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07 मार्च 2026

साधू-संन्यासी और लम्बे काले बाल

कई बार अचानक से मन में कोई विचार उत्पन्न होता है और उस बारे में आसपास खोजबीन करने की इच्छा होने लगती है.


इस बारे में बहुत समय से गौर किया जा रहा था कि जो साधु-संन्यासी-संत आदि होते हैं, उनके सिर पर भरपूर बाल दिखाई पड़ते हैं. जिन्होंने स्वतः ही मुंडन करा रखा है, उनकी बात अलग अन्यथा की स्थिति में साधु-संन्यासी-संत आदि को गंजे वाली स्थिति में, कम बालों वाली स्थिति में नहीं ही देखा है. लगा, ऐसा तो नहीं कि हम लोगों ने अपना रहन-सहन, जीवन-शैली आदि इस तरह की कर ली है कि शैम्पू, क्रीम, तेल आदि का आधुनिक रूप, रासायनिक रूप प्रयोग में लाने लगे हैं?


जो भी हो मगर कुछ तो है जो आधुनिक युवाओं को कम समय में ही गंजा किये जा रहा है और ये बाबा लोग घनघोर बालों के साथ दिख रहे हैं.

25 जुलाई 2023

खुद का जीवन खुद से जिएँ

जीवन को लेकर जिस तरह से बहुत सारे विद्वानों, दार्शनिकों आदि ने अपने-अपने विचार रखे हैं, देखा जाये तो वे जीवन के प्रति दृष्टि को सुलझाने से ज्यादा उलझाते ही हैं. उनके विचारों को पढ़ने-सुनने पर प्रतीत होता है कि जीवन को सिरे से नकारते हुए आगे बढ़ना है. जीवन के सुख-दुःख से नितांत परे होकर बस आगे ही आगे बढ़ते जाना है. संभव है कि उनका अपना अनुभव ऐसा रहा हो जहाँ निरपेक्ष भाव से आगे चलते रहने में ही जीवन का वास्तविक आधार हो.




ऐसे दार्शनिकों, विचारकों, विद्वानों के विचारों से किसी भी तरह का तर्क-वितर्क न करते हुए सभी को अपने अनुभवों के आधार पर ही जीवन को जीते रहने का प्रयास करना चाहिए. यहाँ ऐसा इसलिए कहना हो रहा है क्योंकि समाज में एक-एक व्यक्ति अपने आपमें नितांत व्यक्तिगत इकाई है. एक माता-पिता की सभी संतानें भी गुणों के, चरित्र के, व्यवहार के आधार पर एक जैसी नहीं होती. उनके बीच भी तमाम असमानताएँ स्पष्ट रूप से देखने को मिलती हैं. उनके अपने-अपने जीवन के अपने-अपने अनुभव होते हैं. बहुतायत स्थिति में एक जैसी परिस्थिति में भी उनके बीच के अनुभव अलग-अलग होते हैं. ऐसे में ये कैसे संभव है कि दो अलग-अलग लोगों के जीवन का चाल-चलन एक जैसा हो? उनके जीवन के अनुभव दूसरों के जीवन पर खरे उतरें? उनकी जीवन-शैली कैसे दूसरे की जीवन-शैली बने?


प्रत्येक व्यक्ति का अपना जीवन है, अपनी जीवन-शैली है, अपने अनुभव हैं. ऐसे में उस व्यक्ति के अपने अनुभवों के आधार पर ही उसे अपने जीवन का आकलन करना चाहिए. दूसरे का जीवन, चाहे वह एकदम सामान्य है, सादा है अथवा तड़क-भड़क वाला है उसका अनुसरण दूसरे व्यक्ति के लिए कष्ट का विषय ही बनता है. इस तरह की स्थितियों में व्यक्ति कभी भी संतुलन की, सामंजस्य की स्थिति में नहीं रहता है. 





 

09 मई 2020

तेरे संग जीने को, बदलना होगा आदतों को

जब चीनी वायरस कोरोना ने हंगामा काटना शुरू किया था तो लोगों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया था. अपने देश में तो इसे गंभीरता से लेना तो अभी भी शुरू नहीं किया गया है. पता नहीं इस देश के लोग किस मिट्टी के बने हैं जो गंभीर मसलों पर गंभीरता नहीं दिखाते और अनावश्यक मामलों में बहुत ज्यादा गंभीर हो जाते हैं. गंभीर न रहने की इसी मानसिकता ने संकट खड़ा कर दिया है. जिस तरह से इस वायरस के बारे में कहा जा रहा है यदि सभी लोग पूरी तरह से लॉकडाउन का पालन करते तो स्थिति इतनी भयावह न होती.


वैश्विक भयावहता देखने के बाद बहुत सारे लोग कहने लगे हैं कि अब सभी को इस वायरस के साथ जीवन जीने की आदत डाल लेनी चाहिए. सही भी है. अभी जिस तरह से इसकी वैक्सीन बनाये जाने का काम चल रहा है, दवा, टीका आदि के बारे में जिस तरह के प्रयोगों की स्थिति है उसे देखते हुए लग रहा है कि इसके अंतिम रूप से आने में समय लगेगा. तब तक क्या व्यक्ति को भय के साथ जीना पड़ेगा? क्या तब तक समाज में भेदभाव जैसा माहौल दिखेगा? क्या समन्वय बनाने वाली बात की जगह एक-दूसरे को शक की निगाह से देखना पड़ेगा?


आने वाला समय कैसा होगा, इस बारे में अभी से कुछ कहना जल्दबाजी होगी. आने वाले समय में लोग किस तरह की जीवनशैली अपनाएँगे, इसे भी ठीक-ठीक कहना मुश्किल है. लॉकडाउन के पहले दो दौर के बाद जब तीसरे दौर में सरकार की तरफ से शराब की दुकानों को खोलने के आदेश आये तो लोग ऐसे टूट पड़े जैसे कोरोना वायरस की दवा बाजार में आ गई हो. इस शराब की दुकानों के अलावा लोगों को सामान्य खरीददारी के लिए, सब्जी के लिए इस तरह भीड़ लगाते देखा है जैसे अपने देश में कोरोना जैसा कोई संकट ही नहीं है. ये स्थिति इतना बताने के लिए पर्याप्त है कि जो लोग घर में रह रहे हैं उनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो बस पुलिस की मार से बचने के लिए. अनेक राज्यों में बाजारों के तमाम दृश्य देखने के बाद लगता नहीं कि आने वाले समय में इन्सान सहनशीलता दिखायेगा, संयम रखेगा.

ऐसे में, संभव है कि हमारे कुछ सुझाव हास्यास्पद लगें (लगें तो हँस लेना क्योंकि इस लॉकडाउन में लोग हँसना भूल गए हैं) मगर हम यहाँ दे रहे हैं. यदि इसी वायरस के साथ जीवन बिताना है, इसकी आदत डालनी ही है तो तकनीकी क्षेत्र से जुड़े हुए लोग ऐसी कोई मशीन का आविष्कार करें जो कोरोना को नापने का काम करे. आखिर दिल की धड़कन नापने की, बीपी नापने की, शुगर नापने की, हीमोग्लोबिन नापने की, आँखों का प्रेशर नापने की, इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रिक उपकरणों की क्षमता नापने आदि की मशीन तो हैं ही.  इसी तरह की कोई मशीन आनी चाहिए ताकि वो व्यक्ति जो इस मामले में संवेदित है वह सम्बंधित वस्तुओं में कोरोना को नाप सके, लोगों में कोरोना नाप सके.

इसके अलावा बाजार की दुकानों को अलग-अलग वस्तुओं के हिसाब से अलग-अलग दिनों में खोले जाने जैसे कदम उठाये जाएँ. किसी भी शहर में दिव्यांगजनों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं के अलावा किसी अन्य को सार्वजनिक वाहन इस्तेमाल करने से रोका जाना चाहिए. बाजार आने अथवा एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए निजी वाहन (इसमें भी यदि साइकिल को मान्यता दी जाये तो बेहतर रहेगा) अथवा पैदल को वरीयता दी जाये. इससे एकसाथ कई-कई लोगों के बैठने की संभावना पर अंकुश लगेगा.

अब इसी तरह के उपाय खोजने होंगे, अमल में लाना होंगे, यदि वाकई इसी वायरस के साथ जीना है तो.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

19 अप्रैल 2020

विभिन्न आयाम हैं विचारने को इस लॉकडाउन में

लॉकडाउन के इस खाली समय ने इन्सान को सोचने वाली स्थिति में खड़ा कर दिया है बशर्ते कि इन्सान कुछ सोचना चाहे. सोचने के आयाम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं. यही इस समय को प्रकृति संतुलन, पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से देखा-सोचा जाये तो साफ समझ आ रहा है कि लॉकडाउन के समाप्त होने के बाद हमारा पर्यावरण नवीन रूप में हम सबका स्वागत कर रहा होगा. अपने कुछ मित्रों से बातचीत होती है, यह वह समय है जबकि हम अपने संबंधों को पुनर्जीवन दे सकते हैं. सोशल मीडिया के, माइक्रोब्लॉगिंग के ज़माने में अब सन्देश भेजकर ही सारे दायित्वों की पूर्ति कर ली जा रही है. ऐसे में हम सभी अपने मित्रों, रिश्तेदारों, परिचितों, सहयोगियों को फोन करके उनके हालचाल तो ले ही सकते हैं. बहरहाल, अपने बहुत से मित्रों से, ऐसे मित्रों से जो दिल्ली, नॉएडा, गुरुग्राम, मुंबई आदि जैसी जगहों पर रह रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें याद नहीं कि इन जगहों को इतना स्वच्छ, खूबसूरत अंतिम बार कब देखा था. कुछेक मित्रों ने तो बहुत ही अद्भुत जानकारी दी. उन्होंने बताया कि उनके चौदह, पन्द्रह वर्ष के बच्चों ने अपने जीवन में पहली बार गौरैया देखी, उसकी आवाज़ सुनी. सोचिये एक पल ठहर कर कि हम सबने भौतिकतावाद में दौड़ते-दौड़ते किस तरह की दुनिया का निर्माण कर लिया था अपने बीच.



प्रकृति, पर्यावरण की इस सकारात्मक स्थिति के बीच ये समय इन्सान के लिए खुद के बारे में भी सोचने का है. सोचने वाली बात ये है कि जिस दिन लॉकडाउन होने की घोषण प्रधानमंत्री जी द्वारा की गई, उस समय किसी ने भी बाज़ार से टीवी, कार, फ्रिज, मोबाइल, कंप्यूटर आदि लेने के लिए दौड़ नहीं लगाई थी. जो भी बाज़ार की तरफ दौड़ा वह खाद्य सामग्री के लिए दौड़ा, दवाइयों के लिए दौड़ा. क्यों किसी ने ये विचार नहीं किया कि लॉकडाउन में घर पर ही रहना पड़ेगा, सभी कमरों के लिए अलग-अलग टीवी ले ली जाये? क्यों किसी ने सभी सदस्यों के लिए अलग-अलग म्यूजिक सिस्टम नहीं खरीदा? क्यों सभी ने अपनी-अपनी पसंद के कपड़े खरीद कर रख लिए? ऐसी क्या मानसिकता रही कि सभी लोग खाने-पीने की वस्तुओं को लेने के लिए ही आतुर दिखे? समय यही विचार करने का है कि इन भौतिक चीजों के बिना हमारा काम चल सकता है मगर खाद्य-पदार्थों के बिना गुजारा नहीं है.


इस लॉकडाउन में व्यक्तियों को अपनी जीवन-शैली के बारे में भी विचार करना चाहिए. इस लॉकडाउन में कहीं से भी ऐसी कोई खबर नहीं आई कि किसी जगह पर व्यक्तियों ने, उनके परिजनों ने मॉल जाने की, फिल्म देखने की, सड़कों पर देर रात घूमने की जिद की हो. बिना मॉल जाए, बिना फिल्म देखे, बिना जंक फ़ूड खाए भी सबका जीवन चल रहा है. किसी को भी इन चीजों के न मिलने से किसी तरह का कोई शारीरिक कष्ट नहीं हुआ. यदि किसी को किसी भी तरह का मानसिक कष्ट देखने को मिला भी है तो वह इन सामानों की कमी के कारण नहीं बल्कि इतने लम्बे समय से घर में रहने के कारण. उसके भी अपने अलग कारण हैं. असल में व्यक्ति ने अपने जीवन में अपनी आजीविका, अपने उसी काम के अलावा किसी और चीज को महत्त्व ही देना बंद कर दिया है. बहुतों ने तो अपने कैरियर के लिए अपने परिवार को भी महत्त्व देना बंद कर दिया है. ऐसे में अब जबकि वह निपट फुर्सत में है तब उसके पास कोई शौक या कोई दूसरी रुचि, कोई दूसरा काम भी नहीं दिखाई दे रहा है. जो लोग वर्क फ्रॉम होम में हैं वे और भी ज्यादा अवसाद की स्थिति में नजर आने लगे हैं. असल में अब वे काम भी कर रहे हैं मगर तन्हा हैं. अब उनके साथ ऑफिस वाला माहौल नहीं है, उनके सहयोगी नहीं हैं. घर-परिवार के लोग तो वैसे भी उनकी आदतों के चलते अलग-थलग हैं.


यही वह स्थिति है जबकि लोगों को लॉकडाउन के दौरान ही या फिर उसके समाप्त होने के बाद सोचना होगा. सोचना होगा अपनी प्रकृति के बारे में, सोचना होगा अपने पर्यावरण के बारे में, सोचना होगा अपने शौक के बारे में, सोचना होगा अपनी जीवन-शैली के बारे में, सोचना होगा अपने अपव्यय के बारे में, सोचना होगा अपने परिवार के बारे में, सोचना होगा खुद अपने बारे में. सोचे आज के दौर में कि उसकी अंधाधुंध रफ़्तार का क्या हुआ? दिन-रात काम-काम-काम की रट लगाने वाला वह अब क्यों खामोश है? क्यों जो दाल-रोटी उसे मध्यगुगीन भोजन की याद दिलाती थी उसी को आज वह स्वाद से अपने भोजन में शामिल किये है? क्यों जिस जंक फ़ूड के बिना उसका एक दिन गुजरता नहीं था, आज उनके बिना कई हफ्ते गुजार चुका है? क्यों जिस परिवार के साथ उसे एक पल बिताना अपनी गुलामी लगती थी, उसी के साथ आज वह दिन-रात सुख से बिता रहा है? ये वह स्थिति है जहाँ प्रकृति ने हम सभी को घर में रह कर, आराम से बैठ कर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. यद्यपि इससे पहले भी लगातार होती आ रही विभीषिकाओं, प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी इन्सान कुछ सोचने-विचारने को तैयार नहीं था तथापि प्रकृति को स्वयं ही उतरना पड़ा उसे सुधारने. और हुआ भी यही. आज यह विभीषका, महामारी किसी एक-दो देश में नहीं, किसी एक-दो प्रायद्वीप में नहीं वरन समूचे विश्व में फैली हुई है. लगभग सभी देशों के नागरिक एक जैसी अवस्था में घर पर हैं. सब मिलकर सोचें अपनी प्रकृति, पर्यावरण, समाज, परिवार और खुद के बारे में. शायद इसके बाद आने वाला समय सभी के लिए हितकारी हो, मानव के लिए सुखद हो, मानवता के लिए लाभदायक हो.


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05 मार्च 2020

जीवन-शैली का सुधार ही बीमारियों से बचाव है

इस समय कोरोना वायरस का हौआ इस कदर छाया हुआ है कि यदि किसी के बगल में पहुँच कर सामान्य सा खाँस दो या छींक दो तो अगला ऐसे देखेगा जैसे मौत को देख लिया हो. यदि किसी को जरा सा मौसमी जुकाम भी हो गया तो तुरंत मेडिकल के चक्कर में पड़ जायेगा. संभव है कि कोरोना एक भयंकर वाली बीमारी हो. इसके प्रभाव में आने वाले की जान पर बन आये मगर क्या वाकई जीवन के लिए एकमात्र यही घातक बीमारी है? देखने में आ रहा है कि जब से कोरोना के देश में चंद मामले सामने आये हैं, लोग मुँह पर मास्क लगाकर चलने लगे हैं. अभी कुछ दिन पहले सरकार, शासन, प्रशासन अपनी दम लगाकर दो-पहिया वाहन चालकों को हेलमेट के लाभ बता रहा था, उनको प्रेरित कर रहा था, बिना हेलमेट वालों पर जुरमाना भी लगाया जा रहा था मगर क्या मजाल कि सबके कानों में जूँ रेंगी हो. कुछेक लोगों को छोड़कर बाकी लोगों को हेलमेट टाँगे तो जरूर देखा मगर लगाये हुए न देखा. इधर कोरोना के आने की खबर मात्र से बहुतायत लोगों के मुँह पर मास्क चिपक गए.


बीमारी से बचाव अच्छी बात है. किसी भी समस्या के चक्कर में पड़ने के पहले ही यदि उससे सुरक्षा कर ली जाए तो बेहतर होता है. इन सबके बीच ऐसे कई बिंदु दिमाग में आये जबकि लगा कि अब हम सभी किस कदर नकली या कहें कि कृत्रिम जीवन जीते चले जा रहे हैं. दिन भर किसी न किसी तरह से ऐसे काम में संलग्न रहेंगे जो पर्यावरण के हित में नहीं हैं मगर एक बीमारी के काल्पनिक हमले से बचने के लिए मुँह पर मास्क लगा लेंगे. क्या कभी इस पर विचार किया है कि कोरोना की आहट के पहले कितने लोग मास्क लगाकर घर से बाहर निकलते थे? शायद इक्का-दुक्का लोग ही ऐसा करते होंगे. तब क्या किसी बीमारी का खतरा नहीं था? क्या गाड़ियों से निकलने वाला धुँआ इन्सान के लिए किसी अमृत के समान है? क्या वह मनुष्य के शरीर में नहीं जा रहा? क्या उसका खानपान ऐसा है कि उसके किसी तरह की बीमारी न हो? क्या वह नैसर्गिक रूप से अपने आपको प्रकृति से जोड़कर चल रहा है? क्या उसकी दिनचर्या ऐसी है जो उसके लिए लाभप्रद है?

बहुत से लोग जो आज कोरोना के भय से मास्क लगाये घूम रहे हैं, इनमें से बहुतायत में ऐसे लोग हैं जो दिन भर तम्बाकू का, गुटके का सेवन करते हैं. घड़ी-घड़ी इनके मुँह से सिगरेट का धुँआ निकलता रहता है. असल में अब बहुतायत लोगों ने अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन कर दिया है. उनकी दिनचर्या भी अलग तरह की हो गई है. खानपान भी बदल गया है. सेहत के नाम पर वे लोग सजग नहीं दिखाई देते हैं. यही कारण है कि आजकल बच्चे भी मोटापे का शिकार हो रहे हैं. नजर कमजोर हो रही है. बौद्धिक विकास भी त्वरित गति से नहीं हो रहा है. जरा सा परिश्रम करते ही साँस फूलने लगती है. कोरोना से बचाव का कारण उनकी जागरूकता नहीं है वरन मौत से उनका भय है. ऐसी किसी भी बीमारी से, जिसका कि इलाज संभव नहीं दिखता, व्यक्ति उसके प्रति जागरूक रहता है अन्यथा की स्थिति में वह लापरवाही करता ही करता है.


आज खेलकूद के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है. मैदान में न तो बच्चों की भीड़ दिखाई देती है और न ही बड़े लोगों की. सैर के नाम पर चंद बुजुर्ग लोग दिख जाते हैं. पैदल चलना जैसे आज तौहीन है, व्यक्तित्व पर दाग है. खुले में कुछ देर को बैठना, स्वच्छा हवा में साँस लेना आज के लोग जैसे जानते ही नहीं हैं. चौबीस घंटे वातानुकूलित वातावरण में रहने का आदी हो जाना, जंक फ़ूड की आदत लगा बैठना आदि नुकसान के सिवाय कुछ और नहीं कर रहे हैं. ऐसे में बीमारियों का पनपना आम बात है. ऐसे में ध्यान रखने की आवश्यकता है कि आज एक मास्क किसी को एकमात्र बीमारी से चंद पलों के लिए सुरक्षित रख सकता है क्योंकि वह मास्क भी तो संक्रमित होगा ही, किसी न किसी तरह से. उसे दोबारा उपयोग में लाने का अर्थ खुद को संक्रमित करना ही है. ऐसे में अपनी दिनचर्या को नियमित किया जाये. व्यायाम की तरफ ध्यान दिया जाए. शारीरिक श्रम करने की तरफ बढ़ा जाये. बच्चों को बजाय मोबाइल, कंप्यूटर के मैदान में खेलने को प्रोत्साहित किया जाये. ऐसा करके जहाँ एक तरफ कोई व्यक्ति अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है वहीं दूसरी तरफ खुद को अनेक बीमारियों से भी सुरक्षित कर सकता है. 
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07 जुलाई 2019

ज़िन्दगी और जीवन के बारीक अंतर को समझना होगा


ज़िन्दगी और जीवन भले ही देखने-सुनने में एक जैसे समझ आते हों मगर दोनों के स्वभाव में, प्रवृत्ति में बहुत बारीक सा अंतर है. इस बारे में दार्शनिक रूप में बहुत कुछ कहा जा सकता है, बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बहुत कुछ बताया जा सकता है. इसके बाद भी असलियत बहुत बारीक सी रेखा के आसपास ही घूमती रहती है. इसे बहुत दार्शनिक शब्दों में न कहते हुए बहुत ही सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि जीवन वह है जो हमें मिला है और ज़िन्दगी वह है जो हम गुजारते हैं. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि इंसानों के अलावा जीवन वनस्पतियों में भी होता है, जानवरों में भी होता है, पक्षियों में भी होता है. इसके उलट ज़िन्दगी कितने लोग बिताते हैं? क्या आपको लगता है कि ज़िन्दगी एक पौधा बिताता है? क्या आप समझते हैं कि एक पेड़ ज़िन्दगी बिताता है? आपको क्या लगता है कि कोई जीव-जंतु, पशु-पक्षी ज़िन्दगी का आनंद उठाता है? बहुसंख्यक लोग इसका जवाब देने के पहले जीवन और ज़िन्दगी में ही भटकते नजर आयेंगे. 

असल में अभी हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी और जीवन में अंतर करना ही नहीं सीख सके हैं. उनके लिए दोनों शब्द एक अर्थ में प्रयुक्त होते हैं जबकि ऐसा नहीं है. जीवन वो है जो हमें जन्म देता है, हमें सांसे देता है और इसके उलट ज़िन्दगी वह है जो हम जन्म के बाद गुजारना शुरू करते हैं, हर एक साँस के सहारे आगे ले जाना शुरू करते हैं. ज़िन्दगी और जीवन का ये दर्शन जिसकी समझ में आ जाता है वही असल में अपने जीवन का भी आनंद लेता है, ज़िन्दगी का भी आनंद लेता है. ऐसे में बहुत से लोगों को जरा सी नाकामी पर अपनी ज़िन्दगी को दोष देते, उसे कोसते हुए देखा जाता है. क्या वाकई ज़िन्दगी के कारण ऐसा हुआ? बहुत से लोग जीवन-शैली के बाहरी आवरण को देखने के साथ ही उसे ज़िन्दगी से परिभाषित करते हैं और किसी भी व्यक्ति के जीवन को ज़िन्दगी से जोड़ते हुए उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं. असल में ज़िन्दगी उस व्यक्ति के द्वारा खुद के आकलन का विषय है. एक गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने जीवन को भले ही अभावों में गुजार रहा हो मगर वह अपनी ज़िन्दगी से खुश रहता है. इसी तरह एक बहुत ही धन-संपन्न, सत्ता-संपन्न, अधिकार-संपन्न व्यक्ति अपने जीवन को बहुत ही प्रभावी ढंग से बिता रहा हो मगर आवश्यक नहीं कि वह अपनी ज़िन्दगी को भी उसी खुशनुमा तरीके से बिता रहा हो. ज़िन्दगी और जीवन का यही बारीक अंतर समाज में तमाम सारी बुराइयों, परेशानियों, समस्याओं का कारण बना हुआ है.

22 जनवरी 2019

बच्चों को सिखाएँ जीवन का महत्त्व


कोचिंग सेंटर्स की बढ़ती संख्या और उसमें आने वाले बच्चों का सैलाब. कोचिंग क्लास छूटते ही सैकड़ों की संख्या में बच्चों का सडकों पर निकल आना किसी भी छोटे-बड़े शहर का आम नजारा हो गया है. वर्तमान दौर में अंकों की मारा-मारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का अथक दबाव, सबसे आगे रहने की गलाकाट प्रतिद्वंद्विता के चलते लगभग प्रत्येक बच्चा आज विद्यालयों में जाने की बजाय कोचिंग में जाता दिखाई दे रहा है. किसी बच्चे का कोचिंग जाना, अतिरिक्त रूप से पढ़ना किसी भी रूप में बुरा या गलत नहीं है. जिस तरह से वैश्वीकरण के दौर में समूचा विश्व एक जगह सिमटता दिखाई देने लगा है उसमें अधिक से अधिक जानकारी, ज्ञान किसी के लिए भी अपेक्षित है. समस्या कोचिंग सेंटर्स की बढ़ती संख्या से भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या के चलते इनका बढ़ना स्वाभाविक है. असल समस्या वह है जो दिखाई देने के बाद भी किसी को दिखाई नहीं दे रही है. आये दिन इन्हीं बातों पर शासन-प्रशासन द्वारा जागरूकता कार्यक्रम चलाये जाते हैं. इसके बाद भी खुद प्रशासन इस तरफ से आँखें मूँदे बैठा है. 


कोचिंग क्लासेज के छूटते ही वहां से निकले बच्चों का बाइक रेस में शामिल हो जाना एक अनिवार्य सा कदम हो गया है. कोचिंग सेंटर्स में आते समय तो वे अलग-अलग होते हैं लेकिन वहाँ से एकसाथ बड़ी संख्या में निकलने के बाद उन नाबालिग बच्चों की बाइक, स्कूटी का सडकों पर अंधाधुंध तरीके से दौड़ना खतरे का ही सूचक है. बेतरतीब दौड़ती बाइक, एक-एक बाइक पर तीन-तीन लोगों का बैठे होना, बिना अपनी जान की परवाह किये दूसरे व्यक्ति की जान के लिए आफत बने इन बच्चों को अंदाजा भी नहीं होता कि कैसे एक चूक उनकी जान पर भारी पड़ जाएगी. अपने घर-परिवार, अपने माता-पिता की चिंता से बेफिक्र वे बस अपनी बाइक दौड़ाने में तत्पर रहते हैं. वैसे चिंता जैसा शब्द शायद यहाँ उचित नहीं क्योंकि यदि उनके घर-परिवार या माता-पिता को उन बच्चों की चिंता होती तो वे कम उम्र में उनके लिए तेज रफ़्तार बाइक, स्कूटी की व्यवस्था ही नहीं करते. यदि किसी मजबूरी या समय की बचत के लिए उनको ऐसा करवाया भी जाता तो वे अपने बच्चों को इसके लाभ-हानि के बारे में भी समझाते. ऐसा शायद बिलकुल नहीं हो रहा है क्योंकि किसी एक पल में लगता नहीं कि बाइक दौड़ाते इन बच्चों को उनके माता-पिता ने कोई सीख दे रखी है.

यहाँ प्रशासन को भी सजग होने की आवश्यकता है. उनके द्वारा ऐसे बच्चों के बाइक चलाने पर कठोर कदम उठाये जाने चाहिए. कोचिंग सेंटर्स के द्वारा किसी तरह की हिदायत ने देना, कोई सख्ती न करने के पीछे उनकी अपनी मजबूरी होती है, उनके अपने व्यावसायिक हित होते हैं मगर प्रशासन के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती है. ऐसा तब जबकि आये दिन प्रशासन द्वारा यातायात जागरूकता कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं. इस बारे में प्रशासन के साथ-साथ अभिभावकों को भी जागने की, सचेत होने की जरूरत है. भविष्य के खतरों को कुछ आवश्यक कदम उठाकर टालना हम सबके हाथ में है और उन पर अमल करना चाहिए.

23 नवंबर 2018

मशीन में बदलता इन्सान


जगह वो थी जहाँ ज़िन्दगी में आदमी जाता तो है मगर अपने पैरों पर चलकर नहीं. यही एकमात्र वो जगह होती है जहाँ उसी व्यक्ति के लिए सम्पूर्ण गतिविधियाँ चल रही होती हैं मगर एक वही उनका अनुभव नहीं कर पा रहा होता है. यही वो जगह होती है जहाँ वही एकमात्र सबके, सभी गतिविधियों के केंद्र में होता है मगर वह न तो किसी के प्रति आभार व्यक्त कर पा रहा होता है और न ही किसी से मिलजुल पा रहा होता है. यही जगह संभवतः ऐसी जगह मानी जाती है जहाँ किसी भी व्यक्ति को जीवन का असल सत्य ज्ञात होता है. यहाँ आकर वह जीवन की वास्तविकता को समझ सकता है. वह देख सकता है कि जिंदगी भर लोभ, मोह, तृष्णा का अंजाम सिर्फ और सिर्फ राख बनकर मिट्टी में मिल जाना ही होता है. श्मशान घाट, मोक्षधाम आदि नामों से पुकारी जाने वाली यह जगह आमतौर पर लोगों के केंद्र में, आकर्षण में नहीं रहती है इसके बाद भी प्रत्येक आदमी को यहाँ आना होता है. कभी किसी परिचित के कारण, कभी किसी सहयोगी के कारण, कभी किसी अपने के कारण. खुद अपने लिए यहाँ वह एक बार और अंतिम बार ही आता है.


इस जगह में लोग जिस व्यक्ति के कारण आते हैं वह तो चिरनिद्रा में लीन आराम कर रहा होता है. उसके परिजन, शुभेच्छुजन उसकी अंतिम क्रिया की तमाम औपचारिकताओं में लगे होते हैं. यहाँ आने और यहाँ से वापस जाने के मध्य का समय उन लोगों के लिए भारी पड़ता है जो किसी न किसी औपचारिकता में यहाँ आये होते हैं. औपचारिकता के नाते आना हुआ है तो औपचारिकता के कारण ही यहाँ से जा भी नहीं सकते हैं, जब तक कि सम्पूर्ण क्रिया पूर्ण न हो जाये. अब ऐसे में बीच के समय का ऐसे लोग दुरुपयोग करते हैं या सदुपयोग करते हैं, यह तो पता नहीं मगर जो भी करते हैं वह सामाजिक तो नहीं ही लगता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान में किसी भी व्यक्ति के पास बातें करने के गिने-चुने बिंदु रह गए हैं. राजनीति, क्रिकेट, फिल्म या फिर धन-सम्पदा. राजनीति का विषय इनमें से सबसे आगे रहता है क्योंकि इसमें किसी भी बिंदु पर, किसी भी मसले पर अपना ज्ञान बघारने के लिए व्यक्ति को प्रकाण्ड विद्वान् होने की आवश्यकता नहीं होती है. कुछ गंभीर पढ़ने की जरूरत नहीं होती है. किसी भी मुद्दे पर तथ्यों की, सिद्धांतों की चर्चा नहीं करनी होती है. सबको एक सिरे से चोर, भ्रष्ट साबित करते हुए बस अपनी विचारधारा को संपोषित करना होता है. बहस में हारने की स्थिति आने पर पूरी चिल्ला-चोट के साथ सामने वाले की विचारधारा के लोगों को चोर, हत्यारा, भ्रष्ट कहकर अपनी बात को समाप्त किया जा सकता है.

देश-विदेश की कई-कई घटनाओं पर अपना बुद्धि-कौशल दिखाते, ज्ञान बघारते, बहस को अंजाम देते लोग भूल जाते हैं कि वे जहाँ चिल्ला-चिल्लाकर अपना खोखला ज्ञान देने में लगे हैं वहां उनसे ही चंद कदम की दूरी पर किसी का कोई अपना चिरनिद्रा में सोया हुआ है. वे सब उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर यहाँ आये हैं. जहाँ वे आये हैं वह किसी सामाजिक कार्यक्रम का मंच नहीं. वे किसी आयोजक के मुख्य वक्ता नहीं. किसी विषय के विशेषज्ञ नहीं. इसके बाद भी वे महज समय काटने की दृष्टि से हर उस विषय पर बोलने की क्षमता दिखाते हैं जिसे उन्होंने कभी देखा-सुना भी न हो. किसी का दुःख बाँटने आये लोग शमशान घाट पर आकर भी जीवन का सत्य न समझकर अपने आपको सर्वज्ञ दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं. समझ नहीं आता कि तकनीकी विकास में आदमी किस तरह तेजी से क्यों मशीन होता जा रहा है? क्यों संवेदनहीन बनता जा रहा है? क्यों वह किसी के दुःख में शामिल न होते हुए बस निरर्थक बहसों में अपने आपको शामिल किये रहता है? क्यों वह समय, स्थिति, स्थान को न पहचानते हुए नितांत अमर्यादित बना रहता है? हम सभी को विचार करना होगा कि तकनीक हम सबको कहाँ ले जा रही है.

18 जून 2018

दर्द एक मीठा सा एहसास है


दर्द, ये एक ऐसा शब्द है जो प्रत्येक व्यक्ति के साथ जुड़ा हुआ है. अमीर हो या गरीब, राजा हो या रंक, नेता हो या जनता, मालिक हो या नौकर, रोजगारपरक हो या बेरोजगार, किसान हो या उद्योगपति या अन्य कोई भी सबका दर्द से सामना होता ही है. दर्द के भी अपने अलग-अलग फलसफे हैं. कोई किसी दर्द से पीड़ित है तो कोई किसी दूसरे दर्द से. कोई तन के दर्द से दोहरा हुआ जा रहा है कोई मन के दर्द से पीड़ित है. किसी को दिमागी दर्द है तो कोई दिल के दर्द से परेशान है. किसी के बोलने में दर्द है, किसी की ख़ामोशी में दर्द है. कोई गीत गाकर अपने दर्द को बयां कर रहा है तो कोई ग़ज़ल लिखकर अपने दर्द की अभिव्यक्ति कर रहा है. आखिर एक दर्द के अनगिनत अफसाने कहाँ से, कैसे और किसने बनाये? चिकित्सा विज्ञान में भले ही दर्द को शारीरिकता से जोड़कर देखा जाता है मगर उसके अलावा जहाँ भी इसको परिभाषित किया गया है वहां इसका सम्बन्ध मन से, दिल-दिमाग से बताया गया है.  


समझने वाली बात है कि दर्द अपने आपमें एक कटु अनुभव, एक पीड़ादायक अनुभव है. दर्द विशुद्ध रूप से संवेदनात्मकता, भावनात्मकता से जुड़ा हुआ है. दैहिक रूप से दर्द की अनुभूति हो या फिर मानसिक रूप से इसका आभास हो, सभी किसी न किसी रूप में संवेदनात्मकता से ही जुड़े हुए हैं. वैसे इधर देखने में आया है कि दर्द की वर्तमान अनुभूति शरीर से ज्यादा मन से, दिल-दिमाग से जुड़ गई है. लोगों के रहन-सहन में सामान्य स्तर की जगह से विशेषीकरण का प्रभाव बढ़ने लगा है. ऐसे में दिल-दिमाग किसी भी परिस्थिति को सामान्य रूप से स्वीकार करने में असफल हो रहे हैं. यही असफलता दर्द को बढ़ा रही है. चिकित्सा विज्ञान में तो इसका कोई इलाज है नहीं संभव है कि मनोविज्ञान में इसका कोई इलाज हो. वैसे दर्द की अनुभूतियाँ भी स्थिति-परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग भी होती हैं. दर्द किसी भी तरह का हो यदि वह किसी अपने से जुड़ा हुआ है तो उसकी संवेदनात्मकता, उसकी भावनात्मकता कहीं गहराई तक होगी. ऐसा नहीं है किसी गैर के दर्द को देखकर खुद को दर्द की अनुभूति कम हो. संभव है कि यहाँ भी दर्द का स्तर उसी बिंदु पर आकर स्थिर हो जाये जहाँ किसी अपने के कारण स्थिर हुआ था. ऐसी स्थितियों के कारण ही दर्द, चाहे वह शरीर में उपजा हो अथवा मन में या फिर किसी की अनुभूति से उसका सीधा सा सम्बन्ध भावना से है.

चोट खाने से भी दर्द की अनुभूति होती है, किसी सौन्दर्यबोध से भरी हुई विरोग रचना को सुन-पढ़-देख कर भी दर्द की अनुभूति होती है. ऐसे किसी भी दर्द के पीछे का मूल कारण इन्सान का भावनात्मक होना है. तो फिर सवाल उठता है कि क्या जानवरों को दर्द नहीं होता? यदि जानवरों का दर्द सिर्फ शारीरिक है तो भी सवाल वहीं का वहीं कि क्या उनको मानसिक दर्द नहीं होता है? जानवरों या कहें कि पशु-पक्षियों के व्यवहार को देखें तो साफ समझ आता है कि वे अपने साथी के लिए संवेदी रूप से सक्रिय रहते हैं. ये भले ही कहा जाये कि दिमागी रूप से कुछ जानवर ही सक्षम हैं मगर संवेदनात्मक रूप से सभी पशु-पक्षी समान भाव से सक्रिय रहते हैं. एक पल को शारीरिक दर्द की स्थिति से इतर सिर्फ मानसिक दर्द की बात की जाये तो यह भी स्पष्ट है कि मिलने-बिछड़ने का, सुख-दुःख का, हँसी-उदासी का अपना-अपना दर्द जितना इंसानों में महसूस किया जाता है उतना ही पशु-पक्षियों में देखने को मिलता है. स्पष्ट है कि दर्द का रिश्ता विशुद्ध रूप से संवेदनाओं का है. संवेदनात्मक रूप से जिस तरह से सामाजिक ताना-बाना आज छिन्न-भिन्न होता दिख रहा है, उतनी तेजी से दर्द का रिश्ता भी टूटता जा रहा है. आज कोई भले कहे कि वह दिल के, दिमाग के, अपनों के दिए धोखे के या फिर जीवन की किसी भी स्थिति के चलते दर्द को झेल रहा है, सह रहा है लेकिन यह नितांत झूठ है. आज जिस तरह की जीवन-शैली इंसानों ने अपना रखी है, उसमें वह दर्द नहीं बल्कि तन्हाई सह रहा है, एकांतवास झेल रहा है, अकेलेपन से जूझ रहा है. देखा जाये तो दर्द वह मीठा सा एहसास है जो उसे समाप्त करने के लिए इन्सान को, जीवन को सक्रिय बनाता है, हँसना सिखाता है, रुलाता नहीं है, निष्क्रिय नहीं बनाता.

06 मई 2018

हँसते रहे तो जिंदा रहोगे


ये जानकार आश्चर्य हुआ कि आज, 6 मई को विश्व हास्य दिवस मनाया जा रहा है. इसे हमारी सामान्य ज्ञान में कमी भले ही समझा जाये मगर हमने व्यक्तिगत रूप से कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी कोई दिन मनाया जाता होगा. इंसानी शारीरिक क्रियाओं में हँसना स्वाभाविक क्रिया है, जिसके लिए न किसी तरह की मेहनत करनी पड़ती है, न किसी तरह का श्रम करना पड़ता है. ऐसे में यदि इस स्वाभाविक क्रिया के लिए भी एक दिन निर्धारित करना पड़े तो इसका अर्थ है कि इन्सान हँसना-मुस्कुराना भूलता जा रहा है या भुला चुका है. मई माह के पहले रविवार को मनाया जाने वाले हास्य दिवस का उद्देश्य भयग्रस्त समाज को हँसने के द्वारा कुछ देर को ही सही, भय से दूर रखना है. हास्य दिवस का विश्व हास्य दिवस के रूप में पहला आयोजन 11 जनवरी 1998 को मुंबई में किया गया था. विश्व हास्य योग आंदोलन की स्थापना डॉ० मदन कटारिया द्वारा की गई और उनके ही प्रयासों से विश्व हास्य दिवस का आरंभ संसार में शांति की स्थापना, भाईचारे, सदभाव के उद्देश्य से हुआ. वर्तमान में इस दिवस की लोकप्रियता हास्य योग आंदोलन के माध्यम से पूरी दुनिया में फैल गई. ऐसा माना जा रहा है कि इस समय अधिकांश विश्व आतंकवाद के डर से सहमा हुआ है, इसलिए हास्य दिवस की अत्यधिक आवश्यकता है. आज से पहले दुनिया में इतनी अशांति देखने को नहीं मिली थी. आज हर व्यक्ति के अंदर द्वंद्व मचा हुआ है. चूँकि हंसी के द्वारा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, इस कारण प्रत्येक व्यक्ति को हँसी की महत्ता बताने के लिए इस दिवस का आरम्भ किया गया. समाज में वर्तमान में प्रचलित हास्य योग के अनुसार, हास्य सकारात्मक और शक्तिशाली भावना है, जिसमें व्यक्ति को ऊर्जावान और संसार को शांतिपूर्ण बनाने के सभी तत्त्व उपस्थित रहते हैं. यह व्यक्ति के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित करता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. जब व्यक्ति समूह में हंसता है तो उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पूरे क्षेत्र में फैल जाती है और क्षेत्र से नकारात्मक ऊर्जा हटती है.


विश्व हास्य दिवस के पीछे की वास्तविकता क्या है, सत्यता क्या है ये तो इसे मनाने वाले, अपनाने वाले जाने मगर व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना है कि आज ही नहीं वरन समाज में भय सदैव से बना रहा है. वर्तमान और अतीत के भय में मूल अंतर यह था कि उस समय किसी भी स्थिति, परिस्थिति, घटना, दुर्घटना आदि से भयभीत होने वाला खुद को अकेला महसूस नहीं करता था. उस समय उसके सहयोगी, उसका परिवार, उसके मित्र, उसका पड़ोस उसके साथ दिखाई देता था. आज स्थिति इसके ठीक उलट है. आज व्यक्ति ख़ुशी को महसूस कर रहा है मगर अकेला है. अपनी खुशियों को बाँटने के अवसर उसके पास हैं मगर उसकी ख़ुशी को बाँटने वाले लोग उसके साथ नहीं हैं. ऐसे में किसी के भय के, डर के साथ कौन आकर खड़ा होगा. इसके अलावा एक और बात जो महत्त्वपूर्ण है कि आज इन्सान के भीतर अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ चुका है. उसे अपने सगे सम्बन्धियों पर भरोसा नहीं. उसे अपने मित्रों पर भरोसा नहीं. उसे अपने सहयोगियों पर विश्वास नहीं. ऐसे में भी किसी विषम स्थिति में इन्सान खुद को अकेले महसूस करता है. और सीधी सी बात है कि अकेला आदमी कितनी देर हँस सकता है, कितना मुस्कुरा सकता है. वैसे भी हमारा समाज वह है जहाँ अकेले हँसने वाले को पागल, मानसिक दीवालिया समझा जाता है.

विश्व हास्य दिवस को भले ही मनाया जाए मगर सोचा जाये कि एक दिन की हँसी किस तरह डर को दूर करेगी? एक दिन का हास्य कैसे समाज में फ़ैल रहा भय दूर करेगा? बेहतर हो कि इन्सान आपस में संबंधों को मजबूत करे. सामाजिकता का जिस तरह से लोप हो रहा है उसे दूर करने की कोशिश करे. मिलने-मिलाने का जो माहौल आज समाप्त हो चुका है उसे पुनः जिन्दा किया जाये. संबंधों में खो चुके विश्वास को फिर से लाया जाये. घरों की चाहरदीवारी से बाहर आकर समाज के मैदान पर लोगों से मिला-जुला जाये. मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी आदि पर फूहड़ कार्यक्रमों के खरीदे हुए कलाकारों को ठहाके लगाते देख हँसने की जबरिया कोशिश से बाहर निकल कर वास्तविक हास्य का आनंद लिया जाये. ऐसा नहीं कि समाज में ख़ुशी नहीं है, ऐसा नहीं है कि प्रकृति ने हास्य नहीं बिखेरा है बस खुद को जागरूक करने की आवश्यकता है. एक बार व्यक्ति अपने बनाये खोल से बाहर आने की कोशिश कर ले, एक बार वह अपने बनाये घरौंदे को तोड़ दे, एक बार वह कथित बुद्धिजीवी होने के ढोंग से बाहर निकल आये फिर उसके आसपास हास्य ही हास्य है. आज देखने में आता है कि सामाजिक रूप से किसी भी तरह की प्रस्थिति न होने के बाद भी लोग क्या कहेंगे की मानसिकता के चलते लोगों ने अपने चेहरे पर जबरन ही कठोरता चिपका रखी है. सार्वजनिक कार्यक्रमों में अकारण ही खुद को सबसे अलग दिखाने की कोशिश में हँसना भुला कर नाहक ही गंभीरता ओढ़े फिरते हैं. ऐसे लोग न खुद हँसने की कोशिश करते हैं और न ही दूसरों के हँसने में शामिल होते हैं. ऐसे लोगों ने ही हँसने को किसी दूसरे ग्रह की स्थिति बना दिया है.

जागिये, सोचिये, समझिये कि इस प्रकृति ने हमें स्वाभाविक क्रिया दी है जो न केवल खुद को प्रसन्न करती है वरन सामने वाले को भी मुग्ध करती है. पता नहीं क्यों, कब, कैसे ठहाके लगाकर हँसना, खुलकर हँसना फूहड़ता का प्रतीक बना दिया गया. हम तो आज भी खुलकर हँसते हैं, ठहाके मार कर हँसते हैं, सार्वजनिक जगहों पर खुलकर हँसते हैं, घर में बैठकर हँसते हैं, सबके साथ मिलकर हँसते हैं. मुस्कुराते चेहरे के साथ, हँसते रहने के कारण हमें तो आज तक आवश्यकता न हुई थी इस दिवस को मनाने की. कभी भय भी न लगा कि क्या होगा, कभी डर भी नहीं लगा कि क्या होने वाला है. सत्य यही है कि आने वाले समय को किसी ने नहीं देखा है, जो होना होगा वही होगा फिर आने वाले समय की अनिश्चितता के लिए वर्तमान को दुखद क्यों बनाया जाये? आज को बोझिल क्यों बनाया जाये? जो होगा गया यदि उसे बदलना हमारे हाथ नहीं तो दुखी बने रहने से क्या लाभ? इसलिए आज में जीना होगा, वर्तमान में खुद को स्थापित करना होगा और यह होगा खुद को सभी चिंताओं, डर, भय से मुक्त करके. खूब हँसिये, ठहाके लगाकर हँसिये फिर देखिये डर कैसे गायब होता है. भय कैसे दूर भागता है. हाँ, समय, स्थिति, काल, वातावरण के अनुसार सभी चीजें भली लगती हैं, हँसना भी उसमें शामिल है.

09 अप्रैल 2018

थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है


आठ अप्रैल निकल गई. निकल गया एक पूरा साल जबकि कई सालों का जीवन एकसाथ हँसते-गाते बिताया गया. हॉस्टल के सभी भाई सपरिवार बरसों बाद मिले. यादें ताजा की गईं, परिवार के सदस्यों को अपने उस जीवन का अनुभव कराया गया, जो बिंदास, अलमस्त होकर जिया गया. उसी अवसर पर याद आई वो इमारत भी जिसने हम सबकी जिंदगी को बहुत करीब से देखा. पल-पल उसने हम सबको देखा-परखा. हॉस्टल की वो भव्य, अपनी सी लगने वाली इमारत आज भले ही सुनसान दिखाई देती हो पर हम सभी के दिल के बहुत करीब है. अनेकानेक कहानियों को अपने में समेटे वो इमारत आज भी हम सबके लिए एक घर सरीखी है. चंद पंक्तियाँ उसी इमारत और उस इमारत के साए में बिताये गए जीवन के लिए - 


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खामोश खड़ी अनगिनत कहानियाँ सुनाती है
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

चढ़ती रात कमरे का दरवाजा खटकना,
मैस में बुलाया है, बाबा का स्वर उभरना.
अनजान डर के साये में चलती वो इंट्रो पार्टी,
आज भी हौले से गुदगुदा जाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

किसी एक के कमरे में जमकर बैठ जाना,
घर से लाये नाश्ते का चट से उड़ जाना.
हँसी-ठहाकों के बीच वो भूतों की कहानी,
आज भी मीठा सा डर जगाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

छोटे जेबखर्च में बड़ी-बड़ी खुशियाँ सहेजना,
बिना बात पार्टी, अकारण वीडियो का चलना.
सखा विलास की चाय, वो स्टेशन की कॉफी,
आज भी अपने स्वाद को ललचाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

टंकी के बहते पानी में वो बेलौस मस्ती,
अगले ही पल तू-तू, मैं-मैं, झींगा-मुश्ती.
ऊँगली उठाकर तुझे देख लेने की वो नादानी,
आज भी रह-रह कर हँसाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

इसकी जींस, उसकी शर्ट से नित नया फैशन
कुड़ी के चक्कर में चकरघिन्नी बनने का पैशन.
कारतूस बीनने वाले होंगे लखपति की वो धमकी,
आज भी दिल को रोमांचक बनाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

बाड़े की रौनक, बलवंत भैया की कोठी का सूनापन
फिल्मिस्तान की मस्ती, कटोराताल का हुडदंग.
हर जगह की वो अपनी नई सी शरारत,
आज भी दिल को जिंदादिल बनाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

महफ़िलें लल्ला, जगदीश, जैन के ठिकानों की,
संसद चलती रहती जहाँ हॉस्टल के मस्तानों की.
वो चाय, समोसे और मंजू के पान की मिठास,
आज भी होस्टलर्स को दीवाना बनाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.

मिलने का उत्साह तो बिछड़ने का ग़म,
गले मिलते मुस्कुराते पर आँखें रहती नम.
डायरी के पन्नों पर सजी पते-ठिकानों की इबारत,
आज भी सबके साथ का एहसास दिलाती है.
थी आशियाना वो इमारत बहुत याद आती है.






28 मार्च 2018

जीवन की महत्ता उसके निर्वहन में है


कभी कहीं पढ़-सुन रखा था कि एक उम्र भी कम है हाल-ए-दिल सुनाने को, एक याद काफी है उम्र भर रुलाने को, और मुद्दतों बाद भी ये पंक्तियाँ मन-मष्तिष्क को, दिल-दिमाग को झंकृत कर जाती हैं. अकाट्य सत्य कहा जा सकता है इसे कि किसी भी व्यक्ति की एक याद उम्र भर उसके प्रति संवेदनाओं से, भावनाओं से सराबोर करती रहती है. हम सभी के जीवन में बहुत से लोग ऐसे आते हैं जिन्हें चाह कर भी हम भुला नहीं पाते हैं. या कहें कि ऐसे लोगों को भुलाया जाना सहज नहीं होता है. हमारे दैनिक कार्यों में, जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ऐसे लोग बराबर साथ खड़े दिखाई देते हैं. उनका कुछ पल का साथ ही अपने आपमें ज़िन्दगी बन जाता है. इस ज़िन्दगी को जब भी खुद की ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ पाया जाता है तो अपनी ज़िन्दगी कमतर समझ आने लगती है. इसके पीछे मुख्य कारण उस साथ देने वाले के चंद पलों का महत्त्वपूर्ण होना रहता है. जीवन की अवधि इससे तय नहीं होती कि किसी व्यक्ति ने कितने वर्ष इस संसार में व्यतीत किये वरन इससे निर्धारित होती है कि उसके साथ कितने लोगों ने अपनी ज़िन्दगी के पल बिताये. यही वो स्थिति होती है जबकि किसी भी व्यक्ति को अपनी ज़िन्दगी बहुत बड़ी या बहुत छोटी समझ आ सकती है.


यदि किसी व्यक्ति की ज़िन्दगी का आधार उसके स्वयं के लोग, उसकी स्वयं की ज़िन्दगी है तो स्पष्ट है कि उसके लिए किसी और का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है. इसके उलट यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके लिए जीवन का तात्पर्य न केवल खुद से है वरन सबके जीवन से है तो उसके जीवन का आधार सबके जीवन से निर्धारित होता है. ऐसे लोगों के लिए बहुधा जीवन बहुत छोटा महसूस होता है. वे बाकी लोगों के लिए जितना कुछ करना चाहते हैं, उतना अपने इस अल्प जीवन में कर नहीं पाते हैं. ऐसे लोगों के लिए जीवन का सन्दर्भ महज साँस लेने से नहीं, महज पारिवारिक दायित्व निर्वहन से नहीं, अपनी जिम्मेवारियों को पूरा करने से नहीं वरन सम्पूर्ण परिदृश्य में सम्मिलित रहता है. ऐसे लोग अपने जीवन का एक-एक पल न केवल समाज के लिए वरन सामाजिक उत्थान के लिए बिता देना चाहते हैं. ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो अपने ऐसे चंद पलों के द्वारा न केवल उतने दिनों के लिए वरन आजीवन रूप से हमारे साथ जुड़ जाते हैं. ऐसे लोगों के साथ बिताया गया एक छोटा सा पल भी अपने आपमें एक जीवन होता है, एक ज़िन्दगी होती है. आज जिस स्थिति में समाज का सञ्चालन दिख रहा है, उसमें ऐसे लोगों को भी मानक रूप में समाज के सामने लाने की आवश्यकता है जो अपने जीवन को दूसरों के लिए समर्पित किये हुए हैं. यदि हम सब ऐसा कर पाते हैं तो न केवल ऐसे लोगों का सम्मान कर सकेंगे वरन समाज को भी एक दिशा दे सकते हैं.

16 फ़रवरी 2018

बुलंद हौसलों की कहानी


जीवन सिर्फ सुविधाओं का, सहजता का, आराम का नाम नहीं है. जीवन है तो सुख के साथ दुःख भी हैं, आराम के साथ कष्ट भी है, मुस्कान के साथ आँसू भी हैं. ये और बात है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में किस भाग को प्रमुखता देकर उसी के अनुसार अपनी जिंदगी का व्यतीत करता है. जीवन में आने वाले पल के सुखमय या दुखमय होने पर भले ही इन्सान का पूर्ण नियंत्रण न हो किन्तु इस पर अवश्य नियंत्रण है कि उन परिस्थितियों को किस तरह निकाला जाये, उन स्थितियों से कैसे निपटा जाये. ये सही है कि जीवन में आने वाले सुख के, खुशियों के पल अचानक से बहुत जल्दी समाप्त होते समझ आते हैं और कष्टों के, दुखों के दिन बहुत देर से बीतते हुए मालूम पड़ते हैं. देखा जाये तो यह भी अपनी जीवन-शैली के बिताने के तौर-तरीकों पर निर्भर करता है. यदि इन्सान अपनी धारणा बना ले कि उसका जीवन सिर्फ और सिर्फ कष्टप्रद है तो उसका एक-एक पल सिर्फ और सिर्फ कष्ट में बीतता है. इसके अलावा यदि वह मान ले कि किसी भी पल को सिर्फ हँसते-हँसते बिताना है तो उस पल में छिपे हजारों-हजार कष्ट भी एक पल में गायब हो जाते हैं. दुनिया में एक-दो नहीं वरन अनेकानेक ऐसे उदाहरण हैं जिनमें किसी भी व्यक्ति ने कष्टों को दरकिनार करते हुए अपनी जिंदगी को सुखमय ही नहीं बनाया वरन दूसरों के लिए खुद को उदाहरण भी बनाया है.


दो-चार दिन पहले समाचार-पत्र पलटते हुए दो अलग-अलग खबरों पर नजर गई. दोनों ख़बरों का मूल एक था, भले ही वे दोनों खबरें अलग-अलग देशों की क्यों न रही हों. उन दोनों खबरों ने न केवल आकर्षित किया बल्कि उन दोनों व्यक्तियों के प्रति सम्मान भी जगाया जो अपनी शारीरिक अक्षमता को कहीं दूर हाशिये पर लगाकर बराबर सफलता की कहानी लिखने में लगे हैं. ऐसा नहीं है कि ये दो व्यक्ति अपने आपमें पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी शारीरिक कमजोरी को ही अपनी मजबूती बनाकर खुद के लिए नई कहानी लिखी और न ही ये दोनों अंतिम व्यक्ति होंगे जो ऐसा कर रहे हैं. बहुत से व्यक्ति ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी शारीरिक अक्षमता को सक्षमता में बदल कर नए-नए मानक गढ़े. ऐसे व्यक्तियों को समाज में आदर्श के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है क्योंकि आज समाज से लगातार आदर्शों की कमी होती जा रही है. देखने में आता है कि जरा सी शारीरिक कमजोरी के आते ही बहुतेरे इन्सान खुद को इस कदर कमजोर साबित करने में लग जाते हैं जैसे संसार के सबसे ज्यादा कष्ट उसी एक के पास हैं. इस तरह के बहुतेरे लोग खुद को जीवन-यापन में भी अक्षम मानते हुए भीख मांगने का काम करते देखे जाते हैं. आज जरूरत है कि लोगों के सामने ऐसे लोगों की कहानी लाई जाये जो शारीरिक अक्षमता के बाद भी अनेकानेक कठिनाइयों को मात देते हुए अपने आपको स्थापित किये हैं. अपनी ज़िदगी को हँसते-खेलते बिता रहे हैं.


इन दो व्यक्तियों के बारे में कोई अलबेला सा ऐसा नहीं लगा जो पहली बार हुआ हो. बस कई बार होता है कि कोई जानकारी, कोई खबर मन को एकदम से छू जाती है, कुछ ऐसा ही इन दोनों खबरों के साथ हुआ और बस उन दो व्यक्तियों को आपके सामने लाने का मन भी हो आया. ज्यादा कुछ न कहते हुए उन दोनों खबरों की कतरन आपके सामने है.


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उक्त खबरें दैनिक भास्कर, ग्वालियर संस्करण में 12-13 फरवरी 2018 को प्रकाशित हुईं 

24 सितंबर 2016

जीवन मूल्य स्थापित करने होंगे

समाज का जब निर्माण हुआ होगा, उस समय भी किसी न किसी तरह के मूल्य अवश्य ही चलन में रहे होंगे। भारतीय संदर्भों में मूल्यों का तादात्म्य सत्यम, शिवम, सुन्दरम से बैठाकर उसे अनुपम, अलौकिक माना जाता है। वर्तमान समय में जबकि वैश्विक स्तर पर अनेकानेक लोकतान्त्रिक शक्तियाँ विभिन्न प्रकार के संकटों से दो-चार हो रही है, उन्हें भी मूल्यों की, मानवीय मूल्यों की महत्ता का एहसास हो रहा है। ऐसी स्थिति में वैश्विक स्तर पर जीवन मूल्यों को अपनाने की सलाह दी जाने लगती है। देशों को, वहाँ के नागरिकों को, नक्सलवाद अथवा आतंकवाद के द्वारा नरसंहार करने वाले व्यक्तियों, संगठनों से जीवन मूल्यों की रक्षा करने की गुहार लगाई जाने लगती है। सवाल उठता है कि आखिर मानवीय मूल्यों, जीवन मूल्यों अथवा मूल्यों की पहचान क्या है? इनके स्थापन के मानक क्या हैं?

जीवन-मूल्यों अथवा मानवीय-मूल्यों को समझने के लिए उसके निर्धारक तत्त्वों को जानना अपरिहार्य है। मनुष्य का सम्पूर्ण कायिक, मानसिक, सामाजिक व्यवहार उसकी मूल प्रवृत्तियों के द्वारा संचालित होता है। इन्हीं प्रवृत्तियों के आधार पर मूल्य संरचना निर्माण को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जाता है। इसमें पहला जैविक आधार और दूसरा पराजैविक आधार कहा जाता है। इन मूल्यों में जैविक आधार के अन्तर्गत शारीरिक संरचना, मूल प्रवृत्तियाँ, संवेग, प्रेरणा, अनुभूतियाँ, अभिवृत्तियाँ, सहानुभूति, अनुकरण, सुझाव, अभिरुचि, पूर्व धारणा और तर्क को सम्मिलित किया जाता है। पराजैविक आधार को पुनः तीन भागों सामाजिक, प्राकृतिक और मानविकी में स्वीकारा गया है। इस विभाजन में किसी भी व्यवस्था को सुचारू ढंग से संचालित करने के लिए उसका पराजैविक आधार अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें सामाजिक मूल्य के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी अन्तर्निहित हैं। मनुष्य की कल्पनाशीलता, उसकी तार्किकता, चैतन्यता उसके अन्य पशुओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ बनाती है। उसकी यही सांस्कृतिकता के चलते उसके प्रत्येक कार्य का मूल्यपरक होना परिहार्य होता है। सामाजिक मान्यताओं की बात हो अथवा राजनैतिक स्थितियों की चर्चा सभी में मानव के जीवन-मूल्यों का सशक्त होना जरूरी है। यदि मानवीय मूल्यों की आदर्शवादी व्यवस्था न हो तो सम्भवतः समाज का, शासन का संचालन करना बेहद दुष्कर हो जाये। आस्थाओं, परम्पराओं, चिन्तन, जीवन-साधना को विस्मृत करने के बाद किसी भी रूप में सामाजिकता को विखण्डित करने का कार्य किया जाना मानवीय-मूल्यों के लोप को ही दर्शाता है।

मानवीय क्रियाकलापों में आज मानवीय मूल्यों में हृास देखने को मिल रहा है। परिवार जैसी संस्था का लोप होता जा रहा है। संयुक्त परिवार लगातार सिकुड़ते हुए एकल परिवारों और नाभिकीय परिवारों में सिमटने लगे हैं। ऐसा होने से संयुक्त परिवारों में सम्पत्ति के अधिकारों में परिवर्तन, परम्परागत व्यवसाय के महत्व में कमी, सम्बन्धों में परिवर्तन, धार्मिक प्रकृति का हृास, आकार का हृास, परिवार के महत्व में कमी आदि देखने को मिली है। समाज में जिस तरह से लगातार हिंसा, अत्याचार, महिला हिंसा, यौनापराध, हत्याओं आदि का सिलसिला चल निकला है वह मानवीय मूल्यों के क्षरण का ही दुष्परिणाम है। ऐसे में विचार करने की आवश्यकता है कि इन मूल्यों को कैसे प्रतिस्थापित किया जाये? इनके क्षरण को कैसे रोका जाये? समझने की बात है कि आखिर हम मानवीय मूल्यों के विकास के लिए कर क्या रहे हैं? हम जीवन-मूल्यों की प्रतिस्थापना के लिए, अगली पीढ़ी में उसके हस्तांतरण के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? यदि पूरी ईमानदारी से मनुष्य अपने प्रयासों की ओर देख भर ले तो पायेगा कि उसके समस्त क्रियाकलापों के द्वारा मूल्यों का, जीवन-मूल्यों का क्षरण ही हुआ है।


मानवीय मूल्यों का मनुष्य के साथ साहचर्य अनादिकाल से रहा है और बिना इसके मनुष्य निरा पशु समान ही माना गया है। ऐसे में किसी भी रूप में मानवीय मूल्यों को बचाना मानव की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। यद्यपि परिवर्तन समाज की शाश्वत प्रक्रिया है किन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कहीं लगातार होते जा रहे अंधाधुँध परिवर्तन में मनुष्य स्वयं को तो समाप्त नहीं करता जा रहा है। जब भी कोई समाज विकासक्रमानुसार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में सवंमित होता है तभी जीवन-व्यवस्था से सम्बद्ध मानवीय सम्बन्धों पर आधारित जीवन-मूल्यों के स्वरूप एवं दिशा में भी परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। तब युगीन आवश्यकतानुसार पूर्वस्थापित जीवन-मूल्यों का पुनर्मल्यांकन, अवमूल्यन तथा नव-निर्माण का कार्यक्रम भी क्रियान्वित होता है।ऐसी स्थिति में जीवन-मूल्यों की प्रतिस्थापना के लिए एकमात्र सहारा शिक्षा व्यवस्था ही नजर आती है। शिक्षा जहाँ एक ओर मनुष्य के वैयक्तिक व्यक्तित्व को विकसित करती है, वहाँ उसके सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यक्तित्व को भी गति देती है। देखा जाये तो शिक्षा व्यक्ति की चिन्तन-शक्ति, अभिरुचि, क्षमता आदि का विकास करके उसकी सामाजिकता और सांस्कृतिकता का निर्माण करता है। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति कई-कई पीढ़ियों की सांस्कृतिक विरासत का संवाहक बनता है। यही संवाहक यदि मानवीय-मूल्यों का संरक्षण करता हुआ आगे बढ़ता है तो वो न केवल समाज के लिए लाभकारी होता है वरन् लोकतन्त्र के लिए भी कारगर होता है। 

12 जुलाई 2015

स्वतंत्रता, सेक्स, जीवन, जीवन-मूल्य



ये अपने आपमें एक परम सत्य है कि सेक्स किसी भी जीव की नैसर्गिक आवश्यकता है. न केवल इंसानों में वरन जानवरों में भी इसको देखा गया है. कहा तो ये भी जाता है कि पेड़-पौधों में भी आपस में निषेचन क्रिया संपन्न होती है, जो एक तरह से सेक्स का ही स्वरूप है. बहरहाल, जिस तरह से मानव समाज के विकास की स्थितियाँ बन रही हैं, विकसित हो रही हैं, उनके साथ-साथ सेक्स सम्बन्धी समस्याओं में, दुराचार की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिली है. प्राकृतिक सेक्स संबंधों के साथ-साथ समाज में अप्राकृतिक सेक्स संबंधों के बनाये जाने की खबरें भी सामने आ रही हैं. देखा जाये तो कहीं न कहीं समलैंगिकता भी अप्राकृतिक शारीरिक सम्बन्ध ही है मगर जैसे-जैसे इसके विरोध की बात सामने आती है वैसे-वैसे ही इसके समर्थन में भी प्रदर्शन किये जाने लगते हैं. अदालतों ने भी इन संबंधों के प्रति उदार रवैया अपनाते हुए कानूनी तौर पर समलिंगियों को पर्याप्त राहत प्रदान की है. समलैंगिकता के विरोधी जहाँ भारतीय संस्कृति में इस तरह के सम्बन्ध न बनाये जाने की वकालत करते हैं वहीं इसके समर्थक इसे अपना अधिकार, अपनी जीवनशैली की स्वतंत्रता मानते हैं.
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आखिरकार यहाँ समझना ही होगा कि स्वतंत्रता है क्या? जीवनशैली आखिर किस तरह से संचालित की जाये? इसे भी समझने की जरूरत है कि कहीं जीवनशैली की स्वतंत्रता के नाम पर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति सेक्स संबंधों में स्वतंत्रता तो नहीं चाह रहा है? कहीं स्वतंत्रता के नाम पर सेक्स को समाज में कथित तौर पर स्थापित करने की साजिश तो नहीं? सेक्स को लेकर, शारीरिक संबंधों को लेकर, विपरीतलिंग को लेकर समाज में जिस तरह से अवधारणा निर्मित की जा रही है, उसे देखते हुए लगता है जैसे इंसान के जीवन का मूलमंत्र सिर्फ और सिर्फ सेक्स रह गया है. आपसी वार्तालाप में, मित्रों-सहयोगियों के हास-परिहास में बहुधा सेक्स, विपरीतलिंगी चर्चा के केंद्रबिंदु बने होते हैं. दृश्य-श्रव्य माध्यमों में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों, विज्ञापनों में भी सेक्स का प्रस्तुतीकरण इस तरह से किया जाता है जैसे बिना इसके इंसान का जीवन अधूरा है. समस्या यहीं आकर आरम्भ होती है क्योंकि प्रस्तुतीकरण के नाम पर फूहड़ता का प्रदर्शन ज्यादा किया जाता है; दैहिक संतुष्टि के नाम पर जबरन सम्बन्ध बनाये जाने की कोशिश की जाती है; प्यार के नाम पर एकतरफा अतिक्रमण किया जाता है; स्वतंत्रता के नाम पर रिश्तों का, मर्यादा का दोहन किया जाता है. सोचना होगा कि कल को वे मानसिक विकृत लोग, जो दैहिक पूर्ति के लिए जानवरों तक को नहीं बख्शते हैं, अपने अप्राकृतिक यौन-संबंधों को जायज ठहराने के लिए सडकों पर उतर आयें, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर, जीवनशैली चुनने की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी जानवर के साथ को कानूनी स्वरूप दिए जाने की माँग करने लगें तो क्या ऐसे लोगों की मांगों को स्वीकारना होगा?
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जिस तरह से इक्कीसवीं शताब्दी के नाम पर उत्पादों, विचारों, खबरों, कार्यक्रमों, भावनाओं का प्रचार-प्रसार किया गया है उसमें इंसान की वैयक्तिक भावनाओं को ज्यादा महत्त्व प्रदान किया गया है. उसके लिए सामूहिकता, सामाजिकता, सहयोगात्मकता आदि को दोयम दर्जे का सिद्ध करके बताया गया है, व्यक्ति की नितांत निजी स्वतंत्रता को प्रमुखता प्रदान की गई है, ये कहीं न कहीं सामाजिक विखंडन जैसी स्थिति है. पाश्चात्य जीवनशैली को आधार बनाकर जिस तरह से भारतीय जीवनशैली में दरार पैदा की गई है वह भविष्य के लिए घातक है. इसके दुष्परिणाम हमें आज, अभी देखने को मिल रहे हैं. जिस उम्र में बच्चों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए वे रोमांस में घिरे हुए हैं; जिस क्षण का उपयोग उन्हें अपना कैरियर बनाने के लिए करना चाहिए उन क्षणों को वे शारीरिक सुख प्राप्त करने में व्यतीत कर रहे हैं; जो समय उनको ज्ञानार्जन के लिए मिला है उस समय में वे अविवाहित मातृत्व से निपटने के उपाय खोज रहे हैं. कई-कई बार ये आश्चर्य का विषय ज्ञात होता है कि जिस भारतीय संस्कृति पर हम और हमारा देश गर्व करता है, उसकी सार्थक मीमांसा, उसके सकारात्मक चिंतन, उसकी सामाजिक उपयोगिता के बारे में हमें कोई विदेशी आकर आगाह करता है. हमारे देश की जिस पीढ़ी को इस तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए वो सेक्स, समलैंगिकता, अविवाहित मातृत्व, विवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्ध, सुरक्षित सेक्स आदि की मीमांसा, चिंतन करने में लगा हुआ है. संभव है कि ऐसे लोगों के सामने भारतीय संस्कृति का कोई व्यापक अथवा सकारात्मक अर्थ ही न हो क्योंकि इस पीढ़ी ने मुख्य रूप से दैहिक सम्बन्धों की चर्चा अपने आसपास होते देखी है. यहाँ आकर समझना होगा कि सेक्स, शारीरिक सम्बन्धों के मामले में नितांत खुला जीवन जीने वाले पाश्चात्य देशवासी भी कहीं न कहीं संयमित भारतीय जीवनशैली के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. सेक्स को, दैहिक तृष्णा को एकमात्र उद्देश्य मानकर आगे बढ़ती पीढ़ी न केवल सामाजिकता का ध्वंस कर रही है बल्कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भुलाकर समाज में एक दूसरे तरह की गुलामी को जन्म दे रही है. काश! स्वतंत्रता के नाम पर अधिकारों को समझा जाए न कि अनाधिकार चेष्टा को; काश! वैयक्तिक जीवनशैली के नाम पर रिश्तों की मर्यादा को जाना जाए न कि उनके अमर्यादित किये जाने को; काश! निजी जिंदगी के गुजारने के नाम पर पारिवारिक सौहार्द्र को समझा जाए न कि जीवन-मूल्यों के ध्वंस को; काश! जीवन को जीवन की सार्थकता के नाम पर समझा जाये न कि कुंठित सेक्स भावना के नाम पर. काश....!!!