अवैध संबंधों में
बाधक बनती पत्नी की हत्या कर लाश को ब्रीफकेस में भरा, प्रेमी के साथ मिलकर पत्नी ने पति
की हत्या कर लाश के टुकड़े-टुकड़े करके ड्रम में छिपाया, रील
बनाने से मना करने पर माँ ने बेटे की हत्या कर दी, आपत्तिजनक
स्थिति में देख लेने पर बेटे ने माँ-बाप को मौत के घाट उतारा जैसी अनेक खबरों से
नित्य ही हम सबका सामना होता है. ये दो-चार पंक्तियाँ बानगी हैं आज के समाज की
जहाँ ऐसा लग रहा है कि न तो रिश्तों का कोई महत्त्व रह गया है और न ही मर्यादा का
कोई स्थान बचा है. बहुसंख्यक लोगों की आँखों से शर्म-लिहाज पूरी तरह से समाप्त हो
गई है. ऐसे लोगों द्वारा सगे रक्त-सम्बन्धियों के साथ, अपने
परिजनों के साथ दुराचार करने, उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध
बनाये जाने का अपराध सहज रूप में किया जाने लगा है. ऐसा महसूस होने लगा है जैसे
लोगों के लिए शारीरिकता का, यौन संबंधों का ही महत्त्व रह
गया है. उनके लिए जीवन की पूर्णता यौन संतुष्टि प्राप्त करने में ही है.
समाज का बौद्धिक
वर्ग आये दिन ऐसी घटनाओं पर मंचों के माध्यम से, सोशल मीडिया के द्वारा चर्चा कर लेता है किन्तु इसके मूल में
जाने का, उसके समाधान का प्रयास नहीं करता है. गौर करिए
इक्कीसवीं सदी के आरम्भ होने के कुछ वर्ष पूर्व से ही, जबकि
आधुनिकता, वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण शब्द
सामाजिक आसमान पर तैरने में लगे थे. कालांतर में विकास के नाम पर चली आई तकनीकी
क्रांति ने, मोबाइल क्रांति ने समूचे सामाजिक ढाँचे को हिला
कर रख दिया. स्त्री-पुरुष संबंधों, पति-पत्नी के आंतरिक
संबंधों की गोपनीयता एकदम से फटकर परदे से बाहर आ गई. आधुनिकता के नाम पर, पश्चिमीकरण के नाम पर, वैश्वीकरण के नाम पर नग्नता
को, अश्लीलता को, यौन-संबंध को, दैहिक आकर्षण को प्रमुखता दी जाने लगी. किसी समय पारिवारिक नियोजन के लिए
अपनाए गए निरोध का परिवर्तनीय उपयोग अवैध संबंधों में अनचाहे गर्भ से बचने के लिए, एचआईवी से सुरक्षित रहने के लिए होने लगा. उस सुरक्षित समझे जाने वाले
उपाय के शालीन, शर्म भरे विज्ञापन उन्मुक्त, कामपिपासु मानसिकता का प्रदर्शन करते दिखने लगे.
दैहिक उन्मुक्तता
का, वैचारिक फूहड़ता का, कामुकता का चित्रण इसी एक कदम के रूप में सामने नहीं आया बल्कि बहुसंख्यक
विज्ञापनों में नजर आने लगा. उत्पाद स्त्रियों का हो या फिर पुरुषों का, वृद्धजनों का हो या फिर बच्चों का, घरेलू सामान हो
या फिर पूजा की सामग्री, वस्त्र हों या फिर अधोवस्त्र, शैक्षिक सामग्री हो या फिर सौन्दर्य प्रसाधन सभी के किसी न किसी रूप में
स्त्रियों की कामुक, अर्धनग्न छवि को उकेरा जाने लगा. इनके
अलावा लाइव शो हों, कॉमेडी शो हो,
संगीत का कार्यक्रम हो, बच्चों की नृत्य प्रस्तुति हो ये सब
भी द्विअर्थी संवाधों, फूहड़ भाव-भंगिमा का प्रदर्शन करने
लगे. ऐसा लगने लगा कि बिना सेक्स के, बिना यौनेच्छा के
व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है. इस मानसिकता को और अधिक विकृत बनाने के लिए
स्मार्टफोन, इंटरनेट का साथ मिल गया. अब हर हाथ में समूची दुनिया घूम रही थी.
बच्चे उम्र के बहुत पहले ही स्त्री-पुरुष देह के अगोपन को गोपन कर रहे थे. बंद
कमरे से भीतर पति-पत्नी के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त संबंधों की दैहिक
क्रिया को शिक्षण संस्थानों, पार्कों, खेतों आदि के सुनसान
में क्रियान्वित किया जाने लगा. इस उच्छृंखल, अशालीन,
अमर्यादित जीवन-शैली ने न केवल विवाह संस्था को कमजोर किया बल्कि समूची सामाजिक, पारिवारिक संरचना को ही ध्वस्त सा कर दिया.
परिवार में आपस
में ही अविश्वास का माहौल दिखाई देने लगा. आपसी संबंधों में भी संदेह नजर आने लगा.
रिश्तों की मर्यादा को तिलांजलि सी दे दी गई. संस्कारों का कहीं अंतिम संस्कार सा
कर दिया गया. बहुतेरी सामाजिक गतिविधियाँ देह के इर्द-गिर्द ही घूमने लगीं.
वैवाहिक समारोह में संगीत समारोह के नाम पर नग्नता, फूहड़ता ठुमके लगाने लगी तो खेलों में चियर्स लीडर के नाम पर
दैहिक प्रदर्शन को थिरकने का अवसर दिया जाने लगा. सोचने वाली बात है कि समाज में
देह, यौन सम्बन्ध को केन्द्र-बिन्दु कब, कैसे और क्यों बनाया
जाने लगा? क्यों प्रतिभा को शारीरिक आकर्षण के पीछे धकेल
दिया गया? क्यों अवैध शारीरिक संबंधों ने मर्यादित रिश्तों
को निगल लिया? क्यों देह के आकर्षण ने संस्कारों की बुनियाद
को खोखला कर दिया? सेल्युलाइड परदे के विकल्प के रूप में हर
हाथ में सिमटी छोटी सी स्क्रीन में चमकते ओटीटी चैनल्स, सोशल मीडिया की रील्स आदि
में थिरकती, चमकती, लहराती कामुक
नग्न/अर्धनग्न देह पर सामाजिक चिंतन, विमर्श के द्वारा कोई
ठोस कदम उठाना होगा. ऐसा न कर पाने की स्थिति में यह समाज संवेदनहीनता, फूहड़ता, कामुकता, नग्नता,
अशालीनता का बाज़ार बना नजर आयेगा.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें