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25 अक्टूबर 2017

प्रेम स्मारक में विशेष मजहबी क्रिया

इसमें किसी को कोई संदेह होगा ही नहीं कि ताजमहल वास्तुकला का एक नायाब नमूना है. उसकी सुन्दरता और कारीगरी के कारण ही उसे विश्व के सात अजूबों में शामिल किया गया है. ताजमहल अपने निर्माण से लेकर आजतक बराबर किसी न किसी रूप में चर्चा में बना रहा है. इतिहासकारों के अनुसार ताजमहल निर्माण के बाद कारीगरों के हाथ कटवा दिए गए थे ताकि वे दोबारा ताजमहल की अनुकृति का निर्माण न कर सकें. कालचक्र चलता हुआ इतिहास से निकल कर वर्तमान तक आकर खड़े हुए ताजमहल के साथ सुन्दरता जिस तरह से जुडी रही उसी तरह से उसके साथ विवादों का भी नाता रहा है. इस विवाद को राजनीति के कदम आये दिन और बढ़ावा दे देते हैं. ताजमहल के नाम पर कभी विवाद हुआ उसके आसपास कार्यक्रम करवाए जाने को लेकर, कभी किसी निर्माण को लेकर, कभी उसके आसपास बनी औद्योगिक इकाइयों को लेकर, कभी यमुना नदी में बहते पानी को लेकर. इन तमाम सारे विवादों बीच ताजमहल के साथ उसका अस्तित्व शिव मंदिर पर होने का विवाद भी लगातार चलता रहा. हाल ही में इस विवाद को हवा उस समय दी गई जबकि उत्तर प्रदेश की ताजा प्रकाशित पर्यटन पत्रिका में ताजमहल का जिक्र नहीं किया गया. हालाँकि पर्यटन मंत्री ने स्पष्ट करते हुए कहा कि पर्यटन विभाग की तरफ से नए पर्यटन स्थलों को वरीयता दी गई है तथापि इसके बाद भी विवाद बना रहा.


ताजमहल से जुड़े तमाम सारे विवादों में सबसे बड़ा विवाद उसके शिव मंदिर पर बने होने को लेकर है. हिन्दू धर्मावलम्बी लम्बे समय से अपनी बात पर अड़े हुए हैं और ताजमहल में शिव मंदिर के अस्तित्व होने के साक्ष्य भी प्रस्तुत करते रहे हैं. उसके लिए जाँच करवाए जाने की मांग करते रहे हैं. इस विवाद को प्रदेश में भाजपा सरकार के आने के बाद से और बल मिला. भाजपा से, हिन्दू संगठनों से जुड़े लोगों ने पुरजोर तरीके से ताजमहल को तेजोमहल बताया वहीं भाजपा-विरोधी उसे प्रेम का स्मारक बताये जाने पर अड़े हुए हैं. ताजमहल को सदैव से शाहजहाँ द्वारा अपनी बीवी मुमताज की याद में बनवाए गए प्रेम स्मारक के रूप में प्रसारित-प्रचारित किया जाता रहा है. इसी बिंदु के आधार पर भाजपा विरोधी, हिन्दू विरोधी तत्त्व अपनी बात को पुरजोर ढंग से रखने का कथित दावा करते दिखाई देते हैं. वे सभी लोग इसे प्रेम स्मारक होने के साथ-साथ देश की सांस्कृतिक विरासत बताते नहीं थकते हैं. एक पल को ताजमहल के सांस्कृतिक स्मारक होने को सच मान लिया जाये तो सवाल यह उठता है कि उस सांस्कृतिक स्थल पर सिर्फ एक मजहब के लोगों को अपना धार्मिक कृत्य करने की अनुमति क्यों है? सिर्फ मुसलमानों को वहां प्रति शुक्रवार नमाज पढ़ने की अनुमति क्यों है? ये सवाल उस दशा में और भी अहम् हो जाता है जबकि ताजमहल परिसर में दो दिन पहले शिव चालीसा का पाठ करने वाले कुछ युवकों को पकड़ लिया गया. जिन्हें बाद में माफीनामा लिखवाने के बाद रिहा किया गया. ये अपने आपमें बहुत बड़ा सवाल है कि सिर्फ दो-चार युवकों द्वारा एक स्थान पर बैठकर शिव चालीसा का पथ करना अवैधानिक हो गया और प्रति शुक्रवार सैकड़ों की संख्या में मुसलमानों द्वारा नमाज पढ़ना वैधानिक कैसे हो जाता है?


ताजमहल का निर्माण शिवमंदिर को तोड़कर किया गया है या नहीं, ये शोध का, जाँच का विषय हो सकता है मगर इसमें किसी को संशय नहीं होना चाहिए कि मुगलों द्वारा बनवाई गई सभी इमारतों का आधार हिन्दू स्मारक ही रहे हैं, हिन्दू मंदिर ही रहे हैं, हिन्दुओं के सांस्कृतिक केंद्र रहे हैं. ऐसे में यदि बार-बार इस बात को उठाया जाता है कि ताजमहल का निर्माण शिवमंदिर पर किया गया है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए इस पर. इस बिंदु के सन्दर्भ में एक बात विचारणीय होनी चाहिए कि ताजमहल को गिराए जाने की बात नहीं की जा रही है. ऐसी बात होनी भी नहीं चाहिए किन्तु इसके साथ-साथ सबसे अहम् बात जो होनी चाहिए वो यह कि यदि ताजमहल प्रेम का स्मारक है, यदि ताजमहल सांस्कृतिक स्मारक है तो वहाँ प्रति शुक्रवार होने वाली मजहबी क्रिया बंद होनी चाहिए. एक तरफ ताजमहल को सभी धर्मों के लोगों के आकर्षण का केंद्र बताया जाता है, प्रेम स्मारक बताया जाता है तो फिर विशेष छूट किसी एक धर्म को मिलना सिद्ध करता है कि ताजमहल उसी मजहब विशेष का स्मारक है. हाँ, यदि किसी कारण से ताजमहल परिसर में नमाज पढ़ने को नहीं रोका जा सकता तो सभी धर्मों के लोगों को अपने-अपने धार्मिक क्रियाकलाप किसी एक दिन संपन्न करने की अनुमति दी जानी चाहिए.  

05 अक्टूबर 2017

दुनिया के अजूबों की सूची में शामिल ताजमहल को लेकर अचानक से एक विवाद खड़ा हो गया. इसकी उत्पत्ति कैसे और कब हुई ये तो विवाद बनाते लोगों के लिए भी पहेली बना हुआ था. इस विवाद के बीच उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में बतौर पर्यटन मंत्री शामिल रीता बहुगुणा ने स्पष्ट किया कि चालू वर्ष 2017-18 में पर्यटन विभाग द्वारा प्रकाशित बुकलेट में ताजमहल का नाम शामिल होने का तात्पर्य यह नहीं कि वह प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में नहीं है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ताजमहल हमारी सांस्कृतिक विरासत है और सरकार उससे जुड़े पर्यटन स्थलों के विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. दरअसल हुआ यह कि पर्यटन विभाग द्वारा हालिया प्रकाशित पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश पर्यटन – अपार संभावनाएं’ में आगरा एवं ब्रज के आसपास के अनेक क्षेत्रों का उल्लेख लिया गया है मगर ताजमहल का उल्लेख उसमें नहीं किया गया है. इसे लेकर कुछ भाजपा-विरोधी तत्त्व सदैव की भांति सक्रिय हो गए. गनीमत रही कि इसी मुद्दे पर किसी ने पुरस्कार की वापसी नहीं की. पर्यटन मंत्री ने स्पष्ट किया कि ताजमहल और उसके आसपास के क्षेत्र के विकास के लिए सरकार की तरफ से 154 करोड़ रुपये की योजनायें स्वीकृत की गई हैं. इन योजनाओं पर अगले तीन महीने में काम शुरू भी हो जायेगा. इसके बाद भी भाजपा-विरोधियों का कुतर्क अभियान अपनी रफ़्तार से सक्रिय है.


इसमें कोई संदेह नहीं कि ताजमहल एक बेजोड़ नमूना है स्थापत्य कला का. ये इमारत हमारे ही देश की अपने समय की परिपक्व स्थापत्य कला का प्रदर्शन करती है. ये और बात है कि देश के इतिहास से खिलवाड़ करने वालों ने इस पक्ष के प्रचार के बजाय इसे प्रेम का स्मारक बनाकर प्रचारित किया. संभव है कि तत्कालीन बादशाह ने इसे अपनी विशेष महारानी के प्रेम-प्रदर्शन के लिए बनवाया हो मगर इसमें भी कोई संदेह नहीं कि ये आज विशुद्ध रूप से इस्लामिल स्मारक के रूप में ही स्थापित है. यदि ऐसा न होता तो प्रति शुक्रवार यहाँ नमाज न हो रही होती. प्रेम के स्मारक के रूप में स्थापित इस इमारत में आखिर किस कारण से नमाज अता की जाती है? यदि ये विशुद्ध प्रेम का स्मारक है तो यहाँ अन्य धर्म वालों के लिए अपने धार्मिक कृत्य करने की मनाही क्यों है? क्या इसमें भी कोई दो-राय है कि जिस तरह से तत्कालीन बादशाह अपनी विलासिता के चलते अपनी कब्रगाहों को भी वैभवता का रूप देते थे, उसे भव्यता से अलंकृत करते थे कुछ ऐसा ही ताजमहल के साथ किया गया. इसमें भी कोई दोराय नहीं होना चाहिए कि मुग़लों ने बहुसंख्यक इमारतों, स्मारकों का निर्माण हिन्दू मंदिरों का ध्वंस करके किया था. आज या फिर आज के पहले जब भी इस पर विवाद हुआ कि ताजमहल का निर्माण भी शिव मंदिर का ध्वंस करके किया गया है तो इसमें विवाद किस कारण?


आखिर किसी एक-दो व्यक्तियों के कहने पर अथवा किसी एक-दो दलों के कहने पर न तो ताजमहल को गिराया जा रहा है और न ही उसको किसी तरह से पर्यटन स्थल से बाहर किया जा रहा है. ये किसी न किसी रूप में ऐसे लोगों की सोची-समझी साजिश है जो आये दिन भाजपा-विरोधी माहौल देश-प्रदेश में बनाये रखना चाहते हैं. यहाँ ऐसे लोगों के साथ-साथ उन लोगों पर भी तरस आता है जो मात्र इतने विचार के सामने आने पर कि ताजमहल का निर्माण किसी शिव मंदिर के ऊपर किया गया है, अनाप-शनाप बकने लगते हैं. क्या सांस्कृतिक दृष्टि से इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि क्या वाकई ये सच है? आज ये एक फैशन सा बन गया है कि हर उस बात का विरोध किया जाना चाहिए जो किसी न किसी रूप में हिन्दू धर्म के, भाजपा के पक्ष में आ रही हो. एक बात सबको याद रखना चाहिए कि आज भले ही ताजमहल वैश्विक दृष्टि से भले ही पर्यटन का प्रमुख केंद्र बना हुआ हो मगर है तो आखिर में एक कब्रगाह ही. और कम से कम हिन्दुओं को किसी दूसरे धर्म के कब्रगाह की चिंता करने के पहले उस जगह की चिंता कर लेनी चाहिए जहाँ उनके पुरखों का अंतिम संस्कार किया गया है.