अक्टूबर माह जहाँ एक तरफ भारतीय राजनीतिक सन्दर्भों में चर्चा के केन्द्र में है
वहीं विदेश की धरती पर लगी असंतोष की आग में सुलग रहा है. इधर भारत में वोट चोरी पर
विपक्ष लगातार आन्दोलित है तो उधर फ्रांस, इटली सहित अनेक विकसित देशों की सड़कों
पर अराजकता फैली है. विरोध प्रदर्शन की आड़ में अराजकता के शिकार यूरोप के आधा दर्जन से अधिक देशों
ने एकसाथ सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल को देखा. इन देशों में फैले जनाक्रोश का कारण बढ़ती मँहगाई,
शिक्षा की बदतर स्थिति, सार्वजनिक
सुविधाओं में कमी आना आदि रहा है. इनके चलते यहाँ की युवा पीढ़ी सड़क पर उतर कर
आन्दोलन करने को विवश हुई. यथोचित कारणों से उपजे जनाक्रोश को अराजकतावादी ताकतों
ने हिंसक बनाकर मूल कारणों को नेपथ्य में धकेल दिया.
आन्दोलनकारी युवाओं के साथ अराजक ताकतों के शामिल हो जाने से फ्रांस में
स्थिति सर्वाधिक रूप से विध्वंसक हुई. पेरिस सहित कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट और हिंसक झड़पों ने उग्र
रूप धारण कर लिया. यहाँ की हिंसक घटनाओं का असर इसके पड़ोसी देश इटली पर भी पड़ा और
यहाँ मिलान सहित अनेक शहरों में नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा. जीवनयापन के बढ़ते
खर्च के विरुद्ध शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गया. इटली की प्रधानमंत्री
मेलोनी को यह स्पष्ट करना पड़ा कि विरोध जताना नागरिकों का अधिकार है लेकिन शहरों को
बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. फ्रांस और इटली के साथ-साथ स्पेन, पुर्तगाल,
ऑस्ट्रिया, बेल्जियम जैसे
देश भी इस समय तीव्र असंतोष की चपेट में हैं. इन देशों में विरोध का मुख्य कारण मँहगाई,
आवास की समस्या, शिक्षा
व्यवस्था की बदहाल स्थिति ही बताया जा रहा है.
राजनीतिक सन्दर्भों से इतर भी यूरोप के देशों में सुलग रही असंतोष की इस आग के
दूरगामी प्रभाव हमारे देश पर भी पड़ना स्वाभाविक है. यूरोपीय बाजारों की उथल-पुथल का
असर भारत के निर्यात, आईटी
सेक्टर, अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है. वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता
बढ़ने से निवेश और पूँजी प्रवाह भी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे हमारे लघु और
मध्यम उद्योगों को झटका लग सकता है. वैश्विक बाजारों में यदि अनिश्चितता का दौर
आता है तो इसका प्रभाव भारतीय शेयर बाजार और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ेगा.
भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी वैश्विक शक्तियों के मध्य भारत को अपनी प्राथमिकताओं
को नए सिरे से निर्धारित करना पड़ सकता है.
विदेश में फैली इस अराजकता ने देश के आंतरिक परिप्रेक्ष्य में इसे समझने और
तुलनात्मक अध्ययन करने का अवसर प्रदान किया है. यह विचारणीय है कि आखिर क्यों
दुनिया के सबसे पुराने और समृद्ध कहे जाने वाले देश आज गम्भीर अस्थिरता की चपेट
में हैं? आखिर भारत ने अपनी विशाल आबादी, विविधता और जटिल सामाजिक ताने-बाने के बावजूद स्वयं को किस
तरह अराजकता से सुरक्षित बनाये रखा है? यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है
क्योंकि विगत लम्बे समय से भारत को भीतर और बाहर से अस्थिर करने के प्रयास किये जा
रहे हैं; यहाँ अराजकता फैलाने के मंसूबे लगातार बनाये जा रहे
हैं. आज भले ही कुछ राजनीतिक अराजक तत्त्व देश के लोकतंत्र पर, यहाँ की लोकतांत्रिक प्रणाली पर सवाल उठाते हैं;
यहाँ की संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध अविश्वास का वातावरण बनाने का प्रयास करते
हैं; अनावश्यक मुद्दों के द्वारा नागरिकों को भ्रमित करने का
काम करते हैं मगर उनको समझना होगा कि भारत की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसका मजबूत
और समावेशी लोकतांत्रिक ढाँचा ही है. यही ढाँचा समय-समय पर चुनावों, बातचीत से,
लोकतान्त्रिक ढंग से जनता के असंतोष को शांत करने की आन्तरिक क्षमता रखता है. देश
में मजबूत पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक ताने-बाने और
कल्याणकारी योजनाओं का एक ऐसा सुरक्षाचक्र उपस्थित है जो नागरिकों के जीवनयापन की
बुनियादी आवश्यकताओं को सुरक्षित रखने का कार्य करता है.
देखा जाये तो यूरोप के नागरिकों विशेषकर युवाओं ने स्वयं को बेसहारा महसूस किया
है. इसके उलट भारत की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था ने नागरिकों में एक विश्वास
बनाये रखा है कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दायरे में कानून व्यवस्था से
खिलवाड़ न हो सकेगा. वैश्वीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में भी भारत की वैचारिक
और सांस्कृतिक सहनशीलता ने समाज को टूटने से बचाया है. यूरोपीय देशों की अस्थिरता,
भारत के पड़ोस में व्यापक अस्थिरता बनी रहने और देश को भी अराजकता की आग में झोंकने
के कथित प्रयासों के बाद भी यहाँ का लोकतान्त्रिक, सामाजिक ढाँचा सुरक्षित बना रहा. तमाम सारी विपरीत स्थितियों
के बाद भी देश के नागरिक हितों पर आँच न आने देना इस बात का प्रमाण है कि विकास जैसे
भौतिक पैमानों से किसी राष्ट्र की स्थिरता का निर्धारण नहीं होता है. किसी भी देश
की स्थिरता उसके सामाजिक मूल्यों, मजबूत संस्थागत ढाँचे,
स्पष्ट संवाद, लोकतान्त्रिक व्यवस्था और समावेशी शासन प्रणाली आदि के द्वारा
निर्धारित होती है. इनके द्वारा ही किसी भी देश को अराजकता से बचाकर उसकी सम्प्रभुता,
एकता, सुरक्षा आदि को अक्षुण्य रखा जा सकता है. अनेकानेक इंडेक्स के सहारे अपने
नागरिकों का हित और खुशियाँ तलाशते पश्चिमी देशों को हमारे देश से बहुत कुछ सीखने
की आवश्यकता है.

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