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16 नवंबर 2025

अराजकता पैदा करने का मंसूबा?

‘देश के युवा, देश के छात्र, देश के जेन-जी संविधान को बचाएँगे. लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी को रोकेंगे. मैं उनके साथ हमेशा खड़ा हूँ. जय हिन्द.’ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर ये विचार पोस्ट करने वाला व्यक्ति कोई आम नागरिक नहीं बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी हैं. 18 सितम्बर 2025 को पोस्ट इस विचार का उत्प्रेरक नेपाल की अराजकता के लिए जिम्मेदार जेन-जी पीढ़ी को माना जा रहा है. इस पोस्ट के माध्यम से उन्होंने न केवल देश के युवाओं को उकसाने का काम किया बल्कि वोट चोरी जैसे मुद्दे के द्वारा संवैधानिक संस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम किया है.

 

ईवीएम का मुद्दा हो या अब वोट चोरी का, इनके द्वारा राहुल गांधी किसी तरह की सुधारवादी व्यवस्था का सहयोग नहीं करते बल्कि निर्वाचन आयोग पर सवालिया निशान लगाते हैं. भाजपा की जीत पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने, उसे हैक कर लेने का आरोप लगा देना तथा विपक्षी दलों की जीत को लोकतंत्र की जीत बताने लगना आम बात हो गई है. ईवीएम से छेड़छाड़ किये जाने के आरोप भाजपा पर लगातार लगाते रहने के बाद भी विपक्षी दलों द्वारा उसे सही सिद्ध न कर पाने से मतदाताओं ने इसके पीछे की मंशा को भली-भांति समझ लिया. ये सहज रूप में समझ में आता है कि विपक्षी दलों द्वारा अपनी हार का ठीकरा ईवीएम और निर्वाचन आयोग के ऊपर फोड़कर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करना रहा है. कुछ इसी तरह का काम अब राहुल गांधी करते नजर आ रहे हैं वोट चोरी के नाम पर.

 



बिहार में पहले चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस के द्वारा हरियाणा में वोट चोरी होने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि पिछले साल हरियाणा के विधानसभा चुनाव में 25 लाख फर्जी वोटों का इस्तेमाल किया गया जो कुल वोटों का लगभग 12.5 प्रतिशत है. निर्वाचन आयोग और भाजपा पर मिलीभगत का आरोप लगाने वाले राहुल का मानना है कि इसके चलते कांग्रेस हार गई. वोट चोरी के सन्दर्भ में उनके द्वारा एक महिला, जो ब्राजील की मॉडल निकली, की अनेकानेक फोटो के माध्यम से अपने आरोपों को सही साबित करने का भी प्रयास किया गया. यहाँ एक बात समझ से परे है कि यदि राहुल गांधी को लगता है कि भाजपा और निर्वाचन आयोग की मिलीभगत से वाकई वोट चोरी जैसा कदम उठाया जाता है तो इसके समाधान के लिए वे अदालत की मदद क्यों नहीं ले रहे? उनको कम से कम इसका भान तो होना ही चाहिए कि इसी देश में 12 जून 1975 को एक ऐतिहासिक फैसले में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने उनकी दादी इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी पाया था. जिसके चलते न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित करते हुए उन्हें छह साल तक अन्य दूसरा कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया था. इस निर्णय के पश्चात् लागू आपातकाल 1977 में समाप्त होने पर चुनाव सम्पन्न हुए. इन चुनावों में मतदाताओं ने तानाशाही, चुनावी धाँधली के विरोध में न केवल कांग्रेस को बल्कि रायबरेली से इंदिरा गांधी को भी हराया. आज संभवतः अराजकता फ़ैलाने की मंशा रखने के कारण राहुल गांधी मतदाताओं की, न्यायालय की असल ताकत को स्वीकारना नहीं चाह रहे हैं.

 

दरअसल राहुल गांधी को वोट चोरी, निर्वाचन आयोग की मिलीभगत को लेकर न्यायालय जाने से ज्यादा आसान लगता है आरोप लगाना. इसमें न किसी तरह के सबूतों को न्यायालय में प्रस्तुत करना है और न ही किसी तरह के तथ्यों की पुष्टि करना है. विगत वर्षों में अनेक मामलों में न्यायालय की तरफ से उनको समझाए जाने के, सजा सुनाये जाने के दृष्टान्त भी सबके सामने हैं मगर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने इनसे कोई सीख नहीं लेने का मन बना रखा है. इसके अलावा लगता है जैसे राहुल गांधी भारत में उसके पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि की तरह का अराजक माहौल देखने का मंसूबा रखते हैं. यही कारण है कि वे कभी यहाँ की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, संवैधानिक संस्थाओं पर, संविधान पर आरोप लगाते हैं तो कभी इंडियन स्टेट के नाम पर, सेना के नाम पर, आतंकियों के नाम पर, वोट चोरी के आरोपों द्वारा, जेन-जी पीढ़ी की क्रांति के रूप में अनर्गल बयानबाजी करते नजर आते हैं.

 

बिहार चुनावों के परिणामों ने साबित किया है कि यहाँ के मतदाताओं ने न केवल विशेष गहन पुनरीक्षण को अपनी स्वीकार्यता प्रदान की है बल्कि राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोपों की भी हवा निकाल दी है. ईवीएम सम्बन्धी गड़बड़ियों में मुँह की खाने के बाद, अनेक चुनावों में लगातार हारने के बाद अब बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण और वोट चोरी आरोपों के नकारे जाने के बाद राहुल गांधी को स्वयं का विश्लेषण करने की आवश्यकता है. उनको अपने उन मार्गदर्शकों का आकलन करने की आवश्यकता है जो निरर्थक मुद्दों के द्वारा उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने को हवा देते रहने के साथ-साथ देश को अराजकता की तरफ ले जाना चाहते हैं. उनको ऐसे बयानवीरों से दूर रहने की आवश्यकता है जो उनके कपोल-कल्पित बयानों को नाइट्रोजन बम, हाइड्रोजन बम साबित करने की कोशिश में राहुल गांधी को ही मजाकिया पात्र बना दे रहे हैं.

 

ये बात न केवल राहुल गांधी को ही बल्कि कांग्रेस पार्टी को भी समझनी होगी कि वे वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और उनके तमाम अनर्गल बयान न केवल उनकी छवि को धूमिल करते हैं बल्कि देश की राजनीति को भी विवादास्पद बनाने के साथ-साथ देश की संवैधानिक संस्थाओं को संशय के घेरे में खड़ा करते हैं. ऐसी राजनीति भले ही उनके सन्दर्भ में उचित हो मगर देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, संवैधानिक संस्थाओं के लिए कतई उचित नहीं है.


11 दिसंबर 2020

आन्दोलन की आड़ में अराजकता फ़ैलाने की कोशिश?


ये चित्र इधर सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है. यह दिल्ली में कथित रूप से किसान आन्दोलन के साथ जुड़ा हुआ कटाया जा रहा है. जिस दिन से इस आन्दोलन का आरम्भ हुआ था, उसी दिन से किसानों के नाम पर कभी मोदी को देख लेने की बात कही गई, कभी हिन्दू महिलाओं के लिए अशालीन बयान दिए गए, कभी खालिस्तान समर्थन के नारे, कभी पाकिस्तान के पक्ष में नारे सुनाई दे रहे थे. उसी समय से बराबर हमने कहा था कि ये किसानों का आन्दोलन नहीं बल्कि कृषि-व्यापारियों का आन्दोलन है. बहरहाल, वह चर्चा अलग है. यदि ये चित्र वाकई दिल्ली में चल रहे इसी आन्दोलन से सम्बंधित है तो वाकई चिंता का विषय है. सोचने वाली बात ये है कि किसानों का सम्बन्ध इन अलगाववादी लोगों से कैसे है? कृषि से सम्बंधित कानूनों से जुड़े बिन्दुओं, उनसे जुड़े लाभ-हानि का तख्तियों पर चिपके चित्रों से क्या लेना-देना?


किसानों के आन्दोलन का ऐसी बातों से जुड़ा होने का अर्थ समझ से परे है. किसानों की आड़ लेकर देश में या कहें कि देश की राजधानी में फिर से अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है. इस पूरे आन्दोलन में जिस तरह का मुस्लिम गठजोड़ देखने को मिला, सिखों का भेष धारण किये हुए मुस्लिम युवक पकड़े गए वह भी अपनी अलग कहानी कहता है. शाहीन बाग़ के बाद भी दिल्ली में उस स्तर की अराजकता शायद ये ताकतें नहीं फैला सकीं थीं जैसी कि वे चाहती थीं, इसलिए अब दोबारा कोशिश की जा रही है. ये सभी को मालूम है कि दिल्ली में होने वाली हलचल समूचे विश्व में देखी-सुनी जाती है. ऐसे में दिल्ली में अराजकता फैलने से सरकार की, प्रशासन की छवि पर नकारात्मक असर भी पड़ता है. किसानों के रूप में बैठे ऐसे कृषि-व्यापारियों, खालिस्तान समर्थकों, पाकिस्तान समर्थकों का उद्देश्य कृषि सम्बन्धी कानून में संशोधन नहीं बल्कि अराजकता के द्वारा देश को, सरकार को बदनाम करना है. इसका प्रमाण इस चित्र के माध्यम से (यदि ये चित्र सही है) लिया जा सकता है.


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वंदेमातरम्

16 अगस्त 2020

सोशल मीडिया की अनियंत्रित उछल-कूद

सोशल मीडिया ने नियंत्रण के सारे बिन्दुओं को किनारे लगा रखा है. इस मंच पर न रिश्तों की कोई कद्र है, न संबंधों की, न उम्र की. इसकी उन्मुक्तता ने सभी को आज़ादी दे रखी है और वह भी पूरी तरह से निरंकुशता वाली. इस निरंकुश आज़ादी की कीमत लोगों के अपमान से, लोगों की बेइज्जती से चुकाई जा रही है. कई साल पहले कहीं पढ़ रखा था कि देश की आज़ादी के समय बहुत से लोगों ने अपना विचार इस रूप में दिया था कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है कि आज़ादी का सही अर्थ समझ सके या फिर उसका सही उपयोग कर सके. उस समय बहुतेरे लोगों ने आज़ादी के बाद भी कुछ सालों तक एक तरह की तानाशाही की वकालत की थी. उन स्थितियों में ऐसा किया जाना सही होता या गलत ये तो अब विमर्श का विषय है मगर अब लगता है कि वाकई देश अभी भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि यहाँ आज़ादी का सही उपयोग किया जा सके. इसके उदाहरण के रूप में सोशल मीडिया के तमाम मंचों को लिया जा सकता है.



यहाँ किसी भी विषय पर एकतरफा कुतर्क (इसे बहस कतई नहीं कहा जा सकता है) चलते रहते हैं. उम्र, अनुभव, ज्ञान को दरकिनार करते हुए बड़े-बड़ों की इज्जत का कचरा यहाँ सहजता से किया जाने लगता है. किसी भी विषय पर किसी भी व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा की जा सकती है कि वह किसी विशेषज्ञ की तरह अपना ज्ञान उड़ेल सकता है. अपनी बात पर ही, अपने विचार पर ही जमे रहने की कला इसी मंच पर आसानी से देखने को मिलती है. यहाँ एक अपने अलावा बाकी सभी के विचार तुच्छ और क्षुद्र की श्रेणी में शामिल मान लिए जाते हैं. ऐसा व्यक्ति जिसने किसी विषय को पढ़ना तो दूर कभी देखा भी न हो, उस पर भी किसी बड़े विशेषज्ञ से ज्यादा गंभीरता से अपनी राय दे सकता है. ऐसा किये जाने से न केवल विषय से सम्बंधित जानकारी का, सामग्री का नुकसान हो रहा है वरन इंटरनेट पर ऐसी सामग्री का भी जमावड़ा होता जा रहा है जो विशुद्ध रूप से संशय, भ्रम फ़ैलाने का काम कर रही है. इसी अनावश्यक स्वतंत्रता के चलते सभी को अपनी बात रखने का, अपने विचार पोस्ट करने का अधिकार मिला हुआ है. बिना किसी सेंसर के, बिना किसी संपादन के ऐसी सामग्री इंटरनेट पर दिखाई दे रही है जो न केवल भ्रामक है वरन अराजक भी है. इसे रोकने का या फिर इस पर नियंत्रण लगाने जैसा कोई कदम कहीं से भी उठता हुआ नहीं दिख रहा है.

इस तरह की अराजक और भ्रामक स्थिति में आने वाली उस पीढ़ी का भी नुकसान होने वाला है जो इंटरनेट की सामग्री को ही प्रमाणित मानती है. उसके लिए पुस्तकों का, बुजुर्गों के ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं है. ऐसी स्थिति में अधकचरे ज्ञान से, अशिक्षित लोगों के विचारों से सोशल मीडिया हरा-भरा बना हुआ है. आने वाले समय में यही भ्रामक और तथ्यहीन सामग्री ही सामाजिक क्षति करवाएगी. आज भले ही इसके मायने समझ न आ रहे हों मगर आने वाले समय में इसी तरह की सामग्री के सहारे लोगों के दिमाग को, उनके ज्ञान को गुलाम बनाया जा सकेगा. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कालखंड में सेना, हथियार से ही गुलामी लायी जाए. वर्तमान समय तकनीक का है और आने वाला इससे भी ज्यादा तकनीक का, विज्ञान का, जानकारियों का, तथ्यों का होगा. ऐसे में एक गलत अथवा भ्रामक सामग्री भी किसी हथियार से कम साबित नहीं होगी. आज के लिए न सही मगर आने वाले कल के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए आज तथ्यों की गलतियों को, भ्रम को, अराजकता को संभालना होगा. सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 फ़रवरी 2018

विद्यालय में खुलेआम नींद लेते, धुआँ उड़ाते शिक्षक महाशय


कुछ दिनों पहले समाचार-पत्र पलटते हुए एक खबर पर निगाह ठहर गई. आमतौर पर खबरों पर सरसरी निगाह डालकर आगे बढ़ते जाते हैं. यदि कोई खबर महत्त्वपूर्ण लगी तब तो उसे पूरा पढ़ा जाता है अन्यथा शीर्षकों से परिचय करते हुए सम्पादकीय आलेखों को समाप्त कर कॉलेज के लिए निकल लेते हैं. उस दिन जिस खबर पर हमारी निगाह ठहरी उसमें किसी तरह का ग्लैमर नहीं था, किसी हीरो-हीरोइन से जुड़ी नहीं थी किन्तु वह खबर हमारे नौनिहालों के भविष्य से जुड़ी हुई थी. इस कारण उस खबर को पढ़े बिना न रहा गया. खबर के शीर्षक ‘गुरु जी नींद में हैं, उठते ही धूम्रपान’ के साथ-साथ लगी दो फोटो अपने आप ध्यान खींच रही थीं. चूँकि समाचार-पत्र का वो सम्बंधित पृष्ठ उरई-जालौन से सम्बंधित था इस कारण ये तो तय था कि खबर जनपद जालौन की है, पर कहाँ, किस क्षेत्र की है इसे जानने के लिए समाचार पढ़ा गया.


समाचार से ज्ञात हुआ कि चित्र में दिख रहे महाशय शिक्षक हैं एक पूर्व माध्यमिक विद्यालय में. यह विद्यालय उरई के पास स्थित नरछा गाँव में स्थित है. समाचार पढ़ने के बाद तमाम प्रतिक्रियाएं दिमाग में उठीं. बहुत सी बातों ने अपना सिर उठाया. उन सबमें सबसे बड़ी बात जो हमें इस खबर में नजर आई वो यह कि सम्बंधित शिक्षक का नाम कहीं भी नहीं दिया गया है जबकि उसी विद्यालय की प्रधानाचार्या का नाम समाचार में दो बार प्रकाशित किया गया है. यहाँ समझने वाली बात है कि जिस प्रकार से समाचार-पत्र हिंदुस्तान की खबर में प्रकाशित है कि विद्यालय की प्रधानाचार्या ने जिलाधिकारी को सम्बंधित शिक्षक के खिलाफ शिकायती-पत्र दिया था. ऐसे में समाचार-पत्र की, सम्बंधित संवाददाता की जिम्मेवारी बनती थी कि उनके द्वारा यदि दोषी शिक्षक का नाम प्रकाशित नहीं किया गया तो प्रधानाचार्या का नाम भी प्रकाशित नहीं करना था. और यदि जब नाम प्रकाशित करके समाचार को वैधानिकता प्रदान करने की मंशा थी तो शिक्षक का भी नाम सामने आना चाहिए था, जिससे कि जनपदवासियों को उस शिक्षक का नाम भी पता चल सकता.




बहरहाल, आज के हमारे आलेख की चिंता इसके साथ-साथ ये भी है कि जब ऐसे शिक्षक हमारे विद्यालयों में मौजूद हैं तो विकास की संभावनाएं शून्य दिखाई देती हैं. समाचार पढ़ने के बाद पहला काम उस खबर को सबके बीच प्रसारित-प्रचारित करने का किया ताकि उस शिक्षक के बारे में लोग जान सकें. सोशल मीडिया के विविध मंचों पर जैसे ही खबर का प्रकाशन-प्रसारण हुआ वैसे ही कई मित्रों ने हमसे संपर्क किया. हमारे बहुत से मित्र शिक्षा विभाग से सम्बद्ध हैं जिनके कारण वहाँ की खबरें सहजता से मिलती रहती हैं. जरा सी देर में सिगरेट-बीड़ी सुलगाते शिक्षक की जन्मकुंडली पास में आ गई, साथ में कुछ फोटो भी प्राप्त हुईं. अनुरुद्ध पटेल नामक इस शिक्षक के सम्बन्ध राजनैतिक स्तर पर हैं. जनपद के एक रसूखदार नेता जी के बहुत खास लोगों के प्रिय लोगों में इस शिक्षक का नाम शामिल है, जिसके चलते विभागीय स्तर पर लोग इसके सामने आने से बचते हैं. एक मामले की जाँच में जाँच टीम को भी खाली हाथ वापस आना पड़ा क्योंकि मामला किसी छात्रा से जुड़ा होने के साथ-साथ सम्बंधित रसूखदार शिक्षक से भी जुड़ा हुआ था. इसके अलावा वर्तमान में जातिगत रूप से कुछ जनप्रतिनिधि भी इनकी जाति से निर्वाचित हुए हैं, जिसके चलते इनका अहंकार और सिर चढ़ कर बोल रहा है. विद्यालय आना, सम्बंधित कर्मचारियों, अध्यापकों से अभद्रता करना, गाली-गलौज वाली भाषा-शैली का इस्तेमाल करना, खुलेआम बच्चों के सामने धूम्रपान करना, पढ़ने-पढ़ाने वाली बेंचों पर नींद लेना इनके रोजमर्रा के कार्यों में शामिल है.




सोचा जा सकता है कि यदि ऐसे शिक्षक हमारे शिक्षा के मंदिरों में बैठे होंगे तो कैसे शिक्षा का विकास होगा? कैसे बच्चों का भविष्य सुधरेगा? शिक्षा विभाग को समय-समय पर सम्बंधित गांवों के लोगों से, बच्चों से, अभिभावकों से, तमाम विद्यालयों के शिक्षकों आदि से वहां के शिक्षकों-कर्मियों के बारे में जानकारी एकत्रित करते रहना चाहिए. किसी भी तरह से मिलती अनियमितता के बारे में विभाग को अपने स्तर से जाँच भी करते रहनी चाहिए. स्पष्ट है, जब तक ऐसे किसी भी शिक्षक, कर्मचारी पर सख्त से सख्त कार्यवाही नहीं कि जाती तब तक न केवल शिक्षा विभाग में बल्कि ऐसे किसी भी विभाग में सुधार संभव नहीं.