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09 जून 2026

पत्रों की अनमोल धरोहर

कुछ चीजें अचानक ही सामने आती हैं और तब उनकी ऐतिहासिकता का, उनके अनमोल होने का भान होता है.



चित्र में प्रदर्शित डाक लिफाफा हरेक के लिए महत्त्व का नहीं है. घर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में वर्षों से बंद सामान को खोला-टटोला गया कि यदि किसी काम का समझ आएगा तो रखा जायेगा
, अन्यथा कबाड़ी के हवाले किया जायेगा. इसी क्रम में हमारे बाबा जी से सम्बंधित बहुत सारे पत्र मिले; परिजनों के पत्र, उनके मित्रों के पत्र. इसी में एक पत्र यह भी मिला. 1934 में लिखे इस पत्र के समय बाबा जी कक्षा दस में थे. उरई में राजकीय पुस्तकालय के बगल में जो पुरानी इमारत है, उस समय वहीं  राजकीय विद्यालय चला करता था. कालांतर में यही राजकीय संस्था जीआईसी के पुराने भवन में संचालित होने लगी थी. यहाँ हमारे परिवार की तीन पीढ़ियों को पढ़ने का अवसर मिला, बाबा जी, उसके बाद हमारे चाचा जी और मामा जी, तथा उसके बाद हम और हमसे छोटा भाई.


इस पत्र को बाबा जी के किसी मित्र ने कोंच से भेजा था और इस लिफाफे में जो पत्र है, उसमें उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा का वर्णन एक कहानी के रूप में किया है. बाबा जी को उसे भेजने के पीछे उनके मित्र का उद्देश्य उनकी व्यथा को पढ़ना-समझना और उस कहानी को संशोधित करना था. पठन-पाठन-लेखन की आनुवंशिक परम्परा बाबा जी से शुरू होकर पिताजी से चलती हुई हमारे बाद की पीढ़ी अर्थात् हमारी बेटियों तक पहुँच गई है.



09 अप्रैल 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों पर रॉयल्टी

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी



शारदा जी से पहली मुलाकात हुई थी हमारे ही जनपद के कोंच में एक साहित्यिक कार्यक्रम में. परिचय इस मुलाकात से भी पुराना था और ये दोनों बातें ही श्वेतवर्णा के जन्म लेने से भी बहुत पुरानी थीं.


बहरहाल, श्वेतवर्णा का अस्तित्व में आना हुआ और हम जैसे स्वान्तः सुखाय लेखकों को भी जीवन मिला. अपने छपास रोग के आरम्भिक दिनों में कुछ पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं ही करवाया. इसके बाद एक-दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ अपने मित्रों के सहयोग से. उसी समय शारदा जी ने श्वेतवर्णा की जानकारी दी. इसके बाद तपती दुपहरी की शाम के साथ पुराने परिचय-सम्बन्ध-विश्वास ने ऐसा रंग जमाया कि अपनी पुस्तकों का कहीं और से प्रकाशन का सोच भी नहीं सके. जिस विश्वास से हमने पुस्तकों का प्रकाशन जारी रखा, उसी अधिकार से एक बार शारदा जी ने धमकी भी दे डाली थी कि हमने कहीं और से पुस्तकें प्रकाशित करवाईं तो अच्छा नहीं होगा.


आज उसी विश्वास-अपनत्व ने सुखद एहसास करवाया. इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी भी प्राप्त हुई है. यह सुखद एहसास विगत कई वर्षों में पहली बार मिला है. इसमें हमारी एकल लेखन वाली पुस्तकें तो हैं ही, इसके साथ ही देवेन्द्र सिंह जी की पुस्तक और ऋचा सिंह राठौर के साथ लिखी गईं पुस्तकें भी शामिल हैं. (हालाँकि इन लोगों के साथ वाली पुस्तकों की रॉयल्टी हम ही डकार जायेंगे)


संलग्न चित्र में बाकी विवरण इसीलिए छिपा दिया है ताकि कुछ लोग जलन महसूस न करने लगें. विवरण के लिए ऐसे लोग आकुल-व्याकुल न हों. ये विवरण हमारी थाती है, हमारे-शारदा जी के-श्वेतवर्णा के आपसी विश्वास, अपनत्व-अधिकार का परिचायक है.




12 अप्रैल 2025

तीस लाख वर्ष की मातृशक्ति 'लूसी'

इथियोपिया में 1975 में एक कंकाल मिला था. जाँच के बाद बताया गया कि यह कंकाल लगभग तीस लाख साल पहले पृथ्वी पर रहने वाली एक औरत का है. इसे इस दुनिया का सबसे पुराने मानव कंकाल के रूप में चिन्हित किया गया. जाँच से जानकारी मिली कि यह कंकाल ऑस्ट्रेलोपिथेकस एफरेंसिस प्रजाति का है, जो लगभग बत्तीस लाख वर्ष पुराना माना जा रहा है. इस कंकाल के मिलने के बाद से ही इस पर अनेक तरह के शोध किये गए, अनेक तरह से इसकी वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास किया गया. कंकाल का वास्तविक स्वरूप सामने लाने के लिए लगातार शोध भी चल रहे थे.

 



इसी सन्दर्भ में एक खबर सामने आई कि वैज्ञानिकों की एक टीम ने फॉरेंसिक फेसियल रिकंस्ट्रक्शन तकनीक से कंकाल की खोपड़ी के थ्री-डी स्कैन और चिम्पांजी के सॉफ्ट टिशू डाटा की सहायता ली. वैज्ञानिकों की टीम ने इस तकनीकी की मदद से कंकाल की खोपड़ी का लगभग वास्तविक चेहरा बना लेने में सफलता प्राप्त कर ली. इस चेहरे का अनुमानिक आकार पाने के बाद वैज्ञानिकों ने इस कंकाल या कहें कि कंकाल से बने चेहरे का नाम लूसी रखा. इस कंकाल की अनुमानित लम्बाई साढ़े तीन फीट है.

 

मानवीय सभ्यता के सबसे पुराने पूर्वजों में से एक लूसी का चेहरा, भले ही यह काल्पनिक अथवा तकनीक से उत्पन्न हुआ हो, इसे देखना रोमांचकारी है. इस चेहरे के द्वारा अपने अतीत से जुड़ना निश्चित ही अद्भुत है, रोमांचक है. तकनीकी सहायता से कंकाल से निर्मित चेहरे लूसी को नमन, लूसी के रूप में लाखों-लाखों वर्ष पहले की मातृशक्ति को नमन.

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इंटरनेट, सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 

20 सितंबर 2023

लम्बी ऐतिहासिक यात्रा पर विराम

18 सितम्बर को भारतीय संसद के लिए एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में याद रखा जायेगा. जिस संसद भवन ने अपनी 96 वर्षों की यात्रा में बहुत से ऐतिहासिक निर्णय होते देखे, बहुत से क्रांतिकारी परिवर्तन देखे, अनेक अप्रत्याशित घटनाक्रमों की गवाही दी, उसकी वह यात्रा इस दिन थम गई. 18 जनवरी 1927 से चली आ रही अनथक यात्रा को 18 सितंबर 2023 को विश्राम देकर नए संसद भवन को आने वाले समय के लिए तैयार कर लिया गया है. 


वर्ष 1911 में ब्रिटेन के तत्कालीन राजा जॉर्ज पंचम और महारानी ने भारत आने पर देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली बनाए जाने की घोषणा की. इसके बाद वहाँ संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, राजपथ, इंडिया गेट सहित अन्य हेरिटेज इमारतों को बनाने की जिम्मेदारी दो आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को दी गई. 1921 में संसद को बनाने का काम शुरू हुआ और 1927 में यह भवन बनकर तैयार हुआ. छह एकड़ में बने इस भवन को शुरुआत में काउंसिल हाउस के नाम से जाना जाता था. 1926 से 1931 तक भारत के वायसराय रहे लॉर्ड इरविन द्वारा इसका उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को किया गया. बाद में वर्ष 1956 में इसमें दो फ्लोर और वर्ष 2006 में एक संग्रहालय भी बनाया गया. यह संग्रहालय ढाई सौ सालों की समृद्ध लोकतांत्रिक विरासत को दिखाता है. 




18 सितम्बर से 22 सितम्बर 2023 तक चलने वाले विशेष सत्र के पहले दिन पुरानी संसद भवन की लम्बी यात्रा को याद किया गया. पाँच दिनों तक चलने वाले विशेष सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही के नए भवन में आरम्भ होते ही वो पुराना संसद भवन इतिहास बन जायेगा, जो 96 वर्षों की अवधि में घटित कई घटनाओं का गवाह रहा. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की कार्यप्रणाली जिस संविधान के प्रावधानों द्वारा संचालित होती है, उस संविधान का निर्माण इसी संसद भवन में हुआ था. 26 जनवरी 1950 में जब देश का संविधान लागू हुआ और राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने तो उस ऐतिहासिक पल का साक्षी ये पुराना संसद भवन बना था. देश के संविधान को लागू किये जाने के बाद संसद भवन ने 18 जून 1951 को हुए पहले संवैधानिक संशोधन को भी देखा. इसमें धारा 15, 19, 85, 87, 174, 176, 341, 342, 372 और 376 को संशोधित किया गया. अपनी इस यात्रा में संसद भवन ने कुल 105 संवैधानिक संशोधनों को होते देखा.


संसद भवन ने जहाँ सुखद पलों को अपने में सहेज रखा है वहीं उसके पहलू में दुखद घटनाओं ने भी जगह ले रखी है. 25 जून 1975 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के द्वारा आपातकाल की घोषणा किये जाने का निर्णय हो या फिर 1996 से 1998 की दो वर्षीय अवधि में चार प्रधानमंत्रियों का आना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है. संवैधानिक व्यवस्था के इस बुरे दौर से गुजरते हुए संसद भवन ने अपनी सुरक्षा, अपनी आन-बान-शान पर हमला होने का दर्द भी सहा है. देश की सुरक्षा व्यवस्था पर उस समय सवाल उठे जबकि संसद भवन को ही आतंकियों ने अपना निशाना बनाया. 13 दिसम्बर 2001 को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने लोकतंत्र के इस मंदिर पर हमला कर दिया. इस हमले में सुरक्षा कर्मियों और दिल्ली पुलिस के जवानों सहित कुल नौ लोग शहीद हुए. यद्यपि हमले को अंजाम देने आये सभी पाँचों आतंकवादियों को सुरक्षाबलों ने मौके पर ही मार गिराया तथापि इस हमले ने एक गहरा जख्म तो दे ही दिया.


आतंकी हमले की टीस लेकर खड़े पुराने संसद भवन ने इसके अलावा बहुत सारे ऐसे ऐतिहासिक पलों को, घटनाक्रमों को घटित होते देखा है, जिनको देश की एकता, अखंडता, गौरव आदि के लिए जाना जा सकता है. किसी समय जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं ने वहाँ के जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके रख दिया था. पाकिस्तान की तरफ से लगातार कश्मीर को कब्जाने के कुत्सित प्रयासों के चलते और संवैधानिक प्रावधानों के चलते जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न हिस्सा होने के बाद भी अलग-थलग सा दिखाई देता था. वर्तमान केन्द्र सरकार की दृढ इच्छशक्ति का सुफल भी पुराने संसद भवन ने महसूस किया जबकि 5 अगस्त 2019 को केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 पेश किया. इस अधिनियम के लागू हो जाने के बाद से  जम्मू-कश्मीर राज्य से सम्बंधित संविधान का अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी हो गया है. इसी के साथ अब देश में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केन्द्रशासित प्रदेशों की उपस्थिति भी हो गई है.




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 28 मई 2023 को नए संसद परिसर का उद्घाटन करते समय आशा व्यक्त की थी कि नया भवन सशक्तीकरण, सपनों को प्रज्वलित करने और उन्हें वास्तविकता में बदलने का उदगम स्थल बनेगा. ऐसा होना आज समय की माँग है क्योंकि विगत कुछ वर्षों से जिस तरह से पुराने संसद भवन के दोनों सदनों ने हंगामा, शोरगुल, आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी, सदन सञ्चालन में व्यवधान, असंवैधानिक कृत्यों को होते देखा है उससे न केवल संसद सदस्यों की साख में गिरावट आई है बल्कि संवैधानिक व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगे हैं. पुराने संसद भवन ने पाँच दिवसीय विशेष सत्र का पहला दिन अपने नाम करके नए संसद भवन को अपने उत्तराधिकारी के रूप में शेष चार दिनों को सौंप दिया है. अब नया संसद भवन देश के विकास की कहानी का साक्षी बनेगा और पुराना संसद भवन अतीत की गाथाओं को सुनाएगा. आशा है आज़ाद भारत में भारतीयों द्वारा बनाये गए इस नए ससंद भवन में हमारा लोकतंत्र अपनी श्रेष्ठता को प्राप्त करेगा. रिकॉर्ड समय में तैयार हुआ यह भवन न सिर्फ भारतीय मेधा का प्रतीक बना है बल्कि नए भारत की छवि प्रदर्शित करेगा जो अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों से आबद्ध है और उन पर गर्व करता है. नई संसद में स्थापित चोल शासकों का राजदंड सेंगोल राजशक्ति की न्याय के प्रति समर्पण का प्रतीक बनेगा और लोकतंत्र की इस कर्मभूमि को न्याय का मंदिर बनाएगा. 





 

19 नवंबर 2022

अल्पायु में बनी क्रांति मशाल

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी, ये कविता आज भी रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानी सुनाती है। वास्तव में अंग्रेजों के सामने घुटने न टेक, मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी का घोष कर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। वाराणासी में जन्मी मणिकर्णिका के रानी लक्ष्मीबाई बनने की गाथा भी उनके कार्यों की तरह अविस्मरणीय है। रानी लक्ष्मीबाई कही जाने वाली मनु का जन्म 19 नवम्बर 1835 को काशी में एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपन्त ताम्बे और माता का नाम भागीरथी बाई था। मोरोपन्त मराठा बाजीराव की सेवा करते थे। उनके पारिवारिक संरक्षण में ही मनु ने बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र, दोनों की ही शिक्षा ली। इस दौरान लोग उन्हें प्यार से ‘छबीली’ के नाम से भी पुकारने लगे। 

 

पन्द्रह वर्ष की आयु में, सन 1850 में मणिकर्णिका का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हुआ। यहीं आने के बाद वे मनु या मणिकर्णिका से झाँसी की रानी बन गयी। विवाह पश्चात उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। ये शायद दैवीय विधान कहा जाये या कि नियति का खेल कि विवाह के एक वर्ष पश्चात लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसकी चार माह पश्चात ही मृत्यु हो गयी। इस दुख के सदमे के कारण राजा अस्वस्थ रहने लगे। इसी के चलते बाद में 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव का निधन हो गया। एक तरफ झाँसी शोक में डूबी थी और दूसरी तरफ अंग्रेज उसे हड़पने का मन बनाये थे। इसीलिए अंग्रेजों द्वारा चाल चलते हुए रानी लक्ष्मीबाई द्वारा 20 नवम्बर 1853 को गोद लिए बालक दामोदर राव को रानी लक्ष्मीबाई का वारिस मानने से इंकार कर दिया।

 



अंग्रेजों ने झाँसी पर चढ़ाई कर दी। रानी ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए अंग्रेजों को सा़फ कह दिया ‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी’। उधर 1857 के विद्रोहियों ने सदर बा़जार स्थित किले पर कब़्जा कर लिया। अपनी मौत से भागते हुए झाँसी में मौजूद सभी अंग्रे़जों ने झाँसी के मुख्य किले में शरण ली। इस संघर्ष में 61 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा गया। 6 जून से 8 जून 1857 तक चले इस संघर्ष में कैप्टन डनलप, लेफ्टिनेण्ट टेलर और कैप्टन गॉर्डन मारे गये। कैप्टन स्कीन ने बचे हुए अंग्रे़ज सैनिकों सहित विद्रोहियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटना के बाद 12 जून 1857 को रानी लक्ष्मीबाई ने एक बार फिर झाँसी राज्य का प्रशासन संभाला। 

 

अंग्रेज अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनका जनरल ह्यूरो़ज आखिरकार बदला लेने की नीयत से 21 मार्च 1858 को झाँसी आ पहुँचा। यहाँ 21 मार्च से 3 अप्रैल उसका  रानी के साथ घनघोर युद्ध हुआ। युद्ध जब चरम पर पहुँच गया था किन्तु रानी को जीत सुनिश्चित नहीं दिख रही थी। उनके कुछ अपने लोगों ने विश्वासघात करके अंग्रेजों को अवसर दे दिया। अपने सलाहकारों की सलाह से रानी लक्ष्मीबाई 03 अप्रैल 1858 को आधी रात के बाद अपने अतिनिकट और विश्वस्त सैनिकों के साथ कालपी की ओर रवाना हुई। अंग्रेज सैनिकों ने उनका पीछा किया, पर वे हाथ नहीं आयीं। 

 

कालपी से युद्ध की स्थिति में ही रानी ग्वालियर पहुंची। यहाँ के किले पर कब्जा करने के बाद उनका युद्ध अंग्रेजों से फिर शुरू हुआ। यहाँ भी रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रे़जी सेना को पीछे हटना पड़ा। युद्ध के विषम क्षणों में रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र को अपनी पीठ पर बाँध कर किले से कूद पड़ी। उनको पकड़ने की नीयत से जनरल ह्यूरो़ज स्वयं युद्धभूमि में डटा हुआ था। अंग्रेजों को लगातार परास्त करती रानी ने जब सोनरेखा नाले को पार करना चाहा तो दुर्भाग्यवश उनका घोड़ा इस नाले को पार नहीं कर सका। वह वहीं अड़ा रहा। उसी समय पीछे से एक अंग्रे़ज सैनिक ने रानी पर तलवार से हमला कर दिया। इस हमले में उनको गम्भीर चोट आई। इस कारण मात्र 23 वर्ष की आयु में 18 जून 1858 को वे वीरगति को प्राप्त हुई। कहते हैं उनके सैनिक साथी उनको घायलावस्था में बाबा गंगादास की कुटिया में ले गये। यहीं रानी लक्ष्मीबाई का प्राणान्त हुआ था। इसी स्थान पर उनका अन्तिम संस्कार किया गया। 

 

अल्पायु में वे संघर्ष की चेतना ना केवल बुन्देलखण्ड में जगा गईं बल्कि महिलाओं को भी जगा गईं। रानी का बलिदान अमर है और बरसों तक सभी को आलोकित करता रहेगा।





 

04 नवंबर 2022

फाउंटेन पेन आज भी है लेखकों की पसंद

फाउंटेन पेन एक ऐसा उपकरण होता है, जिसके माध्यम से लेखन कार्य किया जाता है. एक निब की सहायता से इसका उपयोग स्याही को कागज़ पर उतार कर लिखा जाता है. आज बहुतायत में लोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग लिखने के लिए करने लगे हैं फिर भी बहुत सारे लोग लिखने के लिए पेन का उपयोग करते हैं. मूल रूप से दो तरह के पेन उपयोग में लाए जा रहे हैं. इनमें एक बॉलपेन और दूसरा फाउंटेन पेन है. फाउंटेन पेन का उपयोग अब कम ही दिखता है. इसके अलावा वर्तमान में बच्चों द्वारा लिखने के लिए पेन्सिल का उपयोग किया जाता है. फाउंटेन पेन में उस पेन में बनी टंकी के अंदर भरी स्याही को निब की सहायता से कागज़ पर चलाया जाता है. निब और जीबी की सहायता से कागज पर उतरी स्याही कागज पर चिपक जाती है. इसी तरह से अक्षरों का लिखना होता रहता है.  


पूर्व में जबकि पेन का अविष्कार न हुआ था तब पक्षियों के पंखों से, हड्डियों से बने पेन की सहायता से, पत्थर को नुकीला बनाकर लेखन कार्य हुआ करता था. कालांतर में इसका विकास हुआ, जिसके चलते पेंसिल और फाउंटेन पेन का आविष्कार हुआ. फाउंटेन पेन का अविष्कार होने का लाभ ये हुआ कि अब पेन को बार-बार स्याही में डुबोने की आवश्कता नहीं होती थी. इससे पहले जिस तरह के उपकरण लेखन हेतु उपयोग में लाये जा रहे थे, वे चाहे हड्डियों से बने हों, पक्षियों के पंखों के बने रहे हों या फिर पत्थर से निर्मित हों सभी को बार-बार स्याही में डुबोना पड़ता था.




आज हम लोग जिस तरह के फाउंटेन पेन को देख रहे हैं, उसका स्वरूप बाँस के माध्यम से बनाया गया था. पहले पेन बनाने के लिए इसका उपयोग किया गया था. बाँस को काटकर एक शार्प निब वाला पेन तैयार किया गया, जिसे इंक बुश के नाम से जाना जाता था. यह पेन अन्य पेन के मुकाबले में बहुत बड़ा होता था. इंक बुश पेन आगे से पतला और पीछे से मोटा होता था. इसका पीछे वाला हिस्सा खोखला होता था, जिसमें स्याही भरी जाती थी. इसी के बाद ही फाउंटेन पेन अस्तित्व में आये. ऐसा माना जाता है कि पेन का सर्वप्रथम आविष्कार इराक में हुआ था. यह एक नुकीली धातु के द्वारा बनाया गया था. यदि पहले रीड पेन की बात की जाये तो उसका आविष्कार मिस्त्र में हुआ था. ऐसा कहा जाता है कि फाउंटेन पेन का आविष्कार भी मिस्त्र में हुआ था.


फाउंटेन पेन का अविष्कार फ्रेंच के वैज्ञानिक पेट्राचे पोएनरु और रॉबर्ट विलियम थॉमसन ने किया. उन्होंने 25 मई 1857 को इसका आविष्कार किया था. यदि ऐतिहासिक रूप में देखा जाये तो भारत में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के लोगों को सबसे पहले पेन के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है. मोहनजोदड़ो शहर से कई ऐसे लेखयुक्त मोहरें प्राप्त हुईं हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में पेन का आविष्कार मोहनजोदड़ो काल में हुआ था. फाउंटेन पेन के आविष्कार से ही बॉलपेन के आविष्कार का रास्ता खुला. बॉलपेन का आविष्कार इस क्षेत्र में क्रांति माना जाता है. बॉलपेन का आविष्कार जॉन जैकब लाउड और लासलो बीरो ने किया.


जब फाउंटेन पेन बना था तो इसकी खूब बिक्री हुई. कालांतर में जब साठ के दशक में बॉलपेन की तकनीक आयी तो लोगों द्वारा इसे हाथों-हाथ लिया गया. फाउंटेन पेन का उपयोग आज भले कम हो रहा हो किन्तु वह पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है. आज भी ज्यादातर लेखक फाउंटेन पेन का उपयोग करते हैं. सुलेखन के लिए लोग आज भी फाउंटेन पेन को ही महत्त्व देते हैं.


(फाउंटेन पेन दिवस, 04 नवम्बर पर विशेष)





 

08 मई 2022

काशी विश्वनाथ मंदिर का नक्शा

यह नक्शा लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में रखा काशी विश्वनाथ मंदिर का है, जिसे जेम्स प्रिंसेप ने बनाया था। इस नक्शे में काशी विश्वेश्वर मन्दिर के गर्भगृह को बीचो बीच दिखाया गया है। इस पर अंग्रेजी में महादेव लिखा गया है। इसके चारों तरफ अन्य मन्दिर बने हैं।


औरंगजेब के हमले से स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को बचाने के लिए सन 1669 में मंदिर के पुजारी जी ज्ञानवापी कुंड में कूद गए थे। जब औरंगजेब की सेना जब स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को नुकसान नहीं पहुंचा पाई, तब उसने मंदिर के बाहर बैठे 5 फीट ऊंची नंदी की मूर्ति पर हमला कर दिया। मूर्ति पर खूब हथौड़े चले, खूब प्रहार किए गए पर नंदी अपनी जगह से हिले नहीं। तमाम प्रयासों के बाद सेना हार गई और नंदी जी को उसी जगह छोड़ दिया। यह प्रतिमा ज्ञानवापी मस्जिद की तरफ है। हम सब जानते हैं कि नंदी जी का मुँह सदा शिवलिंग स्थापित गर्भगृह की ओर ही होता है।


नक्शे के नीचे लिखे गए डिस्क्रिप्शन को गौर से देखा जाए, तो अंग्रेजी में लिखा है - The doted line shows the portion of the temple occupied by the present masjid.


अर्थात नक्शे में बनाई गई डॉटेड लाइन मौजूदा मस्जिद के कब्जे वाले मंदिर के हिस्से को दर्शाती है। यह नक्शा सन 1832 में तैयार किया गया था।



नक्शा और पोस्ट डॉ. अभिलाषा की फेसबुक पोस्ट से साभार 

27 सितंबर 2021

अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति संवेदित नहीं नागरिक

किसी भी समाज की ऐतिहासिक धरोहरों के द्वारा उस समाज के बारे में आसानी से जाना जा सकता है. बहुत सारे देश हैं जो आज भी अपनी हजारों साल पुरानी धरोहरों को सुरक्षित और संरक्षित रखे हुए हैं. बहुत बार पढ़ने में आता है कि फलां देश के किसी शहर के नागरिकों ने अपने किसी ऐतिहासिक महत्त्व के वृक्ष को कटने से बचाने के लिए आन्दोलन किया. कभी समाचार सुनाई देता है कि किसी देश के नागरिकों ने स्वेच्छा से अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के साफ़-सफाई का जिम्मा ले लिया है. ऐसा समाचार पढ़ते-सुनते-देखते समय मन में एक सवाल कौंधता है कि क्या ऐसा हमारे देश के नागरिक नहीं कर सकते?


इस सवाल के सापेक्ष पहली बात यह कि यह सारे नागरिकों के सन्दर्भ में नहीं है. दूसरी बात कि इस सवाल के साथ ही आप स्वयं अपने आसपास देखिये और महसूस करिए कि क्या हमारे सभी नागरिक अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, इमारतों के प्रति जिम्मेवारी का भाव लिए हैं? आइये, अब आगे बढ़ते हैं. हमारे देश में ऐतिहासिक महत्त्व की इमारतों, स्मारकों की कहीं कोई कमी नहीं. बहुत सारे किले, महल, मंदिर, स्मारक आदि हमारी ऐतिहासिकता की कहानी स्वयं कहते हैं. इन ऐतिहासिक महत्त्व की धरोहरों में से बहुतायत में ऐसी मिलेंगीं जहाँ पर किसी न किसी रूप में देश के नागरिकों ने अपनी नकारात्मक सक्रियता के निशान छोड़ दिए हैं. कहीं किसी आशिक का तीर घुसा हुआ दिल देखने को मिल जायेगा तो कहीं किसी दीवार पर किसी के प्रेम का नाम खुदा हुआ मिल जायेगा. कहीं किसी इमारत के कोने पर पीक की नक्काशी देखने को मिल जाएगी तो कहीं किसी ने रंगों से करामात दिखाई होगी. कहीं कुछ तोड़ा गया होगा तो कहीं से कुछ उखाड़ा गया होगा.


क्या हम नागरिकों में वाकई सामाजिक सोच समाप्त होती जा रही है? क्या हम नागरिकों में अपने इतिहास के प्रति गरिमा बोध मिटता जा रहा है? क्या वाकई हम नागरिक अपने इतिहास को कलंकित करने वाला समझने लगे हैं? क्या हमें अपनी ऐतिहासिक धरोहरों से प्रेम-स्नेह नहीं रह गया है? जो धरोहरें हैं उनमें से बहुतों के प्रति यदि सरकार संवेदित नहीं है तो इनके प्रति क्षेत्रीय नागरिक भी असंवेदित है. कहीं धन के लालच में इमारत को नुकसान पहुँचाया जा रहा है तो कहीं विद्वेष की भावना से धरोहर को क्षतिग्रस्त किया जा रहा है. ऐसी विषम स्थिति में यदि किसी व्यक्ति के अपने व्यक्तिगत प्रयासों से कोई धरोहर सुरक्षित, सुसज्जित नजर आती है तो दिल वाकई प्रसन्न हो उठता है.


जनपद जालौन के रामपुरा में वहाँ के कछवाह राजाओं की धरोहर, उनका किला और उसका बहुतायत साजो-सामान उनके वारिस कुँवर केशवेन्द्र सिंह द्वारा आज भी सुरक्षित, संरक्षित, सुसज्जित करके रखा गया है. अभी हाल ही में किले को देखने का, वहाँ भ्रमण करने का अवसर मिला. जल्द ही इस बारे में आपके साथ अपना अनुभव साझा किया जायेगा. 


कुँवर केशवेन्द्र सिंह 


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20 सितंबर 2021

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान)

 

काष्ठा = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग

■ 1 त्रुटि  = सैकन्ड का 300 वाँ भाग

■ 2 त्रुटि  = 1 लव 

■ 1 लव = 1 क्षण

■ 30 क्षण = 1 विपल 

■ 60 विपल = 1 पल

■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट) 

■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा)

■3 होरा=1प्रहर व 8 प्रहर 1 दिवस (वार)

■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) 

■ 7 दिवस = 1 सप्ताह

■ 4 सप्ताह = 1 माह 

■ 2 माह = 1 ऋतू

■ 6 ऋतू = 1 वर्ष 

■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी

■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी 

■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग

■ 2 युग = 1 द्वापर युग 

■ 3 युग = 1 त्रैता युग 

■ 4 युग = सतयुग

सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग

■ 72 महायुग = मनवन्तर 

■ 1000 महायुग = 1 कल्प

■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ)

■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प (देवों का अन्त और जन्म)

महाप्रलय  = 730 कल्प (ब्रह्मा का अन्त और जन्म)

 

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यहीं है जो हमारे देश भारत में बना हुआ है, जिस पर हमे गर्व होना चाहिये.


(सोशल मीडिया पर प्राप्त सन्देश के अनुसार)

17 सितंबर 2021

इतिहास से छेड़छाड़ के सम्बन्ध में इरफान हबीब, रोमिला थापर के नाम पत्र

आजकल मूर्धन्य इतिहासकार श्री इरफ़ान हबीब और सुश्री रोमिला थापर जी के नाम मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त श्री विजय मनोहर तिवारी का खुला पत्र सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें मध्यकाल के मुस्लिम इतिहास को लेकर की गई मिलावट और मनमानी पर कई सवाल खड़े किए गए हैं। इस लंबी चिट्‌ठी में उन्होंने लिखा है कि आज इतिहास को लेकर भारतीयों में पहले से ज़्यादा जागरूकता पैदा हुई है। इंटरनेट ने तथ्यों को उजागर करने में बहुत मदद की है। आप भी पढ़ें और बताएं कि जो बात उन्होंने कहीं हैं या तथ्य उन्होंने रखें हैं आप उनसे कितना सहमत हैं।


पूरी चिट्‌ठी इस प्रकार है-


आदरणीय इरफान हबीब साहब/ रोमिला थापर मैम,

सादर प्रणाम।


मैं साइंस का विद्यार्थी रहा हूँ। मगर बहुत बचपन से ही मेरी दिलचस्पी इतिहास में थी। लेकिन सबसे पास के कॉलेज में इतिहास में एमए की व्यवस्था ही नहीं थी और मैं पढ़ाई के लिए बाहर जा नहीं सकता था, इसलिए गणित में एमएससी करके एक साल काॅलेज में पढ़ाया। फिर लिखने के शौक की वजह से मीडिया में आ गया।


करीब पच्चीस बरस प्रिंट और टीवी में काम किया। इस दरम्यान पाँच साल तक लगातार आठ दफा भारत भर के कोने-कोने में घूमनेे का भी मौका मिला। इन पच्चीस-तीस सालों में इतिहास ने मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ा। स्कूल से कॉलेज तक की अपनी पूरी पढ़ाई में जितनी किताबें नहीं पढ़ी होंगी, उतनी अकेले इतिहास की किताबें पढ़ी होंगी। खासतौर से भारत का मध्यकालीन इतिहास। भारत के ‘मध्यकाल’ से आप जैसे विद्वानों का आशय जो भी हो, मेरी मुराद लाहौर-दिल्ली पर तुर्कों के कब्ज़े के बाद से शुरू हुए भयावह दौर की है।


मुझे अच्छी तरह याद है कि तीस साल पहले गणित की डिग्री लेते हुए जब इतिहास की किताबों में ताकाझाँकी शुरू की थी, तब इरफान हबीब और रोमिला थापर के नाम बहुत इज़्ज़त से ही सुने और माने थे। हमने आपको इतिहास लेखन में बहुत ऊँचे दर्जे पर देखा था।


हम नहीं जानते थे कि इतिहास जैसे सच्चे और महसूस किए जाने वाले विषय में भी कोई मिलावट की गुंजाइश हो सकती है। हम सोच भी नहीं सकते थे कि इतिहास में कोई अपनी मनमर्ज़ी कैसे डाल सकता है।


मैं बरसों तक वही पढ़ता रहा, जो आज़ादी के बाद आप जैसे मनीषियों ने स्थापित किया। सल्तनत काल और फिर मुगल काल के शानदार और बहुत विस्तार से दर्ज एक के बाद एक अध्याय। सल्तनत काल के सुल्तानों की बाज़ार नीतियाँ, विदेश नीतियाँ और फिर भारत के निर्माण में मुग़ल काल के बादशाहों के महान योगदान और सब तरह की कलाओं में उनकी दिलचस्पियाँ वगैरह। वह कथानक बहुत ही रूमानी था।


वह इन सात सौ सालों के इतिहास की एक शानदार पैकेजिंग करता था। उसी पैकेजिंग से हिंदी सिनेमा के कल्पनाशील महापुरुषों ने बड़े परदे पर ‘मुगले-आजम’ और ‘जोधा-अकबर’ के कारनामे रचे।


चूँकि मुझे इतिहास में एमए की डिग्री नहीं लेनी थी और न ही पीएचडी करके किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी की नौकरी की तमन्ना या जरूरत थी इसलिए मैं एक आज़ाद ख़्याल मुसाफिर की तरह इतिहास में सदियों तक भटका और कई ऐसे लोगों से अलग-अलग सदियों जाकर मिला, जो अपने समय का सच खुद लिख रहे थे।


इस भटकन में एक सिरे को पकड़कर दूसरे सिरे तक गया। एक के बाद दूसरे कोने तक गया। एक सूत्र से दूसरे सूत्र तक गया। मीडिया में बीते ढाई दशक के दौरान कोई साल ऐसा नहीं बीता होगा जब मैं किसी न किसी ब्यौरे को पढ़ते हुए ऐसे ही एक से दूसरे सूत्रों तक नहीं पहुँचा होऊँ। उस खोजी तरीके ने मेरे दिमाग की खिड़कियाँ खोलीं। रोशनदान फड़फड़ाए। दरवाज़े हिल गए। एक अलग ही तरह का मध्यकाल मेरे सामने अपनी सारी सच्चाई के साथ उजागर हुआ।


ऐसा होना तब शुरू हुआ जब मैंने समकालीन इतिहास के मूल स्त्रोतों तक अपनी सीधी पहुँच बनाई। यह काम उसी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जरिए हुआ, जहाँ आप इतिहास के एक प्रतिष्ठित आचार्य रहे हैं। मैंने आज़ादी के बाद की लिखी गई इतिहास की किताबों को अपनी लाइब्रेरी की एक अल्मारी में रखा और सीधे मुखातिब हुआ मध्यकाल के मूल लेखकों से।


कुछ के नाम इस प्रकार हैं, गलत हों तो दुरुस्त कीजिएगा, कम हों तो जोड़िएगा-फखरे मुदब्बिर, मिनहाजुद्दीन सिराजुद्दीन जूजजानी, जियाउद्दीन बरनी, सद्रे निजामी, अमीर खुसरो, एसामी, इब्नबतूता, निजामुद्दीन अहमद, फिरिश्ता, मुहम्मद बिहामत खानी, शेख रिजकुल्लाह मुश्ताकी, अल हाजुद्दबीर, सिकंदर बिन मंझू, मीर मुहम्मद मासूम, गुलाम हुसैन सलीम, अहमद यादगार, मुहम्मद कबीर, याहया, ख्वंद मीर, मिर्जा हैदर, मीर अलाउद्दौला, गुलबदन बेगम, जौहर आफताबची, बायजीद ब्यात, शेख अबुल फजल, बाबर और जहाँगीर वगैरह। ज़ाहिर है इनके अलावा और भी कई हैं, जिन्होंने बहादुर शाह ज़फर तक की आँखों देखी लिखी।


इतिहास हमारे यहाँ एक उबाऊ विषय माना जाता रहा है। आम लोगों की कोई रुचि नहीं रही यह पढ़ने में कि बाबर का बेटा हुमायूँ, हुमायूँ का बेटा अकबर, उसका बेटा सलीम, उसका बेटा खुर्रम और उसका बेटा औरंगज़ेब। इसे पढ़ने से मिलना क्या है? गाँव-गाँव में बिखरी और बर्बाद हो रही ऐतिहासिक विरासत के प्रति आम लोगों का नज़रिया बहुत ही बेफिक्री का रहा है। उन्हें कोई परवाह ही नहीं कि ये सब कब और किसने बनाए और कब? और किसने बर्बाद किए, क्यों बर्बाद किए?


गाँव-गाँव में बर्बादी की निशानियाँ टूटे-फूटे बुतखानों और बर्बाद बुतों की शक्ल में मौजूद हैं। मैं जिस शहर के कॉलेज में पढ़ता था, वहाँ नौ सौ साल पहले परमार राजाओं ने एक शानदार मंदिर बनाया था, जिसे बाद के दौर में बहुत बुरी तरह तोड़कर बरबाद किया गया और एक मस्जिदनुमा ढाँचा उस पर खड़ा किया। डेढ़ लाख आबादी के उस शहर में ज़्यादातर बाशिंदे नहीं जानते कि वह सबसे पहले किसने तोड़ा था, कौन लूटकर ले गया था, किसने उसके मलबे से इबादतगाह बनाई?


अलबत्ता प्राचीन बुतखानों की बरबादी को एकमुश्त सबसे बदनाम मुगल औरंगज़ेब के खाते में एकमुश्त डाला जाता रहा है। वहाँ भी पुरातत्व वालों के एक साइन बोर्ड पर आलमगीरी मस्जिद ही लिखा है, जो एक पुराने मंदिर को तोड़कर बनाई गई। वह बरबाद स्मारक उस शहर के एक ज़ख्म की तरह आज भी खड़ा है, जहाँ बहुत कम लोग ही आते हैं। किसी को कोई मतलब नहीं है।


जब मैं समकालीन लेखकों के दस्तावेजी ब्यौरों में गया तो पता चला कि मिनहाजुद्दीन सिराज ने उस मंदिर की ऊँचाई 105 गज ऊँची बताई है, जिसे शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने 1235 के भीषण हमले में तोड़कर बरबाद किया। लेकिन मुझे यह जानकर हैरत हुई कि इतिहास विभाग में नौकरी करने वाले कई प्रोफेसरों को भी इसके बारे में कुछ खास इल्म था नहीं।


जब किसी विषय के प्रति किसी भी देश के अवाम में ऐसी उदासीनता और बेफिक्री होती है तो मिलावट और मनमर्ज़ी उन लोगों के लिए बहुत आसान हो जाती है, जो एक खास नजरिए से अतीत की सच्चाइयों को पेश करना चाहते हैं। उस पर अगर सरकारें भी ऐसा ही चाहने लगें तो यकीनन यह अल्लाह की ही मर्ज़ी मानिए।


मैं अपने मूल विषय पर आता हूँ। बरसों तक इतिहास को एक खास पैटर्न पर पढ़ते हुए हमने अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नीतियों को इस अंदाज़ में पढ़ा जैसे कि दिल्ली के किले में बैठकर हुए फैसलों से भारत का शेयर मार्केट आसमान छूने लगा था और विदेशी निवेश में अचानक उछाल आ गया था, जिसने भारत के विकास के सदियों से बंद दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिए थे।


जावेद अख़्तर जैसे फिल्मकार भी ऐसे ही इतिहास के हवाले से खिलजी की बाजार नीतियों के जबर्दस्त मुरीद देखे गए हैं। इतिहास की उन किताबों को पढ़कर कोई भी सुल्तानों और बादशाहों का दीवाना हो जाएगा। जबकि खिलजी के समय अपनी आँखों से सब कुछ देखने वाले लेखकों ने जो बताया है, वह असल इतिहास पूरी तरह गायब है और आपसे बेहतर कौन जानता है कि वह कितना भयावह है।


मसलन बाज़ार नीतियों के कसीदों में दिल्ली में सजे गुलामों के बाजार का कोई ज़िक्र तक नहीं है, जहाँ दस-बीस तनके में वे लड़कियाँ ग़ुलाम बनाकर बेची गईं, जो खिलजी की लुटेरी फौजें लूट के माल में हर तरफ से ढो-ढोकर लाई जा रही थीं। जियाउद्दीन बरनी ने गुलामों की मंडी के ब्यौरे दिए हैं और ऐसा हो नहीं सकता कि आपकी आँखों के सामने से वह मंजर गुजरा न हो। इसी तरह मोहम्मद बिन तुगलक की नीतियों पर ऐसे चर्चा की गई, जैसे बाकायदा कोई नीति निर्माण जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ आज की तरह संवैधानिक तौर पर काम कर रही थीं। जबकि उस दौर में अपने आसपास तमाम तरह के मसखरों और लुटेरों से घिरे तथाकथित सुलतानों की सनक ही इंसाफ थी।


तुगलक की महान नीतियों के कसीदों में ईद के वे रौनकदार जलसे गायब कर दिए गए, जिनमें इब्नबतूता ने बड़े विस्तार से उन जलसों में नाचने के लिए पेश की गई लड़कियों से मिलवाया है। वे लड़कियाँ और कोई नहीं, हारे हुए हिंदू राज्यों के राजाओं की बेटियाँ थीं, जिन्हें ईद के जलसे में ही तुगलक अपने अमीरों और रिश्तेदारों में बाँट देता था। लुटेरों की उन महफिलों में तमाम आलिम और सूफी भी सरेआम नज़र आते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि ये गिरोह आपकी निगाहों में आने से रह गए?


मैं अक्सर सोचता हूँ कि सदियों तक सजे रहे उन गुलामों के बाज़ार में बिकी हजारों-लाखों बेबस बच्चियाँ और औरतें कहाँ गई होंगी? वे जिन्हें भी बेची गई होंगी, उनकी भी औलादें हुई होंगी? आज उनकी औलादें और उनकी भी औलादों की औलादें सदियों बाद कहाँ और किस शक्ल में पहचानी जाएँ?


जब मैं यह सोचता हूँ तो आज के आजम-आजमी, जिलानी-गिलानी, इमरान-कामरान, राहत-फरहत, सलीम-जावेद, आमिर-साहिर, माहरुख-शाहरुख, औवेसी-बुखारी, जुल्फिकार-इफ्तखार, तसलीमा-तहमीना, शेरवानी-किरमानी जैसे अनगिनत चेहरे आँखों के सामने घूमने लगते हैं।


बांग्लादेश के इस छोर से लेकर अफगानिस्तान के उस छोर तक इस हरी-भरी आबादी के बेतहाशा फैलाव में नजर आने वाला हरेक चेहरा और तब मुझे लगता है कि मातृपक्ष (Mother’s side) से धर्मांतरण का व्याकरण कितना जटिल और अपमानजनक है, जो हमारी अपनी याददाश्तों से गुमशुदा किए बैठे हैं और यह सब नजरअंदाज़ कर हम मुगलों को राष्ट्र निर्माता बताकर प्रसन्न हैं। यह कैसी कयामत है कि कोई खुद को गाली देकर खुश होता रहे!


ऐसे दो-चार नहीं सैकड़ों रुला देने वाले विवरण हैं, जो इतिहास पर लिखी हुई किताबों में पूरी तरह गायब हैं। इन पर लंबी बहस हो सकती है। कई किताबें लिखी जा सकती हैं। खुद ये असल और एकदम ताजे ब्यौरे मोटी-मोटी कई किताबों में रियल टाइम दर्ज हैं। इनमें कोई मिलावट नहीं है। कोई मनमर्जी नहीं है। जो देखा जा रहा था, जो घट रहा था, बिल्कुल वही जस का तस कागजों पर उतार दिया गया है। लेकिन आजादी के बाद के इतिहास लेखन में भारत के मध्यकाल के इतिहास का यह भोगा हुआ सच पूरी तरह गायब है।


इसके उलट हमने ऐसी नकली और मनगढ़ंत अच्छाइयों का महिमामंडन किया, जो दरअसल कहीं थी ही नहीं। भारत के मध्यकाल के इतिहास की किताबें कूड़े में से बिजली बनाने के विलक्षण प्रयासों जैसी हैं और इन प्रयासों का नतीजा यह है कि सत्तर साल बाद कूड़ा अपनी पूरी सड़ांध के साथ सामने है। बिजली की रोशनी आपके ख्यालों और ख्वाबों में ही रोशन है! और मध्यकाल के पहले जिसे एक बिखरा हुआ भारत माना गया, जो एक राजनीतिक इकाई के रूप में कभी था ही नहीं, उसमें एक सबसे कमाल की बात को आप साहेबान में किसी ने गौर करने लायक ही नहीं समझा। गुजरात में साेमनाथ से लेकर हिमालय में केदारनाथ तक शिव के ज्योतिर्लिंगों की स्थापना और पूजा परंपरा हजारों साल पुरानी है।


किसी मुल्क के इतने बड़े भौगोलिक विस्तार में देवी-देवता और उनकी मूर्तियाँ एक ही तरह से बनाईं और पूजी जा रही थीं। आंध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम के पहाड़ी स्तूपों से लेकर अफगानिस्तान के बामियान तक गौतम बुद्ध एक ही रूप में पूजे जा रहे थे, जिनके महान स्मारक इस छोर से उस छोर तक बन रहे थे। यह तो दो हजार साल पीछे की बातें हैं।


मतलब, राजनीतिक रूप से भले ही इतने बड़े भारत में हजार राजघराने राज कर रहे होंगे, मगर उनकी सांस्कृतिक पहचान एक ही थी। वह ‘कल्चरल कवर’ पूरे विस्तार में भारत का एक शानदार आवरण था, जिसके रहते आपसी राजनीतिक संघर्ष में भी भारत की संस्कृति चारों तरफ एक जैसी ही फलती-फूलती रही थी। यह महत्वपूर्ण बात थी, जिसे आजाद भारत के इतिहास लेखकों ने बिल्कुल ही नजरअंदाज किया। क्या यह अनेदखी अनायास है या एक शरारत जो जानबूझकर की गई?


अगर भारत के इतिहास को एक किक्रेट मैच के नज़रिए से देखा जाए तो पचास ओवर के टेस्ट मैच में सल्तनत और मुगल काल आखिरी ओवर की गेंदों से ज़्यादा हैसियत नहीं रखते। लेकिन इतिहास की कोर्स की किताबों में इन खिलाड़ियों को पूरे ‘मैच का मैन ऑफ द मैच’ बना दिया गया है। अगर मैच जिताने लायक ऐसा कुछ बेहतरीन होता भी ताे कोई समस्या या आपत्ति नहीं थी।


जिन लेखकों के नाम मैंने ऊपर लिखे हैं, उनके लिखे विवरणों से साफ जाहिर है कि सल्तनत और मुगल काल के सुल्तानों और बादशाहों के कारनामे अपने समय के इस्लामी आतंक और अपराधों से भरी बिल्कुल वही दुनिया थी, जो हमने सीरिया और काबुल में इस्लामिक स्टेट और अफगानिस्तान में तालिबानों के रूप में अभी-अभी देखी। इस्लाम के नाम पर भारत भर में वे बिल्कुल वही कर रहे थे, जो वे आज कर रहे हैं। सदियों तक माथा फोड़ने के बावजूद वे भारत का संपूर्ण इस्लामीकरण नहीं कर पाए और एक दिन खुद खत्म हो गए।


तीस साल बाद आज भी मैं इतिहास के विवरणों में जाता रहता हूँ। भारत की यात्राओं में मैं नालंदा और विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों के खंडहरों में भी घूमा हूँ और दूर दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य के बर्बाद स्मारकों में भी गया हूँ। इनकी असलियत आपसे बेहतर कौन जानता है कि ये उस दौर में इस्लामी आतंक के शिकार हुए हैं। ऐसे हजारों और हैं।


बामियान के डेढ़ सौ मीटर ऊँचे बुद्ध तभी बने होंगे जब आज का पूरा अफगानिस्तान बौद्ध और हिंदू ही रहा होगा। वे सब हमेशा-हमेशा के लिए बरबाद कर दिए गए। लेकिन आजाद भारत की इतिहास की किताबों में सल्तनत और मुगलकाल के उन कारनामों पर पूरी तरह चादर डालकर लोभान जला दिए गए। माशाअल्लाह, इतिहास पर पड़ी इन चादरों के आसपास आप भी किसी सूफी से कम नहीं लगते।


अगर हिंदी सिनेमा की एक मशहूर फिल्म ‘शोले’ की नजर से भारत के इतिहास को देखा जाए तो मध्यकाल का इतिहास एक नई तरह की शोले ही है। आप जैसे महान विचारकों की इस रचना में गब्बर सिंह, सांभा और कालिया रामगढ़ के चौतरफा विकास की नीतियाँ बना रहे हैं। रामगढ़ पहली बार उनकी बदौलत ही चमक रहा है। रामगढ़ में विदेशी निवेश बढ़ रहा है और हर युवा के हाथ में काम है। बाजार नीतियाँ गज़ब ढा रही हैं। शेयर मार्केट आसमान छू रहा है। कारोबारी भी खुश हैं और किसान भी। मगर वीरू रामगढ़ की किसी गुमनाम गली में बसंती की घोड़ी धन्नो को घास खिला रहा है।


रामगढ़ में पसरे सन्नाटे के बीच जय मौलाना साहब का हाथ थामकर मस्जिद की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं, क्योंकि अज़ान हो रही है। जय ने अपना माऊथ ऑर्गन जेब में खोंसा हुआ है क्योंकि नमाज़ का वक्त है और म्यूजिक हराम है, जिससे मौलाना साहब की इबादत में खलल हाे सकता है। ठाकुर के जुल्मो- सितम से निपटने के लिए जननायक गब्बर सिंह ने सूरमा भोपाली की अध्यक्षता में एक जाँच कमेटी बना दी है। बसंती ने गब्बर को राखी भेजी है और गब्बर ने खुश होकर रामगढ़ की आटा चक्की उसके नाम कर दी है। जेलर के गुणों से प्रसन्न मौसी बसंती और जेलर की जन्म कुंडली मिलवा रही हैं। गब्बर ने शिवजी के मंदिर में भंडारा कराया है और जन्मजात बदमाश गाँव के ठाकुर ने दंगे की नीयत से मस्जिद के पास की जमीन पर नाजायज कब्जे करा दिए हैं। आपसे ही पूछता हूँ कि मध्यकाल का इतिहास बिल्कुल ऐसा ही रचा गया एक फरेब नहीं है?


इतिहास की बात है, बहुत दूर तक न जाए, इसलिए इस खत को यहीं समेटता हूँ। मैं याद करता हूँ, तीस साल पहले जब एनसीईआरटी की किताबों में इतिहास को पढ़ना शुरू किया और कॉलेज में चलने वाली कोर्स की किताबों के जरिए भारत के मध्यकाल को पढ़ा तो उस दौर में अखबार में छपने वाले इतिहास संबंधी लेखों में इरफान हबीब और रोमिला थापर को अपने समय के महान प्रज्ञा पुरुषों के रूप में ही पाया।


अब तीस साल बाद मैं एक ऐसे समय में हूँ जब टेक्नालॉजी ने कमाल ही कर दिया है। इंटरनेट की फोर-जी जनरेशन अपने आईफोन पर आज सब कुछ देख सकती है और पढ़ सकती है। दुनिया की किसी भी लाइब्रेरी की किसी भी भाषा और उसके अपने अनुकूल अनुवाद में हर दस्तावेज हाथों पर मौजूद है।


भारत का अतीत आज हर युवा को आकर्षित कर रहा है। वह भले ही किसी भी विषय में पढ़ा हो लेकिन इतिहास में पहले से बहुत ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है। वह सच को जानने में उत्सुक है। बिना लागलपेट वाला सच। बिना मिलावट वाला इतिहास का सच, जिसमें न किसी सरकार की मनमर्जी हो और न किसी पंथ की बदनीयत!


इतिहास जानने के लिए उसे एमए की डिग्री और मिलावटी किताबें कतई जरूरी नहीं हैं। भारत के विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग दरअसल इतिहास के ऐसे उजाड़ कब्रिस्तान हैं, जहाँ डिग्री धारी मुर्दा इतिहास के नाम पर फातिहा पढ़ने जाते रहे हैं। उनकी आँखें मध्यकाल के इतिहास में की गई आपराधिक मिलावट को देख ही नहीं पातीं। लेकिन इंटरनेट ने सारी दीवारें गिरा दी हैं। सारे हिजाब हटा दिए हैं। सारी चादरें उड़ा दी हैं और मध्यकाल अपनी तमाम बजबजाती बदसूरती के साथ सबके सामने उघड़कर आ गया है।


जिस इस्लाम के नाम पर दिल्ली पर कब्ज़े के बाद सात सौ सालों तक और सिंध को शामिल करें तो पूरे हज़ार साल तक भारत में जो कुछ घटा है, वह सब दस्तावेजों में ही है। आज के नौजवान को यह सुविधा इन हजार सालों में पहली ही बार मिली है कि वह उसी इस्लाम की मूल अवधारणाओं को सीधा देख ले। कुरान अपने अनुवाद के साथ सबको मुहैया है और हदीसों के सारे संस्करण भी। भारत के लोग जड़ों में झाँक रहे हैं जनाब।


कभी बहुत इज़्ज़त से याद किए जाने वाले इरफान हबीब और रोमिला थापर आज इतिहास लेखन का ज़िक्र आते ही एक गाली की तरह क्यों हो गए हैं, जिन्होंने उल्टी व्याख्याएँ करके इतिहास को दूषित करने की कोशिश की। वक्त मिले तो कभी विचार कीजिए।


क्यों लोग इतनी लानतें भेज रहे हैं। वामपंथ को अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की यह दिव्य दृष्टि कहाँ से प्राप्त होती है? मेरे लिए यह भीतर तक दुखी करने वाला विषय इसलिए है क्योंकि मैंने जिस दौर में इतिहास पढ़ना शुरू किया, आप महानुभावों को सबसे योग्य इतिहासकारों के रूप में ही जाना और माना था। ऊँचे कद और लंबे तजुर्बे के ऐसे लोग जिन्होंने भारत के इतिहास पर किताबें लिखीं। यह कितना बड़ा काम था।


आजादी और मजहब की बुनियाद पर मुल्क के बँटवारे के साथ एक नया सफर शुरू कर रहे हजारों साल पुराने मुल्क में इससे बड़ा अहम काम और कोई नहीं था। जो इतिहास लिखा जाने वाला था, आजाद भारत की आने वाली पीढ़ियाँ उसी के जरिए अपने मुल्क के अतीत से रूबरू होने वाली थीं। लेकिन हुआ क्या? आज आप स्वयं को कहाँ पाते हैं?


जनाब, मैं चाहता हूँ कि आप चुप्पी तोड़ें। गिरेबाँ में झाँकें, उठ रहे हर सवाल का जवाब दें। सामने आएँ और मेहरबानी करके हाथापाई न करें। अपने समूह के अन्य इतिहास लेखकों को भी साथ लाएँ। वैसे भी आपको अब पाने के लिए रह ही क्या गया है। पद, प्रतिष्ठा और पुरस्कार से परे हैं आप। न अब और कुछ हासिल होने वाला है और न ही यह कोई छीनकर ले जाएगा!


इतिहास से अगर कोई छेड़छाड़ या मिलावट नहीं हुई है तो आपको खुलकर कहना चाहिए। क्या आपको यह नहीं लगता कि आजादी के बाद अपनाई गई इतिहास लेखन की प्रक्रिया दूषित और दोषपूर्ण थी? क्या आज भी आपको लगता है कि सल्तनत और मुगल काल जैसे कोई कालखंड वास्तविक रूप में वजूद में रहे हैं या दिल्ली पर कब्जे की छीना-झपटी में हुई हिंदुस्तान की बेरहम पिसाई का वह एक कलंकित कालखंड है?


आखिर उस सच्चाई पर चादर डाले रखने की ऐसी भी क्या मजबूरी थी? हमारी ऐसी क्या मजबूरी थी कि हम उन लुटेरे, हमलावरों और हत्यारों को सुल्तान और बादशाह मानकर ऐसे चले कि हमने उन्हें देवताओं के बराबर रख दिया और देवताओं को हाशिए पर भी जगह नहीं मिली?


आप सोचिए आजादी के बाद हमारी तीन पीढ़ियाँ यही मिलावटी झूठ पढ़ते हुए निकली हैं? इसका जरा सा भी अपराध बोध आपको हो तो आपको जवाब देना चाहिए। इस खत का जवाब मुझे नहीं, इस देश की आवाम को दें, जो इतिहास के प्रति पहले से ज्यादा जागी हुई है। सारे फरेब उसके सामने उजागर हैं।


अंत में यह और कहना चाहूँगा कि आज की नौजवान पीढ़ी मध्यकाल के इतिहास को देख और पढ़ रही है तो वह इन ब्यौरों की रोशनी में टेक्नालॉजी के ही ज़रिए आज के सीरिया, इराक, ईरान, यमन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और कुछ अफ्रीकी मुल्कों की हर दिन की हलचल को भी देख पा रही है।


तारीख के जानकार आलिमों के इजहारे-ख्यालात ठीक उसी समय सबके सामने नुमाया है, जब वे अपनी बात कह रहे हैं। अब अगले दिन के अखबार का भी इंतजार बेमानी हो गया है। कुछ भी किसी से छिपा नहीं रह गया है। आज की जनरेशन 360 डिग्री पर सब कुछ अपनी आँखों से देख रही है और अपने दिमाग से सोच और समझ रही है। किसी राय को कायम करने के लिए अब मिलावटी और बनावटी बातों की जरूरत नहीं रह गई है।


ईश्वर आपको अच्छी सेहत और लंबी उम्र दे। ताकि सत्तर साल का इतिहास के कोर्स का बिगाड़ा हुआ हाजमा आप अपनी आँखों से सुधरता हुआ भी देख सकें। हमें यह भी मान लेना चाहिए कि आखिरकार ऊपरवाला सारे हिसाब अपने बंदों के सामने ही बराबर कर देता है!


बहुत शुक्रिया।


(विजय मनोहर तिवारी)

राज्य सूचना आयुक्त, मध्यप्रदेश


(पत्र का अंतिम हिस्सा)



(पत्र को इस लिंक से लिया गया है.)

17 जून 2021

रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम युद्ध

बुन्देलखण्ड के इतिहास की बारीकियों से परिचित करवाने वाले देवेन्द्र सिंह जी की कलम से...

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१७ जुन,१८५८ महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस, आज १७ जून है तो आज की पोस्ट उन्हीं को समर्पित करता हुआ ग्वालियर में लड़े गए युद्ध का विवरण.


१७ जून से एक दिन पहले कल यानि १६ जून को रोज अपनी सेना के साथ बहादुरपुर से मोरार की तरफ बढ़ा लेकिन उसके पहले उसने अपनी व्यूहरचना पूरी कर ली थी. संक्षेप में कहूँ तो यह इस प्रकार थी, ग्वालियर के दक्षिण दिशा में मेजर ओर हैद्राबाद कन्टन्जेंट के साथ आ जमा था. उसका कार्य यह था कि ग्वालियर शिवपुरी मार्ग से यदि भारतीय सेना दक्षिण की ओर भागने की कोशिश करे तो उसको रोके. ग्वालियर, लश्कर और मुरार को तीन भागों में बांट कर ग्वालियर के पूर्व-दक्षिण में कोटा की सराय में मुख्य मोर्चा स्थापित किया. ग्वालियर से कोटा की सराय सात मील की दुरी पर थी और लश्कर वहाँ से लगभग चार मील पर था. एक बार कम्पू और लश्कर पर अधिकार हो जाय तो किले के दक्षिण का भाग उनके उनके अधिकार में आने में ज्यादा मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ता. रोज ने निश्चय किया कि वह स्वयं मुरार पर अधिकार करेगा और वहीं से कोटा की सराय में विद्यमान स्मिथ को सहयोग करेगा. स्मिथ के ऊपर सबसे महत्वपूर्ण स्थान का भार था.


ग्वालियर में क्रांतिकारी सैनिकों के मोर्चे इस प्रकार थे, तात्या टोपे का मोर्चा कम्पू में, राव साहब पश्चिम में था, बाँदा के नवाब अलीबहादुर को ग्वालियर नगर और किले का भार सौपा गया. १६ जून को हुए युद्ध में क्रांतिकारी सेनाओं की हार हुई और उनको पीछे हटना पड़ा. मुरार पर रोज का अधिकार हो गया. रोज के साथ Sir Robert Hamilton, Agent to the Governor-General in central India और Major Charters MacPherson, the Political Resident of Gwalior भी मुरार में आए. इसके साथ ही ब्रिगेडियर जनरल नेपिअर और महाराजा जयाजीराव सिंधिया भी आगरा से मुरार रोज के कैम्प में आ गये. अंग्रेजों ने सिंधिया से एक विज्ञप्ति जारी करवाई जिसमें ग्वालियर के सैनिकों से जो क्रांतिकरियों की तरफ से लड़ रहे थे, से कहा गया कि अंग्रेजी फ़ौज उनको राजपद फिर से देने के लिए युद्ध कर रही है. अतः वे उनका साथ छोड़ दें, उनके लिए आम माफ़ी की घोषणा की जाती है. ऐसा लगता है कि इस घोषणा का कुछ असर हुआ और फौजियों में कुछ लोग फिर से सिंधिया से मिलने की सोचने लगे.


रानी लक्ष्मीबाई ने फिर एक बार आगे आकर अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में उनको समझाया. मेरे गुरु प्रोफेसर बिलास राय मिश्रा ने अपनी पुस्तक The Rising of 1857 in Bundelkhand with Special Reference to Jhansi के पेज न० १११ में लिखा – The Rani, however, once again rose equal to the occasion, she prepared an excellent plan of defence, entrusting to herself the most difficult task defending the eastern side of Gwalior. Accordingly, she made dispositions of her small force on the hills not yet occupied by the British. Her chief officers were Munder, Juhi, Ram Chandra desmukh, Raghunath singh, and Gul mohammad. They did not shut themselves up inside the fort. The fate that had befallen Jhansi was a constant reminder of the futility and danger of getting shut up inside the fort and thereby running the risk of being reduced to submission for want of provisions and other necessaries.


इस प्लान के तहत १६ जून की रात तक रानी ने और नेताओं से सलाह लेकर सब तोपें लगवा दीं. १७ जून को प्रातः सिंधिया की अश्वशाला से रानी के लिए एक नया घोडा लाया गया क्योंकि १६ जून को मुरार के मोर्चे में रानी का घोड़ा घायल हो गया था. उन्होंने हाथ में तलवार और कमर में खंजर बांध कर फौजियों की तरह सफ़ेद पैजामा और लाल कुरता पहना, साथ ही गले में मोतियों की माला डाली. पैरों में नागरा पहन, सिर पर सफ़ेद चंदेरी मुरैठा धारण कर रानी युद्ध के लिए तैयार हो गई.




इधर भोर होते ही स्मिथ की फ़ौज में युद्ध का बिगुल बज गया. स्मिथ ने एक भाग को रिजर्व में छोड़ा और अन्य के साथ आगे बढ़ा. उसका दल ४०० या ५०० कदम आगे बढ़ा था कि क्रांतिकारी सेना के गोलों की बौछार होने लगी. पीछे हट कर उसने अपने घुड़सवार दस्ते को आगे बढ़ाया और पीछे से गोलों की मार शुरू की. घनघोर युद्ध शुरू हो गया. इसी में रानी के एक तोपची ने कैप्टेन हिनेज को लक्ष्य करके एक गोला चलाया मगर दुर्भाग्य से गोला कैप्टेन के घोड़े को लगा और वह बच गया. हिनेज इस घटना से इतना डर गया कि कमान कैप्टेन पोर को दी. युद्ध होते-होते दोपहर हो गई. कोई भी पक्ष न जीतता और न ही हारता लग रहा था.


अब अंग्रेजों की ओर से कर्नल हिक्स और लेफ्टिनेंट रेले ने मोर्चा संभाला लेकिन अभी वे थोडा ही आगे बढ़े थे कि रानी के मोर्चे से चले एक गोले ने रेले और उसके घोड़े के प्राण ले लिए. इस आक्रमण में डाक्टर शेलोक्क भी घायल हो गया. इस मोर्चे पर रानी की जीत लगभग तय लग रही थी. तभी Cornet Goldworthy वीरतापूर्ण कौशल से अंग्रेजों की हारती बाजी को बचाया. उसने और कर्नल ब्लेक ने क्रांतिकारियों के मोर्चे पर खलबली मचा दी. दो घंटे के भयानक युद्ध के बाद भारतियों की तरफ के पार्श्व भाग की सेना पीछे हटने लगी. सारी भारतीय सेना तेजी से फूलबाग के परेड मैदान की तरफ पीछे हटने लगी.


रानी लक्ष्मीबाई ने जब यह देखा तो वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते हुए प्राणों की बाजी लगा कर युद्ध करने लगी. दिन के तीन बज चुके थे, युद्ध करते-करते रानी अपने साथियों से बहुत दूर पहुँच गई थी. उसके बॉडीगार्ड भी उससे बहुत दूर थे. रानी के साथ केवल मुन्दर ही थी. इसी समय स्मिथ ने अपनी रिजर्व में रोके हुए ८वीं हुसर्स सैनिकों की टुकड़ी को युद्ध में उतार दिया. ताजादम ये सैनिक एकदम से उन पर टूट पड़े. अब रानी ने प्राण बचाने के लिए सोनरेखा नाले को पार करना चाहा. इसी वक्त मुन्दर को एक गोली लगती है. रानी ने सुना कि पीछे से मुन्दर कह रही थी कि अब वह नहीं भाग सकती. रानी पीछे मुड़ी और मुन्दर को गोली मारने वाले का काम तमाम कर दिया लेकिन तभी एक सैनिक की तलवार का करारा हाथ उन पर पड़ा. उनकी माथे से दाहिनी आँख तक का भाग कट गया. सहसा एक गोली भी उसकी छाती में समा गई. वह घोड़े पर औंधे मुँह गिर पड़ी. इसी समय अंग्रेजी फ़ौज को वापस लौटने का आदेश देने वाला बिगुल बजा और उनके सैनिक पीछे लौट चले. ये सैनिक भी नहीं जानते थे कि उन्होंने किसको मारा है.


रानी के साथियों ने रानी को ढूँढना शुरू किया परन्तु वह कहाँ थी. थोड़ी दूर पर रानी का घोडा मिला. रानी अभी भी उस पर ही लेटी थी. उसकी सांसे चल रही थी. सब उनको लेकर नाले के पार एक कुटिया पर लाए. थोड़ी ही देर में रानी की सांसें थम गईं. तात्या टोपे ने अपने बयान में बतलाया था कि रामचंद्र देशमुख ने रानी की चिता में आग दी थी.


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रानी झाँसी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि सहित 

09 जनवरी 2021

ऐतिहासिकता को जीवंत स्वरूप प्रदान करने वाले साहित्यकार

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 131वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे.  उनकी प्रतिज्ञा अपने आपसे थी, इसी कारण वे इतिहास की सत्यता सामने लाने के लिए लगातार प्रयत्नशील बने रहे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली. गढ़कुंडार जैसे विस्तृत उपन्यास की कथा-वस्तु के बारे में उनका स्वयं का कहना है कि एक शिकार कार्यक्रम के दौरान रात भर उस किले की छवि देखते-देखते ही उन्होंने उसकी एतिहासिकता की कथा को स्वरूप प्रदान कर दिया था. 


उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. ऐसे दौर में इतिहास जैसे विषय पर लेखन करना और उसे जनसामान्य के बीच सहज मान्यता प्रदान करवाना सरल नहीं था. वृन्दावन लाल वर्मा जी की सरल और रोचक लेखन-शैली का ही कमाल कहा जायेगा कि उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास ने उन्हें पर्याप्त ख्याति प्रदान करवा दी. उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.




भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...


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वंदेमातरम्



23 अक्टूबर 2020

लाल किला नहीं लाल कोट कहिए

लाल किला नहीं लाल कोट था जिसे शाहजहां ने नहीं राजपूत राजा अनंगपाल तोमर द्वितीय ने बनवाया था। वास्तव में 7360 में दिल्ली में तोमर राजवंश की स्थापना अनंगपाल सिंह तोमर प्रथम नाम के राजा द्वारा की गई थी। पांडवो के वंशज चंद्रवंशी क्षत्रिय इसी तोमर वंश में आगे चलकर 1051 ईस्वी से 10810 तक अनंगपाल सिंह तोमर द्वितीय नाम के प्रतापी शासक ने शासन किया। इसी शासक ने अपने शासनकाल में 1060 ईस्वी के लगभग लाल कोट नाम का किला बनवाया।


तारीखे फिरोजशाही के पृष्ठ संख्या 160 (ग्रन्थ 3) में लेखक लिखता है कि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल ( लाल प्रासाद/ महल ) की ओर बढ़ा और वहाँ उसने आराम किया।


अकबरनामा और अग्निपुराण दोनों ही जगह इस बात का वर्णन है कि महाराज अनंगपाल ने ही एक भव्य और गौरवशाली दिल्ली का निर्माण करवाया था।




दिल्ली के लालकिले को देखते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वहाँ पर एक विशेष महल में सुअर अर्थात वराह के मुंह वाले चार नल अभी भी लगे हुए हैं। इससे भी पता चलता है कि यह किसी हिंदू शासक द्वारा बनवाया गया ही लगता है क्योंकि सुअर को कोई भी मुस्लिम शासक अपने यहाँ पर इस प्रकार सम्मानपूर्ण स्थान नहीं देता।


शाहजहाँ से 250 वर्ष पहले ही 1398 ईस्वी में एक विदेशी तुर्क आक्रमणकारी जेहादी तैमूरलंग ने भी पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया है। उसने अपने विवरण में जामा मस्जिद को काली मस्जिद के नाम से पुकारा है जबकि आज के इतिहासकार इस जामा मस्जिद को भी शाहजहां द्वारा निर्मित बताते हैं। वास्तव में इसे काली मस्जिद कहे जाने का अर्थ यह था कि यहां पर हिन्दू देवी (काली) का मंदिर था। तैमूरलंग के विवरण से पता चलता है कि पुरानी दिल्ली को भी शाहजहां के द्वारा बसाया जाना कपोल कल्पना मात्र है। यद्यपि शाहजहां ने अपने शासनकाल में दिल्ली को शाहजहानाबाद का नाम देकर पुरानी दिल्ली को कब्जाने का प्रयास अवश्य किया था।



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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

18 जून 2019

महान वीरांगना रानी झाँसी को सादर नमन


आज, 18 जून को रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि है. उनका जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था. उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु पुकारा जाता था. झाँसी के राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हुआ. सन 1851 में उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन चार माह पश्चात उसका निधन हो गया. राजा गंगाधर राव को इस घटना से गहरा धक्का पहुंचा. वे लगातार अस्वस्थ रहने लगे और 21 नवंबर 1853 को उनका स्वर्गवास हो गया. इससे पहले उन्होंने अपने चचेरे भाई के पुत्र को गोद लेने सम्बन्धी प्रस्ताव अंग्रेजों के पास भेजा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था. 


राजा के निधन पश्चात् 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत करके झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी. एक वार्ता के क्रम में रानी के घोष मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी के साथ ही विद्रोह का बिगुल बज उठा. अंग्रेजों की राज्य लिप्सा की नीति से उत्तरी भारत के नवाब और राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में विद्रोह की आग भभक उठी. नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तांत्या तोपे आदि रानी के इस कार्य में सहयोग देने आगे आये. 

23 मार्च 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ. रानी ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया. वे अपनी पीठ पर दामोदर राव को बाँध घोड़े पर सवार हो अंग्रेजों से युद्ध करती रहीं. युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई झाँसी से कालपी होते हुए ग्वालियर जा पहुँचीं. ग्वालियर पर आक्रमण कर वहां के किले पर अधिकार कर लिया गया. अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता हुआ ग्वालियर पहुँच गया. यहाँ हुए युद्ध में रानी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं. 18 जून 1858 को ग्वालियर का युद्ध उनके लिए अंतिम अंतिम युद्ध सिद्ध हुआ. वे घायल हो गईं और अंततः वीरगति प्राप्त की.

रानी लक्ष्मी बाई के जीवन से दो बातें सीखने योग्य हैं. एक तो उन्होंने उस कालखंड में जबकि पर्दा-प्रथा प्रभावी था किन्तु स्त्री-शिक्षा प्रभावी रूप में नहीं थी, रानी ने महिलाओं की सेना बनाई, उनको प्रशिक्षित किया. दूसरे, बिना किसी स्त्री-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण सम्बन्धी आन्दोलनों के उन्होंने बुन्देलखण्ड और आसपास के अनेक पुरुष राजाओं को अपने झंडे तले लाकर स्त्री-शक्ति का परिचय दिया था.
महान वीरांगना को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन. 

23 मार्च 2019

युवा-शक्ति को युवा-शक्ति के नाम पर भ्रमित करने की मानसिकता


सन 2014 के बाद जैसे ही केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ वैसे ही बहुत सारे लोगों ने राष्ट्र, राष्ट्रवाद देशभक्ति के बारे में अपने-अपने मानक तय करने आरम्भ कर दिए. ऐसा नहीं कि इसमें विपक्ष ही शामिल रहा बल्कि सत्ता पक्ष की तरफ से भी इस तरह के मानक बनाये जाते दिखे. बावजूद इसके विपक्ष की तरफ से जरा-जरा सी बात को देश से, देश की अस्मिता से, राष्ट्रवाद से जोड़ते हुए देशभर में बवाल मचाये रखा गया. विगत लगभग पांच वर्षों से ऐसा महसूस होने लगा है जैसे इन्हीं विपक्षियों के हाथों में ही देश की जिम्मेवारी है. सत्ता पक्ष तो बस देश से खिलवाड़ करने के लिए काम कर रहा है. युवाओं को दोनों ही तरफ से अपनी-अपनी तरह से भ्रमित किया गया. इतिहास को अपनी तरह से सामने रखने का काम किया जाने लगा. यदि पूर्वाग्रह रहित होकर विचार किया जाये तो वर्तमान विपक्ष ने कभी सत्ता में रहते हुए भी देश के इतिहास के साथ न्याय नहीं किया था. देश के असली वीरों को उनके द्वारा आतंकवादी तक बताया गया था. बिना इस पर विचार किये कि देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले असंख्य वीर क्रांतिकारियों में अनेकानेक युवा भी रहे थे, देश के वर्तमान युवाओं को दिग्भ्रमित किया गया.


उस समय के अनेकानेक युवाओं में से तीन युवाओं ने, जिनकी उम्र २३-२४ वर्ष रही थी, आज ही के दिन आज़ादी के हवनकुंड में अपने प्राणों की आहुति दी थी. भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के क्रांतिकारी कदम की देशवासियों को जानकारी होगी, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. अपेक्षा ही क्योंकि विश्वास तो कतई नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रतिवर्ष वेलेंटाइन डे के अवसर पर देश के बहुत से युवा इन्हीं तीनों क्रांतिकारियों के बारे में असत्य खबर को दिन भर प्रसारित करते हुए अपने आपको देशभक्त समझते रहते हैं. यही वह स्थिति होती है जहाँ देशहित और देशभक्ति के असल मायने निर्धारित करने की आवश्यकता होती है. असल में आज एक लम्बा समय इन तीनों जोशीले युवाओं को अमर हुए हो गया है मगर क्रांति की अलख में युवा शक्ति के द्योतक बन चुके इन तीन नामों के सन्दर्भ में आज दशकों बाद भी एक सामान्य जानकारी ही सबके बीच है. असेम्बली में बम फेंकना, गिरफ़्तारी के भय से मुक्त रहते हुए वहाँ गिरफ़्तारी देना, मुक़दमे में भारत माता की आज़ादी के लिए अपने आपको कर्तव्यनिष्ठ दिखाना, इनकी फांसी की सजा रुकवाने के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी का इंकार करना, सजा के पूर्व भगत सिंह का लेनिन की जीवनी पढ़ना, शहीद होने के पूर्व अपने परिजनों, मित्रों को पत्रों द्वारा देश की आज़ादी के लिए संघर्षरत रहने की बात समझाना, अंग्रेजी सरकार द्वारा नियत समय से पहले ही इनको फांसी की सजा दे देना, इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाना, भगत सिंह द्वारा मैं नास्तिक क्यों हूँ जैसा लेख लिखना आदि-आदि जानकारियाँ ही हम सबके बीच बराबर तैरती रहती हैं. इन तमाम सारी बातों के बीच ये तीनों युवा या कहें कि विशेष रूप से भगत सिंह को बम, बन्दूक, रिवाल्वर का पर्याय बना दिया गया है. उनके इसी आलेख विशेष का सन्दर्भ लेते हुए उन्हें ईश्वरीय-सत्ता विरोधी, नास्तिक बताये जाने की कवायद चलती रहती है. ऐसे लोगों के लिए आज का दिन सर्वाधिक उपयुक्त होता है, जबकि वे इन तीनों क्रांतिकारियों को याद करते हुए अपनी विचारधारा से इतर लोगों को कोसने का काम करने लग जाते हैं.

सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसा क्या चला होगा उस समय के युवाओं के मन में जो वे सब अपने प्राणों की परवाह न करते हुए तत्कालीन सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे? क्या इनके मन में कभी भी एक पल को अपनी मौत का, अंग्रेजी शासन के अत्याचारों का खौफ नहीं जागा होगा? आखिर 23-24 वर्ष की उम्र होती ही कितनी है? क्या उस समय उन युवाओं के मन में अपने कैरियर, अपने परिवार, अपने भविष्य के प्रति कोई मोह नहीं जागा होगा? ऐसी कौन सी शक्ति इनके अन्दर उत्पन्न हो गई होगी जिससे ये शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने की हिम्मत जुटा सके थे? ऐसी कौन सी शिक्षा इनको मिली थी जो महज दो दशक के जीवन में वैचारिकी का उत्कृष्ट उदाहरण सम्पूर्ण देश के लिए ये लोग छोड़ गए? युवा तो आज भी हैं. शिक्षा-व्यवस्था तो आज तत्कालीन समाज से बेहतर है. अव्यवस्थाएँ तो आज भी बनी हुई हैं. प्रशासनिक निरंकुशता, सरकारी अव्यवस्था तो आज भी दिखाई देती है. फिर आज का युवा इनके खिलाफ विद्रोह का बिगुल क्यों नहीं फूंक पाती है? आज का युवा अपने कैरियर का मोह त्याग कर क्यों नहीं सरकार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा करता है?

जब-जब भी इन सवालों के जवाब भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के इंकलाब के सापेक्ष खोजने का काम किया जाता है तो लगता है कि इनकी वैचारिकी के प्रचार के स्थान पर इनके उस बम को ज्यादा प्रचारित किया गया है जिसे फेंकने के समय उछाले गए पर्चों का पहला ही वाक्य था कि बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है. आज भी भगत सिंह और उनके साथियों को आज़ादी के संघर्ष में हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेने वाला बताया जाता है. उनकी क्रांति को सीधे-सीधे बन्दूक से, हत्या से, धमाके से जोड़ दिया गया है. उनके इंकलाब जिंदाबाद को भी विशुद्ध रूप से अराजकता का द्योतक बताया जाने लगा है. किसी समय यह उद्घोष अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लोगों को एकजुट करने का प्रतीक माना जाता था तो आज इसके द्वारा हिंसात्मक गतिविधि का सञ्चालन करना माना जाने लगा है. ऐसे में जबकि हमारे ही देश में हमारे देश के इन क्रांतिकारी युवाओं के बारे में संकुचित मानसिकता के साथ जानकारी दी जा रही हो, भावी पीढ़ी को इनके बारे में कम से कम या कहें कि अत्यल्प रूप से पढ़ाया जा रहा हो तो कैसे अपेक्षा की जाये कि आज का युवा किसी अव्यवस्था के खिलाफ, किसी अराजकता के विरुद्ध उठ खड़ा होगा. देखा जाये तो आज भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद, नक्सलवाद, सामाजिक अपराध, राजनैतिक अपराध, लूटमार, हत्याएँ, हिंसा, जातिगत विभेग, लिंगभेद आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जो भले ही देशवासियों को गुलाम न बनाये हों मगर गुलामों जैसा व्यवहार करती दिखती हैं. इसके बाद भी आज का समाज, विशेष रूप से युवा इनके प्रति अनभिज्ञ बना हुआ बस अपने आपमें ही खोया हुआ है. उसके लिए उसके आसपास की दुनिया ही उसका अपना देश है. उसके लिए अपना कैरियर ही उसकी आज़ादी है. उसके लिए स्वार्थपूर्ति के लिए उठाया गया कोई भी कदम राष्ट्रहित में उठाया गया कदम है. 

ऐसी विद्रूप स्थितियों में हम शहीदी दिवस मनाने की औपचारिकता का निर्वहन कर लेते हैं. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की प्रतिमाओं, चित्रों पर माल्यार्पण कर लेते हैं. उनके बारे में चलन में बनी सामान्य सी जानकारी को चंद लोगों के बीच गोष्ठी रूप में बार-बार प्रसारित करते रहते हैं. भगत सिंह को केंद्र में रखकर, उनको कामरेड, मार्क्सवादी, समाजवादी बनाकर दक्षिणपंथी विचारधारा वालों को गरियाने का काम कर लेते हैं. भगवा और लाल रंग का विभेद कर देश के लिए प्राण न्योछावर कर देने वाले युवाओं का भी बंटवारा कर लेते हैं. इन सबके बीच कभी किसी ने विचार करने का प्रयास किया है कि उस दिन असेम्बली में बम फेंकने की घटना के समय भगत सिंह के साथ राजगुरु, सुखदेव तो थे नहीं फिर इन दोनों वीरों को भगत सिंह के साथ फाँसी क्यों? उस दिन भगत सिंह के साथ एक अन्य युवक जो साथ था, उन बटुकेश्वर दत्त को आज कौन याद कर रहा है? उस वीर नौजवान के साथ क्या हुआ? आज भले ही शहीद भगत सिंह अपने अन्य साथियों के सापेक्ष बहुत बड़े कद के दिखाई देते हों पर हम सभी का कर्तव्य है कि देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देने वालों के चित्र यदि एकसाथ रखे हों तो हम सबको पहचान सकें. इनके विचारों को किसी विचारधारा विशेष के खाँचे में बाँधकर प्रसारित न करें. आने वाली पीढ़ी को समझाएं कि आज वे जिस आज़ाद हवा-पानी में अपना जीवन गुजार रहे हैं वह ऐसे युवाओं के कारण संभव है. आज की पीढ़ी को बताना होगा कि भगत सिंह सहित अन्य युवा क्रांतिकारी हिंसा का, बन्दूक का, बम का पर्याय नहीं हैं. ऐसे वीर युवकों के विचारों की सान पर आज की पीढ़ी को तैयार करना होगा ताकि वह भी आज के समस्यारुपी शासकों के खिलाफ बिगुल फूंक सके.