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22 मार्च 2023

पंजाब में आतंकी आग लगाने का मोहरा है अमृतपाल

किसी समय पंजाब में खालिस्तान के नाम पर जबरदस्त खून-खराबा मचा हुआ था. जिसे पंजाब पुलिस ने सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों की मदद से पूरी तरह से खत्म कर दिया था. सुधार भरे दौर में खालिस्तान के बचे-खुचे समर्थकों ने जाकर पाकिस्तान में शरण ली थी. पाकिस्तान द्वारा उनको लगातार पालने-पोसने का काम चलता रहा. पाकिस्तान का ऐसा करने के पीछे का उद्देश्य भारत विरोधी गतिविधियों को संचालित करना है. इसके लिए कभी उसके द्वारा जम्मू-कश्मीर में गड़बड़ करवाई जाती है, अब वही काम वह पंजाब में करवा रहा है.


पिछले कुछ समय से पंजाब में खालिस्तान के नाम पर उत्पात फिर से दिखने लगा है. इसी उत्पात के बीच एक नाम बहुत तेजी से उभर कर आया, अमृतपाल सिंह. इसके उभरने के पीछे इसका न केवल खालिस्तानी अलगाववादी होना है बल्कि स्वयं को जरनैल सिंह भिंडरावाले का अनुयायी होने का दावा करना है और उसके समर्थकों द्वारा उसे ‘भिंडरावाले 2.0 कहना भी है. अमृतपाल द्वारा अमृतसर के अजनाला पर आक्रमण करना, पुलिस को मजबूर करके अपने साथी को थाने से छुड़वा लेना, हथियार लेकर स्वर्ण मंदिर जाना आदि घटनाएँ ऐसी रहीं जिनके द्वारा अमृतपाल एकदम से सुर्ख़ियों में आ गया. अमृतपाल की ऐसी हरकतों के अलावा ऐसी बहुत सी गतिविधियाँ हैं जो देश-विरोधी हैं. उसके द्वारा आईएसआई द्वारा पाकिस्तान से मँगाए गए हथियारों के वितरण में मदद करना, अवैध रूप से चलाए जा रहे नशामुक्ति केन्द्रों और अमृतसर के पड़ोस के जल्लुपुर खेड़ा में एक गुरुद्वारे में हथियार जमा करना, हथियारों के खुले प्रदर्शन के सम्बन्ध में सरकार के आदेश की अवहेलना करना आई ऐसी गतिविधियाँ हैं जो देश के लिए खतरा हैं. कोई बड़ी वारदात करने के पहले कट्टरपंथी संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ का प्रमुख और खालिस्तानी समर्थक अमृतपाल सिंह फरार हो गया. पंजाब पुलिस लगातार उसकी गिरफ्तारी के लिए ऑपरेशन चला रही है. उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून भी लगाया है. 




केन्द्रीय जाँच एजेंसियों ने पंजाब पुलिस को लगातार चेतावनी भी दी थी कि अमृतपाल सिंह का पंजाब में आना बड़ा खतरा बन सकता है. खुफिया एजेंसियों की जाँच में नया खुलासा हुआ है कि अमृतपाल को पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई ने जॉर्जिया में हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी थी. वह पंजाब आने से पहले दुबई से जॉर्जिया गया था. प्राइवेट आर्मी के रूप में ‘आनंदपुर खालसा फोर्स’ बनाने की तैयारी भी इसी ट्रेनिंग का हिस्सा थी. उसे पंजाब में गड़बड़ी कर देश का माहौल खराब करने की पूरी ट्रेनिंग जॉर्जिया में ही दी गई.


मात्र 19 साल की उम्र में 2012 में काम करने के लिए पंजाब से दुबई गया युवक अमृतपाल किसान आन्दोलन के दौरान दीप सिद्धू के साथ दिल्ली बॉर्डर पर आया था. यहीं से उसने दोबारा केश रखकर दस्तारबंदी की और भिंडरावाले के पैतृक गाँव में दस्तारबंदी का बड़ा कार्यक्रम किया. किसान आंदोलन में 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर हुई हिंसा में दीप सिद्धू का नाम सामने आया था. उस वक्त लाल किले पर खालसा पंथ का झंडा ‘निशान साहिब’ फहराया गया था. पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले सितम्बर 2021 को दीप सिद्धू ने ‘वारिस पंजाब दे’ नामक संगठन की स्थापना की. राजनैतिक एजेंडा ना बताते हुए दीप सिद्धू ने ‘वारिस पंजाब दे’ का उद्देश्य पंजाब के हक की लड़ाई को आगे बढ़ाना बताया था. हालांकि विधानसभा चुनाव में दीप सिद्धू ने सिमरनजीत सिंह मान की खालिस्तान समर्थक पार्टी का समर्थन किया था. पंजाब चुनाव से ठीक पहले एक कार दुर्घटना में सिद्धू की मौत होने के बाद अमृतपाल ‘वारिस पंजाब दे’ का प्रमुख बन गया. इसके बाद वह पंजाब में धार्मिक यात्रा चलाने के साथ-साथ युवाओं को अमृत छकाने लगा और खालिस्तान के नाम पर ग्रामीण युवाओं को जोड़ने लगा. पाकिस्तान से मिलती सहायता से अमृतपाल ने बेरोजगारी, मँहगाई और रूस-यूक्रेन युद्ध से उपजे असमंजस के हालातों से जूझते युवाओं का फायदा उठा कर उनके मन में खालिस्तान राज्य की माँग को जगा दिया.


ऐसा माना जा रहा है कि अमृतपाल सिंह को आईएसआई द्वारा सहायता दी जा रही है, ताकि पंजाब में एक नया भिंडरांवाले को फिर से खड़ा किया जाए, पंजाब को फिर से आतंकवाद की आग में झुलसाया जाये. आईएसआई ने भारत-विरोध, देश-विभाजन हेतु सदैव किसी न किसी प्यादे को भरपूर मदद की है. भिंडरावाले, बुरहानबानी से लेकर अमृतपाल तक उसकी यही कहानी है. अमृतपाल धार्मिक शिक्षाओं को देने के नाम पर पंजाब के युवाओं को खालिस्तान के लिए उकसाने का काम कर रहा था. अमृतपाल सिंह यूके में रहने वाले खालिस्तानी आतंकी अवतार सिंह खंडा का करीबी है. ऐसा भी कहा जाता है कि सरकार की ओर से प्रतिबंधित बब्बर खालसा इंटरनेशनल के प्रमुख परमजीत सिंह पम्मा, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन के प्रमुख लखबीर सिंह रोड़े के साथ भी उसके नजदीकी सम्बन्ध हैं.

  

दरअसल जम्मू-कश्मीर से धारा 370 समाप्त का समाप्त होना पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई की हार मानी जा रही है. अपनी खीझ को और भारत को तोड़ने की मानसिकता से उसके द्वारा एकबार फिर खालिस्तान की माँग को हवा दी जा रही है. यह भी देखने में आया है कि जो खालिस्तान समर्थक इंग्लैंड, कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों में हैं, उनके द्वारा भारतीय दूतावास के सामने समय-समय पर उग्र प्रदर्शन किया जाता है.


केन्द्र सरकार और पंजाब सरकार को अमृतपाल के मामले में किसी भी तरह से ढील देने की आवश्यकता नहीं है. खालिस्तान समर्थक एक व्यक्ति द्वारा गृहमंत्री तक को धमकी देने के बाद भी उस पर कोई कड़ी कार्यवाही नहीं होना, पंजाब में शासन-प्रशासन के लिए मुसीबत बन चुके एक व्यक्ति को वहाँ के मुख्यमंत्री द्वारा नजरंदाज किया जाना समझ से परे है. अमृतपाल को महज एक व्यक्ति समझकर गंभीरता न दिखाना सुखद संकेत नहीं है. एक तरफ उसके समर्थकों द्वारा उसमें भिंडरावाले का रूप देखा जाना, दूसरी तरफ पंजाब में बहुत सारे आपराधिक गैंग का वर्चस्व होना, ड्रग्स की समस्या होना, पंजाब सरकार द्वारा इन आतंकियों पर कार्रवाई करने में ढुलमुल नीति का अपनाया जाना राज्य को आतंकवाद की तरफ ही ले जाता है. हालाँकि अमृतपाल फरार है, लेकिन उसके संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ से जुड़े सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है. पुलिस ने उसके समर्थकों से अनेक अत्याधुनिक हथियार बरामद किये हैं, जो पंजाब में, देश में आतंकी उत्पात मचाने के उसके मंसूबों की गवाही देते हैं. देखा जाये तो राज्य में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति सामान्य नहीं है. इससे पहले कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए, पूरे पंजाब में आग लग जाए, खालिस्तान समर्थक हथियार लेकर आतंक मचाने लगें उससे पहले समस्या से निपटना होगा.

 






 

06 दिसंबर 2019

समय, परिस्थिति के हिसाब से अपने-अपने सत्य-असत्य


आज के दौर में जबकि एक तरफ संवैधानिक रूप से चलने की बात की जाती है उस समय में संवैधानिक क्या है, इसे लेकर भी संशय बना हुआ है. हैदराबाद की जघन्य घटना के बाद आम जनमानस में आक्रोश बना हुआ था और आरोपियों को जनता के हवाले करके, जनता के द्वारा हिसाब बराबर किये जाने की आवाजें उठ रही थीं. देश के सर्वोच्च सदन से भी एक सदस्य ने अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए जनता के द्वारा ही ऐसे लोगों का न्याय किये जाने की बात कही थी. किसी भी लोकतान्त्रिक देश में जहाँ कि संविधान, कानून आदि के द्वारा समाज का, सत्ता का सञ्चालन होता हो वहाँ ऐसे किसी भी तानाशाही तरीके को सहज स्वीकार नहीं किया जा सकता है. यह जानते-समझते हुए भी जो भी अपराध हो रहा है, पकड़े जाने वाले व्यक्ति अपराधी हैं, वे अपना अपराध कबूल चुके हैं इसके बाद भी जनता को सीधे तौर पर कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है. सड़कों से चाहे आक्रोशित जनता की आवाज़ उठी हो या फिर सदन के भीतर से किसी सदस्य की, सभी में आरोपियों के खिलाफ मानसिकता, महिलाओं के साथ होती आ रही जघन्य वारदातों के कारण उपजा आक्रोश था मगर सिर्फ इसी से उनको किसी तरह का न्याय करने का, कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिल जाता. 


ऐसे आक्रोश भरे दौर में जबकि लोग आरोपियों द्वारा अपना अपराध कबूल लेने के बाद भी उनको न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने को महज समय की बर्बादी मान रहे थे, किसी बड़े रसूखदार का संरक्षण समझ रहे थे, उसी समय उन चारों आरोपियों के एनकाउन्टर की खबर ने जैसे अबको चौंका दिया. अचानक से बहुत से स्वर बदले दिखने लगे. जो कल तक सड़कों पर न्याय की मांग कर रहे थे, अचानक पुलिस एनकाउन्टर के बाद मानवाधिकार की बात करने लगे. इ चारों आरोपियों की आड़ में किसी बड़े आदमी को बचाने की चर्चा करने लगे. ऐसा कुछ भी संभव है मगर इस तरह की घटनाओं से दो तरह की बातें तो साफ़ होती हैं कि क्या कानून को जनभावना के कारण ऐसा कोई भी कदम उठा लेना चाहिए? दूसरे कि क्या ऐसे कदमों से प्रशासनिक निरंकुशता बढ़ने की सम्भावना है? पुलिस द्वारा एनकाउन्टर की जो कहानी बनाई-बताई जा रही उसमें कितनी सच्चाई है, कितनी नहीं ये तो पुलिस वाले ही जानें किन्तु असल सत्य यही है कि चार ऐसे व्यक्ति मारे गए जिन्होंने अपने अपराध कबूल लिया था. यहाँ सवाल उठाने वालों के अपने सत्य हैं और उन सवालों का विरोध करने वालों के अपने सत्य हैं.

इन्हीं सवालों के साये में देखना होगा कि पिछले सात सालों से दिल्ली की सड़कों पर बर्बरता का शिकार हुई उस बेटी को कहाँ इंसाफ मिल सका है? उसके अलावा बहुत सी बेटियाँ ऐसी हैं जो अभी भी इंसाफ की तलाश में भटक रही हैं, कुछ जीवित अवस्था में और कुछ की आत्मा. क्या उनके परिजनों को यह भटकाव सही लगता होगा? आज की एनकाउन्टर की घटना एकबारगी कानूनी रूप में, संवैधानिक रूप में गलत भले लगे किन्तु उस डॉक्टर बेटी के परिजनों को किसी भी रूप में यह कदम गलत नहीं लग रहा होगा. उस परिवार से जुड़े लोगों को या फिर ऐसी किसी भी जघन्य घटना के दर्द को सह रहे लोगों को भी पुलिस का यह कदम किसी भी रूप में गलत नहीं लग रहा होगा. किसी भी घटना को दीर्घकालिक रूप में देखने की मानसिकता से बचना चाहिए. पुलिस का यह कदम जनभावना का सम्मान था या फिर किसी रसूखदार को बचाने वाला, यह तो आने वाले समय में स्पष्ट होगा. इस कदम से किसी और दूसरे राज्य सबक के तौर पर लेंगे या फिर संवैधानिक, कानूनी सुधार के रूप में, यह भी अभी नहीं कहा जा सकता है. इस तरह से आरोपियों के मारे जाने के बाद ऐसे अपराधों में किसी तरह की कमी आएगी ही, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. कुल मिलाकर पुलिस के इस कदम ने जनाक्रोश को ठंडा करने का काम किया है. पीड़ित परिजनों के आँसू पोंछने का काम किया है. शेष तो बहुत कुछ ऐसा है समाज में जो गलत होने के बाद भी चल रहा है, जो सही होने के बाद भी समाज को स्वीकार नहीं है.

04 नवंबर 2019

कानून से उलझता कानून


सोशल मीडिया पर पुलिस-वकील झड़प के कई वीडियो देखने को मिले. वकीलों का जिस तरह का आक्रोशित स्वरूप दिखा वह अकल्पनीय नहीं कहा जायेगा. ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है जबकि वकीलों और पुलिस में झड़प हुई हो और वकीलों ने कानून को अपने हाथों में लेकर पुलिस वालों के साथ मारपीट की हो. ऐसा वकीलों द्वारा कई बार होता रहा है. ऐसा नहीं है कि पुलिस भी ऐसे मामलों में दूध की धुली हो. उसके द्वारा भी अपनी वर्दी का अहंकार समय-समय पर जनता पर निकलता ही रहता है. इसी अहंकार में कई बार वकील भी चपेटे में आ जाते हैं. असल में दोनों ही अपनी-अपनी वर्दी में कानून का साथ लिए घूमते हैं. एक को अपने आपमें ये अहंकार है कि किसी भी मामले की शिकायत के लिए उसी के पास आया जायेगा. ठीक इसी तरह दूसरे पक्ष को भी इसका अहंकार है कि मामला तो उसी के क्षेत्र में आकर निपटेगा. ऐसी स्थिति में दोनों पक्ष खुद को कानून का पालन करवाने वाले या उसका अमल करवाने नहीं बल्कि खुद को कानून समझते हैं.


हालिया जिस झड़प की चर्चा चारों तरफ फैली है, उसके मूल में पार्किंग है. एक कार को पार्किंग में खड़े करने को लेकर शुरू हुई बहस इस तरह रास्ता पकड़ लेगी, इसका अंदाजा तो उन दोनों को नहीं होगा. एक कार की पार्किंग में काले कोट और खाकी वर्दी की बहद ने देशव्यापी विवाद खड़ा करवा दिया. यहाँ इस घटना से स्पष्ट है कि जब अधिकारों का, शक्ति का आधिक्य व्यक्ति के पास हो जाता है तो वह संतुलन बना पाने में कामयाब नहीं रहता है. देखा जाये तो शक्ति का, कानून का, अधिकारों का आधिक्य पुलिस, वकील दोनों के पास है. दोनों ही किसी रूप में खुद को किसी से कम मानने को तैयार नहीं रहते. ऐसे में इस तरह के उपद्रव आम बात हैं. आज जबकि समाज में किसी भी रूप में शक्ति प्रदर्शन का, सत्ता की सामर्थ्य का, खुद के बाहुबल का प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है वैसे में खुद को कानून से ऊपर मान बैठना न तो पुलिस के लिए मुश्किल है, न ही वकीलों के लिए. ऐसे में दोनों पक्षों का टकराना और आपस में लात-जूता करना सहज प्रक्रिया है. यहाँ इस सन्दर्भ में याद रखना चाहिए कि एक ही क्षेत्र से संदर्भित बार-बेंच विवाद को निपटाने की सलाह लगातार दी जाती रहती है मगर शायद ही कहीं ये विवाद सुलझता दिखता हो. ऐसे में पुलिस और वकील दो अलग-अलग क्षेत्र हैं, दो अलग-अलग विधान हैं तब उनमें विवाद का न दिखना अपने आपमें आश्चर्य ही कहा जायेगा. 

बहरहाल, पुलिस जनता की रक्षा के लिए है, कानून को अमली जामा पहनाने के लिए है, कानूनी प्रक्रिया का पालन करवाने के लिए है. इसी तरह वकील उसी कानून की सही व्याख्या करने के लिए, कानून के सही प्रयोग के द्वारा निर्दोष को सजा-मुक्त करवाने और दोषी को सजा दिलवाने के लिए है. इसके बाद भी दोनों पक्ष अपने आपको ही कानून मान बैठते हैं. पुलिस का जनता के साथ किया जाने वाला व्यवहार स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे खुद को क्या समझते हैं और उनकी निगाह में जनता की कीमत क्या है. सीधी सी बात है जब तक ये दोनों पक्ष खुद को कानून मान कर चलते रहेंगे या फिर खुद को कानून से ऊपर मानते रहेंगे तब तक ऐसी घटनाएँ सामने आती रहेंगी. कभी वकील पुलिस पर हावी रहेंगे, कभी पुलिस वकील पर हावी रहेगी. इन सबसे अलग सबसे बड़ा सत्य यह है कि इन दोनों के बीच भले ही कोई विवाद न हो मगर ये दोनों हमेशा ही आम जनता पर भारी पड़ते रहेंगे. उस पर कानूनी दांव-पेंच चलाते रहेंगे.

27 सितंबर 2019

लोकतान्त्रिक तानाशाही का प्रत्यक्ष उदाहरण


हाल ही में एक मामला संज्ञान में आया जो पुलिस से संदर्भित था. पुलिस का नाम सामने आते ही पसीने छूट जाते हैं लोगों के, हमारे भी छूट जाते हैं. अक्सर हम अपने मित्रों से कहते भी हैं कि हमारा और पुलिस का सम्बन्ध उतना ही है जितना हमारा और चंद्रमा का. हम उसे देख सकते हैं, महसूस कर सकते मगर उसे छू नहीं सकते, वो भी हमें न देख सकता है, न महसूस कर सकता है. बहरहाल, इस मामले में अनावश्यक रूप से तूल दिया गया. कई बिन्दुओं पर लगा कि मामले को जबरिया आपराधिक मोड़ दिया जा रहा है. रात का समय था और पुलिस के लोग भी जानते हैं कि एक समय विशेष के बाद आला अधिकारीयों से संपर्क न तो फोन पर संभव होता है और न ही व्यक्तिगत रूप से. रात के मामले या तो निपट ही जाते हैं या फिर वे सलाखों के भीतर रात गुजारने के साथ ही निपटते हैं. इधर ऐसा लग रहा था जैसे सारी प्लानिंग पहले से कर रखी गई हो. दोषी कोई और मगर पकड़ा किसी और को. किसी तरह से कोई हस्तक्षेप न हो सके इसलिए एक संवेदनशील कहानी जोड़ी गई. निर्दोष मामले को संवेदनशील बनाने और राजनैतिक हस्तक्षेप रोकने के लिए मामले को लड़की छेड़ने से जोड़ दिया गया. लड़की कौन, ये उनको भी न पता था जो मामले की पैरवी कर निर्दोषों को फँसाने में लगे थे.


एक बार मामला पुलिस के पक्ष में आया कि दोनों तरफ से अपनी-अपनी कवायद शुरू हुई. खाकी के पास असीमित कानूनी अधिकार और जनता के पास उसके चुने हुए प्रतिनिधियों का सहारा. यहाँ समस्या और विकत थी. प्रशासन के आला अधिकारी या तो सोये हुए थे या फिर उनके मोबाइल को उन तक पहुँचाया ही नहीं गया. अब ले-देकर मामला जनप्रतिनिधियों तक पहुँचाने का समझ आया. यहाँ स्थिति तो बद से बदतर निकली. सत्ता पक्ष के एड़ी से चोटी तक के नेतागीरी करने वालों को, जनप्रतिनिधि कहलाने वालों को, प्रतिनिधि कहलाने वालों को, पदाधिकारी कहने वालों को सिसियाते-मिमियाते देखा. बजाय निर्दोष लोगों की पैरवी करने के वे लोग भी खाकी की कहानी में अपना सिर मटकाते नजर आये. ऐसी घटना जो हुई न हो, ऐसी बात जिसका कोई ओर-छोर न हो उस पर भी जनप्रतिनिधि किसी तरह से अपनी बात को मजबूती के साथ नहीं रख सके. मामला हाथ से सरकता हुआ वापस फिर जनता के हाथ आ गया. निर्दोष व्यक्तियों के परिवारों के पास आ गया. रात करवटें बदलते रहने के अलावा कोई काम न था क्योंकि चुने हुए प्रतिनिधि सुनी-सुनाई, बनी-बनाई कहानी को सुनकर मस्त-मगन लेटे थे.

ऐसी घटना जो हुई ही नहीं, जिसका कोई प्रमाण नहीं, जिसका कोई गवाह नहीं उसमें भी सत्ताधारी कुर्तेबाज़ बस हाथों की कठपुतली बने नज़र आए. बात जहाँ से शुरू हुई थी वहीं पहुँच गई. अपना-अपना शेयर सेट करने के माहिर लोगों ने किसी तरह से अपना दायित्व न निभाया. वोट लेने के समय चरणों में लोटने वाले वही चरण सम्बंधित पक्ष के सिर पर मारते समझ आये. अंततः जिसका डर था वही हुआ. बातचीत के सारे रास्ते बंद करते हुए कानूनी रास्ता न चाहते हुए भी अपनाना पड़ा. एक ऐसी गलती की सजा मानने को मजबूर करना पड़ा जो किसी ने की ही नहीं. फ़िलहाल तो पूरी रात और पूरे दिन के बाद घटनाक्रम एक बिंदु पर आकर रुका मगर सबकी असलियत सामने आ गई. अब बड़ी-बड़ी गाड़ियों की बड़ी-बड़ी नेम प्लेट्स और हूटर की हनक में सड़कों, विभागों में तैरते इन (अ)राजनेताओं को प्रत्यक्ष मिलकर नमन किया जाएगा, किसी दिन.

24 नवंबर 2018

विवाहेतर संबंधों को कानूनी मान्यता के बाद भी...


पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने क्रांतिकारी निर्णय देते हुए दो धाराओं की दिशा बदल दी. एक से समलैंगिक सम्बन्ध बनाने वालों को राहत मिली और दूसरी धारा से विवाहेतर सम्बन्ध बनाने वालों को. अदालत द्वारा धारा 370 और धारा 497 की दिशा बदली गई उसके बाद समाज की दिशा बदले या न बदले मगर कानून की, पुलिस की दिशा अवश्य बदलनी चाहिए. यहाँ चर्चा इन निर्णयों के बाद भी सामने आने वाली कुछ खबरों के सन्दर्भ में है, जिसमें हाल-फिलहाल धारा 497 को शामिल किया गया है. लगभग दो माह होने को आये हैं जबकि विवाहेतर संबंधों के बनाये जाने को कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी कई घटनाएँ सामने आईं हैं जहाँ कि दो बालिग स्त्री-पुरुष के द्वारा आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाये जाने के बाद भी उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया. अदालत द्वारा जबकि इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यह कानून एक तरह से महिलाओं के साथ भेदभाव करता है. उसका ऐसा कहना किसी और सन्दर्भ में हो सकता है मगर जबकि कानूनी रूप से स्त्री और पुरुष दोनों को आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट मिल गई है तब ऐसा करने वालों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करना क्या अदालत के आदेश का अपमान नहीं? 


लेखक कानून का जानकार नहीं, इसलिए ऐसा सवाल दिमाग में आना स्वाभाविक है. ऐसा सवाल इसलिए भी जेहन में उपजा क्योंकि किसी शिकायत पर पुलिस प्रशासन का किसी के घर पहुँच कर, किसी होटल पहुँच कर छापामारी करने, बालिग स्त्री-पुरुष को गिरफ्तार करने की खबरें नियमित रूप से सुनाई पड़ रही हैं. सवाल यह भी उपजता है कि यदि कोई बालिग स्त्री-पुरुष आपसी सहमति से अपने घर में, किसी होटल में शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं और इसके प्रमाण मिलते हैं कि उनके द्वारा किसी रूप में वेश्यावृत्ति नहीं की जा रही है, होटल प्रबंधक, मालिक द्वारा किसी तरह से वेश्यावृत्ति की संलिप्तता नहीं है तो फिर ऐसे बालिग स्त्री-पुरुष को गिरफ्तार क्यों किया जाता है? यह भी एक तथ्य है कि वे दोनों किसी सार्वजनिक स्थान पर शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना रहे होते हैं तब क्या उनको गिरफ्तार किया जा सकता है? यदि आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाना अब गैर-कानूनी नहीं तो फिर क्या इस सम्बन्ध में पुलिस प्रशासन को सचेत नहीं किया गया है? जबकि यह सर्वविदित है कि कानून का पालन करवाना पुलिस का ही काम है.

इस विषय पर इसलिए भी चर्चा आवश्यक है क्योंकि ऐसे ही बहुत सारे विषय हैं जिनके कारण समाज में विसंगति देखने को मिलती है. ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिनको लेकर कानून कुछ कहता है और पुलिस प्रशासन कुछ और करता है. इस तरह का दोहरा व्यवहार, बर्ताव भी समाज में न्यायालय की उस सोच को बाधित करता है, जिसके द्वारा उसके द्वारा हाल ही में दो-दो धाराओं की दिशा बदली गई.

12 मार्च 2013

पुलिसिया आतंक का प्रेम



सड़क किनारे खाकी वर्दी में सजे खड़े अधिकारी, सिपाही. अधिकारी के कंधे पर चमकते सितारे और हाथ में एक हॉकी. साथ में खड़े सिपाही कंधे पर स्टार तो नहीं सजाये हैं, हाँ एक बन्दूक टाँगे हैं....सिर्फ टाँगे ही हैं और अपने हाथ में एक नुकीला सूजा गर्वित भाव से लहराने में लगे हैं. इन महानुभावों का खड़ा होना ही सड़क पर चलती-फिरती जनता के मन में भय का सृजन करती है. बीच-बीच में कभी अधिकारी साहब तो कभी उनके मातहत सिपाही मुखारविंद से रिश्तों-नातों का जाप करते दिख जाते हैं. पुलिसिया शालीनता के साथ अशालीन शब्दों का संयोजन लोगों को डराता है..धमकाता है. मौखिक, शाब्दिक प्रक्रिया के साथ-साथ इन लोगों के हाथों में सुशोभित लघु अस्त्र भी बीच-बीच में सक्रियता का भान करा देते हैं. बड़े साहब के हाथ में शोभायमान हो रही हॉकी लोगों की पीठ पर, टांगों पर चिपकने की कोशिश करती हुई सफलता प्राप्त कर लेती है. ‘बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानल्लाह’ वाली बात को चरितार्थ करते बड़े साहब के अधीनस्थ ‘बहुत बड़े वाले’ साहब, जो अपने हाथ में नुकीला सूजा लिए लोगों के रोंगटे खड़े करने का काम कर रहे हैं, उसी सूजे को गाड़ियों के, स्कूटर-बाइक के, साइकिल-रिक्शा के, हाथ ठेला के पहियों में प्रवेश दिलाने में महारत हासिल किये होते हैं. मौका ताड़ के बिना किसी विशेष प्रयास के वे तमाम गाड़ियों के पहियों और सूजे का मिलन करवा देते हैं. इसके अलावा जब बड़े साहब अपनी नीली बत्ती लगी और हों-हों की आवाज़ में चिल्लाती जीप में बैठ कर शहर की सड़कों में भ्रमण कर रहे होते हैं तो अपनी परमप्रिय हॉकी के सहारे सड़क के किनारे कड़ी बेतरतीब बाइक, स्कूटर, साइकिलों को सड़क की धूल चटाते जाते हैं.
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          ये दृश्य पता नहीं कितने नगरों की शोभा, दिव्यता बढ़ाते हैं पर हमारे दिव्य शहर उरई में आये दिन दिखाई देते हैं. पीठ, पैर अथवा शरीर के किसी भी अंग पर सवारी कर चुकी हॉकी जब वापस बड़े साहब के पास आती है तो सामने वाले को दोहरा करके आती है. आसपास वाले ‘चिपका ले सैंया फेविकोल से’ गाने की लाइन ‘उह्ह, आह की आवाज़ आती है जोर से’ ही बड़ी मद्धिम आवाज़ में सुनते हैं. उनका नगर-भ्रमण कितनी गाड़ियों की हालत को बदल देता है, कितनी ही गाड़ियों की लाइट को बदलवा देता है, कितनों को रगड़ के सहारे खरोच के निशान देता है, कहा नहीं जा सकता. कुछ यही स्थिति ‘बहुत बड़े वाले’ छोटे-छोटे साहबों की दिखती है. हाथ का सूजा किसकी हवा निकाल दे, पता नहीं. डर तो तब लगता है जब वो सूजा उनके हाथ में इधर-उधर डोलता है, समझ नहीं आता कि पहिये से मिलन करेगा या आदमी की देह से? सड़क के किनारे पल भर को किसी का रुकना हुआ नहीं और ये महाशय बस वहां खड़े भर हों, फिर क्या, रुकना भूलकर, काम करना भूलकर लोग देखने लगते हैं कि कहीं पहिया जमींदोज तो नहीं हो गया. एक बार इनके नुकीले सूजे ने पहिये का स्पर्श मात्र किया ही कि बस...पूरी कहानी ख़तम.
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          इसके अलावा एक और काम आजकल हमारे शहर के बड़े साहब, बहुत बड़े वाले साहब करने में लगे हैं और वो है सड़क पर गुजरते, कहीं एक साथ टहलते-बैठे जोड़ों की जांच-परख करने का. भले ही लड़का-लड़की आपत्तिजनक स्थिति में न हों, भले ही लड़की किसी लड़के की शिकायत न कर रही हो, भले ही लड़का कोई गलत हरकत न कर रहा हो....पर इन अतिजागरूक रक्षकों को अपना जांच-धर्म निभाना ही है. किसी भी चलती बाइक को रोक लेना, लड़के-लड़की को अपने रिश्ते का सबूत उपलब्ध करवाने को कहना, तमाम शालीन-अशालीन सवालों से दाग देना, थाना-कोतवाली का भय दिखाना इन साहेबान का परम दायित्व बन जाता है. इसके अलावा ये साहब आजकल महिला पुलिसकर्मी को भी हथियार के रूप में शहर में प्रयोग करते घूम रहे हैं. सादे कपड़ों में, बन-संवर कर ये आधुनिक ललनाएं कभी सीटी मारके, कभी अंखियों से गोली चला के, कभी शारीरिक भाव-भंगिमाओं के परिचालन से इधर-उधर डोलते लड़कों को पकड़वा कर कोतवाली की सैर करवा कर डंडे का स्पर्श करवा देती हैं. 
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भले ही खाकी वर्दी को अनुशासन बनाये रखने का, शांति व्यवस्था बनाये रखने का, कानून का अनुपालन करने का, आपराधिक तत्त्वों पर नियंत्रण का कार्य दिया गया हो किन्तु वह कानूनी ताकतों का बेजा इस्तेमाल कर रही है. साईकिल, बाइक, स्कूटर, रिक्शा, ठेले, पटरी व्यापारियों को हड़काना-धमकाना इनका नित्य का कार्य बन गया है. अपनी हनक दिखाते हुए कहीं भी अपनी गाड़ी को खड़ी करके सड़क पर जाम की स्थिति बना देना, अकारण लोगों पर हाथ साफ़ कर देना भी इनकी आदत में शुमार हो गया है. कोई व्यक्ति एक बार किसी भी छोटे से आरोप में बस चौकी, थाना अथवा कोतवाली की सैर कर आये उसके शरीर पर चार-छः जगह लाल-लाल निशान बने आसानी से देखे जा सकते हैं. ऐसे में जनाक्रोश धीरे-धीरे बढ़ता हुआ उग्रता की पराकाष्ठा तक पहुँच जाता है और यही स्थिति पुलिसिया आतंक के विरुद्ध हिन्सात्मक रूप में उभरकर आती है. खाकी वर्दी को सुधारने की और जनता के साथ उसके रिश्ते मधुर बनाये जाने की वकालत करते लोगों को पुलिस के आला अफसरों को उनके अधिकारीयों, सिपाहियों की इस तरह की अतिवादिता से बचने की सलाह देना चाहिए. कानून की ताकत उनको कानून का अनुपालन करने के लिए दी गई है न कि जनता की पीठ सेंकने के लिए. विडंबना ये है कि लाख समझाने के बाद इनकी समझ में आता नहीं है और इसी कारण से ये कभी राजनैतिक दलों के, व्यक्तियों के हाथों की कठपुतली बनते हैं, कभी राजनैतिक अपराधियों के शिकार बनते हैं तो कभी-कभी जनाक्रोश का शिकार होकर अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं. कानूनी ताकत का भय लोगों में रहे, वे अनुशासन से, शांति से रहें इसके लिए आवश्यक है कि कानून को सशक्त किया जाए न कि कानून का अनुपालन करवाने-करने वालों को.
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06 मार्च 2013

पुलिस अपनी कार्यशैली में सुधार लाये



          कुंडा में पुलिस अधिकारी की हत्या से सियासी हलकों में एक तरह का उफान सा आ गया है। सरकार के बाहुबली मंत्री राजा भैया को इस हत्या में आरोपी माना-समझा जा रहा है और प्रथम दृष्टया सरकार ने अपनी कार्यवाही करते हुए राजा भैया का इस्तीफा ले लिया है। इस कांड की जांच सीबीआई से करवाये जाने की संस्तुति के लिए भी प्रदेश सरकार ने केन्द्र सरकार को लिख भेजा है। अपनी तरफ से शासन-प्रशासन अपना-अपना काम करने में लगे हुए हैं; मीडिया अपना काम करने में लगी है; तमाम विपक्षी राजनैतिक दल अपना काम करने में व्यस्त हैं; सम्बन्धित मृतक के परिवारीजन अपना काम करने में लगे हैं और इन सारे कामों के परिणाम को सभी अपने-अपने तरह से आते हुए भी देखना चाहते होंगे। यह घटना कहीं न कहीं राजनैतिक अपराधीकरण की ओर इशारा करती है तो इसके साथ में पुलिस के अधिकार, उसकी शक्ति, उसकी स्वतन्त्रता, उसकी राजनैतिक हदबन्दी की ओर भी इशारा करती है। लगभग हर ओर से पुलिस के हाथ-पैर को राजनैतिक दलों, बाहुबलियों द्वारा बांधे रखने की चर्चा होती दिख रही है। यह कदाचित अपने आपमें एक बहुत बड़ा सत्य है कि बहुसंख्यक मामलों में पुलिस प्रशासन स्वतन्त्र रूप से अपराधियों के खिलाफ अपनी कार्यवाहियों को नहीं कर पाता है। इसी का दुष्परिणाम अनेक बार यह होता है कि यही अपराधी राजनैतिक संरक्षण पाकर पुलिस प्रशासन पर हावी हो जाते हैं और पुलिस की कार्यप्रणाली को, कार्यवाही को प्रभावित करते हैं। 
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          पुलिस के साथ घटित होता यह एक पक्ष है और इस पक्ष के साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि आज आम आदमी के बीच पुलिस की छवि कितनी अपनत्व भरी है। पुलिस की स्वतन्त्रता, उसकी कार्यशैली, कार्यप्रणाली का उन्मुक्त रूप राजनैतिक व्यक्तित्व के सामने, राजनैतिक दबंगई के समक्ष, राजनैतिक दलों के साये में बंधा-बंधा, सिसियाया सा, घुटन भरा सा महसूस होता है, वही रूप किसी भी आम आदमी के विरुद्ध कार्यवाही करते समय, किसी भी निर्दोष को फंसाते समय, हवालात में रात-रात भर बेल्टों-डंडों से मारते समय, रिक्शेवालों, खोमचे वालों, पटरी पर व्यवसाय करते लोगों से वसूली करने में, महिलाओं-बच्चों पर हाथ छोड़ने में भरपूर स्वतन्त्रता का अनुभव करता है। आये दिन देखने में आता है कि आम आदमी को सड़क पर चलते हुए किसी भी स्थानीय अपराधी से, स्थानीय दबंग नेता से उतना डर नहीं लगता है जितना कि सड़क पर किसी भी पिकेट के रूप में तैनात दो सिपाहियों से लगता है; कोबरा मोटरसाइकिल पर घूमते दो सिपाहियों से लगता है। कोई भी सम्मानित शहरी दबंगों की रिवॉल्वर, पिस्टल, बन्दूक का सामना सीना ठोंककर करने की दम रखता है वही व्यक्ति पुलिस के एक पांच फीट के डंडे से घनघोर रूप से घबराता है। 
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          कानून के प्रहरी जब खुद को ही कानून समझने लगे हों; कानून का पालन करने के नाम पर खुलेआम दबंगई, गुण्डागर्दी दिखाने लगे हों; रक्षक के स्थान पर भक्षक के रूप में नजर आने लगे हों तो सोचा जा सकता है कि आम आदमी में, एक भीड़ में पुलिस के प्रति क्या भावबोध पनप रहा होगा। किसी भी साधारण सी चौकी में, थाने में, कोतवाली में साधारण सी रिपोर्ट लिखवाने के लिए जाने पर आम आदमी को किस तरह से अपनी माताओं-बहिनों से मुंहजबानी रिश्ता यहां जुड़वा दिया जाता है, यह समझाने की आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि विगत कुछ वर्षों से जनआक्रोश का शिकार पुलिस प्रशासन को होना पड़ा है। कुंडा की इस घटना में पुलिस अपनी कार्यवाही कर रही है और चूंकि यह मामला अब हाईप्रोफाइल हो गया है इसलिए पुलिस प्रशासन के आला अधिकारियों को भी इसमें प्रत्यक्ष रूप से शामिल होना पड़ रहा है। पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह आम आदमी के मन में बैठी पुलिसिया आतंक की छवि को दूर करने का प्रयास करे। जनमानस और पुलिस में एक प्रकार का समन्वय बनाये जाने का उपक्रम किया जाये। पुलिस के साये में आम आदमी सुरक्षा महसूस करे न कि असुरक्षा और जिस दिन वह ऐसा करने में सफल हो जाती है किसी भी राजनैतिक बाहुबली की हिम्मत नहीं कि किसी भी पुलिसकर्मी को अपने इशारे पर नचा ले; उसकी स्वतन्त्रता को बंधक बना ले; उसको घुटन भरी जिन्दगी जीने पर मजबूर करे। इसे ठीक दूसरी ओर यह भी सत्य है कि जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक पुलिस प्रशासन को जाने-अनजाने भीड़ के आक्रोश का, जनमानस के गुस्से का सामना करना ही पड़ेगा और आक्रोश, गुस्सा किसी भी रूप में हो, हानिकारक ही होता है।
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02 जून 2012

आ जाओ तुम बस्तर..मरने!!



आज भी याद है वर्षों पुराना वह दिन जब हम लोगों को खबर मिली कि हमारे सबसे छोटे चाचाजी का तबादला बस्तर के सुदूर अंचल सुकमा में कर दिया गया है। हम सभी को लग रहा था जैसे कहीं देश से दूर भेजा जा रहा हो उन्हें, पता नहीं क्यों एक अजीब सा डर सभी के मन में समाया हुआ था। हालांकि उस समय आज के जैसी नक्सलवादी हिंसात्मक घटनाओं की अधिकता नहीं थी, इसके बाद भी बस्तर के नाम से एक प्रकार का आदिवासी माहौल दिमाग में घर कर जाता था। फिल्मों, सीरियलों के वे दृश्य याद आ जाते जिनमें वहां के इंसान नंगे बदन, हाथों में हथियार लिये शहर से आये लोगों को पकड़ने, बंधक बनाने, मार डालने का काम करते हैं।

बहरहाल चाचाजी बैंक की नौकरी में वहां तीन-चार वर्ष अच्छी तरह से बिताकर वापस आ गये। उनके और चाचीजी के द्वारा वहां के हाल जानने के बाद वहां के लोगों के बारे में ज्ञात हुआ। उनके अनुभवों के अलावा बस्तर के बारे में बताने का काम समाचार-पत्रों ने, मीडिया के द्वारा किया गया। स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए नक्सलियों का आना, सरकार द्वारा स्थानीय निवासियों का शोषण, बस्तर में हो रहे अत्याचार और नक्सली हिंसा को मीडिया द्वारा इस तरह दिखाया गया कि लगा कि वहां सिर्फ और सिर्फ अत्याचार मचाया जा रहा है, शासन-प्रशासन द्वारा तानाशाही चलाई जा रही है।

एक आम भारतीय के दिलो-दिमाग पर पुलिस प्रशासन की जो छवि बनी हुई है, उसका नृशंसतापूर्ण, हैवानियत भरा रूप बस्तर में मीडिया के द्वारा दिखाया गया है। समझ में भी आता है कि जो व्यक्ति बस्तर को दूर से देखकर उसकी छवि का निर्धारण करेगा वह वहां तैनात पुलिसवालों के प्रति क्या सोच रखेगा। गरीब बस्तरवासियों को लूटना, उन्हें तंग करना, बेवजह मारपीट करना, निरपराधों का एनकाउंटर कर देना, पुलिस थानों-चौकियों में मार-मार कर अधमरा कर देना आदि-आदि ही बस्तर की पुलिस की पहचान बन गई है या कहें कि मीडिया के द्वारा बना दी गई है। हालांकि हमने कभी नक्सली हिंसा का समर्थन नहीं किया, जब भी कोई हमला हुआ, नक्सलियों ने नरसंहार सा किया, पुलिस अथवा सेना के जवानों को मारा, तब-तब हमने विरोध भी किया इसके बाद भी बस्तर में तैनात पुलिस प्रशासन के प्रति तनिक सहानुभूति भी नहीं जागी। इसके पीछे सम्भवतः पुलिस का वो चेहरा रहा होगा जो कि आये दिन सड़क पर दिखाई देता है। हां, उनके परिवार के प्रति एक अजब सा दर्द दिल में उमड़ता-घुमड़ता रहता था।

ये तो अच्छा हुआ कि अपने अपार स्नेह से अभिसिंचित करके ख्यातिलब्ध, वरिष्ठ पत्रकार तथा तेजतर्रार लेखन के लिए भी विख्यात भाई अनिल पुसदकर जी ने अपनी पुस्तक क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!पढ़ने को भेज दी। इस पुस्तक के पढ़ने के बाद लगा कि सिर्फ और सिर्फ पुलिस प्रशासन को कोसना ही उचित नहीं है। मीडिया द्वारा दिखाये जा रहे सत्य का ही पूर्ण सत्य मान लेना भी उचित नहीं है। अनिल भाई ने अपनी पुस्तक के तीन पात्रों के द्वारा बस्तर के सत्य को, वहां तैनात पुलिस प्रशासन के सत्य को, देशभर में मीडिया के द्वारा दिखाये गये सत्य को इस तरह से सामने रखा है कि दिमाग पर छाये कुहासे को कुछ हद तक छँटने का मौका मिला।

अनिल पुसदकर जी के द्वारा लिखित इस पुस्तक में प्रशंसनीय और आँखें खोलने वाले तथ्य प्रत्येक पृष्ठ पर दिये गये हैं। प्रत्येक पृष्ठ ने अपने आपमें शहीदों को छिपा रखा है तथा बस्तर क्षेत्र में हुई उनकी शहादत को भी सामने रखा है। अनिल भाई के द्वारा पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर नक्सलियों द्वारा सुरक्षाबलों पर किये हमलों और इनमें मारे गये/घायल हुए जवानों की संख्या का प्रस्तुतिकरण समूचे परिदृश्य को स्पष्ट कर देता है। वे अपनी इस पुस्तक में पुलिस प्रशासन की समस्याओं को प्रस्तुत करने का अथवा उनका समर्थन करने का कार्य नहीं करते हैं वरन् अपनी दृष्टि से उनके सवालों को सामने रखने का कार्य करते हैं। जिस पत्रकारिता से वे पिछले बीस वर्षों से जुड़े हैं, उसी के एक दूसरे पहलू पर चोट सी करते दिखते हैं। वे कोई समाधान नहीं सुझाते हैं वरन् अपने पात्रों के द्वारा उठाये गये सवालों के पीछे से एक और सवाल खड़ा करके इसका जवाब देने की जिम्मेवारी सारे समाज पर छोड़ देते हैं।

अपने अनुभवों के द्वारा, अपनी पारखी दृष्टि के द्वारा उन्होंने जो देखा, उस सत्य को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया। उनका प्रयास वाकई सराहनीय है किन्तु इसे और व्यापक बल तभी मिलेगा जब समाज के द्वारा, जनप्रतिनिधियों के द्वारा, मीडिया के द्वारा, सरकार के द्वारा, हमारे द्वारा उसका जवाब, सार्थक और सकारात्मक जवाब खोज लिया जायेगा। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक बस्तर जाने वाला प्रत्येक पुलिस वाला एक ही सवाल करेगा क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!