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25 जून 2013

ये आपदा सीख भी देती है



उत्तराखंड की आपदा, केदारनाथ की तबाही से प्रभावित इंसानों ने अपना बहुत कुछ गंवाया है, अपने परिवार को खोया है. वहां रह रहे लोगों ने एक तरह से अपने वजूद को भी गंवाया है. हर गलती इन्सान को कुछ न कुछ सीखने का अवसर देती है. हर संकट से बाहर निकलने के रास्ते मिलते हैं, संकट से लड़ने की शक्ति मिलती है. इस आपदा से भयंकर जन-धन की तबाही हुई है और कहीं न कहीं इस बात को मानने से संकोच नहीं करना चाहिए कि ये आपदा मानवजनित अधिक है. हम सब भले ही इसके लिए बादलों के फटने को, घनघोर बारिश को, नदियों के तेज बहाव को दोष दें किन्तु असल सत्य यही है कि हम इंसानों ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि इस तरह की आपदाएं आने वाले वर्षों में आम हो जाएँगी. हाल-फ़िलहाल तो राहत कार्य, बचाव कार्य चल रहे हैं और हम सभी को भी अभी उसी की पूर्ण सफलता के प्रयास करने चाहिए पर ये आपदा कहीं न कहीं हम इंसानों के लिए एक तरह की सीख लेकर आई है. यदि हमने कुछ सीखने की कोशिश की तो ये हमारी जागरूकता होगी अन्यथा की स्थिति में आने वाले वर्षों में हमें और भयावह अवसरों का सामना करना पड़ेगा.
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हमें आगे के लिए अपनी योजनाओं, अपनी परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है. अपने मकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, होटलों आदि के निर्माण के समय इस बात का ध्यान दिया जाए कि प्राकृतिक असंतुलन न होने पाए. हमारे किसी भी कदम से नदियों के बहाव में अड़चन पैदा न हो, नदियों की प्राकृतिकता नष्ट न हो. जो लोग पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं वे इस बात का ख्याल रखें कि उनके विकास कार्य पहाड़ों को अस्थिर न बनाते हों. इनके अलावा और भी तमाम कार्य ऐसे हो सकते हैं जिनके उठाये जाने से हम प्राकृतिक असंतुलन को रोक सकते हैं. ये सावधानी भरे कदम इन्सान के लिए तो हैं ही, सरकारों को भी इस तरफ मुस्तैदी और ईमानदारी से विचार करने की जरूरत है.
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इसके अलवा एक और अहम सीख, जो हमारी नज़रों में, मिली कि धन के पीछे अंधाधुंध रूप से भागना भी इन्सान को बंद करना चाहिए. तमाम कहानियां केदारनाथ के दर्द से बाहर आईं, जिनके द्वारा पता लगा कि लोगों के लाखों रुपये, लाखों की संपत्ति उनके किसी काम न आ सकी. बैंक में जमा लाखों धन की निकासी के लिए काम आने वाले एटीएम निर्जीव से बेकाम वहीं मलबे में पड़े रहे. लोगों को एक-एक रोटी के लिए अपने जेवरातों को मिटटी के मोल देना पड़ा. उस विभीषिका में काम आई तो लोगों की सहानुभूति, लोगों का सहयोग, लोगों की मंगल कामनाएं, दान देने की प्रवृत्ति. भौतिकतावादी होने का अर्थ ये नहीं होना चाहिए कि हम धन को अनिवार्य समझ लें, हाँ, ये आवश्यक हो सकता है पर अनिवार्य नहीं.
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रिश्तों, सहयोग, जनभावना, संवेदनशीलता को इस आपदा ने अवश्य ही सिखाया होगा. ये अपवाद स्वरुप जरूर हो सकता है कि कुछ स्वार्थी ताकतों ने ऐसे समय में भी लूटमार की, सामानों को बहुत अधिक कीमत पर बेचा किन्तु देश भर से मदद को उठे हाथ, जवानों का बेख़ौफ़ जमे रहना, आम आदमी का भी सहायता को सामने आना आदि ऐसी घटनाएँ हैं जिनको सीखा जा सकता है. ये सत्य है कि इस भीषण आपदा को शायद ही कभी भुलाया जा सके किन्तु इस आपदा के पीछे से आती सीख को यदि हम आत्मसात कर सकें तो संभव है कि आने वाली पीढ़ी को हम स्वस्थ समाज दे सकें.
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20 जून 2013

अब भी न संभले तो रोज आएँगी ऐसी आपदाएँ



ऐसा लग रहा है जैसे हमारे देश में प्राकृतिक आपदा पहली बार आई हो. सभी चिंतातुर हैं, मीडिया से लेकर समाजसेवी तक, राजनेता से लेकर आम आदमी तक किन्तु कुछ सीखेंगे नहीं. जिस-जिस के हाथ में कैमरा है, जिस-जिस के पास इंटरनेट है, जिस-जिस के सामने टीवी खुला हुआ है वो ‘सबसे पहले हमने’ की तर्ज़ पर विनाशकारी मंज़र की फोटो चिपकाने में लगा हुआ है. हम भारतवासी लगभग प्रतिवर्ष इसी तरह की विभीषिका से दो-चार होते रहते हैं, इसके बाद भी ‘जैसे कुछ हुआ ही न हो’ के अंदाज़ में प्रकृति से खिलवाड़ करने लगते हैं. आज ऐसा लग रहा है जैसे बाढ़ का आना कोई विभीषिका नहीं, कोई पर्व हो गया हो. ऐसे विनाशकारी हालात में भी बहुत से लोग हैं जो मानवता को छोड़ व्यापार को, अपने लाभ को ज्यादा महत्त्व देने में लगे हैं. (समाचारों के द्वारा ज्ञात हुआ कि स्वार्थपरक लोग विपदा में फंसे लोगों की मजबूरी का लाभ उठाकर अधिक मूल्य पर सामान उपलब्ध करवा रहे हैं) 
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कुछ दिनों सभी का केंद्रबिंदु बना रहेगा ये तबाही का मंज़र, कोई लाशों की चर्चा करेगा, किसी के पास नेताओं की बुराई की बातें होंगी, कोई वहां की अव्यवस्था की बात करेगा, किसी की जुबान पर सेना के साहसिक कदमों की तारीफ होगी...और कुछ दिन के बाद इस तबाही को, इसके पीछे के कारणों को बिसरा दिया जायेगा.
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विकास की अंधी दौड़ में इन्सान इस कदर शामिल है कि वो भूल जाता है कि उसके कदम एक तरफ भले ही विकास ला रहे हों किन्तु दूसरी तरफ विनाश को भी आमंत्रण दे रहे हैं. लगातार काटे जाते वृक्ष, महंगे इमारती पत्थरों की तृष्णा में पहाड़ों को काटकर साफ़ कर देना, लकड़ी की चाह में जंगल के जंगल मिटा देना, बालू की जबरदस्त मांग के चलते नदियों में जगह-जगह सैकड़ों मीटर गहरे गड्ढे करके नदियों के पानी को अवरुद्ध कर देना, इमारतें बनाने के लालच में नदियों-नालों की जमीन पर कब्ज़ा करके उनके प्रवाहमार्ग को संकरा कर देना आदि-आदि वे लालची कदम हैं जो पल-पल इन्सान को विनाश की तरफ ले जा रहे हैं.
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ये बात सभी को समझना चाहिए, उन्हें भी जो अपने-अपने घरों में सुरक्षित हैं, उन्हें भी जो इस विपदा से बचकर सुरक्षित अपने-अपने ठिकानों को लौटने लगे हैं, उन्हें भी जो समझते हैं कि इस तरह की कोई प्राकृतिक आपदा उनके आसपास फटक नहीं सकती, कि यदि विकास की गति इस तरह से प्रकृति को नज़रंदाज़ करके होती रही तो इस तरह की आपदाएं आये दिन हमारे सामने प्रकट हो जाया करेंगी. 
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22 मई 2011

अगले जनम मोहे हिन्दू न कीजो -- व्यंग्य -- कुमारेन्द्र


चलते-चलते सोचा-विचारी हो रही थी कि उस जगत के सर्वशक्तिमान का फरमान चारों ओर गूँजने लगा कि जल्द ही पृथ्वीलोक को बसाया जाना है। सभी को वहाँ जाना जरूरी है, हाँ इतनी छूट है कि अपने-अपने विकल्प दे दें कि किस देश में पैदा किया जाये........। हमने आगे के फरमान को नहीं सुना और दौड़कर सर्वशक्तिमान के दरवार में पहुँच गये। देखा वहाँ महाराज की बजाय महारानियों का जमावड़ा था। कोई इंग्लैण्ड से, कोई अमेरिका से, कोई श्रीलंका से, कोई पाकिस्तान से, कोई दिल्ली से, कोई उत्तर प्रदेश से, कोई तमिलनाडु से, कोई पश्चिम बंगाल से। हमें लगा कि भारत का बहुमत है अपना ही देश माँग लिया जाये पर तभी दिमाग में धार्मिक लहर जोर मार गई। हमने चिल्ला कर कहा-‘‘महारानियो जो भी देश देना हो दे देना पर अगले जनम मोहे हिन्दू धर्म में पैदा न करना। इस धर्म में सिवाय ढोंग के, नाटक के, छल-प्रपंच के, भेदभाव के कुछ नहीं होता....हमें हिन्दू धर्म के अलावा किसी भी धर्म में पैदा कर देना। चाहे ईसाई धर्म में जिसने प्रलय की घोषणा कर उसको सच्चाई में बदल दिया चाहे मुस्लिम धर्म में जिसकी धार्मिक कट्टरता के कारण कभी भी फाँसी की सजा नहीं मिल सकती चाहे.....।’’


चित्र गूगल छवियों से साभार


‘‘बस...चुपचाप रहो हिन्दू...ये तुम्हारा मन्दिर नहीं, तुम्हारा समाज नहीं, तुम्हारा देश नहीं कि कुछ भी बकवास करते फिरो। यहाँ सब नियम से, समय से होता है। समय आया, नियम बना तो प्रलय आ गई, समय आ जाता, नियम बन जाता तो फाँसी भी हो जाती।’’ महारानियों की कड़क आवाज का गूँजना था कि कई सारे दिग्गी टाइप सिपहसालार खड़े हो गये। हमने मौन लगा जाना ही बेहतर समझा। होंठ बन्द, जुबान खामोश किन्तु मन फिर भी कह रहा था कि अगले जनम मोहे हिन्दू कीजो।


इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.....




14 मार्च 2011

जापान की प्रलयंकारी घटनाएँ सबक हैं---कुछ सीख लो अब तो


सम्भवतः
यह ऐसा विषय नहीं है जिस पर किसी तरह से लिखने की हिम्मत इस समय हो पा रही है। जापान में आई प्रलयकारी स्थितियां किसी भी व्यक्ति को व्यथित कर सकती हैं। पहले भूकम्प की मार उसके तुरन्त बाद ही सुनामी का कहर और अभी एक ही दिन बीता था कि ज्वालामुखी के फटने की खबर। यह सब प्रलय का ही संकेत दे रहीं स्थितियां हैं। इस बात को मीडिया द्वारा प्रचारित वर्ष 2012 के धरती के विनाश से कदापि न जोड़ा जाये।

भूकम्प
और सुनामी से जो नुकसान जापान को हुआ है उससे डरे सहमे लोग इस बात को लेकर ज्यादा सशंकित थे कि उनके परमाणु रियेक्टर आज दोपहर तक सुरक्षित समझे जा रहे थे। दोपहर बाद तो जापान की ही नहीं अपितु समूचे विश्व की नींद उड़ गई जब समाचारों में देखा कि वहां के तीन परमाणु रियेक्टर खराब हो गये हैं। हद तो तब हो गई जबकि यह भी समाचार मिला कि 25 लोग रेडियेशन की चपेट में आ गये हैं।


परमाणु तबाही को साक्षात झेल चुका और किसी न किसी रूप में अभी तक झेल रहा जापान इस बात को भली-भांति समझता है कि परमाणु रियेक्टर के खराब होने का अर्थ क्या है। भूकम्प-सुनामी से तबाही को सहने के बीच संभलने की जापान की कोशिशों को झटका तो लगा ही होगा कि इस झटके को वहां के ज्वालामुखी ने और भी तीव्र बना दिया। दो-दो तरह से तबाही को देखने के बाद अब जापानवासी 4 किमी तक उठते घुंए के बादलों को देख रहे हैं।

इस
तरह की तबाही इंसान को कुछ सिखा पायेगी अथवा नहीं यह तो काल के गर्भ में है पर एक बात तो तय हो गई है कि बार-बार चेताने के बाद भी इंसान ने स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने का भ्रम नहीं छोड़ा और इसका परिणाम आम आदमी ही भोग रहा है। किसी भी रूप में शक्तिशाली बनने की होड़ और उस पर हथियारों का, परमाणु का सहारा लेकर विश्व-सत्ता पर कब्जा जमाने वाली ताकतों को इन घटनाओं से कुछ सीखना होगा।



भूकम्पों को देखते-सहने का आदी हो चुका जापान तकनीकों को विकसित भी कर चुका था किन्तु प्रकृति की विनाशलीला से निजात पा लेना किसी व्यक्ति के वश की बात नहीं है, यह सिद्ध फिर से हो गया है। हथियारों की दम पर, परमाणु बमों के जोर पर समूचे विश्व में दादागीरी दिखाने का दम्भ भरने वाले देशों को इससे सबक मिलेगा और बात-बे-बात तीसरी दुनिया के देशों को, विशेष रूप से भारत को प्रत्येक संकट के लिए दोषी बना देने वालों को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है।

ग्लोबल
वॉर्मिंग, परमाणु रेडियेशन, सुनामी, भूकम्प आदि के खतरों को आमन्त्रण विकसित देश ही देते आये हैं और उनके आने पर दोषारोपण का शिकार तीसरी दुनिया के देशों को होना पड़ता है। बहरहाल, समूचा विश्व अब स्वयंभू सत्ता से बाहर आकर प्रकृति को समझने का प्रयास करे और उसके अनुकूल ही स्वयं को ढालने की कोशिश करे। इंसानियत की, मानवता की, शान्ति की, सुख की और समृद्धि आदि की स्थापना भी इसी के पीछे-पीछे हो सकेगी।

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दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार

11 सितंबर 2008

पहले सामजिक स्थिति को सुधारना होगा

आज दो-तीन दिन बाद ब्लॉग पर लौटना हुआ. इधर कुछ अजीब तरह की व्यस्तता रही. इसी बीच कुछ काम मिला लोगों से मिलने-जुलने का, वो भी अजीब से विषय को लेकर. सरगर्मी हर तरफ़ छाई रही कि दस तारीख को वैज्ञानिक परीक्षणों के कारण प्रलय आने वाली है, सारी धरती नष्ट हो जायेगी. अपनी सामाजिक शोध संस्था "समाज अध्ययन केन्द्र" (SOCIETY STUDY CENTRE) के द्वारा एक छोटा सा सर्वे करने में लग गए. आश्चर्य तो तब हुआ कि पढ़े-लिखे समाज में आज भी ऎसी बातों पर जयादा ध्यान दिया जाता है जिनका कोई भी सर-पैर नहीं होता है। इससे अधिक आश्चर्य की बात तो ये है कि एक ओर तो हम पढ़े-लिखे होने का दम भरते हैं और दूसरी तरफ़ किसी भी आपदा से बचने के लिए उपाय न करके पूजा-अर्चना या फ़िर ज्योतिष के चक्कर में पड़ जाते हैं.

इस वैज्ञानिक घटना को लेकर भी यही सब होता रहा. लोगों में भय रहा और पंडितों-पुरोहितों ने नक्षत्रों का भय दिखा कर अपना उल्लू सीधा किया. यहाँ पंडितों को बढावा देने का काम हमारे तेज-तर्रार मीडिया ने भी किया. समाचार-पत्रों में ख़बरों के अनुसार एक-दो स्थानों पर बच्चों ने डर के कारण आत्महत्या कर ली. मीडिया ने यह दिखाने के कि वैज्ञानिकों के परीक्षण के क्या परिणाम होंगे यह दिखाने में अधिक दिलचस्पी दिखाई कि धरती किस समय नष्ट होगी, कैसे नष्ट होगी?

इस तरह के वैज्ञानिक परीक्षण क्या सिद्ध करेंगे ये तो वैज्ञानिक ही बता पाएंगे पर जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि भारत जैसे देशों को अभी कई वर्षों तक ऐसे परीक्षणों से दूर रहने की जरूरत है. बताया जा रहा है कि इस परीक्षण में भारत ने भी चार करोड़ डालर की धनराशी खर्च की है. यदि एक पल को मान लिया जाए कि इस महाप्रयोग से ज्ञात हो जाएगा कि धरती का जन्म कैसे हुआ, किस तरह अन्य चीजों का विकास हुआ तो उससे किस तरह की तरक्की हो सकती है? एक ऐसे देश में जहाँ अभी भी एक बड़ी आबादी खाने-पीने की समस्या से जूझ रही है, एक बहुत बड़ा भाग अपनी आजीविका के लिए भाग-दौड़ कर रहा है, एक बहुत बड़ा भाग बीमारियों से लड़ रहा है, पोलियो, एड्स, कैंसर आदि जैसी अनेकानेक बीमारियाँ प्रतिदिन जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा समाप्त कर रहीं हो वहाँ इस तरह के प्रयोग पर करोड़ों डालर की रकम खर्च कर देना मेरी दृष्टि में उपयोगी नहीं है।

यदि हम अपने देश की स्थिति पर नजर डालें तो पता चलेगा कि जितना भाग स्वस्थ लोगों का है उससे अधिक बड़ा भाग विकलांगों, परेशानो, बीमारों, भ्रष्टाचारियों, घूसखोरों आदि का है पहले सरकार इस तरफ़ ध्यान दे कि इनकी उत्पत्ति कैसे हुई? इनके जन्म कहाँ से हुआ और इनको रोकने का उपाय क्या हैं? यदि हम स्वस्थ समाज देने के प्रयोग में सफल हो सके तो उसके बाद धरती-आकाश-चाँद-तारों-मंगल आदि के रहस्यों को खोजना सुखद प्रतीत होगा. तब तक हम किसी भी प्रयोग पर प्रलय आने की आशंका से ही डर कर जीवन जीते रहेगे.