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30 अगस्त 2017

दद्दा का खेल और राष्ट्रीय खेल दिवस

आज पूरा देश राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा है. आज का दिन हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद जी के जन्मदिन पर उनके सम्मान में मनाया जाता है. उनका जन्म 29 अगस्त सन्‌ 1905 ई. को इलाहाबाद में हुआ था. उनको हॉकी का खेल विरासत में नहीं मिला था बल्कि अपनी सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे उन्होंने यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी. आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे महज 16 वर्ष की अवस्था में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भरती हो गए. उनको हॉकी के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है, जिनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और एक दिन दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए. हॉकी में उत्कृष्ट खेल के कारण सेना में उनकी पदोन्नति होती गई. सिपाही से भर्ती होने वाले ध्यानचंद लांस नायक, नायक, सूबेदार, लेफ्टिनेंट, सूबेदार बनते हुए अंत में मेजर बने. यहाँ एक रोचक बात ये है कि उनका मूल नाम ध्यानसिंह था किन्तु उनके रात में चाँद की रौशनी में हॉकी का अभ्यास करने के कारण उनके मित्र उनको चाँद उपनाम से पुकारने लगे. यहीं से उनका नाम ध्यानचंद पड़ गया. इसके साथ-साथ लोग प्यार से उनको दद्दा कहकर भी बुलाते थे.


उनका हॉकी स्टिक और गेंद पर इस कदर नियंत्रण था कि अकसर प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं. हॉलैंड में तो चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी भी गई थी. हॉकी खेलने की उनकी कलाकारी से मोहित होकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश भी की थी किन्तु ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही अपना गौरव समझा. मेजर ध्यानचंद ने अंतर्राष्ट्रीय मैचों सहित अन्य मैचों को मिलाकर 1000 से अधिक गोल किए. उनकी बेहतरीन हॉकी कला के कारण भारतीय टीम ने तीन ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीते. सन 1928 में एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय टीम ने भाग लिया. यहाँ भारतीय टीम सभी मुकाबले जीत हॉकी की चैंपियन बनी. सन 1932 में लास एंजिल्स में हुई ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में ध्यानचंद ने 262 में से 101 गोल किए. निर्णायक मैच में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हरा कर स्वर्ण जीता. इसके बाद सन 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में मेजर ध्यानचंद भारतीय टीम के कप्तान बने. फाइनल में भारतीय टीम ने जर्मन टीम को 8-1 से हरा कर स्वर्ण जीता. द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद उन्होंने अप्रैल 1949 ई. को हॉकी से संन्यास ले लिया था. इसके बाद उन्होंने नवयुवकों को गुरु-मंत्र सिखाने शुरू कर दिए और लम्बे समय तक राष्ट्रीय खेलकूद संस्थान (पटियाला) में भारतीय टीमों को प्रशिक्षित करते रहे.



हॉकी के जादूगर और सबके लोकप्रिय दद्दा को सन 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. सन 1980 में मरणोपरांत उनके सम्मान में भारत सरकार ने डाक टिकट का प्रकाशन करवाया. 3 दिसंबर 1979 को दिल्ली में उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार झाँसी में किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया जहाँ वो हॉकी खेला करते थे. 

24 अगस्त 2008

खेलों के सहारे ताकत दिखाई

बीजिंग ओलम्पिक का आज समापन उसी भव्यता से हुआ जिस तरह से उसका आगाज़ हुआ था. चीन ने अपने आयोजन से सारे विश्व के सामने अपनी हनक को स्पष्ट कर दिया है. चीन अपनी नीतियों, अपने कार्यों के लिए हमेशा विवादों के, संदेह के घेरे में बना रहता था. इस आयोजन के पहले भी कई सारे देश इस ताक में थे कि कैसे भी कुछ कमी इस आयोजन में दिखे और वे चीन को नीचा दिखाने में कोई कसर बाक़ी न रखें. चीन ने अपने उदघाटन समारोह में जिस तरह से अपनी तकनीक, अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया वो वाकई कमाल का था तथा हैरत में डालने वाला था.

देखा जाए तो चीन ने हमेशा बंद अर्थव्यवस्था (Closed Economy) को अपने देश में बनाये रखा है और बिना महाशक्तियों के सहारे उन्नति की. जब उसने अपने बाज़ार को खोला तो फ़िर समूचे विश्व के बाज़ारों को अपने सामान से भर दिया. बहरहाल बात करें ओलम्पिक की तो लग रहा था कि चीन सफलता की कहानी लिख नहीं पायेगा. उदघाटन में एक बारगी तो विश्वास ही नहीं हुआ कि ये चीन की ताकत है. एक एक कार्यक्रम लोगों के भ्रम को तोड़ रहा था. तमाम महाशक्तियों के महानायक स्टेडियम में बैठे-बैठे सिर्फ़ तमाशा देख कर अपनी ताकत का अनुमान लगा रहे थे.

चीन की ताकत से कोई देश घबराए या नहीं, कोई संभले या नहीं पर हमारे देश को कुछ सीखने, कुछ संभलने की जरूरत है। जिस तरह चीन का अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप हमारी सीमाओं में होता रहता है वो अब नजरंदाज करने वाला नहीं है. हमने कितने भी परमाणु बना लिए हों, कितने भी हथियार जमा कर लिए हों पर जिस तरह से चीन ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है वो दिखाता है कि चीन की तकनीक कितनी उन्नत है. चीन ने ने खेलोंके माध्यम से समूचे विश्व को एक संकेत दिया है जिससे भारत को सतर्क रहने की जरूरत है.

इसे केवल खेल न समझा जाए एक प्रकार की कूटनीति ही मन जाए. इसे केवल भ्रम न समझा जाए, कुछ वास्तविकता भी इसमें देखी-समझी जाए.

24 जुलाई 2008

ओलम्पिक का सफर

ओलम्पिक के सफर में इस बार ओलम्पिक का सफर-3 । ओलम्पिक की विगत की यात्रा हमें गुदगुदाती है, हंसाती है, रुलाती भी है. इसी यात्रा का मजा लें.