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19 जून 2026

क्या बेरोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी न मिलना है?

क्या बेरोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी न मिलना है?

किसी और के बजाय यदि अपनी ही बात करें.... तो कृपया बताया जाये कि हम कब बेरोजगार रहे, कब हमें रोजगार वाला माना जायेगा?

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==>> 1995 में एम.ए. करते ही डी.वी.कॉलेज में अंशकालिक प्रवक्ता के रूप में अर्थशास्त्र विषय में अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया था.

==>> इसके पश्चात् 2002 तक डी.वी.कॉलेज में ही हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य अंशकालिक प्रवक्ता के रूप में किया.

==>> दिसम्बर 2005 से लेकर मार्च 2019 तक गांधी महाविद्यालय में हिन्दी विषय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहे.

==>> मार्च 2019 से अभी तक गांधी महाविद्यालय में ही हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में स्थायी नियुक्ति मिलने के पश्चात् कार्यरत हैं.

==>> 1995 से लेकर अभी तक की समयावधि में बीच में कुछ समय ऐसा भी आया जबकि किसी तरह की नौकरी नहीं की बल्कि लेखन से, कुछ फुटकर कार्यों से, स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए किये कार्यों से आमदनी होती रही.


18 जनवरी 2026

भेदभाव उन्मूलन में दूसरे संग भेदभाव न हो

उच्च शिक्षा के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय की भावना के प्रति सकारात्मकता पैदा करने का कार्य करने के साथ-साथ इंसानों में संवेदनशीलता, मानवीयता गुणों का विकास किया जाता है. इसी उद्देश्य को लेकर ही देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की स्थापना की गई थी. अपनी स्थापना से लेकर अद्यतन यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों लोकतांत्रिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक आधारशिला निर्मित करने का प्रयास किया जाता रहा है. आयोग द्वारा इसी 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समता के संवर्द्धन हेतु विनिमय 2026 को अधिसूचित कर दिया गया. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया.

 



इस अधिनियम के लक्ष्य में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना. यदि इस उद्देश्य पर विचार किया जाये तो यह किसी एक वर्ग के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति नहीं दिखाता है. इसके बाद भी इसे सामान्य वर्ग के विरुद्ध बताया जा रहा है, जिसके चलते देशभर में यह बिल चर्चा के केन्द्र में है. चर्चा के दौरान जो बात उभर कर सामने आई है वो दर्शाती है कि अधिनियम में जिस तरह के प्रावधान किये गए हैं उसके अनुसार इस विचार को मजबूती मिलती है कि सामान्य वर्ग के लोग भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते बल्कि वे सिर्फ भेदभाव ही कर सकते हैं. इस सोच के पीछे वे तमाम अधिनियम हैं जिनका दुरूपयोग करके सामान्य वर्ग को परेशान किया जाता रहा है.

 



यह पूर्णतः सत्य है कि किसी भी समाज में, संस्था में किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान नहीं होना चाहिए और इससे भी किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि समाज से भेदभाव कम करने के प्रयास ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए. इस सन्दर्भ में आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को भी समझना आवश्यक हो जाता है. अधिनियम के बिन्दु 3 के अन्तर्गत विभिन्न सन्दर्भों को परिभाषित किया गया है, जिसमें 3ख में पीड़ित का सन्दर्भ ऐसे व्यक्ति से लगाया गया है जिसके पास इन विनियमों के अंतर्गत शिकायतों से सम्बंधित या जुड़े मामलों में कोई शिकायत है. इसमें भी जातिगत उल्लेख नहीं है अर्थात पीड़ित व्यक्ति किसी भी वर्ग का हो सकता है. इसके अतिरिक्त 3थ में हितधारक का अर्थ स्पष्ट किया गया है कि इसमें छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है. एक बिन्दु 3ग अवश्य ऐसा है जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करता है. इस सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी. आरोपी विद्यार्थी पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में पहले उसे चेतावनी दी जाएगी, इसके पश्चात् जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गम्भीर मामलों में विद्यार्थी को शिक्षण संस्थान से निष्कासित भी किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त सामान्य भेदभाव में नस्ल, लिंग, धर्म, दिव्यांगता, जन्म-स्थान आदि को शामिल किया गया है. सामान्य वर्ग का व्यक्ति इस आधार पर अपने साथ होने वाले भेदभाव की शिकायत कर सकता है.

 



अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने की दृष्टि से प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केन्द्र की स्थापना करनी होगी. इसका कार्य वंचित समूहों के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना; शैक्षणिक, वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रदान करना; तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना होगा. प्रत्येक समान अवसर केन्द्र एक समता समिति के माध्यम से कार्य करेगा. यदि इस अधिनियम में बिन्दु 3ग के अलावा बिन्दु 7 खटकता है, जो कहता है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता है. इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण बिन्दु यह माना जाना चाहिए कि झूठी शिकायत मिलने पर सम्बंधित व्यक्ति के लिए किसी भी तरह की सजा, जुर्माना अथवा कार्यवाही का प्रावधान नहीं किया गया है. यद्यपि मसौदा नियमों में इसका प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया था तथापि अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने इस प्रावधान को हटा दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया. इस कारण यूजीसी का वर्तमान अधिनियम न केवल बेहद सख्त हो जाता है बल्कि अन्यायपूर्ण भी समझ आने लगता है.

 




अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस अधिनियम पर जल्दबाजी अथवा उतावलेपन में विरोध के बजाय व्यापक विमर्श, पारदर्शिता और हितधारकों से संवाद के साथ इसका स्वरूप निर्धारित किया जाए. शिक्षा सुधार का लक्ष्य जाति-आधारित भेदभाव नहीं बल्कि स्वतंत्र, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. यूजीसी को भी जनमानस के विचारों का सम्मान करते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. यह न केवल वर्तमान समय की माँग है बल्कि देश के शैक्षणिक भविष्य के लिए आवश्यक भी है. ध्यान रखना चाहिए कि एक वर्ग के साथ सम्भावित भेदभाव को दूर करने के प्रयास में दूसरा वर्ग भेदभाव का शिकार न हो जाये.

 


06 दिसंबर 2025

हाथ पहले दिन भी खाली थे, हाथ आज भी खाली हैं

06 दिसम्बर राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण तो है ही, व्यक्तिगत स्तर पर हमारे लिए भी महत्त्वपूर्ण है. बाबरी ढाँचे के ध्वंस से इतर सन 2005 में इसी दिन गांधी महाविद्यालय, उरई में अध्यापन कार्य हेतु अपना पहला कदम रखा था.


आज बीस वर्ष की समाप्ति बाद अपनी इस यात्रा को देखते हैं तो इसमें न संतुष्टि नजर आती है, न उपलब्धि. ऐसा महसूस होता है कि जैसे एक बहुत लम्बा और महत्त्वपूर्ण समय निरर्थक गुजार दिया.


इन बीस वर्षों में अपने जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे जो इस कार्यक्षेत्र से सम्बंधित भी रहे और नितांत पारिवारिक भी रहे. दोनों के साथ तालमेल बिठाने का प्रयास करते हुए आगे भले ही बढ़ते रहे मगर कहीं आगे पहुँच न पाए. गम्भीरता से जब अपना ही आकलन करते हैं तो एहसास होता है कि आज भी उसी स्थिति में खड़े हैं जहाँ 06 दिसम्बर 2005 को खड़े हुए थे. 


जिनको वेतन सम्बन्धी आँकड़ा उपलब्धि लगता होगा उनको ये बात हजम नहीं होगी. ये सही है कि नौकरी के पहले दिन और आज के वेतन में बहुत बड़ा अंतर आया है मगर धनोपार्जन को उपलब्धि नहीं कहा जा सकता है. विगत वर्षों में अनेकानेक कारणों से जिस तरह से कार्यक्षेत्र में विसंगतियों से जूझना हुआ है, खुद का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य से दूर होना हुआ है, लेखन-साहित्य के क्षेत्र से जुड़े रहने के बाद भी अनमना सा रहा है उसने एक तरह की शून्यता ही पैदा की है.


बहरहाल, कहानी बहुत लम्बी और बड़ी है. सारांश महज इतना ही है कि इन बीस वर्षों की अध्यापन यात्रा में मिला कुछ नहीं और खोया बहुत कुछ है; पाया कुछ नहीं पर गँवाया बहुत कुछ है. हाथ पहले दिन भी खाली थे, हाथ आज भी खाली हैं.




05 नवंबर 2025

नैक के प्रति सुस्त चाल

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों (कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि) का मूल्यांकन और प्रमाणन का कार्य राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा किया जाता है. संक्षेप में इसे नैक से सम्बोधित किया जाता है. यह यूजीसी का एक स्वायत्त निकाय है जिसकी स्थापना 1994 में हुई थी. नैक के द्वारा गुणवत्ता के मानकों के अनुरूप संस्थानों की ग्रेडिंग करना है. ऐसा किये जाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि विद्यार्थियों को सही संस्थान चुनने में मदद मिले.

 

नैक के मुख्य कार्यों और उद्देश्यों में शैक्षणिक संस्थाओं की मान्यता को उनके मूल्यांकन के आधार पर की गई ग्रेडिंग से किया जाना है. शिक्षण क्षेत्र में उच्च शिक्षा से सम्बंधित संस्थाओं, चाहे वे महाविद्यालय हों अथवा विश्वविद्यालय सभी का मूल्यांकन नैक द्वारा किया जाता है.

 

इसके माध्यम से सुनिश्चित किया जाता है कि संस्थान गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं अथवा नहीं. इन मानकों में पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, अनुसंधान, बुनियादी ढाँचा आदि के साथ-साथ अध्यापकों और विद्यार्थियों से सम्बंधित सुविधाओं और मूलभूत ढाँचे को शामिल किया जाता है.

 



विगत वर्षों में नैक को लेकर लगातार उठाये जाने वाले कदमों के बाद भी उच्च शिक्षण संस्थाओं में नैक मूल्यांकन करवाने को लेकर जागरूकता न के बराबर है. नैक मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कदम उठा रहा है. इसके लिए उसके द्वारा ऑनलाइन और हाइब्रिड मॉडल जैसी नई रणनीतियाँ शामिल हैं किन्तु निजी संस्थाएँ हों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ, सभी नैक करवाने में अभी बहुत पीछे हैं. उत्तर प्रदेश में यह स्थिति तो और भी सोचनीय है. 

 


01 नवंबर 2025

MMTTP के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान

MMTTP के द्वारा करवाये जाने कोर्स/प्रोग्राम के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान यूजीसी की तरफ़ से किया गया है.



मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम (MMTTP) का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धतियों और नेतृत्व कौशल से सशक्त बनाना है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सिफारिशों को लागू करने पर केन्द्रित है. इस प्रशिक्षण का लक्ष्य शिक्षकों की क्षमताओं को बढ़ाना और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है. इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के प्रशिक्षण शामिल किये गए हैं. 


बहुत सी संस्थाओं में देखने में आ रहा है कि इस कोर्स में सहभागिता करने वाले प्राध्यापकों को उन उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्राचार्यों द्वारा अवकाश प्रदान नहीं किया जा रहा है. ऐसे में प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन कार्य के लिए संस्था में उपस्थित रहने के दौरान ही इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करना पड़ता है. ऐसे में जहाँ अध्यापन कार्य भी प्रभावित होता है वहीं इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्देश्य में भी बाधा उत्पन्न होती है. 


इसी को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करने पर अवकाश का प्रावधान किया गया है. 


20 सितंबर 2024

इसे बेशर्मी कहा जाये या कुछ और...??

समझ नहीं आ रहा कि इसे बेशर्मी कहा जाये या कुछ और...??

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गांधी महाविद्यालय, उरई के अनेक शिक्षकों एवं कर्मचारियों के वेतन से NPS की नियमित कटौती मई 2019 से हो रही है. इसके बाद भी आजतक किसी भी शिक्षक अथवा कर्मचारी की धनराशि उसके NPS खाते में प्रदर्शित नहीं हो रही है. प्राचार्य से लगातार इस बारे में निवेदन करते-करते थक जाने के बाद 12 अगस्त 2024 को इस बारे में SP जालौन, DM जालौन, क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी झाँसी, निदेशक उच्च शिक्षा प्रयागराज, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, राज्यपाल उत्तर प्रदेश, वित्त मंत्री भारत सरकार, गृह मंत्री भारत सरकार, प्रधानमंत्री भारत सरकार, विजिलेंस उत्तर प्रदेश को लिखित/ई-मेल से शिकायत भेजी.

 

एक महीना से अधिक हो जाने के बाद भी फोन सम्बन्धी कार्यवाही के अलावा प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं. प्राचार्य की स्थिति ये है कि वह घनघोर बेशर्मी लादे हुए आज भी बायोमेट्रिक उपस्थिति, बिना विद्यार्थियों के कक्षाओं की चेकिंग में व्यस्त है. लगता है कि अपने वकील मित्र की सलाह मानते हुए सीधे अदालत की शरण में जाना चाहिए था. जो बीती सो बीती.... अगले सप्ताह इस मामले को अदालत में लेकर जाना ही होगा. आखिर मामला वित्तीय घोटाले का समझ आ रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि मई 2019 से रुके धन का ब्याज कौन देगा? विगत पाँच वर्षों की वित्तीय हानि का जिम्मेवार कौन होगा?

 

लगता है कि प्राचार्य सहित उसके अन्य सहायकों के जेल जाए बिना मामला अब सुलझने वाला नहीं. यथोचित सलाह, जानकारी अपेक्षित है.


14 सितंबर 2024

प्राध्यापकों का अनूठा विरोध प्रदर्शन

सत्ताएँ, कुर्सियाँ, प्राधिकारी जब अपने-अपने दायित्वों से च्युत होने लगते हैं, हो जाते हैं तो उनको अपनी आवाज़ सुनाने के लिए प्रताड़ित पक्ष को कुछ न कुछ कदम उठाने ही पड़ते हैं. अक्सर प्रताड़ित पक्ष अपनी अवहेलना के कारण, अपने कार्य में प्रगति होता न देख क्षुब्ध होकर क्रोधवश ऐसे कदम उठा लेता है जिसे सहज रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है. ये जानते हुए भी कि विरोधात्मक कदम उठाने वाला पक्ष अपनी ओर से कतई गलत नहीं है मगर समाज आदर्शात्मक रूप में ऐसे किसी भी कदम का समर्थन नहीं करता है जो कि किसी भी तरह के आदर्श का ध्वंस करते हों, किसी भी तरह से सामाजिक व्यवस्था में अवरोध पैदा करते हों. यह बिन्दु उस समय और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है जबकि विरोध का मुद्दा शिक्षित वर्ग से जुड़ा हो, शिक्षकों से सम्बंधित हो. इस को ध्यान में रखते हुए गांधी महाविद्यालय, उरई के प्राध्यापकों ने व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ भी उठाई और विरोध करने का, अपनी नाराजगी को प्रदर्शित करने का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया.

 




विरोध का, नाराजगी का मामला चूँकि महाविद्यालय के प्राध्यापकों से जुड़ा हुआ था, ऐसे में उनके द्वारा ऐसे किसी भी कदम को गलत ठहराया जा सकता था, जिससे किसी व्यवस्था में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगे. गुरुतर दायित्व-बोध का भान होने के कारण प्राध्यापकों द्वारा किये गए विरोध प्रदर्शन से महाविद्यालय के किसी भी कार्य में किसी भी तरह की रुकावट नहीं आई. महाविद्यालय में जिन कक्षाओं में अध्यापन कार्य चल रहा था, उन कक्षाओं का सञ्चालन भी सुचारू रूप से होता रहा. स्नातक और परास्नातक कक्षाओं में नवीन सत्र हेतु प्रवेश प्रक्रिया भी संचालित है, प्राध्यापकों ने इसका भी ध्यान रखा और उनके विरोधात्मक कदम के बाद भी विद्यार्थियों के प्रवेश सम्बंधित कक्षाओं में होते रहे. कार्यालयीन कार्य भी यथोचित रूप से संपन्न होते रहे.

 

आपको बताते चलें कि महाविद्यालयों में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम के अन्तर्गत प्राध्यापकों की प्रोन्नति प्रक्रिया को अपनाया जाता है. इस प्रक्रिया के अंतर्गत प्रोन्नति के नियमों और सेवा-शर्तों को पूरा करने वाले प्राध्यापकों को निश्चित प्रारूप में अपना आवेदन समस्त अभिलेखों के साथ प्राचार्य कार्यालय में जमा करना पड़ता है. गांधी महाविद्यालय, उरई के दस प्राध्यापकों द्वारा यथोचित सेवा-शर्तों को पूरा करने के बाद अपनी प्रोन्नति सम्बन्धी आवेदन की फाइल को समस्त दस्तावेजों के साथ गत वर्ष, 2023 में 15 सितम्बर को प्राचार्य कार्यालय में जमा किया गया था. उसके बाद से अद्यतन सम्बंधित प्राधिकारी द्वारा, प्राचार्य द्वारा कोई आधिकारिक जानकारी किसी भी प्राध्यापक को नहीं दी गई और न ही इस सम्बन्ध में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा गठित साक्षात्कार पैनल को आधिकारीक ढंग से सूचित किया गया. सम्बंधित उच्चाधिकारी, प्राधिकारी की इस तरह की कार्य-संस्कृति के चलते पूरा एक वर्ष हो जाने के बाद भी वे दस प्राध्यापक अपनी प्रोन्नति की राह ताकने में लगे हैं.

 


इस तरह की कार्य-संस्कृति, कार्य-प्रणाली से क्षुब्ध होकर उन दस प्राध्यापकों के साथ-साथ अन्य जागरूक प्राध्यापकों ने विरोध का, अपनी नाराजगी प्रदर्शित करने का एक नया तरीका अपनाया. इस विरोध प्रदर्शन में सम्बंधित प्राध्यापकों ने एक वर्ष से फाइलों की स्थिति में प्रगति ने देखते हुए प्राचार्य कार्यालय में फाइल जमा करने की पहली वर्षगाँठ मनाई. अवसर भले ही विरोध करने का रहा, भले ही नाराजगी दिखाने का था, प्राचार्य की उदासीन कार्य-प्रणाली के विरुद्ध था मगर किसी भी तरह का तो शोर-शराबा किया गया, न किसी तरह की नारेबाजी की गई, न किसी तरह से कक्षाओं में अध्यापन कार्य को बाधित किया गया. नारेबाजी, शोरगुल, हंगामा आदि से उलट इस अवसर पर प्राध्यापकों द्वारा केक काट कर अपना विरोध जताया गया. केक के साथ-साथ महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापकों, कर्मचारियों को जलपान भी करवाया गया. इसमें भी प्राध्यापकों ने गंभीरतापूर्वक व्यवहार अपनाते हुए इस बात का ध्यान रखा कि महाविद्यालय का अध्यापन अथवा कार्यालयीन कार्य बाधित न हो, इसलिए सभी विभागों में जलपान पहुँचाये जाने की व्यवस्था की गई.

 





महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने इस अवसर पर कहा कि वे लोग शिक्षित वर्ग से आते हैं, शिक्षा देने का कार्य करते हैं. और तो और शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, ऐसे में उनके द्वारा विरोध के तरीके से एक तरह का सन्देश भी देना उनका उद्देश्य था, साथ ही विद्यार्थियों में भी चेतनात्मक विकास करवाना था. आज विरोध, अनशन के नाम पर देश की, समाज की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है, समाज में अराजकता फैलाई जाती है, यह सब नकारात्मक प्रवृत्ति का परिचायक है. उन्होंने अपने इस तरह के शालीन, सभ्य, शांत विरोधात्मक कदम के द्वारा प्रयास किया है कि अपने दायित्वों, कार्यों के प्रति उदासीन प्राचार्य, प्राधिकारी संभवतः जाग सकें. प्राध्यापकों ने कहा कि प्रोन्नति के इस मुद्दे के साथ-साथ एनपीएस का मुद्दा भी उनके महाविद्यालय में उलझा हुआ है. इसके लिए भी प्राध्यापकों और कर्मियों द्वारा इसी तरह से शालीन, सभ्य विरोध प्रदर्शन करके उदाहरण निर्मित किया जायेगा.

 




विरोध प्रदर्शन के इस अवसर पर शिक्षक संघ अध्यक्ष रोहित कुमार पाठक, महामंत्री डॉ. धर्मेन्द्र कुमार, पूर्व नैक प्रभारी डॉ. ऋचा सिंह राठौर, पूर्व आईक्यूएसी संयोजक डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, डॉ. सुनीता गुप्ता, डॉ. ऋचा पटैरिया, प्रीति परमार, डॉ. मोनू मिश्रा, डॉ. के.के. गुप्ता, डॉ. के.के. त्रिपाठी, डॉ. मसऊद अंसारी, डॉ. कंचन दीक्षित, डॉ. इन्द्रमणि दूबे, डॉ. संदीप श्रीवास्तव, डॉ. शिवसंपत्त द्विवेदी, डॉ. वंदना सिंह, डॉ. विश्वप्रभा त्रिपाठी, कश्यप पालीवाल, महेन्द्र सिंह आदि उपस्थित रहे.         




23 जून 2024

प्राचार्य समस्या के सम्बन्ध में पत्र

दिनांक 06.05.2024 के इस पत्र को मिलने के बाद कुछ कार्यवाहक ऐसे नाचने में मगन हैं जैसे उनके नाम वसीयत कर दी गई हो. उनसे ज्यादा उनके लगुआ-भगुआ ठुमके मार रहे हैं. 


पत्र को पढ़ें, कम से कम जो हिस्से रंगीन किये गए हैं, उनको विशेष रूप से पढ़ें.


==>> आवश्यक/अनिवार्य............. इसका अर्थ क्या निकाला जाये?

==>> प्राचार्यों की नियुक्ति के बारे में दो बार साफ़-साफ़ लिखा गया है. स्पष्ट है कि कार्यवाहक/अस्थायी टाइप के प्राचार्य उचकने का प्रयास न करें.

==>> पाँच घंटे की बैठकी तो लगभग सभी लोग कर रहे हैं. हाँ, कार्यवाहक प्राचार्य की ही गैंग के कुछ लोग ऐसा नहीं कर रहे थे. (कहो तो नाम लिख दें?)

==>> बाकी परीक्षा समय में बायोमैट्रिक सम्बन्धी या पाँच घंटे सम्बन्धी कोई नियम इस पत्र में नहीं है. इसलिए परीक्षा समय में अनावश्यक बकबकाने की कोशिश न की जाये.

==>> और अंत में, यह पत्र किसी तरह का आदेश नहीं बल्कि प्राचार्य परिषद् के अध्यक्ष/महामंत्री के लिए एक तरह से सूचनार्थ लिखा गया है. इसके साथ-साथ क्षेत्रीय अधिकारियों को यह पत्र बायोमैट्रिक उपस्थिति और छात्र-निधि सम्बन्धी निर्गत शासनादेशों का अनुपालन करवाए जाने के सम्बन्ध में लिखा गया है.

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उक्त के सम्बन्ध में कार्यवाहक प्राचार्य खुद को खुदा न समझें और कमजोर दिल के प्राध्यापक घबरा कर कार्डियोलोजी में भर्ती होने न चले जाएँ. 




18 फ़रवरी 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ खिलवाड़

बँधी-बँधाई लकीर पीटने वाले, मूढ़ बुद्धि वाले, ख़ुद को एकमात्र ज्ञानवान समझने वाले यदि किसी भी नीति, योजना आदि को क्रियान्वित करने वाले हों तो किसी भी अच्छी से अच्छी नीति, योजना का बंटाधार होना निश्चित है. कुछ ऐसा ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ हो रहा है.


बाक़ी जगहों की बहुत ज़्यादा व्यावहारिक जानकारी नहीं मगर बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में ऐसा ही हो रहा है. आये दिन एनईपी 2020 से सम्बन्धित आने वाले आदेशों, नियमों, दिशा-निर्देशों में किसी भी रूप में स्पष्टता देखने को नहीं मिलती. व्यावहारिक रूप से इनका पालन करना कठिन होता है. इस कठिनाई को बहुसंख्यक महाविद्यालयों के प्राचार्य और भी बढ़ा देते हैं.




पिछले वर्ष एक आदेश आया था, सतत आंतरिक मूल्यांकन में विद्यार्थी को न्यूनतम 15 अंक अनिवार्यतः देने के सम्बन्ध में. इस पर तबसे लेकर आजतक विवाद, भ्रम की स्थिति बनी है. बहुतेरे महाविद्यालयों में अनुपस्थित विद्यार्थियों को भी 15 अंक देने का दबाव प्राचार्यों द्वारा बनाया जा रहा है. इस बारे में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है कि आख़िर अनुपस्थित विद्यार्थी को अंक कैसे दिये जाएँ?


इस तरह के आदेश प्रोजेक्ट को लेकर, लघु शोध प्रबंध को लेकर, क्षेत्रीय भ्रमण/सर्वेक्षण को लेकर, माइनर विषयों को लेकर भी आते रहे हैं, जो भ्रम, विवाद ही पैदा करते आ रहे हैं. इस बारे में न तो बहुत से प्राचार्यों द्वारा कोई जानकारी ली जा रही है और न ही विश्वविद्यालय द्वारा स्पष्ट नीति बनाई जा रही है.


वैसे, देखने में आ रहा है कि अब अपने उच्चाधिकारियों से चर्चा करने में, विमर्श करने में शिक्षक भी घबराने लगे हैं. अपने आपको विश्वासी, सक्षम बनाने में असफल ऐसे अनेकानेक शिक्षक विद्यार्थियों को कैसे विश्वासी, सक्षम बना सकेंगे?

 






 

10 फ़रवरी 2024

मित्रों की ताकत से चलती उठापटक

आज एक बहुत पुराने मित्र से मुलाक़ात हुई. यहाँ उनसे मिलना विशेष नहीं क्योंकि हम लोग एक ही शहर में हैं, एक ही कार्यक्षेत्र में हैं, इसके अलावा विशेष बात ये है कि हम दोनों मित्र हैं, इस कारण मुलाकात होती ही रहती है. आज मुलाकात में और भी तमाम बातों के साथ-साथ अपने-अपने कार्यक्षेत्र के बारे में चर्चा चल पड़ी. जनपद के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में आलम ये है कि कहीं-कहीं प्रबंधकों की मनमर्जी है तो कहीं प्राचार्यों की. कहीं-कहीं तो अतिशय स्थिति है, वहाँ चपरासियों, बाबुओं का बोलबाला है. बहरहाल, हम मित्रों की बातचीत में अनायास ही परीक्षाओं, ड्यूटी, शिक्षा, महाविद्यालय, विद्यार्थियों की उपस्थिति, प्राचार्यों के क्रियाकलापों, एनईपी 2020, माइनर विषयों आदि-आदि का जिक्र चल गया.

 

अपने-अपने कॉलेज के अपने-अपने कार्यों की चर्चा हुई. चूँकि वे हमारे मित्र हैं बहुत पुराने, इसलिए हमारी आदतों, स्वभाव से परिचित हैं. हमारी स्थिति ये है कि गलत बात, निर्णय बर्दाश्त नहीं होते और यही कारण है कि आये दिन न केवल अपने संस्थान में बल्कि समाज में भी कई जगह पर तनातनी की स्थिति आ जाती है. हमारे संस्थान में भी पिछले कुछ समय से बड़ी उठापटक मची हुई है, जिसके चलते विद्रोही तेवरों के साथ काम करना हो रहा है. हमारे अनेक कांडों, कदमों, बर्ताव, व्यवहार आदि को सुनने-समझने के बाद बोले कि कुमारेन्द्र, अपनी नौकरी बचा के चलो. उस मित्र की इसी बात पर हमने ठहाका लगाया तो अगले ने भी उसमें साथ दिया और बोला कि तुम न सुधरोगे. वैसे आज की स्थिति में तुम जैसे कुछ लोगों की जरूरत है. हमने कहा, बस यही विश्वास बनाए रहना. नौकरी ही ज़िन्दगी नहीं. एक जाएगी तो अनेक आएँगी मगर किसी की गुलामी बर्दाश्त नहीं.

 

उस मित्र ने पूर्ववत मित्रवत व्यवहार दिखाया. ऐसे ही मित्र हमारी ताकत हैं. गुलामी नहीं हो सकती, नौकरी कल जाती हो तो आज-अभी हाल चली जाए मगर नकारात्मकता फैलाने वाले को सबक सिखाया ही जायेगा. समय के फेर में कुछ दिन तो ख़ामोशी अपनाई जा सकती है, दया का भाव दिखाया जा सकता है किन्तु लगातार अन्याय को सहते रहना खुद को आरोपी बनाता है, खुद को खुद की निगाह में अपराधी बनाता है, अपराध-बोध जगाता है.


30 जनवरी 2024

ग्रेडिंग प्रणाली समाप्त करना समाधान नहीं

देश की शैक्षणिक व्यवस्था में लगातार किसी न किसी रूप में सुधारात्मक कदम उठाये जाते रहे हैं. समयानुसार ऐसा किया जाना एक सतत प्रक्रिया है. उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधारात्मक क़दमों के रूप में राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (नैक) की कार्यकारी परिषद की बैठक में निर्णय लिया गया कि अब देश में उच्च शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रणाली (एक्रीडिटेशन सिस्टम) के द्वारा ग्रेड नहीं दिया जाएगा. अब महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को ए डबल प्लस से लेकर डी तक किसी भी प्रकार का ग्रेड नहीं मिलेगा. इसके स्थान पर उच्च शिक्षण संस्थानों को द्विआधारी मान्यता पद्वति के द्वारा मान्यता प्राप्त या मान्यता प्राप्त नहीं के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा. यह व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2024-25 से लागू हो जाएगी.

 



उच्च शिक्षण संस्थानों में ग्रेडिंग के स्थान पर मान्यता प्रणाली को दो चरणों में लागू किया जायेगा. पहले चरण में बताया जाएगा कि संस्थान मान्यता प्राप्त है अथवा मान्यता प्राप्त नहीं है. पहले चरण की इस प्रक्रिया के पश्चात दूसरे चरण में संस्थानों को एक से लेकर पाँच तक के स्तर पर आँका जायेगा. इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों को अच्छा करते रहने के लिए प्रेरित करना होगा. जिस संस्थान का प्रदर्शन जिस क्षेत्र में जितना अच्छा होगा, उसे उसी के अनुसार एक से पाँच तक की रेटिंग दी जाएगी. नैक की कार्यकारी परिषद् का मानना है कि इस द्विआधारी व्यवस्था से अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए यह पहचानना सहज हो जायेगा कि कौन सा संस्थान मान्यता प्राप्त है और कौन सा नहीं. इसी के साथ उस शैक्षणिक संस्थान की एक से पाँच तक की रेटिंग के अनुसार वे उसे अपने अध्ययन हेतु चयनित कर सकेंगे.

 

अभी तक की संचालित व्यवस्था में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के दिशानिर्देशों के अन्तर्गत नैक द्वारा पूरे देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ग्रेड प्रदान किये जाते हैं. जो विश्वविद्यालय और महाविद्यालय नैक टीम के निरीक्षण के दौरान उनके द्वारा निर्धारित मापदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं, उनको ग्रेड प्राप्त करने में मुश्किल होती है. यूजीसी के अनुसार देश के कुल 1113 विश्वविद्यालयों में से 437 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि बाकी 676 के पास नैक मूल्यांकन नहीं है. इसी तरह देश में 43796 महाविद्यालयों में से 9335 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि 34461 कॉलेज अभी तक मूल्यांकन नहीं करवा सके या असफल हुए हैं. नैक एक स्वायत्त संस्था है, जिसे 1994 में यूजीसी द्वारा स्थापित किया गया था. इसका काम देश भर के विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों, निजी शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता को परखना, उनका मूल्यांकन करके ग्रेडिंग देना है. यूजीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नैक से मान्यता प्राप्त करना आवश्यक है. यदि किसी संस्थान द्वारा इसकी मान्यता नहीं ली जाती है तो उसे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है.

 

जैसा कि नैक की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष भूषण पटवर्धन ने कहा कि मान्यता की द्विआधारी पद्धति यह सुनिश्चित करेगी कि ग्रेड की अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्धा जड़ से समाप्त हो जाए. वह दौड़ जिसमें एक महाविद्यालय को ए डबल प्लस से सम्मानित किया गया और दूसरे को ए प्लस से सम्मानित किया जाना था, समाप्त हो, ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वाकई ऐसा हो सकेगा? इस स्तर पर आकर विचारणीय यह है कि ऐसे संस्थान जो मान्यता प्राप्त नहीं वर्ग में आयेंगे उनके शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों का भविष्य क्या होगा? उनके कैरियर की दिशा क्या होगी? शिक्षण दायित्वों से इतर अनेकानेक कार्यों के लिए शिक्षकों को अनुमति होगी अथवा नहीं? नैक मूल्यांकन-रहित संस्थानों के भविष्य के साथ-साथ उनसे जुड़े शिक्षकों, कर्मियों, विद्यार्थियों के भविष्य पर भी समवेत रूप से विचार किया जाना महती आवश्यकता है.

 

एक लम्बे समय से यूजीसी द्वारा बार-बार निर्देशित किये जाने के बाद भी बहुसंख्यक संस्थानों द्वारा नैक मूल्यांकन नहीं करवाया गया. इसके पीछे ऐसा नहीं कि संस्थानों की मंशा मूल्यांकन करवाने की नहीं है बल्कि वास्तविकता ये है कि बहुत बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जिनका मूलभूत ढाँचा ही नैक द्वारा निर्धारित किये गए मानदंडों के आसपास भी नहीं ठहरता है. ग्रामीण अंचलों में संचालित संस्थानों में तो स्थिति और भी दयनीय है. मूलभूत ढाँचे के अभाव के साथ-साथ शिक्षकों की कमी, विद्यार्थियों का बहुत बड़ी संख्या में अनुपस्थित रहना, पाठ्यक्रमों का रोजगारपरक न होने से प्रवेश का कम होना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भी बहुत से संस्थान नैक मूल्यांकन में सफल नहीं हुए हैं.

 

विगत कुछ वर्षों में शिक्षा के उन्नतीकरण से अधिक जोर उसके व्यवसायीकरण पर दिया गया. परिणामस्वरूप निजी संस्थानों की भरमार हो गई, जिनमें से बहुतायत में शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों, विद्यार्थियों, परीक्षा, मूल्यांकन आदि की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. ऐसे संस्थान धनबल की ताकत से किसी भी कार्य को पूर्ण करवाने का दम भरते भी हैं और रखते भी हैं. इसी के चलते माना जाने लगा था कि नैक मूल्यांकन भी अब पारदर्शी नहीं रह गया है. नवीन व्यवस्था के पहले चरण को आगामी चार महीनों में पूरा किया जाना है. ऐसे में वे संस्थान जिनका ढाँचा ही सही नहीं है, जहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, वे कैसे इस चरण के लिए आवेदन कर सकेंगे? निश्चित है कि संस्थानों द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए वही अतार्किक, असंगत उपाय अपनाए जाने की आशंका रहेगी जिनके कारण नैक मूल्यांकन को अनुपयुक्त माना जाने लगा है. यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों की मूल्यांकन प्रणाली बदलने से इतर प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि संस्थान अपने मूलभूत ढाँचे में, शैक्षणिक गुणवत्ता में, शैक्षणिक वातावरण, विद्यार्थियों की उपस्थिति में आवश्यक सुधार करें. बिना इसके किसी भी बदलाव का बहुत सारगर्भित प्रभाव नहीं होने वाला. 






 

20 अगस्त 2023

बायोमैट्रिक उपस्थिति का समर्थन

शिक्षा निदेशक (उच्च शिक्षा) की ओर से एक पत्र जारी किया गया, बायोमैट्रिक उपस्थिति की अनिवार्यता के सम्बन्ध में. इसमें महाविद्यालयों में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमैट्रिक उपस्थिति का प्रावधान किये जाने की बात कही गई है. हम तो व्यक्तिगत रूप से इसके पक्ष में हैं मगर प्रदेश स्तर पर शिक्षक संगठन ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. काली पट्टी बाँध कर काम करने का आदेश सा पारित कर दिया गया है.

 

बायोमैट्रिक उपस्थिति का समर्थन हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसके लगने से महाविद्यालय में प्राचार्य और प्रबंध समिति की मनमानी, तानाशाही समाप्त हो जाएगी. कहते हैं न कि 'अँधा बाँटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह के दे' ठीक यही हाल उपस्थिति को लेकर होता है. जो इनके अपने हैं वे कभी भी आकर उपस्थिति दर्ज करवाएँ, उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती और जो इनके पक्ष के नहीं हैं वे नोटिस पा जाते हैं, कार्यवाही के शिकार हो जाते हैं. बायोमैट्रिक उपस्थिति अकेले शिक्षकों के लिए नहीं है, वह विद्यार्थियों के लिए भी है. इसका होना अनिवार्य होना ही चाहिए ताकि विद्यार्थी महाविद्यालय में आना शुरू करें. अभी प्राचार्य की तरफ से दबाव होता है विद्यार्थियों की झूठी उपस्थिति दिखाने का. आखिर परीक्षा फॉर्म में, छात्र-वृत्ति में इनको खेल जो करना होता है.

 

हमारा तो व्यक्तिगत अनुभव रहा है प्राचार्य और प्रबंध समिति की मनमानी, तानाशाही का. उपस्थिति को लेकर; विद्यार्थियों की फर्जी उपस्थिति को लेकर, छात्र-वृत्ति और परीक्षा फॉर्म को लेकर. स्थानीय स्तर पर सक्षम होने के कारण इस मामले में हम संघर्ष कर ले रहे हैं मगर सभी शिक्षक इस तरह से खुलकर विरोधी स्वर नहीं अपना पाते. उन सभी शिक्षकों के हितार्थ बायोमैट्रिक उपस्थिति प्रक्रिया सर्वोत्तम है, उचित है. हम व्यक्तिगत रूप से प्रदेश के, विश्वविद्यालय के, महाविद्यालय के शिक्षक संगठन द्वारा चलाये जा रहे विरोध में शामिल नहीं हैं.

 


10 मई 2023

ऐसे संयोग भी बिरले ही होते हैं - 2300वीं पोस्ट

शिक्षा किसी के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इस शिक्षा के द्वारा व्यक्ति न केवल संस्कारित बनता है बल्कि अपनी भावनाओं के प्रकटीकरण को लेकर भी सजग होता है. पता नहीं ये सबके साथ होता है या नहीं मगर हमारे साथ हमारे उन सभी शिक्षण संस्थानों के साथ आत्मिक लगाव रहा है जहाँ से हमने शिक्षा प्राप्त की है. प्राथमिक शिक्षा के लिए संस्थान रहा हो या या फिर उच्च शिक्षा का संस्थान, न उस संस्थान को, न वहाँ के शिक्षकों को हमने विस्मृत किया है.


इसी क्रम में अपनी उच्च शिक्षा से जुड़े एक शिक्षण संस्थान दयानंद वैदिक महाविद्यालय, उरई का जिक्र करना आज अत्यावाशय्क हो गया है. वैसे इस पोस्ट को हमने 08 मार्च को लिखा था मगर जब बात ख़ास थी तो पोस्ट भी ख़ास होनी चाहिए थी, यही सोचकर इसे रोक रखा था. चलिए, अब दोनों बातें एक-एक करके आपको बताते चलें. पहली बात चूँकि हमारे कॉलेज से जुडी है, इसलिए पहले उसे बताते हैं. विगत दो दशकों से अधिक समय से अध्यापन कार्य से जुड़े होने के बाद भी इस साल पहली बार अवसर मिला कि हमें कहीं बाह्य परीक्षक के रूप में मौखिकी परीक्षा लेने जाना था. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि विगत वर्षों में कई बार ऐसे अवसर आने के बाद भी हम इनकार करते रहे. शायद दस्तावेज के रूप में दयानंद वैदिक महाविद्यालय, उरई का नाम ही जुड़ना था.




इस महाविद्यालय के प्राध्यापक नीरज, जो हमारे मित्र भी हैं, का फोन आने पर पहले हमने उनको इनकार कर दिया, वो भी इस रूप में कि मित्र की मौज ले ली जाए. असलियत ये थी कि दयानंद वैदिक महाविद्यालय के नाम से हमें इनकार करना ही नहीं था. अब आते हैं इस नाम के आकर्षण के पीछे की कहानी पर. असल में जहाँ ये महाविद्यालय स्थित हैं, वहाँ हमारा निवास स्थान है. और निवास स्थान भी कोई आज का नहीं दशकों पुराना है. उस दौर का है जबकि हम इस महाविद्यालय के प्रांगण का उपयोग अध्यापन के लिए नहीं बल्कि अपने खेलकूद के लिए किया करते थे. उन दिनों का स्मरण आप लोग भी साथ में कीजिये, जबकि हम सन 1985 में रामनगर स्थित अपने मकान में आये और उसके बगल में डीवी कॉलेज को देखा. ये भी एक संयोग था कि तत्कालीन प्राध्यापकों के बच्चे हमउम्र होने के कारण या तो हमारे सहपाठी थे या फिर खेल के मैदान के मित्र थे. इसी कारण से कॉलेज कभी अनजाना सा नहीं लगा. खेलकूद के लिए मैदान का उपयोग करने के साथ-साथ वहाँ की शैक्षिणक सुविधाओं का लाभ लिया गया.


अब जबकि नीरज का फोन आया तो मन में एक लालच था अपने महाविद्यालय में बाह्य परीक्षक के रूप में जाने का. अपना महाविद्यालय इसलिए क्योंकि यहाँ बचपन में खेले तो हैं ही, कालांतर में यहाँ अध्ययन भी किया और उसके बाद अध्यापन कार्य भी किया. ये संयोग एकमात्र हमारे साथ नहीं जुड़ा होगा मगर हमारे लिए तो वाकई बिरला संयोग कहा जायेगा. इस महाविद्यालय में न केवल हमारा बचपन खेलकूद में बीता बल्कि अपनी स्नातक की पढ़ाई के बाद यहीं हमने परास्नातक में प्रवेश लिया था. सन 1995 में अर्थशास्त्र विषय से परास्नातक होने के बाद उसी साल जुलाई से महाविद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया था. अर्थशास्त्र विषय से अध्यापन के साथ-साथ वर्ष 1998 से यहीं हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य करने का अवसर भी मिला. अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ यहीं से हमें अपनी दोनों पी-एच.डी. करने का अवसर भी मिला.




ऐसे सुखद संयोग को हम किसी भी रूप में अपने हाथ से गँवाना नहीं चाह रहे थे. नीरज से कुछ मिनट के हँसी-मजाक के बाद बाह्य परीक्षक के लिए हाँ कर दी. 08 तारीख को पोस्ट लिखने के दौरान पोस्ट की संख्या देखी तो लगा कि इसे एक-दो दिन के लिए टाल दिया जाये तो हमारे लिए महत्त्वपूर्ण घटना के साथ-साथ पोस्ट भी विशेष हो जाएगी. असल में हमारे इस ब्लॉग की ये 2300वीं पोस्ट है. विगत 15 वर्षों से नियमित रूप से ब्लॉग-लेखन का ये सुफल आज दिख रहा है. एकसाथ दो-दो बातों को आप सबके बीच बाँटना बहुत ही अच्छा लग रहा है. बड़ों के आशीर्वाद, छोटों के स्नेह और साथियों के सहयोग का सुखद परिणाम है कि आज हम इस दोहरी ख़ुशी को आप सबके बीच साझा कर रहे हैं. आप सभी लोग अपना स्नेह बनाये रखियेगा. 



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इस ब्लॉग की 2300वीं पोस्ट है ये.



 

06 दिसंबर 2022

अध्यापन के सत्रह साल

06 दिसम्बर को कोई भारतीय कभी नहीं भूल सकता है. यह वो तारीख है जिस दिन भारतीय सांस्कृतिक पहचान पर जबरिया थोपे गए निशान को हटाया गया था. यह तिथि इसलिए भी महत्त्वपूर्ण मानी जानी चाहिए क्योंकि भले ही न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह सिद्ध हो जाता कि अमुक स्थान पर भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है मगर शायद कोई भी न्यायालय उस पर बने निर्माण को गिराने की अनुमति नहीं देता, वो भी तब जबकि वह किसी मजहब विशेष से सम्बंधित हो. ऐसे में सबूतों के आने के पहले उस विवादित ढाँचे के गिर जाने ने रामलला के जन्मस्थान को पुनर्स्थापित का अवसर सुलभ करवाया.


यह तिथि और भी कारणों से अन्य लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है. हमारे लिए भी यह तिथि इसलिए भी स्मरणीय है क्योंकि इसी दिन हमने उस क्षेत्र में लगभग स्थायी रूप से कदम रख दिया था, जिस क्षेत्र में कभी भी जाने का सोचा नहीं था. प्रत्येक बच्चा अपने बचपन से लेकर कैरियर बनाने तक किसी न किसी रूप में अपने आपको स्थापित करता रहता है. कभी वह डॉक्टर को देखकर डॉक्टर बनने का सपना पाल लेता है, कभी पुलिस वाले को देखकर पुलिस सेवा में जाने का मन बना लेता है. कभी वह अध्यापक बनना पसंद करता है तो कभी उसके सपने में कोई व्यापारी आने लगता है. हमारे साथ भी ऐसा बहुत कुछ हुआ मगर कभी भी न ख्वाब में, ना वास्तविकता में यह आया कि अध्यापक बनना है. ऐसा क्यों हुआ, इस बारे में कोई स्पष्ट स्मृति नहीं है.




समय का खेल देखिये, जिस क्षेत्र में नहीं आना चाहते थे, उस क्षेत्र में आज की तारीख में आने को मिला. एक तरफ इस तारीख में संस्कृति पर कब्ज़ा करने वाला निशान ध्वस्त हुआ था और एक हम इसी तिथि में उस पहचान को अपने ऊपर स्थापित करने वाले थे जिसे हम पसंद नहीं करते थे. इसी को समय, भाग्य, तकदीर आदि कह सकते हैं कि जिस क्षेत्र को, जिस काम को पसंद नहीं करते रहे, आज उसी में आधिकारिक रूप से काम करते हुए पूरे सत्रह वर्ष बीत गए. इन सत्रह वर्षों में इस क्षेत्र में स्वयं के द्वारा की गई बहुत सारी उठापटक को किया भी, देखा भी मगर इस क्षेत्र से पीछा नहीं छूटा. अब जबकि इस पहचान पर स्थायी होने का ठप्पा लग गया है तब इससे पीछा छुड़ाना और भी कठिन हो गया है. यह सोच कर कि बहुत बार काम अपने लिए नहीं बल्कि अपने लोगों के लिए किये जाते हैं, बस उसी सोच के साथ यहाँ काम हो रहा है. देखा जाये तो यह सही भी है क्योंकि इसके द्वारा बहुत से ऐसे काम जो हमसे संभव नहीं थे, वे यहाँ से हो जाते हैं.


लोगों की सहायता के लिए शायद समय ने हमें इस क्षेत्र में बनाये रखा है, यही सोचकर अठारहवें साल में प्रवेश कर लिया है. यह समयावधि कहाँ तक ले जाएगी, यह देखने का विषय है. 





 

04 अक्टूबर 2022

भाषा और कला के द्वारा समावेशी गुणों का विकास

शिक्षा किसी भी मानव को एक न्यायसंगत और समाज के विकास की राष्ट्रीय अवधारणा के लिए प्रेरित करती है. यह उसे वैश्विक मंच तक ले जाती है. एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वैश्विक मंच पर सामाजिक न्याय, समानता, उन्नति आदि के मार्ग खोलती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य देश के विकास के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है. आज समूचा विश्व एक व्यापक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आदि के द्वारा वैज्ञानिक और तकनीकी विकास हो रहा है वहीं दूसरी ओर डाटा साइंस, कंप्यूटर, गणित, विज्ञान आदि क्षेत्रों में ऐसे कुशल लोगों की आवश्यकता है जो विभिन्न क्षेत्रों में विविध विषयों में मानक योग्यता रखते हों. इसी को दृष्टिगत रखते हुए नई शिक्षा नीति में भारतीय परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों को आधार बनाते हुए इस प्रकार के लक्ष्य शामिल किए गए हैं जो सभी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ भाषा, कला, संस्कृति, इतिहास से भी परिचित करा सकें.


वर्तमान शिक्षा नीति के द्वारा तर्कसंगत विचार, कार्य करने की क्षमता, करुणा, सहानुभूति, वैज्ञानिक चिंतन, रचनात्मक कल्पनाशीलता, नैतिक मूल्य आदि के समावेशी गुणों से ओतप्रोत इंसान का विकास करना है. इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा अवधारणात्मक हो ना कि रटंत पद्धति वाली. इसी से अध्ययन-अध्यापन कार्य में भाषा की शक्ति को प्रोत्साहन दिया गया है. उसमें सीखने के सतत मूल्यांकन पर जोर दिया गया है. सभी पाठ्यक्रमों और शिक्षण शास्त्रों में स्थानीय संदर्भों की विविधता और सांस्कृतिकता पर विशेष बल दिया गया है. यह कदाचित सत्य भी है कि कोई व्यक्ति जितनी सहजता से स्थानीय भाषा में, अपनी संस्कृति में किसी ज्ञान को सीख सकता है, किसी अन्य भाषा में उतनी सहजता से नहीं सीख सकता है.




शिक्षा के द्वारा ऐसे व्यक्तियों को तैयार किया जाए जो एक से अधिक विशिष्ट क्षेत्रों में गहन स्तर पर अध्ययन करने में सक्षम हों और जिनमें नैतिक चरित्र, संवैधानिक मूल्यों, बौद्धिक जिज्ञासा, वैज्ञानिक रचनात्मकता, सेवा की भावना, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, मानविकी, भाषा आदि की क्षमताओं को सहेजने की क्षमता भी हो. इसके लिए ऐसे शिक्षा संस्थान निर्मित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है जो स्थानीय एवं भारतीय भाषाओं में शिक्षा के कार्यक्रम को बढ़ा सकें. इस बात पर भी बल दिया गया है कि बहु-विषयक शिक्षा व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाए जाएं. शिक्षा नीति के प्रस्ताव में बतलाया गया है कि भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नहीं मिल पाई है, जिसके कारण देश ने विगत 50 वर्षों में ही 220 भाषाओं को खो दिया है. यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय घोषित कर दिया है. वे भाषाएँ जिनकी लिपि नहीं है, विलुप्त होने की कगार पर हैं. जनजाति और समुदायों की भाषा भी विलुप्त हो रही है. भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन हेतु शिक्षा को प्रभावी माना जा रहा है. इसी कारण से ऐसे पाठ्यक्रमों को विकसित करने पर जोर है, जिनमें भारतीय भाषाओं, तुलनात्मक साहित्य, सृजनात्मक लेखन, कला, संगीत, दर्शनशास्त्र आदि के कार्यक्रमों का निर्माण और विकास किया जा सके. स्थानीय संगीत, कला, भाषा आदि के प्रति विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए उनको स्थानीय संस्कृति और ज्ञान से परिचित करवाना भी एक प्रभावी कदम है. इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए शिक्षण संस्थानों में मातृभाषा, स्थानीय भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग में लाये जाने पर जोर दिया गया है.


विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति के प्रति समझ विकसित करने के लिए स्थानीय पर्यटन, विरासत, संग्रहालय आदि के प्रति भी जागरूक दृष्टि अपनाये जाने को प्रमुखता दी गई है. इसके लिए पर्यटन को बढ़ावा दिया गया है. एक भारत श्रेष्ठ भारत योजना के अंतर्गत देश के 100 स्थलों की पहचान कर वहाँ विद्यार्थियों को इन क्षेत्रों के बारे में ज्ञानवर्धन करने, उनके ऐतिहासिक, वैज्ञानिक योगदान, परंपराओं, स्वदेशी साहित्य और ज्ञान आदि का अध्ययन करने के लिए भेजा जायेगा. यहाँ इस बात पर भी बल दिया गया है कि इन सभी स्थलों के इतिहास, संस्कृति, ज्ञान आदि का सभी भारतीय भाषाओं और उससे संबंधित स्थानीय कला एवं संरक्षण हेतु दस्तावेजीकरण किया जाए. इसमें स्थानीय भाषा में बोलना, कहानियाँ सुनाना, कविता पाठ करना, नाटक खेलना, लोक गायन, लोक नृत्य करना आदि शामिल है.


भाषाई विकास एवं संरक्षण हेतु भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित किये जाने का भी प्रस्ताव शिक्षा नीति में रखा गया है. इसमें प्रत्येक भाषा से श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलने वाले लोग शामिल करने का विचार है ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किंतु सटीक शब्द-भंडार निर्मित करने में सहायता मिल सकेगी. इसके अलावा इससे नियमित रूप से नवीनतम शब्दकोश जारी किया जा सकेगा तथा शब्दकोश और शब्द-भंडार को भी विकसित किया जा सकेगा. इसके लिए भाषाई विद्वानों के साथ-साथ शिक्षकों और विद्यार्थियों का भी सहयोग लिया जाये. इससे उनके अपने विषय से संबंधित शब्द-भंडार और शब्दकोश को न केवल निर्मित करवाया जा सकता है बल्कि उसे लगातार विकसित भी करवाया जा सकता है.


अभी तक देखने में आता रहा है कि न केवल संस्थान का बल्कि शिक्षक और शिक्षार्थी का उद्देश्य कैसे भी करके अपने पाठ्यक्रम को समाप्त कर लेना भर था. उनका ध्यान स्थानीय भाषा, बोली अथवा स्थानीय संस्कृति, इतिहास की जानकारी करना, उसका विकास अथवा संरक्षण करना नहीं होता था. मानविकी, कला, संगीत से लगातार दूर होता जाता विद्यार्थी सिर्फ और सिर्फ अच्छे अंक लाने के लिए, डिग्री प्राप्त करने की दिशा में ही दौड़ता रहता था. यह स्थिति उसे तनावग्रस्त करती जा रही थी. इसका दुष्परिणाम समाज में युवाओं का अवसाद में चले जाने, नशे का शिकार होने, निराशा-हताशा के चलते आत्महत्या करने के रूप में सामने आ रहा था. नई शिक्षा नीति में जिस तरह से पाठ्यक्रम में विज्ञान, कला, मानविकी, संगीत, संस्कृति, इतिहास आदि का समावेशी और वातावरण अनुकूलित स्वरूप निर्मित किया गया है, इससे विद्यार्थियों के समग्र विकास की दिशा का बहुत हद तक निर्धारण संभव है. 





 

28 सितंबर 2022

सेफ ज़ोन में रहते हुए नापसंदगी का काम

एक शाम मित्रों की महफ़िल में बैठे-बिठाए रोजगार, नौकरी, व्यापार आदि की चर्चा छिड़ गई. बात घूम-टहल कर हमारी नौकरी पर आ गई. जरा सी गणित लगाईं तो पता चला कि इस साल दिसंबर में पूरे सत्रह वर्ष हो जाएँगे गांधी महाविद्यालय, उरई में अध्यापन कार्य करते-करते. ये समयावधि तो वो है जो मानदेय के रूप में और वर्ष २०१९ में विनियमितीकरण के रूप में सामने आई है. यदि उससे पहले की प्रबंधकीय स्थिति के अंशकालिक अध्यापन कार्य को भी इसमें शामिल कर लिया जाये तो ढाई दशक से अधिक समय अध्यापन कार्य में लगा चुके हैं. नंबर सिस्टम में देखें तो एकबारगी यह आँकड़ा बड़ा लुभावना लग सकता है. इसके उलट यदि हमारी व्यक्तिगत रुचि को देखते हुए यह आँकड़ा खुद हमारे लिए कष्टकारी महसूस होता है.


स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी भी आम विद्यार्थी की तरह सपना था सिविल सेवा में जाने का. कुछ सालों तक तैयारी भी की मगर शायद उस स्तर को नहीं छू सके जहाँ से सिविल सेवा में जाने का द्वार दिखाई देता. समय के गुजरने के साथ-साथ कैरियर के लिए, भविष्य के लिए कई कामों का निर्धारण मन ही मन में होता रहता था. बहुतेरे कामों की लिस्ट में कहीं से भी अध्यापन कार्य शामिल नहीं था. ये बात किसी भी उस व्यक्ति के लिए आश्चर्य का विषय हो सकती है, जो हमसे परिचित नहीं है कि तमाम सारे कामों की सूची में अध्यापन कार्य न होने के बाद भी ढाई दशक से अधिक का समय इसी क्षेत्र में गुजार दिया गया. एक आश्चर्य वाली बात ये और है कि अध्यापन क्षेत्र में हमारा आना उसी वर्ष से हो गया था, जिस वर्ष हमने अपनी परास्नातक की पढ़ाई पूरी की थी. १९९५ में अर्थशास्त्र से एमए पूरा करते ही डी.वी.कॉलेज, उरई में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया था.




बहरहाल, जहाँ तक हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी रुचि के अनुसार ही अपने कार्य का चुनाव करना चाहिए. ऐसा बहुत से लोग कर पाते होंगे, बहुत से लोग ऐसा नहीं भी कर पाते हैं. समाज में जिस तरह से रोजगार को लेकर, नौकरी को लेकर, आर्थिक स्थायित्व को लेकर मारा-मारी मची रहती है, उसे देखते हुए व्यक्ति किसी भी तरह बस रोजगार को पाना चाहता है. इसके साथ-साथ परिवार को चलाने की स्थिति भी व्यक्ति को ऐसे कामों में धकेल देती है, जो वह करना नहीं चाहता है. रोजगार की खातिर, आर्थिक सहायता के कारण, परिवार को मदद करने के नाम पर व्यक्ति अपने नापसंदगी वाले कार्य को भले ही करता रहे मगर उसमें वह अपना शत-प्रतिशत नहीं दे पाता है या कहें कि चाह कर भी वह ऐसा नहीं कर पाता. इस तरह की स्थिति से हम खुद ही लगातार जूझ रहे हैं.


कहना होगा अपने बारे में कि कतिपय स्थितियाँ, परिस्थितियाँ ऐसी रहीं कि किसी तरह का रिस्क उठा नहीं सके या कि उठाने न दिया गया. जैसा कि अर्थशास्त्र में एक विचार है कि किसी भी कार्य के लिए (वैसे ये उत्पादन के सम्बन्ध में है मगर हमें प्रत्येक कार्य के लिए उचित प्रतीत होता है) भूमि, पूँजी, श्रम, संगठन, साहस की आवश्यकता होती है. इनमें से किसी एक की कमी सफलता को दूर कर देती है. हमारे अपने मामले में इन पाँच में क्या साथ रहा, क्या साथ नहीं रहा ये अलग विषय है किन्तु जब अपना आकलन करते हैं तो लगता है कि साहस की कमी रही. स्थितियों, परिस्थितियों, परिवार की स्थितियों के चलते ऐसा साहस नहीं उठा सके कि इस काम को छोड़कर अपने मन के काम को पूरा करने निकल पड़ते.


फिलहाल तो अभी इसी अध्यापन कार्य से जुड़े हुए हैं. प्रयास लगातार हो रहे हैं किसी दूसरे क्षेत्र के लिए मगर बिना अपने सेफ ज़ोन को छोड़े. यह हम स्वयं महसूस करते हैं कि व्यक्ति जब सेफ ज़ोन में होता है तो उसके द्वारा किये जा रहे प्रयास भी बहुत ठोस नहीं होते हैं. सफलता का उच्चतम पाने के लिए आवश्यक लगता है कि व्यक्ति रिस्क ज़ोन में रहे. रिस्क ज़ोन से सेफ ज़ोन में आने की तमन्ना ही व्यक्ति को कार्य करने को प्रेरित करती है और इसमें भी यदि उसके मन का काम हो तो सोने पर सुहागा वाली स्थिति होती है. 





 

18 मई 2022

अमृत महोत्सव कार्यक्रम और अध्यापन कार्य

आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रमों की एक विस्तृत श्रृंखला सरकारी स्तर पर जारी की गई है. इस कार्ययोजना में 09 अप्रैल 2022 से लेकर 29 अगस्त 2023 तक के कार्यक्रमों की सूची भी शासन स्तर से जारी की गई है. आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रमों के अंतर्गत महापुरुषों एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवन गाथाओं के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण दिवसों पर भी कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना है. एक वर्ष से अधिक की उक्त समयावधि में कुल 116 कार्यक्रमों का आयोजन उच्च शिक्षण संस्थानों में किया जाना है. देश से जुड़ी भावना के सन्दर्भ में इस तरह के आयोजनों का सतत रूप से होना अच्छी बात है. अपनी आजादी को याद करना, उस पर गौरवान्वित होना, स्वतंत्रता सेनानियों और महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करना आवश्यक भी है, ख़ुशी देने वाला है. यदि इसी ख़ुशी के सापेक्ष देखा जाये तो उक्त कार्यक्रमों की विस्तृत कार्ययोजना में बहुतायत समय इनके आयोजन में ही निकलने वाला है. 


सरकार एक तरफ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सुचारू क्रियान्वयन के लिए इस वर्ष ग्रीष्मावकाश को समाप्त करने का निर्णय सा ले चुकी है, दूसरी तरफ कार्यक्रमों की विस्तृत श्रृंखला जारी करके अध्यापन कार्य को ही बाधित करने जैसा कदम उठा रही है. आजादी का अमृत महोत्सव जैसी ख़ुशी और गर्व करने वाले आयोजन की सार्थकता उस समय और अधिक होती जबकि ये आयोजन माह में एक अथवा दो किये जाते. सामान्य रूप में भी एक कार्यक्रम करवाने में सभी तरह के संसाधनों को जुटाने और कार्यक्रम के समापन तक लगभग दो घंटे खर्च होते हैं. इसके साथ-साथ ऐसा तो होता नहीं है कि अकेले संयोजक और कुछ बच्चे ही इसमें शामिल हों. अनेक विद्यार्थी शामिल होते हैं, कई शिक्षक शामिल होते हैं. ऐसे में अनेक विषयों का अध्यापन कार्य प्रभावित होता है.


शासन को इस दिशा में पुनः विचार किया जाना चाहिए. नोडल अधिकारियों को सम्बंधित दिशा-निर्देश देते हुए एक माह में दो कार्यक्रमों के आयोजन की अनुमति देनी चाहिए. इससे एक तरफ आजादी का अमृत महोत्सव का आयोजन भी होता रहेगा, दूसरी तरफ अध्यापन कार्य भी चलता रहेगा. इसी में कार्यक्रम की सार्थकता भी है.




01 मई 2022

मौखिकी परीक्षा (वायवा) एक अनावश्यक प्रक्रिया

आज बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी के अंतर्गत आने वाले तमाम महाविद्यालयों में परास्नातक स्तर के विद्यार्थियों की मौखिकी परीक्षा सम्पन्न हुई. परास्नातक अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों की सामान्य परख ही इस मौखिकी परीक्षा में होने की, करने की सम्भावना बनती है. उनके ज्ञान से ज्यादा उनके प्रस्तुतीकरण को जाँचने का प्रयास किया जाता है. अपने अध्यापन के लम्बे समय में इस परीक्षा के दौरान विद्यार्थियों के ज्ञान में तो गिरावट देखने को मिली ही है, यह भी देखने को मिला है कि उनमें सामान्य शिष्टाचार भी जैसे समाप्त होता जा रहा है. मौखिकी परीक्षा के लिए आना, परीक्षकों के समक्ष अभिवादन, शिष्ट आचरण आदि जैसे कहीं लोप हो चुके हैं. ऐसा लगता है जैसे वे लोग अध्यापकों पर, परीक्षकों पर, महाविद्यालय पर किसी तरह का एहसान करने के लिए आये हुए हैं. 


कुछ साल पहले तक मौखिकी परीक्षा को रोक दिया गया था. हमें व्यक्तिगत स्तर पर वह निर्णय अत्यंत सुखद लगा था. ऐसा इसलिए क्योंकि विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या में एक बहुत सी छोटी संख्या होती है जो परीक्षकों को संतुष्ट करने का कार्य करती है, उनके पूछे प्रश्नों के सही उत्तर देती है. बहुतायत में तो स्थिति यह होती ही कि उनको हिन्दी साहित्य का काल-विभाजन भी नहीं पता, कालखंड अनुसार साहित्यकारों के नाम की जानकारी नहीं. इस पर भी विद्रूपता यह कि ऐसे विद्यार्थियों को भी अंक देना परीक्षकों की मजबूरी होती है. एक-एक विद्यार्थी के लिए कई-कई फोन, कई-कई सिफारिशें मेज पर अपनी उपस्थिति दर्शाती हैं.


विश्वविद्यालय स्तर पर बनी अनेक कमेटियों में मित्रों, परिचित सदस्यों से अनेक बार कहा भी है कि इस तरह की अनावश्यक व्यवस्था को बंद किया जाये या फिर इसे इस तरह से डिजाइन किया जाये कि विद्यार्थी इसके प्रति सक्रियता दिखाए. अपने ज्ञान को बढाए. जब तक इस मौखिकी परीक्षा में कोई ढाँचागत सुधार नहीं किया जायेगा तब तक सामने चुप्पी लगाये बैठे विद्यार्थी को भी उसके साथ चलकर आई सिफारिश के आधार पर अंक देने होंगे. उनको उत्तीर्ण करना होगा. यह सब शायद इसलिए भी सहज रूप में स्वीकार्य है क्योंकि हम सभी को भली-भांति जानकारी है कि वर्तमान दौर में परास्नातक करने के बाद भी किसी बच्चे का भविष्य निर्माण नहीं होने वाला.


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