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29 सितंबर 2021

हृदय को स्वस्थ और मजबूत रखें

आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए लोगों ने अपने शरीर की परवाह किये बिना धनोपार्जन की परवाह करना शुरू कर दिया. वैश्वीकरण के दौर ने इस काम में उत्प्रेरक का काम किया है. अब लोगों को अपने स्वास्थ्य, घर-परिवार से ज्यादा चिंता अपने धन की रहती है, अपनी आर्थिक स्थिति की रहती है. इस कारण से लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है. अव्यवस्थ‍ित दिनचर्या, अनावश्यक तनाव, अशुद्ध खाना-पीना, प्रदूषण आदि के कारण इंसानों में अत्यधिक बीमारियाँ देखने को मिल रही हैं. इनमें भी सर्वाधिक मरीज हृदय रोग के मिल रहे हैं. इसमें भी सबसे बुरी बात ये है कि युवा वर्ग के लोग बहुतायत में ह्रदय रोग के बीमार हो रहे हैं.  


पूरे विश्व में हृदय के प्रति जागरूकता लाने और रोग की समस्याओं से बचने के लिए प्रतिवर्ष 29 सितम्बर को विश्व हृदय दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने की शुरूआत सन 2000 में की गई थी. आरम्भ में इसे प्रतिवर्ष सितम्बर माह के अंतिम रविवार को मनाया गया किन्तु सन 2014 में इसके लिए 29 सितम्बर की तिथि को निर्धारित कर दिया गया.




हृदय को स्वस्थ रखने के लिए निम्नलिखित उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं - 


प्रतिदिन व्यायाम के लिए समय निकालें. इसमें भी सुबह, शाम पैदल चलना अथवा सैर करना बेहतर है.

भोजन के द्वारा भी हृदय रोग की समस्या पर बहुत हद तक नियंत्रण लगाया जा सकता है. इसके लिए भोजन में नमक और वसा की मात्रा कम कर की जा सकती है. इसके साथ-साथ ताजे, मौसमी फल और सब्जियों को भोजन में नियमित रूप से लेना चाहिए.

धूम्रपान नहीं करना चाहिए. यह हृदय के साथ ही कई बीमारियों का कारक है.

इसके अलावा हृदय को तंदुरुस्त रखने के लिए नींद का भरपूर लिया जाना सर्वोत्तम उपाय है.

  

16 दिसंबर 2020

सहायता करने की सच्ची मानसिकता का प्रेरणादायी उदाहरण

सुबह लगभग दस बजे का समय है. बाजार में हलचल अभी शुरू होती जा रही है. दुकानें भी आराम-आराम से खुलती दिख रही हैं. ऐसी ही सामान्य सी सुस्त सुबह में सड़क के किनारे एक महिला बेहोशी की हालत में सड़क किनारे गिरी हुई है. वह अकेली नहीं है बल्कि उसके आसपास कई लोगों की भीड़ भी है. भीड़ भले ही ऐसी न हो जिसे बहुत बड़ी भीड़ कहा जाये मगर इतनी अवश्य है जो सड़क किनारे अचेतावस्था में गिरे किसी भी व्यक्ति की मदद कर सकती है. उस सुबह की भीड़ भी इतनी थी जो उस महिला की सहायता कर सकती थी. इसके बाद भी भीड़ बस तमाशा बने उस महिला को देखे जा रही थी. रुकने वाले रुक जाते थे और रुक कर एक नजारा देख चलने वाले फिर अपने रास्ते चल देते थे. उस रुकी भीड़ में कुछ युवा भी थे, कुछ पुरुष भी, कुछ लड़के भी मगर जिस तरह से स्त्री, पुरुष विभेद विगत कुछ वर्षों में समाज में बना दिया गया है, उससे शायद उनकी भी हिम्मत न पड़ रही थी उस महिला की सहायता करने की. इसके अलावा पुलिस, कानून के तमाम चकल्लस देखते हुए भी बहुत से लोग उस सड़क किनारे बेहोश पड़ी महिला से दूरी बनाये रखे होंगे.


उसी समय एक महिला का सड़क के दूसरी तरफ से निकलना हुआ. दूसरी तरफ से इसलिए क्योंकि उस सड़क पर आवागमन के लिए बने डिवाईडर न केवल सड़क को अलग-अलग भागों में बाँट रहे थे बल्कि सड़क पर चलने वालों को भी दो हिस्सों में अलग-अलग किये हुए थे. समाज में सभी एक प्रवृत्ति के नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारे शरीर से जुड़ी सभी उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतीं. इस एक जैसी प्रवृत्ति न होने के कारण अपनी स्कूटी से सड़क के दूसरी तरफ से चली जाने वाली उस महिला ने सड़क के दूसरी तरफ, डिवाइडर के उस पार कुछ असामान्य सा देखा-समझा. उस महिला ने स्कूटी को वापस सड़क किनारे गिरी अचेत महिला के पास लाकर रोका और फिर जैसा कि किसी भी जागरूक, संवेदित व्यक्ति को करना था, उसने अपना काम शुरू किया.


स्कूटी से उतर कर उस महिला ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर अचेत महिला को होश में लाने का उपक्रम शुरू किया. सजग महिला की हिम्मत, उसकी सक्रियता देख आसपास खड़े कुछ युवकों ने भी अपना सहयोग देना शुरू किया. इतनी देर के बाद जब भीड़ का हिस्सा न बन, एक सक्रिय महिला ने अपनी सजगता दिखाई तो उस अचेत महिला की बंद हथेलियों में से एक में कोई फोटो सी दिखाई दी और दूसरी में एक मोबाइल नंबर लिखा नजर आया. या भी सबकुछ भीड़ को नहीं बल्कि उस स्कूटी वाली महिला को नजर आया. उन्होंने अपने मोबाइल से तत्काल उस नंबर पर बात की. वो नंबर उस अचेत महिला के किसी रिश्तेदार का नहीं था. अब भी स्थिति ज्यों की त्यों थी कि वो महिला कौन है? वह सड़क पर अचेत क्यों पड़ी हुई है? उसके हाथ में लिखा नंबर किसका है? उसकी दूसरी हथेली में दबी फोटो किसकी है? वह यहाँ अचेतावस्था में कैसे पहुँची?


इस बीच उस जागरूक महिला के कहने पर किसी व्यक्ति ने एम्बुलेंस को फोन करके बुलाया. तब तक महिला भी कुछ होश में आती नजर आई. एम्बुलेंस आकर उस महिला को जिला चिकित्सालय ले गई. सक्रिय, जागरूक महिला अपने कार्यक्षेत्र को चल दी, भीड़ अपने-अपने विचार-तर्क गढ़ते हुए अपने-अपने रास्ते चल दी. बात यही समाप्त नहीं हुई, जो सजग रहता है, वह सदैव सजग रहता है. अचेत महिला की सहायता को रुकी उस महिला ने लगातार अपने फोन से चिकित्सालय प्रशसान से, पुलिस प्रशासन से संपर्क बनाये रखा. अंततः जब सुखद खबर ये मिली कि वह अचेत महिला, जो किसी संदेहास्पद वस्तु के खा लेने से अचेत हो गई थी, अब स्वस्थ है, खतरे से बाहर है.


यह पूरी घटना जनपद जालौन के उरई शहर की है. इस घटना को यहाँ सामने लाने का उद्देश्य महज इतना है कि उरई जैसे छोटे से शहर में भी जहाँ कि परिचय का दायरा आसानी से बड़ा किया जा सकता है, वहाँ भी सड़क किनारे अचेत पड़ी एक महिला सहायता को तरसती है. उसके चारों तरफ जमा भीड़ सिर्फ तमाशबीन बनी रहती है. इसके पीछे भले ही कानूनी लफड़े की बात हो या स्त्री, पुरुष विभेद की बात मगर स्थिति सुखद नहीं कही जाएगी.


अब आपको मिलवा दें उस महिला से जो अचानक से उस रास्ते से गुजरीं और बिना किसी लफड़े, समस्या की परवाह करते हुए उस अचेत महिला की सहायता में जुट गईं. वे डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी हैं जो वर्तमान में गांधी महाविद्यालय, उरई में मनोविज्ञान विभाग में कार्यरत हैं साथ ही संगीत, समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं. वे जनपद के ही नहीं बल्कि प्रदेश के अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से सम्बद्ध हैं. सामाजिक सक्रियता बनाये रखना, लोगों की मदद करना उनके खून में है, उनके स्वभाव में है. इसी के चलते उन्होंने बिना किसी तरह की देरी किये, बिना अच्छा-बुरा सोचे उस अचेत महिला की सहायता की.




इस घटना को सामने लाने का उद्देश्य यही है कि हममें से बहुत से लोग कानूनी दांव-पेंच, पुलिस प्रशासन के रवैये से डर कर, घबरा कर बहुत बार सहायता देने से बचते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. यदि हम अपने आपमें सशक्त हैं, ईमानदार हैं और निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता कर रहे हैं तो किसी तरह की समस्या नहीं आती है. हम सभी को डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी जी के इस कदम से सीखने की आवश्यकता है, प्रेरणा लेने की आवश्यकता है. इसी तरह से एक-एक करके समाज की नींव बनती है, समाज की आधारशिला मजबूत होती है, समाज की इमारत भव्य बनती है.



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वंदेमातरम्

24 नवंबर 2020

न खुद डरिए, न औरों को डराइए

रोज ही आपको सड़क दुर्घटनाओं की खबर पढ़ने को मिलती होगी, दुर्घटनाओं में लोगों के मारे जाने की भी खबरें मिलती होंगीं, हो सकता है कि आप, आपके परिजन, परिचित, सहयोगी आदि कभी बाइक, कार आदि दुर्घटना के शिकार हुए हों, दुर्भाग्य से आपके बीच का कोई सदस्य दुर्घटना में आपने हमेशा-हमेशा को खो दिया हो, तो 

क्या ऐसे किसी हादसे के बाद से आपने यात्रा करना बंद कर दिया?

क्या आपने बाइक, कार आदि पर बैठना बंद कर दिया?

दुर्घटना न हो तो क्या इसके लिए आपने बाइक, कार आदि चलाना छोड़ दिया?

दुर्घटना की आशंका के चलते क्या आपने घर से निकलना ही बंद कर दिया?

क्या और लोगों को आप बाइक, कार दुर्घटनाओं के आँकड़े दिखाकर डराते हैं?

क्या अपने परिचितों में दुर्घटनाओं की भयावहता के बारे में  डर पैदा करते हैं?

क्या आप अपनी सामान्य बातचीत में दुर्घटनाओं की बातें ही करते हैं?


संभव है आप कहेंगे कि ऐसा नहीं करते, तो ऐसा कोरोना को लेकर क्यों कर रहे हैं?


दुर्घटनाएँ देखकर, अपनों के साथ हुए हादसे देखकर, अपने किसी परिचित को इसमें खो देने के बाद आपने ये सब बंद न किया, बस सावधानी बढ़ा दी।


अब आप सुरक्षित यात्रा करने लगे होंगे। हो सकता है कि रफ्तार से बाइक, कार चलानी बंद कर दी हो। बस ऐसे ही सावधान रहिए, सावधानी बरतिए। अनावश्यक न डरिए, न दूसरों को डराइए।



24 जून 2019

जल संकट भविष्य की नहीं, आज की ही भयावहता है


यह सार्वभौमिक सत्य है कि समूचे विश्व के क्षेत्रफल का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा पानी से लबालब है. ऐसा होने के बाद भी वैश्विक स्तर पर जल-संकट बना हुआ है. इसका कारण है और वह कारण उपलब्ध जल का खारा होना है. सत्तर प्रतिशत के आसपास जल होने में पीने योग्य जल मात्र तीन प्रतिशत ही है, शेष उपलब्ध जल खारा है. इसमें भी एक समस्या है और वह यह कि उपलब्ध तीन प्रतिशत पेयजल में से महज एक प्रतिशत जल का उपयोग किया जाता है. औद्योगीकरण, जनसंख्या विस्फोट, पर्यावरण के साथ खिलवाड़ आदि से जहाँ प्राकृतिक संतुलन डगमगाया है उसी के दुष्परिणाम से जल का संकट सामने आया है.  इस संकट में वृद्धि उस समय और होने लगी है जबकि जल-प्रदूषण बढ़ने लगा है.


सेंट्रल वाटर कमीशन बेसिन प्लानिंग डारेक्टोरेट, भारत सरकार 1999 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में आने वाले वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में जल की खपत बढ़ती ही रहेगी. इससे भी जल-संकट और बढ़ने की आशंका है. इस रिपोर्ट में विभिन्न वर्षों एवं क्षेत्रों में भारत में जल की माँग प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि वर्ष 2000 में सिंचाई क्षेत्र में सर्वाधिक जल की माँग 542 बिलियन क्यूबिक मीटर रही जो बढ़कर वर्ष 2025 में 910 बिलियन क्यूबिक मीटर हो जाएगी. इसी तरह घरेलू उपयोग में जल की माँग मात्रा वर्ष 2000 में 42 बिलियन क्यूबिक मीटर थी जो बढ़कर वर्ष 2025 में 73 बिलियन क्यूबिक मीटर हो जाएगी. रिपोर्ट में इसी तरह से उद्योग, ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में जल की माँग को दिखाया गया है. इन तमाम क्षेत्रों में कुल माँग वर्ष 2000 में 634 बिलियन क्यूबिक मीटर रही जिसके वर्ष 2025 में बढ़कर 1092 बिलियन क्यूबिक मीटर होने की सम्भावना इस रिपोर्ट में दर्शायी गई है. स्पष्ट है कि देश में आने वाले वर्षों में हर क्षेत्र में जल की माँग निरंतर बढ़ती जा रही है. इस माँग के बढ़ने के अनुपात में पूर्ति न होने के कारण जल-संकट अवश्य ही बढ़ेगा. 

यहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य है कि जल-संकट का मूल कारण जल की बढ़ती माँग नहीं है. अब सवाल यही उठता है कि यदि जल की बढ़ती माँग जल-संकट का कारण नहीं है तो फिर इसका कारण क्या है? असल में देखा जाये तो देश में जल का उपयोग नियंत्रित ढंग से नहीं होता है. इसके साथ-साथ जनसामान्य द्वारा जल-संरक्षण के प्रति भी जागरूकता नहीं दिखाई जाती है. इससे भी जल का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है. एक अनुमान के अनुसार देश में लगभग 15 प्रतिशत जल का उपयोग होता है शेष बहकर बर्बाद हो जाता है. इसके अलावा घरों से, उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ भी जल को प्रदूषित कर रहे हैं. इससे भी पानी का संकट पैदा हो रहा है. 

यदि भविष्य के घनघोर जल-संकट से निपटने का विचार मानव अपने मन में नहीं लाता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि आने वाले समय में जल के लिए विश्व युद्ध हो जाये. हाल-फिलहाल बड़े-बड़े कदमों के उठाये जाने के बजाय छोटे-छोटे कदमों को उठाकर जल-संकट से बचा जा सकता है. जल के प्रति प्रत्येक व्यक्ति में गंभीरता आये इसके लिए आवश्यक है बचपन से ही घरों, स्कूलों के माध्यम से सभी को जल-संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाये. कुछ कानूनी कदम इस तरह के भी उठाये जाने चाहिए जिनके चलते लोग जल का दुरुपयोग करने से बचें. भू-गर्भ जल की, पेयजल की बर्बादी के प्रति उनमें डर का भाव जागे. घर के, उद्योगों के अपशिष्ट का उचित प्रबंधन किया जाना चाहिए, जिससे कि नदियों में, तालाबों में जल प्रदूषित न हो सके. इसके अलावा वर्षा के जल का संरक्षण करने सम्बन्धी कदम उठाये जाने की आवश्यकता है. इसके साथ-साथ यह देखने में आया है कि समाज में धर्म सम्बन्धी कार्यों के प्रति लोगों में एक सजग भावना रहती है. इसलिए जल संवर्धन सम्बन्धी कार्यों को धार्मिकता से जोड़कर उनका प्रसार करना चाहिए. सामाजिक स्तर पर किसी धर्म सम्बन्धी कदम की तरफ सभी का ध्यान सहजता से जाता है और उसके प्रति जागरूकता भी बढ़ती है. आने वाले समय के लिए हम सभी को आज सजग होना पड़ेगा, आज ही जागरूक होना पड़ेगा अन्यथा की स्थिति में कल को गंभीर जल-संकट से सामना करना पड़ सकता है.

07 जून 2019

पर्यावरण संरक्षण हेतु छोटे-छोटे कदमों की आवश्यकता


वर्तमान दौर में पर्यावरण असंतुलन की सबसे बड़ी समस्या ग्लोबल वॉर्मिंग है. इस कारण से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे मानव जीवन के कदम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में अगर हमने पर्यावरण को बचाने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा. पर्यावरण संरक्षण के लिए हम सभी के बहुत छोटे-छोटे प्रयास भी बहुत बड़े साबित हो सकते हैं. इसके लिए हम सभी निम्न कदम अपना सकते हैं - 

(1) नागरिकों को पौधारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जाये. भले ही कम पौधे लगाये जाएँ किन्तु उनकी विधिवत देखभाल की जाये. अपने पारिवारिक सदस्यों के जन्मदिन या किसी भी यादगार क्षण पर पौधे लगाकर उन यादों को चिरस्थायी बनाया जाये.
(2) मकान बनाते समय पेड़-पौधारोपण के लिए अतिरिक्त जगह छोड़ी जा सकती है. जहाँ वर्तमान में जगह नहीं है वहां अपने आंगन में थोड़ी सी जगह में गमलों के द्वारा हरियाली की जा सकती है. यही तापमान कम करेगी.
(3) पॉलिथीन से प्रदूषण फैलता है अत: पॉलिथीन का उपयोग न करते हुए रद्दी-पेपर से बनी थैलियों और कपड़े से बनी थैली और बैग्स का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए.
(4) पर्यावरण जागरूकता हेतु जल-संरक्षण भी आवश्यक है. इसके लिए हम सभी को कम से कम पानी का उपयोग करना चाहिए. शॉवर की जगह बाल्टी में पानी लेकर नहाएं. आंगन या फर्श सीधे पानी से धोने की बजाए झाडू लगाकर बाद में पोंछा लगा सकते हैं.
(5) घर में नल को टपकने न दें. प्लम्बर बुलाकर तुरंत ठीक करवाएं. इसके साथ-साथ सार्वजनिक जगहों में बहते नल को बंद करके पानी बचाया जा सकता है.
(6) घर के कचरे को बाहर खुले में फेंकने से बचा जाये. इसके साथ-साथ गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग जगहों पर एकत्रित किया जाना चाहिए.
(7) जल-संरक्षण के साथ-साथ बिजली की बजट करके भी पर्यावरण जागरूकता लाई जा सकती है. ऑफिस हो या घर बिजली का किफायती उपयोग करें. कमरे से बाहर निकलते समय बिजली से चलने वाले सभी उपकरण बंद कर दें.
(8) एसी, फ्रिज खरीदते समय ध्यान रखें कि ऐसे उपकरण पर्यावरण को नुकसान न पहुँचायें. विद्युत उपकरणों का समय-समय से रखरखाव करें.
(9) इसके साथ-साथ घर-घर जाकर लोगों को पर्यावरण बचाने के प्रति जागरूक किया जा सकता है. जिससे लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने से प्रकृति की रक्षा करने में मदद मिलेगी.
(10) इसी तरह नई पीढ़ी को प्रकृति, पर्यावरण, पानी व पेड़-पौधों का महत्व समझाएं. उनको इसके प्रति संवेदनशील बनायें. पृथ्वी हरी भरी होगी तो पर्यावरण स्वस्थ होगा, पानी की प्रचुरता से जीवन सही अर्थों में समृद्ध व सुखद होगा.

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पर्यावरण संरक्षण हेतु आवश्यक नहीं कि सिर्फ एक दिन विशेष पर ही जागरूक हुआ जाये. रोज ही छोटे-छोटे कदमों से, सामान्य से उपायों के द्वारा पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है.  आइये हम सब एकसाथ आगे बढ़ें. 

28 अप्रैल 2019

ऐसे जागरूक मतदाताओं के सहारे जिंदा है हमारा लोकतंत्र


इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव को देश का महापर्व घोषित कर दिया गया है. शासन-प्रशासन अपने-अपने स्तर पर पूरा दम लगाकर अधिक से अधिक मतदान करवाने की कोशिश में लगा हुआ है. ऐसे में मतदान कितना होगा ये बाद की बात है मगर जैसा कि पहले भी कहा था कि मतदाता जागरूकता किसी के कहने से नहीं होती वरन यह स्व-स्फूर्त प्रक्रिया है जो अंतःकरण से उपजती है. जिसे भी जरा सा भी भान है अपनी जिम्मेवारी का, अपने कर्तव्य का, देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली के प्रति विश्वास का, देश की सरकार के कार्यों के प्रति सकारात्मकता का वह अपने आपको मतदान के लिए प्रेरित कर ही लेता है. मतदान के लिए खुद को तैयार कर ही लेता है. उसे न तो प्रशासन की गोष्ठियों की आवश्यकता होती है, न रैलियों की, न नारे लिखी तख्तियों की, न आदर्श बूथ की. ऐसे लोग अपने आप मतदान के लिए सतर्क रहते हैं, जागरूक रहते हैं.


ऐसा उदाहरण आज विश्व के पहले अनाज बैंक के बुन्देलखण्ड स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की उरई शाखा में देखने को मिला जबकि वहाँ की लाभार्थी खाताधारक महिलाएँ जनपद जालौन में 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने के प्रति उत्साहित दिखीं. अनाज बैंक उरई शाखा प्रतिमाह दो बार एक महिला को पांच किलो अनाज प्रदान करता है, इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी भूखा न सोये. सभी महिलाएं ऐसी हैं जो अकेली हैं, वृद्ध हैं, अत्यंत गरीब हैं, मजबूर हैं, निराश्रित हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जो शिक्षित नहीं हैं. सामान्य अक्षर-ज्ञान से भी वंचित हैं, अपने नाम को लिखना भी नहीं जानती हैं. बहुत सी महिलाएं अत्यंत वृद्ध हैं. इसके बाद भी ख़ुशी की बात यह है कि दो-चार महिलाओं को छोड़कर सभी महिलाएं अभी तक मतदान करती रही हैं. अबकी बार कुछ महिलाओं के वोट कट गए हैं; कैसे, क्यों इसकी जानकारी उनको भी नहीं है और अनाज बैंक शाखा को भी समय से नहीं हो सकी.  

अप्रैल माह के दूसरे वितरण के दौरान आज सभी महिलाओं से मतदान करने सम्बन्धी चर्चा हुई. सभी महिलाओं ने पूर्व में अपने मतदान करने की बात कही. कुछ महिलाओं ने अपने वोट के इस बार कट जाने की समस्या बताई. उनकी बातों से लग रहा था, जैसे कि उनका वोट कट जाना गलत हुआ. उन्हीं महिलाओं में से अत्यंत वृद्ध महिला ने यहाँ तक कहा कि वह कल मतदान दिवस पर अपना आधार कार्ड लेकर अपने बूथ जाएगी. वहां किसी अधिकारी से बात करके वोट डलवाने के लिए कहेगी क्योंकि वह पहले वोट डालती रही है. सोचिये, जिस देश के नागरिकों में इस तरह का ज़ज्बा होगा, वहां का लोकतंत्र खतरे में कैसे आ सकता है? ये ऐसी महिलाएं हैं जिनको सीधे-सीधे अपने किसी जनप्रतिनिधि से काम नहीं पड़ना है. इनको किसी सरकार में बालू, शराब के ठेके नहीं चाहिए हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं जिनके किसी परिजन को कोई सिफारिश भी नहीं करवानी है. ये सभी महिलाएं बस इतना समझ सकी हैं कि देश में सरकार के बनाने-गिराने में वोट का महत्त्व है. इसी कारण वे अपना वोट देना चाहती हैं. उनके ये जानने का प्रयास नहीं किया कि वे किसे अपना वोट देना चाहती हैं और न ही उन्होंने ये बताने-पूछने की चेष्टा की. 

सुखद ये लगा जानकर कि जहाँ आज के दौर में जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों से रुष्ट होकर पढ़ा-लिखा मतदाता वोट डालने से विरक्त होने लगा है वहीं ऐसी महिलाएं अपने मतदान को लेकर सजग हैं. मतदान को छुट्टी का दिन मानकर पढ़ा-लिखा मतदाता कहीं सपरिवार पिकनिक पर निकल जाता है वहीं ये महिलाएं सबह-सुबह मतदान करने के प्रति जागरूक दिखीं. शिक्षित मतदाताओं के लिए शासन-प्रशासन द्वारा आये दिन तमाम तरह की नौटंकी करते हुए उनको जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं ये महिलाएं स्व-प्रेरण से मतदान के लिए जागरूक हैं. ऐसी महिलाओं, ऐसे मतदाताओं के कारण ही इस देश का लोकतंत्र जिन्दा है, इस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली सक्रिय है. नमन है ऐसी महिलाओं को, ऐसे जागरूक मतदाताओं को.  

27 अप्रैल 2019

एकमात्र काम बस मतदाता जागरूकता कार्यक्रम


चुनाव अपने चरम पर है और सभी जगह प्रशासन भी मुस्तैदी से जुटा हुआ है. चुनाव सम्बन्धी जो तैयारियाँ चल रही हैं, उनको लेकर जितना ध्यान प्रशासन स्तर पर रखा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा जोर इस बार मतदाता जागरूकता को लेकर दिख रहा है. दिन भर किसी न किसी रूप में मतदाताओं को जागरूक करने का काम किया जा रहा है. इस काम में प्रशासनिक मशीनरी जितना अधिक शामिल है, उससे कहीं ज्यादा उसने निजी मशीनरी को लगा रखा है. जागरूकता के नाम पर निजी संस्थानों को, सामाजिक कार्य करने वालों को लगा रखा गया है. कहीं-कहीं इनके द्वारा स्वेच्छा से काम किया जा रहा है और कहीं-कहीं प्रशासन द्वारा जबरिया तरीके से इनसे मतदाता जागरूकता के कार्य करवाए जा रहे हैं.


निश्चित ही चुनाव हमारे देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण भाग है और इसमें हर एक व्यक्ति को अपनी भागीदारी निभानी चाहिए. देखा जाये तो बहुत से भागों में ऐसा होता भी है. वे सरकारी लोग जिन पर सरकार का, प्रशासन का नियंत्रण है, चुनाव ड्यूटी में लगाये जाते हैं. यहाँ ऐसे लोगों की अपनी मजबूरी होती है और वे इस कार्य से खुद को सहजता से अलग भी नहीं कर पाते हैं. इस बार कई जगहों से प्रशासन द्वारा असंवेदनशील रवैया अपनाये जाने की खबरें भी मिली हैं. महिलाओं की निर्वाचन सम्बन्धी ड्यूटी लगाने में भी संवेदना का भाव नहीं दिखाया गया है. कई जगह बुजुर्ग कर्मियों के साथ भी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाये जाने की बातें सामने आई हैं. इसके साथ-साथ चुनाव ड्यूटी से बचे लोगों को और चुनाव ड्यूटी में लगे लोगों को मतदाता जागरूकता के इतने काम सौंपे गए, लगा जैसे वर्तमान निर्वाचन में जागरूकता एक प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आया हो. विद्यालयों के वे बच्चे भी इसमें शामिल किये गए जिन्हें अभी मतदान करने में समय है. कोचिंग सेंटर्स, विद्यालयों आदि को लगभग रोज ही किसी न किसी कार्यक्रम करने को, रैली निकालने को, गोष्टी आयोजित करने को मजबूर किया जाता रहा है. इस समय की भीषण गर्मी में बच्चों को धूप में रैली निकालने के लिए मजबूर करना किसी भी रूप में मानवीय तो समझ नहीं आया.

आज के दौर में मतदान करने वाला बहुत हद तक जागरूक है, इसके बाद भी यदि उसमें किसी तरह की सुसुप्तावस्था आई है तो वह जनप्रतिनिधियों के रवैये के चलते. उनके बेरुखे व्यवहार ने मतदाताओं को मतदान से दूर किया है. इसी तरह प्रशासन के तानाशाही भरे रवैये ने भी आम आदमी को प्रशासन से दूर किया है, उसके प्रति खौफ सा पैदा किया है. आज जिस तरह से शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधि अपने कार्य करने का तरीका बनाये हैं, उससे आमजनमानस में सिर्फ और सिर्फ भ्रष्ट तस्वीर बनी है. इसी के चलते प्रशासन के मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आम जनता को सिर्फ धन कमाने के, सरकारी पैसे को खपाने का माध्यम मात्र नजर आता है. प्रशासन ज्यादा से ज्यादा मतदाता जागरूकता कार्यक्रम करवा कर, अधिक से अधिक मतदान करवा कर अपनी प्रोफाइल को बढ़िया कर लेने की कोशिश में रहते हैं. चुनाव संपन्न होने के बाद उनका रवैया भी जनप्रतिनिधियों जैसा हो जाता है. वे भी आम जनता की समस्याओं की तरफ से अपने आपको दूर ले जाते हैं. 


असल में आज जनप्रतिनिधियों ने, प्रशासन ने जनता के बीच से अपना विश्वास खो सा दिया है. आये दिन के कार्यों से इसकी झलक भी दिखाई देती है. यदि हालिया मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों की चर्चा की जाये तो आये दिन निकलने वाली रैलियों से शहर की सड़कों पर जाम की स्थिति बनती है. चिलचिलाती धूप में राहगीर फँसे होते हैं, बच्चे फँसे होते हैं, मरीज तड़प रहे होते हैं मगर उस जाम को घंटों तक खुलवाने के लिए किसी तरह की प्रशासनिक मदद, सहयोग नहीं मिलता है. ऐसे भी जागरूकता से क्या फायदा जो अपने शहर के लोगों को ही कष्ट में खड़ा कर दे. असल में जागरूकता कहीं बाहर से ठेल-ठेल कर नहीं लाई जा सकती है. यह विशुद्ध अंतःप्रेरण का सुफल है. आज से दशकों पहले के चुनावों का दौर भी भली-भांति याद है जबकि लोग सुबह से ही मतदान करने के लिए हँसते-हँसते चल दिया करते थे. तब न तो आज की तरह रैलियाँ थीं, न गोष्ठियाँ, न नारेबाजी, न तख्तियाँ, न सेल्फी पॉइंट. तब लोग मतदान करना अपना कर्तव्य समझते थे और इसके लिए सजग रहते थे. जब तक एक-एक मतदाता चुनाव को, मतदान को अपनी जिम्मेवारी नहीं समझेगा,, अपना कर्तव्य नहीं मानेगा तब तक ऐसे ही मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलते रहेंगे. प्रशासन अपना काम करता रहेगा, मतदाता अपना काम करते रहेंगे, जनप्रतिनिधि अपना काम करते रहेंगे. इन सबके बीच देश का लोकतंत्र आगे बढ़ता ही रहेगा, लोकतान्त्रिक प्रणाली आगे बढ़ती रहेगी.

25 फ़रवरी 2019

सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने को सक्रिय रहिये


सोशल मीडिया की निर्बाध स्वतंत्रता किसी को कुछ भी कर गुजरने को प्रेरित करती है. कुछ लोग इस आज़ादी का सकारात्मक रूप से प्रयोग करते हैं तो कुछ इस आज़ादी का दुरुपयोग करते हैं. किसी समय सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों का उपयोग लोग अपनी पहचान बनाने के लिए किया करते थे. लोगों द्वारा अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन भी इसके माध्यम से हुआ करता था. ऐसा इसलिए भी होता होगा क्योंकि आज से कोई दस-पांच साल पहले इंटरनेट की सुविधा सबके पास में नहीं थी. स्मार्टफोन की सुविधा सबके हाथ में नहीं थी. मोबाइल पर नेट चार्ज अत्यधिक मंहगा होने के कारण भी लोगों द्वारा बहुत ही किफ़ायत से इसका उपयोग किया जाता था. ऐसे में जबकि व्यक्ति की जेब से उसकी क्षमता से अधिक धन का व्यय हो रहा हो तब वह अपनी किसी भी सुविधा का सोच-समझ कर उपयोग करता है. तब नेटचार्ज अधिक होने के कारण व्यक्ति के पास फालतू विचारों, कामों के लिए समय नहीं निकलता था.


समय बदला, स्मार्ट फोन ने सबके हाथों में पहुँच बना ली. फोन करने की सुविधा देने वाली सिम में अनलिमिटेड इंटरनेट की सुविधा के आने ने व्यक्तियों को निरंकुश बना दिया. निश्चित और सीमित समय में इंटरनेट का उपयोग करने वाला व्यक्ति अब चौबीस घंटे के हिसाब से इंटरनेट का उपयोग करने लगा. कभी-कभी लैपटॉप, डेस्कटॉप के सामने बैठने वाला व्यक्ति लगातार अब अपने स्मार्टफोन को ही निहारने का काम करने लगा. किसी समय काम के लिए उपयोग करने के लिए नेट का उपयोग करने वाला व्यक्ति अब बिना काम के भी उसी में चिपका रहने लगा. किसी समय अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने के लिए उपयोग में लाने वाले मंच को उसने अपने अन्दर की कुंठा निकालने के लिए उपयोग करने का मंच बना लिया. यही कारण है कि अब बहुतायत में लोगों का अवसाद, कुंठा बाहर आ रही है. अकारण लोग एक-दूसरे को गाली देने का काम कर रहे हैं. रिश्तों, संबंधों, उम्र अनुभव की परवाह किये बिना, सारी शर्म, संकोच त्याग कर सोशल मीडिया के खुले मंच का दुरुपयोग नंगई फ़ैलाने के लिए किया जा रहा है. लोग सकारात्मकता के बजाय अपनी नकारात्मकता को सामने लाने का काम कर रहे हैं. राजनैतिक विद्वेष को व्यक्तिगत विद्वेष में बदलने लगे हैं. बिना यह जाने-समझे कि किसका क्या स्थान है, क्या महत्त्व है, क्या अहमियत है सामने वाले को सिर्फ छोटा करने की कोशिश की जा रही है. सामने वाले के लिए अभद्र भाषा, अशालीन शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है. 

सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाएँ काफी समय से हो रही हैं. समय-समय पर लोगों द्वारा उनका जवाब भी दिया जाता है. इधर पुलवामा में सैनिकों पर हुए आत्मघाती हमले के बाद कुछ लोगों ने सैनिकों, शहीदों, उनके परिजनों के सम्बन्ध में आपत्तिजनक विचार दिए, पोस्ट लिखी. कुछ सजग, जागरूक लोगों द्वारा ऐसे लोगों के खिलाफ तुरंत कार्यवाही किये जाने सम्बन्धी कदम उठाया. ऐसी ही एक घटना के सन्दर्भ में प्रशासनिक अधिकारियों से मिलना हुआ. वर्तमान में ऐसे किसी भी घटनाक्रम से, जो कहीं न कहीं सैनिकों, शहीदों, भारतीय सेना के प्रति अशालीन, अभद्र व्यवहार को दर्शाता है न केवल प्रशासन सचेत है वरन आम नागरिक भी सक्रिय है. एक कवि महाशय की एक पोस्ट पर पहले तो वे उसी समय सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा जबरदस्त तरीके से समझाए गए. बाद में उनके खिलाफ शिकायत करने सम्बन्धी काम भी किया गया. ऐसे किसी भी घटनाक्रम पर, किसी भी पोस्ट पर जो किसी के स्वाभिमान के खिलाफ है, किसी के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करती है, किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाती हुई उसकी मान-मर्यादा को चोटिल करती है तो आम नागरिक को सचेत होने का परिचय देना चाहिए. हमें समझना होगा कि यही वे लोग होते हैं जो ऐसे छोटे-छोटे विचारों के द्वारा खाद-पानी पाते हैं और समय आने पर खुलेआम अपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं. हमारी आज कि सजगता, सक्रियता आने वाले कल के लिए सुरक्षित, खुशनुमा वातावरण तैयार करेगी.

22 जनवरी 2019

बच्चों को सिखाएँ जीवन का महत्त्व


कोचिंग सेंटर्स की बढ़ती संख्या और उसमें आने वाले बच्चों का सैलाब. कोचिंग क्लास छूटते ही सैकड़ों की संख्या में बच्चों का सडकों पर निकल आना किसी भी छोटे-बड़े शहर का आम नजारा हो गया है. वर्तमान दौर में अंकों की मारा-मारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का अथक दबाव, सबसे आगे रहने की गलाकाट प्रतिद्वंद्विता के चलते लगभग प्रत्येक बच्चा आज विद्यालयों में जाने की बजाय कोचिंग में जाता दिखाई दे रहा है. किसी बच्चे का कोचिंग जाना, अतिरिक्त रूप से पढ़ना किसी भी रूप में बुरा या गलत नहीं है. जिस तरह से वैश्वीकरण के दौर में समूचा विश्व एक जगह सिमटता दिखाई देने लगा है उसमें अधिक से अधिक जानकारी, ज्ञान किसी के लिए भी अपेक्षित है. समस्या कोचिंग सेंटर्स की बढ़ती संख्या से भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या के चलते इनका बढ़ना स्वाभाविक है. असल समस्या वह है जो दिखाई देने के बाद भी किसी को दिखाई नहीं दे रही है. आये दिन इन्हीं बातों पर शासन-प्रशासन द्वारा जागरूकता कार्यक्रम चलाये जाते हैं. इसके बाद भी खुद प्रशासन इस तरफ से आँखें मूँदे बैठा है. 


कोचिंग क्लासेज के छूटते ही वहां से निकले बच्चों का बाइक रेस में शामिल हो जाना एक अनिवार्य सा कदम हो गया है. कोचिंग सेंटर्स में आते समय तो वे अलग-अलग होते हैं लेकिन वहाँ से एकसाथ बड़ी संख्या में निकलने के बाद उन नाबालिग बच्चों की बाइक, स्कूटी का सडकों पर अंधाधुंध तरीके से दौड़ना खतरे का ही सूचक है. बेतरतीब दौड़ती बाइक, एक-एक बाइक पर तीन-तीन लोगों का बैठे होना, बिना अपनी जान की परवाह किये दूसरे व्यक्ति की जान के लिए आफत बने इन बच्चों को अंदाजा भी नहीं होता कि कैसे एक चूक उनकी जान पर भारी पड़ जाएगी. अपने घर-परिवार, अपने माता-पिता की चिंता से बेफिक्र वे बस अपनी बाइक दौड़ाने में तत्पर रहते हैं. वैसे चिंता जैसा शब्द शायद यहाँ उचित नहीं क्योंकि यदि उनके घर-परिवार या माता-पिता को उन बच्चों की चिंता होती तो वे कम उम्र में उनके लिए तेज रफ़्तार बाइक, स्कूटी की व्यवस्था ही नहीं करते. यदि किसी मजबूरी या समय की बचत के लिए उनको ऐसा करवाया भी जाता तो वे अपने बच्चों को इसके लाभ-हानि के बारे में भी समझाते. ऐसा शायद बिलकुल नहीं हो रहा है क्योंकि किसी एक पल में लगता नहीं कि बाइक दौड़ाते इन बच्चों को उनके माता-पिता ने कोई सीख दे रखी है.

यहाँ प्रशासन को भी सजग होने की आवश्यकता है. उनके द्वारा ऐसे बच्चों के बाइक चलाने पर कठोर कदम उठाये जाने चाहिए. कोचिंग सेंटर्स के द्वारा किसी तरह की हिदायत ने देना, कोई सख्ती न करने के पीछे उनकी अपनी मजबूरी होती है, उनके अपने व्यावसायिक हित होते हैं मगर प्रशासन के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती है. ऐसा तब जबकि आये दिन प्रशासन द्वारा यातायात जागरूकता कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं. इस बारे में प्रशासन के साथ-साथ अभिभावकों को भी जागने की, सचेत होने की जरूरत है. भविष्य के खतरों को कुछ आवश्यक कदम उठाकर टालना हम सबके हाथ में है और उन पर अमल करना चाहिए.

17 जून 2018

अवैध तेजाब से लड़ने को एकजुट होना होगा #stopsaleacid


इंसानी दिमाग में कहीं गहरे बैठी पशुता, क्रूरता कब, किस रूप में सामने आये कहा नहीं जा सकता. उसकी मानसिक क्रूरता का ही दुष्परिणाम है कि समाज में रोज ही किसी न किसी तरह की आपराधिक घटनाएँ सुनाई देती हैं. इन्हीं आपराधिक घटनाओं में विगत कुछ वर्षों से एसिड अटैक (तेजाबी हमले) की घटनाओं में वृद्धि हुई है. तेजाबी हमले का शिकार सिर्फ और सिर्फ बेटियाँ हो रही हैं. किसी मनचले के एकतरफा प्रेम का इंकार और तेजाबी हमला, किसी अन्य इंकार के सुनाई देने पर महिला के चहरे पर एसिड अटैक कर देना. एक पल को सिर्फ विचार करने पर ही पूरा दिमाग झनझना जाता है कि कैसे कॉलेज में प्रैक्टिकल के दौरान दो-चार बूँद एसिड उँगलियों पर गिर जाने भर से घंटों जलन मचती रहती थी. किस तरह घर में, किसी व्यवसाय के दौरान एसिड से कार्य करने के दौरान असावधानीवश शरीर पर छिटक कर गिरा तेजाब कभी-कभी शरीर के उस हिस्से में खाल का, मांस को जला दिया करता है. घंटों, दिनों के हिसाब से न केवल जलन बल्कि अप्रत्याशित दर्द बना रहता है. जब दो-चार बूंदे पूरे दिल-दिमाग को हिलाकर रख देती हैं तो सोचिये क्या स्थिति होती होगी जबकि कोई दिमागी क्रूर इन्सान किसी के पूरे चेहरे पर तेजाब फेंक देता है.


ये हमारे समाज की विद्रूपता है कि इस तरह की कई-कई घटनाओं को देखने-सुनने के बाद भी जनसामान्य इस बारे में जागरूक या सचेत नहीं है. सन 2016 में मुम्बई के प्रीति राठी तेजाब कांड में अदालत ने मामले को रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मानते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी. यह अपने आपमें पहला मामला था जबकि एसिड अटैक मामले में किसी आरोपी को फाँसी की सजा सुनाई गई हो. देखा जाये तो महज सजा ही एकमात्र समाधान नहीं है. इससे बेहतर समाज को जागरूक होने की जरूरत है. उच्चतम न्यायालय ने सन 2013 में एसिड अटैक को गंभीर अपराध मानते हुए सरकार, एसिड बेचनवाले दुकानदारों और एसिड अटैक पीड़ितों के लिए दिशा-निर्देश दिए थे. अदालत के अनुसार तेजाब केवल उन्हीं दुकानों पर बिक सकता है जिनको इसके लिए पंजीकृत किया गया हो. एसिड 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों द्वारा नहीं बेचा जाएगा और जो भी इसे खरीदने आएगा दुकानदार द्वारा उसके घर का पता, टेलीफोन नंबर तथा एसिड खरीदने का उद्देश्य सहित अन्य जानकारी लेनी होगी और इसका पूरा लेखा-जोखा लिखित में अपने पास रखना होगा. जो दुकानदार एसिड बेच रहे हैं उनके पास इसका कितना स्टॉक है इसकी जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी. अदालत ने यह भी प्रावधान किया है कि यदि किसी दुकानदार द्वारा इन नियमों की अनदेखी की जाती है तो पकड़ने जाने पर  उस पर पचास हजार रुपये जुर्माना लगाया जाएगा. ऐसी स्थिति के बाद भी तेजाब की बिक्री खुलेआम हो रही है.


वर्ष 2005 में महज पंद्रह वर्ष की आयु में लक्ष्मी अग्रवाल एसिड अटैक का शिकार हुई. लम्बे और दर्दनाक समय में इलाज के बाद अपने आपको कमजोर न पड़ने देने वाली लक्ष्मी ने देश भर में एसिड अटैक के विरुद्ध आवाज़ उठानी शुरू की. वर्तमान में उनके द्वारा #stopsaleacid अभियान चलाया जा रहा है, जिसका मूल उद्देश्य खुलेआम एसिड की बिक्री को रुकवाना है. यह सही है कि आज बहुतेरे काम ऐसे हैं जिसके लिए तेजाब की आवश्यकता होती है. ऐसे में तेजाब को हमेशा-हमेशा के लिए बिक्री से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है मगर इसके साथ एक पहलू ये भी है कि यह अत्यंत घातक पदार्थ है. जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी बिक्री के लिए नियम बना दिए गए हैं तो प्रशासन द्वारा उन्हें सख्ती से लागू करने के कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे हैं? उपयोगी कार्यों के अलावा तमाम सिरफिरे हैं जो तेजाब का दुरुपयोग करते हुए हमारी-आपकी बेटियों के भविष्य से, उनकी जान से खिलवाड़ करते हैं. न केवल प्रशासन को बल्कि नागरिकों को भी इसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता है. हम लोग सजग हों और बिना ये सोचे कि इससे हमारा व्यक्तिगत क्या लेना-देना है हर उस व्यक्ति की, हर उस दुकानदार की शिकायत प्रशासन से करनी चाहिए जो खुलेआम तेजाब बेचने में लगा है. उन दुकानों को भी चिन्हित करने की आवश्यकता है जो गैर-पंजीकरण के तेजाब बेचने का काम कर रहे हैं.


हम सभी को आज ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है. यह समय की माँग भी है और हमारी बेटियों के लिए सुरक्षात्मक भी है. आइये, हम सब एकजुट होकर तेजाब रुपी खतरनाक पदार्थ की खुलेआम बिक्री के खिलाफ खड़े हों. इसके साथ ही उस मानसिकता के खिलाफ भी खड़े हों जो महज अपनी पसंदगी के नकारने पर एसिड अटैक जैसे खतरनाक कदम उठाकर हमारी बेटियों की जान से, भविष्य से खेल रही है. आखिर किसी एक व्यक्ति की दिमागी क्रूरता का शिकार हम अपनी बच्चियों को कब तक होने देंगे? आज नहीं तो कल हमें जागना ही होगा, एकजुट होना ही होगा. और जब ऐसा करना ही है तो फिर कल का इंतजार क्यों?




05 जून 2018

पर्यावरण के लिए संकट है पॉलीथीन


सम्पूर्ण विश्व अनेकानेक संकटों से गुजरने के साथ-साथ पर्यावरण संकट के दौर से भी गुजर रहा है. सत्यता यह है कि यह संकट मनुष्य द्वारा ही उत्पन्न किया गया है. इन्सान इस संकट के लिए किसी शक्ति, परमात्मा, प्राकृतिक कारकों को दोषी नहीं ठहरा सकता है. पर्यावरण संकट आज मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में खड़ा हुआ है. इसके मूल में तमाम कारण होते हुए भी सबसे प्रमुख है इन्सान का विकास की अंधी दौड़ में लगे रहना. इस दौड़ ने मनुष्य को पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों से विमुख कर दिया है. आदिमानव से महामानव बनने की अदम्य लालसा में इस बात की परवाह किये बिना कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी, उसने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. मनुष्य के उठते लगभग प्रत्येक कदम से आज पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है. इसमें भी सबसे ज्यादा नुकसान उसके द्वारा प्रत्येक छोटे-बड़े कामों के लिए उपयोग में लाई जा रही पॉलीथीन से हो रहा है.


पॉलीथीन से पर्यावरण को सर्वाधिक नुकसान होता समझ भी आ रहा है, दिख भी रहा है. इसमें पाली एथीलीन के होने के कारण उससे बनने वाली एथिलीन गैस पर्यावरण क्षति का बहुत बड़ा स्त्रोत है. पॉलीथीन में पालीयूरोथेन नामक रसायन के अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है. इन रसायनों की उपस्थिति के कारण पॉलीथीन हो या कोई भी प्लास्टिक उसको नष्ट करना संभव नहीं होता है. जमीन में गाड़ने, जलाने, पानी में बहाने अथवा किसी अन्य तरीके से नष्ट करने से भी इसको न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें शामिल रसायन के दुष्प्रभाव को मिटाया जा सकता है. यदि इसे जलाया जाये तो इसमें शामिल रसायन के तत्व वायुमंडल में धुंए के रूप में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं. यदि इसको जमीन में दबा दिया जाये तो भीतर की गर्मी, मृदा-तत्त्वों से संक्रिया करके ये रसायन जहरीली गैस पैदा करते हैं, इससे भूमि के अन्दर विस्फोट की आशंका पैदा हो जाती है. पॉलीथीन को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस धुंए के रूप में वायुमंडल से मिलकर ओजोन परत को नष्ट करती है. इसके साथ-साथ पॉलीथीन को जमीन में गाड़ देना भी कारगर अथवा उचित उपाय नहीं है क्योंकि यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है इससे मृदा तो प्रदूषित होती ही है साथ ही ये भूमिगत जल को भी प्रदूषित करती है. इसके साथ-साथ जानवरों द्वारा पॉलीथीन को खा लेने के कारण ये उनकी मृत्यु का कारक बनती है. 

सबकुछ जानते-समझते हुए भी आज बहुतायत में पॉलीथीन का उपयोग किया जा रहा है. यद्यपि केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा उनके विनिर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध वर्तमान में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. इसका मूल कारण पॉलीथीन बैग की मोटाई की जांच करने की तकनीक की अपर्याप्तता है. ऐसे में पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को रोकने का सर्वाधिक सुगम उपाय उसके पूर्ण प्रतिबन्ध का ही बचता है. पॉलीथीन के द्वारा उत्पन्न वर्तमान समस्या और भावी संकट को देखते हुए नागरिकों को स्वयं में जागरूक होना पड़ेगा. कोई भी सरकार नियम बना सकती है, अभियान का सञ्चालन कर सकती है किन्तु उसे सफलता के द्वार तक ले जाने का काम आम नागरिक का ही होता है. इसके लिए उनके द्वारा दैनिक उपयोग में प्रयोग के लिए कागज, कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग किया जाना चाहिए. नागरिकों को स्वयं भी जागरूक होकर दूसरों को भी पॉलीथीन के उपयोग करने से रोकना होगा. हालाँकि अभी भी कुछ सामानों, दूध की थैली, पैकिंग वाले सामानों आदि के लिए सरकार ने पॉलीथीन के प्रयोग की छूट दे रखी है, इसके लिए नागरिकों को सजग रहने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे उत्पादों के उपयोग के बाद पॉलीथीन को अन्यत्र, खुला फेंकने के स्थान पर किसी रिसाइकिल स्टोर पर अथवा निश्चित स्थान पर जमा करवाना चाहिए. ये बात हम सबको स्मरण रखनी होगी कि सरकारी स्तर पर पॉलीथीन पर लगाया गया प्रतिबन्ध कोई राजनैतिक कदम नहीं वरन हम नागरिकों के, हमारी भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए उठाया गया कदम है. इसको कारगर उसी स्थिति में किया जा सकेगा, जबकि हम खुद जागरूक, सजग, सकारात्मक रूप से इस पहल में अपने प्रयासों को जोड़ देंगे.

20 मार्च 2018

हमारे आँगन आज भी खेलती है गौरैया


आज, २० मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है. वर्तमान परिदृश्य जिस तरह का है उसमें वर्तमान पीढ़ी के बहुत से बच्चों ने गौरैया को देखा भी नहीं होगा. ऐसे बच्चों-युवाओं के लिए गौरैया तस्वीरों में, फिल्मों में देखने वाला पक्षी बन गया है. महानगरों में, मेट्रो शहरों के अलावा ऐसे शहर जहाँ आधुनिक सभ्यता तेजी से फैलती जा रही है वहाँ मानव का विकास तो हुआ मगर गौरैया का विनाश होता चला गया. गौरैया अचानक ही हम लोगों के जीवन से गायब नहीं हुई है. सत्तर-अस्सी के दशक में जन्म लेने वाली पीढ़ी ने तो गौरैया के साथ अपना बचपन गुजारा है, संभव है कि कहीं-कहीं नब्बे के दशक में जन्मे लोगों ने भी गौरैया के साथ थोडा-बहुत खेलकूद कर लिया हो. इसके बाद की जन्मी पीढ़ी ने बमुश्किल गौरैया को देखा-सुना होगा. 


आज तो गौरैया हमारे घरों के आँगन, छतों में मिलना तो बहुत दूर की बात होती जा रही है, वह शहर में भी गिनी-चुनी संख्या में, गिनी-चुनी जगहों पर दिखाई दे रही है. जिन लोगों ने भी इसके साथ अपना बचपन बिताया है, अपने दिन बिताये हैं उन्हें भली-भांति याद होगा कि इस नन्हीं चिड़िया का जीवन-चक्र इंसानी माहौल के बीच, मानव-परिजनों के बीच ही बीतता था. परिवार के छोटे-बड़े कामों में घर की छत, आँगन का उपयोग किया जाता था. रोजमर्रा के कामों के साथ-साथ किसी भी तरह के आयोजनों में खाद्य-पदार्थों का समूचा प्रक्रम घर-परिवार के बीच ही संपन्न होता था. गेंहू, अनाज का धोना-सुखाना, अचार, पापड़, चिप्स आदि के बनाये जाने, उनके सुखाये जाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया घर के छत-आँगन में ही संपन्न होती थी. इसके अलावा परिजनों का भोजन करना एकसाथ होता था और वो भी घर के बरामदे में, खुले में ही. सर्दियों में तो छत या खुली जगह पूरे परिवार की डायनिंग टेबल बन जाया करती थी. ऐसे में जहाँ पूरा परिवार एकसाथ बैठकर अपना पेट भर रहा हो उस नन्हीं गौरैया का परिवार कैसे भूखा रह जाता? थालियों, कटोरियों के बीच से उसके नन्हे से पेट के लिए खाद्य-सामग्री सहज रूप से स्वतः ही निकलती रहती थी.


इधर अब मानव गौरैया को बचाने की वकालत करने में लगा है, उसके पहले वह ये तो जान ले कि इस नन्हे पक्षी को विलुप्त पक्षी की श्रेणी में खड़ा करने वाला भी वही इन्सान है. गाँव वीरान होते जा रहे हैं. छोटे शहर बड़े शहरों की नक़ल करने में लगे हैं. बड़े शहर महानगर बनते जा रहे हैं. महानगर मेट्रो बनने की दौड़ में शामिल हैं. ऐसे में चारों तरफ कंक्रीट के जंगल ही खड़े दिखाई देते हैं. छोटे-छोटे, खुले मकानों की जगह पर बड़ी-बड़ी इमारतें, बहुमंजिली इमारतें, दबड़े, जेलनुमा अपार्टमेंट्स दिखाई देने लगे हैं. जंगल तो लगातार समाप्त होते ही जा रहे हैं, शहरों में से भी बड़ी तेजी से पार्क, बाग़-बगीचे, पेड़-पौधे विलुप्त हो रहे हैं. बड़े-बड़े पेड़ों के समाप्त होने के साथ-साथ घरों में से रोशनदान भी समाप्त हो चुके हैं. आँगन-छतें तो पहले से ही गायब हैं. आधुनिकता के चलते एक तिनका भी घर के कोने में न देखने वाला इन्सान गौरैया का घोंसला कैसे बर्दाश्त कर सकता है. परिणामस्वरूप घोंसला-विहीन गौरैया कहाँ, कैसे अपने अंडे देती? कहाँ उन्हें सेती? कैसे बच्चे उनमें से जन्म लेते?


इन सबके अलावा मोबाइल टावर से होने वाले रेडियेशन ने भी गौरैया को नुकसान पहुँचाया है. इसी तरह से ग्लोबल वार्मिंग के चलते बढ़ते तापमान ने भी उसकी जान ली है. हम लोग यदि चंद छोटे-छोटे सकारात्मक, सार्थक कदम उठा लें तो आज भी बची-खुची गौरैयाओं के सहारे उनकी संख्या को बढ़ाया जा सकता है. यदि हमारा घर आज भी ऐसी स्थिति में है जहाँ अहाता है, खुला स्थान है तो वहां गौरैया के घोंसले बनाने लायक जगह की व्यवस्था की जा सकती है. यदि हमारा घर छोटा है तो उसकी बालकनी में, खिड़की के रोशनदान में इन चिड़ियों को आहार और घरौदें बनाने के लिए कृत्रिम घरौंदों की व्यवस्था कर सकते हैं. उनके लिए पानी, खाद्य-पदार्थ का इंतजाम कर सकते हैं. घरों में सुरक्षित स्थानों पर गौरैया के घोंसले बनाने वाली जगहों का विकास किया जा सकता है और ऐसा न होने पर लकड़ी, प्लास्टिक के डिब्बों या मिट्टी के घोंसले बनाकर लटकाये जा सकते हैं.

आज की पीढ़ी यदि इस लेख को पढ़ेगी तो समझ ही नहीं सकेगी कि किसकी बात हो रही है? उनकी जानकारी के लिए संक्षिप्त रूप में, घरेलू गौरैया एक ऐसा पक्षी है जो यूरोप और एशिया में सामान्य रूप से हर जगह पाया जाता है. शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह ही प्रजातियां पाई जाती हैं. ये हैं हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो. इनमें हाउस स्पैरो को ही गौरैया कहा जाता है. यह शहरों में ज्यादा पाई जाती हैं. यह एक छोटी चिड़िया है जो हल्की भूरे रंग की होती है. इसके शरीर पर छोटे-छोटे पंख, हलकी पीली चोंच व हलके पीले रंग के पैर होते हैं. नर गोरैया की पहचान उसके गले के पास बने काले धब्बे से होती है. मादा गौरैया में ऐसा धब्बा नहीं पाया जाता. नर गौरैया के सिर का ऊपरी भाग, नीचे का भाग और गालों पर पर भूरे रंग का होता है. गला चोंच और आँखों पर काला रंग होता है और पैर भूरे होते हैं. मादा के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होता है. बहुत सी जगहों पर नर गौरैया को चिड़ा और मादा चिड़ी या चिड़िया भी कहते हैं. सामान्यतः यह चिड़िया हमारे घरों के आसपास रहना पसंद करती है.


अपने आसपास रहने वाले इस पक्षी के बिना हम सबको बुरा लगता है, लगना भी चाहिए. हम लोगों के साथ खेलकूद कर अपना जीवन हम लोगों के साथ गुजारने वाली ये नन्हीं गौरैया आज कभी-कभार ही दिखाई देती है. वह फिर से हमारे साथ रहे. फिर से हमारे साथ खाए-पिए. फिर से हमारे साथ छत-आँगन में टहले-उड़े. यदि यह सब संभव करना है तो हम इंसानों को अपनी जीवन-शैली में कुछ बदलाव करने होंगे. नन्हीं गौरैया को बचाने के लिए कुछ सार्थक, ठोस कदम उठाने होंगे.

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सारे चित्र लेखक द्वारा कैमरे से निकाले हुए हैं.

21 जनवरी 2017

राजनैतिक जागरूकता की आवश्यकता

चुनावी मौसम सबको अपने आगोश में ले लेता है. प्रशासनिक अमला अपनी तरह से कार्य करने में जुट जाता है, राजनैतिक दल अपनी तरह से गतिविधियाँ बढ़ा देते हैं. राजनैतिक दल जहाँ लुभावने वादों और तमाम तरह के सपने दिखाकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति बनाते हैं वहीं प्रशासनिक अमला मतदाताओं को अधिक से अधिक मतदान करने के लिए जागरूक करने लगता है. उसकी तरफ से मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों के संचालन की भरमार होने लगती है. कभी गोष्ठी, कभी जुलूस, कभी रैली, कभी नुक्कड़ नाटक आदि. इन सबके लिए  राष्ट्रीय, प्रादेशिक स्तर से जनपद, ग्रामीण स्तर तक प्रशासन मुस्तैदी से मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलाने में जुट जाता है और उसके साथ सम्बंधित क्षेत्र के कुछ नागरिक भी जुट जाते हैं. इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो शौकवश इन कार्यक्रमों में दिख जाते हैं अन्यथा की स्थिति में बहुतायत में वे लोग हैं जो किसी न किसी रूप में प्रशासन के दबाव में हैं, प्रशासन से लाभान्वित होते रहते हैं, प्रशासन से लाभ लेने की जुगाड़ में रहते हैं अथवा प्रशासन की गुड बुक में आने की जद्दोजहद करते रहते हैं. ज्यादातर देखने में आ रहा है कि मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों में रैली के लिए, गोष्ठी के लिए अथवा किसी कार्यक्रम के लिए माध्यमिक विद्यालयों को, महाविद्यालयों को प्रशासन द्वारा पकड़ सा लिया जाता है, उनके विद्यार्थियों के रूप में संख्याबल बना लिया जाता है. पोस्टरतथा अन्य प्रचार-सामग्री साथ में मीडिया की उपस्थिति फिर फोटो सेशन, कुछ भाषणबाज़ी और निपट गया मतदाता जागरूकता कार्यक्रम. इस बार जिला प्रशासन अन्य तरीके अपनाने के साथ मानव श्रृंखला बनाये जाने पर भी जोर दे रहा है. शहर भर में सड़क के किनारे खड़े सरकारी कर्मी, विद्यालयों, महाविद्यालयों के विद्यार्थी, समाजसेवी आदि मतदाता जागरूकता अभियान सम्बन्धी नारे लगाते अपनी उपस्थिति दिखाने में लगे हुए हैं. 



आखिर ऐसे अभियानों का, कार्यक्रमों का और गोष्ठियों आदि का औचित्य क्या है? सिर्फ मतदाता को जागरूक बनाकर, अधिक से अधिक मतदान करवा कर क्या सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है? कहीं न कहीं नागरिकों की सक्रियता के चलते, चंद महाविद्यालयों, विद्यालयों के विद्यार्थियों के संख्याबल से, प्रशासनिक मातहतों के ज़रिये प्रशासन अधिक मतदान पर चुनाव आयोग के सामने अपनी पीठ खुद ठोंक लेता है. इसके अलावा कुछ और परिवर्तन होता नहीं दीखता है. बदलाव की जिस पहल की बात की जा रही है, वो देखने को नहीं मिलती है; मतदाताओं को उसकी शक्ति, उसके अधिकारों का जो झुनझुना पकड़ाया जाता है उसमें स्थायित्व नहीं दीखता है. आखिर जब तक चयन के लिए सही लोग सामने नहीं आयेंगे, तब तक अधिक मतदान से क्या मिलने वाला है? चुनाव आयोग जिस तरह से अधिक मतदान के लिए, निष्पक्ष मतदान के लिए, मतदाता जागरूकता के लिए कमर कसे रहता है, उसी तरह राजनैतिक दलों के लिए भी उसे मुस्तैद होना पड़ेगा. 



आखिर अधिक से अधिक मतदान करना ज्यादा उपयुक्त है या फिर सही व्यक्ति को मतदान करने की आवाज़ उठाना ज्यादा उपयुक्त है? आज जिस तरह से धर्म-मजहब के आधार पर, जातिगत आधार पर, क्षेत्रगत आधार पर मतदान होने लगा है उससे अधिक से अधिक मतदान का औचित्य समझ नहीं आता है. मतदाता को शक्तिशाली, सत्ता बदलने वाला भले ही बताया जाता हो किन्तु उसके अधिकार, उसकी शक्ति बस उसी समय तक काम करती है जबकि वो मतदान करने के लिए बटन दबाता है. उसके बाद उसके हाथ में न तो अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार होता है और न ही उसके स्थान पर किसी और को सदन में भेजने का. ठगा सा खड़ा रहकर बस वो अगले चुनाव का इंतज़ार करता है. जागरूक होकर मतदाता जब मतदान स्थल पहुँचता है तो उसे वही भ्रष्ट, अपराधी, सुस्त, कामचोर प्रवृत्ति के प्रत्याशी दिखाई देते हैं. ऐसे में उसके जागने का क्या अर्थ निकला? ऐसे में नोटा जैसा विकल्प भी उसके किसी काम का नहीं होता. शातिर प्रत्याशी ऐसे में और आगे निकल जाता है. अब मतदाताओं के जागने की नहीं, मतदाताओं को जागरूक करने की नहीं वरन राजनैतिक दलों को, राजनीतिज्ञों को जागरूक करने की आवश्यकता है. उनको इसके लिए जागरूक करने की जरूरत है कि वे निष्पक्ष छवि के लोगों को, जनप्रिय लोगों को, ईमानदार लोगों को चुनाव मैदान में उतारें. उनको इसके लिए जागरूक करना होगा कि वे दल-बदलुओं को टिकट न दें; इसके लिए भी जागरूक करना होगा कि शराब, धन-बल, बाहू-बल से वोट खरीदना बंद किया जाये; उनको इसके लिए भी जागरूक करना चाहिए कि कम से कम धन-खर्च में इस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को संपन्न कराएँ. क्या कोई रास्ता है अथवा मतदाताओं को जागरूक करने का ढोल पीटा जाता रहेगा; मतदाता जागरूकता अभियान निपटाया जाता रहेगा और जागरूक मतदाता उसी तरह से कई चोरों में एक चोर को, अनेक भ्रष्टों में एक भ्रष्ट को, तमाम अपराधियों में एक अपराधी को चुनता रहेगा. 



01 सितंबर 2016

नहीं बिकेगी कोख

केंद्रीय कैबिनेट ने सेरोगेसी अर्थात किराए की कोख के व्यावसायीकरण रोक सम्बन्धी एक बिल को मंजूरी दे दी है. इस बिल में सेरोगेट मदर और बच्चे के अधिकारों को ध्यान में रखा गया है. साथ ही कानून को ज्यादा सख्त बनाने की कोशिश की गई है. इसके अंतर्गत व्यावसायिक सेरोगेसी को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है. इस कानून के आने के बाद सिर्फ उन दंपत्ति को ही सेरोगेसी की अनुमति मिलेगी जिन्हें वाकई संतान पैदा करने में समस्या है और जिनके विवाह को पाँच वर्ष हो चुके हों. दरअसल भारत सेरोगेसी का एक बहुत बड़ा बाज़ार बनता जा रहा था. सरकार के साथ-साथ अन्य जागरूक संगठनों द्वारा लगातार इसके सम्बन्ध में कड़े कानून बनाये जाने की कवायद की जाती रही है. देखा जाये तो भारत सरोगेसी के लिए सर्वोत्तम प्लेटफ़ॉर्म के रूप में विकसित हुआ है. एक अनुमान के अनुसार प्रजनन विज्ञान की इस सहायक विधि ने सालाना 63 अरब रुपए से अधिक के कारोबार का रूप ग्रहण कर लिया है. इसे विधि आयोग ने स्वर्ण कलश का नाम दिया है. भारत में सरोगेसी सम्बन्धी कानून न होने तथा बच्चा गोद लेने की जटिल प्रक्रिया के कारण यह निःसंतान दम्पत्तियों के लिए बेहतरीन और पसंदीदा विकल्प बन गई है. 


सरोगेसी लैटिन शब्द सबरोगेट से बना है जिसका अर्थ है किसी और को अपने काम के लिए नियुक्त करना. तकनीक रूप से सरोगेसी दो प्रकार, ट्रेडिशनल और जेस्टेटशनल से होती है. ट्रेडिशनल सरोगेसी में संतान सुख के इच्छु्क दंपत्ति में से पिता के शुक्राणुओं को एक स्वस्थ महिला के अंडाणु के साथ प्राकृतिक रूप से निषेचित कर सरोगेट माँ के प्राकृतिक अण्डोत्सर्ग के समय डाला जाता है. इसमें जेनेटिक संबंध सिर्फ पिता से होता है. जेस्टेसशनल सरोगेसी में माता-पिता के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से करवाकर भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्चे्दानी में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है. इसमें बच्चे का जेनेटिक संबंध माता-पिता दोनों से होता है. हाल ही में फिल्म अभिनेता तुषार कपूर द्वारा इस विधि से पिता बनने के बाद सेरोगेसी तकनीक पुनः चर्चा में आई. इससे पूर्व शाहरुख़ खान द्वारा भी ऐसा किये जाने पर सवाल उठाये गए थे, जबकि उनके पहले से अपनी पत्नी से दो बच्चे थे. ये दो उदाहरण मात्र उदाहरण ही नहीं हैं वरन समाज की मानसिकता का परिचायक हैं. वर्तमान में आधुनिक पीढ़ी में कैरियर के प्रति अतिशय सजगता आने से नवयुवतियों में माँ बनने सम्बन्धी लालसा कम हुई है. ऐसे में सेरोगेसी को बढ़ावा मिला है. इसके साथ-साथ लिव-इन-रिलेशन में रह रहे युगल, समलैंगिकों के बीच, एकल पुरुष, महिला के द्वारा भी सेरोगेसी तकनीक के द्वारा बच्चे प्राप्त किये जाने का चलन बढ़ा है.

देश में किसी तरह का कानून न होने के कारण सेरोगेट मदर के लिए अनेक तरह की समस्याएँ पैदा हो रही थी. अक्सर किसी न किसी तरह की बीमारी के कारण अथवा असामान्य रूप में जन्मे शिशु को उसके पिता द्वारा अपनाने से इंकार कर दिया जाता था. धन की लालसा में सेरोगेट बनने वाली महिला के लिए ऐसी स्थिति में बहुत बड़ी समस्या पैदा हो जाती थी. उसके पास कानूनी रास्ता भी नहीं रह जाता था. अब ऐसा किया जाना संभव नहीं. बिल में प्रावधान किया गया है कि सेरोगेसी से उत्पन्न संतान को हरहाल में उसके पिता द्वारा अपनाना ही होगा. कानून के अभाव में पहले ऐसा नहीं था. चूँकि भारत में सरोगेसी पर सख्त कानून नहीं है साथ ही फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, इटली, स्पेन, बुल्गारिया में सरोगेसी पूरी तरह प्रतिबंधित होने तथा अमेरिका, ब्रिटेन समेत कुछ देशों में अत्यंत खर्चीली तकनीक होने के कारण विदेशी दंपत्ति भी सरोगेसी के लिए भारत आते हैं. किसी विदेशी दंपत्ति के लिए सरोगेसी से भारत में पैदा होने वाले बच्चे की नागरिकता पर उठते प्रश्नचिन्ह को देखते हुए आठ यूरोपीय देशों- जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड, चेक रिपब्लिक, इटली, नीदरलैंड्स, बेल्जियम और स्पेन ने भारत सरकार को पत्र लिख कर अनुरोध किया था कि यदि उनके देश का कोई दंपत्ति भारत में सरोगेसी से बच्चा पैदा करता है तो उन्हें संबंधित देश के दूतावास से इसकी अनुमति लेने के लिए कहा जाए. इसको ध्यान में रखते हुए पूर्व में प्रावधान किया गया था कि अनिवासी भारतीयों सहित विदेशी नागरिक जो सरोगेसी की चाह में भारत आएंगे, उन्हें प्रस्तावित कानून के अंतर्गत इस आशय का प्रमाणपत्र देना होगा कि उनके देश में सरोगेसी को कानूनी मान्यता प्राप्त है और जन्म के बाद शिशु को उनके देश की नागरिकता दी जाएगी. हाल ही में कैबिनेट से पारित बिल में विदेशियों को सेरोगेसी के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया है. अब किसी भी रूप में उनको देश में सेरोगेसी की सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई जा सकेगी.

कैबिनेट से पास बिल में इस तरह के प्रावधान किये गए हैं जो सेरोगेट मदर को और जन्मे शिशु को संरक्षण देते हैं. बिल में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अगर किसी के पास एक बच्चा है अथवा किसी ने एक बच्चा गोद ले रखा है तो उन्हें सेरोगेसी की अनुमति नहीं होगी. मूलरूप से प्रजनन विज्ञान की सहायक तकनीक के रूप में विकसित सरोगेसी के द्वारा ऐसे दम्पत्तियों को संतानसुख प्रदान किया जाता है जो कतिपय कारणोंवश संतान पैदा नहीं कर पा रहे हैं. उन्हें किसी अन्य महिला को गर्भस्थ करने और गर्भावस्था के दौरान होने वाले खर्च सहित, उसकी फीस चुकानी होती है. इसी को किराये की कोख या सेरोगेट मदर का नाम दिया गया है. इस तकनीक का उपयोग एक तरफ तो निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए कर रहे हैं साथ ही वे धनवान महिलाएँ भी कर रही हैं जो प्रसूति के दौरान होने वाली तकलीफों से बचना चाहती हैं. ऐसी स्थिति से बचने के लिए बिल में प्रावधान किया गया है कि लिव-इन-रिलेशन में रहने वालों को, समलैंगिकों को, एकल पुरुष-महिला को सेरोगेसी का लाभ नहीं मिलेगा.


नियम-कानून का पूरी तरह कड़ाई से पालन हो सके इसके लिए भी बिल में व्यवस्था की गई है. अब सेरोगेसी क्लीनिक वालों को सेरोगेसी से पैदा बच्चे का रिकॉर्ड 25 वर्ष तक रखना अनिवार्य किया गया है. ऐसा न किये जाने पर दस वर्ष की सजा का प्रावधान है. फ़िलहाल कानून बन चुका है, अब देखना है कि कितनी कड़ाई से, सख्ती से इसका पालन करवाया जाता है, किया जाता है. यदि ये कानून वाकई कारगर ढंग से काम कर सका तो किसी गरीब महिला की मजबूरी का फायदा धनिकों द्वारा, मौज-मस्ती करने वालों द्वारा नहीं उठाया जा सकेगा. 

12 जून 2016

अभियान के नाम पर देह से खिलवाड़

विगत कुछ समय से स्त्री-सम्बन्धी मुद्दों पर या फिर स्त्री-केन्द्रित विषयों पर ज्यादा ही चर्चा देखने को मिल रही है. इस चर्चा में, विमर्श में स्त्री की आज़ादी की बात की जा रही है. उसके स्वतंत्र विचारों की बात हो रही है. उसके अस्तित्व पर बहस हो रही है. सोचकर, सुनकर अच्छा लगता है कि समाज में स्त्री, पुरुष दोनों ही स्त्री-विकास की, स्त्री-सशक्तिकरण की बात करने में लगे हैं. इस अच्छे-भले सुनने, महसूस करने के बीच यदि स्त्री-स्वतंत्रता, स्त्री-सशक्तिकरण के लिए उठाये गए मुद्दों पर दृष्टिपात करने पर कहानी कुछ और ही समझ आती है. स्त्री की आज़ादी की आवाज़ उठाने वाले विषयों में हैप्पी टू ब्लीड, फ्री सेक्स, मैरिटल रेप, उन्मुक्त शारीरिक सम्बन्ध, माहवारी पर चुप्पी तोड़ो, मंदिर प्रवेश आदि-आदि दिखाई देते हैं. कहीं, किसी तरफ से स्त्रियों के स्वावलंबन की बात नहीं होती है. किसी तरफ से स्त्रियों की आर्थिक आज़ादी की चर्चा नहीं होती है. कोई भी स्त्रियों के वास्तविक अधिकारों की बात करता नहीं दिखता है. ऐसा लगता है जैसे स्त्री की समूची दुनिया को देह के इर्द-गिर्द, सेक्स के आसपास, धर्म के चारों तरफ ही केन्द्रित कर दिया गया है. समाज में एक तरफ स्त्री-सशक्तिकरण की वकालत करने वाले, स्त्रियों के अधिकारों की चर्चा करने वाले, स्त्री-अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाले समाज पर ही आरोप लगाते हैं कि स्त्रियों को सदैव सेक्स और धर्म के नाम पर कैद किया जाता रहा; उसके अस्तित्व को छोटा करके दिखाया जाता रहा; महिलाओं की सोच को कुंठित करके रखा गया और इसके ठीक उलट उन्हीं के द्वारा स्त्री-आज़ादी के लिए धर्म और सेक्स को ही मुख्य बिन्दु बनाया जाता है.

समझने वाली बात है कि क्या सेक्स की आज़ादी से, देह की आज़ादी से, माहवारी की चुप्पी तोड़ने से स्त्री को वाकई आज़ादी मिल जाएगी? कहीं ये स्त्री-सशक्तिकरण का झंडा उठाये वर्ग द्वारा एक तरह का षड्यंत्र तो नहीं जो स्त्री को सेक्स और धर्म की चाशनी में लपेटकर उसी में बंधक बना देना चाहता है? हैप्पी टू ब्लीड से लेकर माहवारी पर चुप्पी तोड़ो पर इस तरह से होहल्ला मचाया गया जैसे कि स्त्री की आज़ादी की राह में यही सबसे बड़ा रोड़ा है. प्रतिमाह आने वाली इस शारीरिक प्रक्रिया के बारे में इस तरह से दुष्प्रचार किया जा रहा मानो इन पाँच दिनों में स्त्री को सिर्फ पुरुष ही बंधक बना लेता हो; सिर्फ पुरुष ही उसकी आवाज़ को खामोश कर देता हो. प्राकृतिक शारीरिक संरचना में अनिवार्यता के चलते उत्पन्न कतिपय दैहिक क्रियाविधि को घर-परिवार की महिलाओं द्वारा ही सबसे ज्यादा निशाने पर लिया जाता है. मंदिर में प्रवेश न करना, पूजादि धार्मिक कृत्य न करना, रसोई में घुसने, खाद्य-पदार्थ छूने की मनाही आदि-आदि सहित अनेक कार्यों से महिलाओं को महिलाओं द्वारा ही वंचित किया जाता है. स्त्री की देह को जिस तरह से प्रश्नवाचक चिन्ह लगा कर देखा जाता है, जिस तरह से उसकी शारीरिक सञ्चालन की प्राकृतिक गतिविधि को केन्द्रित करके स्त्री को लक्ष्य किया जाता है, उस सोच पर, उस गतिविधि पर नियंत्रण लगाये जाने की आवश्यकता है.


वर्तमान में जिस तरह का परिवेश समाज में बनता जा रहा है उसमें सेक्स को, स्त्री-देह को प्रमुखता दी जाने लगी है. किसी भी उत्पाद का विज्ञापन हो, किसी भी तरह का म्यूजिकल कार्यक्रम हो, कोई भी एलबम हो, क्रिकेट का मैदान हो सभी जगह किसी न किसी रूप में स्त्री-देह को सजा-संवार कर पेश किया जाता है. यदि इस तथ्य को ध्यान में रखा जाये तो कहीं ऐसा तो नहीं कि स्त्री से सम्बंधित इस तरह के संचालित अभियानों का कथित उद्देश्य उनकी देह को ही विमर्श के केंद्र में रखना हो? स्त्री देह से सम्बंधित विभिन्न समस्याओं का समाधान संभव हो कि सार्वजनिक सहभागिता से निकले किन्तु इस तरह के सार्वजनिक अभियानों से कतई नहीं निकलने वाला. ये अभियान विवाद पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे हैं. सोचिये एक मिनट रुक कर कि हैप्पी टू ब्लीड से किस तरह का सन्देश दिया गया? फ्री सेक्स के द्वारा किस तरह से संबंधों की वकालत की जा रही है? मैरिटल रेप जैसी अवधारणा से क्या दाम्पत्य जीवन सुखमय बनेगा? माहवारी पर चुप्पी किससे तोड़नी होगी और कैसे? बेहतर हो कि ऐसे विषयों पर सकारात्मक चर्चा हो न कि प्रचार की तरह इन्हें इस्तेमाल किया जाये. माहवारी जैसे विषयों को, सेक्स जैसे विषयों को समाज की गति को देखते हुए, उसके परिवेश को देखते हुए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये. अपनी देह के गोपन को जानना-समझना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है किन्तु ये किसी का अधिकार नहीं कि वो स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे की देह से खेलने का कार्य करे. 

26 अप्रैल 2016

भयावह जल-संकट की स्थिति में बुन्देलखण्ड

पानी के लिए लगभग समूचे देश में हाहाकार मचा हुआ है. इस हाहाकार में सर्वाधिक बुरी स्थिति में बुन्देलखण्ड क्षेत्र दिखाई दे रहा है. अब तो नित्य ही खबरें सामने आ रही हैं जिनसे ज्ञात हो रहा है कि कई-कई इलाकों में तो दसियों दिन से पानी की एक बूँद के दर्शन भी नहीं हुए हैं. कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ भूगर्भीय जल स्तर पिछले वर्षों के मुकाबले और नीचे चला गया है. ये जानते-समझते हुए कि पानी न केवल मनुष्य के जीवन हेतु वरन जीव-जंतुओं के लिए भी अनिवार्य तत्त्व है, जल संरक्षण के उपाय गंभीरता से किये ही नहीं जा रहे हैं. बुन्देलखण्ड के सन्दर्भ में देखें तो यहाँ के भू माफियाओं ने, खनन माफियाओं ने विगत कई वर्षों से हरे-भरे बुन्देलखण्ड को उजाड़ने का कुचक्र रचाया हुआ है. कुछ गंभीर अध्येताओं के अध्ययन रिपोर्टों को आधार बनायें तो वर्तमान में बुन्देलखण्ड में कुल क्षेत्रफल का दस प्रतिशत से कम जंगल बचे हुए हैं. किसी समय में इस वन-सम्पदा का क्षेत्रफल चालीस प्रतिशत के आसपास ठहरता था. इन जंगलों के समाप्त होने के मूल में यहाँ के पर्वतों का लगातार मिटते जाना भी है. पत्थरों के द्वारा आर्थिक लाभ लेने के स्वार्थ ने यहाँ के माफियाओं ने पहाड़ों को, जंगलों को पूरी तरह से मिटा दिया है. एक बहुत बड़े इलाके में दिन-रात चलती क्रेशर मशीनों के कारण किलोमीटरों तक धूल के बादल बने दिखाई देते हैं. इस धूल ने रहे-सहे वृक्षों पर, पेड़-पौधों पर, उपजाऊ जमीन पर अपना कब्ज़ा कर रखा है. हरियाली के स्थान पर सफ़ेद चादर सी लगातार गहराती जा रही है. 

बुन्देलखण्ड में जल-संकट का हाल तब है जबकि यहाँ नदियों, जलाशयों, कुँओं आदि की पर्याप्त उपलब्धता है. यमुना, बेतवा, नर्मदा, काली, सिंध, धसान, केन आदि नदियों; कीरत सागर, मदन सागर, सेमरताल आदि के साथ-साथ बुन्देलखण्ड का कश्मीर कहा जाने वाला चरखारी है, जो अपनी झीलों के कारण प्रसिद्द है. इसके अलावा पातालतोड़ कुँओं की उपलब्धता भी यहाँ है. असीमित भूगर्भीय जलस्त्रोत धुरहट जैसे स्थान बुन्देलखण्ड में हैं. इसके बाद भी यहाँ जल संकट का होना यहाँ के निवासियों के जागरूक न होने, संवेदनशील न होने का ही परिचायक है. भू एवं खनन माफिया तो लगातार यहाँ की वन सम्पदा का, पर्वत श्रेणियों का नाश करके जल-संकट पैदा कर ही रहे हैं, ज्यादा से ज्यादा आर्थिक लाभ लेने के लालच में बड़े-बड़े किसानों द्वारा भी भूगर्भीय जल स्त्रोतों का जबरदस्त ढंग से विदोहन किया जा रहा है. इसने भी जल स्तर को लगातार कम करके भी जल-संकट पैदा किया है. एक अनुमान के अनुसार बुन्देलखण्ड में औसत बारिश 95 सेंटीमीटर होती है. इसके चलते कृषि योग्य जलसंकट लगभग बना ही रहता है. ऐसे में यहाँ उन्हीं कृषि फसलों को वरीयता दी जाती रही है जिनमें सिंचाई के लिए कम से कम पानी की आवश्यकता हो. इधर कुछ वर्षों से आर्थिक लाभ के चलते ऐसी फसलों का चयन भी किसानों द्वारा किया जाने लगा जिनमें अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है. इस कारण से नलकूपों के माध्यम से भू-गर्भीय जल स्त्रोतों से पानी खींचकर उन्हें सुखाया जाने लगा. एक अनुमान के मुताबिक बुन्देलखण्ड में प्रतिवर्ष भूजल स्तर में दो से चार मीटर तक की गिरावट आ रही है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि हालात कितने भयावह होते जा रहे हैं.


अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल कर, अव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता है, शेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबों, जलाशयों, कुँओं आदि को गन्दगी से, कूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव हो, नए-नए तालाबों, कुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर पर, सीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैं, उपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगे? भविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.
 

(चित्र चित्रकूट जिले में विशेष बुन्देलखण्ड पैकेज से निर्मित रसिन बाँध है. इसे प्रवासनामा से लिया गया है.)