विपक्षी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विपक्षी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

25 जून 2024

आपातकाल का सच और वर्तमान दौर

भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है. रेडियो पर लगभग आधी सदी पूर्व गूँजी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस आवाज़ ने देश में हलचल मचा दी थी. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत देश में आपातकाल घोषणा किया था. 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह लागू हो गया था. 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में 21 महीने तक आपातकाल लागू रहा. इस कदम को आज भी लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है.

 

आपातकाल की व्यवस्था किसी तरह की असंवैधानिक व्यवस्था नहीं है. देश के संविधान में ही आपातकाल लागू किये जाने की व्यवस्था है. संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है. आपातकाल में नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं. ऐसी स्थिति उस समय व्यवहार में लाई जाती है जबकि सम्पूर्ण देश अथवा किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण, आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था अथवा अस्थिरता आदि जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए. इस तरह की विषम स्थिति में समस्त राजनैतिक और प्रशासनिक  शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं. 1975 के पूर्व वर्ष 1962 तथा वर्ष 1971 में राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था.

 



देश में पहली बार आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 के बीच लगा जबकि उस समय भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. दूसरी बार 3 से 17 दिसंबर 1971 के बीच आपातकाल लगाये जाने का कारण भारत-पाकिस्तान युद्ध था. दोनों स्थितियों में देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए ऐसी घोषणा की गई थी. इन दो वास्तविक विषम परिस्थितियों के सापेक्ष वर्ष 1975 की स्थितियों को देखा जाये तो आपातकाल लागू किये जाने का तार्किक आधार नजर नहीं आता है. बावजूद इसके आपातकाल लागू किया गया. अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ नागरिकों के जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. प्रत्येक मीडिया सेंटर पर सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिया गया. उसकी अनुमति के बाद ही समाचार का प्रकाशन हो रहा था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो रही थी.

 

दरअसल आपातकाल लगाये जाने के पीछे किसी बाहरी शक्ति से खतरा होने से ज्यादा इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता जाने का खतरा दिखाई देने लगा था. 1971 में तत्कालीन भारत-पाकिस्तान युद्ध में जबरदस्त विजय और बांग्लादेश निर्माण के बाद से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इसी के चलते उन्होंने 1971 का लोकसभा चुनाव भी प्रचंड बहुमत से जीतकर विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया था. दरअसल 1971 में बांग्लादेश बन जाने से भले ही इंदिरा गांधी को लोकप्रियता मिली मगर उसके साथ बांगलादेशी शरणार्थियों के आने से देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा. गुजरात और बिहार में इस नकारात्मकता ने आन्दोलन का रूप ले लिया. इन दोनों राज्यों से विद्यार्थियों की जबरदस्त एकजुटता को आन्दोलन की शक्ल में बदलने का काम किया बिहार के जयप्रकाश नारायण ने. उनके नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते हुए आन्दोलन तेज होने लगा. इसके साथ ही इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत में अपनी याचिका में आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. जगह-जगह उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी. इसी से आक्रोशित होकर आपातकाल जैसा कदम उठाया गया.  

 

विगत कुछ वर्षों से विपक्ष द्वारा लगातार प्रचार किया जा रहा है कि वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा आपातकाल जैसी स्थितियाँ पैदा कर दी गई हैं. अभी हाल में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में संविधान बदल देने, आरक्षण समाप्त कर देने, भविष्य में चुनाव न होने देने जैसा दुष्प्रचार किया गया. यहाँ विशेष बात यह है कि 1975 में आपातकाल की नींव रखने वाला दल आज विपक्ष में है और आपातकाल के ज़ुल्मों को सहने वाले सरकार में हैं. ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया के पर्याप्त स्वतंत्र होने की स्थिति में किसी भी प्रचार-दुष्प्रचार का आकलन राष्ट्रीय हितों को देखते हुए किया जाना चाहिए. वर्तमान पीढ़ी के बहुसंख्यक नागरिकों ने आपातकाल में प्रशासन, पुलिस की ज्यादतियों को पढ़ ही रखा है, इसके उलट बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक भी हैं जिन्होंने आपातकाल की क्रूरता को न केवल देखा है बल्कि सहा भी है. ऐसे में उन लोगों, भले ही वे राजनीति में नहीं हैं, का भी दायित्व बनता है कि वर्तमान पीढ़ी को सत्य से परिचित करवाते रहें. आपातकाल के दौर में भुक्तभोगी रही मीडिया को भी यथोचित स्थितियों के सच के साथ सामने आने की आवश्यकता है. यदि लगता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्य, नीतियाँ इस तरह की हैं जो घोषित अथवा अघोषित आपातकाल की पीठिका निर्मित करती हैं, तो उनका मुखर विरोध किया जाना चाहिए. जिस तरह से विगत वर्षों में संसद में पक्ष और विपक्ष की भूमिकाएँ देखने को मिली हैं वे प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती हैं. देश के धन और समय के अपव्यय के बीच समाप्त होते निष्फल संसद सत्रों के बीच घोषित अथवा अघोषित आपातकाल देश को नुकसान ही पहुँचायेगा.   


06 जून 2024

लोकसभा चुनाव परिणाम पश्चात् विपक्ष

लोकसभा चुनाव का अंतिम परिणाम सामने आ चुका है. पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने दावों-वादों से कहीं अलग इस बार का चुनाव परिणाम सामने आया है. भाजपा के चार सौ पार के नारे ने असर न दिखाया तो गठबंधन के दावे कि चार जून को नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे ने भी असर न दिखाया. देश-प्रदेश स्तर पर चुनावी स्थितियाँ अलग रहीं और उसी के हिसाब से परिणाम भी सामने आये. चुनाव परिणामों ने कहीं ख़ुशी का माहौल बनाया तो कहीं दुःख भी प्रकट हुआ. इसमें सबके अपने-अपने भाव, अपनी-अपनी मानसिकता ने भी काम किया.

 



लोकसभा के चुनाव में परिणाम क्या रहा, किसे सत्ता मिली, कौन विपक्ष में रहा ये एक अलग विषय है मगर इस बार सबसे ज्यादा प्रभावी विषय यही रहा कि किसी भी भाजपा-विरोधी दल द्वारा ईवीएम को दोषी नहीं बताया गया. कहीं के चुनाव परिणामों के चलते इस पर आरोप नहीं लगाया गया, केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया गया. ईवीएम को हैक करने जैसी किसी भी खबर ने कहीं भी स्थान नहीं पाया. इससे साफ़ समझ आता है कि भाजपा-विरोधी दल विगत दस सालों में किस कदर बौखलाए हुए हैं. तमाम तरह की जुगत बिठाने के बाद भी वे सत्ता हासिल नहीं कर पा रहे हैं. सत्ता तो बहुत दूर की बात है, विगत दो बार से वे लोकसभा में सदन के भीतर अपना नेता सदन नहीं बना पा रहे हैं. इसका एकमात्र कारण नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने के लिए आवश्यक मतों का न मिल पाना रहा है. इसी तरह से लोकसभा उपाध्यक्ष पद भी खाली बना रहा. सामान्य सी मान्यता है कि सत्ता पक्ष को लोकसभा अध्यक्ष का और विपक्ष को लोकसभा उपाध्यक्ष का पद प्रदान किया जाता है. विपक्ष की स्थिति इस तरह की बनी रही कि लोकसभा उपाध्यक्ष का पद भी खाली बना रहा.

 

यहाँ अब विशेष ये होगा कि तमाम दलों द्वारा जो गठबंधन सरकार बनाने के लिए, खुद को सत्ता में लाने के लिए किया गया था क्या वही गठबंधन विपक्ष में होने के बाद सदन को चलने देगा? विगत वर्षों की तरह सदन के सञ्चालन में व्यवधान उत्पन्न करके देश का धन बर्बाद करने की उनकी मंशा तो इस बार भी नहीं है?


02 अप्रैल 2019

भाजपा की लड़ाई खुद से है


चुनावी चर्चाएँ अब अपने चरम पर हैं. घोषणा-पत्र से लेकर आम आदमी तक के विचार अब सड़क पर टहलते दिखाई दे रहे हैं. राजनैतिक मंच हो या फिर चाय की दुकान, सभी जगह राजनीति की चर्चा ही दिख रही है. आश्वस्त होने के बाद भी आश्वस्त न समझ आना भी बहुत बड़ी स्थिति है इस समय. ऐसा लगभग सभी दलों में दिख रहा है. सत्तासीन भाजपा सहित अन्य सभी दलों में विभ्रम की स्थिति दिखाई दे रही है. भाजपा जहाँ अपने विकास के नारे के साथ मोदी के नाम पर स्वयं को निर्भर मान बैठी है वहीं कांग्रेस सहित अन्य दल अपने-अपने क्षेत्रों पर अपनी निर्भरता बनाये हुए हैं. राष्ट्रीय स्तर के दल कांग्रेस की स्थिति भी वर्तमान में किसी क्षेत्रीय दल की तरह रह गई है या कहें कि वह उसी तरह का व्यवहार करने में लगी है. यदि ऐसा न होता तो वह उत्तर प्रदेश में अपने से कमतर दलों के सामने गठबंधन जैसी स्थिति को दोहराने में न लगी होती. इससे पहले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में दो युवाओं का साथ पसंद आने के नारे लगाये जा रहे थे मगर लोकसभा तक आते-आते ये पसंद बदल गई.


जैसे कि हालात दिखाई दे रहे हैं, उसमें लगभग सभी जगह भाजपा के साथ ही बाकी दलों का संघर्ष है. इसके उलट देखा जाये तो भाजपा का संघर्ष अपने आपसे ही है. किसी भी प्रदेश में नजर घुमाई जाए तो वहां भाजपा की लड़ाई किसी दूसरे राजनैतिक दल से नहीं है, वह किसी न किसी रूप में अपने आपसे ही लड़ रही है. भाजपा के कार्यकर्ताओं में मोदी जी के नाम पर उत्साह है मगर स्थानीय प्रतिनिधित्व के नाम पर जबरदस्त गुस्सा है, जबरदस्त नाराजगी है. ऐसा किसी एक-दो जगहों में नहीं, किसी एक-दो राज्यों में नहीं वरन बहुसंख्यक जगहों पर है. ऐसे में भाजपा के लिए सहजता से वर्तमान लोकसभा चुनाव जीतना भले ही असंभव न हो पर कठिन अवश्य है. इस कठिनता को दूर करना भाजपा नेतृत्व का कार्य होना चाहिए मगर इस काम को विपक्षी करते नजर आते हैं, गैर-भाजपाई करते नजर आते हैं. ये सिर्फ इस चुनाव की बात नहीं है विगत कई चुनावों के समय की स्थितियों का आकलन किया जाये तो आसानी से समझ आता है कि बहुत से चुनाव भाजपा ने अपनी सशक्तता के कारण नहीं जीते हैं वरन विपक्ष की, विरोधियों की गलतियों के कारण जीते हैं. कुछ इसी तरह का काम भाजपा-विरोधी इस चुनाव में भी कर रहे हैं. आये दिन की उलटी-सीधी बयानबाजी, आये दिन किसी न किसी तरह की नौटंकीयुक्त हरकतें, आये दिन की कोई न कोई देश-विरोधी गतिविधि. ऐसे में मतदान के प्रति स्पष्ट राय न बना सके मतदाता स्वतः ही भाजपा के राष्ट्रवाद की तरफ मुड़ जाते हैं. ऐसे मतदाताओं को विगत वर्षों के कार्यों के सापेक्ष पिछली सरकारों के कारनामों का तुलनात्मक अध्ययन करने का मौका मिल जाता है. 

भले ही विपक्षियों द्वारा, विरोधियों द्वारा भाजपा को मौका दे दिया जाता हो मगर इस चुनाव में भाजपा नेतृत्व को पहले की अपेक्षा ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता है. इसके पीछे जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, दूसरे दलों के आये हुए नए-नए लोगों को टिकट दे देना, बहुसंख्यक भाजपा जनप्रतिनिधियों का जनता से जुड़ाव न बनाये रखना, मीडिया द्वारा केन्द्रीय नेतृत्व के प्रति नकारात्मक खबरों का प्रसारण करना आदि भी है. ऐसे में भले ही वर्तमान में देश के मतदाताओं के सामने केन्द्रीय स्तर पर अभी मोदी के अलावा कोई और विकल्प नहीं दिखाई दे रहा हो मगर ऐसी सोच में कार्यकर्ताओं की नाराजगी नकारात्मक स्थिति ला सकती है. चूँकि अभी मतदान का आरम्भ नहीं हुआ है, ऐसे में भाजपा नेतृत्व को ज्यादा सक्रियता से, ज्यादा गंभीरता से विचार करने की, कार्य करने की आवश्यकता है.

03 मार्च 2019

क्षुद्र मानसिकता से संचालित विरोधी


विरोध और विरोधी विचारधारा का होना किसी भी प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्द्धा के लिए आवश्यक होता है. बिना इसके कोई प्रतियोगिता अथवा प्रतिस्पर्द्धा सफलता से संचालित नहीं हो सकती है. कुछ इसी तरह की स्थिति लोकतान्त्रिक व्यवस्था में, राजनीति में भी होती है. लोकतंत्र की सफलता के लिए, व्यवस्थित और सशक्त लोकतंत्र के लिए विरोधियों का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है. यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका अर्थ है कि या तो लोकतंत्र बीमार हो गया है अथवा जनता में, लोकतंत्र के सञ्चालन करने वालों में वैचारिकी का अभाव हो गया है. किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के सञ्चालन के लिए राजनीति उसका प्रमुख अंग है. बिना राजनीति के किसी भी संस्था का, किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का एक कदम आगे बढ़ना संभव नहीं हो सकता है. आज के दौर में जबकि सम्पूर्ण विश्व एक क्लिक पर सबके साथ जुड़ा हुआ है तब बिना राजनीति के न तो व्यक्तियों का विकास संभव है, न समाज का और न ही देश का. विकास की इस प्रक्रिया के लिए आवश्यक है कि लोकतंत्र के सभी घटकों में वैचारिक विभेद बना रहे. इस विभेद के चलते ही नए विचारों की उत्पत्ति होती है, नए-नए सूत्रों का उदय होता है, विकास की नवीन प्रक्रिया का रास्ता सुलभ होता है. 


इधर कुछ समय से देखने में आ रहा है कि देश में राजनैतिक रूप से विरोध की स्थिति नकारात्मक होती चली जा रही है. सत्ता पक्ष और विपक्ष का विरोध तो सदैव से रहा है. यहाँ किसी एक दल को संदर्भित किया जाना उद्देश्य नहीं है. आज जो दल सत्ता में है जब वह विपक्ष में था तो उसके द्वारा तमाम सारे बिन्दुओं का विरोध किया गया था, किया जाता था मगर सत्ता में आने के बाद उन्हीं सारी प्रक्रियाओं का सञ्चालन उसे भी करना पड़ा. सत्ता में आने के बाद उसे भी उन्हीं समस्याओं से जूझना पड़ा जिनसे कि तत्कालीन सत्ता पक्ष जूझ रहा था. बहरहाल, राजनीति में यह संघर्ष सदैव से चलता रहा है, चलता रहेगा किन्तु अब देखने में आ रहा है कि इस वैचारिक विरोध के बीच से स्वस्थ मानसिकता समाप्त होती जा रही है. वर्तमान में देश के लगभग सभी सत्ता-विरोधी दलों का एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से सत्ता पक्ष को बदनाम करना है. इसके लिए विरोधी किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं. विद्रूपता तो तब हो गई जबकि राजनैतिक रूप से विरोधी माने जाने वाले दल केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करते-करते देश का, सेना का, सैनिकों का विरोध करने लगे. यह स्थिति तब भी सहन करने वाली होती यदि इसे महज राजनैतिक विरोध के रूप में देखा-समझा जाता मगर ऐसा नहीं हुआ. राजनीति में सबकुछ अपने पक्ष में करने की मंशा से, सिर्फ और सिर्फ सत्ता पाने की लालसा में इन लोगों ने सेना पर, सैनिकों पर ही सवाल खड़ा कर दिया. 

बहुत पुरानी बातें न करके अभी हाल की घटनाओं पर नजर डालें तो लगता है कि यदि देश का सञ्चालन वाकई इनके हाथों में चला गया तो ये क्या-क्या न कर गुजरेंगे. पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सीमा में घुसकर उसके आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया. इस कार्यवाही से बौखलाए पाकिस्तान ने दूसरे दिन भारत की तरफ अपने विमान दौड़ाए मगर हमारी चौकन्नी सेना के चलते वह किसी तरह की वारदात को, हमले को अंजाम नहीं दे सका. पाकिस्तान का एक विमान मार गिराया गया वहीं हमारा एक जांबाज़ विंग कमांडर उनकी गिरफ्त में आ गया. इधर सम्पूर्ण देश उस वीर की सुरक्षित वापसी के लिए मनोकामना कर रहा था वहीं विरोधी दल एक महिला को उसी वीर विंग कमांडर की पत्नी बताते हुए वीडियो ज़ारी करवा रहे थे. इसके साथ-साथ ऐसी ही विकृत सोच वालों  की तरफ से एक वीडियो और वायरल किया गया जिसमें दिखाया गया कि कैसे भारत वापसी के ठीक पहले विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तानी सैनिकों के साथ डांस कर रहे हैं, खुश हैं. इन दो वीडियो को न केवल विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं, समर्थकों द्वारा शेयर किया गया बल्कि कई दलों के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों द्वारा भी शेयर किया गया. बिना इस शर्म-लिहाज के कि एकदम झूठे वीडियो भारतीय जनता के बीच शेयर किये गए. यह दिखाया गया कि कैसे सरकार गलत बातें कर रही है, दिखाने की कोशिश की गई कि कैसे दुश्मन देश में बंद हमारा सैनिक प्रसन्न है, नाच रहा है.


ये समझने वाली बात है कि पड़ोसी देशों से मित्रता अच्छी बात है. यह भी सभी लोग मानते हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं मगर जब देश में इस तरह का संकट बना हो तब विरोधी दलों द्वारा बजाय सरकार का साथ देने के इस तरह की घिनौनी हरकत की जा रही है. सेना द्वारा की गई एयरस्ट्राइक के सबूत मांगे जा रहे हैं. आतंकियों के मारे जाने पर भी सन्देश व्यक्त किया जा रहा है. पुलवामा हमले को आतंकी घटना समझने के बजाय इसे चुनावी लाभ के लिए सत्ता पक्ष द्वारा करवाया गया हमला साबित करने के प्रयास किये जा रहे हैं. देखा जाये तो देश बहुत ही गहरे संकट से गुजर रहा है, जहाँ एक तरफ सीमा पार दुश्मन हैं वहीं देश की सीमा के अन्दर ही ऐसे न जाने कितने दुश्मन हैं जो आपातकाल में दुश्मन से भी ज्यादा घातक सिद्ध हो सकते हैं. विरोध की इतनी निकृष्ट मानसिकता के द्वारा, इतनी क्षुद्र सोच के द्वारा सबकुछ किया जा सकता है, मगर न तो राजनीति की जा सकती है, न देश का भला किया जा सकता है, न सेना का, सैनिकों का, नागरिकों का सम्मान किया जा सकता है.  

25 जून 2018

आपातकाल : भारतीय इतिहास का काला अध्याय


25 जून, भारतीय सन्दर्भों में, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में यह मात्र एक तारीख भर नहीं है. इस तारीख का अपना ही एक इतिहास है, जिसे आज काले अध्याय के रूप में देखा-जाना जाता है. 25 जून 1975 की रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की नींव रखी. अगले दिन सुबह-सुबह रेडियो के द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा हो गई. सुबह छह बजे इंदिरा गाँधी ने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया. बैठक के तुरंत बाद ही इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर अपने भाषण के द्वारा आपातकाल लगाये जाने की जानकारी देश को दी. उस समय फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्‍ट्रपति थे. कैबिनेट की बैठक में आपातकाल के प्रस्‍ताव को स्वीकृति मिल चुकी थी. उस पर अंतिम मुहर राष्‍ट्रपति को लगानी थी. इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर ने राष्‍ट्रपति भवन पहुँच राष्‍ट्रपति को देश के हालात के बारे में अवगत कराया और आपातकाल की उपयोगिता बताई. इसके बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी. यह अपने आपमें विचित्र स्थिति है कि आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई बाद में उस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. आपातकाल के बाद देश भर में गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हुआ. खास बात यह रही कि महज तीन नेताओं की गिरफ़्तारी की इजाजत नहीं दी गई थी. ये तीन नेता तमिलनाडु के कामराज, बिहार के जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एसएम जोशी थे.


आपातकाल लगाये जाने के पीछे उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का एक आदेश था. 12 जून 1975 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया. उन पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसे चौदह आरोप लगे थे. यह मामला राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद दर्ज कराया था. इस फैसले के बाद इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा देने से इन्कार करते हुए फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के इस आदेश को बरकरार रखा. यह आदेश 24 जून 1975 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने दिया. इसके बाद इंदिरा गाँधी ने आपातकाल का सहारा लेकर राजनैतिक विरोधियों को नियंत्रण में लेने का प्रयास किया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई. इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया. प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया था. उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया. जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था. 


आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गाँधी के राजनैतिक विरोधी और अधिक सक्रिय हो गए. विरोध की लगातार बढ़ती तीव्रता के कारण लगभग दो साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं. संसद में कांग्रेस 153 पर सिमट गई और केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली. नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया. अपने अंदरूनी मतभेदों के कारण 1979 में जनता सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने तक ही चल सकी. इस सरकार में चौधरी चरण सिंह एक दिन के लिए भी संसद न जा सके. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया.

वैसे देखा जाये तो देश में आंतरिक अशांति का खतरा होने पर, किसी बाहरी देश के आक्रमण होने पर अथवा वित्तीय संकट की स्थिति दिखाई देने पर आपातकाल लगाया जा सकता है. देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का सहा था. 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच का आपातकाल विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था, जिसे आंतरिक अशांति के नाम पर अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था.

24 सितंबर 2017

निम्नतर मानसिकता का विरोध

एक पत्रकार की हत्या होती है और देश भर में एकदम से आक्रोश दिखाई देने लगता है. लोग सड़कों पर उतर आते हैं. चौराहों पर मोमबत्तियाँ जलाई जाने लगती हैं. बड़े-बड़े चैनल, नामधारी पत्रकार संगठित होने लगते हैं, प्रमुख राजनैतिक व्यक्तित्व अपना निर्णय सा सुनाने लगते हैं. बहुतेरे लोग इस हत्या को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताते हैं. कुछ लोगों के लिए यह लोकतंत्र की हत्या कही जाने लगती है. यह सब देख सुनकर लगने लगता है कि क्या देश में वाकई लोकतान्त्रिक व्यवस्था शेष रही भी है या नहीं? इन सबका विलाप सुनकर मन द्रवित हो उठता है और एहसास होने लगता है कि वाकई देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी है ही नहीं. यहाँ बोली का जवाब गोली से दिया जाने लगा है. अभी इस तरह के अनजाने डर से खुद को बाहर निकाल भी न पाए थे कि एक और पत्रकार की हत्या हो जाती है. अबकी मारे जाने वाला पत्रकार अपने पीछे किसी तरह का हंगामा नहीं खड़ा कर पाता है. कोई बड़ा राजनैतिक व्यक्ति उसके समर्थन में आकर बयान नहीं देता है. किसी मीडिया संस्थान की तरफ से कोई प्रदर्शन नहीं किया जाता है. चौराहों पर इकट्ठा होकर नारेबाजी करने, मोमबत्तियाँ जलाने वाले कहीं गायब नजर आते हैं. देश से और न ही विदेश से कोई आवाज़ उठती है कि अब भी देश में बोली का जवाब गोली से दिया जा रहा है. दिमाग भन्ना जाता है कि आखिर हम सब किस युग में जी रहे हैं? क्या हम सबकी इंसानियत महज राजनैतिक विचारधाराओं में ही सिमट कर रह गई है?


मन-मष्तिष्क में उठते अनेक तरह के सवालों के बीच जब दोनों घटनाओं का और अतीत में घटित कई-कई घटनाओं का आकलन करते हैं तो पता चलता है कि विरोध की राजनीति ने, भाजपा-विरोध की राजनीति ने सभी तरह की मानवता का ह्रास कर दिया है. इस विरोध की राजनीति में किसी समय देश की राजनीति का मुख्य केंद्रबिन्दु रहा राजनैतिक दल और उसके तमाम पदाधिकारी हैं. उनका संगठित स्वरूप सिर्फ और सिर्फ भाजपा को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. उनके साथ इस खेल में वे वामपंथी ताकतें भी शामिल हैं जो विगत कई दशकों के बाद भी जनमानस के बीच अपनी स्वीकार्यता नहीं बना सकी हैं. इन विरोधी शक्तियों को और ताकतवर बनाने का काम कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियों द्वारा भी किया जा रहा है. इन सबका आंतरिक उद्देश्य किसी न किसी तरह केंद्र सरकार को, भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. यदि ऐसा न होता तो गौरी लंकेश हत्या के मामले में चंद मिनट बाद ही आरोप न लगाया जाता कि इस हत्या में हिन्दुवादी ताकतों का, संघ का हाथ है. बिना आगापीछा सोचे तमाम बड़े मीडिया संस्थानों द्वारा, मीडिया के बड़े नामों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा. देश को अलोकतांत्रिक बताया जाने लगा. यदि इन लोगों को वाकई देश की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई अभिव्यक्ति की आज़ादी की चिंता होती तो इनके वही विरोधी मुखर स्वर शांतनु चौधरी की हत्या के बाद भी उभरने चाहिए थे. चिंता की बात तो ये रही कि इस युवा पत्रकार की हत्या पर ऐसा कुछ न हुआ. किसी भी गैर भाजपाई राजनैतिक दल की तरफ से, किसी भी मीडिया संस्थान की तरफ से इस युवा पत्रकार की हत्या पर दो शब्द भी नहीं कहे जा सके.

असल में आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस हो या फिर अस्तित्व की खोज में लगी अनेक कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां हों, सबका एकमात्र उद्देश बजाय अपने को स्थापित करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करना है. इसी के चलते उनके द्वारा अकसर भाषाई संयम खो दिया जाता है. इस भाषाई संयम खोने का उदाहरण कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और कभी मंत्री रहे मनीष तिवारी के रूप में देखा जा सकता है. देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का चौथा स्तम्भ मानने वाले पत्रकार भी इस भाषाई संयम को खोने में पीछे नहीं दिखे. ये सारे लोग किसी भी रूप में इस बात को आज भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा केंद्र में सत्तासीन होने के साथ-साथ अनेक राज्यों में अपनी सत्ता जमा चुकी है. वे सब ये भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस नरेन्द्र मोदी के पीछे सभी साजिशन विगत एक-डेढ़ दशक से पड़े हुए थे, उस व्यक्ति को किसी भी मामले में दोषी सिद्ध न कर सके. उनको ये स्वीकार नहीं हो पा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने न केवल निर्विवाद रूप से सत्ता प्राप्त की वरन लगातार अपनी छवि को भी परिष्कृत किया है. जिस तरह की वोट-बैंक की राजनीति विगत कई दशकों से देश की धुरी बनी हुई थी, मोदी ने उसे दरकिनार करते हुए विकासपरक राजनीति को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया. गैर-भाजपाई मानसिकता वाले दलों, व्यक्तियों, मीडिया संस्थाओं के लिए ये स्वीकार कर पाना अत्यंत दुष्कर होता जा रहा है कि देश के आम जनमानस ने प्रधानमंत्री की अनेक योजनाओं में न केवल उनका समर्थन किया वरन एकाधिक बार उन कठिन परिस्थितियों में भी उनका समर्थन किया जबकि लगने लगा था कि जनमानस विरोध करेगा.


देश के सामने कांग्रेस अथवा अन्य दूसरे दल अपनी मानसिकता के चलते, हिन्दू-विरोधी रवैये के कारण विश्वास जगा नहीं सके. इसी के साथ-साथ समय-समय पर उनके द्वारा उठाये गए पूर्वाग्रही कदमों ने भी जनमानस के मन-मष्तिष्क से इन दलों के प्रति, व्यक्तियों के प्रति विरोधी वातावरण तैयार किया. इस वातावरण को और पुख्ता करने का काम इन्हीं दलों, व्यक्तियों ने समय-समय पर किया. अशालीन, अशिष्ट बयानबाज़ी के चलते भी ये लोग अनजाने ही नरेन्द्र मोदी के पक्ष में, भाजपा के पक्ष में माहौल बनाते नजर आये. कुछ ऐसा ही अब रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में दिख रहा है. समझने वाली बात है कि आखिर किसी देश से उनको क्यों भगाया जा रहा है? उनके उस सम्बंधित देश से भागने या भगाए जाने का कारण क्या है? उनको देश में शरण देने के क्या औचित्य हैं? बिना सोचे-समझे सिर्फ मुसलमान होने के नाते रोहिंग्या लोग देश में शरणार्थी नहीं बनाये जाने चाहिए. एक सवाल उनका समर्थन करने वालों से कि आखिर यदि उनके प्रति मानवाधिकार का मुद्दा नजर आ रहा है, संवेदना दिखाई दे रही है तो ऐसा कुछ कश्मीरी हिन्दुओं के पलायन करते समय क्यों नहीं दिखा? तब न सही तो अब क्यों नहीं दिख रहा है? आखिर वे तो किसी दूसरे देश के नहीं, इसी देश के नागरिक हैं, जिस देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सही करने का स्वयंभू ठेका ये राजनेता, मीडिया संस्थान लेते नजर आते हैं. 

++
उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, 23 सितम्बर 2017 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.