25 जून 2013
ये आपदा सीख भी देती है
20 जून 2013
अब भी न संभले तो रोज आएँगी ऐसी आपदाएँ
22 मई 2011
अगले जनम मोहे हिन्दू न कीजो -- व्यंग्य -- कुमारेन्द्र
चलते-चलते सोचा-विचारी हो रही थी कि उस जगत के सर्वशक्तिमान का फरमान चारों ओर गूँजने लगा कि जल्द ही पृथ्वीलोक को बसाया जाना है। सभी को वहाँ जाना जरूरी है, हाँ इतनी छूट है कि अपने-अपने विकल्प दे दें कि किस देश में पैदा किया जाये........। हमने आगे के फरमान को नहीं सुना और दौड़कर सर्वशक्तिमान के दरवार में पहुँच गये। देखा वहाँ महाराज की बजाय महारानियों का जमावड़ा था। कोई इंग्लैण्ड से, कोई अमेरिका से, कोई श्रीलंका से, कोई पाकिस्तान से, कोई दिल्ली से, कोई उत्तर प्रदेश से, कोई तमिलनाडु से, कोई पश्चिम बंगाल से। हमें लगा कि भारत का बहुमत है अपना ही देश माँग लिया जाये पर तभी दिमाग में धार्मिक लहर जोर मार गई। हमने चिल्ला कर कहा-‘‘महारानियो जो भी देश देना हो दे देना पर अगले जनम मोहे हिन्दू धर्म में पैदा न करना। इस धर्म में सिवाय ढोंग के, नाटक के, छल-प्रपंच के, भेदभाव के कुछ नहीं होता....हमें हिन्दू धर्म के अलावा किसी भी धर्म में पैदा कर देना। चाहे ईसाई धर्म में जिसने प्रलय की घोषणा कर उसको सच्चाई में बदल दिया चाहे मुस्लिम धर्म में जिसकी धार्मिक कट्टरता के कारण कभी भी फाँसी की सजा नहीं मिल सकती चाहे.....।’’
चित्र गूगल छवियों से साभार
‘‘बस...चुपचाप रहो हिन्दू...ये तुम्हारा मन्दिर नहीं, तुम्हारा समाज नहीं, तुम्हारा देश नहीं कि कुछ भी बकवास करते फिरो। यहाँ सब नियम से, समय से होता है। समय आया, नियम बना तो प्रलय आ गई, समय आ जाता, नियम बन जाता तो फाँसी भी हो जाती।’’ महारानियों की कड़क आवाज का गूँजना था कि कई सारे दिग्गी टाइप सिपहसालार खड़े हो गये। हमने मौन लगा जाना ही बेहतर समझा। होंठ बन्द, जुबान खामोश किन्तु मन फिर भी कह रहा था कि अगले जनम मोहे हिन्दू न कीजो।
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14 मार्च 2011
जापान की प्रलयंकारी घटनाएँ सबक हैं---कुछ सीख लो अब तो
सम्भवतः यह ऐसा विषय नहीं है जिस पर किसी तरह से लिखने की हिम्मत इस समय हो पा रही है। जापान में आई प्रलयकारी स्थितियां किसी भी व्यक्ति को व्यथित कर सकती हैं। पहले भूकम्प की मार उसके तुरन्त बाद ही सुनामी का कहर और अभी एक ही दिन बीता था कि ज्वालामुखी के फटने की खबर। यह सब प्रलय का ही संकेत दे रहीं स्थितियां हैं। इस बात को मीडिया द्वारा प्रचारित वर्ष 2012 के धरती के विनाश से कदापि न जोड़ा जाये।
भूकम्प और सुनामी से जो नुकसान जापान को हुआ है उससे डरे सहमे लोग इस बात को लेकर ज्यादा सशंकित थे कि उनके परमाणु रियेक्टर आज दोपहर तक सुरक्षित समझे जा रहे थे। दोपहर बाद तो जापान की ही नहीं अपितु समूचे विश्व की नींद उड़ गई जब समाचारों में देखा कि वहां के तीन परमाणु रियेक्टर खराब हो गये हैं। हद तो तब हो गई जबकि यह भी समाचार मिला कि 25 लोग रेडियेशन की चपेट में आ गये हैं।

परमाणु तबाही को साक्षात झेल चुका और किसी न किसी रूप में अभी तक झेल रहा जापान इस बात को भली-भांति समझता है कि परमाणु रियेक्टर के खराब होने का अर्थ क्या है। भूकम्प-सुनामी से तबाही को सहने के बीच संभलने की जापान की कोशिशों को झटका तो लगा ही होगा कि इस झटके को वहां के ज्वालामुखी ने और भी तीव्र बना दिया। दो-दो तरह से तबाही को देखने के बाद अब जापानवासी 4 किमी तक उठते घुंए के बादलों को देख रहे हैं।
इस तरह की तबाही इंसान को कुछ सिखा पायेगी अथवा नहीं यह तो काल के गर्भ में है पर एक बात तो तय हो गई है कि बार-बार चेताने के बाद भी इंसान ने स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने का भ्रम नहीं छोड़ा और इसका परिणाम आम आदमी ही भोग रहा है। किसी भी रूप में शक्तिशाली बनने की होड़ और उस पर हथियारों का, परमाणु का सहारा लेकर विश्व-सत्ता पर कब्जा जमाने वाली ताकतों को इन घटनाओं से कुछ सीखना होगा।

भूकम्पों को देखते-सहने का आदी हो चुका जापान तकनीकों को विकसित भी कर चुका था किन्तु प्रकृति की विनाशलीला से निजात पा लेना किसी व्यक्ति के वश की बात नहीं है, यह सिद्ध फिर से हो गया है। हथियारों की दम पर, परमाणु बमों के जोर पर समूचे विश्व में दादागीरी दिखाने का दम्भ भरने वाले देशों को इससे सबक मिलेगा और बात-बे-बात तीसरी दुनिया के देशों को, विशेष रूप से भारत को प्रत्येक संकट के लिए दोषी बना देने वालों को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है।
ग्लोबल वॉर्मिंग, परमाणु रेडियेशन, सुनामी, भूकम्प आदि के खतरों को आमन्त्रण विकसित देश ही देते आये हैं और उनके आने पर दोषारोपण का शिकार तीसरी दुनिया के देशों को होना पड़ता है। बहरहाल, समूचा विश्व अब स्वयंभू सत्ता से बाहर आकर प्रकृति को समझने का प्रयास करे और उसके अनुकूल ही स्वयं को ढालने की कोशिश करे। इंसानियत की, मानवता की, शान्ति की, सुख की और समृद्धि आदि की स्थापना भी इसी के पीछे-पीछे हो सकेगी।
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दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार
11 सितंबर 2008
पहले सामजिक स्थिति को सुधारना होगा
इस वैज्ञानिक घटना को लेकर भी यही सब होता रहा. लोगों में भय रहा और पंडितों-पुरोहितों ने नक्षत्रों का भय दिखा कर अपना उल्लू सीधा किया. यहाँ पंडितों को बढावा देने का काम हमारे तेज-तर्रार मीडिया ने भी किया. समाचार-पत्रों में ख़बरों के अनुसार एक-दो स्थानों पर बच्चों ने डर के कारण आत्महत्या कर ली. मीडिया ने यह दिखाने के कि वैज्ञानिकों के परीक्षण के क्या परिणाम होंगे यह दिखाने में अधिक दिलचस्पी दिखाई कि धरती किस समय नष्ट होगी, कैसे नष्ट होगी?
इस तरह के वैज्ञानिक परीक्षण क्या सिद्ध करेंगे ये तो वैज्ञानिक ही बता पाएंगे पर जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि भारत जैसे देशों को अभी कई वर्षों तक ऐसे परीक्षणों से दूर रहने की जरूरत है. बताया जा रहा है कि इस परीक्षण में भारत ने भी चार करोड़ डालर की धनराशी खर्च की है. यदि एक पल को मान लिया जाए कि इस महाप्रयोग से ज्ञात हो जाएगा कि धरती का जन्म कैसे हुआ, किस तरह अन्य चीजों का विकास हुआ तो उससे किस तरह की तरक्की हो सकती है? एक ऐसे देश में जहाँ अभी भी एक बड़ी आबादी खाने-पीने की समस्या से जूझ रही है, एक बहुत बड़ा भाग अपनी आजीविका के लिए भाग-दौड़ कर रहा है, एक बहुत बड़ा भाग बीमारियों से लड़ रहा है, पोलियो, एड्स, कैंसर आदि जैसी अनेकानेक बीमारियाँ प्रतिदिन जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा समाप्त कर रहीं हो वहाँ इस तरह के प्रयोग पर करोड़ों डालर की रकम खर्च कर देना मेरी दृष्टि में उपयोगी नहीं है।
यदि हम अपने देश की स्थिति पर नजर डालें तो पता चलेगा कि जितना भाग स्वस्थ लोगों का है उससे अधिक बड़ा भाग विकलांगों, परेशानो, बीमारों, भ्रष्टाचारियों, घूसखोरों आदि का है पहले सरकार इस तरफ़ ध्यान दे कि इनकी उत्पत्ति कैसे हुई? इनके जन्म कहाँ से हुआ और इनको रोकने का उपाय क्या हैं? यदि हम स्वस्थ समाज देने के प्रयोग में सफल हो सके तो उसके बाद धरती-आकाश-चाँद-तारों-मंगल आदि के रहस्यों को खोजना सुखद प्रतीत होगा. तब तक हम किसी भी प्रयोग पर प्रलय आने की आशंका से ही डर कर जीवन जीते रहेगे.
