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22 मार्च 2025

कामुकता, नग्नता का बाज़ार न बन जाये ये समाज

अवैध संबंधों में बाधक बनती पत्नी की हत्या कर लाश को ब्रीफकेस में भरा, प्रेमी के साथ मिलकर पत्नी ने पति की हत्या कर लाश के टुकड़े-टुकड़े करके ड्रम में छिपाया, रील बनाने से मना करने पर माँ ने बेटे की हत्या कर दी, आपत्तिजनक स्थिति में देख लेने पर बेटे ने माँ-बाप को मौत के घाट उतारा जैसी अनेक खबरों से नित्य ही हम सबका सामना होता है. ये दो-चार पंक्तियाँ बानगी हैं आज के समाज की जहाँ ऐसा लग रहा है कि न तो रिश्तों का कोई महत्त्व रह गया है और न ही मर्यादा का कोई स्थान बचा है. बहुसंख्यक लोगों की आँखों से शर्म-लिहाज पूरी तरह से समाप्त हो गई है. ऐसे लोगों द्वारा सगे रक्त-सम्बन्धियों के साथ, अपने परिजनों के साथ दुराचार करने, उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने का अपराध सहज रूप में किया जाने लगा है. ऐसा महसूस होने लगा है जैसे लोगों के लिए शारीरिकता का, यौन संबंधों का ही महत्त्व रह गया है. उनके लिए जीवन की पूर्णता यौन संतुष्टि प्राप्त करने में ही है. 


समाज का बौद्धिक वर्ग आये दिन ऐसी घटनाओं पर मंचों के माध्यम से, सोशल मीडिया के द्वारा चर्चा कर लेता है किन्तु इसके मूल में जाने का, उसके समाधान का प्रयास नहीं करता है. गौर करिए इक्कीसवीं सदी के आरम्भ होने के कुछ वर्ष पूर्व से ही, जबकि आधुनिकता, वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण शब्द सामाजिक आसमान पर तैरने में लगे थे. कालांतर में विकास के नाम पर चली आई तकनीकी क्रांति ने, मोबाइल क्रांति ने समूचे सामाजिक ढाँचे को हिला कर रख दिया. स्त्री-पुरुष संबंधों, पति-पत्नी के आंतरिक संबंधों की गोपनीयता एकदम से फटकर परदे से बाहर आ गई. आधुनिकता के नाम पर, पश्चिमीकरण के नाम पर, वैश्वीकरण के नाम पर नग्नता को, अश्लीलता को, यौन-संबंध को, दैहिक आकर्षण को प्रमुखता दी जाने लगी. किसी समय पारिवारिक नियोजन के लिए अपनाए गए निरोध का परिवर्तनीय उपयोग अवैध संबंधों में अनचाहे गर्भ से बचने के लिए, एचआईवी से सुरक्षित रहने के लिए होने लगा. उस सुरक्षित समझे जाने वाले उपाय के शालीन, शर्म भरे विज्ञापन उन्मुक्त, कामपिपासु मानसिकता का प्रदर्शन करते दिखने लगे.




दैहिक उन्मुक्तता का, वैचारिक फूहड़ता का, कामुकता का चित्रण इसी एक कदम के रूप में सामने नहीं आया बल्कि बहुसंख्यक विज्ञापनों में नजर आने लगा. उत्पाद स्त्रियों का हो या फिर पुरुषों का, वृद्धजनों का हो या फिर बच्चों का, घरेलू सामान हो या फिर पूजा की सामग्री, वस्त्र हों या फिर अधोवस्त्र, शैक्षिक सामग्री हो या फिर सौन्दर्य प्रसाधन सभी के किसी न किसी रूप में स्त्रियों की कामुक, अर्धनग्न छवि को उकेरा जाने लगा. इनके अलावा लाइव शो हों, कॉमेडी शो हो, संगीत का कार्यक्रम हो, बच्चों की नृत्य प्रस्तुति हो ये सब भी द्विअर्थी संवाधों, फूहड़ भाव-भंगिमा का प्रदर्शन करने लगे. ऐसा लगने लगा कि बिना सेक्स के, बिना यौनेच्छा के व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है. इस मानसिकता को और अधिक विकृत बनाने के लिए स्मार्टफोन, इंटरनेट का साथ मिल गया. अब हर हाथ में समूची दुनिया घूम रही थी. बच्चे उम्र के बहुत पहले ही स्त्री-पुरुष देह के अगोपन को गोपन कर रहे थे. बंद कमरे से भीतर पति-पत्नी के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त संबंधों की दैहिक क्रिया को शिक्षण संस्थानों, पार्कों, खेतों आदि के सुनसान में क्रियान्वित किया जाने लगा. इस उच्छृंखल, अशालीन, अमर्यादित जीवन-शैली ने न केवल विवाह संस्था को कमजोर किया बल्कि समूची सामाजिक, पारिवारिक संरचना को ही ध्वस्त सा कर दिया.


परिवार में आपस में ही अविश्वास का माहौल दिखाई देने लगा. आपसी संबंधों में भी संदेह नजर आने लगा. रिश्तों की मर्यादा को तिलांजलि सी दे दी गई. संस्कारों का कहीं अंतिम संस्कार सा कर दिया गया. बहुतेरी सामाजिक गतिविधियाँ देह के इर्द-गिर्द ही घूमने लगीं. वैवाहिक समारोह में संगीत समारोह के नाम पर नग्नता, फूहड़ता ठुमके लगाने लगी तो खेलों में चियर्स लीडर के नाम पर दैहिक प्रदर्शन को थिरकने का अवसर दिया जाने लगा. सोचने वाली बात है कि समाज में देह, यौन सम्बन्ध को केन्द्र-बिन्दु कब, कैसे और क्यों बनाया जाने लगा? क्यों प्रतिभा को शारीरिक आकर्षण के पीछे धकेल दिया गया? क्यों अवैध शारीरिक संबंधों ने मर्यादित रिश्तों को निगल लिया? क्यों देह के आकर्षण ने संस्कारों की बुनियाद को खोखला कर दिया? सेल्युलाइड परदे के विकल्प के रूप में हर हाथ में सिमटी छोटी सी स्क्रीन में चमकते ओटीटी चैनल्स, सोशल मीडिया की रील्स आदि में थिरकती, चमकती, लहराती कामुक नग्न/अर्धनग्न देह पर सामाजिक चिंतन, विमर्श के द्वारा कोई ठोस कदम उठाना होगा. ऐसा न कर पाने की स्थिति में यह समाज संवेदनहीनता, फूहड़ता, कामुकता, नग्नता, अशालीनता का बाज़ार बना नजर आयेगा. 


05 मार्च 2018

सार्वजनिक स्तनपान : मातृत्व या विज्ञापन


ऐसा माना जाता रहा है कि पढ़-लिख कर व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. वह तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. ऐसे बहुत से उदाहरण देखने में आये हैं जबकि ऐसा हुआ भी है. शिक्षित व्यक्तियों ने अपने ज्ञान के आधार पर तर्कों पर तमाम निष्कर्षों को कसा है. इधर तकनीकी विकास के साथ साक्षर होती पीढ़ी ने, तकनीकी का सहारा लेकर कुछ कर-गुजरने वाली मानसिकता ने शिक्षित होने, साक्षर होने के बाद तर्क-वितर्क को कुतर्क के रास्ते पर उतार दिया है. इस तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं.

विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान के द्वारा वह न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रेक होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

ऑस्ट्रेलियाई संसद की कार्यवाही के दौरान अपनी बेटी को स्तनपान कराकर इतिहास रचने वाली सीनेटर लैरिसा वा‌र्ट्स
असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. इन्हें न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. बाजार के लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?

05 फ़रवरी 2018

देह और यौन सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ती चर्चाएँ

जिस तेज़ी से समाज बदल रहा है, उतनी तेज़ी से समाज में चर्चाओं के विषय में भी परिवर्तन हो रहा है. ये बदलाव किसी तरह की सामाजिकता के चलते आता हुआ नहीं है बल्कि इसके पीछे भी एक तरह का सेक्सुअल कारक काम कर रहा है. सामान्य रूप से देखा जाए तो ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक समाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती  जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है? 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है.