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26 दिसंबर 2022

रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण से बढ़ेगी आर्थिक शक्ति

पिछले दिनों भारतीय आर्थिक क्षेत्र में दो उल्लेखनीय घटनाओं का उद्भव हुआ. एक तो केंद्र सरकार द्वारा व्‍यापार नीति के तहत निर्यात संवर्धन योजनाओं के लिए अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार निकायों को भारतीय रुपए में लेन-देन की अनुमति देना रहा है. दूसरी घटना भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा डिजिटल रुपये की पेशकश के लिए पहली पायलट परियोजना दिसम्बर माह में मुंबई, नई दिल्ली, बेंगलुरु और भुवनेश्वर में शुरू करना रही. इन दो घटनाओं से भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक सुधार आने की सम्भावना देखी जा रही है. अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार में रुपये का लेन-देन होने से जहाँ भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलेगी वहीं डिजिटल रुपये के आने से लेन-देन सहज हो सकेगा. एक अनुमान के अनुसार विदेशी व्यापार भुगतान में औसतन छह प्रतिशत तक शुल्क लगता है. डिजिटल मुद्रा आने से, भारतीय रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण होने से इस शुल्क में कमी आएगी. 


अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार निकायों को भारतीय रुपए में लेन-देन की अनुमति देने का उद्देश्य घरेलू मुद्रा में व्यापार को सुगम बनाना और बढ़ावा देना है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि भारतीय रुपये के अंतरराष्‍ट्रीयकरण करने की रुचि में वृद्धि को देखते हुए रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के निपटाने को मंजूरी देने का फैसला लिया गया है. इससे आयात और निर्यात के बारे में इनवॉयस तैयार करने, भुगतान और निपटान भारतीय रुपए में किया जा सकेगा. वर्तमान में आयात के मामले में भारतीय कंपनी को विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है. मुख्य रूप से यह डॉलर में होता है किन्तु कभी-कभी यह पाउंड, यूरो या येन में भी हो सकता है. निर्यात के मामले में भी भारतीय कंपनी को विदेशी मुद्रा में भुगतान किया जाता है. बाद में कंपनी उस विदेशी मुद्रा को रुपये में बदल देती है क्योंकि उसे अपनी आवश्यकताओं के लिए रुपये की आवश्यकता होती है.




भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मान्यता दिलवाने के साथ-साथ डॉलर की अघोषित सत्ता को, उस पर बनी निर्भरता को भी समाप्त करना इसका उद्देश्य हो सकता है. यदि बीते माह को दृष्टिगत रखते हुए बाजार की स्थिति देखें तो कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, डॉलर की कमजोरी और निरंतर विदेशी फंड प्रवाह के बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट देखने को मिल रही थी. इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर जिस तरह से पाबन्दी लगाई है, उसके बाद वैश्विक व्यापार जगत में अनेक देशों ने उसकी मंशा को भाँप लिया है. बहुतायत देशों को लगने लगा है कि इस तरह के कदम के बाद बहुत ज्यादा समय तक वैश्विक स्तर पर व्यापार के लिए डॉलर पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है. भारत तो बहुत पहले से डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती स्थिति की समस्या से जूझ रहा है. इसी कारण से भारतीय रिजर्व बैंक भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रुपये में विदेशी कारोबार को बढ़ावा देना चाहता है. बैंक ने जुलाई को एक सर्कुलर जारी करके कहा था कि उसने आईएनआर में चालान, भुगतान और निर्यात/आयात के निपटान के लिए एक अतिरिक्त व्यवस्था करने का फैसला किया है. रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय ने बैंकों और कारोबारियों के संगठनों के प्रतिनिधियों से रुपये में आयात-निर्यात लेनदेन को बढ़ावा देने को कहा था. डिजिटल मुद्रा के आने के बाद रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना सुगम हो सकता है.


भारतीय रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण होने से निकट भविष्य में डॉलर की तरह पूरी तरह से रुपये में कारोबार करना संभव हो जाएगा. इसके लिए किसी भी देश के साथ व्यापार लेनदेन का निपटान करने के लिए भारत में बैंक व्यापार के लिए भागीदार देश के कॉरेस्पॉन्डेंट बैंक/बैंकों के वोस्ट्रो खाते खोलेंगे. भारतीय आयातक इन खातों में अपने आयात के लिए भारतीय रुपये में भुगतान कर सकते हैं. आयात से होने वाली इन आय का उपयोग भारतीय निर्यातकों को भारतीय रुपये में भुगतान करने के लिए किया जा सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक से रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार किये जाने की अनुमति मिलने के बाद नई दिल्ली में विशेष ‘वोस्ट्रो खाते’ खोले गए, जिससे विदेश में रुपये में कारोबार संभव हो सकेगा. रूस के दो सबसे बड़े बैंक स्बरबैंक और वीटीबी बैंक ऐसे पहले बैंक हैं जिन्हें रुपये में कारोबार करने की मंजूरी मिली है. वर्तमान में रूस के नौ बैंकों ने रुपये में कारोबार करने के लिए विशेष वोस्ट्रो खाते खोल दिए हैं. वोस्ट्रो खाता एक ऐसा खाता है जो एक कॉरेस्पॉन्डेंट बैंक दूसरे बैंक की ओर से रखता है.


यदि वैश्विक बाजार का आकलन करें तो ज्ञात होता है कि डॉलर का वैश्विक विदेशी मुद्रा कारोबार में लगभग 88% हिस्सा है. यूरो, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग का स्थान डॉलर के बाद ही आता है. भारतीय रुपए की हिस्सेदारी लगभग दो प्रतिशत के आसपास है. चूँकि डॉलर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मान्यता मिली हुई है, ऐसे में विशेषाधिकारों की सीमा-रेखा में होने वाले भुगतान संतुलन संकट से वह अमेरिका को एक तरह की मौद्रिक सुरक्षा देता है. रुपये के अंतरराष्ट्रीय कारोबार का हिस्सा बनने से विदेशी लेन-देन में रुपए का उपयोग भारतीय व्यापार के लिये मुद्रा जोखिम को कम करेगा. डॉलर पर निर्भरता कम होने से मुद्रा की अस्थिरता जैसे संकट का सामना भी कम करना पड़ेगा. ऐसा होने से व्यापारिक सुरक्षा बनी रहेगी. एक तरफ जहाँ व्यापार की लागतों पर नियंत्रण रहेगा, वहीं व्यापार का बेहतर विकास भी संभव हो सकेगा.


इसके साथ ही सरकार की एक निश्चित सीमा तक विदेशी मुद्रा भंडार रखने की अनिवार्यता में भी बहुत हद तक कमी आएगी. वर्तमान में मुख्य रूप से डॉलर में अंतरराष्ट्रीय कारोबार होने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में डॉलर को जमा करके रखना होता है. यदि भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए बहुसंख्यक देशों द्वारा मान्यता मिल जाती है तो डॉलर पर बनी निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा भंडार जमा रखने की स्थिति से मुक्ति मिलेगी. विदेशी मुद्रा पर निर्भरता को कम होने से भारतीय व्यापार बाहरी जोखिमों से बच सकेगा. मुद्रा जोखिम के कम होने से पूंजी प्रवाह के उत्क्रमण को काफी हद तक कम किया जा सकेगा. इससे भारतीय व्यापार की सौदेबाज़ी की शक्ति भारतीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने, उसके वैश्विक कद और सम्मान को बढ़ाने में सहायक होगी.





 

18 दिसंबर 2022

भारतीय अर्थव्यवस्था में डिजिटल मुद्रा की आहट

छह वर्ष पूर्व नोटबंदी की घोषणा के समय से मुद्रा के डिजिटल संस्करण पर देशव्यापी चर्चा होने लगी थी. उस घोषणा के साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा डिजिटल लेन-देन करने पर विशेष जोर दिया गया था. डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर उस समय आशंका भी व्यक्त की गई थी, जो तत्कालीन स्थितियों में गलत भी नहीं कही जा सकती है. समय गुजरने के साथ आज स्थिति यह है कि खोमचे वाले, ठेले वाले, रेहढ़ी वाले भी डिजिटल माध्यम से लेन-देन कर रहे हैं. नोटबंदी के काफी पहले से बाजार में क्रिप्टोकरेंसी का दबदबा दिखाई दे रहा था. इसे असुरक्षित भी माना जाता है. ऐसे में सरकार के सामने एक तरह का अप्रत्यक्ष दवाब था कि ऐसी डिजिटल मुद्रा का सञ्चालन किया जाये जो सुरक्षित हो और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हो. ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा डिजिटल रुपये की पेशकश के लिए पहली पायलट परियोजना दिसम्बर माह में मुंबई, नई दिल्ली, बेंगलुरु और भुवनेश्वर में शुरू की गई है. आर्थिक क्षेत्र में इसे एक बड़ा कदम कहा जायेगा.


डिजिटल मुद्रा का लेन-देन चार बैंकों- भारतीय स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, यस बैंक और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक- की ओर से उपलब्ध एप्स, मोबाइल फोन और डिवाइस में बने डिजिटल वॉलेट के द्वारा किया जा सकेगा. इसे आसानी से मोबाइल फोन से एकदूसरे को भेजा जा सकेगा और और हर तरह के सामान खरीदे जा सकेंगे. इस डिजिटल मुद्रा को पूरी तरह से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा संचालित, नियंत्रित किया जायेगा.




देश की डिजिटल मुद्रा को सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी अर्थात सीबीडीसी के नाम से जाना जायेगा. यह एक डिजिटल टोकन के रूप में जारी होगा और एक लीगल टेंडर होगा अर्थात इसे कानूनी मुद्रा माना जाएगा. जिस मूल्य पर वर्तमान में नकद मुद्रा (नोट) और सिक्के जारी होते हैं, डिजिटल मुद्रा को भी उसी मूल्य पर जारी किया जायेगा. यदि आसान शब्दों में कहें तो डिजिटल मुद्रा या फिर सीबीडीसी नकद रुपये का इलेक्ट्रॉनिक रूप है. जिस तरह से नकद मुद्रा के द्वारा लेन-देन किया जाता है, उसी तरह से डिजिटल करेंसी के माध्यम से लेन-देन किया जा सकेगा.


देश में डिजिटल मुद्रा आने के बहुत पहले से लोग यूपीआई के माध्यम से भुगतान कर रहे हैं. ऐसे में प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि डिजिटल करेंसी और यूपीआई के माध्यम से भुगतान में क्या अंतर है? यहाँ एक बात का ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि यूपीआई के माध्यम से जो भुगतान किया जाता है वह सीधे बैंक खाते से बैंक खाते को ट्रांसफर होता है. तमाम सारे यूपीआई एप्स को अलग-अलग बैंक नियंत्रित करते हैं. उन पर रिजर्व बैंक की निगरानी नहीं होती है जबकि डिजिटल मुद्रा का लेन-देन सीधे रिजर्व बैंक की निगरानी में होगा. इसके अलावा यूपीआई से होने वाले लेन-देन में एक व्यक्ति बैंक को निर्देशित करता है कि उसके खाते में जमा राशि से वास्तविक रुपये का भुगतान किया जाये. इस प्रक्रिया को पूरा होने में कई बार कुछ मिनट से लेकर दो दिन तक लग जाते हैं. स्पष्ट है कि भुगतान तत्काल न होकर एक प्रक्रिया के अंतर्गत होता है, जो समय ले सकता है. इसके उलट डिजिटल मुद्रा में भुगतान करते ही सामने वाले को उसकी रकम मिल जाती है. वर्तमान में होने वाला डिजिटल लेन-देन किसी बैंक के खाते में जमा रुपये का ट्रांसफर होता है जबकि सीबीडीसी को नकद मुद्रा की जगह उपयोग में लाया जाएगा.


डिजिटल मुद्रा के चलन में आने से सरकार उस खर्च को बचा सकेगी जो नकद मुद्रा छापने में आता है. सरकार इसकी निगरानी कर सकेगी, जो किसी भी रूप में नकद मुद्रा पर नहीं है. इसके अलावा रिजर्व बैंक के हाथों में नियंत्रण होने से बाजार में उसकी तरलता को भी नियंत्रित किया जा सकेगा. इसके आने के बाद बहुत हद तक भ्रष्टाचार, नकली मुद्रा, काले धन की समस्या पर भी अंकुश लग सकेगा. नागरिक अपने धन को जमा करने और निकालने की परेशानियों से भी बच सकेंगे क्योंकि डिजिटल मुद्रा का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक रूप से किया जाएगा. नकदी से ज्यादा सुरक्षित होने के कारण लोग धन की सुरक्षा को लेकर भी चिंता-मुक्त हो सकेंगे.


डिजिटल मुद्रा एक तरह से बहुत पहले से चलन में रही बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी वाली अवधारणा है. यह उसी तरह से कार्य भी करेगी, बस मूल अंतर ये होगा कि क्रिप्टोकरेंसी का नियंत्रण निजी हाथों से होता है, इससे इसकी मॉनिटरिंग नहीं हो पाती. इसमें गुमनाम रहकर भी लेन-देन हो जाते हैं, जिससे गैरकानूनी गतिविधियों में क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल होने की आशंका रहती है. इसके उलट डिजिटल मुद्रा का सञ्चालन, नियंत्रण रिजर्व बैंक के द्वारा किया जा रहा है. इससे डिजिटल रुपये की निगरानी हो सकेगी और किसके पास कितने रुपये हैं, इसकी जानकारी भी रिजर्व बैंक को होगी. सरकारी नियंत्रण में होने के कारण हमारे देश का एक रुपये का सिक्का और डिजिटल रुपया एकसमान ताकत रखता है. इसके साथ ही एक बड़ा अंतर यह भी है कि डिजिटल रुपये को क्रिप्टोकरेंसी की तरह खरीदा या बेचा नहीं जा सकेगा बल्कि यह नकद के विकल्प के रूप में काम करेगा.


वर्तमान युग तकनीक का है, जहाँ कदम-कदम पर खुद को भी तथा लगभग सभी क्षेत्रों को अपडेट होते रहने की आवश्यकता है. ऐसे दौर में जबकि अर्थव्यवस्था वैश्विक समुदाय के साथ गति पकड़ने की स्थिति में है, तब इस क्षेत्र में भी व्यापक सुधार अपेक्षित हैं. इन्हीं सुधारों के लिए उठाये जाने वाले तमाम क़दमों में से एक कदम डिजिटल मुद्रा का भी है. आज जबकि डिजिटल भुगतान को लगभग सभी जगह होते देखा जा रहा है, तब सरकारी नियंत्रण से संचालित डिजिटल मुद्रा निश्चित ही भारतीय अर्थव्यवस्था में अपेक्षित सुधार लाएगी.  





 

09 दिसंबर 2022

रेपो रेट और भारतीय अर्थव्यवस्था

भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के फैसलों की घोषणा की गई. इस समिति ने इस बार भी मँहगाई को नियंत्रित करने के लिए रेपो रेट को बढ़ाने का फैसला किया है. मौद्रिक नीति समिति ने अपनी बैठक में तरलता समायोजन सुविधा अर्थात लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (एलएएफ) के अन्तर्गत रेपो रेट को 35 आधार अंक या 0.35 प्रतिशत बढ़ाने का निर्णय लिया. समिति के छह सदस्यों में से पाँच सदस्यों ने रेपो रेट बढ़ाने के फैसले का समर्थन किया. इस बढ़ोतरी को मिला कर देखा जाये तो पिछले सात महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से ब्याज दरों में पाँचवीं बार वृद्धि की गई है. बैंक ने इससे पूर्व मई में 0.40 प्रतिशत जून, अगस्त और सितंबर में 0.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी. इस वृद्धि के बाद अब रिजर्व बैंक की रेपो रेट 5.4 प्रतिशत से बढ़कर 6.25 प्रतिशत हो गई है.


रेपो रेट को बढ़ाने का निर्णय अचानक से नहीं लिया गया. जब सितम्बर माह में चौथी बार रेपो रेट में बढ़ोत्तरी की गई थी, उसी समय रिजर्व बैंक गवर्नर ने संकेत दिए थे कि यदि मँहगाई पर नियंत्रण न लगा तो आने वाले समय में रेपो रेट को बढ़ाया जा सकता है. इस बार तीन दिनों तक मौद्रिक नीति समिति की बैठक चलने के बाद रेपो रेट को बढ़ाने का फैसला किया गया. इस बढ़ोत्तरी की घोषणा करते हुए रिजर्व बैंक गवर्नर ने कहा कि अगले चार महीनों में मँहगाई दर चार प्रतिशत से ऊपर बने रहने की संभावना है. उन्होंने यह भी कहा है कि देश में ग्रामीण माँग में सुधार दिख रहा है. कंज्यूमर कॉन्फिडेंस में भी सुधार हुआ है. गवर्नर के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023 में जीडीपी ग्रोथ 6.8 प्रतिशत रह सकता है.




भारतीय अर्थव्यवस्था में रेपो रेट शब्द अब आम होता जा रहा है. सात महीनों में पाँच बार इसमें वृद्धि से आम आदमी भले ही इस शब्द से परिचित हो गया हो मगर वह इसकी कार्य-प्रणाली से, इसके वास्तविक सन्दर्भों से अपरिचित ही है. सामान्यजन के लिए अक्सर यह समझना कठिन हो जाता है कि रेपो रेट के बढ़ने या घटने से आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ता है. रेपो रेट के द्वारा किस तरह से मँहगाई को नियंत्रित किया जा सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक एक विशिष्ट दर पर वाणिज्यिक बैंकों को धन उधार देता है. इसी के आधार पर बैंकों द्वारा उपभोक्ताओं को ब्याज दर का निर्धारण किया जाता है. यदि आसान शब्दों में कहें तो रेपो रेट का मतलब है रिजर्व बैंक द्वारा अन्य बैंकों को दिए जाने वाले कर्ज की दर. बैंकों द्वारा अपने उपभोक्ताओं को देने के लिए, अन्य वित्तीय कार्यों के निष्पादन हेतु भारतीय रिजर्व बैंक से एक तरह का ऋण लिया जाता है. रिजर्व बैंक एक निश्चित रेट पर या कहें कि दर पर अन्य बैंकों को ऋण उपलब्ध कराती है. उसी को रेपो रेट कहा जाता है. बाद में बैंक इसी रेट पर अपने ग्राहकों को ऋण प्रदान करते हैं. रेपो रेट अधिक होने से ग्राहकों को अधिक ब्याज दर पर ऋण मिलता है जबकि रेपो रेट कम होने पर बैंक अपने ऋण पर ग्राहकों से कम ब्याज दर वसूल करते हैं. रेपो रेट का निर्धारण मौद्रिक नीति समिति की दो मासिक बैठक में किया जाता है.


यहाँ यह जानना आवश्यक है कि भारतीय रिजर्व बैंक सभी वाणिज्यिक बैंकों को ऋण नहीं देता है. उसके द्वारा सबसे पहले वाणिज्यिक बैंकों की प्रतिभूतियों और बांडों का सत्यापन किया जाता है. इसके पश्चात् ही रिजर्व बैंक द्वारा ऋण देने की प्रक्रिया शुरू की जाती है. जब तक वाणिज्यिक बैंकों द्वारा उधार ली गई राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तब तक ये प्रतिभूतियाँ अथवा बांड रिजर्व बैंक के पास बंधक रहते हैं. किसी कारण से यदि वाणिज्यिक बैंक ऋण को नहीं चुका पाता है तो रिजर्व बैंक को उन प्रतिभूतियों को बेचने का अधिकार होता है.


देखा जाये तो रेपो रेट देश के आर्थिक विकास के लिए एक आवश्यक उपकरण होता है. देश की मुद्रास्फीति पर भी यह महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है. इसके माध्यम से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति और तरलता को भी नियंत्रित करने में सहायता मिलती है. रेपो रेट अधिक होने की स्थिति में बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से उधार लेने की लागत मँहगी हो जाती है. ऐसी स्थिति अर्थव्यवस्था में निवेश और मुद्रा आपूर्ति को धीमा कर देती है. परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना सहज हो जाता है. ऐसे कदम से मँहगाई को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है. यही कारण है कि विगत सात माह में रिजर्व बैंक द्वारा पाँच बार रेपो रेट को बढ़ाया गया है.


रेपो रेट समग्र अर्थव्यवस्था पर कई तरह के प्रभावों का कारण बन सकता है चाहे वह बैंकिंग क्षेत्र पर प्रभाव हो, औसत नागरिक पर प्रभाव हो या भारतीय अर्थव्यवस्था अन्य बिन्दुओं पर प्रभाव हो. किसी भी तरह की मौद्रिक नीतियों में परिवर्तन से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाला महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बैंकिंग का होता है. यह बैंकों के लिए एक बड़ी राहत की खबर होती है जब रिजर्व बैंक रेपो रेट को कम करने का फैसला करता है. रेपो रेट कम होने के कारण वाणिज्यिक बैंक रिजर्व बैंक से कम दर पर उधार ले सकते हैं. इसके ठीक उलट स्थिति रेपो रेट बढ़ने पर होती है. रेपो रेट के बढ़ने या फिर घटने का सीधा प्रभाव उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है. इसके द्वारा गृह ऋणव्यवसाय ऋण और अन्य ऋण दर परिवर्तन पर प्रभाव पड़ता है. ऐसा होने से मुद्रा प्रवाह में स्थिरता या कमी आती है. इसके द्वारा बहुत हद तक मँहगाई को नियंत्रित किया जा सकता है.


रिजर्व बैंक द्वारा बढ़ाये जाने वाले रेपो रेट से मँहगे बैंक ऋण उधारकर्ता को ऋण लेने से हतोत्साहित करते हैं. यह बाजार में धन की आपूर्ति को कम करता है और इस प्रकार प्रणाली में तरलता को स्थिर करता है. यह भले ही खपत, विस्तार और उत्पादन में कम पैसे की आपूर्ति के साथ एक गिरावट है किन्तु इसके द्वारा रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रण में रखने के लिए आर्थिक विकास और बढ़ती मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है. बाजार में तरलता में कमी आने पर, मुद्रा की गति कम रहने पर, नकदी का प्रवाह कम रहने के कारण लोगों की क्रय शक्ति पर भी प्रभाव पड़ता है. इसके द्वारा भी मँहगाई को नियंत्रित किया जा सकता है. संभव है कि प्रथम दृष्टया रेपो रेट के बढ़ने से ब्याज दरों में बढ़ना अर्थव्यवस्था के लिए, आम आदमी के लिए अहितकर लगे किन्तु दीर्घकालिक स्थिति से निपटने के लिए यह सर्वाधिक अनुकूल कदम कहा जाता है.