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07 मार्च 2025

काग दही पर जान गँवायो

काग दही पर जान गँवायो वाक्य को लगभग सभी ने पढ़-सुन रखा होगा और इससे जुड़ी कहानी से भी लगभग सभी लोग परिचित होंगे. ऐसा जानने-समझने के बाद भी इस वाक्य से जुड़ी कहानी एक बार फिर आप सबके बीच रख दी जाए ताकि जिस-जिस को विस्मृत हो गई हो या फिर सही से याद न हो तो उसे पुनः स्मरण हो जाये.

 

इससे जुड़ी कहानी कुछ इस तरह से है कि एक बार एक कवि महोदय हलवाई की दुकान पहुँचे. वहाँ उन्होंने अपने खाने के लिए जलेबी और दही खरीदी और वहीं पड़ी मेज-कुर्सी पर बैठ कर खाने लगे. इस दौरान उन कवि महोदय ने गौर किया कि एक कौआ बहुत देर से दुकान से कुछ न कुछ खाने की जुगाड़ में थे. कई-कई बार की मेहनत के बाद भी उसे कुछ खाने को नहीं मिल पा रहा था क्योंकि हलवाई पूरी तत्परता से उसे भगा देता था. इसी बीच वो कौआ कहीं से जगह बनाने में सफल हो गया और वह दही की परात में चोंच मारकर उड़ गया. ये देखकर हलवाई को बहुत गुस्सा आया, उसने बगल में वजन तौलने वाला बाँट उठा कर उस कौए को दे मारा. कौए की किस्मत ख़राब थी सो वह बाँट सीधे उसे लगा और वो मर गया.

 

इस घटना को देख कवि हृदय द्रवित हो उठा. दही-जलेबी खाने के बाद कवि महोदय जब पानी पीने पहुँचे तो उन्होंने अपने हृदय की पीड़ा को वहीं बनी एक दीवार पर एक कोयले के टुकड़े से एक पंक्ति में लिख दिया-

‘काग दही पर जान गँवायो’

 



कवि महोदय तो अपना काम करके चले गए. उनके जाने के बाद वहाँ एक लिपिकीय कार्यों से सम्बंधित व्यक्ति आता है. वे महाशय अपनी नौकरी के दौरान कागजों में हेराफेरी करने के कारण निलम्बित हो गये थे. उस पानी की टंकी के पास पानी पीने के लिए आने पर उनको कवि महोदय की लिखी पंक्ति दिखाई दी. नजर पड़ते ही उनके मुँह से निकला कि बात तो सही है, बस शब्द लिखने में कुछ त्रुटि हो गई है. ऐसा मन में आते ही उन्होंने अपने मन के अनुसार कवि की लिखी पंक्ति में सुधार कर दिया. उन्होंने उस पंक्ति को कुछ इस तरह पढ़ते हुए सही कर दिया-

‘कागद ही पर जान गँवायो’

 

कवि और उस लिपिक टाइप वाले के जाने के बाद एक लड़का वहाँ आया. शक्ल-सूरत से वह आशिक टाइप, मजनू सरीखा समझ आ रहा था. चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रहीं थीं. ऐसा लग रहा था जैसे अपने प्रेम में हताश-निराश होकर कहीं से चला आ रहा है. पानी पीने के दौरान उसकी नजर भी उस पंक्ति पर पड़ी. पंक्ति पढ़ते ही उसे भी लगा कि कितनी सच्ची बात लिखी है, यदि उसे ये बात पहले पता चल जाती तो वो परेशान न होता. उसने उस पंक्ति को कुछ इस तरह से पढ़ा-

‘का गदही पर जान गँवायो

 

सीधा सा अर्थ है कि हम सभी लोग अपनी स्थिति, अपनी मनोदशा के अनुसार ही सामने वाली स्थिति, परिस्थिति का आकलन करते हैं. हमारी मानसिकता के चलते, कई बार पूर्वाग्रह के चलते वास्तविकता से दूर होकर किसी भी स्थिति को हम सभी अपने अनुसार देखते-समझते हैं. जबकि होना नहीं चाहिए ऐसा. हम सभी को किसी भी स्थिति, परिस्थिति, घटना आदि की वास्तविकता की जानकारी कर लेने के बाद अपना मंतव्य बनाना चाहिए, उस पर कोई फैसला लेना चाहिए.


19 अप्रैल 2019

नैतिकता भी रास्ता खोज रही है


राजनैतिक घोटालेबाजों का बेशर्मी से अपनी सफाई देते रहना; राजनैतिक हत्यारों का सीना तानकर समाज में घूमते रहना; रिश्तेदारों द्वारा रिश्तों की गरिमा को तार-तार करना, युवा पीढ़ी द्वारा आधुनिकता के वशीभूत नशे की गिरफ्त में चले जाना; एक पल में शानोशौकत, पद, प्रतिष्ठा पाने की चाहत में लोगों का अपराधों के दलदल में धँस जाना; महिलाओं, यहाँ तक कि छोटी-छोटी बच्चियों तक से बलात्कार की घटनाओं का लगातार सामने आना और भी बहुत सी घटनायें हैं, विकृतियाँ हैं जिन्हें देखने-सुनने के बाद लगता है जैसे समाज पूरी तरह से अपराध की दुनिया में समा गया है। किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था के द्वारा उसके अपराधी घोषित होने के बाद भी उसमें किसी तरह का भी अपराधबोध नहीं दिखाई देता है। उसके द्वारा एक अपराध करने के बाद, एक घोटाला करने के बाद पुनः दूसरे अपराध की ओर, दूसरे घोटाले की ओर मुड़ जाता है। इस तरह की पुनरावृत्ति दर्शाती है कि समाज से नैतिकता समाप्त होती जा रही है। 


अब सवाल यही उभरता है कि क्या वाकई ऐसा हो रहा है? क्या आज का समाज नैतिकता, संस्कार, सामाजिकता जैसी बातों पर विश्वास करता है? आज जिस तरह से चारों ओर पल भर में स्वविकास की होड़ लगी है, किसी भी तरह से उच्च से सर्वोच्च तक पहुँचने को हर प्रकार के हथकंडे प्रयोग में लाये जा रहे हैं, आपसी रिश्तों में भी स्वार्थपरकता पूरी तरह से हावी होती दिख रही है, आधुनिकता के नाम पर संस्कारों को, संस्कृति को एक प्रकार से तिलांजलि दी जा रही हो ऐसे में क्या नैतिकता की ओर कोई ध्यान भी देता होगा?

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो एक के बाद एक घोटाले सामने आते जा रहे हैं और सरकार से, घोटालेबाज मंत्री-नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दें; विपक्षी दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी नैतिकता को बनाये रखते हुए सहयोग प्रदान करें; प्रादेशिक स्तर पर देखें अथवा स्थानीय स्तर पर एक छोटे से छोटे कर्मचारी से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वो नैतिकता से अपने दायित्वों को पूर्ण करेगा। सभी को सभी से किसी न किसी प्रकार की नैतिकता की अपेक्षा रहती है पर स्वयं अपने स्तर पर नैतिकता भरे कदम नहीं उठाते हैं। ऐसे समय में जबकि समाज के प्रत्येक वर्ग से, प्रत्येक क्षेत्र से नैतिकता समाप्त सी होती दिख रही है तब हम सभी को ही मिलकर इस ओर कदम बढ़ाने की आवश्यता है। अपनी युवा पीढ़ी को समझाने की आवश्यकता है क्योंकि आने वाला समय इसी पीढ़ी का है और यदि हमारे समाज की भावी पीढ़ी ने नैतिकता के गूढ़ार्थ को समझ लिया तो जिस तरह का हताशा-निराशा का माहौल आज दिख रहा है सम्भव है कि वो न दिखे।

26 फ़रवरी 2018

भ्रष्टाचार-मुक्ति के लिए नैतिकता चाहिए


शिक्षा समाप्ति के बाद दिमाग में प्रशासनिक सेवा में जाने का कीड़ा कुलबुला रहा था. उसके साथ-साथ खुद को आर्थिक आधार पर खड़ा करने की सोच भी काम कर रही थी. नब्बे के दशक में बहुत सारी स्थितियाँ सहायक सिद्ध होती थीं तो बहुत सी स्थितियाँ विपरीत दिशा में काम करती थीं. उनकी सहायक और असहायक स्थितियों से जूझते हुए प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी के साथ-साथ अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियाँ चलती रहतीं. उरई जैसे छोटे शहर में प्रतियोगी परीक्षाओं का माहौल जिस तरह का था उसके अनुसार खुद को सक्षम बनाते हुए आगे बढ़ने की कोशिश चलती रहती. इसी कोशिश के कई प्रतियोगी परीक्षाओं में साक्षात्कार देने की स्थिति भी बनी, ये और बात है कि अंतिम रूप से सफलता उनमें किसी में भी न हाथ लगी.


ऐसी ही एक स्थिति उस समय बनी जबकि बैंकिंग भर्ती बोर्ड के अंतर्गत भारतीय स्टेट बैंक में सेवाएँ देने के लिए साक्षात्कार से सामना करना पड़ा. कई सारे सवालों-जवाबों के आदान-प्रदान के बीच उस साक्षात्कार लेने वाले बोर्ड के अध्यक्ष ने किसी बात पर कहा कि बैंक में कोई अवसर ही नहीं, कोई भ्रष्टाचार करेगा कैसे? उस समय उनकी बात पर सहमति भी व्यक्त की. बैंक को तत्कालीन स्थितियों में इस कारण भी हमको बहुत सहज नौकरी दिखती थी क्योंकि हमारे तीनों चाचा लोग भारतीय स्टेट बैंक में अपनी सेवाएँ दे रहे थे. उनका सहज तरीके से अपनी नौकरी करना, परिवार को समय देना और बाकी के उत्तरदायित्वों का निर्वहन भी सहजता से होता दिखता था. ये और बात है कि समय के साथ-साथ बैंक की नौकरी भी कष्टप्रद साबित होने लगी. बहरहाल, नब्बे के दशक के उस दौर में बैंक में किसी तरह के घोटाले की, भ्रष्टाचार की बात कोई सोचता नहीं था. हालाँकि इसी दौर में देश का सबसे बड़ा शेयर घोटाला हुआ था, जिसे बैंक के नियमों का फायदा उठाकर अंजाम दिया गया था तथापि इसमें भी बैंकों की कार्यप्रणाली पर संदेह नहीं किया गया था.

अभी पिछले दिनों पंजाब नेशनल बैंक और अब ओरिएंटल बैंक और कॉमर्स में 390 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है. कहा जा रहा है कि इसकी शिकायत लगभग छह महीने पहले ही की जा चुकी है मगर मामला अब दर्ज किया गया. फ़िलहाल इन घोटालों के पूर्व भी जबकि देश नोटबंदी जैसे कड़े सरकारी कदम से खुद को आगे बढ़ाने में लगा था तब कुछ बैंकों की कार्यप्रणाली ने, उनके अधिकारियों के रवैये ने ऐसा माहौल बनाया जिससे आम आदमी को विश्वास हो चला था कि बैंक भी घोटाले कर सकती हैं. नोटबंदी में जिस तरह से बैंकों और उनके अधिकारियों ने मिलीभगत से धन की अदला-बदली की उससे बैंक की निष्पक्ष कार्यप्रणाली पर से भरोसा उठने लगा था. इस उठते भरोसे को उस समय भी हवा मिली जबकि विजय माल्या करोड़ों का कर्ज लेकर देश से फरार हो गया. इसके बाद जैसे ही ये दो घोटाले सामने आये, आम जनमानस में धारणा बन गई कि बैंक और उनके अधिकारियों के सारे नियम-कानून आम आदमी के लिए हैं, सामान्यजन के लिए ही हैं. प्रभावशाली लोगों के लिए, रसूखदार लोगों के लिए बैंकों में भी किसी नियम का कोई मतलब नहीं है.

एक बात स्पष्ट है कि किसी भी संस्थान में तब तक कोई घोटाला, किसी भी तरह का भ्रष्टाचार नहीं हो सकता है जबकि उस सिस्टम में बैठा कोई जिम्मेवार स्वयं ही उसके लिए कोई कार्य न करे. बैंक से लोन का निकलना किसी विजय माल्या, किसी नीरव मोदी की हैसियत से बहुत बाहर की बात है. सरकारी नियमों, कायदों में कमियाँ निकालकर उसी कमी का फायदा दिलाने का काम वही व्यक्ति कर सकता है जो उस सम्बंधित सिस्टम से जुड़ा हुआ है. ऐसे में बैंक हों या फिर कोई भी संस्थान सभी में नियमों-कानूनों की अपनी स्थिति है मगर उसके बीच से सुराख़ खोजने का काम उसी के वर्तमान या पूर्व अधिकारी करते हैं. ऐसे में अपने उसी साक्षात्कार की घटना याद आती है तो लगता है कि संभव है कि नब्बे के दशक में जबकि औद्योगीकरण का दौर आरम्भ हुआ था, नई आर्थिक नीतियां अपना स्वरूप गढ़ने में लगी थीं, वैश्वीकरण की परिभाषा को नया लिबास पहनाया जा रहा था तब व्यक्ति में संस्कार, नैतिक मूल्य किसी न किसी रूप में जीवित बचे थे. आज पूर्ण रूप से खुद को आधुनिक और भौतिकवादी बनाने के साथ-साथ व्यक्तियों ने अपने-अपने नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देने का काम भी किया है. यही कारण है कि आज हमारे बीच के लोग ही हमको नकली खाद्य-सामग्री बेचते हैं, जहरीला दूध बच्चों को पिलाते हैं, बिना गुणों की औषधि से इलाज किया जा रहा है, हर तरफ नकली, मिलावटी सामानों की भरमार है.

ये अवगुण अचानक नहीं जन्मे हैं. इनके जन्मने में हमारे आसपास का वातावरण बहुत प्रभावी रहा है. पड़ोसी को आये दिन आर्थिक तरक्की करते देखकर, उसके मकान को बढ़ता देखकर, उसकी कारों का काफिला लम्बा होता देखकर दूसरा इन्सान भी उसी दिशा में कार्य करने लगता है. इसके लिए वो किसी भी कदम को उठाने से नहीं चूकता है. इसी भागमभाग में वह कब घोटालों, रिश्वत, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने लगता है उसे खुद पता नहीं चलता है. सीधी सी बात है, जब तक कि व्यक्ति स्वयं में नैतिक मूल्यों का विकास नहीं करता है तब तक समाज से किसी भी तरह के घोटाले, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी को दूर करना असंभव ही है. आने वाले समय में शायद ही कोई संस्था ऐसी शेष रहे जो भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, घोटालों की चपेट में न आये. वैसे समाज के हित में यही है भी. आखिर जब तक भ्रष्टाचार का पैमाना पूरी तरह से नहीं भरेगा, जब तक एक-एक आदमी भ्रष्ट नहीं हो जायेगा तब तक समाज से भ्रष्टाचार का खात्मा करना सहज, संभव नहीं.

15 जुलाई 2015

क्रिकेट अब सटोरियों का खेल


क्रिकेट का खेल अब धन का खेल बन चुका है, विवादों का, घोटालों का, भ्रष्टाचार का खेल बन चुका है. ऐसा कोई एक-दो उदाहरणों से नहीं वरन आये दिन होते नए-नए खुलासों से स्पष्ट होता रहा है. कभी क्रिकेट खेलने और देखने के परम शौकीनों में शामिल माने जाने वालों में हम भी रहे और एकाएक उस समय क्रिकेट से मोहभंग हुआ जब मैच फिक्सिंग का एक मामला अज़हरुद्दीन, हैंसी क्रोनिये आदि के रूप में सामने आया. तबसे क्रिकेट देखना पूरी तरह से बंद, हाँ, कभी-कभी खुद खेलने की दृष्टि से खेलते रहे. व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए वो खबर अपने आपमें भीतर तक हिला देने वाली थी. उसके मूल में ऐसा नहीं था कि हमारा किसी तरह का धन सम्बंधित मामले में लगा हुआ था या फिर हमारी संलिप्तता किसी भी रूप में उस मामले में थी. ऐसा होना इस कारण हुआ क्योंकि खेल को खेल की भावना का नाम देकर भी, भद्रजनों के खेल के रूप में परिभाषित खेल को भी खिलाड़ियों के द्वारा ही कलंकित किया गया था. भावनाएं इस कारण से भी आहत हुईं थी क्योंकि एक तरफ हम निस्वार्थ भाव से इन  खिलाड़ियों के पक्ष में चिल्लाते, नारे लगाते खेल को खेल की भावना से देखते, उसका आनंद उठाते, देश की जीत पर सारा आसमान सिर पर उठा लेते और हारने पर दुःख के सागर में गोते लगाने लगते और दूसरी तरफ ये खिलाड़ी बिना दर्शकों की, प्रशंसकों की भावनाओं का ख्याल रखे अपनी झोली भरने में लगे हुए थे. खेल के सहारे अपनी धनलोलुपता को पूरा करने की रही सही मानसिकता को आईपीएल ने पूरा कर दिया.
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अपने आरम्भ से ही आईपीएल में किसी न किसी तरह का विवाद सामने आता रहा है और अब पुनः आईपीएल विवादों के घेरे में है. टीमों को, खिलाड़ियों को, उनके मालिकों आदि को लेकर उठते विवादों के बीच हर बार सवाल यही आता है कि क्या इन खिलाड़ियों के लिए खेल से बढ़कर सिर्फ पैसा हो गया है? यदि ऐसा है तो ये कहीं न कहीं उन करोड़ों प्रशंसकों के साथ विश्वासघात है जो इन खिलाड़ियों को भगवान सा दर्ज़ा देते हैं; अपने समय, धन की परवाह न करते हुए इनकी हौसलाअफजाई करने में दिन-रात एक कर देते हैं. ये अपने आपमें आश्चर्य का विषय है कि समूचे विश्व में चंद देशों में खेले जाने वाले इस खेल में इतना धन आखिर आता कहाँ से है? भद्रजनों का खेल कहे जाने वाले इस खेल में सट्टेबाजी का खेल कब और कैसे शुरू हो गया? देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ी किस लालच में सट्टेबाजों के हाथों में खेलने लगे? किसी भी मैच में मैदान में अपना पसीना बहाकर जीत-हार तय करने वाले खिलाड़ियों का स्थान कब बुकियों ने ले लिया? इन सबके बीच मालामाल खिलाड़ी होने लगे, बुकी होने लगे, सट्टेबाज़ होने लगे खाली हाथ रहे तो बस वे दर्शक जो नितांत निस्वार्थ भाव से चिल्लाते हुए, शोर मचाते हुए मैच देखने में मगन रहे. हालाँकि मैच फिक्सिंग का मामला उस समय सामने आया था जबकि आईपीएल का कहीं नामोनिशान भी नहीं था तथापि क्रिकेट के इस संस्करण ने मैच फिक्सिंग के बजाय सट्टेबाजी को उभारने में अपनी भूमिका निभाई है.
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ऐसे में जबकि संभ्रांत माने जाने वाले खेल में अब विवादों का, सट्टेबाजी का साया पूरी तरह से स्पष्ट दिखने लगा है, तब क्रिकेट प्रशंसकों की अपेक्षा यही होनी चाहिए कि दोषियों पर कठोर कार्यवाही हो. ये भी किसी बड़े अपराध से कम नहीं है कि खिलाड़ी, टीम प्रबंधक सट्टेबाजों से मिलकर खेल में अपना खेल चालू रखते हुए दर्शकों की, प्रशंसकों की भावनाओं से खिलवाड़ करें. ये और बात है कि इतने विवादों के बाद भी, आईपीएल जैसे संस्करण को देश में लाने वाले ललित मोदी के विवादित होने के बाद भी, कई-कई खिलाड़ियों की संलिप्तता के बाद भी, टीम-प्रबंधकों की मिलीभगत के बाद भी दर्शकों, क्रिकेट प्रशंसकों के सिर से इसका बुखार उतरा नहीं है. वे अभी भी खिलाड़ियों को भगवान मानकर उन्हें सर्वोच्च स्थान दिए हैं, वे अभी भी मैच को लेकर अपनी दीवानगी की हद तक जाने को तैयार रहते हैं, वे अभी भी अपने समय-धन का अपव्यय करके सट्टेबाजों द्वारा निर्धारित खेल का हिस्सा बनने को तैयार रहते हैं. बावजूद इसके संजय मांजरेकर की टिप्पणी कि ‘क्रिकेट में प्रशंसकों का भरोसा कायम रखने के लिए जो कुछ किये जाने की जरूरत हो वो किया जाना चाहिए’ और पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी का कहना कि ‘जस्टिस मुदगल कमेटी के निष्कर्षों के बाद लोढ़ा कमेटी ताज़ा हवा का झोंका है’ अपने आपमें क्रिकेट के, आईपीएल के अंधकारमय, दुर्भाग्यपूर्ण, निराशाजनक माहौल में एक तरह की आश्वस्ति सी जगाते हैं. शायद क्रिकेट और क्रिकेट के तमाम संस्करण, खिलाडी, टीम प्रबंधन सट्टेबाजों के हाथों की कठपुतली बनने से बच कर प्रशंसकों में नए उत्साह का संचार कर सकें.

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13 नवंबर 2014

नैतिक शिक्षाविहीन व्यवस्था में नैतिकता की उम्मीद बेमानी है



शायद सामाजिक स्थिति वर्तमान में समझने-समझाने वाली मुद्रा से अनियंत्रित होकर सिर्फ देखते रहने की हालत में आ गई है. आधुनिकता के, नई सदी के, इक्कीसवीं सदी के नाम पर बनाये गए विभिन्न वैभवशाली विशेषणों के मध्य संस्कार, संस्कृति, सदाचार, नैतिकता आदि का लगातार पतन देखने को मिल रहा है. सब तरफ सिर्फ देह, हर ओर सिर्फ सेक्स, जिसे देखो वो उन्मुक्त, जिसका व्यवहार देखो वो उन्मादित, ऐसा लग रहा है जैसे समाज अब संबंधों, रिश्तों की मर्यादा पर नहीं वरन खुलेपन की अवधारणा पर विकास कर रहा है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य बनते शारीरिक सम्बन्ध, विवाहपूर्व और विवाहेतर शारीरिक सम्बन्ध, अनेक स्त्री-पुरुषों के सेक्स सम्बन्ध, मासूम बच्चियों से लेकर वृद्ध महिलाओं तक से दुराचार, स्वस्थ महिला से लेकर बीमार-असहाय महिलाओं तक को हवस का शिकार बनाया जाना आदि सामाजिक विकृति को ही दर्शाता है.
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युवा वर्ग पूरी तरह से स्वतंत्रता पाने को लालायित है, अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति, भले ही किसी भी तरह से हो, किसी भी तरह की हो, को करने के लिए उत्साहित है, पुरानी पीढ़ी संस्कारों को ढोते रहने को विवश है, युवाओं को सीख देने के लिए प्रतिबद्ध है किन्तु सब के सब संज्ञाशून्य से कार्य करने में लगे हैं. युवा अपने प्रेम करने को जन्मसिद्ध अधिकार समझ कर प्रेमालाप में ‘किस ऑफ़ लव’ सरीखा आयोजन करने में मस्त हैं और उनकी पूर्वापर पीढ़ी कुढ़ते-कुढ़ते सामाजिक, नैतिक पतन की चर्चा करके अपनी खीझ निकालने में व्यस्त है. नैतिकता की बात करने के पूर्व इस बात पर भी गौर करना होगा कि आखिर नैतिकता आये कहाँ से? नैतिक शिक्षा कोई उद्योग जगत द्वारा निर्मित उत्पाद नहीं है, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा बनाया जाने वाला मल्टीनेशनल उत्पाद भी नहीं है कि जिसे आयात करवा लिया जाये, देशी-विदेशी कंपनियों से बहुतायत में उत्पादित करवा लिया जाये. नैतिकता एक तरह का व्यवहार है जो शिक्षा के द्वारा, घर-परिवार के संस्कारों से, आपसी सद्भाव आदि से नैसर्गिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती है. आज विद्यालयों, महाविद्यालयों से नैतिक शिक्षा नाम का कोई भी विषय, कोई भी पाठ्येतर कार्य संपन्न नहीं करवाया जा रहा है. ऐसे में नैतिक शिक्षाविहीन पीढ़ी से किस तरह की नैतिकता की उम्मीद की जा सकती है?
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परिवारों को, माता-पिता को, बुजुर्गों को भी नैतिक शिक्षा प्रदान किये जाने का माध्यम समझा जाता रहा है किन्तु वर्तमान में इन माध्यमों को भी हाशिये पर लगा दिया गया है. आधुनिक माता-पिता आर्थिक चक्र में फँसकर दिन-रात मशीन बने घूम रहे हैं, जिन्हें भौतिकता की चाह ज्यादा है बजाय इस बात को जानने के कि उनके नौनिहाल कौन से और कैसे गुल खिला रहे हैं. बुजुर्गों की स्थिति बहुतायत परिवारों में आउटडेटेड सामान की भांति कर दी गई है, जिनकी बातों को, सीख को नई पीढ़ी न तो सुनना ही चाह रही है और न ही उन पर अमल करना चाह रही है. ऐसे में नैतिकता का प्रवाह बने तो कहाँ से और किसके द्वारा.
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वर्तमान में हालात यह हैं कि संस्कारों, संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान, परिवेश आदि के बारे में जानकारी देने के लिए हर हाथ में मोबाइल है, हर हाथ में इंटरनेट है. जहाँ युवा, किशोर, बच्चे आदि अपने मन की शिक्षा भली-भांति ले रहे हैं. और यही कारण है कि जिस उम्र में शैक्षिक ज्ञानार्जन किया जाना चाहिए उस उम्र में बच्चे दैहिक-कुंड में गोते लगा रहे हैं; कम उम्र में लड़कियाँ गर्भपात करवाते देखी जा रही हैं; गोपन को अगोपन बनाकर सबकुछ खुलेआम करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है; किताबें-खिलौने थामने वाले हाथ बीयर की बोतलें, शराब के जाम, जलती सिगरेट, तीव्र गति से भागती बाइक-कार, विपरीतलिंगी साथी का हाथ थामे मस्ती में भटक रहे हैं. ऐसे हालातों पर चिंतन नहीं सिर्फ चिंता हो रही है. नैतिक शिक्षाविहीन प्रणाली में नैतिकता की उम्मीद की जा रही है जो सर्वथा गलत, भ्रमपूर्ण है. बिना नैतिक शिक्षा के नैतिकता की उम्मीद करना बच्चों, किशोरों, युवाओं पर ज़ुल्म ढाना ही होगा.  
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