17 June 2021

रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम युद्ध

बुन्देलखण्ड के इतिहास की बारीकियों से परिचित करवाने वाले देवेन्द्र सिंह जी की कलम से...

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१७ जुन,१८५८ महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस, आज १७ जून है तो आज की पोस्ट उन्हीं को समर्पित करता हुआ ग्वालियर में लड़े गए युद्ध का विवरण.


१७ जून से एक दिन पहले कल यानि १६ जून को रोज अपनी सेना के साथ बहादुरपुर से मोरार की तरफ बढ़ा लेकिन उसके पहले उसने अपनी व्यूहरचना पूरी कर ली थी. संक्षेप में कहूँ तो यह इस प्रकार थी, ग्वालियर के दक्षिण दिशा में मेजर ओर हैद्राबाद कन्टन्जेंट के साथ आ जमा था. उसका कार्य यह था कि ग्वालियर शिवपुरी मार्ग से यदि भारतीय सेना दक्षिण की ओर भागने की कोशिश करे तो उसको रोके. ग्वालियर, लश्कर और मुरार को तीन भागों में बांट कर ग्वालियर के पूर्व-दक्षिण में कोटा की सराय में मुख्य मोर्चा स्थापित किया. ग्वालियर से कोटा की सराय सात मील की दुरी पर थी और लश्कर वहाँ से लगभग चार मील पर था. एक बार कम्पू और लश्कर पर अधिकार हो जाय तो किले के दक्षिण का भाग उनके उनके अधिकार में आने में ज्यादा मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ता. रोज ने निश्चय किया कि वह स्वयं मुरार पर अधिकार करेगा और वहीं से कोटा की सराय में विद्यमान स्मिथ को सहयोग करेगा. स्मिथ के ऊपर सबसे महत्वपूर्ण स्थान का भार था.


ग्वालियर में क्रांतिकारी सैनिकों के मोर्चे इस प्रकार थे, तात्या टोपे का मोर्चा कम्पू में, राव साहब पश्चिम में था, बाँदा के नवाब अलीबहादुर को ग्वालियर नगर और किले का भार सौपा गया. १६ जून को हुए युद्ध में क्रांतिकारी सेनाओं की हार हुई और उनको पीछे हटना पड़ा. मुरार पर रोज का अधिकार हो गया. रोज के साथ Sir Robert Hamilton, Agent to the Governor-General in central India और Major Charters MacPherson, the Political Resident of Gwalior भी मुरार में आए. इसके साथ ही ब्रिगेडियर जनरल नेपिअर और महाराजा जयाजीराव सिंधिया भी आगरा से मुरार रोज के कैम्प में आ गये. अंग्रेजों ने सिंधिया से एक विज्ञप्ति जारी करवाई जिसमें ग्वालियर के सैनिकों से जो क्रांतिकरियों की तरफ से लड़ रहे थे, से कहा गया कि अंग्रेजी फ़ौज उनको राजपद फिर से देने के लिए युद्ध कर रही है. अतः वे उनका साथ छोड़ दें, उनके लिए आम माफ़ी की घोषणा की जाती है. ऐसा लगता है कि इस घोषणा का कुछ असर हुआ और फौजियों में कुछ लोग फिर से सिंधिया से मिलने की सोचने लगे.


रानी लक्ष्मीबाई ने फिर एक बार आगे आकर अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में उनको समझाया. मेरे गुरु प्रोफेसर बिलास राय मिश्रा ने अपनी पुस्तक The Rising of 1857 in Bundelkhand with Special Reference to Jhansi के पेज न० १११ में लिखा – The Rani, however, once again rose equal to the occasion, she prepared an excellent plan of defence, entrusting to herself the most difficult task defending the eastern side of Gwalior. Accordingly, she made dispositions of her small force on the hills not yet occupied by the British. Her chief officers were Munder, Juhi, Ram Chandra desmukh, Raghunath singh, and Gul mohammad. They did not shut themselves up inside the fort. The fate that had befallen Jhansi was a constant reminder of the futility and danger of getting shut up inside the fort and thereby running the risk of being reduced to submission for want of provisions and other necessaries.


इस प्लान के तहत १६ जून की रात तक रानी ने और नेताओं से सलाह लेकर सब तोपें लगवा दीं. १७ जून को प्रातः सिंधिया की अश्वशाला से रानी के लिए एक नया घोडा लाया गया क्योंकि १६ जून को मुरार के मोर्चे में रानी का घोड़ा घायल हो गया था. उन्होंने हाथ में तलवार और कमर में खंजर बांध कर फौजियों की तरह सफ़ेद पैजामा और लाल कुरता पहना, साथ ही गले में मोतियों की माला डाली. पैरों में नागरा पहन, सिर पर सफ़ेद चंदेरी मुरैठा धारण कर रानी युद्ध के लिए तैयार हो गई.




इधर भोर होते ही स्मिथ की फ़ौज में युद्ध का बिगुल बज गया. स्मिथ ने एक भाग को रिजर्व में छोड़ा और अन्य के साथ आगे बढ़ा. उसका दल ४०० या ५०० कदम आगे बढ़ा था कि क्रांतिकारी सेना के गोलों की बौछार होने लगी. पीछे हट कर उसने अपने घुड़सवार दस्ते को आगे बढ़ाया और पीछे से गोलों की मार शुरू की. घनघोर युद्ध शुरू हो गया. इसी में रानी के एक तोपची ने कैप्टेन हिनेज को लक्ष्य करके एक गोला चलाया मगर दुर्भाग्य से गोला कैप्टेन के घोड़े को लगा और वह बच गया. हिनेज इस घटना से इतना डर गया कि कमान कैप्टेन पोर को दी. युद्ध होते-होते दोपहर हो गई. कोई भी पक्ष न जीतता और न ही हारता लग रहा था.


अब अंग्रेजों की ओर से कर्नल हिक्स और लेफ्टिनेंट रेले ने मोर्चा संभाला लेकिन अभी वे थोडा ही आगे बढ़े थे कि रानी के मोर्चे से चले एक गोले ने रेले और उसके घोड़े के प्राण ले लिए. इस आक्रमण में डाक्टर शेलोक्क भी घायल हो गया. इस मोर्चे पर रानी की जीत लगभग तय लग रही थी. तभी Cornet Goldworthy वीरतापूर्ण कौशल से अंग्रेजों की हारती बाजी को बचाया. उसने और कर्नल ब्लेक ने क्रांतिकारियों के मोर्चे पर खलबली मचा दी. दो घंटे के भयानक युद्ध के बाद भारतियों की तरफ के पार्श्व भाग की सेना पीछे हटने लगी. सारी भारतीय सेना तेजी से फूलबाग के परेड मैदान की तरफ पीछे हटने लगी.


रानी लक्ष्मीबाई ने जब यह देखा तो वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते हुए प्राणों की बाजी लगा कर युद्ध करने लगी. दिन के तीन बज चुके थे, युद्ध करते-करते रानी अपने साथियों से बहुत दूर पहुँच गई थी. उसके बॉडीगार्ड भी उससे बहुत दूर थे. रानी के साथ केवल मुन्दर ही थी. इसी समय स्मिथ ने अपनी रिजर्व में रोके हुए ८वीं हुसर्स सैनिकों की टुकड़ी को युद्ध में उतार दिया. ताजादम ये सैनिक एकदम से उन पर टूट पड़े. अब रानी ने प्राण बचाने के लिए सोनरेखा नाले को पार करना चाहा. इसी वक्त मुन्दर को एक गोली लगती है. रानी ने सुना कि पीछे से मुन्दर कह रही थी कि अब वह नहीं भाग सकती. रानी पीछे मुड़ी और मुन्दर को गोली मारने वाले का काम तमाम कर दिया लेकिन तभी एक सैनिक की तलवार का करारा हाथ उन पर पड़ा. उनकी माथे से दाहिनी आँख तक का भाग कट गया. सहसा एक गोली भी उसकी छाती में समा गई. वह घोड़े पर औंधे मुँह गिर पड़ी. इसी समय अंग्रेजी फ़ौज को वापस लौटने का आदेश देने वाला बिगुल बजा और उनके सैनिक पीछे लौट चले. ये सैनिक भी नहीं जानते थे कि उन्होंने किसको मारा है.


रानी के साथियों ने रानी को ढूँढना शुरू किया परन्तु वह कहाँ थी. थोड़ी दूर पर रानी का घोडा मिला. रानी अभी भी उस पर ही लेटी थी. उसकी सांसे चल रही थी. सब उनको लेकर नाले के पार एक कुटिया पर लाए. थोड़ी ही देर में रानी की सांसें थम गईं. तात्या टोपे ने अपने बयान में बतलाया था कि रामचंद्र देशमुख ने रानी की चिता में आग दी थी.


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रानी झाँसी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि सहित 

5 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१९-०६-२०२१) को 'नेह'(चर्चा अंक- ४१००) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. विस्तृत चित्रात्मक वृत्तान्त

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  3. रोचक प्रस्तुति...

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  4. इस वीर गाथा को न जाने कितनी बार पढी हूँ, सुनी हूँ. मन में ऊर्जा का संचार होता है.

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