किसी मजबूरी या समय की बचत के लिए उनको ऐसा करवाया भी जाता तो वे अपने बच्चों को इसके लाभ-हानि के बारे में भी समझाते. ऐसा शायद बिलकुल नहीं हो रहा है क्योंकि किसी एक पल में लगता नहीं कि बाइक दौड़ाते इन बच्चों को उनके माता-पिता ने कोई सीख दे रखी है.

यहाँ प्रशासन को भी सजग होने की आवश्यकता है. उनके द्वारा ऐसे बच्चों के बाइक चलाने पर कठोर कदम उठाये जाने चाहिए. कोचिंग सेंटर्स के द्वारा किसी तरह की हिदायत ने देना, कोई सख्ती न करने के पीछे उनकी अपनी मजबूरी होती है, उनके अपने व्यावसायिक हित होते हैं मगर प्रशासन के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती है. ऐसा तब जबकि आये दिन प्रशासन द्वारा यातायात जागरूकता कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं. इस बारे में प्रशासन के साथ-साथ अभिभावकों को भी जागने की, सचेत होने की जरूरत है. भविष्य के खतरों को कुछ आवश्यक कदम उठाकर टालना हम सबके हाथ में है और उन पर अमल करना चाहिए.

08 अगस्त 2018

पंद्रह अगस्त का इंतजार है अंध-विद्यालय को

नया अधूरा भवन, जिसमें दो-दो विधायकों की निधि लगी है 

पुराना भवन, जिसमें अंध-विद्यालय संचालित था, अब बंद है 

अधूरे नए भवन की अंदरूनी अपूर्ण स्थिति 

अधूरे नए भवन की अंदरूनी अपूर्ण स्थिति 

अधूरे नए भवन की अंदरूनी अपूर्ण स्थिति 


आज, 08 अगस्त 2018, शांतिनगर, उरई में पूर्व में संचालित अंध-विद्यालय का भवन. 
इसके साथ ही वह भवन और उसके अन्दर के चित्र, जिसके निर्माण में दो-दो विधायकों की निधि का उपयोग किया गया है. निधि उपयोग के बाद भी भवन अधूरा है. 

गत माह, जुलाई में अंध-विद्यालय के प्रबंधक और उसके कार्यकारिणी सदस्य ने ADM साहब के सामने अंध-विद्यालय विवाद को निपटाने के समय नए भवन को पंद्रह अगस्त तक पूर्ण करवाने तथा स्वतंत्रता दिवस पर ADM साहब से ही ध्वज फहराने का वादा किया था. 

अंध-विद्यालय के दोनों शिक्षक भी इसी शर्त पर वहां से हटाये गए थे कि नए शिक्षक तत्काल लाये जायेंगे. इसके बाद भी पुराने भवन में ताला लगा हुआ पाया गया. 

पंद्रह अगस्त का इंतजार है.... उसके बाद प्रशासन के कदम को देखना है... (दोनों नेत्रहीन शिक्षक तो हटा दिए गए.... क्या भ्रष्ट प्रबंध-तंत्र पर प्रशासन कोई कार्यवाही करेगा?)

17 जून 2018

अवैध तेजाब से लड़ने को एकजुट होना होगा #stopsaleacid


इंसानी दिमाग में कहीं गहरे बैठी पशुता, क्रूरता कब, किस रूप में सामने आये कहा नहीं जा सकता. उसकी मानसिक क्रूरता का ही दुष्परिणाम है कि समाज में रोज ही किसी न किसी तरह की आपराधिक घटनाएँ सुनाई देती हैं. इन्हीं आपराधिक घटनाओं में विगत कुछ वर्षों से एसिड अटैक (तेजाबी हमले) की घटनाओं में वृद्धि हुई है. तेजाबी हमले का शिकार सिर्फ और सिर्फ बेटियाँ हो रही हैं. किसी मनचले के एकतरफा प्रेम का इंकार और तेजाबी हमला, किसी अन्य इंकार के सुनाई देने पर महिला के चहरे पर एसिड अटैक कर देना. एक पल को सिर्फ विचार करने पर ही पूरा दिमाग झनझना जाता है कि कैसे कॉलेज में प्रैक्टिकल के दौरान दो-चार बूँद एसिड उँगलियों पर गिर जाने भर से घंटों जलन मचती रहती थी. किस तरह घर में, किसी व्यवसाय के दौरान एसिड से कार्य करने के दौरान असावधानीवश शरीर पर छिटक कर गिरा तेजाब कभी-कभी शरीर के उस हिस्से में खाल का, मांस को जला दिया करता है. घंटों, दिनों के हिसाब से न केवल जलन बल्कि अप्रत्याशित दर्द बना रहता है. जब दो-चार बूंदे पूरे दिल-दिमाग को हिलाकर रख देती हैं तो सोचिये क्या स्थिति होती होगी जबकि कोई दिमागी क्रूर इन्सान किसी के पूरे चेहरे पर तेजाब फेंक देता है.


ये हमारे समाज की विद्रूपता है कि इस तरह की कई-कई घटनाओं को देखने-सुनने के बाद भी जनसामान्य इस बारे में जागरूक या सचेत नहीं है. सन 2016 में मुम्बई के प्रीति राठी तेजाब कांड में अदालत ने मामले को रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मानते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी. यह अपने आपमें पहला मामला था जबकि एसिड अटैक मामले में किसी आरोपी को फाँसी की सजा सुनाई गई हो. देखा जाये तो महज सजा ही एकमात्र समाधान नहीं है. इससे बेहतर समाज को जागरूक होने की जरूरत है. उच्चतम न्यायालय ने सन 2013 में एसिड अटैक को गंभीर अपराध मानते हुए सरकार, एसिड बेचनवाले दुकानदारों और एसिड अटैक पीड़ितों के लिए दिशा-निर्देश दिए थे. अदालत के अनुसार तेजाब केवल उन्हीं दुकानों पर बिक सकता है जिनको इसके लिए पंजीकृत किया गया हो. एसिड 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों द्वारा नहीं बेचा जाएगा और जो भी इसे खरीदने आएगा दुकानदार द्वारा उसके घर का पता, टेलीफोन नंबर तथा एसिड खरीदने का उद्देश्य सहित अन्य जानकारी लेनी होगी और इसका पूरा लेखा-जोखा लिखित में अपने पास रखना होगा. जो दुकानदार एसिड बेच रहे हैं उनके पास इसका कितना स्टॉक है इसकी जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी. अदालत ने यह भी प्रावधान किया है कि यदि किसी दुकानदार द्वारा इन नियमों की अनदेखी की जाती है तो पकड़ने जाने पर  उस पर पचास हजार रुपये जुर्माना लगाया जाएगा. ऐसी स्थिति के बाद भी तेजाब की बिक्री खुलेआम हो रही है.


वर्ष 2005 में महज पंद्रह वर्ष की आयु में लक्ष्मी अग्रवाल एसिड अटैक का शिकार हुई. लम्बे और दर्दनाक समय में इलाज के बाद अपने आपको कमजोर न पड़ने देने वाली लक्ष्मी ने देश भर में एसिड अटैक के विरुद्ध आवाज़ उठानी शुरू की. वर्तमान में उनके द्वारा #stopsaleacid अभियान चलाया जा रहा है, जिसका मूल उद्देश्य खुलेआम एसिड की बिक्री को रुकवाना है. यह सही है कि आज बहुतेरे काम ऐसे हैं जिसके लिए तेजाब की आवश्यकता होती है. ऐसे में तेजाब को हमेशा-हमेशा के लिए बिक्री से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है मगर इसके साथ एक पहलू ये भी है कि यह अत्यंत घातक पदार्थ है. जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी बिक्री के लिए नियम बना दिए गए हैं तो प्रशासन द्वारा उन्हें सख्ती से लागू करने के कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे हैं? उपयोगी कार्यों के अलावा तमाम सिरफिरे हैं जो तेजाब का दुरुपयोग करते हुए हमारी-आपकी बेटियों के भविष्य से, उनकी जान से खिलवाड़ करते हैं. न केवल प्रशासन को बल्कि नागरिकों को भी इसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता है. हम लोग सजग हों और बिना ये सोचे कि इससे हमारा व्यक्तिगत क्या लेना-देना है हर उस व्यक्ति की, हर उस दुकानदार की शिकायत प्रशासन से करनी चाहिए जो खुलेआम तेजाब बेचने में लगा है. उन दुकानों को भी चिन्हित करने की आवश्यकता है जो गैर-पंजीकरण के तेजाब बेचने का काम कर रहे हैं.


हम सभी को आज ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है. यह समय की माँग भी है और हमारी बेटियों के लिए सुरक्षात्मक भी है. आइये, हम सब एकजुट होकर तेजाब रुपी खतरनाक पदार्थ की खुलेआम बिक्री के खिलाफ खड़े हों. इसके साथ ही उस मानसिकता के खिलाफ भी खड़े हों जो महज अपनी पसंदगी के नकारने पर एसिड अटैक जैसे खतरनाक कदम उठाकर हमारी बेटियों की जान से, भविष्य से खेल रही है. आखिर किसी एक व्यक्ति की दिमागी क्रूरता का शिकार हम अपनी बच्चियों को कब तक होने देंगे? आज नहीं तो कल हमें जागना ही होगा, एकजुट होना ही होगा. और जब ऐसा करना ही है तो फिर कल का इंतजार क्यों?