06 May 2018

हँसते रहे तो जिंदा रहोगे


ये जानकार आश्चर्य हुआ कि आज, 6 मई को विश्व हास्य दिवस मनाया जा रहा है. इसे हमारी सामान्य ज्ञान में कमी भले ही समझा जाये मगर हमने व्यक्तिगत रूप से कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी कोई दिन मनाया जाता होगा. इंसानी शारीरिक क्रियाओं में हँसना स्वाभाविक क्रिया है, जिसके लिए न किसी तरह की मेहनत करनी पड़ती है, न किसी तरह का श्रम करना पड़ता है. ऐसे में यदि इस स्वाभाविक क्रिया के लिए भी एक दिन निर्धारित करना पड़े तो इसका अर्थ है कि इन्सान हँसना-मुस्कुराना भूलता जा रहा है या भुला चुका है. मई माह के पहले रविवार को मनाया जाने वाले हास्य दिवस का उद्देश्य भयग्रस्त समाज को हँसने के द्वारा कुछ देर को ही सही, भय से दूर रखना है. हास्य दिवस का विश्व हास्य दिवस के रूप में पहला आयोजन 11 जनवरी 1998 को मुंबई में किया गया था. विश्व हास्य योग आंदोलन की स्थापना डॉ० मदन कटारिया द्वारा की गई और उनके ही प्रयासों से विश्व हास्य दिवस का आरंभ संसार में शांति की स्थापना, भाईचारे, सदभाव के उद्देश्य से हुआ. वर्तमान में इस दिवस की लोकप्रियता हास्य योग आंदोलन के माध्यम से पूरी दुनिया में फैल गई. ऐसा माना जा रहा है कि इस समय अधिकांश विश्व आतंकवाद के डर से सहमा हुआ है, इसलिए हास्य दिवस की अत्यधिक आवश्यकता है. आज से पहले दुनिया में इतनी अशांति देखने को नहीं मिली थी. आज हर व्यक्ति के अंदर द्वंद्व मचा हुआ है. चूँकि हंसी के द्वारा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, इस कारण प्रत्येक व्यक्ति को हँसी की महत्ता बताने के लिए इस दिवस का आरम्भ किया गया. समाज में वर्तमान में प्रचलित हास्य योग के अनुसार, हास्य सकारात्मक और शक्तिशाली भावना है, जिसमें व्यक्ति को ऊर्जावान और संसार को शांतिपूर्ण बनाने के सभी तत्त्व उपस्थित रहते हैं. यह व्यक्ति के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित करता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. जब व्यक्ति समूह में हंसता है तो उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पूरे क्षेत्र में फैल जाती है और क्षेत्र से नकारात्मक ऊर्जा हटती है.


विश्व हास्य दिवस के पीछे की वास्तविकता क्या है, सत्यता क्या है ये तो इसे मनाने वाले, अपनाने वाले जाने मगर व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना है कि आज ही नहीं वरन समाज में भय सदैव से बना रहा है. वर्तमान और अतीत के भय में मूल अंतर यह था कि उस समय किसी भी स्थिति, परिस्थिति, घटना, दुर्घटना आदि से भयभीत होने वाला खुद को अकेला महसूस नहीं करता था. उस समय उसके सहयोगी, उसका परिवार, उसके मित्र, उसका पड़ोस उसके साथ दिखाई देता था. आज स्थिति इसके ठीक उलट है. आज व्यक्ति ख़ुशी को महसूस कर रहा है मगर अकेला है. अपनी खुशियों को बाँटने के अवसर उसके पास हैं मगर उसकी ख़ुशी को बाँटने वाले लोग उसके साथ नहीं हैं. ऐसे में किसी के भय के, डर के साथ कौन आकर खड़ा होगा. इसके अलावा एक और बात जो महत्त्वपूर्ण है कि आज इन्सान के भीतर अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ चुका है. उसे अपने सगे सम्बन्धियों पर भरोसा नहीं. उसे अपने मित्रों पर भरोसा नहीं. उसे अपने सहयोगियों पर विश्वास नहीं. ऐसे में भी किसी विषम स्थिति में इन्सान खुद को अकेले महसूस करता है. और सीधी सी बात है कि अकेला आदमी कितनी देर हँस सकता है, कितना मुस्कुरा सकता है. वैसे भी हमारा समाज वह है जहाँ अकेले हँसने वाले को पागल, मानसिक दीवालिया समझा जाता है.

विश्व हास्य दिवस को भले ही मनाया जाए मगर सोचा जाये कि एक दिन की हँसी किस तरह डर को दूर करेगी? एक दिन का हास्य कैसे समाज में फ़ैल रहा भय दूर करेगा? बेहतर हो कि इन्सान आपस में संबंधों को मजबूत करे. सामाजिकता का जिस तरह से लोप हो रहा है उसे दूर करने की कोशिश करे. मिलने-मिलाने का जो माहौल आज समाप्त हो चुका है उसे पुनः जिन्दा किया जाये. संबंधों में खो चुके विश्वास को फिर से लाया जाये. घरों की चाहरदीवारी से बाहर आकर समाज के मैदान पर लोगों से मिला-जुला जाये. मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी आदि पर फूहड़ कार्यक्रमों के खरीदे हुए कलाकारों को ठहाके लगाते देख हँसने की जबरिया कोशिश से बाहर निकल कर वास्तविक हास्य का आनंद लिया जाये. ऐसा नहीं कि समाज में ख़ुशी नहीं है, ऐसा नहीं है कि प्रकृति ने हास्य नहीं बिखेरा है बस खुद को जागरूक करने की आवश्यकता है. एक बार व्यक्ति अपने बनाये खोल से बाहर आने की कोशिश कर ले, एक बार वह अपने बनाये घरौंदे को तोड़ दे, एक बार वह कथित बुद्धिजीवी होने के ढोंग से बाहर निकल आये फिर उसके आसपास हास्य ही हास्य है. आज देखने में आता है कि सामाजिक रूप से किसी भी तरह की प्रस्थिति न होने के बाद भी लोग क्या कहेंगे की मानसिकता के चलते लोगों ने अपने चेहरे पर जबरन ही कठोरता चिपका रखी है. सार्वजनिक कार्यक्रमों में अकारण ही खुद को सबसे अलग दिखाने की कोशिश में हँसना भुला कर नाहक ही गंभीरता ओढ़े फिरते हैं. ऐसे लोग न खुद हँसने की कोशिश करते हैं और न ही दूसरों के हँसने में शामिल होते हैं. ऐसे लोगों ने ही हँसने को किसी दूसरे ग्रह की स्थिति बना दिया है.

जागिये, सोचिये, समझिये कि इस प्रकृति ने हमें स्वाभाविक क्रिया दी है जो न केवल खुद को प्रसन्न करती है वरन सामने वाले को भी मुग्ध करती है. पता नहीं क्यों, कब, कैसे ठहाके लगाकर हँसना, खुलकर हँसना फूहड़ता का प्रतीक बना दिया गया. हम तो आज भी खुलकर हँसते हैं, ठहाके मार कर हँसते हैं, सार्वजनिक जगहों पर खुलकर हँसते हैं, घर में बैठकर हँसते हैं, सबके साथ मिलकर हँसते हैं. मुस्कुराते चेहरे के साथ, हँसते रहने के कारण हमें तो आज तक आवश्यकता न हुई थी इस दिवस को मनाने की. कभी भय भी न लगा कि क्या होगा, कभी डर भी नहीं लगा कि क्या होने वाला है. सत्य यही है कि आने वाले समय को किसी ने नहीं देखा है, जो होना होगा वही होगा फिर आने वाले समय की अनिश्चितता के लिए वर्तमान को दुखद क्यों बनाया जाये? आज को बोझिल क्यों बनाया जाये? जो होगा गया यदि उसे बदलना हमारे हाथ नहीं तो दुखी बने रहने से क्या लाभ? इसलिए आज में जीना होगा, वर्तमान में खुद को स्थापित करना होगा और यह होगा खुद को सभी चिंताओं, डर, भय से मुक्त करके. खूब हँसिये, ठहाके लगाकर हँसिये फिर देखिये डर कैसे गायब होता है. भय कैसे दूर भागता है. हाँ, समय, स्थिति, काल, वातावरण के अनुसार सभी चीजें भली लगती हैं, हँसना भी उसमें शामिल है.

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